

विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर रुपये पर साफ दिखाई दे रहा है। आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में अब तक रुपया करीब 11 प्रतिशत कमजोर हो चुका है। यह गिरावट पिछले एक दशक में किसी भी वित्त वर्ष की तुलना में सबसे अधिक मानी जा रही है।
रुपये में गिरावट के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतों में उछाल रुपये पर दबाव बना रहा है। जानकारों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रह सकता है, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका है और इसका सीधा असर करेंसी पर पड़ रहा है।
विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से लगातार पैसा निकालना भी एक बड़ी वजह है। आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक महीने में करीब 13 अरब डॉलर की निकासी की गई है, जिससे रुपये पर दबाव और बढ़ा है।
आगे क्या रह सकता है रुख?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जब तक ईरान और इजरायल के बीच जारी तनाव कम नहीं होता, तब तक रुपये में बड़ी मजबूती की संभावना कम है। हालांकि सरकार अपने स्तर पर स्थिति संभालने की कोशिश कर रही है।
पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में कटौती का फैसला लिया है, जिससे आम लोगों को कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, इससे सरकारी राजस्व पर दबाव बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

रेणु बाला ने अपने जवाब में यह भी आरोप लगाया कि उनके खिलाफ सुनियोजित तरीके से अभियान चलाया गया और उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि जो आरोप लगाए गए हैं वे पूरी तरह निराधार हैं और सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। इस पूरे मामले ने कांग्रेस के अंदरूनी मतभेदों को उजागर कर दिया है जहां एक ओर पार्टी अनुशासन की बात कर रही है वहीं दूसरी ओर विधायक खुद को निर्दोष साबित करने में जुटे हैं।
दरअसल 16 मार्च को हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान हरियाणा कांग्रेस के पांच विधायकों पर क्रॉस वोटिंग के आरोप लगे थे जिसके बाद पार्टी ने 20 मार्च को इन सभी को कारण बताओ नोटिस जारी किया। पार्टी का आरोप था कि इन विधायकों ने जानबूझकर आधिकारिक उम्मीदवार को हराने की कोशिश की जो अनुशासनहीनता के साथ साथ पार्टी विरोधी गतिविधि की श्रेणी में आता है। नोटिस में सात दिनों के भीतर जवाब देने को कहा गया था।
अब तक तीन विधायक अपने जवाब दे चुके हैं जिनमें रेणु बाला के अलावा शैली चौधरी और जरनैल सिंह शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार इन सभी ने लगभग एक जैसी सफाई दी है और कहा है कि उन्होंने पार्टी उम्मीदवार को ही वोट दिया और अपना बैलट अधिकृत एजेंट को दिखाया था। इसके बावजूद उनके खिलाफ आरोप लगाए जाना राजनीतिक साजिश का हिस्सा बताया जा रहा है। वहीं दो अन्य विधायक मोहम्मद इलियास और मोहम्मद इजरायल ने अभी तक अपना जवाब नहीं दिया है जिससे इस मामले को लेकर सस्पेंस बना हुआ है।
इधर मोहम्मद इजरायल ने अपने क्षेत्र में एक कार्यक्रम के दौरान दिए बयान में संकेत दिए कि उनके फैसले को जनता के नजरिए से देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो भी निर्णय उन्होंने लिया वह क्षेत्र के विकास और लोगों के सम्मान के लिए था और उसमें उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में चुनाव लड़ने और किस पार्टी से लड़ने का फैसला जनता ही करेगी। उनके इस बयान को राजनीतिक हलकों में अलग अलग नजरिए से देखा जा रहा है।
गौरतलब है कि राज्यसभा चुनाव में खुली मतदान प्रणाली लागू होती है जिसमें विधायकों को वोट डालने के बाद पार्टी के अधिकृत एजेंट को अपना बैलट पेपर दिखाना होता है। हालांकि क्रॉस वोटिंग करने पर उनकी सदस्यता तो समाप्त नहीं होती लेकिन पार्टी अपने स्तर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई जरूर कर सकती है। ऐसे में यह मामला केवल एक चुनावी विवाद नहीं बल्कि कांग्रेस के अंदर अनुशासन और एकजुटता की बड़ी परीक्षा बन गया है। आने वाले दिनों में पार्टी इस पर क्या कदम उठाती है इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

स्थिति और भी चिंताजनक इसलिए हो जाती है क्योंकि इस पूरे मामले के दौरान नगर निगम के अधिकारी सब कुछ देखते रहे लेकिन किसी ने भी हस्तक्षेप करने या कार्रवाई करने की जरूरत नहीं समझी। यह केवल एक व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता का उदाहरण है जहां गरीब और जरूरतमंद लोगों को रोजगार के नाम पर ठगा जा रहा है। एजेंसी ने कर्मचारियों से न केवल नौकरी के लिए पैसे लिए बल्कि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित भी किया और विरोध करने पर धमकाकर चुप रहने के लिए मजबूर किया।
वेतन और अन्य सुविधाओं के मामले में भी भारी अनियमितताएं सामने आई हैं। कर्मचारियों को उनके ईपीएफ और अन्य कटौतियों की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई जिससे उनके भविष्य की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। इतना ही नहीं हर गार्ड से एक सेट वर्दी के नाम पर 5600 रुपये वसूले गए जबकि बाजार में इसकी वास्तविक कीमत दो से ढाई हजार रुपये के बीच होती है। यह सीधे तौर पर कर्मचारियों के शोषण और धोखाधड़ी का मामला है।
इस एजेंसी का विवादों से पुराना नाता भी रहा है। लगभग नौ साल पहले भी नगर निगम में ईपीएफ और ईएसआईसी घोटाले में इसका नाम सामने आया था जब कर्मचारियों के खाते में जमा की जाने वाली राशि का भुगतान नहीं किया गया था। इसके अलावा वर्ष 2014 में सारण जिले में इस एजेंसी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इन तथ्यों को छिपाकर एजेंसी ने लाइसेंस हासिल किया था जिसे बाद में नवंबर 2025 में गृह विभाग द्वारा निरस्त कर दिया गया।
अब जब यह मामला सामने आया है तो नगर निगम प्रशासन ने जांच और कार्रवाई की बात जरूर कही है लेकिन सवाल यह है कि जब इतनी बड़ी अनियमितताएं लंबे समय से चल रही थीं तब तक जिम्मेदार अधिकारी चुप क्यों बैठे रहे। क्या यह लापरवाही थी या फिर मिलीभगत इसका जवाब मिलना अभी बाकी है। फिलहाल दो आउटसोर्सिंग एजेंसियों पर वित्तीय अनियमितताओं के चलते कार्रवाई की तलवार लटक रही है और उनसे वेतन भुगतान में देरी सहित अन्य मुद्दों पर स्पष्टीकरण मांगा गया है।
यह घटना केवल एक शहर या एक एजेंसी तक सीमित नहीं है बल्कि यह देशभर में फैल रही उस व्यवस्था की तस्वीर है जहां आउटसोर्सिंग के नाम पर पारदर्शिता की कमी और जवाबदेही का अभाव आम लोगों के शोषण का कारण बन रहा है। जरूरत इस बात की है कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई हो ताकि भविष्य में कोई भी एजेंसी गरीब और मजबूर लोगों के अधिकारों का इस तरह दुरुपयोग करने की हिम्मत न कर सके।

बीते एक साल में कई शीर्ष माओवादी नेताओं ने हथियार डालकर मुख्यधारा में वापसी की है। हाल ही में ओडिशा में वांछित माओवादी नेता सुक्कू ने चार अन्य माओवादियों के साथ 25 मार्च को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया। एडीजी (एंटी नक्सल ऑपरेशंस) संजीव पांडा के अनुसार, आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी नेताओं पर कुल 66 लाख रुपये का इनाम था। साथ ही पांच हथियार भी बरामद किए गए, जिनमें एक एके-47, एक इंसास राइफल और एक सिंगल शॉट गन शामिल हैं।
कंधमाल जिले में अब माओवादियों की संख्या सिंगल डिजिट में रह गई है। एडीजी संजीव पांडा ने बताया कि अब केवल 8–9 माओवादी बचे हैं और आने वाले दिनों में अभियान को और तेज किया जाएगा। उन्होंने शेष माओवादियों से अपील की है कि वे आत्मसमर्पण करें और सरकार की सभी आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीतियों का लाभ उठाएं।
इस चर्चा के माध्यम से लोकसभा में नक्सलवाद को समाप्त करने के केंद्र सरकार के व्यापक प्रयासों और रणनीति को साझा किया जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीतियों के संयोजन से न केवल हिंसा कम होगी, बल्कि मुख्यधारा में शामिल माओवादी नेताओं के लिए नए अवसर भी खुलेंगे। इस तरह, नक्सल-मुक्त भारत का सपना मार्च 2026 तक हकीकत बन सकता है

38 वर्षों तक चले मुकदमे में 26 नामजद आरोपियों में से 12 की मृत्यु हो गई, और केवल 14 आरोपी जीवित बचे। सालों तक लंबित इस मामले में पीड़ित परिवार ने न्याय के लिए लड़ाई जारी रखी। महावीर यादव के बेटे सुरेंद्र यादव ने अपने पिता और परिवार के अन्य सदस्यों की हत्या के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश-3, बृजेश कुमार सिंह की अदालत ने आखिरकार दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया। 14 आरोपियों में से 12 को साक्ष्यों के आधार पर दोषी पाया गया, जबकि 2 को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। अभियोजन पक्ष ने 12 गवाहों को पेश किया, जिनकी गवाही ने न्याय सुनिश्चित करने में मुख्य भूमिका निभाई।
सजा की घोषणा में लाल बहादुर यादव, विनय यादव, गणेश यादव, जनार्दन यादव और कलमी यादव को धारा 302 के तहत उम्रकैद और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। वहीं रामदेव यादव और ध्यानी यादव को 7 साल के सश्रम कारावास की सजा मिली। गरीब दास यादव, अंगद यादव, जोगी यादव, रामचंद्र यादव और रफू यादव को डेढ़ साल की कैद और जुर्माने की सजा दी गई।
इस फैसले को लेकर इलाके में राहत और न्याय मिलने की भावना है। सरकारी वकील ने इस मुकदमे को महाभारत से कम नहीं बताया, जबकि न्यायपालिका ने ‘देर है पर अंधेर नहीं’ का सजीव उदाहरण पेश किया। यह केस अपने जटिलता और लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण 10 अलग-अलग अदालतों से गुजरा।
स्थानीय लोग और परिवार के सदस्य 38 साल बाद न्याय मिलने को ऐतिहासिक और संतोषजनक मान रहे हैं। इस फैसले ने पीड़ित परिवार की लंबी प्रतीक्षा को समाप्त किया और भविष्य में इस प्रकार के जघन्य अपराधों में न्याय सुनिश्चित करने का मार्ग स्पष्ट किया।

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि आज विकसित यूपी विकसित भारत अभियान के तहत एक नए दौर की शुरुआत हो रही है। उन्होंने वैश्विक हालात का जिक्र करते हुए कहा कि इस समय दुनिया के कई हिस्सों में संकट की स्थिति बनी हुई है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते कई देशों में खाद्य सामग्री ईंधन और अन्य जरूरी संसाधनों की कमी देखने को मिल रही है। ऐसे समय में भारत भी मजबूती से इन चुनौतियों का सामना कर रहा है। कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने जेवर स्थित नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टर्मिनल भवन का निरीक्षण भी किया। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद रहे।
एयरपोर्ट से बढ़ती है तरक्की

महेंद्र हिल्स की पहाड़ियों पर बौद्ध मंदिर स्थित है, जहां आने वाले लोग ध्यान और योग के लिए आते हैं। खासकर सुबह और शाम के समय यहां का दृश्य बेहद मनोहारी होता है। ठंडी हवा, हरियाली और आसपास का शांत माहौल तिब्बत की झलक पेश करता है और पर्यटकों को शहर की आपाधापी से कुछ पल के लिए दूर ले जाता है।
स्थानीय लोग और पर्यटक दोनों ही यहां सैर करने, तस्वीरें लेने और मानसिक शांति पाने आते हैं। यह जगह खास तौर पर उन लोगों के लिए आदर्श है जो जीवन की भागदौड़ में शांति और मानसिक सुकून की तलाश में हैं। धीरे-धीरे महेंद्र हिल्स हैदराबाद- सिकंदराबाद के लोकप्रिय ऑफबीट पर्यटन स्थलों में शामिल होने लगा है।
यदि आप शहर से दूर कुछ समय बिताना चाहते हैं, तो महेंद्र हिल्स में मिनी तिब्बत’ का अनुभव करना एक यादगार अनुभव साबित हो सकता है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण आपको तनावमुक्त और तरोताजा कर देगा।

मामला उत्तर प्रदेश के मऊ जिले से जुड़ा है जहां वर्ष 2023 में पादरी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी आरोप था कि वह प्रार्थना सभाओं के दौरान यह कहते थे कि संसार में केवल एक ही धर्म सत्य है और वह ईसाई धर्म है साथ ही उन पर यह भी आरोप लगाए गए कि वे अन्य धर्मों को नीचा दिखाते हैं जिससे लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं
न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि भारत का संविधान सभी धर्मों को समान सम्मान देने की बात करता है और यही इसकी मूल भावना है ऐसे में किसी एक धर्म को सर्वोच्च या एकमात्र सत्य बताना न केवल सामाजिक सद्भाव के खिलाफ है बल्कि कानून की दृष्टि में भी आपत्तिजनक हो सकता है अदालत ने यह भी कहा कि विविधता में एकता भारत की पहचान है और इसे बनाए रखना सभी नागरिकों की जिम्मेदारी है
अदालत ने विशेष रूप से आईपीसी की धारा 295ए का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी धर्म या उसके अनुयायियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का प्रयास करता है तो यह दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है पादरी के कथित बयान इस दायरे में आते हैं या नहीं इसका निर्णय निचली अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा
पादरी की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को बेवजह परेशान किया जा रहा है और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं उन्होंने कहा कि जांच के दौरान भी धर्मांतरण जैसे आरोप साबित नहीं हुए हैं और बिना निष्पक्ष जांच के ही चार्जशीट दाखिल कर दी गई है इसलिए मामला रद्द किया जाना चाहिए
वहीं सरकारी पक्ष ने इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मामला बनता है और इसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता अदालत ने भी इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि समन जारी करने या संज्ञान लेने के लिए प्रारंभिक साक्ष्य पर्याप्त होते हैं जिनका मूल्यांकन मजिस्ट्रेट द्वारा किया जा सकता है
अंततः अदालत ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए याचिका में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता और इसे खारिज किया जाता है इस फैसले के साथ ही अदालत ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि धार्मिक सहिष्णुता और आपसी सम्मान भारतीय समाज की आधारशिला है और इसे किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं होने दिया जा सकता