चाणक्य नीति के अनुसार, जल्दबाजी में लिया गया फैसला किसी भी दृष्टिकोण से अच्छा नहीं है. यह नियम संवाद में भी लागू होता है. आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जल्दबाजी में जुबान से निकली हुई बातें हर वक्त सही नहीं होतीं. इसलिए, बोलने से पहले उसके संभावित परिणाम पर भी विचार कर लेना चाहिए. चाणक्य सलाह देते हैं कि व्यक्ति को कभी भी सोच-समझकर की बोलना चाहिए.
आचार्य चाणक्य का मानना है कि इंसान को बोलचाल में आसान भाषा का प्रयोग करना चाहिए, ताकि सामने वाला भी आसानी से समझ सके. चाणक्य नीति के मुताबिक, अगर संवाद में आसान भाषा का प्रयोग किया जाता है, तो सामने वाला उसे आसानी से समझ जाता है. इन्हीं वजहों से शिक्षक, सफल वक्ता और दिग्गज नेता संवाद के क्रम में आसान भाषा का प्रयोग करते हैं.
चाणक्य नीति में आचार्य ने बताया है कि इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसका आत्मविश्वास होता है. अगर कोई व्यक्ति अपनी बात रखते वक्त झिझकता है, तो सामने वाला उसकी बातों को हल्के में लेकर टाल देता है. जबकि, अगर कोई व्यक्ति किसी बात को आत्मविश्वास के साथ रखता है, तो सामने वाला ना चाहते हुए भी उसकी बातों पर ध्यान देता है.चाणक्य की सलाह है कि आत्मविश्वास हमेशा मजबूत रखना चाहिए.
आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति में कहा है कि व्यक्ति को संवाद में समझदारी भी रखना चाहिए, क्योंकि हर बार हर समय पर कहना उचित नहीं है. किसी भी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए उचित समय का इंतजार करना चाहिए. इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जिस बात को कहना है, उसके लिए माहौल सही है या नहीं. चाणक्य नीति कहती है कि अगर कोई व्यक्ति कोई बड़ी गलती भी करे तो उसे सार्वजनिक रूप से कहने के बजाए, व्यक्तिगत रूप से कहना उचित है. ऐसा करने से गलती करने वाले के मन पर भी नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता.
चाणक्य ने अपनी नीति में स्पष्ट तौर पर कहा है कि कठोर शब्दों का इस्तेमाल करते हुए सामने वाले को कुछ समय से लिए भयभीत किया जा सकता है लेकिन सम्मान प्राप्त नहीं किया जा सकता. इसलिए, चाणक्य प्रत्येक मनुष्य को यह सलाद देते हैं कि किसी भी बात को विनम्रता से रखना चाहिए. विनम्रतापूर्वक रखी गई बातों का सामने वालों के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है. विनम्रता से व्यक्तित्व में निखार आता है. ऐसा करने वाला इंसान लाखों की भीड़ में भी अपनी पहचान बनाता है और सम्मान पाता है.









