Blog

  • केएल राहुल के साथ नाइंसाफी पर श्रीकांत का बड़ा हमला बोले बार बार प्रयोग से विश्व कप की तैयारी पर उठे सवाल

    केएल राहुल के साथ नाइंसाफी पर श्रीकांत का बड़ा हमला बोले बार बार प्रयोग से विश्व कप की तैयारी पर उठे सवाल


    नई दिल्ली । इंग्लैंड के खिलाफ वनडे सीरीज में मिली हार के बाद भारतीय क्रिकेट टीम की रणनीति और टीम चयन पर बहस तेज हो गई है। पूर्व भारतीय कप्तान कृष्णमाचारी श्रीकांत ने हेड कोच गौतम गंभीर और टीम मैनेजमेंट के फैसलों पर खुलकर सवाल उठाते हुए जवाबदेही तय करने की मांग की है। उनका कहना है कि मजबूत टीमों के खिलाफ लगातार निराशाजनक प्रदर्शन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और केवल कमजोर टीमों पर जीत हासिल कर संतुष्ट होना भारतीय क्रिकेट के लिए सही संकेत नहीं है।

    श्रीकांत ने कहा कि भारतीय टीम को आयरलैंड टी20 सीरीज इंग्लैंड टी20 सीरीज और इंग्लैंड के खिलाफ वनडे सीरीज में उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। ऐसे में टीम प्रबंधन को अपनी रणनीति की समीक्षा करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि भारत जिम्बाब्वे श्रीलंका या वेस्टइंडीज जैसी टीमों के खिलाफ जीत दर्ज करता है तो उसे बड़ी उपलब्धि नहीं माना जाना चाहिए। असली पैमाना यह होना चाहिए कि टीम ऑस्ट्रेलिया इंग्लैंड और अन्य मजबूत देशों के खिलाफ कैसा प्रदर्शन करती है।

    पूर्व सलामी बल्लेबाज ने 2027 वनडे विश्व कप की तैयारियों पर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि विश्व कप से पहले बहुत कम वनडे मुकाबले बचे हैं इसलिए लगातार प्रयोग करना टीम के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि बार बार प्लेइंग इलेवन बदलने से खिलाड़ियों का आत्मविश्वास प्रभावित होता है और टीम का संतुलन भी बिगड़ता है। चोटिल खिलाड़ियों की बढ़ती संख्या भी टीम के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

    श्रीकांत ने विशेष रूप से केएल राहुल के बल्लेबाजी क्रम पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि लक्ष्य का पीछा करते समय राहुल जैसे अनुभवी बल्लेबाज को निचले क्रम में भेजना समझ से परे है। उन्होंने कहा कि राहुल कई बार दबाव की परिस्थितियों में भारत को जीत दिला चुके हैं और उन्हें विराट कोहली के साथ शुरुआती चरण में बल्लेबाजी के लिए भेजा जाना चाहिए था। जब रन गति पूरी तरह हाथ से निकल चुकी थी तब उन्हें बल्लेबाजी के लिए भेजना उनके साथ अन्याय जैसा था।

    उन्होंने यह भी कहा कि टीम मैनेजमेंट लगातार खिलाड़ियों की भूमिका बदल रहा है जिससे उनकी लय प्रभावित हो रही है। श्रीकांत के अनुसार राहुल की बॉडी लैंग्वेज भी मैच के दौरान आत्मविश्वास से भरी नजर नहीं आई। उनका मानना है कि यदि राहुल चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करते तो वह विराट कोहली के साथ बड़ी साझेदारी बनाकर मैच को अंत तक ले जा सकते थे जैसा उन्होंने 2023 विश्व कप में कई मौकों पर किया था।

    पूर्व कप्तान ने यह भी कहा कि भारतीय टीम को विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट को ध्यान में रखते हुए अब स्थिर संयोजन तैयार करना चाहिए। लगातार बदलाव और प्रयोग की नीति से टीम को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है। उनका मानना है कि टीम प्रबंधन को खिलाड़ियों की स्पष्ट भूमिकाएं तय करनी होंगी ताकि बड़े मुकाबलों में बेहतर प्रदर्शन किया जा सके।

    भारतीय टीम की हालिया हार के बाद श्रीकांत के ये बयान क्रिकेट जगत में नई बहस छेड़ सकते हैं। अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि आने वाली सीरीज में टीम मैनेजमेंट अपनी रणनीति में कोई बदलाव करता है या नहीं।

  • भारतीय सिनेमा की प्रतिभावान अभिनेत्री स्मिता पाटिल की अंतिम घड़ियों का दर्दनाक सच: गंभीर संक्रमण और असमय चिकित्सा ने छीना दिग्गज कलाकार

    भारतीय सिनेमा की प्रतिभावान अभिनेत्री स्मिता पाटिल की अंतिम घड़ियों का दर्दनाक सच: गंभीर संक्रमण और असमय चिकित्सा ने छीना दिग्गज कलाकार

    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा की सबसे प्रभावशाली और प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों में शुमार स्मिता पाटिल के असमय निधन की कहानी आज भी कला जगत को झकझोर देती है। समानांतर और व्यावसायिक सिनेमा दोनों में अपनी सशक्त अदाकारी की छाप छोड़ने वाली इस महान अभिनेत्री की जीवन यात्रा बेहद दर्दनाक परिस्थितियों में समाप्त हुई थी। वर्ष 1986 में अपने पहले बच्चे के जन्म के ठीक दो सप्ताह बाद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उनका निधन हो गया था। प्रसव के बाद शरीर में फैले घातक संक्रमण और सही समय पर चिकित्सीय सलाह न लेने की वजह से उनकी स्थिति बेहद नाजुक हो गई थी।

    पुत्र के जन्म के बाद परिवार में खुशियों का माहौल था, लेकिन प्रसवोत्तर संक्रमण ने अभिनेत्री को अपनी चपेट में ले लिया था। शुरुआती दौर में स्वास्थ्य में आ रही गिरावट को सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज किया गया, जिससे संक्रमण धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैलता चला गया। स्थानीय चिकित्सकों द्वारा प्राथमिक उपचार और ड्रिप दिए जाने के बावजूद उनके शरीर का तापमान लगातार बढ़ता रहा। अपने नवजात शिशु के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण वे अस्पताल जाने से बचती रहीं, जिससे स्थिति लगातार नियंत्रण से बाहर होती चली गई।

    निधन वाले दिन अभिनेत्री की स्थिति में अचानक भारी गिरावट दर्ज की गई। शाम के समय उनका चेहरा पीला पड़ने लगा और उन्हें लगातार खून की उल्टियां होने लगीं। गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें तत्काल मुंबई के जसलोक अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक वे कोमा की स्थिति में जा चुकी थीं। विशेषज्ञों की टीम ने उन्हें बचाने के भरसक प्रयास किए और स्थिति को संभालने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के डॉक्टरों से भी संपर्क साधने की कोशिशें की गईं, परंतु संक्रमण मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों तक फैल चुका था।

    अस्पताल में भर्ती कराए जाने के कुछ ही घंटों भीतर आंतरिक रक्तस्राव और अंगों के काम न करने की वजह से स्थिति पूरी तरह से बिगड़ गई। अंततः देर रात चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। केवल इकत्तीस वर्ष की आयु में स्मिता पाटिल का इस तरह अचानक चले जाना संपूर्ण भारतीय फिल्म उद्योग के लिए एक कभी न पूरा होने वाला घाटा था। उनके निधन के बाद उनके नवजात शिशु का पालन-पोषण उनके माता-पिता द्वारा किया गया, जबकि भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को आज भी अत्यंत सम्मान के साथ याद किया जाता है।

  • पूजा में नैवेद्य अर्पित करने की सही विधि: बीज वाले फलों के भोग से जुड़े नियम और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

    पूजा में नैवेद्य अर्पित करने की सही विधि: बीज वाले फलों के भोग से जुड़े नियम और ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

    नई दिल्ली। सनातन धर्म और हिंदू धार्मिक मान्यताओं में पूजा-पाठ के दौरान देवी-देवताओं को नैवेद्य यानी भोग अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार बिना भोग लगाए कोई भी पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती है। ईश्वर को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार मिठाई, खीर और विभिन्न प्रकार के ताजे फलों का अर्पण करते हैं। हालांकि, पूजा में फलों के चुनाव और उन्हें अर्पित करने के सही तरीकों को लेकर अक्सर श्रद्धालुओं के मन में संशय रहता है। विशेषकर बीज वाले फलों को भगवान के समक्ष चढ़ाने के नियमों को लेकर धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान किया गया है।

    धार्मिक विद्वानों और शास्त्रों के अनुसार पूजा-पाठ में फलों का अर्पण अत्यंत सात्विक और उत्तम माना जाता है। मौसम के अनुसार उपलब्ध ताजे फलों का भोग लगाने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। जहां तक बीज वाले फलों का प्रश्न है, तो ऐसे फलों को भगवान को अर्पित किया जा सकता है, परंतु इसके लिए एक निश्चित विधि का पालन करना आवश्यक है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति स्वयं भोजन ग्रहण करते समय या बच्चों को फल देते समय बीज अलग करता है, उसी प्रकार पूर्ण श्रद्धा और भाव के साथ भगवान को भी बीज निकालकर ही फल अर्पित करने चाहिए।

    भोग लगाने की विधि में शुद्धता और भाव का सबसे अधिक महत्व होता है। बड़े या अधिक बीज वाले फल जैसे आम, तरबूज या अन्य मौसमी फलों का भोग लगाते समय पहले उन्हें अच्छी तरह स्वच्छ जल से धोना चाहिए। इसके बाद पूजा के समय ही उन्हें काटकर उनके बीजों को अलग कर देना चाहिए। पहले से काटकर रखे गए बासी या दूषित फलों को पूजा में चढ़ाना वर्जित माना गया है। इसके अलावा, भगवान विष्णु या उनके अवतारों को भोग अर्पित करते समय उसमें तुलसी का पत्ता रखना अत्यंत शुभ और अनिवार्य माना जाता है।

    पूजा-पाठ में नैवेद्य अर्पित करते समय भक्त के मन का भाव पूरी तरह से निष्काम और अहंकार रहित होना चाहिए। शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है कि भोग केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति समर्पण और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। इसलिए सही नियमों का पालन करते हुए, स्वच्छता और मर्यादा के साथ अर्पित किया गया साधारण सा भोग भी भगवान सहर्ष स्वीकार करते हैं और साधक पर अपनी कृपा बरसाते हैं।

  • सह-राष्ट्रपति पत्नी के साथ मिलकर ओर्टेगा ने खत्म की चुनावी प्रक्रिया, अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारी चिंता..

    सह-राष्ट्रपति पत्नी के साथ मिलकर ओर्टेगा ने खत्म की चुनावी प्रक्रिया, अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारी चिंता..

    नई दिल्ली। मध्य अमेरिकी देश निकारागुआ के राजनीतिक घटनाक्रम ने वैश्विक स्तर पर हलचल मचा दी है। वर्ष 2007 से लगातार सत्ता पर काबिज राष्ट्रपति डैनियल ओर्टेगा ने देश में भविष्य में किसी भी प्रकार के चुनाव न कराने का एकतरफा ऐलान कर दिया है। इस अप्रत्याशित घोषणा के बाद देश में अगले वर्ष कार्यकाल समाप्त होने पर होने वाली चुनावी प्रक्रिया और किसी भी तरह की राजनीतिक चुनौती की संभावना पूरी तरह समाप्त हो गई है। इस निर्णय से ओर्टेगा और उनकी पत्नी सह-राष्ट्रपति रोसारियो मुरिलो का शासन पर एकछत्र नियंत्रण और अधिक मजबूत हो गया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठनों में भारी चिंता व्याप्त है।

    सैंडिनिस्टा क्रांति की वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित एक समारोह के दौरान दो महीने बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से सामने आते हुए ओर्टेगा ने अपने फैसले को स्पष्ट किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि अब देश में सरकार या सत्ता पर कब्जा करने के उद्देश्य से कोई चुनाव आयोजित नहीं किए जाएंगे। उन्होंने विदेशी ताकतों और विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि पुरानी व्यवस्था के समर्थक दलों के सत्ता में लौटने के दरवाजे अब पूरी तरह से बंद हो चुके हैं। इस ऐलान के साथ ही ओर्टेगा ने देश के विपक्षी राजनीतिक दलों के अस्तित्व और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लगभग समाप्त कर दिया है।

    निकारागुआ का राजनीतिक परिदृश्य पिछले कई वर्षों से लगातार विवादों और मानवाधिकार उल्लंघनों के घेरे में रहा है। वर्ष 2021 में हुए पिछले राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी ओर्टेगा प्रशासन पर प्रमुख विपक्षी नेताओं, उद्योगपतियों और आलोचकों को हिरासत में लेने के गंभीर आरोप लगे थे। इसके बाद हाल के वर्षों में किए गए संवैधानिक संशोधनों के जरिए राष्ट्रपति का कार्यकाल बढ़ाने के साथ-साथ ओर्टेगा की पत्नी को सह-राष्ट्रपति का आधिकारिक पद प्रदान किया गया था। वर्तमान में यह दंपति देश के सशस्त्र बलों, न्यायपालिका और संपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण रखता है।

    संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद सहित कई अंतरराष्ट्रीय निकायों ने निकारागुआ सरकार की कार्यशैली पर कड़ा ऐतराज जताया है। वैश्विक संगठनों का मानना है कि देश को पूर्णतः एक दमनकारी शासन तंत्र में बदल दिया गया है, जहां नागरिक स्वतंत्रताओं और मानवाधिकारों का लगातार उल्लंघन हो रहा है। वर्ष 2018 के भीषण सरकार-विरोधी प्रदर्शनों के बाद से ही निकारागुआ में राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। चुनाव रद्द करने के इस ताजा ऐलान ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है, जिसकी चौतरफा आलोचना की जा रही है।

  • दुनिया में एयर एंबुलेंस के दौर में पाकिस्तान की पुरानी योजना पर छिड़ी नई बहस..

    दुनिया में एयर एंबुलेंस के दौर में पाकिस्तान की पुरानी योजना पर छिड़ी नई बहस..


    नई दिल्ली।
    सोशल मीडिया के विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर इन दिनों पाकिस्तान के कराची शहर से जुड़ा एक वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहा है। इस वीडियो में बुनियादी मेडिकल किट से लैस साइकिल एंबुलेंस व्यवस्था को दिखाया गया है, जिसे लेकर इंटरनेट पर विविध प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। आधुनिक दौर में जहां विश्व स्तर पर एयर एंबुलेंस और ड्रोन आधारित आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हो रहा है, वहीं इस तरह की पहल को लेकर कई यूजर्स पाकिस्तान की वर्तमान स्वास्थ्य प्रणाली और बुनियादी ढांचे पर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि, इस वायरल वीडियो के पीछे का वास्तविक संदर्भ और उद्देश्य काफी अलग है।

    यह वायरल सामग्री कोई नई नीति या हालिया लॉन्च नहीं है, बल्कि मई 2025 में पाकिस्तान की आपातकालीन सेवा ‘रेस्क्यू 1122’ द्वारा शुरू की गई एक पुरानी प्रायोगिक परियोजना का हिस्सा है। कराची जैसे घने और अत्यधिक आबादी वाले महानगर में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां अत्यंत संकरी गलियां हैं और अक्सर भारी ट्रैफिक जाम की स्थिति बनी रहती है। ऐसे इलाकों में आपात स्थिति के दौरान पारंपरिक बड़े एंबुलेंस वाहनों का समय पर पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। इसी भौगोलिक और यातायात संबंधी बाधा को दूर करने के लिए इस वैकल्पिक त्वरित प्रतिक्रिया मॉडल को तैयार किया गया था।

    तकनीकी रूप से यह साइकिल केवल एक सामान्य सवारी साधन नहीं है, बल्कि इसे आपातकालीन प्राथमिक उपचार के अनुकूल विशेष रूप से तैयार किया गया है। इसमें ऑक्सीजन मास्क, नेबुलाइजर, ब्लड शुगर जांचने के उपकरण, प्राथमिक चिकित्सा किट और अन्य जरूरी जीवनरक्षक दवाएं रखी जाती हैं। प्रशिक्षित स्वयंसेवक, जिनमें विशेष रूप से प्रशिक्षित महिला कार्यकर्ता भी शामिल हैं, भीड़भाड़ वाले मार्गों से आसानी से निकलकर मरीज तक त्वरित पहुंच बनाते हैं। इनका मुख्य कार्य मुख्य एंबुलेंस के आगमन तक मरीज को शुरुआती महत्वपूर्ण मिनटों में प्राथमिक चिकित्सा प्रदान कर स्थिति को स्थिर बनाए रखना है।

    वैश्विक स्तर पर भी देखें तो कई विकसित और विकासशील देशों के पुराने शहरों तथा सघन शहरी क्षेत्रों में साइकिल या मोटरसाइकिल आधारित प्रथम प्रतिक्रिया टीमों का उपयोग एक स्थापित मानक प्रक्रिया के रूप में किया जाता है। कराची की यह व्यवस्था सामान्य एंबुलेंस सेवा का विकल्प न होकर, केवल एक सहायक आपातकालीन प्रणाली है। सोशल मीडिया पर बिना पूरे संदर्भ के शुरू हुई इस बहस के बाद अब कई विश्लेषकों का मानना है कि शहरी यातायात की जटिलताओं को देखते हुए स्थानीय स्तर पर जान बचाने के लिए उठाए गए व्यावहारिक कदमों को केवल व्यंग्य के दृष्टिकोण से देखना उचित नहीं है।

  • महाभारत से जुड़ी थी टाइम मशीन की कहानी करण जौहर की एक पेशकश के बाद ठंडे बस्ते में चली गई फिल्म

    महाभारत से जुड़ी थी टाइम मशीन की कहानी करण जौहर की एक पेशकश के बाद ठंडे बस्ते में चली गई फिल्म


    नई दिल्ली । फिल्म निर्माता और लेखक करण राजदान ने बॉलीवुड की सबसे चर्चित लेकिन अधूरी रह गई फिल्मों में शामिल टाइम मशीन को लेकर बड़ा खुलासा किया है। यह फिल्म निर्देशक शेखर कपूर के निर्देशन में बननी थी जिसमें आमिर खान और जूही चावला मुख्य भूमिकाओं में नजर आने वाले थे। विज्ञान कल्पना और भारतीय पौराणिक इतिहास को जोड़ने वाली इस फिल्म को उस दौर का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट माना जा रहा था लेकिन कई कारणों से यह फिल्म कभी पर्दे तक नहीं पहुंच सकी।

    करण राजदान ने बताया कि टाइम मशीन की कहानी आमिर खान के किरदार पर आधारित थी जो गलती से एक ऐसी मशीन के जरिए अतीत में पहुंच जाता है जहां महाभारत का युद्ध चल रहा होता है। वहां उसकी मुलाकात भगवान कृष्ण से होती है और वह इतिहास के सबसे बड़े युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी बन जाता है। इस अनोखे विचार ने शुरुआत में पूरी टीम को बेहद उत्साहित कर दिया था।

    उन्होंने बताया कि इस कहानी की प्रेरणा उन्हें और शेखर कपूर को अपने निजी जीवन की एक भावुक घटना से मिली थी। दोनों ने कम समय के अंतराल में अपने माता पिता को खो दिया था और अक्सर यह सोचते थे कि काश समय में पीछे जाकर उनसे एक बार फिर मिल पाते। इसी भावना ने टाइम मशीन की कहानी को जन्म दिया। केवल तीन महीने में पूरी कहानी पटकथा और संवाद तैयार कर लिए गए थे।

    शेखर कपूर इस प्रोजेक्ट को लेकर इतने उत्साहित थे कि उन्होंने संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल और गीतकार आनंद बख्शी को भी इससे जोड़ लिया था। आमिर खान परेश रावल और अन्य कलाकारों को भी कहानी सुनाई गई और सभी ने इसकी कल्पना और विषय की सराहना की। उस समय यह फिल्म भारतीय सिनेमा में तकनीकी और कहानी के स्तर पर बड़ा बदलाव ला सकती थी।

    करण राजदान ने यह भी खुलासा किया कि कई बड़े निर्माता इस फिल्म को बनाना चाहते थे। उन्होंने धर्मा प्रोडक्शंस के प्रमुख करण जौहर को भी स्क्रिप्ट भेजी थी लेकिन उन्हें स्क्रिप्ट के बदले केवल पच्चीस लाख रुपये की पेशकश की गई। राजदान के मुताबिक उन्हें लगा कि इतनी बड़ी और अनोखी कहानी की यह कीमत बेहद कम थी इसलिए बात आगे नहीं बढ़ सकी। बाद में निर्माता फिरोज नाडियाडवाला ने भी इस प्रोजेक्ट को दोबारा शुरू करने की कोशिश की लेकिन निर्देशन को लेकर सहमति नहीं बन पाई। राजकुमार संतोषी का नाम भी सामने आया लेकिन राजदान का मानना था कि यह उनकी शैली की फिल्म नहीं थी।

    आज जब भारतीय सिनेमा में विज्ञान कल्पना और पौराणिक कथाओं पर आधारित बड़े बजट की फिल्में बन रही हैं तब टाइम मशीन का अधूरा रह जाना एक बड़ी चूक माना जाता है। यदि यह फिल्म अपने समय में बन जाती तो संभव है कि भारतीय सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में इसका नाम शामिल होता। वर्षों बाद सामने आए इन खुलासों ने एक बार फिर इस अधूरे ड्रीम प्रोजेक्ट को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

    English Tags:
    #TimeMachine #AamirKhan #JuhiChawla #ShekharKapur #BollywoodNews

  • विदेशी सरजमीं पर लगातार सीरीज गंवाने के बाद बैकफुट पर भारतीय क्रिकेट टीम: 'ऑल इज वेल' के दावे के बीच बोर्ड और मुख्य कोच के फैसलों पर तीखी बहस

    विदेशी सरजमीं पर लगातार सीरीज गंवाने के बाद बैकफुट पर भारतीय क्रिकेट टीम: 'ऑल इज वेल' के दावे के बीच बोर्ड और मुख्य कोच के फैसलों पर तीखी बहस


    नई दिल्ली।
    विदेशी सरजमीं पर भारतीय क्रिकेट टीम के हालिया निराशाजनक प्रदर्शन ने खेल प्रेमियों और खेल विश्लेषकों को चिंता में डाल दिया है। आयरलैंड के खिलाफ मिली झटकों भरी हार के बाद इंग्लैंड दौरे पर भी टी20 और वनडे सीरीज में भारतीय टीम को पराजय का सामना करना पड़ा है। लगातार मिल रही असफलताओं के बावजूद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई का रवैया बेहद शांत नजर आ रहा है। बोर्ड की ओर से दिए जा रहे ‘ऑल इज वेल’ के बयानों पर अब सवाल उठने लगे हैं कि आखिर टीम प्रबंधन और मुख्य कोच से इस हार का हिसाब कब मांगा जाएगा।

    भारतीय टीम का हालिया विदेशी दौरा कई मोर्चों पर कमजोरियों को उजागर कर चुका है। आयरलैंड जैसी अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाने वाली टीम के खिलाफ उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन न कर पाना और फिर इंग्लैंड की मजबूत टीम के सामने पूरी तरह पस्त हो जाना, भारतीय क्रिकेट के गिरते स्तर की ओर इशारा करता है। विशेषकर इंग्लैंड दौरे पर खेली गई टी20 और वनडे सीरीज में न तो भारतीय बल्लेबाजी में गहराई दिखी और न ही गेंदबाजी आक्रमण में वह धार नजर आई, जिसके लिए भारतीय टीम जानी जाती है। महत्वपूर्ण मौकों पर टीम के सीनियर और युवा खिलाड़ियों दोनों ने ही निराश किया है।

    टीम प्रबंधन के फैसलों और रणनीति पर लगातार उंगलियां उठ रही हैं। मुख्य कोच गौतम गंभीर के कार्यकाल में टीम के रणनीतिक बदलावों को लेकर तीखी आलोचना हो रही है। प्लेयिंग इलेवन के चयन में लगातार किए जा रहे प्रयोग, खिलाड़ियों के बल्लेबाजी क्रम में बार-बार बदलाव और फॉर्म में चल रहे खिलाड़ियों को नजरअंदाज करने की नीति टीम के संतुलन को बिगाड़ रही है। क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि मैदान पर सही समय पर सही फैसले न ले पाने के कारण टीम को बार-बार हार का मुंह देखना पड़ रहा है।

    इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात बीसीसीआई का रुख है। अमूमन किसी बड़े दौरे पर हार के बाद बोर्ड सख्त रुख अपनाता है और समीक्षा बैठकें आयोजित करता है, लेकिन इस बार बोर्ड की ओर से सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश की जा रही है। बोर्ड के अधिकारियों की यह चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। खेल जगत में यह चर्चा तेज है कि जब तक प्रबंधन और कोचिंग स्टाफ की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक प्रदर्शन में सुधार की उम्मीद करना बेमानी होगा।

    भारतीय टीम के इस लचर प्रदर्शन से प्रशंसकों में भारी निराशा व्याप्त है। सोशल मीडिया से लेकर खेल के मंचों तक मुख्य कोच की कार्यप्रणाली और कप्तान के फैसलों की कड़ी समीक्षा की मांग की जा रही है। आगामी बड़ी प्रतियोगिताओं और दौरों को देखते हुए यदि समय रहते इन कमियों को दूर नहीं किया गया, तो भारतीय क्रिकेट को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या बीसीसीआई वाकई समीक्षा बैठक बुलाकर कड़े कदम उठाता है या फिर ‘ऑल इज वेल’ के आवरण में इन असफलताओं को ढका जाता रहेगा।

  • अक्षय खन्ना की दमदार एक्शन थ्रिलर जिसने सच्ची घटना को किया पर्दे पर जिंदा 7.5 रेटिंग वाली फिल्म आज भी जीत रही दिल

    अक्षय खन्ना की दमदार एक्शन थ्रिलर जिसने सच्ची घटना को किया पर्दे पर जिंदा 7.5 रेटिंग वाली फिल्म आज भी जीत रही दिल


    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेता अक्षय खन्ना इन दिनों अपनी फिल्मों को लेकर एक बार फिर चर्चा में हैं। उनकी हालिया मौजूदगी के बाद दर्शक उनकी पुरानी फिल्मों को भी बड़े उत्साह से देख रहे हैं। अगर आप भी अक्षय खन्ना की दमदार एक्टिंग के प्रशंसक हैं और एक ऐसी फिल्म की तलाश में हैं जिसमें एक्शन रोमांच और देशभक्ति का बेहतरीन मिश्रण हो तो साल 2021 में रिलीज हुई स्टेट ऑफ सीज टेंपल अटैक आपके लिए शानदार विकल्प हो सकती है। इस फिल्म को दर्शकों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली और इसे 7.5 की प्रभावशाली रेटिंग भी हासिल हुई।

    फिल्म की कहानी वर्ष 2002 में गुजरात के गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर पर हुए आतंकवादी हमले से प्रेरित है। 24 सितंबर 2002 को हुए इस हमले में आतंकवादियों ने मंदिर परिसर में अंधाधुंध फायरिंग कर कई निर्दोष लोगों की जान ले ली थी जबकि दर्जनों लोग घायल हुए थे। हालात बेहद गंभीर हो गए थे और इसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड यानी एनएसजी के कमांडोज ने ऑपरेशन चलाकर आतंकवादियों का सफाया किया और सैकड़ों लोगों की जान बचाई। फिल्म इसी साहसिक अभियान को सिनेमाई अंदाज में पेश करती है।

    स्टेट ऑफ सीज टेंपल अटैक की सबसे बड़ी ताकत इसकी कहानी और निर्देशन है। निर्देशक केन घोष ने वास्तविक घटना के तनाव और भावनात्मक पहलुओं को प्रभावी तरीके से पर्दे पर उतारा है। हालांकि फिल्म में कुछ सिनेमाई बदलाव किए गए हैं लेकिन मूल घटना की गंभीरता और सुरक्षा बलों के साहस को पूरी ईमानदारी से दिखाया गया है। यही वजह है कि फिल्म केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती बल्कि दर्शकों को भावनात्मक रूप से भी जोड़ती है।

    फिल्म में अक्षय खन्ना ने मेजर हनुत सिंह के किरदार को बेहद प्रभावशाली ढंग से निभाया है। उन्होंने बिना किसी अतिनाटकीय अंदाज के केवल अपने शांत अभिनय और मजबूत स्क्रीन प्रेजेंस से एक अनुशासित और बहादुर कमांडो की छवि को जीवंत कर दिया है। उनके अभिनय को फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है।

    फिल्म के एक्शन दृश्य भी इसकी खास पहचान हैं। मंदिर परिसर के भीतर आतंकवादियों और एनएसजी कमांडोज के बीच होने वाली मुठभेड़ को बेहद वास्तविक अंदाज में फिल्माया गया है। हर दृश्य में तनाव और रोमांच का ऐसा माहौल बनता है जो दर्शकों को अंत तक स्क्रीन से बांधे रखता है। करीब 110 मिनट की यह फिल्म कहीं भी अपनी गति नहीं खोती और लगातार रोमांच बनाए रखती है।

    स्टेट ऑफ सीज टेंपल अटैक केवल एक एक्शन फिल्म नहीं बल्कि उन बहादुर सुरक्षा कर्मियों को श्रद्धांजलि भी है जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना निर्दोष लोगों की रक्षा की। फिल्म यह संदेश देती है कि देश की सुरक्षा में जुटे जवानों का साहस और समर्पण किसी भी चुनौती से बड़ा होता है।

    अगर आपको सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्में पसंद हैं और आप देशभक्ति के साथ दमदार एक्शन और सस्पेंस का अनुभव करना चाहते हैं तो स्टेट ऑफ सीज टेंपल अटैक जरूर देखनी चाहिए। अक्षय खन्ना का शानदार अभिनय और मजबूत कहानी इसे एक यादगार सिनेमाई अनुभव बनाते हैं।

  • जन नायगन विजय की आखिरी नहीं बल्कि मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली फिल्म एच विनोद के बयान से बढ़ी हलचल

    जन नायगन विजय की आखिरी नहीं बल्कि मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली फिल्म एच विनोद के बयान से बढ़ी हलचल


    नई दिल्ली । साउथ सुपरस्टार और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय की बहुप्रतीक्षित फिल्म जन नायगन रिलीज से पहले ही सुर्खियों में बनी हुई है। लंबे समय से इस फिल्म को विजय के अभिनय करियर की आखिरी फिल्म माना जा रहा था लेकिन अब निर्देशक एच विनोद के एक बयान ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। उनका कहना है कि जन नायगन को विजय की अंतिम फिल्म के रूप में नहीं बल्कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी पहली फिल्म के रूप में देखा जाना चाहिए। इस बयान के बाद फिल्म को लेकर दर्शकों की उत्सुकता और भी बढ़ गई है।

    एक इंटरव्यू में एच विनोद ने कहा कि जन नायगन केवल एक मसाला एंटरटेनर नहीं है बल्कि लोकतंत्र और राजनीति से जुड़े गंभीर विषयों पर आधारित फिल्म है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिल्म का उद्देश्य केवल विजय को बड़े पर्दे पर नायक के रूप में पेश करना नहीं बल्कि उन चुनौतियों को सामने लाना है जिनका सामना लोकतंत्र करता है। उनके अनुसार फिल्म में लोकतंत्र को कमजोर करने वाली ताकतों और उसकी रक्षा करने वालों के बीच संघर्ष को बेहद प्रभावशाली तरीके से दिखाया गया है।

    निर्देशक ने दावा किया कि फिल्म का लगभग आधे घंटे का हिस्सा इतना मजबूत और विचारोत्तेजक है कि दर्शक उसे बार बार देखकर नए अर्थ निकाल सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस हिस्से में कई परतें हैं जिन्हें समझने में समय लगेगा और आने वाले वर्षों तक इस पर चर्चा होती रहेगी। उनका मानना है कि जन नायगन उन फिल्मों में शामिल होगी जिन्हें दस बीस या तीस साल बाद भी याद किया जाएगा।

    एच विनोद ने फिल्म से जुड़ा एक और दिलचस्प खुलासा किया। उन्होंने बताया कि जन नायगन की कहानी सबसे पहले विजय को नहीं बल्कि एक अन्य बड़े अभिनेता को सुनाई गई थी। हालांकि उन्होंने उस अभिनेता का नाम नहीं बताया। निर्देशक के अनुसार जब उन्होंने बताया कि यह एक राजनीतिक विषय पर आधारित फिल्म है तो उस अभिनेता ने इसे करने में रुचि नहीं दिखाई। इसके बाद यह कहानी विजय तक पहुंची और उन्होंने इसे करने का फैसला लिया।

    फिल्म में आधुनिक युद्ध और बदलती वैश्विक परिस्थितियों को भी अहम स्थान दिया गया है। एच विनोद ने कहा कि आज की दुनिया में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते बल्कि ड्रोन तकनीक और आधुनिक हथियारों के जरिए भी संघर्ष होता है। फिल्म में इसी नए दौर की चुनौतियों को भी कहानी का हिस्सा बनाया गया है जिससे यह सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि समकालीन मुद्दों पर आधारित फिल्म भी बन जाती है।

    निर्देशक ने यह भी स्वीकार किया कि फिल्म की रिलीज को लेकर वह काफी उत्साहित होने के साथ साथ चिंतित भी हैं। उनका कहना है कि यह सामान्य व्यावसायिक फिल्म नहीं है इसलिए इसकी तुलना किसी दूसरी फिल्म के बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन से नहीं की जा सकती। फिल्म की रिलीज कई बार टल चुकी है और इसे संवेदनशील माहौल में रिलीज किया जा रहा है। इसके अलावा फिल्म को मिला ए सर्टिफिकेट भी उनके लिए चिंता का विषय है क्योंकि विजय की फिल्मों को बड़ी संख्या में बच्चे भी पसंद करते हैं।

    जन नायगन में विजय के साथ पूजा हेगड़े बॉबी देओल प्रकाश राज प्रियामणि ममिता बैजू गौतम वासुदेव मेनन और नारायण जैसे कई कलाकार अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे। फिल्म 23 जुलाई 2026 को दुनियाभर के सिनेमाघरों में रिलीज होगी। दर्शकों को उम्मीद है कि यह फिल्म मनोरंजन के साथ साथ राजनीति और समाज पर नई बहस भी छेड़ेगी।

  • नसीरुद्दीन शाह की अधूरी प्रेम कहानी पहली शादी से लेकर बेटी की अनदेखी तक आत्मकथा में किए भावुक खुलासे

    नसीरुद्दीन शाह की अधूरी प्रेम कहानी पहली शादी से लेकर बेटी की अनदेखी तक आत्मकथा में किए भावुक खुलासे


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह अपनी दमदार अदाकारी के लिए जाने जाते हैं लेकिन उनकी निजी जिंदगी भी उतार चढ़ाव और भावनात्मक संघर्षों से भरी रही है। अपनी आत्मकथा एंड देन वन डे में अभिनेता ने पहली शादी पहली पत्नी परवीन मुराद बेटी हीबा और अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल को लेकर खुलकर बात की है। नसीरुद्दीन शाह ने स्वीकार किया कि कम उम्र में लिए गए फैसलों और अपरिपक्व सोच की वजह से वह न तो अच्छे पति बन पाए और न ही अच्छे पिता।

    नसीरुद्दीन शाह की पहली मुलाकात परवीन मुराद से उस समय हुई थी जब वह महज 19 साल के थे और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे। परवीन उनसे लगभग 15 वर्ष बड़ी थीं। वह तलाकशुदा थीं और पहले से दो बच्चों की मां भी थीं। उम्र और सामाजिक परिस्थितियों का अंतर होने के बावजूद दोनों एक दूसरे के करीब आए। नसीरुद्दीन शाह के अनुसार परवीन पहली ऐसी शख्स थीं जिन्होंने उनके भीतर छिपे अभिनेता पर भरोसा जताया और उनके सपनों को पहचान दी। यही विश्वास धीरे धीरे प्यार में बदल गया।

    हालांकि दोनों के रिश्ते को परिवारों की मंजूरी नहीं मिली। नसीरुद्दीन शाह के परिवार को परवीन के तलाकशुदा होने और दो बच्चों की मां होने पर आपत्ति थी जबकि परवीन के परिवार को दोनों की उम्र के बड़े अंतर और नसीरुद्दीन की कम उम्र को लेकर चिंता थी। विरोध के बावजूद दोनों ने शादी कर ली और अपने नए जीवन की शुरुआत की।

    शादी के करीब एक वर्ष बाद बेटी हीबा का जन्म हुआ लेकिन इस खुशी के साथ ही दोनों के रिश्ते में दूरियां बढ़ने लगीं। नसीरुद्दीन शाह ने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया कि उस समय वह पत्नी की भावनाओं को समझने में पूरी तरह असफल रहे। उन्होंने लिखा कि वह अपने अभिनय करियर और भविष्य को लेकर इतने व्यस्त थे कि परिवार और पत्नी की जरूरतों पर ध्यान ही नहीं दे सके। उन्होंने यह भी माना कि गर्भावस्था के दौरान वह पत्नी का साथ नहीं दे पाए और पिता बनने की जिम्मेदारी निभाने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी नहीं थे।

    अभिनेता ने अपनी बेटी हीबा को लेकर भी बेहद भावुक स्वीकारोक्ति की है। उन्होंने लिखा कि कई वर्षों तक वह अपनी बेटी से भावनात्मक रूप से जुड़ ही नहीं पाए। उन्हें इस बात का आज भी गहरा पछतावा है कि उन्होंने पिता होने की जिम्मेदारी को गंभीरता से नहीं लिया। नसीरुद्दीन शाह के अनुसार यह उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी गलतियों में से एक रही जिसका अफसोस उन्हें हमेशा रहेगा।

    पहली शादी टूटने के दौर में ही थिएटर के दौरान उनकी मुलाकात अभिनेत्री रत्ना पाठक से हुई। दोनों के बीच दोस्ती धीरे धीरे गहरे रिश्ते में बदल गई। परवीन मुराद से कानूनी रूप से अलग होने के बाद वर्ष 1982 में नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक ने विवाह किया। अभिनेता ने अपनी आत्मकथा में रत्ना पाठक को अपने जीवन का सबसे सच्चा प्रेम बताया है और स्वीकार किया कि उनके साथ उन्होंने रिश्तों की अहमियत को सही मायनों में समझा।

    नसीरुद्दीन शाह की यह कहानी केवल एक अभिनेता की निजी जिंदगी का किस्सा नहीं बल्कि इस बात की सीख भी देती है कि सफलता के पीछे भागते समय रिश्तों और परिवार की जिम्मेदारियों को नजरअंदाज करना जीवनभर का पछतावा बन सकता है। उनकी आत्मस्वीकृति यह साबित करती है कि गलतियों को स्वीकार करना भी साहस का सबसे बड़ा रूप होता है।