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  • अमेरिका ईरान तनाव के बीच पेजेशकियान की भारत यात्रा अहम, BRICS बैठक में क्षेत्रीय और द्विपक्षीय मुद्दों पर होगी चर्चा

    अमेरिका ईरान तनाव के बीच पेजेशकियान की भारत यात्रा अहम, BRICS बैठक में क्षेत्रीय और द्विपक्षीय मुद्दों पर होगी चर्चा

    नई दिल्ली । ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान सितंबर में भारत की यात्रा पर आने वाले हैं। वह नई दिल्ली में आयोजित होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। भारत वर्ष 2026 में BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और इसी के तहत राजधानी में इस महत्वपूर्ण बहुपक्षीय बैठक का आयोजन किया जा रहा है।

    पेजेशकियान की प्रस्तावित भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में ईरानी राष्ट्रपति का नई दिल्ली पहुंचना भारत और ईरान के बीच कूटनीतिक संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच पारंपरिक रूप से ऊर्जा, व्यापार, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय सहयोग जैसे विषयों पर संबंध रहे हैं।

    भारत की अध्यक्षता में होने वाले BRICS सम्मेलन की थीम ‘बिल्डिंग फॉर रिजीलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनिबिलिटी’ रखी गई है। सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग, वैश्विक शासन व्यवस्था, विकास, तकनीक और साझा चुनौतियों से जुड़े विषयों पर चर्चा होने की उम्मीद है। ईरान की भागीदारी से पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियां भी बैठक के महत्वपूर्ण विषयों में शामिल हो सकती हैं।

    ईरान वर्ष 2024 में BRICS का पूर्ण सदस्य बना था। उसके साथ मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात भी संगठन के पूर्ण सदस्य बने थे। ईरान के शामिल होने के बाद BRICS का दायरा पश्चिम एशिया तक भी व्यापक हुआ है। भारत और ईरान दोनों के लिए संगठन के मंच पर आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने के अवसर बढ़े हैं।

    मसूद पेजेशकियान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछली महत्वपूर्ण मुलाकात अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में आयोजित BRICS सम्मेलन के दौरान हुई थी। उस समय दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय बैठक भी हुई थी। बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों के साथ क्षेत्रीय परिस्थितियों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई थी।

    पेजेशकियान की आगामी भारत यात्रा के दौरान भी द्विपक्षीय संबंधों को लेकर बातचीत की संभावना बनी हुई है। दोनों देशों के बीच व्यापार, चाबहार बंदरगाह, संपर्क परियोजनाओं और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दे लंबे समय से महत्वपूर्ण रहे हैं। भारत के लिए ईरान के साथ संपर्क बनाए रखना पश्चिम और मध्य एशिया तक पहुंच के दृष्टिकोण से भी उपयोगी माना जाता है।

    पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत की संभावित कूटनीतिक भूमिका भी चर्चा का विषय बन सकती है। जून में BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने के लिए भारत आए ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा था कि नई दिल्ली क्षेत्रीय संकट को कम करने में रचनात्मक भूमिका निभा सकता है।

    ईरानी पक्ष का रुख रहा है कि संघर्ष का समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से होना चाहिए। ऐसे में पेजेशकियान की नई दिल्ली यात्रा BRICS के बहुपक्षीय मंच के साथ-साथ भारत और ईरान के बीच उच्चस्तरीय संवाद का अवसर भी प्रदान कर सकती है।

    भारत की BRICS अध्यक्षता में होने वाला यह सम्मेलन ऐसे दौर में आयोजित हो रहा है, जब वैश्विक राजनीति में पश्चिम एशिया का संकट, व्यापारिक तनाव, ऊर्जा सुरक्षा और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे प्रमुख बने हुए हैं। ईरानी राष्ट्रपति की भागीदारी से सम्मेलन में इन विषयों पर चर्चा को अतिरिक्त महत्व मिलने की संभावना है।

  • Independence Day 2026: तिरंगे के केसरिया, सफेद और हरे रंग का क्या है अर्थ, जानिए त्याग, शांति और विकास का संदेश

    Independence Day 2026: तिरंगे के केसरिया, सफेद और हरे रंग का क्या है अर्थ, जानिए त्याग, शांति और विकास का संदेश


    नई दिल्ली । 
    15 अगस्त को भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा देश की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय गौरव और एकता का प्रतीक बनकर हर जगह लहराता है। तिरंगे में शामिल केसरिया, सफेद और हरा रंग केवल उसकी पहचान का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि इनके साथ अलग-अलग भाव और प्रतीकात्मक अर्थ भी जोड़े जाते हैं। भारतीय परंपरा और जीवन दर्शन में इन रंगों को त्याग, शांति, सत्य, प्रकृति और विकास जैसे मूल्यों से जोड़कर देखा जाता रहा है।

    तिरंगे की सबसे ऊपरी पट्टी का रंग केसरिया है। इसे साहस, त्याग, तपस्या और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक माना जाता है। भारतीय परंपरा में केसरिया रंग का संबंध संन्यास और वैराग्य से भी रहा है। साधु-संतों और संन्यासियों के वस्त्रों में इस रंग का प्रयोग लंबे समय से देखने को मिलता है।

    राष्ट्रीय ध्वज में केसरिया रंग का प्रतीकात्मक संदेश यह माना जाता है कि राष्ट्रहित में व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर सेवा, समर्पण और साहस के साथ आगे बढ़ना चाहिए। इसे नेतृत्व, आत्मबल और दृढ़ संकल्प से भी जोड़ा जाता है। यही भाव स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देश के लिए बलिदान देने वाले लोगों की भावना से भी जुड़ा दिखाई देता है।

    तिरंगे के बीच में सफेद रंग की पट्टी है। सफेद रंग को शांति, सत्य और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। भारतीय संस्कृति में सफेद रंग को सात्विकता और शुद्धता से जोड़ने की परंपरा रही है। धार्मिक और सामाजिक अवसरों पर भी सफेद रंग को शांत और सकारात्मक भावनाओं से संबंधित माना जाता है।

    राष्ट्रीय ध्वज में सफेद रंग यह संदेश देता है कि राष्ट्र की शक्ति और प्रगति के साथ शांति तथा सत्य का महत्व भी बना रहना चाहिए। इसी सफेद पट्टी के बीच गहरे नीले रंग का अशोक चक्र स्थित है, जो निरंतर गति और प्रगति का प्रतीक माना जाता है।

    तिरंगे की सबसे निचली पट्टी हरे रंग की है। हरा रंग प्रकृति, हरियाली, उर्वरता और विकास से जुड़ा माना जाता है। पेड़-पौधे, कृषि और प्राकृतिक संसाधन मानव जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में हरे रंग को जीवन, समृद्धि और संतुलित विकास के व्यापक भाव से जोड़ा जाता है।

    भारतीय परंपराओं में हरे रंग और हरियाली का संबंध नवजीवन तथा प्रकृति से भी रहा है। खेती-किसानी और प्राकृतिक वातावरण से जुड़े समाज में हरियाली समृद्धि और जीवन की निरंतरता का संकेत मानी जाती है। राष्ट्रीय ध्वज में यह रंग देश के विकास के साथ प्रकृति और पर्यावरण के महत्व की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है।

    तिरंगे के तीनों रंगों को एक साथ देखें तो इनमें राष्ट्र जीवन के कई महत्वपूर्ण मूल्यों का प्रतीकात्मक समन्वय दिखाई देता है। केसरिया त्याग और साहस का संदेश देता है, सफेद शांति और सत्य की याद दिलाता है, जबकि हरा विकास और प्रकृति से जुड़ी समृद्धि का भाव सामने रखता है।

    इन रंगों के बीच मौजूद अशोक चक्र भी तिरंगे की पहचान को पूर्ण करता है। इसमें 24 तीलियां हैं और यह निरंतर गति का संदेश देता है। इस तरह तिरंगा केवल राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक नहीं, बल्कि देश के नागरिकों को कर्तव्य, शांति, प्रगति और निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाला राष्ट्रीय ध्वज भी है।

  • उज्जैन में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ का अनुमान, मांडू में कमरों का टोटा; महेश्वर में लग्जरी रूम का किराया 60 हजार तक

    उज्जैन में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ का अनुमान, मांडू में कमरों का टोटा; महेश्वर में लग्जरी रूम का किराया 60 हजार तक


    मध्य प्रदेश मध्य प्रदेश में मानसून के साथ पर्यटन का रंग भी गहरा हो गया है। बारिश ने मांडू की पहाड़ियों और ऐतिहासिक इमारतों से लेकर महेश्वर के नर्मदा घाटों तक की खूबसूरती बढ़ा दी है। इसी वजह से वीकेंड पर बड़ी संख्या में पर्यटक इन जगहों का रुख कर रहे हैं। दूसरी तरफ सावन का महीना और धार्मिक आयोजनों ने उज्जैन दतिया और नलखेड़ा जैसे धार्मिक शहरों में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ा दी है। नतीजा यह है कि कई पर्यटन और धार्मिक स्थलों पर होटल और होम स्टे पहले से बुक हो चुके हैं। मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग भी मांडू महेश्वर उज्जैन और दूसरे प्रमुख स्थलों को अपने पर्यटन सर्किट में शामिल करता है।

    सबसे ज्यादा असर मांडू में दिखाई दे रहा है। बारिश के मौसम में मांडू की हरियाली झरने और ऐतिहासिक स्मारक पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। 14 से 16 अगस्त तक यहां कई होटल पूरी तरह बुक बताए जा रहे हैं और नो रूम जैसी स्थिति बन गई है। मांडू में सरकारी और निजी होटलों के साथ धर्मशालाओं में भी ठहरने की सुविधा है। सामान्य कमरों से लेकर बेहतर सुविधाओं वाले कमरों तक किराये में काफी अंतर है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यहां कमरा करीब 500 रुपए से शुरू होकर 10 हजार रुपए तक पहुंच सकता है। बारिश के कारण वीकेंड पर मांग बढ़ने से एडवांस बुकिंग कराने वालों को ज्यादा आसानी हो रही है।

    मांडू सिर्फ प्राकृतिक खूबसूरती के लिए ही नहीं बल्कि अपने ऐतिहासिक वैभव के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां जहाज महल रानी रूपमती महल बाज बहादुर महल अशरफी महल और होशंग शाह का मकबरा जैसे प्रमुख स्थल हैं। बारिश में इन स्मारकों के आसपास का नजारा और भी आकर्षक हो जाता है। यही वजह है कि अगस्त के इस दौर में पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है।

    नर्मदा किनारे बसे महेश्वर की तस्वीर भी कुछ ऐसी ही है लेकिन यहां ठहरने के विकल्प अपेक्षाकृत ज्यादा हैं। महेश्वर में होटल होम स्टे रिजॉर्ट धर्मशाला और पर्यटन निगम के ठहरने के विकल्प मौजूद हैं। यहां सामान्य कमरों का किराया करीब 1200 रुपए से शुरू बताया जा रहा है जबकि हेरिटेज और लग्जरी प्रॉपर्टीज में रॉयल रूम की कीमत 60 हजार रुपए तक पहुंच सकती है। मध्य प्रदेश पर्यटन की आधिकारिक सामग्री में भी महेश्वर के लिए Narmada Retreat जैसे ठहरने के विकल्प सूचीबद्ध हैं।

    महेश्वर आने वाले पर्यटक अक्सर एक ही यात्रा में ओंकारेश्वर मांडू और उज्जैन को भी शामिल करते हैं। अहिल्या बाई होलकर की विरासत होलकर किला नर्मदा के घाट और धार्मिक स्थल यहां के प्रमुख आकर्षण हैं। ऐसे में वीकेंड पर पर्यटकों की संख्या बढ़ने के साथ अच्छे कमरों की मांग भी बढ़ जाती है।

    उज्जैन में मामला पर्यटन से ज्यादा धार्मिक भीड़ का है। सावन के दौरान महाकाल मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती है और सोमवार को भीड़ और ज्यादा रहने की संभावना रहती है। हाल के यात्रियों के अनुभवों में भी सावन के दौरान सोमवार और वीकेंड को सबसे ज्यादा भीड़ से बचने की सलाह दी गई है।

    इसी तरह आगर मालवा के नलखेड़ा स्थित मां बगलामुखी मंदिर में शनिवार और रविवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां होटल और ठहरने के दूसरे विकल्प पहले से बुक होने लगे हैं। दतिया में मां पीतांबरा पीठ के कारण वीकेंड पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है और उपलब्ध जानकारी के मुताबिक बड़ी संख्या में कमरे पहले ही बुक हो चुके हैं।

    ओरछा में भी राम राजा सरकार के मंदिर के कारण धार्मिक पर्यटन लगातार बना रहता है। यहां छोटे बड़े होटल और होम स्टे उपलब्ध हैं। वहीं खजुराहो में अगस्त के दौरान पर्यटन सीजन अपेक्षाकृत कमजोर रहने के बावजूद वीकेंड पर पर्यटकों की संख्या बढ़ सकती है। बड़े होटलों में किराये की रेंज काफी ऊंची है और फाइव स्टार प्रॉपर्टीज में कमरे 30 से 60 हजार रुपए तक पहुंच सकते हैं।

    ऐसे में अगर इस वीकेंड मध्य प्रदेश के किसी पर्यटन या धार्मिक स्थल पर जाने का प्लान है तो सबसे जरूरी सलाह यही है कि होटल की बुकिंग पहले कर लें। खासकर मांडू और उज्जैन जैसे स्थानों पर मौके पर कमरा मिलने की गारंटी नहीं मानी जा सकती। बारिश का मौसम पर्यटन के लिए बेहद खूबसूरत है लेकिन बढ़ती भीड़ के बीच बेहतर यात्रा के लिए ठहरने और आने जाने की व्यवस्था पहले से तय करना ज्यादा समझदारी होगी।

  • अभिजीत दीपके ने सौरव दास का किया समर्थन, बोले उनके वीडियो से लॉ छात्रों का भविष्य बचा और सवाल उठाना जरूरी है

    अभिजीत दीपके ने सौरव दास का किया समर्थन, बोले उनके वीडियो से लॉ छात्रों का भविष्य बचा और सवाल उठाना जरूरी है


    नई दिल्ली । 
    अभिजीत दीपके ने सौरव दास के समर्थन में बयान देते हुए कहा है कि वह देश और विशेष रूप से कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों के हित में काम कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि सौरव दास के एक वीडियो के सामने आने के बाद बार काउंसिल के चेयरमैन ने अपना नोटिफिकेशन वापस ले लिया था। दीपके के मुताबिक इससे बड़ी संख्या में लॉ छात्रों का भविष्य प्रभावित होने से बच गया।

    अभिजीत दीपके ने कहा कि सौरव दास का प्रयास देश के लिए सकारात्मक है और कानून के छात्रों के लिए भी इसका महत्व है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक हित से जुड़े मुद्दे पर अपनी बात रख रहा है तो उसे जानबूझकर परेशान करने की कोशिश क्यों की जानी चाहिए।

    उन्होंने सौरव दास और उनके परिवार से जुड़े एक अन्य घटनाक्रम का भी उल्लेख किया। दीपके के अनुसार दिल्ली में एक यूट्यूबर सौरव दास के घर में प्रवेश कर गया था। उन्होंने इस घटनाक्रम को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि सौरव और उनके परिवार को इस तरह परेशान करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी।

    दीपके ने यह भी सवाल उठाया कि परिवार के सदस्यों से उनकी निजी गतिविधियों और कामकाज से जुड़े सवाल क्यों किए गए। उन्होंने विशेष रूप से सौरव की मां को इस पूरे मामले में शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई। उनके अनुसार परिवार को अनावश्यक रूप से परेशान करने की स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए।

    सौरव दास ने इससे पहले पुडुचेरी में अपने परिवार को पुलिस की ओर से डराए और धमकाए जाने का आरोप लगाया था। हालांकि, पुलिस ने इन आरोपों को खारिज किया था। पुलिस की ओर से बताया गया कि अधिकारी सौरव दास के रिश्तेदारों के घर जरूर गए थे, लेकिन यह कार्रवाई नियमित सुरक्षा प्रक्रिया का हिस्सा थी।

    पुलिस के अनुसार स्वतंत्रता दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसरों से पहले संवेदनशील स्थानों और प्रमुख मार्गों के आसपास रहने वाले लोगों के घर जाकर सुरक्षा संबंधी जानकारी जुटाई जाती है। इसी प्रक्रिया के तहत सौरव दास के रिश्तेदारों के घर भी पुलिस पहुंची थी। पुलिस ने किसी तरह की धमकी या परेशान किए जाने के आरोपों से इनकार किया था।

    इस पूरे मामले के बीच अभिजीत दीपके ने सौरव दास के काम को लेकर अपना समर्थन दोहराया। उन्होंने कहा कि देश में कानून के छात्रों के भविष्य और शिक्षा से जुड़े विषयों पर आवाज उठाना जरूरी है। उनके अनुसार यदि किसी मुद्दे पर बदलाव की जरूरत है तो उसके बारे में सवाल पूछे जाने चाहिए और संबंधित व्यवस्था से जवाब मांगा जाना चाहिए।

    स्कूलों की स्थिति को लेकर भी अभिजीत दीपके ने अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश के कई बच्चे बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके अनुसार शिक्षा व्यवस्था में मूलभूत सुविधाओं की कमी दूर किए बिना देश की वास्तविक प्रगति संभव नहीं है।

    उन्होंने कहा कि बच्चों को बेहतर शिक्षा और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए। उनका मानना है कि शिक्षा के क्षेत्र में सुधार का सीधा संबंध देश के भविष्य से है और इस दिशा में लगातार काम करने की जरूरत है।

    सौरव दास से जुड़े विवाद में फिलहाल उनके आरोपों और पुलिस के स्पष्टीकरण के अलग-अलग पक्ष सामने आए हैं। वहीं अभिजीत दीपके ने स्पष्ट रूप से सौरव के प्रयासों का समर्थन किया है और उनके खिलाफ होने वाली किसी भी अनावश्यक कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। मामले को लेकर आगे होने वाले घटनाक्रम पर अब नजर रहेगी।

  • पाकिस्तान के 79वें स्वतंत्रता दिवस पर महंगा हुआ पेट्रोल-डीजल, जानें नई कीमतों से आम लोगों पर कितना बढ़ा बोझ

    पाकिस्तान के 79वें स्वतंत्रता दिवस पर महंगा हुआ पेट्रोल-डीजल, जानें नई कीमतों से आम लोगों पर कितना बढ़ा बोझ


    नई दिल्ली । 
    पाकिस्तान अपने 79वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर महंगाई की एक और चुनौती का सामना कर रहा है। देश में 14 अगस्त से पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी लागू कर दी गई है। ईंधन के दाम बढ़ने का सीधा असर आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ परिवहन और कारोबार की लागत पर पड़ने की संभावना है।

    नई व्यवस्था के तहत पेट्रोल की कीमत में 0.45 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर की वृद्धि की गई है। इसके बाद पेट्रोल का दाम 324.98 रुपये से बढ़कर 325.43 रुपये प्रति लीटर हो गया है। इस बढ़ोतरी के बाद देश में पेट्रोल की कीमत 325 रुपये प्रति लीटर के स्तर को पार कर गई है।

    हाई-स्पीड डीजल के दाम में इससे अधिक वृद्धि की गई है। इसकी कीमत 1.16 रुपये प्रति लीटर बढ़कर 382.79 रुपये से 383.95 रुपये प्रति लीटर हो गई है। नई दरें 14 अगस्त से प्रभावी मानी जा रही हैं। डीजल की कीमत में यह वृद्धि विशेष रूप से परिवहन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि माल ढुलाई और सार्वजनिक परिवहन में डीजल की बड़ी भूमिका होती है।

    ईंधन की नई कीमतें पाकिस्तान के बदले हुए पेट्रोलियम मूल्य निर्धारण तंत्र के तहत तय की गई हैं। इस व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों और तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का प्रभाव घरेलू ईंधन दरों पर तेजी से पड़ सकता है।

    पाकिस्तान में ईंधन कीमतों से जुड़ी व्यवस्था में हाल के महीनों में बदलाव किया गया है। जुलाई से लागू नई प्रणाली का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में होने वाले बदलावों के अनुरूप घरेलू कीमतों को समायोजित करना बताया गया है। पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता के बीच ईंधन कीमतों पर दबाव बना हुआ है।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बदलाव का असर उन देशों पर ज्यादा पड़ता है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं। पाकिस्तान भी अपनी ईंधन जरूरतों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक कीमतों और विनिमय दर में बदलाव घरेलू बाजार में ईंधन की लागत को प्रभावित कर सकते हैं।

    पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने पर माल की ढुलाई महंगी हो सकती है, जिसका प्रभाव खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। पहले से महंगाई का सामना कर रही आबादी के लिए ईंधन की कीमत में मामूली वृद्धि भी घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

    पाकिस्तान में इस वर्ष पहले भी ईंधन कीमतों में बदलाव देखने को मिले हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता, क्षेत्रीय तनाव और आयात लागत में बदलाव के कारण वहां ईंधन मूल्य निर्धारण लगातार चर्चा में रहा है।

    14 अगस्त को लागू हुई नई दरें ऐसे समय में आई हैं जब पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। राष्ट्रीय उत्सव के बीच पेट्रोल और डीजल महंगा होने से महंगाई का मुद्दा एक बार फिर लोगों के बीच चर्चा में है। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की दिशा और क्षेत्रीय परिस्थितियां यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी कि पाकिस्तान में ईंधन की कीमतों पर आगे कितना दबाव बना रहता है।

  • MP में 24 घंटे खुलेंगे बाजार लेकिन 4 दिन की नौकरी का दावा कितना सही? नए कानून के 4 बड़े सवालों का पूरा सच

    MP में 24 घंटे खुलेंगे बाजार लेकिन 4 दिन की नौकरी का दावा कितना सही? नए कानून के 4 बड़े सवालों का पूरा सच


    मध्य प्रदेशमध्य प्रदेश में कार्यस्थल और कारोबार से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया गया है। विधानसभा में पारित मध्य प्रदेश कार्यस्थल सशक्तिकरण संहिता 2026 का मकसद कारोबार के संचालन को आसान बनाना और राज्य में नई तरह की नाइट इकॉनमी को बढ़ावा देना बताया गया है। कानून को लेकर सोशल मीडिया पर कई तरह के दावे भी तेजी से वायरल हो रहे हैं। इनमें दुकानें 24 घंटे खुलने के साथ कर्मचारियों के लिए चार दिन की नौकरी और एक दिन में 12 घंटे काम करने जैसी बातें कही जा रही हैं। लेकिन इन दावों को समझने के लिए प्रतिष्ठान के संचालन और कर्मचारी के काम के नियमों को अलग अलग देखना जरूरी है। विधानसभा में पेश किए गए विधेयक में कारोबार के संचालन से जुड़ी पाबंदियों को आसान बनाने का प्रावधान रखा गया था।

    सबसे पहला सवाल यही है कि क्या अब मध्य प्रदेश में दुकानें और बाजार 24 घंटे खुले रह सकेंगे। नए कानून का मूल प्रावधान प्रतिष्ठानों के कामकाज के घंटों पर पहले जैसी सामान्य पाबंदी को हटाने से जुड़ा है। इसका मतलब यह है कि दुकान मॉल होटल रेस्टोरेंट और दूसरे पात्र प्रतिष्ठान जरूरत और कारोबारी मॉडल के मुताबिक रात में भी खुले रह सकते हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर दुकान को अनिवार्य रूप से 24 घंटे खुला रखना होगा। कारोबारियों को संचालन का विकल्प मिलेगा और सरकार सार्वजनिक व्यवस्था कर्मचारी कल्याण या कुछ विशेष श्रेणियों के लिए अलग नियम बना सकती है। खासतौर पर शराब जैसे कारोबारों को सामान्य दुकानों की तरह नहीं देखा जा सकता।

    अब सबसे ज्यादा चर्चा चार दिन की नौकरी को लेकर है। यहां वायरल दावे को सावधानी से समझना जरूरी है। कानून में कर्मचारी के लिए अनिवार्य चार दिन का वर्क वीक लागू नहीं किया गया है। कर्मचारी से एक सप्ताह में निर्धारित 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं कराया जा सकता। लेकिन व्यवस्था में यह लचीलापन रखा गया है कि कर्मचारी की सहमति से साप्ताहिक काम के घंटे कम दिनों में पूरे किए जा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर कोई कर्मचारी अपनी इच्छा से चार दिन 12 घंटे काम करके 48 घंटे पूरे कर सकता है। लेकिन यह सामान्य या अनिवार्य व्यवस्था नहीं है। नियोक्ता किसी कर्मचारी को उसकी इच्छा के खिलाफ चार दिन में 48 घंटे काम करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। विधेयक की विधानसभा चर्चा में भी चार दिन में 48 घंटे काम करने की संभावना का उल्लेख किया गया था।

    यानी 12 घंटे काम करने वाली बात भी आधी जानकारी के कारण भ्रम पैदा कर रही है। 12 घंटे की सीमा को हर कर्मचारी की रोजाना अनिवार्य ड्यूटी समझना गलत होगा। व्यवस्था का उद्देश्य कर्मचारी को कुछ परिस्थितियों में अपनी सहमति से काम के घंटे अलग तरह से व्यवस्थित करने की सुविधा देना है। अगर तय साप्ताहिक सीमा से ज्यादा काम कराया जाता है तो ओवरटाइम से जुड़े प्रावधान लागू होंगे।

    दूसरा बड़ा सवाल रात में बाजार खुलने से जुड़ा है। अगर कोई दुकान रातभर खुलती है तो इसका मतलब यह नहीं है कि पुलिस या प्रशासन के अधिकार खत्म हो जाएंगे। कानून व्यवस्था की समस्या हो या आग और सुरक्षा का खतरा हो या किसी दूसरे कानून का उल्लंघन हो रहा हो तो संबंधित विभाग कार्रवाई कर सकते हैं। 24 घंटे कारोबार की अनुमति केवल संचालन के समय से जुड़ी सुविधा है। यह किसी कारोबारी को दूसरे कानूनों से छूट नहीं देती।

    सरकार इस बदलाव के जरिए रात की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना चाहती है। बाजार देर रात तक चलने से होटल रेस्टोरेंट कैब डिलीवरी सुरक्षा पार्किंग और दूसरी सेवाओं में कारोबार बढ़ने की संभावना है। इंदौर जैसे शहरों में सराफा और 56 दुकान क्षेत्र की देर रात तक चलने वाली कारोबारी संस्कृति को इसके उदाहरण के तौर पर देखा जाता है। हालांकि केवल बाजार खोलने की अनुमति से रोजगार अपने आप नहीं बढ़ेगा। रात में ग्राहक और पर्याप्त कारोबारी गतिविधि होने पर ही इसका वास्तविक आर्थिक फायदा सामने आएगा। सरकार ने इस कानून को श्रम नियमों को सरल बनाने और कारोबार में अनावश्यक बाधाएं कम करने की दिशा में भी जोड़ा है।

    महिलाओं की नाइट शिफ्ट को लेकर भी नए प्रावधान महत्वपूर्ण हैं। महिला कर्मचारी की इच्छा के खिलाफ उसे रात की पाली में काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यदि महिला अपनी सहमति से नाइट शिफ्ट करती है तो नियोक्ता पर सुरक्षा और परिवहन जैसे इंतजाम की जिम्मेदारी होगी। यानी रात में काम करने की अनुमति के साथ सुरक्षित कार्यस्थल और आने जाने की व्यवस्था भी जरूरी होगी।

    कुल मिलाकर नए कानून का सीधा मतलब यह नहीं है कि हर दुकान अनिवार्य रूप से 24 घंटे खुलेगी या हर कर्मचारी को चार दिन में 48 घंटे काम करना पड़ेगा। असली बदलाव यह है कि कारोबारियों को संचालन के समय में ज्यादा लचीलापन मिलेगा जबकि कर्मचारियों के साप्ताहिक काम के घंटे और सुरक्षा से जुड़े प्रावधान बने रहेंगे। इसलिए सोशल मीडिया पर चल रहे 24 घंटे बाजार और 4 दिन की नौकरी वाले दावे को एक साथ जोड़कर देखना सही नहीं है।

  • अजीत डोभाल ने ऑपरेशन सिंदूर पर दिया बड़ा बयान, कहा भारत की सहनशीलता को कमजोरी समझना गंभीर भूल होगी

    अजीत डोभाल ने ऑपरेशन सिंदूर पर दिया बड़ा बयान, कहा भारत की सहनशीलता को कमजोरी समझना गंभीर भूल होगी


    नई दिल्ली । राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने ऑपरेशन सिंदूर को लेकर भारत की रणनीतिक क्षमता और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि भारत की उदारता और सहनशीलता को उसकी कमजोरी समझना गंभीर भूल होगी। जरूरत पड़ने पर देश जोखिम उठाने और अपने हितों की रक्षा के लिए कड़े फैसले लेने की क्षमता रखता है।

    डोभाल की यह टिप्पणी ऑपरेशन सिंदूर पर आधारित आगामी दो हिस्सों वाली डॉक्यूसीरीज में सामने आई है। यह बातचीत अभियान के बाद उनके प्रमुख सार्वजनिक बयानों में से एक मानी जा रही है। इसमें उन्होंने सैन्य कार्रवाई के पीछे की सोच, सुरक्षा चुनौतियों और फैसले लेने की प्रक्रिया से जुड़े पहलुओं पर बात की है।

    ऑपरेशन सिंदूर के बारे में डोभाल ने बताया कि करीब 88 घंटे चले सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाना था। कार्रवाई का संबंध पहलगाम में हुए आतंकी हमले से जुड़े ठिकानों से बताया गया। भारत ने इस अभियान के माध्यम से आतंकवाद के खिलाफ अपनी नीति और प्रतिक्रिया की क्षमता को स्पष्ट करने का प्रयास किया।

    उन्होंने कहा कि भारत शांति और सहनशीलता में विश्वास करता है, लेकिन इन दोनों मूल्यों को कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक देश जरूरत पड़ने पर ऐसे फैसले लेने में सक्षम है जिनमें जोखिम शामिल हो सकता है और जिनके संभावित परिणामों की परवाह किए बिना राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है।

    ऑपरेशन सिंदूर की पृष्ठभूमि 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले से जुड़ी है। हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में मौजूद आतंकवादी ठिकानों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की थी। इस अभियान को भारत की आतंकवाद विरोधी रणनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर देखा गया।

    डॉक्यूसीरीज में अभियान के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य स्तर पर लिए गए फैसलों से जुड़े कई पहलुओं को सामने लाने की तैयारी है। इसमें वरिष्ठ सुरक्षा और सैन्य अधिकारियों के अनुभवों के माध्यम से अभियान की परिस्थितियों और निर्णय प्रक्रिया को समझाने की कोशिश की जाएगी।

    डोभाल इस कार्यक्रम में सैन्य कार्रवाई के पीछे मौजूद रणनीतिक सोच और विभिन्न स्तरों पर लिए गए फैसलों के बारे में जानकारी देते नजर आएंगे। इससे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सरकार और सुरक्षा प्रतिष्ठान के सामने मौजूद चुनौतियों को समझने का अवसर मिल सकता है।

    अजीत डोभाल लंबे समय से भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। भारतीय पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त डोभाल को 30 मई 2014 को पहली बार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया था। इसके बाद से राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, खुफिया मामलों और रणनीतिक चुनौतियों से जुड़े विषयों पर उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

    डोभाल का करियर खुफिया और सुरक्षा क्षेत्र में लंबे अनुभव से जुड़ा रहा है। इसी पृष्ठभूमि के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में उनकी रणनीतिक समझ को विशेष महत्व दिया जाता है। ऑपरेशन सिंदूर पर उनकी टिप्पणी भी भारत की सुरक्षा नीति और आतंकवाद के खिलाफ उसके दृष्टिकोण को रेखांकित करती है।

    डॉक्यूसीरीज का प्रसारण शनिवार रात नौ बजे से निर्धारित है। कार्यक्रम में ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े घटनाक्रम, सैन्य कार्रवाई और उससे संबंधित रणनीतिक फैसलों के बारे में विस्तार से जानकारी सामने आने की उम्मीद है।

  • 5 किलो सोने की लूट या कुछ और? रतलाम में व्यापारी की कहानी पर पुलिस को संदेह, दोस्त के पास से 300 ग्राम से ज्यादा सोना बरामद

    5 किलो सोने की लूट या कुछ और? रतलाम में व्यापारी की कहानी पर पुलिस को संदेह, दोस्त के पास से 300 ग्राम से ज्यादा सोना बरामद


    रतलाम रतलाम में सराफा व्यापारी से करीब 5 किलो सोने के गहने लूटने के मामले में जांच आगे बढ़ने के साथ ही कहानी में नया मोड़ आ गया है। व्यापारी अर्पित चौरड़िया ने पुलिस को शिकायत देकर बताया था कि बस में सफर के दौरान दो बदमाश उसका बैग छीनकर फरार हो गए। व्यापारी के मुताबिक बैग में करीब 7.5 करोड़ रुपए कीमत के सोने के गहने और 3 लाख रुपए नकद थे। शुरुआती शिकायत के बाद पुलिस ने लूट की घटना मानकर बदमाशों की तलाश शुरू की थी लेकिन जांच के दौरान सामने आए कुछ तथ्यों ने पुलिस का शक व्यापारी की ओर भी मोड़ दिया है।

    पुलिस की जांच में सामने आया कि कथित वारदात के बाद व्यापारी ने अपने दोस्त विक्की अग्रवाल को बुलाया था। बताया जा रहा है कि व्यापारी ने उसे एक बैग सौंपा जिसमें करीब 300 से 350 ग्राम सोने के बिस्किट और आभूषण थे। बरामद किए गए इस सोने की कीमत करीब 50 लाख रुपए बताई जा रही है। खास बात यह है कि शिकायत के समय व्यापारी ने पुलिस को इस सोने के बारे में जानकारी नहीं दी थी। पुलिस ने मुखबिर से मिली सूचना के आधार पर दोस्त तक पहुंचकर उसके पास से सोना बरामद किया।

    अब पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर व्यापारी के पास मौजूद सोना लुट गया था तो घटना के बाद उसके दोस्त के पास करीब 300 से 350 ग्राम सोना कैसे पहुंचा। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि व्यापारी ने दोस्त को सोना किस स्थिति में सौंपा था और शिकायत दर्ज कराने से पहले उसने किन लोगों से संपर्क किया था। इसी वजह से पुलिस पूरे घटनाक्रम को अलग अलग एंगल से खंगाल रही है।

    व्यापारी ने अपनी शिकायत में बताया था कि वह कारोबार के सिलसिले में बड़नगर गया था और रात करीब 8.15 बजे बस से रतलाम के लिए रवाना हुआ। उसके मुताबिक बड़नगर से कुछ संदिग्ध लोग भी बस में सवार हुए और अलग अलग सीटों पर बैठ गए। रात करीब 9.15 बजे बस रेनमऊ फंटे के आसपास पहुंची। इसी दौरान ड्राइवर के पास बैठे एक व्यक्ति ने बस रुकवाई और व्यापारी के पीछे बैठे दो लोगों ने उसका बैग छीन लिया। इसके बाद आरोपी बस से उतरकर बाइक सवार साथियों के साथ फरार हो गए।

    घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे थे। पुलिस ने डॉग स्क्वॉड की मदद से आसपास के इलाके में तलाश की और बस के रूट के साथ संभावित सीसीटीवी फुटेज भी खंगाले। शुरुआती जानकारी में पांच संदिग्धों के बस में सवार होने की बात सामने आई थी। अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या वास्तव में बस में मौजूद बदमाशों ने व्यापारी का बैग छीना था या वारदात की कहानी में कोई और कड़ी छिपी हुई है।

    जांच में यह भी सामने आया है कि व्यापारी ने बड़नगर में करीब 10 कारोबारियों के साथ सोने के सौदे किए थे। अलग अलग कारोबारियों को कुछ ग्राम सोना और आभूषण बेचने के बाद वह रतलाम लौट रहा था। पुलिस अब इन सभी लेनदेन और संबंधित दस्तावेजों की जांच कर रही है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि व्यापारी के पास वास्तव में कितनी मात्रा में सोना था।

    फिलहाल पुलिस ने व्यापारी के दोस्त से बरामद सोना अपने कब्जे में ले लिया है और व्यापारी तथा उसके दोस्त से पूछताछ जारी है। साथ ही पुलिस लूट की शिकायत में बताए गए सोने की वास्तविक मात्रा का मिलान बिलों और दूसरे दस्तावेजों से कर रही है। पुलिस यह भी पता लगाने में जुटी है कि कथित लूट में शामिल बदमाश कौन थे और अगर लूट हुई तो वे किस रास्ते से भागे। फिलहाल करोड़ों रुपए की इस कथित लूट में पुलिस की जांच का सबसे अहम सवाल यही है कि वास्तव में कितना सोना लूटा गया और व्यापारी ने पुलिस को पूरी जानकारी क्यों नहीं दी।

  • भारत की वैश्विक छवि पर प्यू सर्वे का बड़ा खुलासा, श्रीलंका में 79 प्रतिशत सकारात्मक राय, पाकिस्तान में सिर्फ 7 प्रतिशत समर्थन

    भारत की वैश्विक छवि पर प्यू सर्वे का बड़ा खुलासा, श्रीलंका में 79 प्रतिशत सकारात्मक राय, पाकिस्तान में सिर्फ 7 प्रतिशत समर्थन

    नई दिल्ली । भारत की वैश्विक छवि को लेकर किए गए एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे में अलग-अलग देशों के लोगों की राय में बड़ा अंतर सामने आया है। 36 देशों में किए गए अध्ययन के मुताबिक भारत के प्रति दुनिया की औसत सकारात्मक धारणा 45 प्रतिशत रही, जबकि 41 प्रतिशत लोगों ने नकारात्मक राय व्यक्त की। आंकड़े बताते हैं कि भारत की लोकप्रियता कई देशों में मजबूत है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में उसकी छवि को लेकर मतभेद भी स्पष्ट हैं।

    सर्वे में भारत के पड़ोसी देशों की राय सबसे ज्यादा चर्चा में रही। श्रीलंका में भारत के प्रति सकारात्मक सोच रखने वाले लोगों का अनुपात 79 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा भारत के लिए सर्वे में शामिल देशों के बीच सबसे मजबूत सकारात्मक प्रतिक्रियाओं में शामिल है। इसके विपरीत पाकिस्तान में केवल 7 प्रतिशत लोगों ने भारत के बारे में सकारात्मक राय व्यक्त की।

    भारत की बेहतर छवि केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं रही। केन्या और ब्रिटेन में भी लगभग दस में सात लोगों ने भारत के प्रति सकारात्मक रुख जताया। जर्मनी, इजरायल, इटली, स्वीडन, जापान और थाईलैंड में भी भारत को लेकर सकारात्मक सोच रखने वालों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक रही।

    यूरोपीय देशों में भारत की छवि में पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले सुधार भी दर्ज किया गया है। ब्रिटेन में एक वर्ष के दौरान भारत के प्रति सकारात्मक राय में 11 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई। जर्मनी में सकारात्मक धारणा छह प्रतिशत अंक बढ़ी। फ्रांस में भी भारत के प्रति सकारात्मक राय 2023 के 39 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुंच गई।

    श्रीलंका में भारत की छवि में विशेष सुधार दिखाई दिया। वहां 2024 के मुकाबले भारत के प्रति सकारात्मक राय में 14 प्रतिशत अंक की वृद्धि दर्ज की गई। इससे दोनों देशों के बीच सामाजिक और क्षेत्रीय स्तर पर भारत की स्वीकार्यता की एक मजबूत तस्वीर सामने आती है।

    हालांकि अमेरिका में भारत को लेकर तस्वीर अपेक्षाकृत कमजोर रही। वहां 45 प्रतिशत लोगों ने भारत के प्रति सकारात्मक राय व्यक्त की, जबकि 50 प्रतिशत लोगों की राय नकारात्मक रही। यह भारत के लिए 2008 के बाद अमेरिका में दर्ज सबसे कम सकारात्मक रेटिंग बताई गई है। वर्ष 2023 में अमेरिका में भारत को लेकर 51 प्रतिशत सकारात्मक राय सामने आई थी।

    अमेरिका में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर भी भारत को लेकर अंतर दिखाई दिया। डेमोक्रेट समर्थकों में 50 प्रतिशत लोगों ने भारत के प्रति सकारात्मक राय जताई, जबकि रिपब्लिकन समर्थकों में यह आंकड़ा 42 प्रतिशत रहा। इससे अमेरिकी समाज में भारत की छवि को लेकर राजनीतिक विभाजन का संकेत मिलता है।

    सर्वे में भारत के वैश्विक प्रभाव को लेकर भी अमेरिकी नागरिकों से सवाल किया गया। 54 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों ने माना कि दुनिया में भारत का प्रभाव लगभग पहले जैसा ही है। वहीं 30 प्रतिशत लोगों ने कहा कि भारत का प्रभाव बढ़ा है, जबकि 13 प्रतिशत ने इसके कम होने की बात कही।

    तुर्किये में भारत के प्रति सकारात्मक राय केवल 15 प्रतिशत रही। वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में यह आंकड़ा 18 प्रतिशत था। इजरायल में भी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर राय में अंतर सामने आया, जहां दक्षिणपंथी विचार रखने वालों में सकारात्मक धारणा 68 प्रतिशत और वामपंथी विचार रखने वालों में 46 प्रतिशत रही।

    कुल मिलाकर सर्वे भारत की वैश्विक छवि की मिश्रित तस्वीर पेश करता है। जहां श्रीलंका, ब्रिटेन, जर्मनी और कई अन्य देशों में भारत के प्रति सकारात्मक धारणा मजबूत हुई है, वहीं पाकिस्तान, तुर्किये और अमेरिका जैसे देशों में अलग रुझान दिखाई देता है। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत की अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता एक समान नहीं है और अलग-अलग देशों में उसकी छवि क्षेत्रीय संबंधों, राजनीतिक परिस्थितियों और वैश्विक धारणा के अनुसार बदल रही है।

  • देशभक्ति या लापरवाही? नर्मदा की तेज धार में बिना लाइफ जैकेट नाव पर निकले विधायक, वीडियो चर्चा में

    देशभक्ति या लापरवाही? नर्मदा की तेज धार में बिना लाइफ जैकेट नाव पर निकले विधायक, वीडियो चर्चा में


    इंदौर। मध्य प्रदेश में स्वतंत्रता दिवस से पहले तिरंगा यात्राओं और राजनीतिक गतिविधियों के बीच कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने नेताओं और अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रतलाम में तिरंगा यात्रा के दौरान महापौर कलेक्टर और दूसरे जनप्रतिनिधि तथा अधिकारी हाथों में तिरंगा लेकर करीब डेढ़ किलोमीटर तक पैदल चले। देशभक्ति के इस आयोजन में लोगों की मौजूदगी भी रही लेकिन चर्चा उस समय शुरू हुई जब पैदल चल रहे नेताओं और अधिकारियों के पीछे उनके खाली सरकारी वाहन भी चलते नजर आए। इन वाहनों में ड्राइवर के अलावा कोई सवार नहीं था। ऐसे में सवाल उठने लगा कि जब संबंधित अधिकारी और जनप्रतिनिधि पैदल यात्रा में शामिल थे तो उनके खाली वाहनों को साथ चलाने की क्या जरूरत थी। इससे पेट्रोल और डीजल की खपत को लेकर भी सवाल उठे। यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से समय समय पर ईंधन बचाने और ऊर्जा की खपत कम करने की अपील की जाती रही है।

    दूसरी तस्वीर महेश्वर से सामने आई जहां तिरंगा यात्रा के दौरान भाजपा विधायक राजकुमार मेव और टीआई समेत कई नेता तथा अधिकारी नाव में सवार दिखाई दिए। मामला इसलिए ज्यादा गंभीर माना गया क्योंकि इस दौरान नर्मदा नदी उफान पर थी और बारिश के मौसम में नदी का बहाव सामान्य दिनों की तुलना में काफी तेज रहता है। इसके बावजूद नाव में बैठे लोगों ने कथित तौर पर लाइफ जैकेट नहीं पहनी थी। इस दृश्य के सामने आने के बाद सुरक्षा व्यवस्था और नियमों के पालन को लेकर सवाल खड़े हुए। आम लोगों को नदी और जलाशयों के आसपास सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है लेकिन जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की ओर से ही सुरक्षा उपकरणों की अनदेखी का आरोप लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि पूरे घटनाक्रम में संबंधित प्रशासन की ओर से सुरक्षा व्यवस्था को लेकर क्या निर्देश थे यह अलग जांच का विषय हो सकता है।

    इधर मध्य प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के संभावित उज्जैन दौरे को लेकर भी बयानबाजी शुरू हो गई है। राहुल गांधी सितंबर में मध्य प्रदेश के उज्जैन आने वाले हैं ऐसी चर्चा के बीच प्रदेश सरकार के मंत्री विश्वास सारंग ने उन्हें पहले झारखंड के रांची जाने की सलाह दी है। सारंग ने दिल्ली में हुए प्रदर्शन में राहुल गांधी की मौजूदगी का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि रांची में प्रदर्शन कर रहे छात्र छात्राओं के खिलाफ कार्रवाई के दौरान वे वहां क्यों नहीं पहुंचे। इसी बयान के दौरान मंत्री ने राहुल गांधी को रांची जाने का ऑफर दिया और यहां तक कहा कि वे उनकी दिल्ली से रांची की टिकट भी करा देंगे। हालांकि राहुल गांधी के मध्य प्रदेश दौरे की अंतिम तारीख अभी तय नहीं हुई है। ऐसे में मंत्री का टिकट वाला बयान फिलहाल राजनीतिक तंज के तौर पर ही देखा जा रहा है।

    राजनीतिक बयानबाजी के बीच मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की ई-अटेंडेंस भी परेशानी का कारण बनी। स्वतंत्रता दिवस से दो दिन पहले बड़ी संख्या में शिक्षक स्कूलों में ड्यूटी पूरी करने के बाद आउट-पंच लगाने के लिए परेशान होते रहे। ई-अटेंडेंस पोर्टल में तकनीकी समस्या के कारण शिक्षक समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कर पा रहे थे। शिक्षकों की चिंता इस बात को लेकर थी कि अगर आउट-पंच नहीं हुआ तो उनकी उपस्थिति प्रभावित हो सकती है और वेतन कटौती का खतरा पैदा हो सकता है। नियमों के अनुसार शिक्षकों को स्कूल के निर्धारित दायरे में रहकर ही ई-अटेंडेंस प्रक्रिया पूरी करनी होती है।

    देर शाम तकनीकी समस्या दूर होने के बाद विभाग की ओर से शिक्षकों को राहत दी गई और उन्हें जहां वे मौजूद थे वहीं से अटेंडेंस लगाने की अनुमति दी गई। हालांकि शिक्षकों के लिए ई-अटेंडेंस की तकनीकी दिक्कत कोई नई समस्या नहीं है। प्रदेश के कई ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में नेटवर्क की परेशानी के कारण भी शिक्षकों को बार बार मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सवाल केवल तकनीकी व्यवस्था का नहीं बल्कि ऐसी प्रणाली तैयार करने का है जो कर्मचारियों के लिए सुविधा बने परेशानी नहीं।

    कुल मिलाकर स्वतंत्रता दिवस से पहले मध्य प्रदेश में सामने आए इन घटनाक्रमों ने राजनीति प्रशासन और सरकारी व्यवस्था से जुड़े कई सवालों को एक साथ चर्चा में ला दिया है। कहीं ईंधन बचाने की जरूरत पर सवाल है तो कहीं नदी में सुरक्षा नियमों के पालन को लेकर चिंता है। वहीं राजनीतिक बयानबाजी और ई-अटेंडेंस की तकनीकी समस्या ने भी अलग बहस छेड़ दी है।