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  • ट्रंप प्रशासन का बड़ा अभियान, कथित इमिग्रेशन धोखाधड़ी पर पाकिस्तानी मूल के व्यक्ति समेत 10 लोगों की अमेरिकी नागरिकता रद्द करने की पहल

    ट्रंप प्रशासन का बड़ा अभियान, कथित इमिग्रेशन धोखाधड़ी पर पाकिस्तानी मूल के व्यक्ति समेत 10 लोगों की अमेरिकी नागरिकता रद्द करने की पहल

    नई दिल्ली । अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया में कथित धोखाधड़ी और गंभीर आपराधिक मामलों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई शुरू करते हुए 10 मामलों में अमेरिकी नागरिकता रद्द करने की पहल की है। इन मामलों में पाकिस्तान में जन्मा एक व्यक्ति भी शामिल है, जिस पर अलग-अलग पहचान का उपयोग कर अमेरिकी आव्रजन प्रणाली का लाभ उठाने और बाद में नागरिकता हासिल करने का आरोप है। प्रशासन का कहना है कि यह अभियान अमेरिकी नागरिकता प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने और कथित धोखाधड़ी के मामलों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

    अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग और न्याय विभाग के अनुसार पिछले एक महीने के दौरान ऐसे कई मामलों में न्यायिक कार्रवाई शुरू की गई है, जिनमें नागरिकता प्राप्त करने के दौरान गलत जानकारी देने, महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने या फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप लगाए गए हैं। इन मामलों में केवल आव्रजन धोखाधड़ी ही नहीं, बल्कि बच्चों के यौन शोषण, स्वास्थ्य बीमा धोखाधड़ी, मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े आरोप भी शामिल हैं। हालांकि प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि सभी मामलों में अंतिम निर्णय अदालतों द्वारा ही किया जाएगा।

    कार्रवाई के केंद्र में 65 वर्षीय पाकिस्तानी मूल के मुर्तजा अली का मामला है। अधिकारियों का आरोप है कि उन्होंने अमेरिका में स्थायी निवास और बाद में नागरिकता प्राप्त करने के लिए अलग-अलग नामों से कई आव्रजन आवेदन दाखिल किए। आरोपों के अनुसार उन्होंने अमेरिकी नागरिकता “मोहम्मद इकबाल” नाम से हासिल की थी। बाद में फिंगरप्रिंट मिलान और जांच के दौरान विभिन्न आवेदनों को एक ही व्यक्ति से जुड़ा पाया गया।

    संघीय अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2014 में मुर्तजा अली ने अमेरिकी सरकारी एजेंसी को झूठी और भ्रामक जानकारी देने के मामले में दोष स्वीकार किया था। जांच एजेंसियों का कहना है कि उन्होंने तीन अलग-अलग पहचान का उपयोग करते हुए अलग-अलग आव्रजन लाभ प्राप्त करने का प्रयास किया। इसी आधार पर अब उनके खिलाफ नागरिकता रद्द करने की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है।

    सरकार ने टेक्सास की संघीय अदालत में दायर शिकायत में आरोप लगाया है कि संबंधित व्यक्ति ने इमिग्रेशन धोखाधड़ी, नागरिकता प्रक्रिया के दौरान झूठी गवाही देने और आवश्यक तथ्यों को छिपाने जैसे कृत्यों के माध्यम से अमेरिकी नागरिकता प्राप्त की। प्रशासन का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत जानकारी देकर नागरिकता हासिल करता है तो वह उस नागरिकता पर अपना वैधानिक अधिकार खो देता है।

    ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा है कि अमेरिकी नागरिकता एक विशेष कानूनी अधिकार है और इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया में ईमानदारी सर्वोपरि है। प्रशासन का दावा है कि जिन मामलों में कार्रवाई की गई है, उनमें गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोग शामिल हैं और कानून के अनुसार ऐसे मामलों में नागरिकता रद्द करने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि आने वाले समय में भी इसी प्रकार के अन्य मामलों की समीक्षा जारी रहेगी।

    इन मामलों में पाकिस्तान के अलावा क्यूबा, मेक्सिको, पेरू और पोलैंड में जन्मे कुछ अन्य नागरिक भी शामिल हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी शिकायतें संघीय अदालतों में दायर की गई हैं और फिलहाल ये आरोप न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं। अंतिम निर्णय अदालतों के आदेश के बाद ही प्रभावी होगा। प्रशासन का कहना है कि उसका उद्देश्य आव्रजन व्यवस्था की पारदर्शिता बनाए रखना और नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की कथित धोखाधड़ी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।

  • अमेरिका के 50 प्रतिशत नए टैरिफ से बढ़ा व्यापारिक तनाव, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने बातचीत की पेशकश कर समाधान पर दिया जोर

    अमेरिका के 50 प्रतिशत नए टैरिफ से बढ़ा व्यापारिक तनाव, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने बातचीत की पेशकश कर समाधान पर दिया जोर

    नई दिल्ली । अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापारिक संबंध एक बार फिर तनावपूर्ण दौर में पहुंच गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कनाडा से आयात होने वाले कई उत्पादों पर 50 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा के बाद कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि उनका देश इस विवाद का समाधान बातचीत के माध्यम से निकालना चाहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कनाडा अपने नागरिकों और उद्योगों के हितों की रक्षा करते हुए अमेरिका के साथ रचनात्मक वार्ता के लिए पूरी तरह तैयार है।

    मार्क कार्नी ने कहा कि अमेरिका की ओर से प्रस्तावित नया शुल्क हाल के वर्षों में अपनाई गई एकतरफा व्यापारिक नीतियों की श्रृंखला का हिस्सा है। उनका कहना है कि यह कदम कनाडा-अमेरिका-मेक्सिको व्यापार समझौते की भावना के विपरीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि कनाडा के ऑटोमोबाइल क्षेत्र सहित कई उद्योगों पर लगाए गए शुल्क मुक्त व्यापार व्यवस्था को प्रभावित करते हैं और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं।

    कनाडाई प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने अब तक हर कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और अपने अधिकारों के अनुरूप उठाया है। उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न प्रांत, उद्योग, किसान, कारोबारी और श्रमिक इस चुनौती के समय एकजुट होकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए काम कर रहे हैं। सरकार का उद्देश्य घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बनाए रखना और रोजगार पर किसी भी संभावित असर को कम करना है।

    कार्नी ने यह भी कहा कि कनाडा लंबे समय से अमेरिका के साथ व्यापारिक विवादों को सुलझाने के लिए व्यापक प्रस्ताव देता रहा है। उनका मानना है कि बदलते वैश्विक आर्थिक माहौल में दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले सप्ताहों में दोनों पक्षों के बीच वार्ता तेज होगी और ऐसा समाधान निकलेगा जिससे दोनों देशों को समान लाभ मिल सके।

    उन्होंने दोहराया कि कनाडा मुक्त और निष्पक्ष व्यापार का समर्थक है। इसी सोच के तहत देश ने हाल के समय में कई नई आर्थिक और सुरक्षा साझेदारियां विकसित की हैं। कार्नी के अनुसार, व्यापारिक विवादों का सबसे अधिक असर आम उपभोक्ताओं, कारोबारियों और उद्योगों पर पड़ता है। उनका कहना है कि बढ़े हुए शुल्क से वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो सकती है, जिससे दोनों देशों के नागरिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ने की आशंका है।

    अमेरिका ने अपने फैसले के पीछे यह तर्क दिया है कि कनाडा कुछ अमेरिकी उत्पादों, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल, मादक पेय और डेयरी वस्तुओं के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करता है। इसी आधार पर अमेरिकी प्रशासन ने विशेष कानूनी प्रावधानों का उपयोग करते हुए सैकड़ों कनाडाई उत्पादों पर अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने का निर्णय लिया है। हालांकि ऊर्जा, पोटाश, महत्वपूर्ण खनिज, मछली और पहले से अलग शुल्क व्यवस्था के तहत आने वाले कुछ उत्पादों को इस फैसले से बाहर रखा गया है।

    नई शुल्क व्यवस्था के लागू होने के बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों, आपूर्ति श्रृंखला और विभिन्न उद्योगों पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों पक्ष जल्द किसी सहमति पर नहीं पहुंचते हैं तो उत्तरी अमेरिका के व्यापारिक वातावरण में अनिश्चितता बढ़ सकती है। ऐसे समय में कनाडा की ओर से बातचीत की पेशकश इस बात का संकेत है कि वह टकराव के बजाय संवाद के माध्यम से समाधान तलाशने की रणनीति पर आगे बढ़ना चाहता है, जबकि अमेरिका के अगले कदम पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

  • मध्य पूर्व में बढ़ा युद्ध का खतरा, अमेरिका ने फिर किए हवाई हमले, हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा पर दिया बड़ा बयान

    मध्य पूर्व में बढ़ा युद्ध का खतरा, अमेरिका ने फिर किए हवाई हमले, हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा पर दिया बड़ा बयान


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य तनाव लगातार गहराता जा रहा है। अमेरिका ने लगातार 10वीं रात ईरान के विभिन्न सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिससे दोनों देशों के बीच टकराव और तेज होने की आशंका बढ़ गई है। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार इन अभियानों का उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है, जिनका उपयोग क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के लिए खतरा पैदा करने में किया जा सकता है। इस घटनाक्रम ने पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति को एक बार फिर वैश्विक चिंता का विषय बना दिया है।

    अमेरिकी सैन्य कमान का कहना है कि हालिया अभियान के दौरान ईरान के सैन्य कमांड सेंटर, मिसाइल और ड्रोन लॉन्च साइट्स, समुद्री ठिकानों तथा वायु रक्षा प्रणालियों को निशाना बनाया गया। अमेरिका का दावा है कि इन हमलों का मकसद स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और समुद्री मार्गों पर किसी भी संभावित खतरे को कम करना है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल माना जाता है।

    अमेरिका ने यह भी दावा किया कि उसकी सैन्य गतिविधियों के कारण हॉर्मुज से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित नहीं हुई है। अधिकारियों के अनुसार पिछले कुछ समय में अमेरिकी बलों ने सैकड़ों वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षित रूप से इस रणनीतिक समुद्री मार्ग से गुजरने में सहायता प्रदान की है। इसके साथ ही करोड़ों बैरल कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने का भी दावा किया गया है। ऊर्जा बाजारों और वैश्विक व्यापार के लिए यह समुद्री मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

    इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर कड़ा रुख दोहराया है। उन्होंने कहा कि यदि किसी भी अमेरिकी सैनिक को नुकसान पहुंचाया गया तो उसका जवाब बेहद सख्त और कई गुना अधिक होगा। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना को आवश्यक निर्देश दिए जा चुके हैं और किसी भी हमले का जवाब पूरी ताकत के साथ दिया जाएगा। उनके इस बयान को क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

    दूसरी ओर ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने दावा किया है कि उसने बहरीन और कुवैत में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। ईरानी पक्ष का कहना है कि यह कार्रवाई उसके सैन्य अभियान के तहत की गई, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। दोनों देशों की ओर से लगातार सामने आ रहे सैन्य दावों और जवाबी कार्रवाइयों ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका को और बढ़ा दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई इसी तरह जारी रही तो इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री परिवहन और कच्चे तेल की कीमतों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे समय में दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस बढ़ते संघर्ष को रोकने में सफल होंगे या फिर क्षेत्र में तनाव और अधिक गंभीर रूप लेगा।

  • रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच भारतीयों की मौत से बढ़ी चिंता, विदेश मंत्रालय ने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कड़ा संदेश दिया

    रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच भारतीयों की मौत से बढ़ी चिंता, विदेश मंत्रालय ने नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कड़ा संदेश दिया


    नई दिल्ली ।
    यूक्रेन के ओडेसा बंदरगाह से रवाना हुए एक वाणिज्यिक जहाज पर हुए मिसाइल हमले में चार भारतीय नागरिकों की मौत ने भारत समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। इस घटना में जहाज पर सवार एक अन्य भारतीय गंभीर रूप से घायल हुआ है और उसका अस्पताल में उपचार चल रहा है। हादसे के बाद भारत सरकार ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए वाणिज्यिक जहाजों और निर्दोष चालक दल के सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, 19 जुलाई की शाम एमवी गोल्डन लियो नामक व्यापारिक जहाज ओडेसा बंदरगाह से रवाना हुआ था। उस समय जहाज पर कुल 17 चालक दल के सदस्य मौजूद थे, जिनमें पांच भारतीय नागरिक भी शामिल थे। उपलब्ध जानकारी के आधार पर चार भारतीयों की मृत्यु की पुष्टि की गई है, जबकि एक भारतीय गंभीर रूप से घायल है। मंत्रालय ने मृतकों के परिजनों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है और घायल नागरिक के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की है।

    घटना के बाद भारत ने स्पष्ट रूप से कहा कि वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना, निर्दोष नागरिक चालक दल के सदस्यों की जान जोखिम में डालना और समुद्री व्यापार की स्वतंत्रता को प्रभावित करना पूरी तरह निंदनीय है। विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सभी पक्षों की जिम्मेदारी है और ऐसे हमलों से बचा जाना चाहिए। हालांकि भारत ने अपने आधिकारिक बयान में किसी देश का प्रत्यक्ष रूप से नाम नहीं लिया, लेकिन नागरिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर अपना रुख स्पष्ट रखा।

    यूक्रेन की ओर से दावा किया गया है कि गिनी-बिसाऊ के ध्वज वाले इस जहाज पर क्रूज मिसाइल से हमला किया गया। जहाज अंतरराष्ट्रीय समुद्री गलियारे से होकर आगे बढ़ रहा था और इसमें विभिन्न देशों के नागरिक चालक दल के सदस्य मौजूद थे। इस घटना में कुल मृतकों की संख्या बढ़कर 10 बताए जाने की जानकारी भी सामने आई है, जिससे इस हमले की गंभीरता और अधिक बढ़ गई है।

    विदेश मंत्रालय ने बताया कि यूक्रेन स्थित भारतीय दूतावास लगातार स्थानीय प्रशासन और संबंधित अधिकारियों के संपर्क में है। प्रभावित भारतीय नागरिकों तथा उनके परिवारों को हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। साथ ही आवश्यक कांसुलर सहायता और अन्य औपचारिक प्रक्रियाओं पर भी लगातार काम किया जा रहा है ताकि प्रभावित परिवारों को समय पर सहयोग मिल सके।

    यह घटना रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष के दौरान भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर नई चिंता लेकर आई है। समुद्री व्यापारिक मार्गों पर बढ़ते खतरे का असर केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, खाद्यान्न परिवहन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि नागरिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अंतरराष्ट्रीय कानून और समुद्री व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    भारत ने एक बार फिर सभी पक्षों से संयम बरतने, अंतरराष्ट्रीय मानवीय सिद्धांतों का सम्मान करने और ऐसे कदमों से बचने की अपील की है जिनसे निर्दोष नागरिकों की जान खतरे में पड़े। सरकार ने संकेत दिया है कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और विदेश मंत्रालय स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। आने वाले दिनों में इस घटना से जुड़े तथ्यों और जांच के आधार पर आगे की कूटनीतिक गतिविधियों पर भी सभी की नजर रहेगी।

  • जंतर-मंतर से संसद मार्च के बाद गरमाई राजनीति, महुआ मोइत्रा ने धर्मेंद्र प्रधान पर साधा निशाना, NEET विवाद पर विपक्ष ने तेज किए सवाल

    जंतर-मंतर से संसद मार्च के बाद गरमाई राजनीति, महुआ मोइत्रा ने धर्मेंद्र प्रधान पर साधा निशाना, NEET विवाद पर विपक्ष ने तेज किए सवाल

    नई दिल्ली । NEET पेपर लीक विवाद को लेकर देशभर में जारी राजनीतिक और छात्र आंदोलनों के बीच तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और जवाबदेही के मुद्दे को लेकर विपक्ष लगातार केंद्र सरकार को घेर रहा है। इसी क्रम में महुआ मोइत्रा की सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी ने इस विवाद को नई राजनीतिक धार दे दी है। उनके बयान के बाद शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है।

    जंतर-मंतर से संसद तक निकाले गए विरोध मार्च के बाद छात्रों और विपक्षी दलों का कहना है कि परीक्षा से जुड़े विवादों ने लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदर्शनकारी लगातार मांग कर रहे हैं कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या जिम्मेदारी तय होती है तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी इसी क्रम में प्रमुख मुद्दा बनकर सामने आई है।

    इसी विवाद के बीच महुआ मोइत्रा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को निशाने पर लेते हुए तीखी टिप्पणी की। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में लिखा कि शायद शिक्षा मंत्री को इस्तीफा लिखना नहीं आता क्योंकि उन्हें केवल दया याचिका लिखना सिखाया गया है। उनकी इस टिप्पणी के सामने आते ही राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। विपक्षी दलों के कई नेताओं ने भी परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग दोहराई।

    विपक्ष का आरोप है कि NEET पेपर लीक विवाद केवल परीक्षा में हुई कथित गड़बड़ी का मामला नहीं है, बल्कि यह देश की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली पर भरोसे से भी जुड़ा हुआ विषय है। उनका कहना है कि लाखों छात्रों ने कठिन मेहनत के साथ परीक्षा की तैयारी की थी और यदि परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं तो इसका सीधा असर युवाओं के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ता है। इसी कारण संसद से लेकर सड़कों तक इस मुद्दे को लगातार उठाया जा रहा है।

    दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि पूरे मामले की जांच की जा रही है और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होगी। सरकार का दावा है कि परीक्षा प्रणाली को और अधिक पारदर्शी तथा सुरक्षित बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

    इस बीच मानसून सत्र में भी NEET पेपर लीक का मुद्दा प्रमुख राजनीतिक विषय बना हुआ है। विपक्ष सरकार से विस्तृत जवाब और जवाबदेही की मांग कर रहा है, जबकि सरकार जांच प्रक्रिया और कानूनी कार्रवाई का हवाला दे रही है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना बनी हुई है। वहीं परीक्षा की तैयारी कर रहे लाखों छात्र इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं और पारदर्शी जांच के साथ ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था की अपेक्षा कर रहे हैं।

  • दिल्ली में CJP प्रदर्शन के बाद बढ़ा राजनीतिक टकराव, कपिल सिब्बल का केंद्र पर तीखा हमला, पुलिस कार्रवाई और नड्डा के बयान पर उठाए सवाल

    दिल्ली में CJP प्रदर्शन के बाद बढ़ा राजनीतिक टकराव, कपिल सिब्बल का केंद्र पर तीखा हमला, पुलिस कार्रवाई और नड्डा के बयान पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली । राजधानी दिल्ली में CJP के प्रदर्शन के दौरान हुई झड़प और उसके बाद की राजनीतिक प्रतिक्रिया ने राष्ट्रीय राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। प्रदर्शन के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कपिल सिब्बल ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा की टिप्पणी को अहंकारपूर्ण बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों की ओर से सरकार के सामने रखी गई मांगों की लंबे समय तक अनदेखी की गई और संवाद के बजाय बल प्रयोग का रास्ता अपनाया गया। इस पूरे घटनाक्रम के बाद सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज हो गया है।

    कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह दावा करना कि पहली बार प्रदर्शनकारियों की ओर से बातचीत का प्रस्ताव आया, वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाता। उन्होंने कहा कि आंदोलन कर रहे लोगों की मांगें पहले से सार्वजनिक थीं और सरकार को उनकी पूरी जानकारी थी। उनके अनुसार यदि समय रहते सकारात्मक बातचीत की पहल की जाती तो हालात इस स्तर तक नहीं पहुंचते। उन्होंने सरकार पर संवेदनशील मुद्दों पर देर से प्रतिक्रिया देने और प्रदर्शनकारियों के साथ कठोर रवैया अपनाने का आरोप लगाया।

    सिब्बल ने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी आंदोलन का समाधान संवाद और विश्वास के जरिए निकाला जाना चाहिए। उनका मानना है कि यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों की बात समय पर सुनी जाती तो टकराव की स्थिति से बचा जा सकता था। उन्होंने सरकार से लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप व्यवहार करने और जनभावनाओं का सम्मान करने की अपील भी की।

    इस बीच कांग्रेस ने भी पूरे घटनाक्रम को लेकर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र में अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। कांग्रेस का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार किया गया, उससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा प्रभावित हुई है। पार्टी ने कहा कि युवाओं और आंदोलनकारियों के प्रति कठोर कार्रवाई किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित संकेत नहीं मानी जा सकती।

    प्रदर्शन के दौरान हुई झड़प के बाद दिल्ली पुलिस ने मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस का कहना है कि घटनास्थल पर कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी थी और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार उपलब्ध साक्ष्यों, वीडियो फुटेज और अन्य जानकारियों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों ने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात कर अपनी मांगों से संबंधित ज्ञापन भी सौंपा। इस मुलाकात के बाद सरकार की ओर से संवाद की पहल की बात कही गई, लेकिन विपक्ष का आरोप है कि यह पहल काफी देर से हुई और इससे पहले हालात अनावश्यक रूप से बिगड़ चुके थे। इसी मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी लगातार जारी है।

    पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि लोकतांत्रिक आंदोलनों से जुड़े मामलों में सरकार और प्रशासन की भूमिका कैसी होनी चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में समय पर संवाद, पारदर्शिता और संयमित प्रशासनिक कार्रवाई से विवादों को बढ़ने से रोका जा सकता है। फिलहाल इस मामले में पुलिस जांच जारी है, जबकि राजनीतिक स्तर पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला थमने के संकेत नहीं दिख रहे हैं।

  • संसद मार्च पर बवाल के बीच सरकार की सक्रियता तेज, आरएमएल अस्पताल पहुंचे जेपी नड्डा, लाठीचार्ज को लेकर विपक्ष ने घेरा

    संसद मार्च पर बवाल के बीच सरकार की सक्रियता तेज, आरएमएल अस्पताल पहुंचे जेपी नड्डा, लाठीचार्ज को लेकर विपक्ष ने घेरा

    नई दिल्ली । संसद मार्च के दौरान हुई झड़प और उसके बाद उपजे राजनीतिक विवाद के बीच केंद्र सरकार ने स्थिति पर सक्रियता बढ़ा दी है। केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने राजधानी स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचकर उन प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों का हालचाल जाना, जो प्रदर्शन के दौरान घायल हुए थे। उन्होंने अस्पताल में भर्ती लोगों से बातचीत कर उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली और उपचार कर रहे चिकित्सकों से भी पूरे घटनाक्रम तथा इलाज की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की। इस मुलाकात को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब संसद मार्च को लेकर राजनीतिक माहौल लगातार गर्म बना हुआ है।

    संसद की ओर निकाले गए मार्च के दौरान बड़ी संख्या में युवा राजधानी की सड़कों पर पहुंचे थे। प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया। इसी दौरान हालात तनावपूर्ण हो गए और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज तथा आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा। इस कार्रवाई में कई प्रदर्शनकारी घायल हुए, वहीं ड्यूटी पर तैनात कई पुलिसकर्मियों को भी चोटें आईं। झड़प के दौरान कुछ स्थानों पर तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आईं, जिससे राजधानी के प्रमुख इलाकों में कुछ समय के लिए सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ।

    घटनाक्रम के बाद सरकार की ओर से लगातार संवाद स्थापित करने की कोशिशें भी देखने को मिलीं। जेपी नड्डा ने अस्पताल पहुंचने से पहले संगठन के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर उनकी मांगों और शिकायतों को भी सुना था। इसके बाद घायलों से सीधे मिलना सरकार की ओर से संवेदनशीलता दिखाने की पहल माना जा रहा है। अस्पताल में उन्होंने चिकित्सकों से यह सुनिश्चित करने को कहा कि सभी घायलों को आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं समय पर उपलब्ध कराई जाएं और उनके उपचार में किसी प्रकार की कमी न रहे।

    इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। विपक्ष ने प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि इस विषय पर संसद में चर्चा होनी चाहिए थी और सरकार को पूरे मामले पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए। उनका आरोप है कि प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर बल प्रयोग उचित नहीं था और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने वालों की आवाज दबाने का प्रयास किया गया। विपक्ष ने यह भी कहा कि यदि संसद में ऐसे मुद्दों पर चर्चा नहीं होगी तो लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होगा।

    वहीं सरकार की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि भीड़ को नियंत्रित करना आवश्यक था ताकि किसी बड़े नुकसान से बचा जा सके। प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान और सुरक्षा व्यवस्था पर पड़े प्रभाव की भी समीक्षा की जा रही है। राजधानी में सुरक्षा एजेंसियां पूरे घटनाक्रम का आकलन कर रही हैं और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए आवश्यक कदमों पर भी विचार किया जा रहा है।

    संसद मार्च के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक बहस का भी प्रमुख विषय बन चुका है। एक ओर सरकार घायलों के उपचार और संवाद के जरिए स्थिति सामान्य करने की कोशिश कर रही है, वहीं विपक्ष इस मुद्दे को संसद और जनता के बीच उठाकर जवाबदेही की मांग कर रहा है। आने वाले दिनों में इस मामले को लेकर राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है।

  • कॉमनवेल्थ गेम्स का मेजबान बनने की दौड़ में कौन कितना आगे जानिए 1930 से 2026 तक का पूरा इतिहास

    कॉमनवेल्थ गेम्स का मेजबान बनने की दौड़ में कौन कितना आगे जानिए 1930 से 2026 तक का पूरा इतिहास


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित बहु खेल आयोजनों में शामिल हैं जिनका इतिहास लगभग एक शताब्दी पुराना है। इन खेलों की शुरुआत वर्ष 1930 में ब्रिटिश एम्पायर गेम्स के नाम से हुई थी। उस समय इसमें केवल ब्रिटिश साम्राज्य से जुड़े देशों ने हिस्सा लिया था लेकिन समय के साथ इसका स्वरूप बदलता गया और आज यह राष्ट्रमंडल देशों का सबसे बड़ा खेल महाकुंभ बन चुका है। इन खेलों का आयोजन हर चार वर्ष में किया जाता है हालांकि द्वितीय विश्व युद्ध के कारण 1942 और 1946 में इनका आयोजन नहीं हो सका था।

    पहले संस्करण का आयोजन कनाडा के हैमिल्टन शहर में हुआ था जहां केवल 11 देशों ने भाग लिया था। इसके बाद प्रतियोगिता का विस्तार लगातार बढ़ता गया और 2022 तक इसमें 72 देशों की भागीदारी दर्ज की गई। 2026 के ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में भी कई देश अपनी चुनौती पेश करेंगे और खेलों का रोमांच नई ऊंचाइयों पर पहुंचेगा।

    मेजबानी के रिकॉर्ड की बात करें तो ऑस्ट्रेलिया इस मामले में सबसे आगे है। ऑस्ट्रेलिया ने अब तक पांच बार कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी की है और इस उपलब्धि के साथ वह सबसे सफल मेजबान देश बना हुआ है। कनाडा चार बार इन खेलों का आयोजन कर दूसरे स्थान पर है जबकि स्कॉटलैंड 2026 में चौथी बार मेजबानी करेगा। इंग्लैंड और न्यूजीलैंड तीन तीन बार इन खेलों की मेजबानी कर चुके हैं।

    भारत ने वर्ष 2010 में नई दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स का सफल आयोजन किया था। यह पहला अवसर था जब भारत को इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता की मेजबानी मिली। इस आयोजन ने देश की खेल अधोसंरचना को नई पहचान दी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आयोजन क्षमता को भी मजबूती से स्थापित किया। मलेशिया जमैका और वेल्स भी एक एक बार इन खेलों की मेजबानी कर चुके हैं।

    अविभाजित भारत ने 1934 और 1938 के संस्करणों में ब्रिटिश शासन के अधीन भाग लिया था जबकि 1947 में स्वतंत्रता के बाद भारत और पाकिस्तान ने अलग अलग देशों के रूप में प्रतियोगिता में हिस्सा लेना शुरू किया। बाद में 1971 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद बांग्लादेश भी इस खेल परिवार का हिस्सा बना। ऑस्ट्रेलिया कनाडा इंग्लैंड न्यूजीलैंड स्कॉटलैंड और वेल्स ऐसे देश हैं जिन्होंने अब तक आयोजित प्रत्येक कॉमनवेल्थ गेम्स में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

    वर्ष 2026 के कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन 28 जुलाई से 8 अगस्त तक स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में होगा। यह शहर चौथी बार इन खेलों की मेजबानी करेगा। इस बार भी दुनिया भर के खिलाड़ी पदकों के लिए संघर्ष करेंगे और राष्ट्रमंडल देशों के बीच खेल भावना तथा प्रतिस्पर्धा का शानदार उदाहरण देखने को मिलेगा।

    करीब सौ वर्षों का सफर तय कर चुके कॉमनवेल्थ गेम्स आज केवल खेल प्रतियोगिता नहीं बल्कि राष्ट्रमंडल देशों के बीच सहयोग मित्रता और खेल संस्कृति का सबसे बड़ा मंच बन चुके हैं। हर नया संस्करण इस गौरवशाली इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ता है।

  • मल्लिकार्जुन खरगे के जन्मदिन पर राजनीतिक दलों ने जताया सम्मान, प्रधानमंत्री और वरिष्ठ नेताओं ने की दीर्घायु व उत्तम स्वास्थ्य की कामना

    मल्लिकार्जुन खरगे के जन्मदिन पर राजनीतिक दलों ने जताया सम्मान, प्रधानमंत्री और वरिष्ठ नेताओं ने की दीर्घायु व उत्तम स्वास्थ्य की कामना


    नई दिल्ली । 
    कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे के 84वें जन्मदिन पर देशभर से उन्हें शुभकामनाएं मिलीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हुए स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु जीवन की कामना की। राजनीतिक मतभेदों से इतर कई नेताओं ने सार्वजनिक जीवन में उनके लंबे अनुभव और योगदान का उल्लेख करते हुए उन्हें शुभकामनाएं प्रेषित कीं।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मल्लिकार्जुन खरगे को जन्मदिन की बधाई देते हुए उनके उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की। उन्होंने अपने शुभकामना संदेश में कहा कि ईश्वर उन्हें स्वस्थ और लंबा जीवन प्रदान करें। प्रधानमंत्री का यह संदेश सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बना और अनेक लोगों ने इसे लोकतांत्रिक परंपराओं का सकारात्मक उदाहरण बताया।

    लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी मल्लिकार्जुन खरगे को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने उनके सुखद, स्वस्थ और मंगलमय जीवन की कामना करते हुए सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान की सराहना की। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी उन्हें बधाई देते हुए स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन की शुभकामनाएं व्यक्त कीं।

    कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के जन्मदिन पर विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से उन्हें शुभकामनाएं दीं। पार्टी नेताओं ने उनके लंबे राजनीतिक जीवन, संगठनात्मक अनुभव और सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्यों तथा जनसेवा के प्रति उनके समर्पण को याद किया। कई नेताओं ने कहा कि उनके नेतृत्व में पार्टी लगातार जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाने का प्रयास कर रही है।

    उत्तर प्रदेश कांग्रेस सहित विभिन्न प्रदेश इकाइयों ने भी मल्लिकार्जुन खरगे को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। पार्टी की ओर से जारी संदेशों में उन्हें अनुभवी नेता, कुशल संगठनकर्ता और करोड़ों कार्यकर्ताओं के प्रेरणास्रोत के रूप में बताया गया। साथ ही उनके स्वस्थ और सक्रिय जीवन की कामना भी की गई।

    सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बल्कि अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी उन्हें जन्मदिन की बधाई दी। समाजवादी पार्टी ने भी अपने शुभकामना संदेश में मल्लिकार्जुन खरगे के स्वस्थ, प्रसन्न और दीर्घायु जीवन की कामना की। विभिन्न दलों के नेताओं की ओर से आए इन संदेशों ने राजनीतिक शिष्टाचार और लोकतांत्रिक परंपराओं को भी रेखांकित किया।

    मल्लिकार्जुन खरगे भारतीय राजनीति के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। उन्होंने लंबे समय तक राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न जिम्मेदारियां निभाई हैं। संगठन और संसदीय राजनीति दोनों में उनका अनुभव व्यापक माना जाता है। वर्तमान में वह कांग्रेस अध्यक्ष होने के साथ-साथ राज्यसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका भी निभा रहे हैं।

    उनके जन्मदिन के अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी कार्यक्रम आयोजित किए। कई स्थानों पर सामाजिक सेवा गतिविधियां, पौधारोपण, रक्तदान शिविर और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस अवसर पर पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके नेतृत्व में संगठन को और मजबूत बनाने का संकल्प भी दोहराया।

  • रोहित शर्मा को कुछ भी साबित करने की जरूरत नहीं अश्विन बोले विश्व कप खेलना पूरी तरह उनका फैसला

    रोहित शर्मा को कुछ भी साबित करने की जरूरत नहीं अश्विन बोले विश्व कप खेलना पूरी तरह उनका फैसला


    नई दिल्ली । भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व दिग्गज ऑफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने रोहित शर्मा और विराट कोहली के भविष्य को लेकर चल रही चर्चाओं पर अपनी स्पष्ट राय रखी है। इंग्लैंड के खिलाफ लॉर्ड्स में खेले गए निर्णायक वनडे मुकाबले में रोहित शर्मा की शानदार 138 रन की पारी के बाद अश्विन ने कहा कि दोनों अनुभवी खिलाड़ियों को अपने करियर का फैसला खुद करने का पूरा अधिकार है और जब तक वे भारत के लिए खेलना चाहते हैं तब तक उन्हें टीम से बाहर करने का सवाल ही नहीं उठता।

    अश्विन ने कहा कि रोहित शर्मा और विराट कोहली भारतीय क्रिकेट के ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने वर्षों तक अपने प्रदर्शन से देश का नाम रोशन किया है। उनके रिकॉर्ड और योगदान को देखते हुए अब उन्हें किसी के सामने अपनी क्षमता साबित करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसे खिलाड़ियों का मूल्य केवल आंकड़ों से नहीं बल्कि उनके अनुभव और बड़े मुकाबलों में निभाई गई भूमिका से भी तय होता है।

    रोहित शर्मा की बल्लेबाजी की तारीफ करते हुए अश्विन ने कहा कि लॉर्ड्स में उनकी पारी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह आज भी बड़े मैचों के खिलाड़ी हैं। शुरुआती समय में थोड़ा संभलकर खेलने के बाद रोहित पूरी तरह लय में आ गए थे और उनके शॉट्स में वही पुराना आत्मविश्वास दिखाई दे रहा था। अश्विन का मानना है कि यदि परिस्थितियां थोड़ा और साथ देतीं तो रोहित आसानी से 180 रन तक पहुंच सकते थे और भारत को जीत भी दिला सकते थे।

    पूर्व स्पिनर ने कहा कि रोहित अब ऐसे मुकाम पर हैं जहां उन्हें आलोचकों को जवाब देने या अपनी योग्यता सिद्ध करने की जरूरत नहीं है। उनके मुताबिक अब केवल एक सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या रोहित खुद अगले वनडे विश्व कप में खेलना चाहते हैं। यदि उनके भीतर देश के लिए खेलने की इच्छा और जुनून है तो उन्हें पूरा अवसर मिलना चाहिए।

    अश्विन ने विराट कोहली का भी समर्थन करते हुए कहा कि दोनों दिग्गज खिलाड़ियों ने भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। उनके अनुभव का फायदा युवा खिलाड़ियों को भी मिलता है और बड़े टूर्नामेंट में उनकी मौजूदगी टीम के लिए आत्मविश्वास बढ़ाने वाली होती है। ऐसे खिलाड़ियों पर जल्दबाजी में फैसला लेना भारतीय टीम के हित में नहीं होगा।

    उन्होंने यह भी कहा कि रोहित शर्मा के लगभग बारह हजार अंतरराष्ट्रीय रन उनके कद और योगदान को खुद साबित करते हैं। दुनिया भर में उनके करोड़ों प्रशंसक हैं और लोग उन्हें बल्लेबाजी करते देखने के लिए मैदान में आते हैं। ऐसे खिलाड़ी केवल आंकड़ों से नहीं बल्कि अपने प्रभाव से भी टीम के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।

    रोहित और विराट के भविष्य को लेकर लगातार हो रही चर्चाओं के बीच अश्विन का यह बयान भारतीय क्रिकेट में नई बहस को जन्म दे सकता है। अब सभी की नजर इस बात पर होगी कि टीम प्रबंधन आगामी सीरीज और 2027 वनडे विश्व कप की तैयारियों में इन दोनों वरिष्ठ खिलाड़ियों की भूमिका को किस तरह तय करता है।