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  • बदरीनाथ में आस्था के बीच बड़ा हादसा तप्तकुंड में ज्यादा देर स्नान बना जानलेवा डॉक्टरों ने दी खास सलाह

    बदरीनाथ में आस्था के बीच बड़ा हादसा तप्तकुंड में ज्यादा देर स्नान बना जानलेवा डॉक्टरों ने दी खास सलाह


    नई दिल्ली। बदरीनाथ धाम में आस्था के साथ तप्तकुंड में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक गंभीर चेतावनी सामने आई है। चमोली जिले में स्थित प्रसिद्ध तप्तकुंड में अधिक संख्या में डुबकी लगाने और लंबे समय तक गर्म पानी में रहने को चिकित्सकों ने स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताया है। शुक्रवार को कुंड में 108 डुबकी लगाने के दौरान दो सगी बहनों की मौत के बाद श्रद्धालुओं से विशेष सावधानी बरतने की अपील की गई है। चिकित्सकों के अनुसार प्राकृतिक रूप से गर्म और सल्फरयुक्त पानी में अधिक समय तक रहने से शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और कुछ परिस्थितियों में यह जानलेवा भी साबित हो सकता है।

    बदरीनाथ के सरकारी अस्पताल के प्रभारी चिकित्सक डॉ. सचिन राणा के अनुसार तप्तकुंड का पानी प्राकृतिक रूप से गर्म और सल्फरयुक्त है। इसके अलावा कुंड के आसपास गर्म हवाओं का प्रभाव भी रहता है। ऐसे वातावरण में लंबे समय तक रहने से शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को सलाह दी है कि कुंड में अधिकतम दो से तीन डुबकी लगाने के बाद बाहर निकल जाना चाहिए। खासकर बुजुर्गों और हृदय संबंधी समस्या वाले लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है।

    शुक्रवार को हुआ हादसा इस चेतावनी की गंभीरता को सामने लाता है। 71 वर्षीय रामू देवी और 63 वर्षीय प्रेमा देवी सगी बहनें थीं। बताया गया कि दोनों करीब एक सप्ताह से प्रतिदिन तप्तकुंड में 108 डुबकी लगा रही थीं। शुक्रवार को भी उन्होंने इसी तरह स्नान किया लेकिन इसके बाद दोनों की तबीयत बिगड़ गई। दोनों की हृदय गति रुकने से मौत हो गई। घटना के बाद तीर्थयात्रियों के बीच भी चिंता बढ़ गई और प्रशासन तथा चिकित्सकों की ओर से सावधानी बरतने की जरूरत पर जोर दिया गया।

    तप्तकुंड बदरीनाथ धाम आने वाले श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है। मान्यता के चलते बड़ी संख्या में लोग यहां स्नान करते हैं। कई श्रद्धालु धार्मिक संकल्प के तहत बार बार डुबकी लगाते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि धार्मिक आस्था के साथ शरीर की क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। गर्म पानी में लंबे समय तक रहने या बार बार डुबकी लगाने से चक्कर आना कमजोरी महसूस होना मूर्छा आना और हृदय संबंधी परेशानी जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

    ऊंचाई वाले क्षेत्र में होने के कारण बदरीनाथ में मौसम और वातावरण मैदानी इलाकों से अलग होता है। ऐसे में श्रद्धालुओं को अपनी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए ही स्नान करना चाहिए। यदि स्नान के दौरान चक्कर घबराहट सांस लेने में परेशानी अत्यधिक कमजोरी या बेचैनी महसूस हो तो तुरंत कुंड से बाहर निकलकर चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।

    चिकित्सकों की सलाह का उद्देश्य श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था को रोकना नहीं बल्कि उसे सुरक्षित बनाना है। तप्तकुंड में स्नान करते समय सीमित समय तक रहना और अधिक डुबकी लगाने से बचना जरूरी है। दो महिलाओं की मौत की घटना ने यह साफ कर दिया है कि आस्था के साथ सावधानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। श्रद्धालुओं को अपनी सेहत को प्राथमिकता देते हुए चिकित्सकों की सलाह का पालन करना चाहिए ताकि बदरीनाथ की यात्रा श्रद्धा के साथ सुरक्षित भी रहे।

  • पैसा Nifty में लगाएं या Sensex में निवेशकों की उलझन होगी दूर जानिए लंबी अवधि के लिए कौन सा विकल्प हो सकता है बेहतर

    पैसा Nifty में लगाएं या Sensex में निवेशकों की उलझन होगी दूर जानिए लंबी अवधि के लिए कौन सा विकल्प हो सकता है बेहतर


    नई दिल्ली। शेयर बाजार में निवेश करने वाले लोगों के सामने अक्सर यह सवाल रहता है कि पैसा Nifty 50 में लगाया जाए या Sensex में। दोनों ही भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख इंडेक्स हैं और देश की बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन को दर्शाते हैं। हालांकि निवेश करने से पहले यह समझना जरूरी है कि Nifty और Sensex में सीधे पैसा नहीं लगाया जाता बल्कि इनके आधार पर बने Index Fund या ETF के जरिए निवेश किया जा सकता है। यही वजह है कि नए निवेशकों के लिए दोनों के अंतर को समझना काफी महत्वपूर्ण हो जाता है।

    Nifty 50 में 50 बड़ी और प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। NSE के अनुसार यह 13 अलग अलग सेक्टरों को कवर करने वाला diversified index है और इसका इस्तेमाल Index Fund तथा ETF सहित कई निवेश उत्पादों के benchmark के रूप में किया जाता है। दूसरी तरफ Sensex में 30 बड़ी कंपनियों का प्रदर्शन शामिल होता है। इस लिहाज से दोनों इंडेक्स large cap कंपनियों में निवेश का रास्ता देते हैं लेकिन Nifty 50 में कंपनियों की संख्या अधिक होने के कारण diversification थोड़ा ज्यादा मिलता है।

    अगर कोई निवेशक लंबी अवधि के लिए पैसा लगाना चाहता है तो Nifty 50 Index Fund को एक सरल विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है। इसमें निवेशक को अलग अलग कंपनियों के शेयर खुद चुनने की जरूरत नहीं होती। Index Fund इंडेक्स के प्रदर्शन को ट्रैक करने की कोशिश करता है। SIP के जरिए हर महीने एक तय राशि निवेश करने से बाजार के उतार चढ़ाव के दौरान अलग अलग स्तरों पर निवेश होता रहता है।

    Sensex आधारित Index Fund भी इसी तरह निवेश का विकल्प देता है। इसमें 30 बड़ी कंपनियों का exposure मिलता है। इसलिए ऐसा नहीं है कि Sensex में निवेश करना गलत है। अगर किसी निवेशक के पास पहले से Sensex आधारित फंड है तो केवल Nifty में अधिक कंपनियां होने की वजह से उसे बदलना जरूरी नहीं है। दोनों ही विकल्पों में असली महत्व निवेश की अवधि लागत और निवेशक की जोखिम क्षमता का होता है।

    मौजूदा समय में बाजार में उतार चढ़ाव भी बना हुआ है। 11 सितंबर 2026 को Nifty 50 करीब 23398 के स्तर पर बंद हुआ जबकि Sensex करीब 74782 पर रहा। दोनों प्रमुख इंडेक्स लगातार पांचवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुए। मध्य पूर्व में तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने बाजार की चिंता बढ़ाई है।

    ऐसे माहौल में निवेशकों के लिए एक साथ पूरी रकम बाजार में लगाने के बजाय चरणबद्ध निवेश या SIP का रास्ता उपयोगी हो सकता है। अगस्त 2026 में भारतीय म्यूचुअल फंड में SIP के जरिए निवेश रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा था जो बताता है कि बड़ी संख्या में खुदरा निवेशक नियमित निवेश की रणनीति अपना रहे हैं।

    हालांकि किसी भी इंडेक्स में निवेश से मुनाफे की गारंटी नहीं होती। बाजार में गिरावट आने पर Index Fund की वैल्यू भी घट सकती है। इसलिए निवेश का फैसला अपनी आर्थिक स्थिति निवेश की अवधि और जोखिम सहने की क्षमता देखकर लेना चाहिए। सामान्य तौर पर अगर कोई व्यक्ति लंबी अवधि के लिए सरल और diversified equity investment चाहता है तो Nifty 50 आधारित Index Fund एक मजबूत विकल्प हो सकता है। वहीं Sensex आधारित फंड भी समान उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। निवेश से पहले फंड का expense ratio tracking error और निवेश की शर्तों को जरूर देखना चाहिए।

  • सुरों से बदलेगी कश्मीर की कहानी एआर रहमान बोले फिल्मों में संघर्ष नहीं अब दिखेगी घाटी की खूबसूरती और कश्मीरियत

    सुरों से बदलेगी कश्मीर की कहानी एआर रहमान बोले फिल्मों में संघर्ष नहीं अब दिखेगी घाटी की खूबसूरती और कश्मीरियत


    नई दिल्ली। ऑस्कर विजेता संगीतकार एआर रहमान ने कश्मीर को लेकर सिनेमा की पारंपरिक सोच बदलने की जरूरत बताई हैनई दिल्ली। शनिवार को श्रीनगर पहुंचे रहमान ने कहा कि कश्मीर को अब केवल संघर्ष और हिंसा की कहानियों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यह घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता शांत वातावरण समृद्ध संस्कृति और सद्भाव के लिए भी जानी जाती है और फिल्मों के माध्यम से दुनिया के सामने कश्मीर की इसी सकारात्मक तस्वीर को मजबूती से पेश किया जा सकता है।

    विज्ञापन की शूटिंग के सिलसिले में श्रीनगर पहुंचे एआर रहमान ने बातचीत के दौरान कहा कि कश्मीर बेहद खूबसूरत शांत और प्रेरणादायक जगह है। उनके मुताबिक सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है बल्कि यह लोगों की सोच और किसी स्थान को देखने का नजरिया बदलने की क्षमता भी रखता है। ऐसे में फिल्मकारों की जिम्मेदारी है कि वे कश्मीर की पुरानी हिंसक छवि को बार बार दोहराने के बजाय घाटी की खूबसूरती शांति और सांस्कृतिक विरासत को अपनी कहानियों का हिस्सा बनाएं।

    रहमान की इस अपील को कश्मीर में पर्यटन और फिल्म निर्माण को बढ़ावा देने की कोशिशों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। लंबे समय तक फिल्मों में कश्मीर को संघर्ष आतंक और तनाव की पृष्ठभूमि के रूप में दिखाया जाता रहा है। हालांकि अब घाटी की प्राकृतिक सुंदरता स्थानीय संस्कृति लोक परंपराओं और सामान्य जनजीवन को केंद्र में रखकर नई कहानियां सामने लाने की संभावना बढ़ रही है। रहमान का मानना है कि अगर सिनेमा कश्मीर के इस बदले हुए पहलू को दुनिया तक पहुंचाता है तो इससे घाटी को लेकर लोगों की धारणा में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।

    एआर रहमान ने कश्मीर में आयोजित हो रहे इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की भी सराहना की। उन्होंने इसे एक अच्छी शुरुआत बताते हुए उम्मीद जताई कि आने वाले समय में यह महोत्सव दुनिया के प्रमुख फिल्म आयोजनों में अपनी अलग पहचान बना सकता है। उन्होंने कहा कि जिस तरह दुनिया भर के लोग बड़े फिल्म फेस्टिवल में हिस्सा लेने के लिए अलग अलग शहरों का रुख करते हैं उसी तरह कश्मीर भी सिनेमा प्रेमियों और फिल्मकारों के लिए आकर्षण का बड़ा केंद्र बन सकता है।

    उनका कहना था कि कश्मीर की मेहमाननवाजी संस्कृति और खूबसूरत वादियां देश और दुनिया के लोगों को अपनी ओर खींच सकती हैं। फिल्म फेस्टिवल के जरिए स्थानीय कलाकारों फिल्मकारों और रचनात्मक प्रतिभाओं को भी बड़ा मंच मिल सकता है। इससे कश्मीर में फिल्म निर्माण की गतिविधियों को बढ़ावा मिलने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन को भी फायदा पहुंचने की उम्मीद है।

    रहमान की बातों में कश्मीर की एक ऐसी तस्वीर दिखाई देती है जिसमें बंदूक और बारूद की जगह संगीत कला सिनेमा और शांति को प्रमुखता मिले। उनका संदेश साफ है कि घाटी की पहचान केवल उसके अतीत के संघर्षों से नहीं बल्कि उसकी खूबसूरती संस्कृति और कश्मीरियत से भी होनी चाहिए। सिनेमा इस बदलाव की कहानी दुनिया तक पहुंचाने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है।

  • हरतालिका तीज की ऐसी है पौराणिक कथा माता पार्वती ने शिव को पाने के लिए किया था कठोर तप सहेली के साथ चली गई थीं जंगल

    हरतालिका तीज की ऐसी है पौराणिक कथा माता पार्वती ने शिव को पाने के लिए किया था कठोर तप सहेली के साथ चली गई थीं जंगल


    नई दिल्ली। हरतालिका तीज हिंदू धर्म में भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम और दांपत्य जीवन से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस दिन महिलाएं माता पार्वती की तरह अखंड सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। इस पर्व की सबसे खास बात इसकी पौराणिक कथा है जिसमें माता पार्वती के कठोर तप और उनके अटूट संकल्प की कहानी सुनाई जाती है। मान्यता के अनुसार हरतालिका तीज की कथा स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को उनके पूर्व जन्म के शैलपुत्री रूप की याद दिलाते हुए सुनाई थी।

    कथा के अनुसार माता पार्वती ने राजा हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था। बचपन से ही उनके मन में भगवान शिव को पति के रूप में पाने की इच्छा थी। उन्होंने भगवान शिव की प्राप्ति के लिए कठिन तपस्या शुरू कर दी। धार्मिक मान्यता के अनुसार पार्वती ने लंबे समय तक भगवान शिव का ध्यान किया और कठोर तप करते हुए अपनी इच्छा पर अडिग रहीं। उनकी तपस्या का उद्देश्य केवल भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना था।

    इसी दौरान एक दिन नारद मुनि राजा हिमालय के पास पहुंचे। उन्होंने पार्वती के विवाह के लिए भगवान विष्णु का प्रस्ताव रखा। राजा हिमालय ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और पार्वती का विवाह भगवान विष्णु से करने का मन बना लिया। जब माता पार्वती को इस बात का पता चला तो वह बहुत दुखी हुईं क्योंकि वह मन से भगवान शिव को अपना पति मान चुकी थीं।

    पार्वती ने अपनी व्यथा अपनी सखी को बताई। सखी ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें घने जंगल में ले जाने का निर्णय लिया ताकि उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से न हो। पार्वती अपनी सखी के साथ जंगल में चली गईं और एक गुफा में रहकर भगवान शिव की आराधना करने लगीं। उन्होंने कठोर तप किया और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखा।

    माता पार्वती की तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने पार्वती को दर्शन देकर उनकी इच्छा पूरी होने का आशीर्वाद दिया और उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वचन दिया। इसके बाद पार्वती की सखी उन्हें लेकर वापस लौटीं। राजा हिमालय अपनी पुत्री के अचानक गायब होने से चिंतित थे और उन्हें लगा कि किसी ने पार्वती का अपहरण कर लिया है। काफी खोजबीन के बाद जब उन्हें पार्वती और उनकी सखी मिलीं तो उन्होंने बेटी से वापस घर चलने को कहा।

    पार्वती ने पिता के सामने अपनी इच्छा रखी कि वह तभी घर लौटेंगी जब उनका विवाह भगवान शिव से कराने का वचन दिया जाएगा। राजा हिमालय ने बेटी की इच्छा स्वीकार कर ली। इसके बाद उचित समय आने पर माता पार्वती का विवाह भगवान शिव के साथ हुआ। इसी पौराणिक प्रसंग से हरतालिका तीज का संबंध माना जाता है।

    हरतालिका नाम भी इसी कथा से जुड़ा माना जाता है। हरत और आलिका शब्दों से मिलकर बने हरतालिका का अर्थ सखी द्वारा पार्वती को अपने साथ ले जाना और उनके लिए रास्ता बनाना माना जाता है। इसीलिए हरतालिका तीज पर महिलाएं माता पार्वती के तप और उनके अटूट संकल्प को याद करती हैं। मान्यता है कि इस दिन शिव पार्वती की पूजा और व्रत कथा का श्रवण करने से दांपत्य जीवन में सुख और सौभाग्य की कामना की जाती है।

    इस कथा का सबसे बड़ा संदेश यही माना जाता है कि माता पार्वती ने अपने संकल्प को पूरा करने के लिए कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं छोड़ा। हरतालिका तीज इसलिए केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं बल्कि प्रेम आस्था तपस्या और दृढ़ संकल्प का प्रतीक भी माना जाता है।

  • हरतालिका तीज की तैयारी शुरू जानिए कब रखना है व्रत कैसे करें पूजा और किस विधि से मिलेगा शिव पार्वती का आशीर्वाद

    हरतालिका तीज की तैयारी शुरू जानिए कब रखना है व्रत कैसे करें पूजा और किस विधि से मिलेगा शिव पार्वती का आशीर्वाद


    नई दिल्ली। हरतालिका तीज हिंदू धर्म के प्रमुख व्रतों में शामिल है और सुहागिन महिलाओं के बीच इसका विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस दिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं और सुखी वैवाहिक जीवन पति की लंबी आयु तथा परिवार की सुख समृद्धि की कामना करती हैं। कुंवारी कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की कामना के लिए यह व्रत रखने की परंपरा निभाती हैं। हरतालिका तीज भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। 2026 में हरतालिका तीज को लेकर पंचांगों में स्थानीय समय के आधार पर तारीख में अंतर दिखाई दे रहा है। दिल्ली के अनुसार यह पर्व 14 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा।

    हरतालिका तीज के दिन महिलाएं प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। कई महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत भी रखती हैं। हालांकि स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर अपनी स्थिति के अनुसार व्रत रखने का निर्णय लेना उचित है। पूजा के लिए घर में साफ स्थान पर चौकी लगाकर उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाया जाता है। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा स्थापित की जाती है। पारंपरिक रूप से मिट्टी या बालू से शिव पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा करने की भी मान्यता है।

    पूजा की शुरुआत भगवान गणेश के स्मरण से की जा सकती है। इसके बाद शिवलिंग और माता पार्वती को जल अर्पित करें। भगवान शिव को बेलपत्र धतूरा फूल और जल चढ़ाने की परंपरा है जबकि माता पार्वती को श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित की जाती हैं। महिलाएं माता को सिंदूर चूड़ी बिंदी मेहंदी चुनरी और अन्य सुहाग सामग्री अर्पित कर सकती हैं। इसके बाद दीपक और धूप जलाकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि विधान से पूजा की जाती है।

    हरतालिका तीज की पूजा में व्रत कथा सुनने या पढ़ने का भी विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। मान्यता है कि माता पार्वती की सहेली उन्हें अपने साथ वन में ले गई थी ताकि उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से न हो। इसी प्रसंग से हरतालिका नाम जुड़ा माना जाता है। बाद में माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

    पूजा के दौरान महिलाएं शिव पार्वती के मंत्रों का जाप कर सकती हैं और आरती करने के बाद परिवार की सुख शांति के लिए प्रार्थना करती हैं। पूजा के अंत में हरतालिका तीज की कथा का श्रवण किया जाता है। जिन स्थानों पर सुबह पूजा संभव नहीं हो वहां प्रदोषकाल में शिव पार्वती की पूजा करने की भी मान्यता बताई गई है। दिल्ली के पंचांग में 2026 के लिए प्रातःकालीन पूजा का समय 6 बजकर 5 मिनट से 7 बजकर 6 मिनट तक बताया गया है। स्थानीय शहर के अनुसार यह समय बदल सकता है।

    हरतालिका तीज केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं बल्कि शिव और पार्वती के अटूट संबंध तथा समर्पण का प्रतीक भी माना जाता है। इस दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं नए कपड़े पहनती हैं और परिवार के साथ मिलकर पर्व मनाती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं सामूहिक रूप से तीज की कथा सुनती हैं और भजन कीर्तन करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और विधि विधान से शिव पार्वती की पूजा करने से दांपत्य जीवन में सुख शांति और प्रेम बना रहता है।

  • Plant Vastu: छत पर पौधे लगाने से पहले जान लें वास्तु के ये जरूरी नियम, सही दिशा और देखभाल से बनी रहे सकारात्मकता

    Plant Vastu: छत पर पौधे लगाने से पहले जान लें वास्तु के ये जरूरी नियम, सही दिशा और देखभाल से बनी रहे सकारात्मकता


    नई दिल्ली ।
    घर की छत को पौधों और गमलों से सजाकर खूबसूरत बनाने का चलन बढ़ा है। कई लोग छत पर अलग-अलग तरह के पौधे लगाकर उसे छोटे गार्डन का रूप देते हैं। वास्तु शास्त्र में भी पौधों को लेकर कई नियम बताए गए हैं। इनके अनुसार पौधों की दिशा, आकार, संख्या और रखरखाव का ध्यान रखना जरूरी माना जाता है। मान्यता है कि सही दिशा में लगाए गए पौधे घर के वातावरण में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि से जुड़ी ऊर्जा बनाए रखने में सहायक होते हैं।

    छत पर गमले रखने से पहले सबसे जरूरी बात उनकी दिशा को लेकर बताई गई है। वास्तु के अनुसार छोटे, हल्के और फूल वाले पौधों को पूर्व, उत्तर या उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण में रखना शुभ माना जाता है। तुलसी, गेंदा, पुदीना और अन्य औषधीय पौधों को भी इन दिशाओं में रखने की सलाह दी गई है।

    वहीं, बड़े और ऊंचे पौधों के लिए दक्षिण और पश्चिम दिशा को उपयुक्त माना गया है। भारी गमलों वाले पौधों को भी इन दिशाओं में रखने की बात कही गई है। वास्तु के अनुसार दक्षिण और पश्चिम दिशा में भारी वस्तुएं रखने से स्थिरता बनी रहने की मान्यता है और इसे नकारात्मक ऊर्जा को रोकने से भी जोड़ा जाता है।

    छत के बीच के हिस्से को लेकर भी विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। वास्तु में इस स्थान को ब्रह्मस्थान कहा जाता है और इसे खुला तथा साफ रखना बेहतर माना जाता है। इसलिए छत के बिल्कुल बीच में भारी गमला या बड़ा पौधा रखने से बचने की सलाह दी गई है।

    पौधों के चुनाव में भी सावधानी जरूरी बताई गई है। छत पर कैक्टस या दूसरे कांटेदार पौधे लगाने से बचने की सलाह दी गई है। गुलाब को इसका अपवाद बताया गया है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार कांटेदार पौधों को तनाव और नकारात्मकता से जोड़ा जाता है।

    इसके अलावा छत को जरूरत से ज्यादा गमलों से भरने से भी बचना चाहिए। बहुत अधिक संख्या में गमले रखने या भारी गमलों की भीड़ लगाने को वास्तु की दृष्टि से उचित नहीं माना गया है। पौधों के बीच पर्याप्त खुली जगह रखना बेहतर बताया गया है। इससे छत पर पौधों को व्यवस्थित रखने में भी आसानी रहती है।

    सूखे, टूटे या मुरझाए पौधों को लंबे समय तक छत पर नहीं रखना चाहिए। वास्तु शास्त्र में ऐसे पौधों को नकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इसलिए पौधों की नियमित देखभाल करने और किसी पौधे के सूखने या खराब होने पर उसे तुरंत हटाने की सलाह दी गई है।

    छत पर पौधे लगाते समय केवल वास्तु नियमों का ही नहीं, बल्कि पौधों की जरूरतों का भी ध्यान रखना जरूरी बताया गया है। ऐसे पौधों का चुनाव करना चाहिए जिन्हें पर्याप्त धूप मिल सके और जिनकी देखभाल आसानी से की जा सके। बहुत अधिक फैलने वाले या भारी होने वाले पौधों को लगाने से पहले उनकी बढ़त और छत पर पड़ने वाले भार का ध्यान रखना चाहिए। इस तरह पौधों की दिशा, संख्या, आकार और नियमित देखभाल पर ध्यान देकर छत को व्यवस्थित रखा जा सकता है।

  • गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को: जानें गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त, मूर्ति से लेकर पूजा-विधि तक पूरी जानकारी

    गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को: जानें गणपति स्थापना का शुभ मुहूर्त, मूर्ति से लेकर पूजा-विधि तक पूरी जानकारी


    नई दिल्ली। गणेश उत्सव को लेकर इस बार तारीख को लेकर लोगों के बीच असमंजस है कि गणपति की स्थापना 14 सितंबर को होगी या 15 सितंबर को। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष गणेश उत्सव की शुरुआत 14 सितंबर 2026 से होगी। इसी दिन घरों और पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। उत्सव का समापन 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी के दिन होगा और इसी दिन गणपति प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा।

    भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होने वाला यह पर्व धार्मिक आस्था में विशेष महत्व रखता है। श्रद्धालु भगवान गणेश की पूजा कर सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। घरों में गणपति को अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार 3, 5, 7 या 10 दिनों तक विराजमान रखा जाता है।

    गणपति स्थापना का शुभ समय

    14 सितंबर को भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करने के लिए सुबह 11:03 बजे से दोपहर 1:31 बजे तक का समय शुभ बताया गया है। इसी अवधि में गणपति स्थापना और पूजा की जा सकती है।

    पहली बार गणपति ला रहे हैं तो ऐसे करें तैयारी

    गणपति स्थापना से पहले घर और पूजा स्थल की अच्छी तरह सफाई कर लें। जिस जगह प्रतिमा रखनी है, वहां चौकी स्थापित करें और उस पर साफ लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाएं।

    भगवान के स्वागत के लिए घर को फूलों, पत्तियों और तोरण से सजाया जा सकता है। मुख्य द्वार पर स्वास्तिक बनाने की भी धार्मिक परंपरा है।

    कैसी प्रतिमा घर लाना शुभ माना जाता है?

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गणपति की प्रतिमा चुनते समय कुछ बातों का ध्यान रखा जाता है। मिट्टी से बनी प्रतिमा को शुभ माना जाता है और पर्यावरण की दृष्टि से भी यह बेहतर विकल्प है।

    घर में स्थापना के लिए बैठे हुए गणेश की प्रतिमा को शुभ माना जाता है। प्रतिमा की सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई हो, इसका भी ध्यान रखने की परंपरा है। पूजा स्थल के लिए घर की उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण को भी शुभ माना जाता है।

    पूजा की थाली में ये सामग्री रखें

    गणपति स्थापना से पहले पूजा की सभी सामग्री तैयार कर लेना सुविधाजनक रहेगा। इसके लिए चौकी, लाल या पीला कपड़ा, कलश, आम के पत्ते, सुपारी, अक्षत, फूल, फल, नारियल, धूप, कपूर और घी का दीपक रखें।

    भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा का विशेष महत्व माना जाता है। इसलिए पूजा सामग्री में दूर्वा जरूर रखें। इसे माला के रूप में भी गणेश जी को अर्पित किया जा सकता है।

    भोग में मोदक को विशेष रूप से शामिल किया जाता है। इसके अलावा लड्डू, फल और अन्य मिठाइयां भी अर्पित की जा सकती हैं।

    इस क्रम से करें गणपति की पूजा

    सबसे पहले पूजा स्थल पर चौकी रखकर उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। इसके बाद भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। प्रतिमा को गंगाजल से शुद्ध करने के बाद तिलक लगाएं और फूल व अक्षत अर्पित करें।

    इसके बाद धूप और दीप जलाएं। भगवान गणेश को दूर्वा, फल और मोदक या लड्डू का भोग लगाएं। अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रार्थना और गणेश जी की आरती करें। पूजा के दौरान अपनी मनोकामना भगवान के सामने रखकर सुख-शांति और समृद्धि की प्रार्थना की जा सकती है।

    गणेश जी का सरल मंत्र

    पूजा के दौरान श्रद्धालु गणेश जी के सरल मंत्र का जाप कर सकते हैं—

    ‘ॐ गं गणपतये नमः।’

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा से मंत्र जाप और पूजा करने से भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है। पूजा के बाद प्रसाद परिवार और अन्य लोगों में वितरित करें।

    कितने दिन रखें गणपति?

    घर में गणपति को कितने दिन विराजमान रखना है, यह परिवार की परंपरा, श्रद्धा और सुविधा पर निर्भर करता है। आमतौर पर 3, 5, 7 या 10 दिनों तक गणपति की स्थापना की जाती है।

    जितने दिन भगवान गणेश घर में विराजमान रहें, नियमित रूप से पूजा-अर्चना करें। इसके बाद शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से विसर्जन किया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, विसर्जन के दौरान अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना की जाती है।

  • नेपाल में बाढ़ के बाद राहत अभियान तेज, अमेरिका ने 50 लाख डॉलर से ज्यादा की मदद दी, मृतकों की पहचान में FBI जुटी

    नेपाल में बाढ़ के बाद राहत अभियान तेज, अमेरिका ने 50 लाख डॉलर से ज्यादा की मदद दी, मृतकों की पहचान में FBI जुटी


    वॉशिंगटन। नेपाल में बाढ़ की तबाही के बाद राहत के साथ-साथ मृतकों की पहचान का काम भी चुनौती बना हुआ है। इस मुश्किल घड़ी में अमेरिका ने नेपाल के राहत अभियान में अपनी मदद बढ़ा दी है। अमेरिकी विदेश विभाग ने नेपाल पुलिस को फोरेंसिक जांच के लिए 10 लाख डॉलर की अतिरिक्त सहायता मंजूर की है। इस राशि से डीएनए किट और दूसरी जरूरी फोरेंसिक सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी। अमेरिका की ओर से नेपाल को अब तक मानवीय, स्वास्थ्य और फोरेंसिक सहायता के रूप में 50 लाख डॉलर से ज्यादा दिए जा चुके हैं।

    आपदा के बाद राहत सामग्री उन इलाकों तक पहुंचाना भी बड़ी चुनौती है, जहां बाढ़ के कारण संपर्क टूट गया है। अमेरिका ने इसके लिए भोजन से लेकर परिवहन और लॉजिस्टिक्स तक की व्यवस्था में सहयोग दिया है।

    10 हजार परिवारों को तीन महीने तक भोजन

    विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) के जरिए अमेरिका ने 30 लाख डॉलर की मदद उपलब्ध कराई है। इस सहायता से बाढ़ प्रभावित 10,000 परिवारों को तीन महीने तक आपातकालीन खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी।

    दूरदराज और संपर्कविहीन इलाकों में राहत पहुंचाने के लिए हवाई और जमीनी परिवहन का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य प्रभावित लोगों तक मानवीय सहायता की सप्लाई बनाए रखना है।

    घर उजड़े तो अमेरिका ने भेजी जरूरी सामग्री

    कैथोलिक रिलीफ सर्विसेज (CRS) के माध्यम से 6,85,000 डॉलर की सहायता दी गई है। इससे प्रभावित परिवारों को भोजन, अस्थायी आश्रय, साफ पानी, स्वच्छता और सुरक्षा से जुड़ी मदद दी जा रही है। राहत सामग्री में कंबल, प्लास्टिक शीटिंग, टेंट, सोलर लाइट और डिग्निटी किट शामिल हैं।

    बाढ़ प्रभावित बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ‘चाइल्ड फ्रेंडली’ स्थान भी बनाए जा रहे हैं, ताकि उन्हें आपदा के बाद सुरक्षित माहौल मिल सके।

    स्वास्थ्य और पोषण पर भी फोकस

    स्वास्थ्य सेवाओं को बनाए रखने के लिए झपीगो (Jhpiego), एफएचआई-360 और यूनिसेफ के जरिए 3,65,000 डॉलर की सहायता दी गई है। यह राशि स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता संबंधी जरूरतों पर खर्च की जा रही है।

    DNA से होगी शवों की पहचान

    बाढ़ में जान गंवाने वाले लोगों की पहचान के लिए अमेरिका ने फोरेंसिक विशेषज्ञता भी उपलब्ध कराई है। FBI के विशेषज्ञ नेपाल पुलिस के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। डीएनए समेत दूसरी फोरेंसिक तकनीकों के जरिए पीड़ितों की पहचान की जा रही है।

    इसका एक अहम उद्देश्य उन अमेरिकी नागरिकों के परिजनों को भी जानकारी उपलब्ध कराना है, जो आपदा के बाद अपने परिवार के सदस्यों के बारे में जानकारी का इंतजार कर रहे हैं।

    खोज-बचाव के लिए अमेरिकी सेना ने दिया उपकरण

    नेपाल के नेतृत्व में चल रहे खोज, बचाव और राहत अभियानों में अमेरिकी सेना भी संसाधनों के साथ सहयोग कर रही है। सेना ने 5,000 विशेष आपदा पीड़ित रिकवरी सामग्री, 500 फर्स्ट एड किट, स्ट्रेचर और फ्रंट-एंड लोडर उपलब्ध कराए हैं।

    जमीन पर चार सदस्यीय अमेरिकी सैन्य सिविल अफेयर्स टीम भी मौजूद है। यह टीम मानवीय सहायता और आपदा राहत से जुड़ी परियोजनाओं में सहयोग कर रही है।

    अमेरिका ने संकेत दिया है कि नेपाल में हालात और राहत की जरूरत का आकलन करते हुए आगे भी सहायता बढ़ाई जा सकती है। प्रभावित क्षेत्रों में अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी जा रही है।

  • सऊदी अरब में हूतियों का बड़ा हमला: शरूराह के सैन्य ठिकाने पर बरसाए मिसाइल-ड्रोन

    सऊदी अरब में हूतियों का बड़ा हमला: शरूराह के सैन्य ठिकाने पर बरसाए मिसाइल-ड्रोन


    नई दिल्ली। मिडिल-ईस्ट में तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है। यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के शरूराह में एक सैन्य ठिकाने पर मिसाइल और ड्रोन से बड़ा हमला करने का दावा किया है। हूती सैन्य प्रवक्ता याहिया सारी ने टेलीग्राम पर बयान जारी कर कहा कि हमले में सैन्य अड्डे के हथियार डिपो और कमांड-एंड-कंट्रोल रूम को निशाना बनाया गया।

    याहिया सारी के मुताबिक, हमले में बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन इस्तेमाल किए गए और सभी निर्धारित लक्ष्यों को निशाना बनाया गया। उन्होंने इसे यमन के खिलाफ सऊदी अरब की कथित लगातार आक्रामक कार्रवाई का जवाब बताया। हूती प्रवक्ता ने चेतावनी दी कि यदि सऊदी हमले जारी रहते हैं तो आने वाले दिनों में सऊदी अरब के अंदरूनी इलाकों को भी निशाना बनाया जा सकता है।

    जीजान में प्रोजेक्टाइल गिरने से दो घायल

    हूती हमले से नुकसान की पुष्टि सऊदी अरब की नागरिक सुरक्षा ने भी की है। सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, यमन की ओर से दागा गया एक प्रोजेक्टाइल जीजान में गिरा, जिससे दो लोग घायल हुए हैं।

    प्रोजेक्टाइल गिरने से एक स्थानीय मस्जिद, कई रिहायशी इमारतों और कुछ वाहनों को भी नुकसान पहुंचा है। हालांकि, शरूराह के सैन्य ठिकाने पर हुए कथित हमले में कितना नुकसान हुआ, इसकी स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।

    मयून द्वीप पर कब्जे का भी दावा

    इससे पहले हूतियों ने लाल सागर के प्रवेश द्वार बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में स्थित मयून द्वीप (पेरिम) पर कब्जा करने का दावा किया था। इसके बाद मोखा बंदरगाह शहर से जुड़े घटनाक्रम को लेकर क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया। हूतियों के मुताबिक, सऊदी अरब ने इसके जवाब में मोखा एयरपोर्ट पर कई हमले किए।

    हूतियों ने दावा किया था कि लाल सागर में तेल और गैस टैंकरों की आवाजाही के लिहाज से अहम इस क्षेत्र पर नियंत्रण के जरिए वे और ईरान अमेरिका पर वैश्विक ऊर्जा कीमतें बढ़ाने का दबाव बनाना चाहते हैं।

    हालांकि, इन दावों और सैन्य ठिकाने को हुए नुकसान की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। क्षेत्र में जारी संघर्ष के बीच हूतियों और सऊदी अरब, दोनों पक्षों के बयानों को अलग-अलग स्रोतों से सत्यापित किया जाना बाकी है।

  • रविवार को भूलकर भी न करें ये गलतियां घर की खुशहाली के लिए अपनाएं ये आसान वास्तु उपाय

    रविवार को भूलकर भी न करें ये गलतियां घर की खुशहाली के लिए अपनाएं ये आसान वास्तु उपाय


    नई दिल्ली। रविवार का दिन सूर्य देव को समर्पित माना जाता है और धार्मिक मान्यताओं में सूर्य को ऊर्जा आत्मविश्वास मान सम्मान और सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसी वजह से रविवार के दिन पूजा पाठ के साथ घर की साफ सफाई और वास्तु से जुड़े कुछ आसान उपाय करने की परंपरा भी रही है। वास्तु शास्त्र में माना जाता है कि घर का वातावरण व्यवस्थित और स्वच्छ रहने से सकारात्मक माहौल बना रहता है। रविवार को किए जाने वाले कुछ छोटे उपाय इसी सोच से जुड़े हुए हैं। हालांकि इन उपायों को धार्मिक और पारंपरिक मान्यता के रूप में ही देखना चाहिए।

    रविवार की सुबह सबसे पहले घर की साफ सफाई पर ध्यान देना अच्छा माना जाता है। घर में लंबे समय से पड़े अनुपयोगी सामान को हटाने से जगह व्यवस्थित रहती है। वास्तु मान्यताओं में भी टूटे फूटे और बेकार सामान को घर में जमा करके रखने से बचने की सलाह दी जाती है। हालिया वास्तु सलाहों में भी घर को साफ रखने और अनुपयोगी वस्तुओं को हटाने पर जोर दिया गया है।

    रविवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद सूर्य देव को जल अर्पित करने की परंपरा है। मान्यता है कि तांबे के पात्र में जल लेकर सूर्य को अर्घ्य देने और मन में सकारात्मक विचार रखने से आत्मविश्वास बढ़ता है। कई धार्मिक परंपराओं में रविवार को सूर्य उपासना के लिए विशेष दिन माना गया है। ऐसे में सुबह का समय पूजा और ध्यान के लिए उपयोग किया जा सकता है।

    घर के मुख्य द्वार की सफाई पर भी रविवार को विशेष ध्यान दिया जा सकता है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार मुख्य द्वार को घर में ऊर्जा के प्रवेश का महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। इसलिए दरवाजे के आसपास गंदगी कबाड़ या अनावश्यक सामान नहीं रखना चाहिए। मुख्य द्वार साफ और व्यवस्थित रखने से घर का वातावरण भी बेहतर नजर आता है। रविवार की सुबह यहां दीपक जलाने की परंपरा भी कई घरों में देखने को मिलती है।

    पूजा स्थान को साफ रखना भी रविवार के आसान उपायों में शामिल किया जा सकता है। मंदिर में जमा धूल और पुराने फूल हटाकर भगवान की प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार घी का दीपक जलाना शुभ माना जाता है। इससे घर में पूजा का सकारात्मक वातावरण बनता है और परिवार के लोगों को भी कुछ समय ध्यान और प्रार्थना के लिए मिल सकता है।

    रविवार के दिन घर में टूटे हुए शीशे और खराब सजावटी सामान को हटाना भी बेहतर माना जाता है। वास्तु संबंधी मान्यताओं में टूटे शीशे को शुभ नहीं माना जाता और शीशे को साफ तथा सही स्थिति में रखने की सलाह दी जाती है। उत्तर और पूर्व दिशा में शीशे को शुभ मानने की परंपरा है जबकि मुख्य दरवाजे के ठीक सामने शीशा लगाने से बचने की सलाह दी जाती है।

    इसके अलावा घर में पौधे रखना भी सकारात्मक वातावरण बनाने का एक सरल तरीका माना जाता है। तुलसी जैसे पौधों को धार्मिक रूप से विशेष महत्व दिया जाता है जबकि मनी प्लांट और अन्य इनडोर पौधों को वास्तु में समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा से जोड़ा जाता है। पौधों की नियमित देखभाल और घर में हरियाली बनाए रखने से वातावरण भी बेहतर महसूस हो सकता है।

    रविवार का दिन केवल उपाय करने के लिए ही नहीं बल्कि पूरे सप्ताह की शुरुआत को व्यवस्थित करने का अवसर भी है। घर की सफाई पूजा स्थान की व्यवस्था मुख्य द्वार की स्वच्छता और सकारात्मक सोच जैसे छोटे कदम परिवार के वातावरण को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। धार्मिक आस्था रखने वाले लोग सूर्य देव की उपासना और जरूरतमंद व्यक्ति की मदद को भी रविवार की दिनचर्या का हिस्सा बना सकते हैं। इस तरह रविवार को की गई छोटी शुरुआत पूरे सप्ताह के लिए सकारात्मक सोच और अनुशासन का आधार बन सकती है।