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  • ऋषि सुनक ने ब्रिटिश पहचान पर उठाए सवाल, बोले- त्वचा का रंग नहीं तय करता कौन कितना ब्रिटिश है

    ऋषि सुनक ने ब्रिटिश पहचान पर उठाए सवाल, बोले- त्वचा का रंग नहीं तय करता कौन कितना ब्रिटिश है


    नई दिल्ली । 
    ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने राष्ट्रीय पहचान और नस्ल से जुड़े मुद्दों पर अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता या ब्रिटिश पहचान को उसकी त्वचा के रंग से तय नहीं किया जाना चाहिए। सुनक ने अपनी पहचान का उल्लेख करते हुए कहा कि वह अंग्रेज और हिंदू दोनों हैं।

    सुनक ने ब्रिटिश समाज की पहचान और वहां रहने वाले अलग-अलग समुदायों के बीच संबंधों को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि त्वचा के रंग को ब्रिटिश या अंग्रेज होने की पहचान से जोड़ना उचित नहीं है। उनके अनुसार राष्ट्रीयता को केवल किसी व्यक्ति की बाहरी पहचान के आधार पर परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए।

    उन्होंने ब्रिटेन में राष्ट्रीय पहचान को लेकर पहले से चली आ रही बहस का भी उल्लेख किया। इस संदर्भ में उन्होंने ‘टेबिट टेस्ट’ का जिक्र किया, जिसे अप्रैल 1990 में तत्कालीन टोरी सांसद नॉर्मन टेबिट ने सामने रखा था।

    टेबिट टेस्ट के तहत यह सवाल उठाया गया था कि अगर ब्रिटेन में रहने वाले प्रवासी इंग्लैंड की क्रिकेट टीम के बजाय अपने मूल देश की टीम का समर्थन करते हैं, तो क्या इसे ब्रिटिश समाज में पूरी तरह घुलने-मिलने की कमी माना जाना चाहिए। सुनक ने इस पुराने विचार को मौजूदा राष्ट्रीय पहचान की बहस से जोड़कर अपनी चिंता सामने रखी।

    सुनक के मुताबिक ब्रिटेन ने समय के साथ एक बहु-धार्मिक और बहु-जातीय लोकतंत्र का निर्माण किया है। उनका कहना है कि यह उपलब्धि अब कई तरह के दबावों का सामना कर रही है। उन्होंने राष्ट्रीय पहचान को नस्ल और त्वचा के रंग से जोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति को भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया।

    उन्होंने आव्रजन और एकीकरण से जुड़ी चुनौतियों का भी उल्लेख किया। सुनक ने कहा कि ब्रिटेन को हाल के वर्षों में आव्रजन को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं कर पाने से पैदा हुई चुनौतियों का सामना करना होगा। उनके अनुसार आव्रजन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करते समय राष्ट्रीय पहचान और सामाजिक एकीकरण के सवाल भी सामने आते हैं।

    सुनक ने यह चिंता भी व्यक्त की कि हाल में ब्रिटेन आए लोगों को केवल इस आधार पर उन लोगों से कम ब्रिटिश नहीं माना जाना चाहिए, जिनके परिवार लंबे समय से देश में रह रहे हैं। उन्होंने ब्रिटिश पहचान की ऐसी परिभाषा पर सवाल उठाया, जिसमें किसी व्यक्ति के रंग, मूल या पारिवारिक इतिहास को उसकी राष्ट्रीयता से जोड़कर देखा जाए।

    पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी व्यक्तिगत पहचान का उदाहरण देते हुए कहा कि एक व्यक्ति एक साथ ब्रिटिश और हिंदू दोनों हो सकता है। उनके बयान का केंद्र यही था कि धार्मिक पहचान और राष्ट्रीय पहचान एक-दूसरे के विरोध में जरूरी नहीं हैं।

    ब्रिटेन में आव्रजन, एकीकरण और राष्ट्रीय पहचान को लेकर लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस होती रही है। सुनक की टिप्पणी इसी व्यापक चर्चा के बीच आई है, जिसमें यह सवाल उठता रहा है कि आधुनिक ब्रिटिश पहचान को किन आधारों पर समझा जाए।

    उनकी बातों में राष्ट्रीयता के लिए त्वचा के रंग को आधार बनाने के विचार पर स्पष्ट असहमति दिखाई दी। साथ ही उन्होंने ब्रिटेन की बहु-धार्मिक और बहु-जातीय संरचना को बनाए रखने तथा आव्रजन और एकीकरण से जुड़ी चुनौतियों पर गंभीर चर्चा की जरूरत बताई।

  • वंदे मातरम के छह अंतरे अनिवार्य करने के कानून को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

    वंदे मातरम के छह अंतरे अनिवार्य करने के कानून को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

    नई दिल्ली ।वंदे मातरम के छह अंतरे गाने को अनिवार्य करने वाले प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। मंगलवार को हुई सुनवाई में अदालत ने केंद्र से दो सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा। मामला कर्नाटक के संगीतकार टीएम कृष्णा की ओर से दायर रिट याचिका से जुड़ा है।

    याचिका में केंद्र सरकार के उस सर्कुलर को चुनौती दी गई है, जिसमें वंदे मातरम के छह पदों के गायन को अनिवार्य किए जाने का प्रावधान किया गया है। याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को लेकर संवैधानिक और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाए हैं।

    टीएम कृष्णा की ओर से अदालत में कहा गया कि वंदे मातरम के चार पदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है। याचिका में तर्क दिया गया है कि लोगों को इन पदों का गायन करने के लिए बाध्य करना धार्मिक और वैचारिक समर्थन के लिए मजबूर करने के समान हो सकता है।

    याचिका में वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने से जुड़े हालिया संशोधन को भी चुनौती दी गई है। इसमें यह सवाल उठाया गया है कि क्या इस तरह का प्रावधान कानून के स्तर पर लागू किया जा सकता है और इसके तहत किसी व्यक्ति पर गायन के लिए दबाव बनाया जा सकता है।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू की जांच करने पर सहमति जताई कि वंदे मातरम नहीं गाने को दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है या नहीं। अदालत ने हालांकि इस चरण पर यह तय करने से इनकार किया कि राष्ट्रगीत को केवल दो अंतरों तक सीमित रखा जाना चाहिए या छह अंतरों तक इसका गायन किया जाना चाहिए।

    मामले की सुनवाई के दौरान धार्मिक कारणों से वंदे मातरम नहीं गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई किए जाने का मुद्दा भी सामने आया। अदालत ने इस विषय को याचिका में उठाए गए संवैधानिक सवालों के संदर्भ में देखा।

    केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने सुनवाई के दौरान कानून बनाए जाने से जुड़े तर्क रखे। वहीं याचिका में उस संशोधन को भी चुनौती दी गई है, जिसके तहत वंदे मातरम को राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम से जुड़े कानून के दायरे में लाने की बात कही गई है।

    याचिकाकर्ता ने इस संशोधन को मनमाना बताते हुए अदालत से इसकी संवैधानिक वैधता की जांच करने की मांग की है। याचिका का मुख्य सवाल यह है कि राष्ट्रीय गीत के गायन को किस सीमा तक अनिवार्य किया जा सकता है और ऐसा नहीं करने पर किसी व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं।

    सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। अदालत ने केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने का समय दिया है, जिसके बाद मामले में आगे की सुनवाई होगी।

    मामले में धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गीत से जुड़े कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन का प्रश्न महत्वपूर्ण रहेगा। अदालत अब केंद्र के जवाब के बाद इन मुद्दों पर आगे विचार करेगी।

  • साहिल की मौत के बाद IIT बॉम्बे ने बदली हॉस्टल की व्यवस्था, सीलिंग फैन हटाकर वॉल फैन लगाने की तैयारी तेज

    साहिल की मौत के बाद IIT बॉम्बे ने बदली हॉस्टल की व्यवस्था, सीलिंग फैन हटाकर वॉल फैन लगाने की तैयारी तेज

     
    नई दिल्ली । IIT बॉम्बे में BTech छात्र साहिल रविंद्र वाकोडे की मौत के बाद हॉस्टल और कैंपस में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बड़ा बदलाव किया जा रहा है। संस्थान ने हॉस्टल में लगे सीलिंग फैन हटाकर उनकी जगह वॉल फैन लगाने का फैसला किया है। कैंपस में वॉल फैन पहुंचने की तस्वीरें भी सामने आई हैं।

    हॉस्टल में पंखों की व्यवस्था बदलने को लेकर चर्चा जुलाई में ही शुरू हो गई थी। एक छात्र की मौत के बाद सीलिंग फैन हटाने और वॉल फैन लगाने के विकल्प पर विचार किया गया था। हालांकि, 18 सितंबर को साहिल की मौत के बाद इस प्रक्रिया को तेज कर दिया गया।

    साहिल एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग में बीटेक के दूसरे वर्ष का छात्र था। वह महाराष्ट्र के यवतमाल जिले का रहने वाला था। 18 सितंबर को परीक्षा से जुड़े घटनाक्रम के बाद वह अपने हॉस्टल के कमरे में पहुंचा था। बाद में उसी दिन उसे कमरे में मृत पाया गया।

    जांच में सामने आए सीसीटीवी फुटेज के अनुसार, परीक्षा के दौरान साहिल दोपहर करीब 12:30 से 12:45 बजे के बीच अपनी जेब में रखी किसी वस्तु को देखने के लिए झुका था। इसके बाद एक प्रोफेसर ने उससे सवाल किया और उसे अलग ले जाया गया। करीब 1:25 बजे वह हॉस्टल के कमरे में पहुंचा और उसके बाद बाहर नहीं निकला।

    मामले की जांच में परीक्षा हॉल, कैंपस और हॉस्टल की सीसीटीवी फुटेज की पड़ताल की जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन फुटेज को सार्वजनिक नहीं किया गया है। जांच का उद्देश्य घटना से पहले के पूरे घटनाक्रम और उससे जुड़े तथ्यों को समझना है।

    साहिल के परिवार ने उसके साथ जाति आधारित भेदभाव और उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। परिवार ने मामले की जांच केंद्रीय जांच एजेंसी से कराने की मांग की है। माता-पिता की शिकायत के आधार पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है। प्राथमिकी में एक प्रोफेसर का नाम भी शामिल किया गया है।

    घटना के बाद संस्थान की ओर से साहिल की परीक्षा से जुड़ी स्थिति को लेकर एक बयान दिया गया था। इसमें दावा किया गया था कि उसने परीक्षा का प्रश्नपत्र ChatGPT पर अपलोड किया था और कथित तौर पर नकल करते पकड़े जाने के बाद उसकी मौत हुई। बाद में संस्थान ने इस बयान को वापस लेते हुए माफी मांगी और कहा कि पूरी जांच पूरी होने से पहले ऐसा निष्कर्ष देना उचित नहीं था।

    साहिल की मौत के बाद संस्थान में छात्रों का विरोध-प्रदर्शन भी जारी रहा। छात्र जवाबदेही, पारदर्शिता, छात्र कल्याण और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की मांग कर रहे हैं। हॉस्टल की सुरक्षा व्यवस्था और संस्थागत प्रक्रियाओं को लेकर भी छात्रों के बीच सवाल उठे हैं।

    उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस साल IIT बॉम्बे में यह तीसरी छात्र आत्महत्या बताई जा रही है। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं के बीच छात्र मानसिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही को लेकर चर्चा फिर तेज हुई है।

    सीलिंग फैन की जगह वॉल फैन लगाने का फैसला इसी व्यापक सुरक्षा व्यवस्था में किए जा रहे बदलावों का हिस्सा है। हालांकि, साहिल की मौत के कारणों और उससे जुड़े आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।

  • SC-ST एक्ट को चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, 2020 के फैसले की समीक्षा से किया इनकार

    SC-ST एक्ट को चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, 2020 के फैसले की समीक्षा से किया इनकार


    नई दिल्ली ।
    अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अत्याचार रोकने के लिए बनाए गए SC/ST अत्याचार निवारण कानून के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि कानून में आरोपी को उत्पीड़न से बचाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं और 2020 में दिए गए फैसले के कुछ ही वर्षों बाद उसकी दोबारा समीक्षा करने का फिलहाल कोई आधार नहीं दिखता।

    याचिका में SC/ST एक्ट के कई प्रावधानों को समानता के अधिकार के खिलाफ बताते हुए उनमें बदलाव की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता बृजभूषण सैनी की ओर से कानून के प्रावधानों पर सवाल उठाए गए और यह दलील दी गई कि एक वर्ग को सुरक्षा देने के उद्देश्य से बनाए गए कानून का इस्तेमाल दूसरे वर्ग के उत्पीड़न के लिए नहीं होना चाहिए।

    याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील विष्णु शंकर जैन ने अदालत के सामने कानून के कथित दुरुपयोग का मुद्दा उठाया। उनका तर्क था कि कई मामलों में कानून के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल होने की आशंका बनी रहती है। उन्होंने सजा की दर कम होने का भी उल्लेख किया और कहा कि गलत मामलों के कारण आरोपियों को गंभीर परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

    याचिका में FIR दर्ज करने और गिरफ्तारी से पहले शुरुआती जांच की व्यवस्था पर भी सवाल उठाया गया। दलील दी गई कि बिना प्रारंभिक जांच के FIR दर्ज करने और आरोपी की गिरफ्तारी की व्यवस्था से कानून के दुरुपयोग की संभावना बढ़ सकती है। इसके साथ ही SC/ST एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर लागू प्रतिबंध को भी चुनौती दी गई।

    याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि कानून के तहत गलत तरीके से दर्ज किए गए मामलों में आरोपियों को आर्थिक नुकसान और अन्य परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी आधार पर कानून के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता पर पुनर्विचार की मांग की गई थी।

    मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। पीठ में जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए 2020 के अपने फैसले का संदर्भ दिया।

    पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही SC/ST एक्ट से जुड़े प्रावधानों और उनमें किए गए बदलावों को लेकर अपना फैसला दे चुका है। उस निर्णय के बाद अभी केवल छह वर्ष का समय बीता है। ऐसे में इस अवधि के भीतर ही पुराने फैसले की दोबारा समीक्षा करने का कोई पर्याप्त आधार अदालत को नजर नहीं आता।

    अदालत की टिप्पणी के बाद SC/ST एक्ट के संबंधित प्रावधानों में तत्काल बदलाव की मांग वाली यह याचिका आगे नहीं बढ़ सकी। मामले में उठाए गए मुद्दों में FIR, गिरफ्तारी, अग्रिम जमानत और कानून के संभावित दुरुपयोग से जुड़े सवाल प्रमुख थे।

    SC/ST एक्ट का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकना और ऐसे मामलों में कानूनी संरक्षण उपलब्ध कराना है। मौजूदा सुनवाई में अदालत ने कानून के मूल उद्देश्य के साथ-साथ आरोपियों के लिए उपलब्ध कानूनी सुरक्षा उपायों को भी ध्यान में रखा और 2020 के फैसले को तत्काल दोबारा खोलने से इनकार किया।

  • जीएसटी 2.0 के बाद ऑटो रिटेल की रफ्तार चार गुना बढ़ी, सस्ती कीमतों से वाहन खरीदने वालों की संख्या बढ़ी

    जीएसटी 2.0 के बाद ऑटो रिटेल की रफ्तार चार गुना बढ़ी, सस्ती कीमतों से वाहन खरीदने वालों की संख्या बढ़ी

    नई दिल्ली ।जीएसटी 2.0 लागू होने के बाद भारतीय ऑटो रिटेल बाजार में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उद्योग के अनुसार, अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच 11 महीनों में देश में तीन करोड़ से अधिक वाहनों का पंजीकरण हुआ। इस अवधि में वाहनों की बिक्री और पंजीकरण की वृद्धि दर करीब 20 प्रतिशत रही, जबकि इससे एक साल पहले समान अवधि में यह पांच प्रतिशत से भी कम थी।

    ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष साई गिरिधर के अनुसार, जीएसटी 2.0 के बाद ऑटो रिटेल की वृद्धि दर करीब चार गुना तक बढ़ी है। उनके मुताबिक, वाहन खरीदने की क्षमता बढ़ना यानी अफोर्डेबिलिटी मौजूदा समय में मांग को आगे बढ़ाने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारण बनकर सामने आया है।

    उनका कहना है कि जीएसटी में बदलाव के बाद छोटे कारों, कम्यूटर दोपहिया वाहनों, ट्रैक्टरों और वाणिज्यिक वाहनों की ऑन-रोड लागत में स्थायी कमी आई। इन वाहन श्रेणियों पर बड़ी संख्या में उपभोक्ता निर्भर हैं। कीमतों में कमी का असर सिर्फ पहले से तय खरीद को आगे लाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे बाजार में नए ग्राहकों की भागीदारी भी बढ़ी।

    साई गिरिधर के मुताबिक, इस बदलाव के बाद पहली बार वाहन खरीदने की तैयारी कर रहे लोगों के साथ लंबे समय से खरीद टाल रहे ग्राहक भी दोबारा शोरूम पहुंचने लगे। इससे ऑटो बाजार में मांग का दायरा बढ़ा है और कई श्रेणियों में बिक्री के मजबूत आंकड़े सामने आए हैं।

    उन्होंने पिछले त्योहारी सीजन में दिखाई दी मजबूत मांग को भी इसी बदलाव से जोड़ते हुए कहा कि यह तेजी केवल मौसमी गतिविधि नहीं रही। उनके अनुसार, मांग में आया बदलाव अब उद्योग के लिए नई सामान्य स्थिति का रूप लेता दिखाई दे रहा है।

    ऑटो क्षेत्र में जीएसटी 2.0 के असर को उन्होंने मौसमी के बजाय संरचनात्मक बताया। इसी वजह से बीते एक साल में उद्योग की अलग-अलग वाहन श्रेणियों ने अपने मजबूत बिक्री महीनों का रिकॉर्ड दर्ज किया। इससे बाजार में उपभोक्ता मांग के विस्तार के संकेत मिले हैं।

    दोपहिया वाहनों को व्यापक जन-आधारित मांग का प्रमुख संकेतक माना जाता है। गिरिधर ने बताया कि इस श्रेणी ने 2018 के बाद का अपना सर्वोच्च स्तर फिर हासिल किया है। इससे बड़े उपभोक्ता वर्ग के बीच वाहन खरीदने की क्षमता और रुचि में सुधार का संकेत मिलता है।

    यात्री वाहन बाजार में भी बदलाव देखने को मिला है। उनके अनुसार, पहली बार वैकल्पिक ईंधन आधारित वाहनों ने पेट्रोल वाहनों को पीछे छोड़ दिया। इसके अलावा कई वाहन श्रेणियों में ग्रामीण बाजारों की वृद्धि शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक तेज रही।

    उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों को भी ऑटो क्षेत्र में बढ़ती खपत से जोड़ा और कहा कि किफायती वाहन उपलब्ध कराने पर जोर देने से मांग और विकास का नया चक्र शुरू हुआ है। हालांकि, उद्योग के सामने चुनौतियां अभी बनी हुई हैं।

    वाहन निर्माता कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, कमोडिटी लागत और मुद्रा विनिमय दरों से जुड़े दबाव का सामना कर रहे हैं। ऐसे में उद्योग के लिए बढ़ी हुई मांग को बनाए रखना कीमतों और लागत के संतुलन पर भी निर्भर करेगा।

    पिछले एक साल के अनुभव को लेकर उद्योग का कहना है कि वाहन बाजार में मांग बढ़ाने के लिए किफायती कीमत सबसे प्रभावी कारकों में से एक साबित हुई है। जीएसटी 2.0 के बाद बढ़ी खरीद क्षमता ने ऑटो रिटेल को नई गति दी है।

  • यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर को लेकर बड़ी सफाई, 96 प्रतिशत से ज्यादा ट्रांजैक्शन पर नहीं पड़ेगा शुल्क का असर

    यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर को लेकर बड़ी सफाई, 96 प्रतिशत से ज्यादा ट्रांजैक्शन पर नहीं पड़ेगा शुल्क का असर

    नई दिल्ली ।यू पीआई भुगतान को लेकर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर और उस पर लगने वाले जीएसटी को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच स्थिति स्पष्ट की गई है। नई व्यवस्था के तहत छोटे व्यापारियों और कम राशि वाले अधिकांश यूपीआई भुगतान पर एमडीआर का बोझ नहीं पड़ेगा।

    जानकारी के अनुसार, 2,000 रुपये तक के सभी व्यक्ति-से-व्यापारी यानी पी2एम यूपीआई ट्रांजैक्शन पर पहले की तरह शून्य एमडीआर लागू रहेगा। ऐसे भुगतान पर एमडीआर नहीं होने के कारण उससे संबंधित जीएसटी का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2,000 रुपये तक के भुगतान यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन वॉल्यूम का 96 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं। इसका मतलब है कि यूपीआई के माध्यम से होने वाले अधिकांश व्यापारी भुगतान एमडीआर और उससे जुड़े जीएसटी दायित्व से बाहर रहेंगे।

    छोटे व्यापारियों के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान भी रखा गया है। जिन व्यापारियों की मासिक यूपीआई प्राप्तियां एक लाख रुपये तक हैं, उन्हें एमडीआर का भुगतान नहीं करना होगा। इसलिए इस श्रेणी के व्यापारियों पर एमडीआर के संबंध में जीएसटी लगने का सवाल भी नहीं उठता।

    एमडीआर का उद्देश्य यूपीआई भुगतान व्यवस्था से जुड़े विभिन्न भागीदारों के बीच भुगतान प्रक्रिया की लागत को पूरा करना है। इसमें बैंक, भुगतान सेवा प्रदाता और यूपीआई एप प्रदाता जैसे भागीदार शामिल होते हैं। एमडीआर सरकार या यूपीआई व्यवस्था संचालित करने वाली संस्था द्वारा लगाया जाने वाला कोई कर नहीं है।

    नई व्यवस्था में 2,000 रुपये से अधिक के पी2एम यूपीआई ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होगा। हालांकि, 75,000 रुपये या उससे अधिक के ट्रांजैक्शन के लिए एमडीआर की अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति ट्रांजैक्शन निर्धारित की गई है।

    कुछ आवश्यक और कम मार्जिन वाले क्षेत्रों के लिए अलग व्यवस्था रखी गई है। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के ट्रांजैक्शन पर पांच रुपये प्रति ट्रांजैक्शन का फ्लैट एमडीआर लागू होगा। इसका उद्देश्य इन क्षेत्रों में भुगतान लागत को सीमित और पूर्वानुमेय रखना है।

    एमडीआर पर जीएसटी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है। यदि किसी व्यापारी को एमडीआर पर जीएसटी का भुगतान करना पड़ता है, तो वह अन्य इनपुट टैक्स की तरह इस राशि को अपनी जीएसटी देनदारी के विरुद्ध समायोजित कर सकता है। ऐसे में यह राशि सीधे तौर पर व्यापारी की अंतिम लागत नहीं बनती।

    दूसरी ओर, व्यक्ति-से-व्यक्ति यानी पी2पी यूपीआई भुगतान पहले की तरह पूरी तरह मुफ्त रहेंगे। इसमें भुगतान की राशि कितनी भी हो, पी2पी ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लागू नहीं होगा।

    इस व्यवस्था का असर मुख्य रूप से 2,000 रुपये से अधिक के कुछ पी2एम भुगतान पर पड़ेगा। वहीं कम राशि वाले भुगतान और एक लाख रुपये तक की मासिक यूपीआई प्राप्ति वाले छोटे व्यापारी इससे बाहर रहेंगे।

    कुल मिलाकर, यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन के बड़े हिस्से पर शून्य एमडीआर की व्यवस्था जारी रहेगी। 96 प्रतिशत से अधिक मर्चेंट ट्रांजैक्शन 2,000 रुपये तक के होने के कारण अधिकांश डिजिटल भुगतान इस शुल्क व्यवस्था के दायरे में नहीं आएंगे।

  • भारत की आर्थिक रफ्तार पर वैश्विक भरोसा बढ़ा, WEF ने 6.7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान जताकर दिया बड़ा संकेत

    भारत की आर्थिक रफ्तार पर वैश्विक भरोसा बढ़ा, WEF ने 6.7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान जताकर दिया बड़ा संकेत


    नई दिल्ली ।भारत वित्त वर्ष 2026-27 में 6.7 प्रतिशत की अनुमानित GDP वृद्धि के साथ दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे मजबूत विकास संभावनाओं वाले देशों में बना हुआ है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सितंबर 2026 की चीफ इकोनॉमिस्ट्स आउटलुक रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती के पीछे घरेलू मांग को प्रमुख आधार बताया गया है।

    रिपोर्ट में अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान, भारत समेत दुनिया के 10 प्रमुख क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति का आकलन किया गया है। इसके लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र से जुड़े 92 मुख्य अर्थशास्त्रियों की राय ली गई।

    भारत को लेकर विशेषज्ञों का भरोसा मई की तुलना में बढ़ा है। सितंबर की रिपोर्ट में 74 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्रियों ने भारत में मजबूत या बहुत मजबूत आर्थिक वृद्धि की उम्मीद जताई है। मई में यह आंकड़ा 52 प्रतिशत था। वहीं 98 प्रतिशत विशेषज्ञों का मानना है कि अगले 12 महीनों में भारत की आर्थिक वृद्धि कम से कम मध्यम स्तर या उससे बेहतर रह सकती है।

    रिपोर्ट में रोजगार की स्थिति को लेकर अपेक्षाकृत स्थिर तस्वीर सामने आई है। करीब 70 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों को अगले एक वर्ष में बेरोजगारी दर में कोई बड़ा बदलाव होने की उम्मीद नहीं है। हालांकि 17 प्रतिशत विशेषज्ञ बेरोजगारी बढ़ने और 13 प्रतिशत इसमें कमी आने का अनुमान लगा रहे हैं।

    आंकड़ों के मुताबिक, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग की बेरोजगारी दर जुलाई में 5.1 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 5 प्रतिशत रह गई। इसी दौरान श्रम बल भागीदारी दर 55.4 प्रतिशत से बढ़कर 55.6 प्रतिशत हो गई।

    रिपोर्ट के अनुसार, ये आंकड़े मजबूत आर्थिक गतिविधियों के बीच श्रम बाजार के अपेक्षाकृत स्थिर रहने का संकेत देते हैं। हालांकि रोजगार के नए अवसर पैदा करने की गति बनाए रखना अभी भी महत्वपूर्ण माना गया है।

    महंगाई के मोर्चे पर भी विशेषज्ञों की चिंता मई के मुकाबले कम हुई है। अगले 12 महीनों को लेकर 55 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने मध्यम महंगाई की संभावना जताई है, जबकि 45 प्रतिशत ने उच्च महंगाई की आशंका व्यक्त की है। मई में 61 प्रतिशत विशेषज्ञ उच्च या बहुत उच्च महंगाई को लेकर चिंतित थे।

    अगस्त में CPI आधारित खुदरा महंगाई 4.8 प्रतिशत रही। यह भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि लक्ष्य से ऊपर है, लेकिन 2 से 6 प्रतिशत के निर्धारित दायरे में बनी हुई है।

    मौद्रिक नीति को लेकर 67 प्रतिशत विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 12 महीनों में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। वहीं 24 प्रतिशत विशेषज्ञों ने नीति के और सख्त होने की संभावना जताई है। अगस्त में RBI ने नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखते हुए तटस्थ रुख कायम रखा था।

    राजकोषीय नीति को लेकर भी 72 प्रतिशत विशेषज्ञों ने बड़े बदलाव की संभावना नहीं जताई। करीब 22 प्रतिशत ने कुछ नरम रुख अपनाए जाने की संभावना व्यक्त की।

    रिपोर्ट का सर्वेक्षण 20 अगस्त को पूरा हुआ था। इसके बाद 31 अगस्त को जारी पहली तिमाही के GDP आंकड़ों में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई। इस प्रदर्शन के बाद कई वैश्विक संस्थानों ने भारत के विकास अनुमान में बदलाव किया है।

    मूडीज ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP वृद्धि का अनुमान 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। एजेंसी के मुताबिक, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष जैसी वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूती दिखाई है।

  • 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य कैसे होगा हासिल, पीयूष गोयल ने बताया आर्थिक विकास का पूरा रोडमैप

    2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य कैसे होगा हासिल, पीयूष गोयल ने बताया आर्थिक विकास का पूरा रोडमैप

    नई दिल्ली ।केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि व्यापक आर्थिक स्थिरता, इन्फ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और लक्षित समाज कल्याण योजनाओं के जरिए भारत 2047 तक विकसित देश बनने का लक्ष्य हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों को मजबूत आधार के रूप में विकसित करने पर सरकार का विशेष जोर है।

    गोयल ने एक आर्थिक सम्मेलन को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए संबोधित करते हुए कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में देश मजबूत आधार तैयार कर रहा है। उन्होंने इसके लिए आर्थिक स्थिरता, बुनियादी ढांचे के विस्तार और लक्षित समाज कल्याण योजनाओं को प्रमुख एजेंडा बताया।

    केंद्रीय मंत्री के अनुसार व्यापार, विनिर्माण और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के विस्तार से भारत वैश्विक आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि दुनिया की कुल आर्थिक वृद्धि में भारत की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है।

    गोयल ने वैश्विक स्तर पर साझेदारियों के महत्व का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भविष्य उन्हीं देशों और लोगों का है, जो साझेदारी बनाने की क्षमता रखते हैं। उनके मुताबिक भारत ने विभिन्न देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है और विकसित तथा विकासशील दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं के साथ सहयोग बढ़ाया है।

    इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में निवेश को लेकर गोयल ने कहा कि केंद्र सरकार निजी क्षेत्र के साथ मिलकर हर साल करीब 12 लाख करोड़ रुपये का निवेश कर रही है। इस निवेश में बंदरगाह, एक्सप्रेसवे, जलमार्ग और रेलवे जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं शामिल हैं।

    उन्होंने कहा कि मजबूत बुनियादी ढांचा देश की आर्थिक गतिविधियों को गति देने के साथ कारोबार और आपूर्ति व्यवस्था को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सरकार और निजी क्षेत्र की भागीदारी के जरिए इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है।

    व्यापार समझौतों का जिक्र करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत ने पिछले वर्षों में कई देशों के साथ द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौते किए हैं। इन समझौतों से भारतीय घरेलू उद्योग और कारोबारियों के लिए विभिन्न अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच के अवसर बढ़े हैं।

    गोयल के अनुसार 2014 से अब तक हुए व्यापार समझौतों के जरिए भारत को कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं तक पहुंच मिली है। उन्होंने बताया कि पिछले चार वर्षों में हुए नौ मुक्त व्यापार समझौतों के परिणामस्वरूप भारतीय कारोबारियों को 38 देशों के बाजारों में तरजीही पहुंच मिली है।

    इन देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था का आकार करीब 60 ट्रिलियन डॉलर बताया गया है। इससे भारतीय कंपनियों और कारोबारियों के लिए निर्यात तथा अंतरराष्ट्रीय कारोबार के नए अवसर उपलब्ध होने की बात कही गई है।

    गोयल ने बताया कि सरकार फिलहाल आठ और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर बातचीत कर रही है। इन समझौतों के पूरा होने पर भारतीय कारोबारियों को लगभग 15 ट्रिलियन डॉलर के अतिरिक्त बाजारों में तरजीही पहुंच मिलने की संभावना है।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आर्थिक स्थिरता, इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश, व्यापार विस्तार और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को साथ लेकर भारत 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

  • चार दिन की तेजी पर लगा ब्रेक, सेंसेक्स 330 अंक टूटा और निफ्टी गिरा, जानिए बाजार में दबाव की बड़ी वजहें

    चार दिन की तेजी पर लगा ब्रेक, सेंसेक्स 330 अंक टूटा और निफ्टी गिरा, जानिए बाजार में दबाव की बड़ी वजहें

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार में पिछले कारोबारी सत्र की तेजी के बाद मंगलवार को एक बार फिर गिरावट देखने को मिली। सप्ताह के दूसरे कारोबारी दिन सेंसेक्स और निफ्टी दोनों लाल निशान में बंद हुए। आईटी और वित्तीय शेयरों में दबाव के चलते बाजार की चार दिन से जारी तेजी का सिलसिला भी टूट गया।

    कारोबार समाप्त होने पर सेंसेक्स 329.91 अंक यानी 0.44 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,529.08 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी50 में 85.30 अंक यानी 0.36 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह 23,329.00 के स्तर पर पहुंच गया।

    व्यापक बाजार में भी दबाव देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.08 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 0.23 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुए। इससे बाजार के बड़े शेयरों के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी सीमित कमजोरी दर्ज हुई।

    सेक्टरवार कारोबार की बात करें तो निफ्टी आईटी, निफ्टी सीमेंट, निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, निफ्टी एफएमसीजी, निफ्टी पीएसयू बैंक, निफ्टी हेल्थकेयर और निफ्टी फार्मा में गिरावट रही। दूसरी ओर निफ्टी मीडिया, निफ्टी रियल्टी और निफ्टी मेटल में तेजी दर्ज की गई।

    निफ्टी50 के शेयरों में कोल इंडिया सबसे अधिक बढ़ने वाले शेयरों में रहा। कंपनी के शेयर में 3.2 प्रतिशत की तेजी दर्ज हुई। इसके अलावा इटरनल, इंडिगो, टाइटन और डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज भी बढ़त वाले प्रमुख शेयरों में शामिल रहे।

    दूसरी तरफ टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, नेस्ले इंडिया, बजाज फिनसर्व, बजाज फाइनेंस, सन फार्मा, ग्रासिम, ट्रेंट, आयशर मोटर्स और टीसीएस में दबाव रहा। इन शेयरों में गिरावट ने प्रमुख सूचकांकों पर भी असर डाला।

    बाजार के जानकारों के मुताबिक, लगातार चार कारोबारी सत्रों की गिरावट के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत दोबारा 99 से 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ विदेशी निवेश की निकासी और भू-राजनीतिक अनिश्चितता भी बाजार की धारणा को प्रभावित कर रही है।

    इन परिस्थितियों में महंगाई और आयात लागत को लेकर चिंता बनी हुई है। रुपये की स्थिति भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई है। मंगलवार को रुपया करीब 95.8 रुपये प्रति डॉलर के स्तर के आसपास रहा।

    वैश्विक ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदों के बीच सोने और चांदी की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव जारी रहा। इन अंतरराष्ट्रीय संकेतकों का असर घरेलू बाजार के निवेशकों की धारणा पर देखने को मिल रहा है।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार निफ्टी के 23,300 से 23,350 के दायरे में रहने के कारण निवेशकों को अल्पकालिक तेजी का पीछा करने के बजाय सावधानी बरतने की जरूरत है। निवेश को अलग-अलग हिस्सों में बांटने, मजबूत कंपनियों पर ध्यान देने और पोर्टफोलियो में विविधता बनाए रखने की सलाह दी गई है।

    इसके साथ ही बाजार में बड़ी गिरावट की स्थिति में अवसरों का इस्तेमाल करने के लिए पर्याप्त नकदी बनाए रखने पर भी जोर दिया गया है। मंगलवार की गिरावट के बाद अब निवेशकों की नजर आगामी कारोबारी सत्रों में वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेश के रुख पर रहेगी।

  • रानी मुखर्जी की मां कृष्णा मुखर्जी का 75 साल की उम्र में निधन, परिवार ने की निजता का सम्मान करने की अपील

    रानी मुखर्जी की मां कृष्णा मुखर्जी का 75 साल की उम्र में निधन, परिवार ने की निजता का सम्मान करने की अपील

    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेत्री रानी मुखर्जी की मां कृष्णा मुखर्जी का 75 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने मंगलवार दोपहर आखिरी सांस ली। उनके निधन की जानकारी परिवार की ओर से दी गई है। परिवार ने इस मुश्किल समय में लोगों से निजता का सम्मान करने की अपील की है।

    कृष्णा मुखर्जी के निधन की खबर सामने आने के बाद रानी मुखर्जी के प्रशंसकों और फिल्म जगत से जुड़े लोगों के बीच शोक की लहर है। रानी अपनी मां के बेहद करीब थीं और दोनों के बीच गहरा भावनात्मक रिश्ता था। कृष्णा अक्सर बेटी के साथ सार्वजनिक मौकों पर नजर आती थीं और उनके करियर में भी उनका लगातार साथ रहा।

    कृष्णा मुखर्जी के निधन की पुष्टि रानी मुखर्जी के पति आदित्य चोपड़ा की कंपनी की ओर से की गई। जानकारी के अनुसार, कृष्णा ने मंगलवार दोपहर दुनिया को अलविदा कहा। परिवार ने लोगों से अपील की है कि इस कठिन समय में उन्हें निजी समय दिया जाए। परिवार की ओर से मिले प्यार और प्रार्थनाओं के लिए भी आभार जताया गया है।

    हालांकि, कृष्णा मुखर्जी के निधन की वजह अभी सामने नहीं आई है। परिवार की ओर से भी उनकी मौत के कारण को लेकर कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसे में फिलहाल उनके निधन की परिस्थितियों के बारे में किसी तरह की पुष्टि नहीं हुई है।

    कृष्णा मुखर्जी का फिल्मों से पुराना जुड़ाव रहा था। उन्होंने फिल्म निर्माता राम मुखर्जी से शादी की थी। कृष्णा ने अभिनय के क्षेत्र में काम नहीं किया, लेकिन बंगाली सिनेमा से उनका नाता रहा। उन्होंने कई बंगाली फिल्मों के लिए प्लेबैक सिंगर के तौर पर अपनी आवाज दी थी।

    रानी मुखर्जी अपने माता-पिता दोनों से बेहद जुड़ी हुई थीं। उनके पिता राम मुखर्जी का निधन वर्ष 2017 में हुआ था। राम मुखर्जी फिल्म निर्माण से जुड़े हुए थे और बंगाली तथा हिंदी सिनेमा में उनका योगदान रहा। पिता के निधन के बाद कृष्णा मुखर्जी परिवार के लिए महत्वपूर्ण सहारा बनी रहीं।

    रानी मुखर्जी के फिल्मी सफर में भी उनकी मां का खास योगदान रहा। रानी ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत बंगाली सिनेमा से की थी। इसके बाद उन्होंने हिंदी फिल्मों में कदम रखा और धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बनाई।

    रानी मुखर्जी ने अपने लंबे करियर में कई चर्चित फिल्मों में काम किया है। इनमें कुछ कुछ होता है, गुलाम, साथिया, हम तुम, ब्लैक और मर्दानी जैसी फिल्में शामिल हैं। अलग-अलग तरह के किरदारों के जरिए उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपनी खास जगह बनाई।

    रानी मुखर्जी के निजी जीवन में उनकी मां कृष्णा मुखर्जी का हमेशा अहम स्थान रहा। मां-बेटी के इस रिश्ते की झलक कई सार्वजनिक मौकों पर भी देखने को मिलती रही है। कृष्णा अपनी बेटी के काम और उपलब्धियों को लेकर हमेशा साथ खड़ी नजर आती थीं।

    रानी मुखर्जी को आखिरी बार मर्दानी 3 में देखा गया था। अब मां कृष्णा मुखर्जी के निधन के बाद अभिनेत्री और उनका परिवार निजी तौर पर शोक के दौर से गुजर रहा है। परिवार की ओर से लोगों से इस कठिन समय में उनकी निजता का सम्मान करने की अपील की गई है।