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  • शिवपुरी में थार का हाईवोल्टेज ड्रामा, कार-बाइक को टक्कर मारकर भागे, गड्ढे में फंसने पर पकड़े गए

    शिवपुरी में थार का हाईवोल्टेज ड्रामा, कार-बाइक को टक्कर मारकर भागे, गड्ढे में फंसने पर पकड़े गए


    शिवपुरी । मध्य प्रदेश के शिवपुरी में गुरुवार शाम तेज रफ्तार थार सवारों ने शहर की सड़कों पर जमकर हंगामा मचाया। आरोप है कि नशे की हालत में वाहन चला रहे दो युवकों ने पहले एक कार को टक्कर मारी और विरोध होने पर मौके से फरार हो गए। पुलिस ने पीछा शुरू किया तो भागते समय उन्होंने एक बाइक को भी टक्कर मार दी, जिससे दो युवक घायल हो गए। करीब आधे घंटे तक चले पीछा के बाद फिजिकल थाना पुलिस ने थार को घेरकर दोनों आरोपियों को पकड़ लिया।

    घटना शाम करीब साढ़े सात बजे माधव चौक पर हुई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार लाल रंग की थार ने गौतम शर्मा की कार को टक्कर मार दी। जब उन्होंने इसका विरोध किया तो वाहन में सवार युवकों ने धमकाते हुए मौके से भागने की कोशिश की। इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई कि थार सवार तेज रफ्तार में शहर से निकल रहे हैं।

    सूचना मिलते ही पुलिस ने वायरलेस के जरिए अलर्ट जारी किया और शहर के विभिन्न स्थानों पर थार को रोकने का प्रयास किया। हालांकि चालक लगातार पुलिस को चकमा देता रहा। थार ग्वालियर नाका, सोनचिरैया होटल, भूत पुलिया, टूरिस्ट विलेज और करबला क्षेत्र से तेज रफ्तार में गुजरती रही। इस दौरान वाहन का एक टायर फटने के बावजूद चालक ने रफ्तार कम नहीं की।

    भागने के दौरान करबला क्षेत्र में थार ने सामने से आ रही एक बाइक को टक्कर मार दी। हादसे में बड़ी नोहरी निवासी वीरेंद्र शर्मा और नवाब साहब रोड निवासी गौरव शर्मा घायल हो गए। दोनों को उपचार के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। घायल वीरेंद्र शर्मा ने बताया कि वह परिवार के साथ बांकड़े मंदिर से दर्शन कर लौट रहे थे, तभी तेज रफ्तार थार ने उनकी बाइक को टक्कर मार दी।

    लगातार पीछा कर रही पुलिस ने आखिरकार थार को घेर लिया। भागने के दौरान वाहन अनियंत्रित होकर एक गड्ढे में फंस गया, जिसके बाद पुलिस ने मौके पर दोनों आरोपियों को हिरासत में ले लिया। पुलिस ने थार को भी जब्त कर लिया।

    पुलिस के मुताबिक थार चला रहे चालक की पहचान सिरसौद निवासी 30 वर्षीय बृजेश विश्वकर्मा के रूप में हुई है। वाहन मालिक चंद्रपाल चौहान भी कार में मौजूद था। दोनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 281 और 125(ए) के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस पूरे घटनाक्रम की जांच कर रही है और हादसे में हुए नुकसान सहित अन्य पहलुओं की भी पड़ताल की जा रही है।

  • शिवपुरी में लेब्राडोर की संदिग्ध मौत, शव लेकर थाने पहुंची महिला ने FIR की मांग की

    शिवपुरी में लेब्राडोर की संदिग्ध मौत, शव लेकर थाने पहुंची महिला ने FIR की मांग की


    शिवपुरी मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में एक पालतू लेब्राडोर कुत्ते की मौत को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। शांति नगर क्षेत्र की रहने वाली एक महिला ने अपने पड़ोसियों पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उसके आठ माह के पालतू लेब्राडोर को लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला। घटना के विरोध में महिला शुक्रवार को कुत्ते का शव लेकर फिजिकल थाना पहुंची और आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की मांग की। पुलिस ने शिकायत दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है।

    महिला प्रीति परिहार के मुताबिक गुरुवार शाम उनका पालतू लेब्राडोर खाना खाने के बाद घर से बाहर निकल गया था। कुछ देर बाद वह पास स्थित एक आरओ प्लांट संचालक के घर की ओर चला गया। देर रात तक कुत्ता वापस नहीं लौटा तो परिवार ने उसकी तलाश शुरू की। इस दौरान आसपास के लोगों से जानकारी मिली कि कुत्ते के साथ मारपीट की गई है।

    प्रीति परिहार का आरोप है कि आरओ प्लांट संचालक, उसके बेटे और ड्राइवर ने मिलकर लाठियों से उनके पालतू कुत्ते की बेरहमी से पिटाई की, जिससे उसकी मौत हो गई। उनका यह भी आरोप है कि घटना के बाद कुत्ते के शव को दूर फेंक दिया गया ताकि मामला सामने न आए।

    महिला का कहना है कि जब वह घटना की जानकारी लेने आरोपियों के घर पहुंचीं तो उनके साथ गाली-गलौज की गई। विरोध करने पर उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई और मारपीट करने की कोशिश भी की गई। शुक्रवार सुबह कुत्ते का शव मिलने के बाद वह उसे लेकर सीधे फिजिकल थाना पहुंचीं और पुलिस से तत्काल कार्रवाई की मांग की।

    अपनी शिकायत में महिला ने यह भी आरोप लगाया है कि संबंधित आरओ प्लांट में रात के समय संदिग्ध और अनैतिक गतिविधियां संचालित होती हैं। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

    फिजिकल थाना पुलिस का कहना है कि शिकायत प्राप्त हो गई है। मामले में लगाए गए सभी आरोपों की जांच की जा रही है। जांच के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर आगे की वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।

  • SCO शिखर सम्मेलन में PM मोदी के पाकिस्तान दौरे पर सस्पेंस, इस्लामाबाद ने सभी सदस्य देशों को आमंत्रित करने की तैयारी शुरू की

    SCO शिखर सम्मेलन में PM मोदी के पाकिस्तान दौरे पर सस्पेंस, इस्लामाबाद ने सभी सदस्य देशों को आमंत्रित करने की तैयारी शुरू की

    नई दिल्ली । शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के आगामी शिखर सम्मेलन को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक गतिविधियां चर्चा में हैं। साल 2027 में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आयोजित होने वाले SCO सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शामिल होने को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है, लेकिन पाकिस्तान की ओर से सभी सदस्य देशों को आमंत्रित करने की बात कही गई है।

    पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने संकेत दिए हैं कि SCO के नियमों और प्रोटोकॉल के तहत सम्मेलन में सभी सदस्य देशों को निमंत्रण भेजा जाएगा। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि संगठन के सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों को सम्मेलन में आमंत्रित करना मेजबान देश की जिम्मेदारी है।

    इस बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी SCO सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान जाएंगे। हालांकि, भारत की ओर से इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। प्रधानमंत्री की किसी भी विदेश यात्रा का फैसला समय, परिस्थितियों और कूटनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर लिया जाता है।

    SCO एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय संगठन है, जिसमें भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान सहित कई अन्य देश सदस्य हैं। इस संगठन का उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग, सुरक्षा, आर्थिक विकास और आपसी संबंधों को मजबूत करना है। हर साल सदस्य देशों के बीच अध्यक्षता बदलती रहती है और जिस देश के पास अध्यक्षता होती है, वही शिखर सम्मेलन की मेजबानी करता है।

    2027 में SCO की अध्यक्षता पाकिस्तान के पास रहने की संभावना है, जिसके तहत इस्लामाबाद में राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों की बैठक आयोजित की जाएगी। ऐसे सम्मेलनों में सदस्य देशों के शीर्ष नेता क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करते हैं।

    भारत और पाकिस्तान के रिश्ते लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रहे हैं। दोनों देशों के बीच कई मुद्दों को लेकर मतभेद हैं, जिनमें सीमा सुरक्षा और आतंकवाद जैसे विषय प्रमुख हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी के पाकिस्तान दौरे का फैसला केवल SCO की बैठक तक सीमित नहीं होगा, बल्कि व्यापक कूटनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।

    इस बीच पाकिस्तान ने भारत और अन्य सदस्य देशों के साथ SCO प्रक्रिया के तहत सामान्य राजनयिक प्रोटोकॉल का पालन करने की बात कही है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता से भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों के बीच संभावित बैठक को लेकर भी सवाल किया गया था, जिस पर उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसी किसी प्रस्तावित मुलाकात की जानकारी नहीं है।

    SCO की स्थापना वर्ष 2001 में हुई थी। संगठन का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाना और क्षेत्र में शांति, स्थिरता तथा आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। समय के साथ इसका दायरा बढ़ा है और यह एशिया के प्रमुख बहुपक्षीय मंचों में शामिल हो गया है।

    अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि भारत इस सम्मेलन को लेकर क्या रुख अपनाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संभावित भागीदारी को लेकर अंतिम फैसला आने वाले समय में भारत सरकार की कूटनीतिक रणनीति और क्षेत्रीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

  • चुनाव आयुक्त चयन पैनल विवाद में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, पारदर्शिता और न्याय के सिद्धांत पर जोर

    चुनाव आयुक्त चयन पैनल विवाद में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, पारदर्शिता और न्याय के सिद्धांत पर जोर

    नई दिल्ली । मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और अदालत के बीच महत्वपूर्ण बहस हुई। केंद्र सरकार ने चयन प्रक्रिया में प्रधानमंत्री की भूमिका का बचाव करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री और सरकार के प्रतिनिधियों पर विश्वास किया जाना चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला किसी व्यक्ति विशेष पर भरोसे या अविश्वास का नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रिया में न्याय, पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने का है।

    केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि चयन समिति में प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी को लेकर संदेह करना उचित नहीं है। सरकार ने कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि प्रधानमंत्री या उनके मंत्रिमंडल के सदस्य किसी गलत उद्देश्य से काम करेंगे। केंद्र का तर्क था कि चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाना संसद की समझ और उसके बनाए कानून पर भी सवाल खड़ा करता है।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत का उद्देश्य किसी व्यक्ति की नीयत पर सवाल उठाना नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिससे जनता के बीच निष्पक्षता और स्वतंत्रता का भरोसा कायम रहे। कोर्ट ने कहा कि चर्चा किसी व्यक्ति विशेष के विश्वास की नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्था में निष्पक्षता दिखाई देने की है।

    केंद्र सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाए गए चयन पैनल में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किए जाने के तर्क पर भी सवाल उठाया। सरकार ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री के निर्णय पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो फिर अन्य संवैधानिक नियुक्तियों में भी बाहरी व्यक्तियों या पूर्व न्यायाधीशों को शामिल करने की मांग उठ सकती है।

    वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2023 में बनाए गए कानून ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के पुराने फैसले के प्रभाव को बदल दिया है। संविधान पीठ ने अपने एक फैसले में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की व्यवस्था सुझाई थी।

    इसके बाद संसद ने नया कानून पारित किया, जिसमें चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल करने का प्रावधान किया गया। याचिकाओं में इसी बदलाव को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था की नियुक्ति प्रक्रिया में संतुलन और निष्पक्षता बनाए रखना जरूरी है।

    चुनाव आयोग देश में चुनावी प्रक्रिया की निगरानी करने वाली महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है। ऐसे में उसके प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर होने वाली बहस का संबंध केवल कानूनी प्रावधानों से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और जनता के विश्वास से भी जुड़ा है।

    सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे। अब आगे की सुनवाई में अदालत यह तय करेगी कि वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया संवैधानिक सिद्धांतों और निष्पक्ष व्यवस्था के अनुरूप है या नहीं। इस मामले के फैसले का असर भविष्य में चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों पर पड़ सकता है।

  • राम मंदिर चढ़ावा चोरी मुद्दे पर संसद परिसर में विपक्ष का अनोखा प्रदर्शन, साधु के वेश में दिखे पप्पू यादव और राहुल गांधी ने दिया चढ़ावा

    राम मंदिर चढ़ावा चोरी मुद्दे पर संसद परिसर में विपक्ष का अनोखा प्रदर्शन, साधु के वेश में दिखे पप्पू यादव और राहुल गांधी ने दिया चढ़ावा

    नई दिल्ली । अयोध्या राम मंदिर से जुड़े चढ़ावा चोरी के मुद्दे को लेकर संसद परिसर में विपक्षी दलों ने अनोखे अंदाज में विरोध प्रदर्शन किया। विपक्षी सांसदों ने नाटक के माध्यम से कथित चढ़ावा चोरी के मुद्दे को उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा। इस दौरान पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव साधु के वेश में दिखाई दिए, जबकि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी समेत कई विपक्षी सांसद प्रदर्शन में शामिल हुए।

    प्रदर्शन के दौरान संसद परिसर में एक प्रतीकात्मक दान पेटी रखी गई थी। विपक्षी नेताओं ने नाटक के जरिए अपनी बात रखने की कोशिश की। इस दौरान राहुल गांधी सहित अन्य सांसद दान पेटी में चढ़ावा डालते हुए नजर आए। वहीं, प्रदर्शन के एक हिस्से में पप्पू यादव साधु के रूप में दान पेटी लेकर जाते हुए दिखाई दिए, जिसके बाद अन्य सांसदों ने उन्हें रोकने और विरोध जताने का अभिनय किया।

    विपक्षी सांसदों ने इस प्रदर्शन के जरिए सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की। नेताओं का कहना था कि वे विभिन्न मुद्दों पर सरकार से जवाब मांग रहे हैं और संसद के भीतर तथा बाहर जनता से जुड़े मामलों को उठाते रहेंगे। प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों ने सरकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारेबाजी भी की।

    प्रदर्शन में राम मंदिर चढ़ावा विवाद के साथ-साथ अन्य मुद्दों को भी जोड़ा गया। विपक्षी सांसदों ने पेपर लीक जैसे मामलों का भी जिक्र करते हुए सरकार से जवाब मांगने की बात कही। प्रदर्शन के दौरान लगाए गए नारों में चढ़ावा चोरी और पेपर चोरी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।

    इस पूरे घटनाक्रम पर लोकसभा अध्यक्ष ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि संसद और उसके परिसर की गरिमा बनाए रखना सभी सांसदों की जिम्मेदारी है। उन्होंने सदस्यों को सलाह दी कि संसद परिसर में ऐसे तरीके अपनाने से बचना चाहिए, जिससे सदन की मर्यादा प्रभावित हो।

    लोकसभा अध्यक्ष ने सांसदों से संसदीय परंपराओं और नियमों का पालन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि संसद लोकतांत्रिक बहस और चर्चा का स्थान है, इसलिए विरोध दर्ज कराने के दौरान भी गरिमा और अनुशासन बनाए रखना जरूरी है।

    घटना के बाद संसद की कार्यवाही कुछ समय के लिए स्थगित भी हुई। हालांकि विपक्षी नेताओं ने अपने प्रदर्शन को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हुए कहा कि वह जनता से जुड़े मुद्दों को उठाते रहेंगे।

    राजनीतिक जानकारों के अनुसार, संसद सत्र के दौरान विपक्ष अक्सर अलग-अलग मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाता है। इस बार राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर किए गए प्रतीकात्मक प्रदर्शन ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है।

    वहीं, सत्ता पक्ष की ओर से संसदीय गरिमा और विरोध के तरीकों को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद की बहस और राजनीतिक बयानबाजी में चर्चा का विषय बना रह सकता है।

  • आय सीमा नहीं तय करती ITR की जरूरत, इन वित्तीय गतिविधियों में टैक्स रिटर्न भरना बन जाता है अनिवार्य

    आय सीमा नहीं तय करती ITR की जरूरत, इन वित्तीय गतिविधियों में टैक्स रिटर्न भरना बन जाता है अनिवार्य

    नई दिल्ली । इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) को लेकर अक्सर लोगों के मन में यह भ्रम रहता है कि अगर उनकी सालाना आय टैक्स छूट की सीमा से कम है तो उन्हें रिटर्न दाखिल करने की जरूरत नहीं होगी। हालांकि आयकर नियमों के अनुसार कुछ ऐसी परिस्थितियां भी हैं, जहां व्यक्ति की आय पर टैक्स देनदारी न होने के बावजूद ITR भरना कानूनी रूप से जरूरी हो जाता है।

    आयकर विभाग ने ऐसी कई स्थितियां तय की हैं, जिनमें केवल आय की सीमा ही नहीं बल्कि व्यक्ति के वित्तीय लेन-देन और आर्थिक गतिविधियों के आधार पर भी ITR दाखिल करने की बाध्यता बन सकती है। ऐसे में टैक्स फ्री इनकम वाले लोगों को भी अपने वित्तीय रिकॉर्ड और लेन-देन की स्थिति के आधार पर रिटर्न भरने की जरूरत पड़ सकती है।

    अगर किसी व्यक्ति ने एक वित्तीय वर्ष में बिजली बिल के रूप में 1 लाख रुपये या उससे अधिक का भुगतान किया है, तो उसके लिए ITR दाखिल करना जरूरी हो सकता है। यह नियम उन लोगों पर लागू होता है जिनके बड़े खर्च उनकी आर्थिक स्थिति को दर्शाते हैं।

    इसी तरह अगर किसी व्यक्ति ने खुद या अपने परिवार के किसी सदस्य के विदेश दौरे पर 2 लाख रुपये या उससे अधिक खर्च किए हैं, तो उसे भी आयकर रिटर्न दाखिल करना आवश्यक हो सकता है। विदेश यात्रा पर होने वाले बड़े खर्च को आयकर नियमों के तहत रिपोर्टिंग की श्रेणी में रखा गया है।

    यदि किसी व्यक्ति के एक या एक से अधिक सेविंग बैंक खातों में एक वित्तीय वर्ष के दौरान कुल जमा राशि 50 लाख रुपये या उससे अधिक पहुंच जाती है, तो भी ITR दाखिल करना अनिवार्य हो सकता है। इसी तरह करंट अकाउंट में 1 करोड़ रुपये या उससे अधिक जमा करने वाले व्यक्तियों को भी रिटर्न दाखिल करना पड़ता है।

    टैक्स कटौती से जुड़ा नियम भी महत्वपूर्ण है। अगर किसी व्यक्ति की आय से निर्धारित सीमा से अधिक TDS या TCS काटा गया है, तो उसे ITR दाखिल करना जरूरी हो सकता है। हालांकि वरिष्ठ नागरिकों के लिए यह सीमा अलग निर्धारित की गई है।

    इसके अलावा जिन लोगों की कुल आय लागू बेसिक छूट सीमा से अधिक है, उनके लिए भी ITR दाखिल करना अनिवार्य है। अलग-अलग टैक्स व्यवस्था के अनुसार छूट सीमा अलग हो सकती है, इसलिए करदाताओं को अपनी आय और लागू नियमों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।

    अगर किसी व्यक्ति को शेयर बाजार, क्रिप्टो निवेश या संपत्ति बिक्री से नुकसान हुआ है और वह उस नुकसान को भविष्य के वर्षों में होने वाले लाभ के साथ समायोजित करना चाहता है, तो उसे नुकसान को आगे ले जाने के लिए ITR दाखिल करना जरूरी होता है।

    विदेश में संपत्ति रखने वाले भारतीय निवासियों के लिए भी टैक्स रिटर्न दाखिल करना आवश्यक हो सकता है। अगर किसी व्यक्ति के नाम विदेश में बैंक खाता, शेयर या कोई संपत्ति है, तो उसे इसकी जानकारी आयकर रिटर्न में देनी होती है।

    फ्रीलांसर, डॉक्टर, वकील, आईटी प्रोफेशनल या अन्य सलाहकारों जैसे पेशेवरों के लिए भी कुछ परिस्थितियों में ITR जरूरी हो जाता है। अगर उनकी पेशेवर आय निर्धारित सीमा से अधिक है, तो उन्हें रिटर्न दाखिल करना पड़ता है।

    इसी तरह कारोबार करने वाले लोगों के लिए भी टर्नओवर के आधार पर ITR दाखिल करने की आवश्यकता हो सकती है। यदि किसी व्यवसाय का सालाना कारोबार तय सीमा से अधिक है, तो मुनाफा कम होने या न होने की स्थिति में भी रिटर्न दाखिल करना जरूरी हो सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि ITR केवल टैक्स भुगतान का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की वित्तीय पहचान और रिकॉर्ड का महत्वपूर्ण दस्तावेज भी होता है। लोन लेने, वीजा प्रक्रिया, निवेश और कई अन्य वित्तीय कार्यों में भी ITR की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए करदाताओं को केवल आय सीमा देखकर निर्णय लेने के बजाय अपनी पूरी वित्तीय स्थिति और नियमों को ध्यान में रखकर रिटर्न दाखिल करना चाहिए।

  • पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून की तैयारी, 10 साल जेल और 50 लाख जुर्माने के प्रावधान पर सियासत तेज

    पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून की तैयारी, 10 साल जेल और 50 लाख जुर्माने के प्रावधान पर सियासत तेज

    नई दिल्ली । देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। एंटी-पेपर लीक संशोधन विधेयक, 2026 को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिल गई है। राज्यसभा में लंबी चर्चा के बाद विधेयक पारित किया गया। अब इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा और स्वीकृति मिलने के बाद यह कानून के रूप में लागू हो जाएगा।

    नए कानून में परीक्षा से जुड़े पेपर लीक और अन्य गंभीर अनियमितताओं पर सख्ती बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। इसके तहत दोषी पाए जाने वाले लोगों को 10 साल तक की सजा और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करना और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना है।

    विधेयक पारित होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वीडियो संदेश जारी कर इसे परीक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने और परीक्षा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री ने पेपर लीक जैसी गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का संदेश दिया।

    हालांकि, प्रधानमंत्री के बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार और प्रधानमंत्री पर टिप्पणी करते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने परीक्षा व्यवस्था और कानून की प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठाए।

    राज्यसभा में इस विधेयक पर करीब सात घंटे तक चर्चा हुई। चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने परीक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल उठाए। कुछ दलों ने संशोधन प्रस्ताव भी पेश किए, जिन्हें सदन में मंजूरी नहीं मिली।

    केंद्रीय कार्मिक मामलों के मंत्री जितेंद्र सिंह ने चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि सरकार पेपर लीक जैसी घटनाओं को गंभीरता से ले रही है। उन्होंने कहा कि यह कानून परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।

    राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) को लेकर उठाए गए सवालों पर सरकार ने कहा कि देश में पेपर लीक के ज्यादातर मामले राज्य स्तरीय भर्ती और परीक्षा एजेंसियों से जुड़े रहे हैं। सरकार के अनुसार, परीक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए तकनीक के इस्तेमाल, सुरक्षा मानकों और निगरानी तंत्र को मजबूत किया जा रहा है।

    इस संशोधन विधेयक के जरिए वर्ष 2024 में बनाए गए कानून को और प्रभावी बनाने का प्रयास किया गया है। इसमें पेपर लीक, परीक्षा में धोखाधड़ी और संगठित तरीके से गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान शामिल है। साथ ही मामलों की तेजी से जांच और सुनवाई के लिए विशेष व्यवस्था बनाने पर भी जोर दिया गया है।

    पेपर लीक की घटनाएं लंबे समय से छात्रों और अभ्यर्थियों के बीच चिंता का कारण रही हैं। कई बार परीक्षाओं के रद्द होने और परिणामों में देरी से लाखों छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ा है। ऐसे में सरकार का दावा है कि नया कानून परीक्षा प्रणाली में भरोसा बढ़ाने और भविष्य में होने वाली गड़बड़ियों को रोकने में मदद करेगा।

    अब सभी की नजर राष्ट्रपति की मंजूरी पर है। इसके बाद यह कानून लागू होने के साथ ही परीक्षा संबंधी अपराधों पर कार्रवाई के लिए नया कानूनी ढांचा प्रभावी हो जाएगा।

  • 2 अगस्त की प्रोफेसर भर्ती परीक्षा से पहले MPPSC की तेज कार्रवाई, एक दिन में जारी की फाइनल चयन सूची

    2 अगस्त की प्रोफेसर भर्ती परीक्षा से पहले MPPSC की तेज कार्रवाई, एक दिन में जारी की फाइनल चयन सूची


    इंदौरमध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) ने भर्ती प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा-2024 के इकोनॉमिक्स विषय की अंतिम चयन सूची रिकॉर्ड समय में जारी कर दी। आयोग ने 112 पदों के लिए इंटरव्यू प्रक्रिया पूरी होने के महज 24 घंटे के भीतर चयनित उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी, जबकि सामान्य परिस्थितियों में अंतिम परिणाम घोषित होने में लगभग एक महीने का समय लग जाता है।

    आयोग के इस फैसले का सबसे बड़ा उद्देश्य 2 अगस्त को आयोजित होने वाली असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा-2025 को अधिक निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी बनाना है। चयन सूची समय रहते जारी होने से वर्ष 2024 की भर्ती में चयनित अधिकांश अभ्यर्थी नई भर्ती परीक्षा में शामिल नहीं होंगे। इससे उन उम्मीदवारों को अधिक अवसर मिलेगा, जो अभी तक किसी भी भर्ती में चयनित नहीं हो सके हैं।

    एमपीपीएससी के अनुसार इकोनॉमिक्स विषय के कुल 112 पदों पर अंतिम चयन किया गया है। इनमें चयनित 111 अभ्यर्थी अब 2 अगस्त को होने वाली असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा-2025 में शामिल नहीं होंगे। इससे परीक्षा में अनावश्यक प्रतिस्पर्धा कम होगी और रिक्त पदों पर नए उम्मीदवारों के चयन की संभावना बढ़ेगी।

    आयोग की यह पहल भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाने के साथ-साथ अभ्यर्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए उठाया गया कदम माना जा रहा है। इससे उन उम्मीदवारों को भी समय रहते अपनी स्थिति स्पष्ट हो गई है, जिनका चयन हो चुका है। उन्हें अब दोबारा परीक्षा देने की आवश्यकता नहीं होगी।

    एमपीपीएससी की यह कार्यशैली भर्ती प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। यदि भविष्य की भर्तियों में भी इसी तरह परिणाम शीघ्र जारी किए जाते हैं, तो न केवल आयोग की कार्यक्षमता बढ़ेगी बल्कि अभ्यर्थियों का समय और संसाधन भी बचेंगे।

    2 अगस्त को होने वाली असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा के लिए आयोग ने सभी तैयारियां पूरी कर ली हैं। चयन सूची पहले जारी होने से परीक्षा संचालन भी अधिक सुव्यवस्थित होने की उम्मीद है।

  • नागरिकता को लेकर बहस के बीच सरकार का बड़ा स्पष्टीकरण, भारतीय पासपोर्ट जारी करने के नियमों पर संसद में दी जानकारी

    नागरिकता को लेकर बहस के बीच सरकार का बड़ा स्पष्टीकरण, भारतीय पासपोर्ट जारी करने के नियमों पर संसद में दी जानकारी

    नई दिल्ली । भारतीय पासपोर्ट और नागरिकता को लेकर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने संसद में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि भारतीय पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है और इसके लिए निर्धारित नियमों के अनुसार पूरी सत्यापन प्रक्रिया अपनाई जाती है। हालांकि सरकार ने यह भी साफ किया कि पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना गया है, बल्कि यह मुख्य रूप से विदेश यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला आधिकारिक दस्तावेज है।

    राज्यसभा में भारतीय पासपोर्ट की स्थिति और नागरिकता से जुड़े सवाल उठाए गए थे। इस दौरान सरकार से पूछा गया था कि क्या भारतीय पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण माना जा सकता है और विदेश की नागरिकता लेने के बाद भारतीय नागरिकता की स्थिति क्या होती है। इसके अलावा नागरिकता कानून से जुड़े कई अन्य विषयों पर भी जानकारी मांगी गई थी।

    सरकार ने जवाब में बताया कि भारतीय पासपोर्ट पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत जारी किया जाता है। पासपोर्ट जारी करने से पहले आवेदक की पात्रता, दस्तावेजों और अन्य जरूरी जानकारियों का सत्यापन किया जाता है। सरकार के अनुसार, यह प्रक्रिया इसलिए अपनाई जाती है ताकि केवल योग्य भारतीय नागरिकों को ही पासपोर्ट जारी किया जा सके।

    केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि भारतीय पासपोर्ट भारत के नागरिकों को विदेश यात्रा की सुविधा देने वाला आधिकारिक दस्तावेज है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा को नियंत्रित और व्यवस्थित करना है। हालांकि पासपोर्ट नागरिकता से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज जरूर है, लेकिन इसे नागरिकता का एकमात्र और अंतिम प्रमाण नहीं बताया गया है।

    सरकार ने यह भी दोहराया कि भारत में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था नहीं है। यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी दूसरे देश की नागरिकता प्राप्त करता है, तो भारतीय कानूनों के अनुसार उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में उसका भारतीय पासपोर्ट भी वैध नहीं रहता और उसे संबंधित प्रक्रिया के तहत इसे वापस करना पड़ता है।

    नागरिकता कानून के प्रावधानों के अनुसार विदेशी नागरिकता लेने के बाद किसी व्यक्ति का भारतीय नागरिक दर्जा समाप्त हो सकता है। इसी वजह से पासपोर्ट जारी करने और उसकी वैधता बनाए रखने के लिए नागरिकता की स्थिति महत्वपूर्ण मानी जाती है। सरकार ने कहा कि पासपोर्ट जारी करने की पूरी प्रक्रिया कानून और निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित होती है।

    पासपोर्ट जारी करने से इनकार करने के मामलों का भी कानून में प्रावधान है। यदि जांच के दौरान यह पाया जाता है कि आवेदक भारतीय नागरिक नहीं है या वह निर्धारित शर्तों को पूरा नहीं करता, तो उसका आवेदन रोका जा सकता है। इसके अलावा सुरक्षा और कानूनी कारणों के आधार पर भी पासपोर्ट जारी करने से इनकार किया जा सकता है।

    सरकार का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में नागरिकता, पहचान और दस्तावेजों को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। केंद्र ने अपने जवाब के माध्यम से यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि भारतीय पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया नियमों और सत्यापन व्यवस्था के आधार पर होती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, पासपोर्ट किसी व्यक्ति की विदेश यात्रा के अधिकार से जुड़ा महत्वपूर्ण दस्तावेज है, लेकिन नागरिकता का निर्धारण अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत होता है। ऐसे में पासपोर्ट और नागरिकता को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। सरकार के इस स्पष्टीकरण के बाद नागरिकता और पासपोर्ट से जुड़े नियमों को लेकर स्थिति और स्पष्ट हुई है।

  • इंदौर के रोबोट चौराहे की बदलेगी तस्वीर, 800 पेड़ों का होगा ट्रांसप्लांट, ट्रैफिक जाम से मिलेगी राहत

    इंदौर के रोबोट चौराहे की बदलेगी तस्वीर, 800 पेड़ों का होगा ट्रांसप्लांट, ट्रैफिक जाम से मिलेगी राहत


    इंदौर इंदौर के सबसे व्यस्त ट्रैफिक जंक्शनों में शामिल रोबोट चौराहे की तस्वीर जल्द बदलने वाली है। लगातार बढ़ते ट्रैफिक दबाव और घंटों लगने वाले जाम से राहत दिलाने के लिए यहां दोनों ओर चार-चार लेन का आधुनिक फ्लायओवर बनाया जाएगा। इस परियोजना के लिए चौराहे के दोनों तरफ मौजूद लगभग 150-150 मीटर लंबे ग्रीन बेल्ट का उपयोग किया जाएगा। हालांकि इस फैसले से इलाके की घनी हरियाली प्रभावित होगी, लेकिन इंदौर विकास प्राधिकरण का कहना है कि एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा और 800 से अधिक पेड़ों को दूसरी जगह ट्रांसप्लांट किया जाएगा।

    रोबोट चौराहे का यह ग्रीन बेल्ट वर्षों की मेहनत से तैयार हुआ है। बारिश के मौसम में यह क्षेत्र मिनी फॉरेस्ट जैसा दिखाई देता है और गर्मियों में राहगीरों को छांव उपलब्ध कराता है। स्थानीय रहवासियों ने स्वयं पौधे लगाकर इस हरित क्षेत्र को विकसित किया था, जो अब बड़े और घने पेड़ों में बदल चुके हैं। फ्लायओवर निर्माण के कारण यह हरियाली अस्थायी रूप से समाप्त होती नजर आएगी, लेकिन अधिकारियों का दावा है कि पेड़ों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर संरक्षित किया जाएगा।

    दरअसल, खजराना चौराहे पर फ्लायओवर बनने के बाद वहां से गुजरने वाले वाहन बिना रुके सीधे रोबोट चौराहे तक पहुंच रहे हैं। इससे इस चौराहे पर ट्रैफिक का दबाव कई गुना बढ़ गया है। पीक आवर्स में लंबी कतारें लग जाती हैं और वाहन चालकों को दो से तीन बार सिग्नल बदलने का इंतजार करना पड़ता है। पहले खजराना चौराहे पर ट्रैफिक रुक जाने से दबाव बंट जाता था, लेकिन अब रोबोट चौराहा शहर का नया ट्रैफिक बॉटलनेक बन गया है।

    इंदौर विकास प्राधिकरण ने फ्लायओवर परियोजना का फिजिबिलिटी सर्वे पूरा कर लिया है और प्रारंभिक डिजाइन भी तैयार कर ली है। प्रस्ताव के अनुसार खजराना फ्लायओवर की तर्ज पर यहां भी दोनों दिशाओं में चार-चार लेन का अलग-अलग स्ट्रक्चर बनाया जाएगा। इसके लिए करीब 150 मीटर लंबी और 30 मीटर से अधिक चौड़ी ग्रीन बेल्ट की जमीन का उपयोग किया जाएगा।

    आईडीए के अधिकारियों का कहना है कि परियोजना शुरू होने से पहले सुपर कॉरिडोर स्थित प्राधिकरण की विभिन्न योजनाओं में पेड़ों के लिए स्थान और गड्ढे तैयार किए जाएंगे। इसके बाद वैज्ञानिक तरीके से सभी पेड़ों का ट्रांसप्लांटेशन किया जाएगा, ताकि पर्यावरणीय नुकसान को न्यूनतम रखा जा सके।

    हालांकि शहर में इससे पहले भी कई बड़े फ्लायओवर निर्माण के दौरान बड़ी संख्या में पेड़ प्रभावित हुए हैं। फूटी कोठी, आईटी पार्क, मूसाखेड़ी, पीपल्याहाना, बंगाली और खजराना फ्लायओवर परियोजनाओं के दौरान 10 हजार से अधिक पेड़ हटाए जा चुके हैं। जिन पेड़ों को दूसरी जगह लगाया गया था, उन्हें नए वातावरण में दोबारा विकसित होने में एक से दो वर्ष का समय लगा था।

    अब रोबोट चौराहे का यह फ्लायओवर शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को सुगम बनाने की दिशा में अहम परियोजना माना जा रहा है। प्रशासन का मानना है कि इसके पूरा होने के बाद रिंग रोड पर ट्रैफिक का दबाव कम होगा और रोजाना हजारों वाहन चालकों को जाम से राहत मिलेगी।