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  • मोदी आज भी विरोधियों पर भारी, पर राज्यों में हाफ रहा डबल इंजन… BJP अपने ही गढ़ में हुई कमजोर

    मोदी आज भी विरोधियों पर भारी, पर राज्यों में हाफ रहा डबल इंजन… BJP अपने ही गढ़ में हुई कमजोर


    नई दिल्ली।
    ‘डबल इंजन (‘Double Engine’)’ के जिस नारे को बीजेपी (BJP) अपनी सबसे बड़ी ढाल और जीत का पक्का फॉर्मूला मानती रही है, उसकी परतें अब उधड़ने लगी हैं. केंद्र की सत्ता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) का चेहरा आज भी विरोधियों पर भारी पड़ता दिख रहा है, लेकिन राज्यों के धरातल पर पार्टी का दूसरा इंजन पूरी तरह हांफ रहा है. इंडिया टुडे और सी-वोटर का ताजा ‘मूड ऑफ द नेशन’ (MOTN) अगस्त 2026 सर्वे राजनीतिक विश्लेषकों की आंखें खोल देने वाले नतीजे लेकर आया है. आंकड़े चीख-चीखकर गवाही दे रहे हैं कि जिन राज्यों में 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का परचम फहराया था, वहां महज दो साल के भीतर पार्टी का जनाधार अप्रत्याशित रूप से खिसक चुका है।

    2024 के लोकसभा चुनाव में बहुमत से दूर रहने वाली भाजपा ने अपने आपको संभाला और फिर हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जबर्दस्त जीत हांसिल की. विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि का सहारा लेकर जिस ‘डबल इंजन’ को जनता ने समर्थन दिया, अब वही समर्थन कमजोर पड़ता दिख रहा है।

    आज देश में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो जाए, तो सर्वे के आंकड़े एनडीए को 326 सीटें और 45.1 प्रतिशत वोट शेयर देते हैं, जबकि विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन को 185 सीटें और 39.1 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है. केवल बीजेपी के आंकड़े देखें तो पार्टी 261 सीटों और 39.0 प्रतिशत वोट शेयर के साथ संसद की सबसे बड़ी ताकत बनी रहेगी और 2024 के 240 सीटों के मुकाबले 21 सीटें ज्यादा हासिल करेगी. लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद चौंकाने वाला और बीजेपी के सिपहसालारों की नींद उड़ाने वाला है. इसी साल जनवरी 2026 के सर्वे में बीजेपी अपने दम पर 287 सीटें जीतती दिख रही थी, जो अगस्त 2026 में घटकर 261 पर आ गई है. यानी बीते महज छह महीनों के भीतर बीजेपी की झोली से 26 सीटें खिसक चुकी हैं, जो यह साबित करता है कि राज्यों में जनता का मिजाज बहुत तेजी से बदल रहा है और डबल इंजन का पहिया थमने लगा है।
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    सबसे ज्यादा आंखें खोल देने वाले आंकड़े उन राज्यों से आए हैं जिन्हें बीजेपी का अभेद्य गढ़ और जीत की गारंटी माना जाता था. मध्यप्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने 29 की 29 सीटें जीतकर इतिहास रचा था और विपक्ष का पूरी तरह सफाया कर दिया था. मगर अगस्त 2026 का सर्वे बताता है कि मध्यप्रदेश में बीजेपी की झोली से सीधे 8 सीटें गायब हो चुकी हैं और पार्टी महज 21 सीटों पर सिमटती नजर आ रही है. जनवरी 2026 के सर्वे में भी जहां पार्टी 26 सीटों पर थी, वहां छह महीने में ही 5 सीटें और कम हो गईं. पार्टी का वोट शेयर 2024 के 59.27 प्रतिशत से सीधा गिरकर 51.3 प्रतिशत पर आ गया है, जबकि बीते चुनाव में शून्य पर लटकी कांग्रेस अब 8 सीटें झटकती दिख रही है और उसका वोट शेयर 32.44 प्रतिशत से उछलकर 43.3 प्रतिशत तक जा पहुंचा है.

    ओडिशा का सच तो और भी ज्यादा कड़वा है. जिस ओडिशा में 2024 के चुनाव में बीजेपी ने 21 में से 20 सीटें जीतकर नवीन पटनायक के दशकों पुराने साम्राज्य को ढहा दिया था, वहीं अब बीजेपी की साख दांव पर लगी है. सर्वे के अनुसार ओडिशा में बीजेपी की सीटें घटकर सिर्फ 12 रह सकती हैं, यानी पार्टी को 8 सीटों का सीधा नुकसान झेलना पड़ रहा है. जनवरी 2026 के 17 सीटों के अनुमान से तुलना करें तो भी छह महीने में पार्टी ने 5 सीटें गंवा दी हैं और उसका वोट शेयर 45.34 प्रतिशत से घटकर 43.0 प्रतिशत पर सिमट गया है.


    हिंदी पट्टी में सुलगता असंतोष और कमजोर पड़ते राज्य

    बीजेपी की राजनीति की रीढ़ मानी जाने वाली हिंदी पट्टी के अन्य राज्यों में भी हालात बेहद चिंताजनक हैं. उत्तर प्रदेश में 2024 के चुनाव में बीजेपी 33 सीटों पर अटक गई थी. अगस्त 2026 के सर्वे में पार्टी को 34 सीटें मिलती दिख रही हैं, जो भले ही 2024 से 1 सीट ज्यादा हो, लेकिन छह महीने पहले की तस्वीर से तुलना करने पर पैरों तले जमीन खिसक जाती है. जनवरी 2026 में उत्तर प्रदेश के भीतर बीजेपी 44 सीटें जीतती दिख रही थी, जो अगस्त आते-आते सीधे 10 सीटें घटकर 34 पर आ चुकी हैं और एनडीए का वोट शेयर 43.69 प्रतिशत से गिरकर 41.7 प्रतिशत हो गया है.

    छत्तीसगढ़ की बात करें तो 2024 में 11 में से 10 सीटें हासिल करने वाली बीजेपी अब सिर्फ 7 सीटों पर सिमटती दिख रही है, यानी 3 सीटों की सीधी चपत लग रही है, जबकि कांग्रेस 1 सीट से बढ़कर 4 सीटों पर कब्जा जमाती नजर आ रही है. उत्तराखंड में सभी 5 सीटों पर काबिज बीजेपी को 1 सीट का नुकसान होकर 4 सीटें मिलने का अनुमान है. वहीं राजस्थान में बीजेपी 16 सीटों पर दिखाई दे रही है, जो 2024 की 14 सीटों से 2 ज्यादा जरूर है, लेकिन जनवरी 2026 के 18 सीटों के आंकड़े से 2 सीटें कम हो चुकी है.


    पश्चिम बंगाल की लहर का छलावा

    देश भर में खिसकती जमीन के बीच पश्चिम बंगाल ही अकेला ऐसा राज्य बनकर उभरा है जहां बीजेपी के लिए चमत्कारिक आंकड़े सामने आए हैं. 2024 के चुनाव में जहां बीजेपी बंगाल की 42 सीटों में से सिर्फ 12 सीटें जीत पाई थी, वहीं अगस्त 2026 का सर्वे अनुमान लगा रहा है कि बीजेपी राज्य में 35 सीटें जीतकर तख्तापलट कर सकती है, यानी सीधे 23 सीटों का बंपर फायदा. बंगाल में बीजेपी का वोट शेयर 38.73 प्रतिशत से बढ़कर 46.2 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन का आंकड़ा 30 सीटों से गिरकर महज 7 सीटों पर सिमट रहा है.

    लेकिन क्या बंगाल का यह उछाल बीजेपी को राहत दे सकता है? आंखें खोल देने वाली सचाई यह है कि केवल एक राज्य के दम पर पूरे देश की राजनीतिक गिरावट की भरपाई नहीं की जा सकती. अगर बंगाल में बीजेपी को 23 सीटों की बढ़त मिल भी जाता है, तो मध्यप्रदेश में 8 सीटें, ओडिशा में 8 सीटें, छत्तीसगढ़ में 3 सीटें और उत्तर प्रदेश में जनवरी के मुकाबले गंवाई गई 10 सीटें मिलकर उस पूरी बढ़त को डकार जाती हैं. मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य पार्टी का वैचारिक और संगठनात्मक आधार हैं. बंगाल में स्थानीय विरोध या सत्ता-विरोधी लहर के कारण अस्थायी फायदा मिल सकता है, लेकिन हिंदी भाषी राज्यों में पार्टी के प्रति गहराता जनाक्रोश संगठन के बुनियादी ढांचे के लिए एक बड़ा खतरा है।

    ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे के ये आंकड़े साफ तौर पर संकेत दे रहे हैं कि देश का मतदाता अब आंख मूंदकर ‘डबल इंजन’ के झांसे में आने को तैयार नहीं है. केंद्र में नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत प्रभाव आज भी कायम है और लोग राष्ट्रीय मुद्दों पर उन पर भरोसा कर रहे हैं, लेकिन राज्यों की बीजेपी सरकारों की नाकामी, स्थानीय बेरोजगारी, महंगाई और प्रशासनिक सुस्ती ने जनता का मोहभंग कर दिया है. एक ताकतवर इंजन पूरी ट्रेन को खींचने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन अगर राज्यों का दूसरा इंजन पूरी तरह खराब हो जाए, तो गाड़ी को पटरी से उतरने में वक्त नहीं लगता।

  • साल 2026 का आखिरी चंद्र ग्रहण आज… जानिए किस राशि पर इसका क्या होगा प्रभाव?

    साल 2026 का आखिरी चंद्र ग्रहण आज… जानिए किस राशि पर इसका क्या होगा प्रभाव?


    नई दिल्ली।
    आज 28 अगस्त को साल का आखिरी व दूसरा चंद्र ग्रहण (Chandra Grahan 2026) लग चुका है. जिस चंद्र ग्रहण की हम बात कर रहे हैं, वह सामान्य या पूर्ण चंद्र ग्रहण नहीं है. यह उपच्छाया चंद्र ग्रहण (Penumbral Lunar Eclipse) है, जिसे मालिन्य चंद्र ग्रहण भी कहा जाता है. भारतीय समय के अनुसार, इसका समापन दोपहर 12 बजकर 31 मिनट पर होगा।

    ज्योतिषीय दृष्टि से यह उपछाया चंद्र ग्रहण कुंभ राशि और शतभिषा नक्षत्र में लगेगा. शतभिषा नक्षत्र के स्वामी राहु हैं, जबकि कुंभ राशि के स्वामी शनि हैं. ऐसे में ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस ग्रहण में शनि और राहु का प्रभाव भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


    मेष राशि

    मेष राशि वालों के लिए यह ग्रहण अनुकूल माना जा रहा है. करियर में बड़ा अवसर मिल सकता है और लंबे समय से सफलता के लिए प्रयास कर रहे लोगों को अच्छे परिणाम मिलने की संभावना है. स्थान परिवर्तन के योग भी बन सकते हैं और यह बदलाव आपके लिए लाभकारी साबित हो सकता है. हालांकि अगले 15 दिन से एक महीने के दौरान यात्राओं में सावधानी रखें. किसी भी यात्रा में लापरवाही न करें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद शिव मंदिर जाकर भगवान शिव को जल अर्पित करें. ऐसा करना आपके लिए शुभ माना जाता है.


    वृषभ राशि

    वृषभ राशि के लोगों के रुके हुए काम इस दौरान पूरे होने की संभावना है. लंबे समय से चली आ रही समस्याओं का समाधान मिल सकता है. अगर कोई विवाद, झगड़ा या कानूनी मामला चल रहा है तो उसमें भी राहत मिलने की संभावना है. करियर के मामले में स्थिति सामान्य से बेहतर रह सकती है, लेकिन कोई बड़ा जोखिम लेने से बचें. अपने महत्वपूर्ण कार्यों को समय पर पूरा करने का प्रयास करें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद भगवान शिव को एक लोटा जल अर्पित करें.

    मिथुन राशि
    मिथुन राशि के लोगों को अगले 15 दिन से एक महीने तक विशेष सावधानी बरतने की जरूरत हो सकती है. स्वास्थ्य का ध्यान रखें और बेवजह के विवाद या कानूनी मामलों से बचने का प्रयास करें. संतान को लेकर चिंता बढ़ सकती है. संतान के स्वास्थ्य या करियर को लेकर परेशानियां सामने आ सकती हैं. ऐसे में उनसे बातचीत करें और उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास करें. यात्राओं में विशेष सावधानी रखें. अगर बहुत जरूरी न हो तो लंबी यात्राओं से बचना बेहतर होगा.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दूध का दान करें.


    कर्क राशि

    कर्क राशि के लोगों के लिए यह समय थोड़ा चुनौतीपूर्ण रह सकता है. करियर में अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है. नौकरी और व्यापार को लेकर सतर्क रहें और किसी तरह की लापरवाही न करें. स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें. चोट, दुर्घटना या अचानक स्वास्थ्य संबंधी परेशानी से बचने के लिए सावधानी जरूरी है. परिवार की महिलाओं, विशेष रूप से माता, पत्नी, बेटी या बहन के स्वास्थ्य पर भी ध्यान दें. अगले एक महीने तक काम का उतना ही दबाव लें, जितना आप आसानी से संभाल सकें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को चीनी का दान करें.


    सिंह राशि

    सिंह राशि वालों को स्वास्थ्य को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है. पाचन और हड्डियों से संबंधित समस्याओं पर ध्यान दें. चोट या फ्रैक्चर जैसी स्थिति से बचने के लिए सावधानी रखें. करियर में किसी तरह का जोखिम न लें. नौकरीपेशा लोग विशेष रूप से अपने काम में लापरवाही से बचें. पारिवारिक और वैवाहिक जीवन में भी तनाव की स्थिति बन सकती है, इसलिए धैर्य से काम लें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को चावल का दान करें.


    कन्या राशि

    कन्या राशि वालों को स्वास्थ्य के मामले में सावधानी रखनी चाहिए. चोट या दुर्घटना से बचने के लिए सतर्क रहें. कान, नाक और गले से जुड़ी परेशानियों का ध्यान रखें. लिखापढ़ी, दस्तावेजों और पैसे के लेन-देन में विशेष सावधानी बरतें. किसी भी कागज पर बिना जांचे हस्ताक्षर न करें. पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में भी सोच-समझकर व्यवहार करें, क्योंकि छोटी गलतफहमी विवाद का कारण बन सकती है.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दूध का दान करें.


    तुला राशि

    तुला राशि वालों को धन के मामले में सावधान रहने की जरूरत है. अचानक खर्च या आर्थिक नुकसान की स्थिति बन सकती है. पैसों के लेन-देन में जल्दबाजी न करें. स्वास्थ्य के मामले में भी सावधान रहें. पाचन और पेट से जुड़ी समस्याएं परेशान कर सकती हैं. चोट या दुर्घटना से बचने के लिए सतर्कता जरूरी है. करियर में कोई लापरवाही न करें और नौकरीपेशा लोग अपने काम को गंभीरता से लें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को चीनी का दान करें.


    वृश्चिक राशि

    वृश्चिक राशि के लोगों के पारिवारिक जीवन में कुछ परेशानियां आ सकती हैं. माता-पिता, पति-पत्नी या अन्य करीबी लोगों के साथ मतभेद हो सकते हैं. बेवजह का तनाव और विवाद बढ़ने की संभावना है. धन और संपत्ति के मामले में अगले एक महीने तक सावधानी रखें. प्रॉपर्टी खरीदने, बेचने या बड़ा निवेश करने में जल्दबाजी न करें. रिश्तों और मित्रता में भी धैर्य से काम लें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दूध का दान करें.


    धनु राशि

    धनु राशि वालों के लिए यह ग्रहण अनुकूल परिणाम दे सकता है. करियर में लंबे समय से चली आ रही रुकावटें दूर हो सकती हैं. रुका हुआ काम पूरा होने और करियर में सफलता मिलने की संभावना है. आर्थिक मामलों में भी सुधार देखने को मिल सकता है. फंसा हुआ या लंबे समय से रुका पैसा मिलने की संभावना है. हालांकि भाई-बहन के साथ संबंधों का ध्यान रखें और उनके स्वास्थ्य को लेकर भी सजग रहें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद शिव मंदिर जाकर भगवान शिव को जल अर्पित करें.


    मकर राशि

    मकर राशि वालों को स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए. आंख, कान, नाक और गले से जुड़ी परेशानियों से सावधान रहें. नौकरी या व्यापार जैसा चल रहा है, उसे फिलहाल स्थिरता से चलने दें. करियर में कोई बड़ा जोखिम न लें. नई नौकरी, स्थान परिवर्तन, प्रॉपर्टी खरीदने या अन्य बड़े फैसलों में जल्दबाजी से बचें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को चावल का दान करें.

    कुंभ राशि

    यह ग्रहण कुंभ राशि में लग रहा है, इसलिए कुंभ राशि वालों को विशेष रूप से अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने की जरूरत बताई जा रही है. स्वास्थ्य के मामले में लापरवाही न करें. रिश्तों और संबंधों में भी सतर्क रहें. गुस्से या विवाद की वजह से कोई करीबी रिश्ता प्रभावित न हो, इसका ध्यान रखें. महत्वपूर्ण कामों को टालने से बचें, क्योंकि देरी आपके लिए परेशानी का कारण बन सकती है.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दूध का दान करें.


    मीन राशि

    मीन राशि वालों के मन पर इस ग्रहण का असर पड़ने की बात कही जा रही है. मानसिक तनाव, चिंता और बेचैनी बढ़ सकती है. बेवजह की बातों को लेकर ज्यादा सोचने से बचें. स्थान परिवर्तन के योग भी बन सकते हैं. ऐसे में जीवन या करियर से जुड़े बदलाव सामने आ सकते हैं. भावनात्मक रूप से खुद को मजबूत रखें और जल्दबाजी में कोई फैसला न लें. यात्रा और दुर्घटना के मामलों में भी सावधानी बरतें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को चीनी का दान करें.

  • देशभर में आज रक्षाबंधन की धूम…. जानें कब तक रहेगा राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

    देशभर में आज रक्षाबंधन की धूम…. जानें कब तक रहेगा राखी बांधने का शुभ मुहूर्त


    नई दिल्ली।
    आज देशभर में रक्षाबंधन (Raksha Bandhan 2026) का पावन पर्व मनाया जा रहा है और इसी के साथ आज साल का आखिरी चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) भी लग रहा है. राहत की बात तो यह है कि यह चंद्रग्रहण भारत में दृश्यमान नहीं होगा, इसी कारण भारत में आज रक्षाबंधन का पर्व पूरी धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है।

    रक्षाबंधन के इस खास दिन पर बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं. वहीं, भाई भी अपनी बहनों की जीवनभर रक्षा करने और हर सुख-दुख में उनका साथ देने का वचन देते हैं. इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं रहेगा, ऐसे में पूरे दिन राखी बांधना शुभ माना जा रहा है. बहनें सुबह से ही अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकेंगी. आइए जानते हैं कि आज राखी बांधने का शुभ मुहूर्त (Shubh Muhurat) कब से कब तक है और इस दिन कौन-कौन से शुभ संयोग बन रहे हैं।


    रक्षाबंधन 2026 की तिथि (Raksha Bandhan 2026 Date)

    पंचांग के मुताबिक, हर साल रक्षाबंधन का पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार सावन पूर्णिमा की तिथि 27 अगस्त यानी कल सुबह 9 बजकर 8 मिनट पर शुरू हो चुकी है और तिथि का समापन 28 अगस्त यानी आज सुबह 9 बजकर 48 मिनट पर होगा।


    रक्षाबंधन 2026 भद्रा काल का समय (Raksha Bandhan 2026 Bhadra kaal Timing)

    शास्त्रों के मुताबिक, भद्रा के दौरान राखी बांधना बहुत ही अशुभ होता है. हालांकि, इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा का साया नहीं रहेगा. सावन पूर्णिमा पर भद्रा 27 अगस्त यानी कल सुबह 9 बजकर 8 मिनट से शुरू होकर कल रात 9 बजकर 32 मिनट पर समाप्त हो चुकी है. यानी रक्षाबंधन का मुहूर्त शुरू होने से पहले ही भद्रा काल समाप्त हो चुका है.


    रक्षाबंधन पर राखी बांधने का शुभ मुहूर्त (Raksha Bandhan 2026 Shubh muhurat)

    रक्षाबंधन पर भाई को राखी बांधने का सबसे पहला शुभ मुहूर्त आज सुबह 05 बजकर 57 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगा. यानी भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने के लिए बहनों को करीब 3 घंटे 51 मिनट का समय मिलने वाला है.

    इसके अलावा, अगर आप किसी कारणवश इस मुहूर्त में राखी बांध पाएं तो अभिजीत मुहूर्त भी रहेगा. जिसका समय आज सुबह 11 बजकर 56 मिनट से लेकर 12 बजकर 48 मिनट तक रहेगा।

    राखी बांधने के कुछ अन्य मुहूर्त भी हैं जैसे-
    शुभ चौघड़िया: दोपहर 12:28 बजे से 2:03 बजे तक
    अपराह्न काल: दोपहर 1:44 बजे से शाम 4:16 बजे तक
    चर चौघड़िया: शाम 5:13 बजे से 6:48 बजे तक

    रक्षाबंधन पर बन रहे कई शुभ योग (Raksha Bandhan 2026 Shubh Yog)
    रक्षाबंधन पर आज करीब 11 शुभ योगों का संयोग बन रहा है. शतभिषा नक्षत्र के साथ अतिगंड, शोभन, शिव और विजय जैसे योग बनने की बात कही जा रही है. इसके अलावा चंद्रादि, बुधादित्य, विमल, विपरीत राजयोग, धन, उभयचरी, शकट और सुनफा योग का भी संयोग बताया जा रहा है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार ऐसे शुभ योगों में पूजा-पाठ, दान और भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने जैसे धार्मिक कार्यों को विशेष फलदायी माना जाता है. रक्षाबंधन के दिन ग्रहों की स्थिति भी महत्वपूर्ण बताई जा रही है. सूर्य सिंह राशि में रहेंगे, जबकि गुरु कर्क राशि में स्थित होंगे. ज्योतिष में सूर्य को आत्मबल, प्रतिष्ठा और ऊर्जा का कारक माना जाता है, वहीं गुरु को ज्ञान, शिक्षा, बुद्धि और समृद्धि से जोड़ा जाता है. चंद्रमा कुंभ राशि में रहेंगे. ऐसे में ग्रहों और नक्षत्रों का यह संयोग रक्षाबंधन को धार्मिक और ज्योतिषीय दोनों दृष्टि से खास बना रहा है।


    इस अशुभ मुहूर्त में ना बांधें राखी? (Raksha Bandhan 2026 Rahu kaal Timing)

    हिंदू पंचांग के अनुसार, रक्षाबंधन पर जिस तरह भद्रा काल का ध्यान रखा जाता है उसी तरह राहु काल का ध्यान रखना चाहिए. राहु काल कल सुबह 10 बजकर 46 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 22 मिनट तक रहेगा. वहीं, यमगंड दोपहर 3 बजकर 35 मिनट से लेकर शाम 5 बजकर 11 मिनट तक रहेगा. ऐसे में, ज्योतिषविदों की सलाह है कि रक्षाबंधन पर राहु काल लगने से पहले या बाद में भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधें।


    कैसे मनाएं रक्षाबंधन? (Raksha Bandhan 2026 Rituals)

    रक्षाबंधन के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और अपने इष्टदेव का स्मरण करें. इसके बाद पूजा की थाली सजाएं, जिसमें रोली, चंदन, अक्षत, दही, राखी, मिठाई और घी का दीपक रखें. सबसे पहले भगवान की विधिवत पूजा करें. इसके बाद भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठाएं. राखी बांधते समय इस बात का ध्यान रखें कि भाई और बहन दोनों का सिर ढका होना चाहिए. बहन सिर पर चुनरी रखें और भाई साफ रुमाल या किसी स्वच्छ वस्त्र से अपना सिर ढकें।

    अब भाई के माथे पर रोली या चंदन का तिलक लगाएं और उस पर अक्षत रखें. भाई की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें. इसके बाद भाई की कलाई पर राखी बांधें, आरती उतारें और मिठाई खिलाकर उसके मंगलमय जीवन की प्रार्थना करें. राखी बांधने के बाद माता-पिता और घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद जरूर लें. वहीं, भाई अपनी सामर्थ्य के अनुसार बहन को उपहार या आशीर्वाद दें और जीवनभर उसकी रक्षा व सहयोग का संकल्प लें।


    आखिर कहां से शुरू हुई राखी की परंपरा

    एक समय की बात है कि राजपूत मुस्लिमों के खिलाफ लड़ रहे थे. अपने पति राणा सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ की कमान रानी कर्णावती के हाथों में थी. उस समय गुजरात के बहादुर शाह ने मेवाड़ पर दूसरी बार आक्रमण किया था. कर्णावती ने तब हुमायूं से मदद मांगने के लिए उसे राखी भेजी. हुमायूं उस समय एक युद्ध के बीच में था, मगर रानी के इस कदम ने उसे भीतर से छू लिया. हुमायूं ने अपनी फौज फौरन मेवाड़ के लिए भेज दी. दुर्भाग्‍यवश, उसके सैनिक समय पर नहीं पहुंच पाए और चित्‍तौड़ में राजपूत सेना की हार हुई. रानी ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए जौहर (खुद को आग लगा ली) कर लिया. लेकिन हुमायूं की सेना ने चित्‍तौड़ से शाह को खदेड़ कर रानी के पुत्र विक्रमजीत को गद्दी सौंप दी और अपनी राखी का मान रखा।


    देवराज इंद्र और इंद्राणी की राखी

    माना जाता है कि एक बार दैत्‍य वृत्रासुर ने इंद्र का सिंहासन हासिल करने के लिए स्‍वर्ग पर चढ़ाई कर दी. वृत्रासुर बहुत ताकतवर था और उसे हराना आसान नहीं था. युद्ध में देवराज इंद्र की रक्षा के लिए उनकी बहन इंद्राणी ने अपने तपोबल से एक रक्षासूत्र तैयार किया और इंद्र की कलाई पर बांध दिया. इस रक्षासूत्र ने इंद्र की रक्षा की और वह युद्ध में विजयी हुए. तभी से बहनें अपने भाइयों की रक्षा के लिए उनकी कलाई पर राखी बांधने लगीं।

  • नेपाल में आई तबाही के बाद भोपाल के 29 लोग लापता…. गोसाईकुंडा तीर्थ गए थे घूमने

    नेपाल में आई तबाही के बाद भोपाल के 29 लोग लापता…. गोसाईकुंडा तीर्थ गए थे घूमने


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) की राजधानी भोपाल (Bhopal) का एक परिवार और उनसे जुड़े कुल 29 लोग नेपाल (Nepal) में अचानक आई भीषण बाढ़ (Devastating floods) के बाद से लापता हैं। परिवार की एक महिला ने उनके बारे में जानकारी देते हुए बताया कि ये सभी लोग जोड़े से नेपाल के रसुवा जिले में स्थित गोसाईकुंडा तीर्थ (Gosaikunda Pilgrimage) में घूमने गए थे। इसी दौरान वहां आई इस बाढ़ में फंस गए।

    महिला ने बताया कि परिवार के एक सदस्य से जो आखिरी बार बात हुई थी, उसमें उन्होंने कहा था कि हम लोग एक मकान की छत पर खड़े हुए हैं, लेकिन हमारा बचना मुश्किल है, आप लोग हमारे बच्चों को देख लेना, आप उनकी देखभाल करना।

    नेपाल में लापता हुए 29 सदस्यों की जानकारी देते हुए परिवार की महिला देवकी अधिकारी ने बताया, ‘मेरे जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी, दीदी-जीजाजी को मिलाकर कुल 29 लोग वहां गए हैं। ये सभी लोग जोड़े से वहां एक तीर्थ की यात्रा करने गए हैं, जहां पर पूर्णिमा पर दर्शन करने जाते हैं।’


    खाना अधूरा छोड़कर भागे, सामान भी नहीं उठाया

    महिला ने बताया कि ये लोग बुधवार को जब निकले थे, तो वहां ऐसी कोई आशंका नहीं थी, कि आगे जाकर कोई खतरा हो सकता है। लेकिन आगे जाकर जब वे खाना खाने के लिए रुके थे, वहां उन्हें पता चला कि पीछे से कोई बाढ़ आ रही है, जिसमें जान का खतरा है। जिसके बाद वे जल्दबाजी में अधूरा खाना छोड़कर उठे और अपनी बस व सामान को छोड़कर वहां से भागे, और जैसे-तैसे पास में स्थिति पहाड़ पर चढ़कर वहां बने एक मकान की छत पर जाकर रूके।’


    ‘आधा घर डूब चुका है, अब हम लोग नहीं बचेंगे’

    महिला ने आगे कहा कि ‘वहां पहुंचकर उन्हें लगा था कि शायद वो बच जाएंगे। लेकिन जब ऐसा होना मुश्किल लगा तो उनमें से एक रिश्तेदार में घर पर फोन लगाकर पूरा घटनाक्रम बताया और कहा कि हमारी बस तो चली गई है और हम फिलहाल छत पर आकर रूके हैं, लेकिन अब हमारी जान को भी खतरा है। उन्होंने बताया कि ‘आधा घर डूब चुका है, और अब हम लोग नहीं बच पाएंगे। हमारे बच्चों को देख लेना’, महिला ने कहा, ‘बस उनके मुंह से इतना ही निकला था, कि फिर बगैर फोन कटे ही सामने से आवाज आना बंद हो गई।’


    बुधवार सुबह हुई बात के बाद कोई संपर्क नहीं हो पाया

    महिला ने बताया कि यह बात उनसे कल सुबह करीब साढ़े नौ बजे हुई थी और अब 24 घंटे से ज्यादा वक्त गुजरने के बाद भी वहां गए किसी भी व्यक्ति से कोई संपर्क नहीं हो पाया है। महिला ने कहा, ‘जिस बस से वो लोग गए थे उसका भी कुछ पता नहीं है और उन 29 लोगों का भी फिलहाल कुछ पता नहीं चला है। एक की भी बॉडी अबतक नहीं मिली है।’


    बच्चों का रो रोकर बुरा हाल, सरकार से मांगी मदद

    महिला के अनुसार वहां गए सभी लोग आपस में परिचित थे और सभी कहीं ना कहीं एक-दूसरे के रिश्ते में लगते थे। उधर उनके लापता होने के बाद सभी के बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है, कोई ससुराल में है तो कोई नौकरी करने गया हुआ है और वे सभी अपने माता-पिता के लिए परेशान हो रहे हैं। महिला ने सरकार से उन लोगों का पता लगाने में मदद करने की गुहार लगाई है।

  • दिल्ली में जुटेंगे ब्रिक्स देशों के नेता… पश्चिम एशिया संघर्ष पर टकराव की आशंका!

    दिल्ली में जुटेंगे ब्रिक्स देशों के नेता… पश्चिम एशिया संघर्ष पर टकराव की आशंका!


    नई दिल्ली।
    ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) में पश्चिम एशिया संघर्ष (West Asia Conflict) को लेकर सदस्य देशों में टकराव की आशंका है लेकिन भारत (India) ने इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज कर दिए हैं। भारत की कोशिश है कि सभी मुद्दों पर सहमति से संयुक्त बयान जारी हो।

    पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच भारत की अध्यक्षता में 12-13 सितंबर को दिल्ली के भारत मंडपम में ब्रिक्स सम्मेलन आयोजित हो रहा। भारत की अध्यक्षता में चौथी बार आयोजित हो रहे सम्मेलन का विषय, ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ है।

    सम्मेलन के लिए भारत ने बाकी 10 सदस्य देशों के अलावा दस पार्टनर देशों को भी आमंत्रित किया है। इसमें में बेलारूस, बोलिविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाइलैंड, युगांडा, उजबेकिस्तान एवं वियतनाम शामिल हैं।


    बांग्लादेश को भी आमंत्रित किया गया

    इसके अलावा बिमस्टेक चेयर के नाते बांग्लादेश को भी आमंत्रित किया गया है। सूत्रों के अनुसार ईरान की कोशिश रहेगी कि संयुक्त बयान में अमेरिका और इजरायल के हमले की निंदा की जाए क्योंकि यह एक ब्रिक्स सदस्य देश की संप्रभुता पर हमला है।

    दूसरे, उसका आरोप है कि एक दूसरे सदस्य यूएई ने हमलों में अमेरिका का साथ दिया तथा अपनी भूमि का इस्तेमाल होने दिया। इसी के चलते मई में विदेश मंत्रियों की बैठक में इस मुद्दे पर बयान जारी नहीं हो सका। यह स्थिति शिखर सम्मेलन में भी हो सकती है।


    ब्रिक्स मुद्रा शुरू करने का प्रस्ताव नहीं

    विदेश मंत्रालय के अनुसार यूरो की तर्ज पर ब्रिक्स मुद्रा शुरू करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। दरअसल, इस मुद्दे पर अमेरिकी राष्ट्रपति आक्रामक हैं और वे बार-बार ब्रिक्स देशों को चेतावनी दे रहे हैं। सूत्रों ने कहा कि ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार के दौरान लेन-देन की कीमत को कम करने के लिए व्यवहारिक तरीके अपनाने पर बातचीत चल रही है। इनमें स्थानीय मुद्रा में कारोबार जैसे विकल्प शामिल हैं। सितंबर में ब्रिक्स वित्त मंत्रियों की बैठक की जाएगी।


    भारत हमेशा कूटनीति के पक्ष में रहा

    सूत्रों ने कहा कि संयुक्त बयान में ईरान पर हमले की निंदा को शामिल करना संभव नहीं होगा। इसके पीछे वजह यह है कि एक तो ब्रिक्स सुरक्षा से जुड़ा मंच नहीं है। दूसरे, भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान ऐसा कोई संदेश नहीं देना चाहेगा जिससे पश्चिम को नाराजगी हो। सूत्रों ने कहा कि भारत हमेशा कूटनीति के पक्ष में रहा है। सभी सदस्य चाहते हैं कि संकट जल्द खत्म हो और जलमार्गों से निर्बाध नौवहन शुरू हो। इस विषय को शामिल किया जा सकता है।

  • नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह अपने पहले विदेश दौरे पर आएंगे भारत…

    नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह अपने पहले विदेश दौरे पर आएंगे भारत…


    नई दिल्ली।
    नेपाल (Nepal) के प्रधानमंत्री बालेन्द्र उर्फ बालेन शाह (Prime Minister Balen Shah) अपने पहले विदेश यात्रा (Foreign Travel) पर भारत (India) आ सकते हैं। नेपाल में आए भीषण बाढ़ के बीच नेपाली वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने गुरुवार को यह जानकारी दी है। उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा है कि प्रधानमंत्री शाह का यह भारत दौरा इस साल के अंत से पहले आयोजित होने की संभावना है।

    काठमांडू में आयोजित एनडीटीवी समिट को संबोधित करते हुए नेपाल के वित्त मंत्री वागले ने कहा कि यात्रा की तारीखों को अंतिम रूप दिया जा रहा है, लेकिन उन्हें पूरा भरोसा है कि पद संभालने के बाद प्रधानमंत्री शाह का पहला विदेशी दौरा भारत का ही होगा। वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने कहा, “हमने प्रधानमंत्री के विदेश दौरों की चर्चा शुरू कर दी है। मुझे पूरा विश्वास है कि उनकी पहली विदेश यात्रा भारत की होगी। तारीख तय की जानी बाकी है, लेकिन मुझे पूरी उम्मीद है कि यह दौरा इसी साल के अंत से पहले होगा।”


    नेपाल में बाढ़ के बाद भारत बना संकटमोचक

    नेपाल के वित्त मंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई भीषण बाढ़ और तबाही से देश जूझ रहा है। समाचार लिखे जाने तक इस त्रासदी में कम से कम 389 लोगों की मौत हो चुकी है। अब भी 1500 लोग लापता हैं। मलबे के तेज बहाव ने कई गांवों, सड़कों और पुलों को तबाह कर दिया है।

    संकट की इस घड़ी में भारत नेपाल की मदद के लिए सबसे पहले आगे आया। भारत ने सैन्य विमानोंके जरिए पहले 10 टन की मानवीय सहायता और आपदा राहत सामग्री भेजी। इसके बाद 37.5 टन की अतिरिक्त खेप एयरलिफ्ट की गई है। वहीं विदेश मंत्री ने गुरुवार को एक बयान में कहा है कि भारत नेपाल की जनता के साथ एकजुटता के साथ खड़ा है। उन्होंने भारत की ओर से हर संभव सहायता और मानवीय सहायता की पेशकश भी की।


    PM मोदी ने दिया था भरोसा

    इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाल के पीएम बालेन शाह से फोन पर बात कर इस आपदा पर गहरा शोक व्यक्त किया था। पीएम मोदी ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर एक पोस्ट में कहा, “प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से बात की और नेपाल में बाढ़ के कारण हुई जनहानि पर संवेदना व्यक्त की। इस कठिन समय में भारत की जनता नेपाल में अपने बहनों और भाइयों के साथ एकजुटता से खड़ी है।” प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की टीमें बचाव और राहत प्रयासों के लिए समन्वय कर रही हैं। उन्होंने कहा, “भारत नेपाल को हर संभव मानवीय सहायता प्रदान करने के लिए तैयार है।”


    नेपाल ने जताया आभार

    वहीं भारत से मिली त्वरित मदद के लिए नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने पीएम मोदी का शुक्रिया अदा किया था। पीएम मोदी द्वारा फोन पर सद्भावनापूर्ण बातचीत और गहरी संवेदना व्यक्त करने के लिए उनका आभार जताते हुए बालेन्द्र शाह ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, ”हम इस मुश्किल घड़ी में नेपाल के प्रति एकजुटता व्यक्त करने वाले आपके आत्मीय शब्दों और सहायता की उदार पेशकश की दिल से सराहना करते हैं।” उन्होंने कहा, ”सहयोग का यह भाव हमारे दोनों देशों के बीच दोस्ती के मजबूत रिश्तों को दिखाता है, जिन्हें हम बहुत महत्व देते हैं।”

  • महिला टी20 एशिया कप का भव्य आगाज आज दुबई में…. Ind vs Pak मैच 5 सितंबर को

    महिला टी20 एशिया कप का भव्य आगाज आज दुबई में…. Ind vs Pak मैच 5 सितंबर को


    दुबई।
    महिला टी20 एशिया कप 2026 (Women’s T20 Asia Cup 2026) का आगाज आज से यूएई (UAE) के दुबई (Dubai) में होने जा रहा है। इस बार टूर्नामेंट (Tournament) में आठ टीमें हिस्सा ले रही हैं। भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश के अलावा इंडोनेशिया, हांगकांग चीन, थाईलैंड और मेजबान यूएई भी खिताब के लिए मैदान में पूरी ताकत झोंकेंगे। टूर्नामेंट का फाइनल 13 सितंबर को खेला जाएगा। भारत को प्रतियोगिता का प्रबल दावेदार माना जा रहा है, जबकि मौजूदा चैंपियन श्रीलंका की टीम भी शानदार फॉर्म के साथ टूर्नामेंट में पहुंची है। पाकिस्तान और बांग्लादेश उलटफेर करने की क्षमता रखते हैं।


    28 अगस्त से 13 सितंबर तक चलेगा टूर्नामेंट

    महिला टी20 एशिया कप में कुल 15 मुकाबले खेले जाएंगे। इनमें 12 लीग मैच, दो सेमीफाइनल और एक फाइनल शामिल है। ग्रुप चरण के मुकाबले 28 अगस्त से आठ सितंबर तक होंगे और इस दौरान हर दिन एक मैच खेला जाएगा। इसके बाद पहला सेमीफाइनल 10 सितंबर और दूसरा सेमीफाइनल 11 सितंबर को होगा। खिताबी मुकाबला 13 सितंबर को खेला जाएगा। टूर्नामेंट के सभी मुकाबले दुबई में आयोजित किए जाएंगे।


    भारत-पाकिस्तान एक ही ग्रुप में

    आठ टीमों को दो ग्रुप में बांटा गया है।
    ग्रुप ए: भारत, पाकिस्तान, हांगकांग चीन और थाईलैंड
    ग्रुप बी: बांग्लादेश, श्रीलंका, यूएई और इंडोनेशिया

    ग्रुप चरण में प्रत्येक टीम अपने ग्रुप की बाकी तीन टीमों से एक-एक मुकाबला खेलेगी। दोनों ग्रुप की शीर्ष दो टीमें सेमीफाइनल में पहुंचेंगी। यह दूसरी बार है जब महिला एशिया कप के टी20 प्रारूप में आठ टीमें हिस्सा ले रही हैं। 2022 में टूर्नामेंट में सात टीमें थीं, जबकि 2024 में एक और टीम के जुड़ने के बाद संख्या आठ हुई थी।


    चार एसोसिएट टीमों ने ऐसे बनाई जगह

    इंडोनेशिया, हांगकांग चीन, थाईलैंड और यूएई ने 2026 महिला प्रीमियर कप के जरिए एशिया कप में जगह बनाई है। 18 टीमों वाले प्रीमियर कप में इन चारों टीमों ने अपने-अपने ग्रुप में शीर्ष स्थान हासिल किया और फिर क्वार्टर फाइनल जीतकर एशिया कप के लिए क्वालिफाई किया। इंडोनेशिया के लिए यह महिला एशिया कप में पहली उपस्थिति होगी। वहीं हांगकांग की टीम 2012 के बाद पहली बार इस टूर्नामेंट में वापसी कर रही है।


    भारत का दबदबा, श्रीलंका मौजूदा चैंपियन

    महिला टी20 एशिया कप में भारत का अब तक दबदबा रहा है। टी20 प्रारूप में खेले गए पांच संस्करणों में भारत ने तीन बार खिताब जीता है। हालांकि, दो मौकों पर उसे फाइनल में हार का सामना करना पड़ा। 2018 में बांग्लादेश ने भारत को हराकर खिताब जीता था, जबकि 2024 में श्रीलंका ने भारत को मात देकर पहली बार ट्रॉफी अपने नाम की थी। अब भारत की नजरें खिताब वापस हासिल करने पर होंगी।


    पांच सितंबर को भारत-पाकिस्तान महामुकाबला

    टूर्नामेंट के सबसे बहुप्रतीक्षित मुकाबलों में भारत और पाकिस्तान की भिड़ंत शामिल है। दोनों टीमें पांच सितंबर को आमने-सामने होंगी। टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत का पाकिस्तान पर दबदबा रहा है। दोनों के बीच खेले गए 17 मुकाबलों में भारत ने 14 में जीत दर्ज की है। हालांकि, टी20 क्रिकेट में एक खराब दिन भी समीकरण बदल सकता है।

    भारतीय कप्तान हरमनप्रीत कौर ने भी टूर्नामेंट से पहले साफ किया कि उनकी टीम किसी एक प्रतिद्वंद्वी पर विशेष ध्यान नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि टीम का लक्ष्य किसी विशेष टीम को लेकर सोचने के बजाय अच्छा क्रिकेट खेलना है। हरमनप्रीत के मुताबिक पिछले दो-तीन वर्षों में एशियाई टीमों के स्तर में काफी सुधार हुआ है और इस वजह से प्रतियोगिता चुनौतीपूर्ण रहने वाली है।


    श्रीलंका और बांग्लादेश की टक्कर भी अहम

    छह सितंबर को मौजूदा चैंपियन श्रीलंका और बांग्लादेश के बीच मुकाबला होगा। इस मैच पर भी नजरें रहेंगी। टी20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में श्रीलंका का बांग्लादेश के खिलाफ रिकॉर्ड मजबूत है। दोनों टीमों के बीच 16 मुकाबलों में श्रीलंका ने 13 मैच जीते हैं। श्रीलंका इस साल शानदार फॉर्म में है। उसने 13 टी20 अंतरराष्ट्रीय मैचों में 10 जीत हासिल की हैं। टीम ने वेस्टइंडीज के खिलाफ सीरीज 2-1 से जीती, बांग्लादेश को 3-0 से हराया और पाकिस्तान के खिलाफ भी 2-1 से सीरीज अपने नाम की।


    भारत पसंदीदा, लेकिन हालिया फॉर्म चिंता का विषय

    भारत को टूर्नामेंट का सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है, हालांकि उसकी हालिया टी20 फॉर्म बहुत प्रभावशाली नहीं रही है। भारत ने इस साल खेले 16 टी20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में नौ मैच गंवाए हैं। इसके बावजूद टीम की गहराई और बड़े टूर्नामेंटों का अनुभव उसे बाकी टीमों से आगे रखता है। भारतीय टीम की नजरें खास तौर पर हालिया निराशाजनक टी20 विश्व कप अभियान से सबक लेकर बेहतर प्रदर्शन करने पर होंगी। हरमनप्रीत ने कहा कि पिछली प्रतियोगिताओं में मिले अनुभव टीम के लिए उपयोगी साबित होंगे और खिलाड़ी यहां अपना सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट खेलने की कोशिश करेंगे।


    बांग्लादेश के प्रदर्शन में निरंतरता की कमी

    बांग्लादेश ने इस साल टी20 क्रिकेट में मिश्रित प्रदर्शन किया है। टीम ने टी20 विश्व कप क्वालिफायर में अपने सभी सात मुकाबले जीते थे, लेकिन उसके बाद खेले गए 12 मैचों में उसे आठ में हार मिली। ऐसे में बांग्लादेश के लिए ग्रुप बी में श्रीलंका के साथ मुकाबला बड़ी चुनौती होगा। टीम को सेमीफाइनल में जगह बनाने के लिए निरंतर प्रदर्शन करना होगा।


    क्या भारत ट्रॉफी वापस हासिल करेगा?

    महिला टी20 एशिया कप 2026 में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत 2024 में गंवाया खिताब वापस हासिल कर पाएगा। कागज पर भारत सबसे मजबूत टीमों में है, लेकिन इस साल उसकी टी20 फॉर्म चिंता पैदा करती है। दूसरी ओर श्रीलंका मौजूदा चैंपियन होने के साथ इस साल बेहतर फॉर्म में है। पाकिस्तान और बांग्लादेश के पास भी बड़े मुकाबलों में उलटफेर करने की क्षमता है, जबकि चार एसोसिएट टीमों के प्रदर्शन पर भी नजर रहेगी। टूर्नामेंट का प्रारूप ऐसा है कि ग्रुप चरण में एक भी चूक भारी पड़ सकती है। इसलिए 28 अगस्त से शुरू होने वाली इस प्रतियोगिता में सिर्फ बड़े नाम ही नहीं, बल्कि युवा और उभरती हुई प्रतिभाएं भी खिताब की दौड़ का रुख तय कर सकती हैं।

  • ऑनस्क्रीन भाई-बहन की जोड़ी को रियल लाइफ में हुआ प्यार, किसी ने की शादी तो किसी का रिश्ता रह गया अधूरा

    ऑनस्क्रीन भाई-बहन की जोड़ी को रियल लाइफ में हुआ प्यार, किसी ने की शादी तो किसी का रिश्ता रह गया अधूरा


    नई दिल्ली। टीवी की दुनिया में कलाकार कई बार ऐसे किरदार निभाते हैं, जिनमें वे एक-दूसरे के भाई-बहन नजर आते हैं। लेकिन शूटिंग के दौरान बढ़ी दोस्ती कभी-कभी असल जिंदगी में प्यार में बदल जाती है। टीवी इंडस्ट्री में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां पर्दे पर भाई-बहन बने कलाकारों ने एक-दूसरे को अपना जीवनसाथी बनाया। हालांकि, इनमें से कुछ रिश्ते शादी तक पहुंचे, तो कुछ समय के साथ टूट भी गए।

    रोहन मेहरा और कांची सिंह: ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में नक्श का किरदार निभाने वाले रोहन मेहरा अपनी ऑनस्क्रीन बहन कांची सिंह के साथ रिलेशनशिप में थे। शो से बाहर आने के कुछ महीने बाद दोनों का रिश्ता खत्म हो गया।

    अविनाश और शाल्मली: ‘इस प्यार को क्या नाम दूं 2’ में अविनाश और शाल्मली ने भाई-भाभी का किरदार निभाया था। साथ काम करते हुए दोनों की दोस्ती बढ़ी और बाद में उन्होंने शादी कर ली। हालांकि, शादी के करीब तीन साल बाद दोनों का तलाक हो गया।

    नीरज और चारू: ‘मेरे अंगने में’ फेम नीरज और चारू ने शो में भाई-बहन की भूमिका निभाई थी। काम के दौरान दोनों एक-दूसरे के करीब आए और उनका रिश्ता सगाई तक पहुंच गया। हालांकि, बाद में दोनों अलग हो गए।

    मजहर और मौली: ‘कहीं किसी रोज’ में मजहर और मौली ने भाई-बहन की भूमिका निभाई थी। अलग-अलग धर्म से होने के बावजूद दोनों ने शादी करने का फैसला किया और अपने रिश्ते को शादी में बदल दिया।

    किरण करमरकर और रिंकू धवन: ‘कहानी घर घर की’ में किरण करमरकर ने ओम अग्रवाल और रिंकू धवन ने उनकी बहन छाया का किरदार निभाया था। शो के दौरान ही दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और उन्होंने शादी कर ली। हालांकि, कुछ साल बाद दोनों का तलाक हो गया।

    अभिषेक और अदिति: ‘ये है मोहब्बतें’ में अभिषेक और अदिति की ऑनस्क्रीन भाई-बहन की जोड़ी को दर्शकों ने पसंद किया। इसी दौरान दोनों के रियल लाइफ में डेटिंग करने की खबरें सामने आईं। हालांकि, बाद में दोनों का ब्रेकअप हो गया।

    अमन वर्मा और वंदना लालवानी: अमन वर्मा और वंदना लालवानी ने ‘शपथ’ में भाई-बहन की भूमिका निभाई थी। पर्दे पर भाई-बहन का किरदार निभाने वाली यह जोड़ी बाद में रियल लाइफ कपल बनी और दोनों ने 2016 में शादी कर ली।

    मयंक और रिया शर्मा: ‘तू सूरज मैं सांझ पिया जी’ में मयंक और रिया शर्मा ने भाई-बहन का किरदार निभाया था। शो के दौरान दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने और एक-दूसरे को पसंद करने की खबरें सामने आई थीं।

    टीवी की दुनिया में ऐसे रिश्ते यह दिखाते हैं कि कैमरे के सामने निभाया गया किरदार और कलाकारों की निजी जिंदगी कई बार बिल्कुल अलग कहानी लिखती है। कुछ कलाकारों का ऑनस्क्रीन रिश्ता रियल लाइफ में प्यार में बदलकर शादी तक पहुंचा, जबकि कुछ रिश्ते समय के साथ खत्म हो गए।

  • तीर्थ में मृत्यु पर क्या कहते हैं शास्त्र? "पुण्यभूमि में प्राण त्यागने से मोक्ष की मान्यता, लेकिन…"

    तीर्थ में मृत्यु पर क्या कहते हैं शास्त्र? "पुण्यभूमि में प्राण त्यागने से मोक्ष की मान्यता, लेकिन…"


    नई दिल्ली। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास आई फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई है। हादसे में जान-माल के नुकसान के साथ बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की खबर है। यह आपदा उस समय आई, जब नेपाल और तिब्बत के रास्ते कैलास मानसरोवर की तीर्थयात्रा चल रही थी। हादसे में प्रभावित भारतीयों में बड़ी संख्या श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों की बताई जा रही है।

    इस घटना के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु तीर्थ में या तीर्थयात्रा के दौरान हो जाए तो हिंदू धर्मग्रंथ इसे किस दृष्टि से देखते हैं? क्या पुण्यभूमि में प्राण त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है? शास्त्रों और पुराणों में कई तीर्थों में देहत्याग की महिमा बताई गई है, लेकिन इसके साथ कर्म और अंतिम समय के विचारों को भी महत्वपूर्ण माना गया है।

    तीर्थ का अर्थ ही है भवसागर से पार जाने का माध्यम

    भारतीय परंपरा में तीर्थ केवल कोई धार्मिक स्थान नहीं है। ‘तीर्थ’ का अर्थ उस स्थान या माध्यम से जुड़ा है, जिसके सहारे मनुष्य संसार के बंधनों से पार जाने का प्रयास करता है। इसी कारण नदियों के तट, पर्वत, देवस्थल और प्राचीन धार्मिक नगर तीर्थ माने गए हैं।

    तीर्थयात्रा में स्नान, दर्शन, दान, तप, जप और आत्मशुद्धि जैसी साधनाएं शामिल होती हैं। इसलिए इसे केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने की यात्रा नहीं, बल्कि धार्मिक संकल्प और साधना के रूप में देखा गया है।

    गीता में अंतिम समय के विचारों को सबसे अधिक महत्व

    तीर्थ में मृत्यु की मान्यता को समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का संदर्भ महत्वपूर्ण है। आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अंतिम समय में मनुष्य की मानसिक अवस्था और उसके विचारों का महत्व बताते हैं।

    श्रीकृष्ण कहते हैं—

    अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
    यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥

    अर्थात जो व्यक्ति अंतिम समय में मेरा स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

    अगले श्लोक में इसी सिद्धांत को और स्पष्ट करते हुए कहा गया है—

    यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
    तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥

    अर्थात मनुष्य अंतिम समय में जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है। इसलिए शास्त्रीय दृष्टि से केवल मृत्यु का स्थान ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उस समय व्यक्ति का चित्त किस अवस्था में था, इसे भी अहम माना गया है।

    काशी में मृत्यु को लेकर सबसे बड़ी धार्मिक मान्यता

    तीर्थ में देहत्याग की चर्चा हो तो काशी का उल्लेख सबसे पहले आता है। काशी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा गया है। स्कंदपुराण के काशीखंड सहित कई पौराणिक परंपराओं में इसकी विशेष महिमा बताई गई है।

    धार्मिक मान्यता है कि काशी में देह त्यागने वाले व्यक्ति को भगवान शिव तारक मंत्र का उपदेश देते हैं और उसे संसार के बंधन से मुक्ति का मार्ग प्राप्त होता है। इसी विश्वास के कारण सदियों से लोग जीवन के अंतिम चरण में काशी जाकर रहने की इच्छा रखते रहे हैं।

    हालांकि इतिहास में ‘करवत काशी’ जैसी कठोर परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यताओं में मोक्ष की कामना से लोग काशी में जानबूझकर प्राण त्यागने तक के प्रयास करते थे। मीरा के पदों और कबीर की रचनाओं में भी ‘करवत कासी’ का संदर्भ मिलता है।

    केदार की यात्रा और कैलास पहुंचने की कथा

    स्कंदपुराण में तीर्थयात्रा से जुड़ी वसिष्ठ और उनके गुरु हिरण्यगर्भ की कथा भी मिलती है। दोनों हिमालय में केदार की यात्रा पर जाते हैं। यात्रा के दौरान असिधारा पर्वत पर हिरण्यगर्भ की मृत्यु हो जाती है।

    पुराण की कथा के अनुसार, तीर्थयात्रा के दौरान देह त्यागने और अंतिम समय में चित्त की शुद्ध अवस्था के कारण शिवगण उन्हें दिव्य विमान से कैलास ले जाते हैं। इस कथा में तीर्थयात्री की मृत्यु को शिवलोक की प्राप्ति से जोड़ा गया है।

    गरुड़ पुराण में पवित्र भूमि पर मृत्यु का उल्लेख

    गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प, अध्याय 14 में मृत्यु के बाद धर्मराज की सभा तक पहुंचने वाले पुण्यात्माओं का वर्णन मिलता है। इसमें काशी में मृत्यु, धर्म की रक्षा करते हुए प्राण त्यागने और योग करते हुए शरीर छोड़ने वालों के साथ पवित्र जल में दुर्घटनावश डूबने या पवित्र तीर्थ और पुण्यभूमि में मृत्यु होने का भी उल्लेख किया गया है।

    इसमें ऐसे पुण्यात्माओं के लिए धर्मराज की सभा की ओर जाने वाले उत्तरी मार्ग का वर्णन मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि धार्मिक परंपरा में पुण्यभूमि पर मृत्यु को विशेष आध्यात्मिक महत्व दिया गया है।

    पांडवों की कथा बताती है कि केवल स्थान ही सब कुछ नहीं

    महाभारत में पांडवों की अंतिम यात्रा का प्रसंग भी इस विषय को अलग दृष्टि से समझाता है। यात्रा के दौरान द्रौपदी और चारों भाई एक-एक करके गिरते जाते हैं। युधिष्ठिर उनके पतन को उनके जीवन में मौजूद अलग-अलग दोषों से जोड़ते हैं।

    इस प्रसंग से यह विचार सामने आता है कि भारतीय शास्त्रीय परंपरा में स्थान के साथ कर्म और चित्त की भी भूमिका है। यानी किसी पवित्र स्थान पर मृत्यु को महत्व दिया गया है, लेकिन मनुष्य के कर्म और उसकी मानसिक अवस्था को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया गया।

    प्रयाग और अयोध्या की भी अलग धार्मिक मान्यताएं

    पद्मपुराण के स्वर्गखंड में प्रयाग और उसके आसपास के तीर्थों की महिमा का वर्णन मिलता है। इसमें गंगा और यमुना के तट पर स्थित तीर्थों में देह त्यागने की धार्मिक महत्ता बताई गई है। यहां तक कहा गया है कि इन पवित्र तीर्थों में मृत्यु पाने वाले व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता।

    इसी तरह स्कंदपुराण के वैष्णवखंड में अयोध्या में देहत्याग को ‘स्वर्गद्वार’ का मार्ग बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसे व्यक्ति को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।

    क्या तीर्थ में मृत्यु से निश्चित रूप से मोक्ष मिल जाता है?

    शास्त्रीय मान्यताओं को समग्र रूप से देखें तो इसका उत्तर इतना सीधा नहीं है कि तीर्थ में मृत्यु होते ही हर व्यक्ति को निश्चित रूप से मोक्ष मिल जाता है। अलग-अलग पुराणों में कुछ तीर्थों की मृत्यु-महिमा जरूर बताई गई है, लेकिन गीता जैसे ग्रंथ अंतिम समय के भाव, स्मरण और चित्त की अवस्था को भी निर्णायक महत्व देते हैं।

    यही कारण है कि तीर्थयात्रा को केवल पर्यटन नहीं माना गया। इसमें संयम, उपवास, स्नान, दान, जप, देवदर्शन और सांसारिक आसक्तियों से दूरी जैसी साधनाएं जुड़ी हैं।

    इस दृष्टि से तीर्थयात्रा धार्मिक संकल्प के साथ शुरू होने वाली आध्यात्मिक यात्रा है। मान्यता है कि पुण्यभूमि का वातावरण मनुष्य के चित्त को ईश्वर और आध्यात्मिक चिंतन की ओर ले जाता है। इसलिए तीर्थ में मृत्यु को विशेष पुण्य से जोड़कर देखा गया है, लेकिन उसके साथ व्यक्ति के कर्म और अंतिम मानसिक भाव को भी महत्वपूर्ण माना गया है।

  • नेपाल-चीन सीमा पर बनी बैरियर लेक से बढ़ी चिंता, भारत से 120-140 किमी दूर झील को लेकर अलर्ट

    नेपाल-चीन सीमा पर बनी बैरियर लेक से बढ़ी चिंता, भारत से 120-140 किमी दूर झील को लेकर अलर्ट


    नई दिल्ली। नेपाल में भोटेकोशी नदी की विनाशकारी बाढ़ के बाद अब नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में बनी एक विशाल बैरियर लेक (प्राकृतिक झील) को लेकर वैज्ञानिकों और प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने अगले 72 घंटों को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए इलाके में निगरानी और फ्लड सिमुलेशन शुरू कर दिया है। आशंका जताई जा रही है कि यदि झील को रोक रहा प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ता है या टूट जाता है तो बड़ी मात्रा में पानी तेजी से निचले इलाकों की ओर बह सकता है।

    यह झील छोछेन खोला और पुरेपू त्सांगपो नदियों के संगम पर बनी है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार यह क्षेत्र भारतीय सीमा से लगभग 120 से 140 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। वहीं नेपाल-चीन सीमा पर स्थित रसुवागढ़ी-ग्यिरोंग बॉर्डर क्रॉसिंग से इसकी दूरी करीब 18 किलोमीटर बताई जा रही है। भौगोलिक रूप से भारत से दूरी अधिक नहीं होने के बावजूद चिंता का कारण इसका नदी तंत्र से जुड़ाव है, क्योंकि यहां का पानी आगे चलकर नेपाल होते हुए गंडक नदी के जरिए भारत तक पहुंचता है।

    झील में करोड़ों लीटर पानी जमा
    चीन की ओर से जारी चेतावनी के मुताबिक बैरियर लेक का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। हाइड्रोजियोलॉजिस्ट के अनुमान के अनुसार झील में करीब 20 लाख क्यूबिक मीटर पानी पहले ही जमा हो चुका है, जबकि लगभग 30 लाख क्यूबिक मीटर अतिरिक्त पानी और जमा होने की संभावना जताई गई है। यानी कुल मिलाकर 50 लाख क्यूबिक मीटर तक पानी प्राकृतिक बांध के पीछे इकट्ठा हो सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पानी का दबाव बढ़ने से प्राकृतिक अवरोध टूटता है तो यह ग्लेशियल या भूस्खलन से बनी झील के अचानक फटने (लेक आउटबर्स्ट फ्लड) जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। ऐसी घटनाओं में पानी बेहद तेज गति से नीचे की ओर बढ़ता है और अपने साथ चट्टानें, मिट्टी, पेड़ तथा भारी मात्रा में मलबा भी बहाकर ले जाता है।

    अगले 72 घंटे क्यों अहम
    खतरे को देखते हुए चीन ने रियल-टाइम मॉनिटरिंग और फ्लड मॉडलिंग शुरू की है। वैज्ञानिक यह आकलन कर रहे हैं कि यदि प्राकृतिक बांध में दरार बढ़ती है या वह टूटता है तो पानी की दिशा, मात्रा और गति क्या होगी। 27 अगस्त को जारी चेतावनी के बाद से पूरे क्षेत्र पर लगातार नजर रखी जा रही है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि झील का पानी धीरे-धीरे बाहर निकलेगा या अचानक बांध टूटने जैसी स्थिति बनेगी। यदि जल निकासी नियंत्रित रहती है तो निचले इलाकों को तैयारी का पर्याप्त समय मिल सकता है, लेकिन अचानक बांध टूटने की स्थिति में बाढ़ की लहर बेहद कम समय में नीचे पहुंच सकती है।

    बिहार और उत्तर प्रदेश पर क्यों नजर
    छोछेन खोला और पुरेपू त्सांगपो का पानी आगे नेपाल की नदियों में मिलकर भोटेकोशी और फिर त्रिशूली नदी तंत्र का हिस्सा बनता है। त्रिशूली आगे चलकर नारायणी नदी में समाहित होती है, जिसे भारत में गंडक नदी के नाम से जाना जाता है। यही वजह है कि ऊपरी क्षेत्र में किसी भी असामान्य जलप्रवाह का असर बिहार और उत्तर प्रदेश के गंडक बेसिन वाले इलाकों पर पड़ सकता है।

    हालांकि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल भारत में बड़ी बाढ़ की कोई निश्चित आशंका नहीं है, लेकिन नदी तंत्र के आपसी जुड़ाव को देखते हुए निगरानी और सतर्कता बेहद जरूरी है।

    नेपाल में पहले ही मची है तबाही
    यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब नेपाल में हाल की बाढ़ ने भारी नुकसान पहुंचाया है। रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों में सड़कें, पुल और मकान प्रभावित हुए हैं। कई क्षेत्रों में नदी के साथ बहकर आए मलबे ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है और अनेक लोगों के लापता होने की भी खबरें हैं।

    ऐसे में अब प्रशासन की नजर केवल बैरियर लेक पर नहीं, बल्कि पूरे नदी तंत्र पर है। आने वाले 72 घंटे यह तय करेंगे कि झील स्थिर रहती है या फिर उसके जलस्तर में बढ़ोतरी नई चुनौती खड़ी करती है।