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  • PM मोदी के शब्दों से गदगद मीराबाई चानू, बोलीं- आने वाली प्रतियोगिताओं में और कड़ी मेहनत करने की मिलेगी प्रेरणा

    PM मोदी के शब्दों से गदगद मीराबाई चानू, बोलीं- आने वाली प्रतियोगिताओं में और कड़ी मेहनत करने की मिलेगी प्रेरणा


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में ऐतिहासिक गोल्ड मेडल जीतकर देश का गौरव बढ़ाने वाली भारतीय महिला वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद उनका आभार जताया है। रविवार को प्रधानमंत्री आवास पर कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतने वाले भारतीय खिलाड़ियों से खास मुलाकात हुई। इस दौरान पीएम मोदी ने खिलाड़ियों की उपलब्धियों की सराहना करते हुए उनका हौसला बढ़ाया। मीराबाई चानू ने कहा कि प्रधानमंत्री के उत्साह बढ़ाने वाले शब्द उन्हें और अन्य खिलाड़ियों को आने वाली प्रतियोगिताओं में कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित करेंगे।

    प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद मीराबाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए उनका धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों की यात्रा में प्रधानमंत्री का लगातार सहयोग और प्रोत्साहन काफी महत्वपूर्ण है। मीराबाई ने लिखा कि मुलाकात के दौरान हर पदक विजेता के लिए पीएम मोदी के उत्साह बढ़ाने वाले शब्द निश्चित तौर पर खिलाड़ियों को भविष्य की प्रतियोगिताओं के लिए और बेहतर तैयारी करने की प्रेरणा देंगे।

    इस मुलाकात के दौरान पीएम मोदी ने मीराबाई के उस भावुक पल का भी जिक्र किया जब उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने के बाद पोडियम पर आंसू बहाए थे। प्रधानमंत्री ने उनसे पूछा कि वह उस समय इतनी भावुक क्यों हो गई थीं। पीएम मोदी ने मजाकिया और भावुक अंदाज में कहा कि उनके इतने आंसू निकल रहे थे कि ऐसा लग रहा था जैसे हर आंसू की बूंद से गोल्ड मेडल टपक रहा हो।

    मीराबाई ने इसके जवाब में अपने संघर्ष की पूरी कहानी बताई। उन्होंने कहा कि गोल्ड मेडल जीतने के बाद वह बेहद खुश और भावुक थीं। उनकी आंखों से आंसू इसलिए भी निकल आए क्योंकि पेरिस ओलंपिक में वह महज एक किलो के अंतर से पदक जीतने से चूक गई थीं। इसके बाद के चार वर्षों में उन्होंने कई तरह की चुनौतियों का सामना किया। चोटों ने उनकी तैयारी को प्रभावित किया और परिवार में भी कई परेशानियां चलती रहीं। इन मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार अपनी फिटनेस तथा प्रदर्शन पर काम करती रहीं।

    मीराबाई ने बताया कि जब वह कॉमनवेल्थ गेम्स के पोडियम पर खड़ी थीं और भारत का राष्ट्रगान बजना शुरू हुआ तो वह खुद को रोक नहीं सकीं। उन्होंने कहा कि जब सामने देश का तिरंगा ऊपर उठता है और राष्ट्रगान बजता है तो भावनाएं अपने आप उमड़ पड़ती हैं। उनके लिए वह पल वर्षों की मेहनत और संघर्ष का परिणाम था।

    कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मीराबाई ने 48 किलोग्राम वर्ग में कुल 190 किलोग्राम भार उठाकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया। इस जीत के साथ उन्होंने एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया जो भारतीय खेल जगत के लिए बेहद खास है। मीराबाई लगातार तीन कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाली दुनिया की पहली वेटलिफ्टर बन गई हैं।

    मीराबाई की इस उपलब्धि के पीछे केवल उनकी ताकत और तकनीक ही नहीं बल्कि लंबे समय तक किया गया संघर्ष भी शामिल है। पेरिस ओलंपिक की निराशा, चोटों और निजी चुनौतियों के बाद उन्होंने जिस तरह वापसी की, वह युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बन गई है। प्रधानमंत्री से मुलाकात और उनके प्रोत्साहन के बाद मीराबाई ने भी संकेत दिया कि उनका लक्ष्य यहीं खत्म नहीं हुआ है। आने वाली प्रतियोगिताओं में वह और बेहतर प्रदर्शन करने के लिए पूरी मेहनत करेंगी और देश के लिए नए पदक जीतने की कोशिश जारी रखेंगी।

  • सिनर की चोट ने बढ़ाई टेंशन, सिनसिनाटी ओपन से नाम लिया वापस; अब यूएस ओपन पर टिकी नजरें

    सिनर की चोट ने बढ़ाई टेंशन, सिनसिनाटी ओपन से नाम लिया वापस; अब यूएस ओपन पर टिकी नजरें


    नई दिल्ली । दुनिया के नंबर एक टेनिस खिलाड़ी यानिक सिनर को यूएस ओपन से पहले बड़ा झटका लगा है। इटली के स्टार खिलाड़ी ने दाहिने घुटने की चोट के कारण सिनसिनाटी ओपन से अपना नाम वापस ले लिया है। टूर्नामेंट आयोजकों ने सिनर के हटने की पुष्टि कर दी है। साल के आखिरी ग्रैंड स्लैम यूएस ओपन की तैयारियों के लिहाज से सिनर के लिए यह फैसला काफी अहम माना जा रहा है क्योंकि उन्हें हार्ड कोर्ट पर अपनी लय हासिल करने के लिए सिनसिनाटी ओपन में उतरना था। अब उनका पूरा ध्यान चोट से उबरने और यूएस ओपन के लिए खुद को फिट करने पर होगा।

    24 वर्षीय सिनर ने अपने फैसले के बारे में बताते हुए कहा कि डॉक्टरों और अपनी टीम से सलाह लेने के बाद उन्होंने सिनसिनाटी में होने वाले मास्टर्स 1000 टूर्नामेंट से हटने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि उनके दाहिने घुटने में परेशानी है और मेडिकल टीम उनके साथ लगातार काम कर रही है। हालांकि अभी वह मुकाबले के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं, इसलिए उन्होंने जोखिम लेने के बजाय आराम और रिकवरी को प्राथमिकता देने का फैसला किया है।

    सिनर के लिए यह इस महीने का दूसरा बड़ा हार्ड कोर्ट टूर्नामेंट होगा जिससे उन्हें बाहर रहना पड़ेगा। इससे पहले उन्होंने कैनेडियन ओपन से भी अपना नाम वापस लिया था। ऐसे में यूएस ओपन से पहले उनके पास प्रतिस्पर्धी मुकाबले के जरिए अपनी तैयारी मजबूत करने के मौके काफी कम हो गए हैं। पिछले महीने विंबलडन में अपना पांचवां ग्रैंड स्लैम खिताब जीतने के बाद सिनर से उम्मीद की जा रही थी कि वह नॉर्थ अमेरिका के हार्ड कोर्ट टूर्नामेंटों में शानदार प्रदर्शन करते हुए यूएस ओपन में अपने खिताब की रक्षा की तैयारी करेंगे।

    सिनर ने सिनसिनाटी ओपन से हटने पर निराशा भी जताई। उन्होंने कहा कि इस टूर्नामेंट में नहीं खेल पाना उनके लिए निराशाजनक है, लेकिन इस समय सबसे जरूरी पूरी तरह फिट होना है। उन्होंने संकेत दिया कि अब उनका ध्यान यूएस ओपन की तैयारी पर रहेगा और वह चोट को लेकर किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहते।

    सिनर के हटने से सिनसिनाटी ओपन की स्टार पावर को भी बड़ा झटका लगा है। इससे पहले यूएस ओपन चैंपियन कार्लोस अल्काराज भी कलाई की चोट के कारण टूर्नामेंट से बाहर हो चुके हैं। ऐसे में सिनसिनाटी के मुख्य ड्रॉ में दो बड़े नामों की गैरमौजूदगी ने टूर्नामेंट की तस्वीर बदल दी है। वहीं सिनर के लिए इसका सीधा असर यूएस ओपन की तैयारियों पर पड़ सकता है क्योंकि अब उन्हें हार्ड कोर्ट पर प्रतिस्पर्धी अभ्यास का सीमित अवसर मिलेगा।

    सिनसिनाटी ओपन का मेन ड्रॉ 13 अगस्त से शुरू होना है, जबकि यूएस ओपन का मेन ड्रॉ 30 अगस्त से शुरू होगा। ऐसे में सिनर के पास लगभग दो सप्ताह से थोड़ा अधिक समय रहेगा जिसमें उन्हें घुटने की समस्या से पूरी तरह उबरना होगा। उनके लिए चुनौती यह होगी कि वह बिना जल्दबाजी किए फिटनेस हासिल करें और यूएस ओपन में अपने खिताब की रक्षा के लिए कोर्ट पर उतरें।

    सिनर का इस समय चोट से बचने का फैसला उनके लंबे सीजन को देखते हुए भी महत्वपूर्ण है। लगातार बड़े टूर्नामेंट खेलने के बाद शरीर पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है और घुटने की समस्या को गंभीर होने से रोकने के लिए आराम करना जरूरी हो सकता है। अब टेनिस प्रशंसकों की नजर इस बात पर होगी कि सिनर अगले कुछ हफ्तों में कितनी तेजी से रिकवरी करते हैं और क्या वह यूएस ओपन में पूरी फिटनेस के साथ अपने अभियान की शुरुआत कर पाते हैं।

  • उतार-चढ़ाव के बीच मामूली बढ़त पर बंद हुआ शेयर बाजार, सेंसेक्स 43 अंक चढ़ा और निफ्टी 24,583 पर पहुंचा

    उतार-चढ़ाव के बीच मामूली बढ़त पर बंद हुआ शेयर बाजार, सेंसेक्स 43 अंक चढ़ा और निफ्टी 24,583 पर पहुंचा


    नई दिल्ली । हफ्ते के पहले कारोबारी दिन सोमवार को भारतीय शेयर बाजार में पूरे सत्र के दौरान उतार-चढ़ाव देखने को मिला। अमेरिका और ईरान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने को लेकर समझौते की अनिश्चितता का असर निवेशकों के रुख पर दिखाई दिया। कारोबार के दौरान बाजार में कई बार तेजी और कमजोरी के दौर आए, लेकिन अंत में प्रमुख सूचकांक मामूली बढ़त के साथ बंद हुए।

    कारोबार समाप्त होने पर सेंसेक्स 43.27 अंक यानी 0.06 प्रतिशत की बढ़त के साथ 78,542.44 के स्तर पर बंद हुआ। इसी तरह निफ्टी50 में 13.15 अंक यानी 0.05 प्रतिशत की मामूली तेजी दर्ज की गई और यह 24,583.80 के स्तर पर पहुंच गया। दोनों प्रमुख सूचकांकों की सीमित बढ़त से संकेत मिला कि निवेशकों ने मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सतर्क रुख बनाए रखा।

    व्यापक बाजार में हालांकि तस्वीर कुछ अलग रही। निफ्टी मिडकैप सूचकांक में 0.62 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 0.27 प्रतिशत कमजोर होकर बंद हुआ। इसके बावजूद दोनों सूचकांक अपने-अपने रिकॉर्ड उच्च स्तरों के आसपास बने हुए हैं। इससे व्यापक बाजार में अब भी मजबूती कायम रहने का संकेत मिलता है।

    क्षेत्रवार कारोबार में निफ्टी पीएसयू बैंक सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाला क्षेत्र रहा और इसमें करीब 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। फार्मा और एफएमसीजी क्षेत्र के शेयरों में भी दबाव देखने को मिला। इसके विपरीत निफ्टी रियल्टी ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया और बाजार की कमजोरी के बीच मजबूती दिखाई।

    निफ्टी50 में टाइटन, टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, बजाज फाइनेंस, श्रीराम फाइनेंस, ग्रासिम और टाटा स्टील प्रमुख बढ़त वाले शेयरों में शामिल रहे। इन कंपनियों के शेयरों में खरीदारी का रुख दिखाई दिया और इन्होंने सूचकांक को संभालने में योगदान दिया।

    दूसरी ओर एसबीआई, इटरनल, आईटीसी, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, टीसीएस, विप्रो और कोल इंडिया के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। इन प्रमुख शेयरों में बिकवाली के कारण बाजार की बढ़त सीमित रही और कारोबार का समग्र रुख सपाट बना रहा।

    आने वाले कारोबारी सत्रों में निफ्टी के लिए 24,750 से 24,800 का स्तर महत्वपूर्ण रेजिस्टेंस क्षेत्र माना जा रहा है। यदि सूचकांक इस दायरे के ऊपर मजबूती से टिकता है तो आगे 24,950 और फिर 25,100 के स्तर की ओर बढ़ने की संभावना बन सकती है।

    वहीं, बाजार में कमजोरी आने पर 24,450 से 24,420 का क्षेत्र निफ्टी के लिए अहम सपोर्ट जोन रहेगा। इस स्तर के ऊपर सूचकांक के बने रहने तक बाजार की व्यापक संरचना सकारात्मक रहने की उम्मीद है। ऐसे में वैश्विक घटनाक्रम, विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी स्थिति, आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण संकेतक बनी रहेगी।

  • प्रदीप रावत के बेटे विक्रमादित्य ने पिता के अनसुने सपनों का किया खुलासा, बताया क्यों अभिनेता नहीं बनना चाहते थे

    प्रदीप रावत के बेटे विक्रमादित्य ने पिता के अनसुने सपनों का किया खुलासा, बताया क्यों अभिनेता नहीं बनना चाहते थे

    नई दिल्ली ।अभिनेता प्रदीप रावत के निधन के बाद उनके परिवार और प्रशंसकों के बीच उनकी यादें ताजा हैं। हिंदी सिनेमा, दक्षिण भारतीय फिल्मों और टेलीविजन में अपनी अलग पहचान बनाने वाले प्रदीप रावत का 5 अगस्त 2026 को 74 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन के बाद अब उनके बेटे विक्रमादित्य रावत ने पिता के जीवन से जुड़े कई ऐसे पहलुओं का खुलासा किया है, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते थे।

    विक्रमादित्य ने बताया कि उनके पिता का पहला सपना अभिनेता बनना नहीं था। वह बचपन से सेना में जाने की इच्छा रखते थे। उनके दादा भी सैनिक थे और इसी पारिवारिक पृष्ठभूमि का प्रभाव प्रदीप रावत के मन पर पड़ा था। हालांकि, परिस्थितियों के चलते वह सेना में शामिल नहीं हो सके और आगे चलकर उनका जीवन अभिनय की दुनिया की ओर मुड़ गया।

    विक्रमादित्य के मुताबिक, अभिनय उनके पिता के जीवन में एक ऐसे मोड़ के रूप में आया, जिसने आगे चलकर उन्हें देशभर में पहचान दिलाई। उन्होंने अपने काम के जरिए हिंदी सिनेमा के साथ दक्षिण भारतीय फिल्मों और टेलीविजन में भी मजबूत जगह बनाई। अलग-अलग तरह के किरदारों को प्रभावशाली ढंग से निभाने की उनकी क्षमता दर्शकों के बीच उनकी खास पहचान बनी।

    प्रदीप रावत को बीआर चोपड़ा के लोकप्रिय धारावाहिक महाभारत में अश्वत्थामा के किरदार से घर-घर में पहचान मिली। इस भूमिका ने उनके अभिनय करियर को एक मजबूत आधार दिया। इसके बाद उन्होंने फिल्मों में भी कई महत्वपूर्ण और प्रभावशाली भूमिकाएं निभाईं। आमिर खान की फिल्म गजनी में उनका किरदार विशेष रूप से चर्चित रहा और इस भूमिका ने नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच भी उन्हें पहचान दिलाई।

    विक्रमादित्य ने अपने पिता के व्यक्तित्व की एक और खास बात साझा करते हुए कहा कि वह बेहद आत्मनिर्भर स्वभाव के व्यक्ति थे। वह मुश्किल परिस्थितियों में भी दूसरों से मदद मांगने के बजाय अपनी मेहनत और क्षमता पर भरोसा करते थे। उनके लिए आत्मसम्मान और खुद के दम पर आगे बढ़ना जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

    उन्होंने बताया कि उनके पिता हमेशा मेहनत करने और ईश्वर पर विश्वास रखने की बात कहते थे। उनका मानना था कि इंसान के हाथ में केवल अपना प्रयास होता है, जबकि परिणाम हमेशा उसके नियंत्रण में नहीं होता। इसलिए व्यक्ति को ईमानदारी से अपना काम करते रहना चाहिए और इसके बाद मिलने वाले परिणाम को स्वीकार करना चाहिए। यही सोच उनके जीवन और व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा रही।

    विक्रमादित्य ने यह भी बताया कि उनके पिता की एक बड़ी इच्छा थी कि वह अपने बेटे को फिल्मी दुनिया में एक सफल कलाकार के रूप में देखें। प्रदीप रावत चाहते थे कि उनका बेटा भी अभिनय के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाए और बड़ा नाम हासिल करे। अब विक्रमादित्य ने पिता के इस सपने को पूरा करने का संकल्प जताया है।

    प्रदीप रावत के निधन की खबर सामने आने के बाद फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई। वह बीमारी का इलाज करा रहे थे और उनके जीवन के अंतिम दौर में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ गई थीं। उनके निधन के बाद बेटे द्वारा साझा की गई यादों ने उनके प्रशंसकों को उनके अभिनय के साथ-साथ उनके निजी व्यक्तित्व और जीवन मूल्यों को भी करीब से समझने का अवसर दिया है।

  • झारखंड में जेपीएससी जेएसएससी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी के खिलाफ छात्रों का प्रदर्शन तेज, बैरिकेड तोड़ विधानसभा की ओर बढ़े आंदोलनकारी

    झारखंड में जेपीएससी जेएसएससी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी के खिलाफ छात्रों का प्रदर्शन तेज, बैरिकेड तोड़ विधानसभा की ओर बढ़े आंदोलनकारी

    नई दिल्ली । झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी के खिलाफ छात्रों का आंदोलन सोमवार को उस समय तेज हो गया, जब बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी विधानसभा की ओर बढ़ने लगे। रांची में प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने प्रशासन की ओर से लगाए गए बैरिकेड पार किए और कई जगह उन्हें हटाकर आगे बढ़ने की कोशिश की। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने वाटर कैनन का इस्तेमाल किया, लेकिन प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं हुए।

    आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने एक के बाद एक आठ बैरिकेड तोड़ दिए। मुख्य सड़क पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत किए जाने के बाद कई छात्र कच्चे और पहाड़ी रास्तों से विधानसभा की ओर बढ़ने लगे। कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड खींचकर रास्ते से हटाए और फिर समूह के साथ आगे बढ़ते रहे।

    आंदोलन की अगुवाई जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म मोर्चा के स्वयंसेवकों ने की। मोर्चा के प्रतिनिधियों ने प्रदर्शनकारियों को विधानसभा के गेट की तरफ आगे नहीं बढ़ने की अपील की। उन्होंने छात्रों से जगन्नाथ मंदिर तक मार्च करने और वहीं धरना जारी रखने का आग्रह किया। भीड़ में किसी असामाजिक तत्व की मौजूदगी की जानकारी देने की अपील भी की गई।

    प्रदर्शनकारियों को रोकने के दौरान मोर्चा के प्रतिनिधियों और कुछ छात्रों के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति भी बनी। इसके बाद आंदोलनकारियों को नियंत्रित करने के लिए तीन स्तर की मानव शृंखला बनाई गई। बड़ी संख्या में छात्र सड़क पर बैठ गए और नारेबाजी शुरू कर दी। प्रदर्शन स्थल पर वंदे मातरम और भारत माता की जय के नारे भी सुनाई दिए।

    इस आंदोलन में नौ दिनों से अनशन कर रहे जेएलकेएम नेता देवेंद्र नाथ महतो की मौजूदगी भी खास रही। जयपाल सिंह स्टेडियम में अनशन पर बैठे महतो को उनके समर्थक कपड़े और डंडों से तैयार पालकी में कंधों पर लेकर विधानसभा के करीब पहुंचे। इससे पहले एंबुलेंस से विधानसभा की ओर जाते समय उन्हें जगन्नाथ मंदिर के पास रोक दिया गया था।

    रोक दिए जाने के बाद समर्थकों ने महतो को कंधों पर उठा लिया और कुछ दूरी तक उन्हें इसी तरह आगे ले गए। बाद में वह पालकी पर बैठकर धरना स्थल तक पहुंचे। इस दौरान उनके हाथ में पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन की तस्वीर भी दिखाई दी। महतो की मौजूदगी ने छात्रों के आंदोलन को राजनीतिक समर्थन का भी संकेत दिया।

    सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेने के बाद जेएलकेएम के विधायक भी प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच पहुंचे। उन्होंने छात्रों से विधानसभा के गेट तक नहीं जाने और उससे पहले ही रुकने की अपील की। विधायक ने आंदोलन को शांतिपूर्ण तरीके से जारी रखने का आग्रह किया और प्रदर्शनकारियों से संयम बनाए रखने को कहा।

    प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को विधानसभा की ओर बढ़ने से रोकने के लिए कई स्तर पर बैरिकेडिंग की थी। वाटर कैनन के इस्तेमाल के बावजूद आंदोलनकारी अपनी मांगों पर कायम रहे। पुलिस बल की तैनाती बढ़ाई गई और ड्रोन के जरिए प्रदर्शन की निगरानी तथा रिकॉर्डिंग भी की गई।

    प्रदर्शन के दौरान विरोध का अलग अंदाज भी देखने को मिला। कुछ छात्र स्पाइडरमैन और वनमानुष की वेशभूषा में पहुंचे और अपने हाथों में संदेश लिखे पोस्टर लेकर प्रदर्शन किया। भीड़ में फिल्म पुष्पा के किरदार जैसी वेशभूषा में भी एक प्रदर्शनकारी नजर आया।

    छात्रों का यह आंदोलन अब विधानसभा के आसपास के क्षेत्रों तक पहुंच चुका है। प्रदर्शनकारी जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी से जुड़े मामलों को लेकर अपनी मांगों पर कायम हैं। वहीं प्रशासन प्रदर्शनकारियों को विधानसभा परिसर की ओर आगे बढ़ने से रोकने और स्थिति को नियंत्रित रखने में जुटा है।

  • पोडियम पर क्यों रोई थीं मीराबाई चानू? PM मोदी ने पूछा सवाल, बोलीं- चार साल में बहुत कुछ सहा

    पोडियम पर क्यों रोई थीं मीराबाई चानू? PM मोदी ने पूछा सवाल, बोलीं- चार साल में बहुत कुछ सहा


    नई दिल्ली । कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में लगातार तीसरी बार गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचने वाली भारतीय वेटलिफ्टर मीराबाई चानू की भावुक तस्वीरें अब भी लोगों के जेहन में हैं। ग्लासगो में पोडियम पर खड़ी मीराबाई जब अपने गले में गोल्ड मेडल पहनकर भारत का राष्ट्रगान सुन रही थीं तो उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े थे। रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आवास पर कॉमनवेल्थ गेम्स से पदक जीतकर लौटे भारतीय खिलाड़ियों से मुलाकात की। इस दौरान पीएम मोदी ने मीराबाई चानू के उसी भावुक पल का जिक्र करते हुए उनकी उपलब्धि और संघर्ष की जमकर सराहना की।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीराबाई से पूछा कि गोल्ड मेडल जीतने के बाद वह पोडियम पर इतनी भावुक क्यों हो गई थीं। पीएम ने बेहद भावुक अंदाज में कहा कि उनके इतने आंसू बह रहे थे कि ऐसा लग रहा था जैसे हर आंसू की बूंद से गोल्ड मेडल टपक रहा हो। प्रधानमंत्री की यह बात सुनकर मीराबाई ने भी अपने भावुक होने की वजह बताई और कहा कि उस दिन वह बेहद खुश और भावुक थीं। उन्होंने बताया कि पेरिस ओलंपिक में वह सिर्फ एक किलो के अंतर से पदक से चूक गई थीं और उस अनुभव ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया था।

    मीराबाई ने बताया कि एक खिलाड़ी के सफर में केवल मैदान पर प्रदर्शन करना ही चुनौती नहीं होता, बल्कि इसके साथ कई व्यक्तिगत और शारीरिक संघर्ष भी जुड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि पिछले चार वर्षों के दौरान उन्हें लगातार चोटों का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही परिवार में भी कई तरह की परेशानियां चल रही थीं। इन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी और खुद को दोबारा मजबूत बनाकर कॉमनवेल्थ गेम्स में वापसी की।

    मीराबाई ने कहा कि जब वह पोडियम पर खड़ी थीं और भारत का राष्ट्रगान बजना शुरू हुआ, तो वह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख सकीं। ऊपर लहराता भारतीय तिरंगा देखकर उनके आंसू अपने आप निकल आए। उनके लिए वह पल केवल एक व्यक्तिगत जीत नहीं था, बल्कि वर्षों की मेहनत, संघर्ष, चोटों और निराशाओं के बाद देश के लिए सम्मान हासिल करने का क्षण था।

    कॉमनवेल्थ गेम्स में मीराबाई चानू का प्रदर्शन भारतीय खेल इतिहास के लिए बेहद खास रहा। उन्होंने लगातार तीसरे कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर ऐसी उपलब्धि हासिल की, जो इससे पहले किसी महिला वेटलिफ्टर के नाम नहीं थी। उन्होंने 48 किलोग्राम वर्ग में कुल 190 किलोग्राम भार उठाकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। उनकी इस जीत ने एक बार फिर साबित किया कि मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद निरंतर मेहनत और मजबूत इच्छाशक्ति से दुनिया के बड़े मंच पर सफलता हासिल की जा सकती है।

    मीराबाई की उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उनके सामने पिछले कुछ वर्षों में कई चुनौतियां आईं। चोटों के कारण उन्हें अपनी फिटनेस और तैयारी पर लगातार काम करना पड़ा। पेरिस ओलंपिक में पदक से मामूली अंतर से चूकने के बाद उनके लिए वापसी आसान नहीं थी। लेकिन उन्होंने निराशा को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया और कॉमनवेल्थ गेम्स में शानदार प्रदर्शन करते हुए फिर से स्वर्ण पदक हासिल किया।

    प्रधानमंत्री मोदी ने खिलाड़ियों से मुलाकात के दौरान भारतीय दल के प्रदर्शन की भी सराहना की। ग्लासगो में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने कुल 39 पदक जीते। इनमें 13 गोल्ड, 17 सिल्वर और 9 ब्रॉन्ज मेडल शामिल रहे। भारतीय खिलाड़ियों के इस प्रदर्शन ने देश को गौरवान्वित किया और मीराबाई चानू की ऐतिहासिक हैट्रिक ने इस सफलता को और खास बना दिया। उनके पोडियम पर छलके आंसू उस संघर्ष की कहानी बयां कर रहे थे, जिसने उन्हें लगातार तीसरी बार कॉमनवेल्थ चैंपियन बनाया।

  • Gold Silver Price: चांदी में ₹3,700 की जोरदार उछाल, सोना भी चढ़ा, जानें आज का ताजा भाव

    Gold Silver Price: चांदी में ₹3,700 की जोरदार उछाल, सोना भी चढ़ा, जानें आज का ताजा भाव

    नई दिल्ली । सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को कारोबारी सप्ताह की शुरुआत तेजी के साथ हुई। घरेलू वायदा बाजार में चांदी ने एक बार फिर निवेशकों का ध्यान खींचा और शुरुआती कारोबार में इसकी कीमत में 3,700 रुपये से अधिक की तेजी दर्ज की गई। वहीं सोने में शुरुआत में मुनाफावसूली के कारण दबाव देखने को मिला, लेकिन कुछ ही समय बाद इसमें तेज रिकवरी हुई और कीमत करीब 1,000 रुपये तक ऊपर चली गई। कीमती धातुओं में यह उतार-चढ़ाव ऐसे समय में देखने को मिल रहा है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों और ब्याज दरों को लेकर निवेशकों की उम्मीदें बदल रही हैं।

    घरेलू वायदा बाजार में सितंबर डिलीवरी वाली चांदी पिछले कारोबारी सत्र में 2,31,466 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई थी। सोमवार को यह 2,31,799 रुपये पर खुली और शुरुआती कारोबार में तेजी पकड़ते हुए 2,35,200 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर तक पहुंच गई। यानी पिछले बंद भाव की तुलना में इसमें 3,700 रुपये से ज्यादा की मजबूती देखने को मिली। चांदी में इस तरह की तेज चाल ने बाजार में निवेशकों की सक्रियता बढ़ा दी है।

    सोने की बात करें तो अक्टूबर डिलीवरी वाला सोना पिछले सत्र में 1,51,820 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था। सोमवार को यह 1,51,793 रुपये पर खुला और शुरुआती कारोबार में गिरकर 1,51,461 रुपये तक पहुंच गया। हालांकि इसके बाद खरीदारी लौटी और सोने ने तेजी से रिकवरी करते हुए 1,52,842 रुपये प्रति 10 ग्राम का स्तर छू लिया। इससे साफ है कि शुरुआती मुनाफावसूली के बाद बाजार में सोने के प्रति फिर से मजबूत खरीदारी देखने को मिली।

    सर्राफा बाजार में हालांकि तस्वीर कुछ अलग रही। खुदरा स्तर पर उपलब्ध दरों के अनुसार 24 कैरेट सोना करीब 380 रुपये की गिरावट के साथ 1,51,970 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया। 22 कैरेट सोने की कीमत लगभग 350 रुपये घटकर 1,39,300 रुपये और 18 कैरेट सोने की कीमत करीब 280 रुपये कम होकर 1,13,980 रुपये तक पहुंच गई। शहरों के अनुसार कीमतों में मामूली अंतर बना हुआ है।

    दिल्ली में 24 कैरेट सोने का भाव करीब 15,212 रुपये प्रति ग्राम, जबकि 22 कैरेट का भाव 13,945 रुपये प्रति ग्राम के आसपास रहा। मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और कई अन्य प्रमुख शहरों में 24 कैरेट सोने की कीमत करीब 15,197 रुपये प्रति ग्राम रही। चेन्नई और कुछ दक्षिण भारतीय शहरों में यह दर करीब 15,218 रुपये प्रति ग्राम रही। भोपाल और इंदौर में 24 कैरेट सोना लगभग 15,202 रुपये प्रति ग्राम के स्तर पर रहा।

    कीमती धातुओं की तेजी के पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार की गतिविधियां भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। अमेरिकी लेबर मार्केट से जुड़े आंकड़े उम्मीद से कमजोर रहने के बाद वहां ब्याज दरों को लेकर बाजार की धारणा में बदलाव आया है। कम ब्याज दरों की संभावना आम तौर पर सोने के लिए सकारात्मक मानी जाती है, क्योंकि ऐसे माहौल में बिना ब्याज देने वाली संपत्तियों की निवेश आकर्षण क्षमता बढ़ सकती है।

    हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोमवार को स्पॉट गोल्ड और स्पॉट सिल्वर में हल्की कमजोरी दिखाई दी। डॉलर में उतार-चढ़ाव, अमेरिकी आर्थिक आंकड़े, केंद्रीय बैंक की नीतियां और वैश्विक स्तर पर निवेशकों की जोखिम धारणा आने वाले दिनों में सोने और चांदी की कीमतों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है। घरेलू बाजार में भी त्योहारी मांग, निवेशकों की खरीदारी और अंतरराष्ट्रीय संकेतों के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है।

  • Gold Silver Price: चांदी में ₹3,700 की जोरदार उछाल, सोना भी चढ़ा, जानें आज का ताजा भाव

    Gold Silver Price: चांदी में ₹3,700 की जोरदार उछाल, सोना भी चढ़ा, जानें आज का ताजा भाव

    नई दिल्ली । सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को कारोबारी सप्ताह की शुरुआत तेजी के साथ हुई। घरेलू वायदा बाजार में चांदी ने एक बार फिर निवेशकों का ध्यान खींचा और शुरुआती कारोबार में इसकी कीमत में 3,700 रुपये से अधिक की तेजी दर्ज की गई। वहीं सोने में शुरुआत में मुनाफावसूली के कारण दबाव देखने को मिला, लेकिन कुछ ही समय बाद इसमें तेज रिकवरी हुई और कीमत करीब 1,000 रुपये तक ऊपर चली गई। कीमती धातुओं में यह उतार-चढ़ाव ऐसे समय में देखने को मिल रहा है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों और ब्याज दरों को लेकर निवेशकों की उम्मीदें बदल रही हैं।

    घरेलू वायदा बाजार में सितंबर डिलीवरी वाली चांदी पिछले कारोबारी सत्र में 2,31,466 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई थी। सोमवार को यह 2,31,799 रुपये पर खुली और शुरुआती कारोबार में तेजी पकड़ते हुए 2,35,200 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर तक पहुंच गई। यानी पिछले बंद भाव की तुलना में इसमें 3,700 रुपये से ज्यादा की मजबूती देखने को मिली। चांदी में इस तरह की तेज चाल ने बाजार में निवेशकों की सक्रियता बढ़ा दी है।

    सोने की बात करें तो अक्टूबर डिलीवरी वाला सोना पिछले सत्र में 1,51,820 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था। सोमवार को यह 1,51,793 रुपये पर खुला और शुरुआती कारोबार में गिरकर 1,51,461 रुपये तक पहुंच गया। हालांकि इसके बाद खरीदारी लौटी और सोने ने तेजी से रिकवरी करते हुए 1,52,842 रुपये प्रति 10 ग्राम का स्तर छू लिया। इससे साफ है कि शुरुआती मुनाफावसूली के बाद बाजार में सोने के प्रति फिर से मजबूत खरीदारी देखने को मिली।

    सर्राफा बाजार में हालांकि तस्वीर कुछ अलग रही। खुदरा स्तर पर उपलब्ध दरों के अनुसार 24 कैरेट सोना करीब 380 रुपये की गिरावट के साथ 1,51,970 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया। 22 कैरेट सोने की कीमत लगभग 350 रुपये घटकर 1,39,300 रुपये और 18 कैरेट सोने की कीमत करीब 280 रुपये कम होकर 1,13,980 रुपये तक पहुंच गई। शहरों के अनुसार कीमतों में मामूली अंतर बना हुआ है।

    दिल्ली में 24 कैरेट सोने का भाव करीब 15,212 रुपये प्रति ग्राम, जबकि 22 कैरेट का भाव 13,945 रुपये प्रति ग्राम के आसपास रहा। मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु और कई अन्य प्रमुख शहरों में 24 कैरेट सोने की कीमत करीब 15,197 रुपये प्रति ग्राम रही। चेन्नई और कुछ दक्षिण भारतीय शहरों में यह दर करीब 15,218 रुपये प्रति ग्राम रही। भोपाल और इंदौर में 24 कैरेट सोना लगभग 15,202 रुपये प्रति ग्राम के स्तर पर रहा।

    कीमती धातुओं की तेजी के पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार की गतिविधियां भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। अमेरिकी लेबर मार्केट से जुड़े आंकड़े उम्मीद से कमजोर रहने के बाद वहां ब्याज दरों को लेकर बाजार की धारणा में बदलाव आया है। कम ब्याज दरों की संभावना आम तौर पर सोने के लिए सकारात्मक मानी जाती है, क्योंकि ऐसे माहौल में बिना ब्याज देने वाली संपत्तियों की निवेश आकर्षण क्षमता बढ़ सकती है।

    हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोमवार को स्पॉट गोल्ड और स्पॉट सिल्वर में हल्की कमजोरी दिखाई दी। डॉलर में उतार-चढ़ाव, अमेरिकी आर्थिक आंकड़े, केंद्रीय बैंक की नीतियां और वैश्विक स्तर पर निवेशकों की जोखिम धारणा आने वाले दिनों में सोने और चांदी की कीमतों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है। घरेलू बाजार में भी त्योहारी मांग, निवेशकों की खरीदारी और अंतरराष्ट्रीय संकेतों के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है।

  • यूपी में ब्राह्मण वोट पर सियासी घमासान, अखिलेश-मायावती की नजर, क्या भाजपा का समीकरण बिगड़ेगा?

    यूपी में ब्राह्मण वोट पर सियासी घमासान, अखिलेश-मायावती की नजर, क्या भाजपा का समीकरण बिगड़ेगा?


    लखनऊ।
    उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच ब्राह्मण मतदाता एक बार फिर सियासी दलों के केंद्र में आते दिख रहे हैं। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के गठजोड़ यानी पीडीए की राजनीति करने वाले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अब ब्राह्मणों को साधने की कोशिश में जुटे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री और सपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में अखिलेश ने पीडीए के ‘पीडी’ का अर्थ ‘पंडित’ बताया।

    अखिलेश ने विकास दुबे एनकाउंटर और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के विजन व उनकी स्मृतियों की कथित उपेक्षा जैसे मुद्दों के जरिए भाजपा पर निशाना साधा। सियासी जानकारों की नजर में यह कोशिश इसलिए अहम है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी करीब 12 से 14 प्रतिशत मानी जाती है और करीब 115 से 120 विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव माना जाता है। पूर्वांचल के कुछ क्षेत्रों में यह हिस्सेदारी 20 प्रतिशत तक बताई जाती है।

    राम मंदिर आंदोलन के बाद बदला ब्राह्मणों का रुख
    90 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन को लेकर कांग्रेस की नीतियों से नाराज ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर चला गया। इसके पीछे सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दों के प्रति समुदाय का झुकाव भी एक प्रमुख कारण माना गया। इसी दौर में मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस से दूर हुए।

    1990 में अयोध्या जा रहे कारसेवकों की गिरफ्तारी और पुलिस कार्रवाई के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को मुस्लिम समुदाय का मजबूत समर्थन मिला। यादव और मुस्लिम मतों के समीकरण ने मुलायम की राजनीतिक जमीन को मजबूती दी। वहीं, ब्राह्मणों के भाजपा के साथ आने से 1991 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।

    1993 में सपा और बसपा के गठबंधन ने पिछड़ा, दलित और मुस्लिम समीकरण के सहारे सत्ता हासिल की। हालांकि यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला और बाद में भाजपा और सपा के बीच मुख्य राजनीतिक मुकाबला बन गया।

    मायावती ने भी आजमाया था ब्राह्मण कार्ड
    2003 में भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई। उन्होंने दलित और ब्राह्मणों के बीच राजनीतिक समीकरण बनाने के लिए अभियान चलाया। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 86 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें 41 चुनाव जीते। इसके बाद मायावती पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रहीं।

    इस दौरान बसपा के नारे भी बदले और पार्टी ने ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ की राजनीति को आगे बढ़ाया। सतीश मिश्र और रामवीर उपाध्याय जैसे ब्राह्मण नेताओं को पार्टी में प्रमुख भूमिका मिली। हालांकि सरकार बनने के कुछ समय बाद दलित और ब्राह्मण कैडर के बीच मतभेद की खबरें सामने आने लगीं।

    2012 में सपा ने भी साधे ब्राह्मण
    2012 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने भी ब्राह्मणों को साधने की कोशिश की। मुलायम सिंह यादव ने 45 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें 21 चुनाव जीतने में सफल रहे। इसके बाद अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।

    हालांकि सरकार के कार्यकाल के दौरान कानून-व्यवस्था, सांप्रदायिक घटनाओं और हिंदू धार्मिक आयोजनों को लेकर उठे सवालों ने ब्राह्मणों के एक वर्ग को सपा से दूर कर दिया। इसके बाद 2017 में भाजपा की प्रचंड जीत के साथ ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा फिर भाजपा के साथ दिखाई दिया।

    भाजपा के साथ क्यों जुड़ा ब्राह्मण वोट?
    2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 68 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें 46 जीतकर विधानसभा पहुंचे। 2022 के चुनाव में भी भाजपा के 46 ब्राह्मण विधायक निर्वाचित हुए।

    योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्ववादी राजनीति, कानून-व्यवस्था पर सख्त रुख और सनातन से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देने की नीति को भाजपा के साथ ब्राह्मणों के जुड़ाव की वजहों में गिना जाता है। हालांकि, पिछले कुछ समय से यूजीसी गाइडलाइन, ट्रांसफर-पोस्टिंग और संगठन में प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर ब्राह्मणों की कथित नाराजगी की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं।

    पिछले वर्ष दिसंबर में भाजपा विधायक पीएन पाठक के घर ब्राह्मण विधायकों की बैठक और इस पर पार्टी अध्यक्ष पंकज चौधरी की सार्वजनिक नाराजगी के बाद यह मुद्दा और चर्चा में आया।

    अखिलेश के सामने बड़ी चुनौती
    अखिलेश यादव अब इन्हीं संभावित असंतोष के बीच भाजपा के ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। जनेश्वर मिश्र की जयंती पर प्रबुद्ध सम्मेलन और अयोध्या से पूर्व मंत्री पवन पांडेय को पहला प्रत्याशी घोषित करना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

    हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अखिलेश के लिए यह राह आसान नहीं होगी। 2022 से पहले भी सपा ने परशुराम और विष्णु मंदिर बनाने तथा ब्राह्मणों को सम्मान देने जैसे वादों के जरिए इसी तरह की कोशिश की थी, लेकिन उसका चुनावी असर सीमित रहा।

    इसके अलावा सपा का पारंपरिक यादव वोट बैंक और ब्राह्मण मतदाताओं के बीच राजनीतिक तालमेल बनाना भी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। वहीं, अखिलेश के सामने मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने और ब्राह्मणों को आकर्षित करने के बीच संतुलन साधने की चुनौती भी होगी।

    मायावती भी पीछे नहीं
    ब्राह्मण वोटों को लेकर बसपा प्रमुख मायावती भी सक्रिय हैं। उन्होंने अपने घोषित उम्मीदवारों में ब्राह्मणों को अच्छी संख्या में जगह दी है। जालौन के माधौगढ़ से आशीष पांडेय को उम्मीदवार घोषित कर उन्होंने ब्राह्मण समुदाय को संदेश देने की कोशिश की है। मायावती पहले भी ब्राह्मण-दलित समीकरण के जरिए सत्ता हासिल कर चुकी हैं। 2007 में उनका प्रयोग सफल रहा था। इस बार भी वह दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के बीच सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रही हैं।

    किसके पाले में जाएगा ब्राह्मण वोट?
    2027 के चुनाव में सपा और बसपा दोनों ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भाजपा के सामने अपने पुराने सामाजिक समीकरण को मजबूत बनाए रखने की चुनौती है। अखिलेश के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह ब्राह्मणों को आकर्षित करते हुए अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार को किस तरह साथ रख पाएंगे। वहीं मायावती के सामने 2007 वाला सामाजिक समीकरण दोहराने की चुनौती है। ऐसे में यूपी की सियासत में ब्राह्मण वोट किस दल के पक्ष में कितना झुकता है, इसका असर 2027 के विधानसभा चुनाव के कई सीटों के समीकरण पर पड़ सकता है।

  • PoK में विरोध के बीच तीसरे चरण का मतदान टला, PML-N ने 24 सीटें जीतीं और सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची.

    PoK में विरोध के बीच तीसरे चरण का मतदान टला, PML-N ने 24 सीटें जीतीं और सरकार बनाने की स्थिति में पहुंची.

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी PoK में लगातार जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच 10 अगस्त को होने वाले विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण का मतदान अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया गया है। तीसरे चरण में 11 सीटों पर मतदान होना था। चुनाव टलने से पहले दो चरणों में पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज यानी PML-N ने कुल 24 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इन नतीजों के बाद पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई थी, लेकिन तीसरे चरण की प्रक्रिया रुकने से चुनावी घटनाक्रम फिलहाल प्रभावित हुआ है।

    PoK विधानसभा में कुल 45 सीटें हैं। पहले दो चरणों में PML-N के पक्ष में आए नतीजों ने पार्टी को मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया। हालांकि, तीसरे चरण के मतदान से पहले क्षेत्र में लगातार विरोध प्रदर्शन और तनाव की स्थिति बनी हुई थी। इसी कारण सोमवार को होने वाला मतदान टालने का फैसला लिया गया।

    चुनावी प्रक्रिया के दौरान हिंसा की घटनाएं भी सामने आई थीं। पहले चरण के चुनाव के दौरान अलग-अलग घटनाओं में कम से कम 19 लोगों की मौत होने की जानकारी सामने आई। कई स्थानों पर मतदान केंद्रों के आसपास झड़पों और विरोध प्रदर्शन की खबरें आईं। प्रदर्शनकारियों की ओर से चुनावी प्रक्रिया में धांधली के आरोप भी लगाए गए।

    जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी यानी JAAC इस आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। संगठन के समर्थकों ने सरकार की नीतियों और चुनावी व्यवस्था को लेकर विरोध दर्ज कराया है। संगठन की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि रावलकोट में प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की गोलीबारी में लोगों की मौत हुई। हालांकि, इन आरोपों को संबंधित घटनाक्रम के संदर्भ में जांच और स्वतंत्र पुष्टि की जरूरत है।

    JAAC की मांगें केवल महंगाई और स्थानीय सुविधाओं से जुड़े मुद्दों तक सीमित नहीं हैं। संगठन अब PoK को अधिक स्वायत्तता और राजनीतिक अधिकार देने की मांग भी उठा रहा है। उसकी प्रमुख मांग विधानसभा की 45 सीटों में से 12 आरक्षित सीटों को समाप्त करने की है।

    ये 12 सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहते हैं। JAAC का तर्क है कि PoK से बाहर रहने वाले लोगों को क्षेत्र की सरकार चुनने की प्रक्रिया में इस तरह की भूमिका नहीं मिलनी चाहिए। संगठन का मानना है कि आरक्षित सीटों के कारण स्थानीय मतदाताओं के राजनीतिक प्रभाव में कमी आती है।

    भारत ने PoK में चल रही चुनावी प्रक्रिया को मान्यता देने से इनकार किया है। भारत का आधिकारिक रुख है कि पाकिस्तान के पास उस क्षेत्र में राजनीतिक प्रक्रिया संचालित करने का अधिकार नहीं है, जिसे भारत अपना अभिन्न हिस्सा मानता है। भारत ने PoK में होने वाले चुनावों को पाकिस्तान के कब्जे को वैध दिखाने की कोशिश के तौर पर खारिज किया है।

    इस बीच पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और PML-N अध्यक्ष नवाज शरीफ का बयान भी चर्चा में रहा। उन्होंने कहा था कि यदि उनकी पार्टी PoK में जीत हासिल करती है तो वह शहबाज शरीफ से उन्हें PoK का प्रधानमंत्री बनाने के लिए कहेंगे। हालांकि, PoK के मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार प्रधानमंत्री का चुनाव विधानसभा के मुस्लिम सदस्यों में से होता है।

    PoK विधानसभा का सदस्य बनने के लिए संबंधित व्यक्ति का स्थायी निवासी होना और मतदाता सूची में नाम होना आवश्यक है। नवाज शरीफ इस चुनाव में किसी विधानसभा सीट से उम्मीदवार नहीं हैं। ऐसे में केवल PML-N अध्यक्ष होने या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सहमति से वह सीधे PoK के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते।

    फिलहाल तीसरे चरण के मतदान के स्थगित होने से चुनावी प्रक्रिया की अगली तारीख स्पष्ट नहीं है। विरोध प्रदर्शनों, सुरक्षा स्थिति और राजनीतिक मांगों के बीच चुनाव आयोग तथा संबंधित प्रशासन के सामने मतदान प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की चुनौती बनी हुई है। वहीं PML-N पहले दो चरणों के परिणामों के आधार पर मजबूत स्थिति में है, लेकिन अंतिम चुनावी तस्वीर तीसरे चरण की 11 सीटों पर मतदान के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट होगी।