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  • जेन-जी बनी देश की सबसे बड़ी उपभोक्ता शक्ति, बदली बाजार की तस्वीर….860 अरब डॉलर की खपत

    जेन-जी बनी देश की सबसे बड़ी उपभोक्ता शक्ति, बदली बाजार की तस्वीर….860 अरब डॉलर की खपत


    नई दिल्ली
    । देश की सबसे युवा पीढ़ी (Younger Generation) यानी जेन-जी (Gen Z) अब सिर्फ सोशल मीडिया और डिजिटल ट्रेंड्स (Digital Trends) की ताकत नहीं, बल्कि भारत की सबसे बड़ी उपभोक्ता शक्ति बन चुकी है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) (Boston Consulting Group – BCG) और स्नैप इंक की एक संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की करीब 37.7 करोड़ जेन-जी आबादी की देश के कुल खपत में हिस्सा 43% है, जिसकी कीमत करीब 860 अरब डॉलर है।

    दावा है कि 1997 से 2012 के बीच जन्मे जेन-जी का खर्च 2035 तक दोगुने से ज्यादा बढ़कर करीब 2 लाख करोड़ डॉलर हो सकता है। यह उस समय भारत के अनुमानित 3.9 लाख करोड़ डॉलर की कुल खपत का करीब आधा होगा। यानी आगामी दशक में बाजार की दिशा तय करने में जेन-जी की भूमिका निर्णायक होगी।


    अभी माता-पिता की कमाई, कल अपनी जेब

    जेन-जी की आर्थिक ताकत का एक दिलचस्प पहलू यह है कि अभी इसकी बड़ी आबादी खुद कमाने वाली नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल इस पीढ़ी का केवल एक चौथाई हिस्सा काम कर रहा है। इसके बावजूद 860 अरब डॉलर के खर्च में करीब 660 अरब डॉलर ‘इन्फ्लुएंस्ड स्पेंडिंग’ है यानी ब्रांड, एप या उत्पाद का चुनाव जेन-जी करता है, लेकिन भुगतान अक्सर माता-पिता करते हैं। 2035 तक तस्वीर पूरी तरह बदलने की उम्मीद है। तब जेन-जी की 93% खपत सीधे उसकी अपनी कमाई से होने का अनुमान है।


    लाइफस्टाइल और टेक पर भी खर्च

    सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023.24 के अनुसार, शहरी परिवारों के कुल खर्च में गैर- खाद्य वस्तुओं की हिस्सेदारी 60.32% पहुंच गई है, जो 2011-12 में 57.38% थी। यह बदलाव बताता है कि भारतीय उपभोक्ता अब सिर्फ जरूरी सामान पर नहीं, बल्कि लाइफस्टाइल, टेक्नोलॉजी, मनोरंजन, फैशन और अन्य गैर-खाद्य श्रेणियों पर भी ज्यादा खर्च कर रहा है।

  • नीचे ग्रामीणों की भीड़ और ऊपर 60 फीट ऊंची टंकी पर सांड: 42 घंटे बाद प्रशासन ने क्रेन से किया सुरक्षित रेस्क्यू

    नीचे ग्रामीणों की भीड़ और ऊपर 60 फीट ऊंची टंकी पर सांड: 42 घंटे बाद प्रशासन ने क्रेन से किया सुरक्षित रेस्क्यू


    श्योपुर । मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले के ददूनी गांव में एक सांड ने करीब दो दिन तक ग्रामीणों और प्रशासन की चिंता बढ़ाए रखी। गांव में बनी करीब 60 फीट ऊंची पानी की टंकी पर चढ़ा सांड लंबे समय तक नीचे उतरने को तैयार नहीं हुआ। उसे टंकी की ऊंचाई पर फंसा देखकर ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई। हर किसी के सामने एक ही सवाल था कि आखिर इतने ऊंचे स्थान से इस जानवर को सुरक्षित नीचे कैसे उतारा जाए। काफी प्रयासों के बाद जब सांड नीचे नहीं आया तो प्रशासन को क्रेन की मदद से रेस्क्यू ऑपरेशन चलाना पड़ा। करीब दो घंटे चले अभियान के बाद आखिरकार सांड को सुरक्षित नीचे उतार लिया गया।

    जानकारी के अनुसार ददूनी गांव श्योपुर शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित है। रविवार की शाम एक सांड पानी की टंकी पर चढ़ गया। टंकी की ऊंचाई लगभग 60 फीट बताई जा रही है। सांड के इतनी ऊंचाई पर पहुंचने की खबर फैलते ही ग्रामीण बड़ी संख्या में मौके पर पहुंचने लगे। लोगों ने अपने स्तर पर उसे नीचे लाने की कोशिश की लेकिन ऊंचाई और सांड की स्थिति को देखते हुए यह आसान नहीं था।

    ददूनी पंचायत के सचिव महेश गौड़ के मुताबिक सांड पर लगातार नजर रखी जा रही थी। पुलिस और प्रशासन को भी पूरे मामले की सूचना दे दी गई थी। इस दौरान सांड ने एक बार नीचे उतरने का प्रयास किया लेकिन नीचे बड़ी संख्या में ग्रामीणों की भीड़ देखकर वह फिर ऊपर की तरफ चला गया। इसके बाद ग्रामीणों ने भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की ताकि जानवर को नीचे आने का मौका मिल सके लेकिन सांड टंकी पर ही रुका रहा।

    समय बीतता गया और रविवार की शाम से मंगलवार तक करीब 42 घंटे गुजर गए। इस दौरान पंचायत की ओर से सांड के खाने और पानी की व्यवस्था की गई। प्रशासन और ग्रामीण उसकी गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए रहे। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि इतने भारी जानवर को 60 फीट की ऊंचाई से नीचे उतारते समय किसी तरह की चोट या दुर्घटना न हो। इसी वजह से जल्दबाजी के बजाय सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू की योजना बनाई गई।

    मंगलवार को प्रशासन ने श्योपुर से क्रेन मंगवाई। मौके पर पुलिस के साथ पशुपालन विभाग और प्रशासन की टीम पहुंची। इसके बाद रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया। मानपुर थाना प्रभारी सतीश दुबे के अनुसार पुलिस टीम ने पशुपालन विभाग के सहयोग से अभियान चलाया। पशु चिकित्सा अधिकारी सचिन उपाध्याय ने सांड को नियंत्रित करने के लिए बेहोशी की दवा दी। इसके बाद क्रेन की मदद से उसे सावधानीपूर्वक नीचे उतारने की प्रक्रिया शुरू की गई।

    करीब दो घंटे तक चले इस ऑपरेशन में टीम ने बेहद सावधानी के साथ सांड को नीचे लाने का काम किया। आखिरकार 42 घंटे से टंकी पर फंसे सांड को सुरक्षित जमीन पर उतार लिया गया। सांड के सुरक्षित नीचे आने के बाद ग्रामीणों ने राहत की सांस ली और मौके पर बनी हलचल भी धीरे धीरे खत्म हो गई।

    हालांकि इस पूरे घटनाक्रम ने एक सवाल जरूर छोड़ दिया कि आखिर सांड 60 फीट ऊंची पानी की टंकी पर चढ़ा कैसे। फिलहाल इसका स्पष्ट कारण सामने नहीं आया है लेकिन इस अनोखे रेस्क्यू की चर्चा पूरे इलाके में बनी हुई है।

  • गोवा में घूमना फिरना है खास अनुभव: बीच हॉलीडे से एडवेंचर और स्वादिष्ट खानपान तक यात्रा को बनाएं यादगार

    गोवा में घूमना फिरना है खास अनुभव: बीच हॉलीडे से एडवेंचर और स्वादिष्ट खानपान तक यात्रा को बनाएं यादगार


    नई दिल्ली। भारत के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में शामिल गोवा अपनी खूबसूरत समुद्री तटों प्राकृतिक नजारों रंगीन संस्कृति और जीवंत माहौल के लिए जाना जाता है। छुट्टियों की योजना बनाते समय बड़ी संख्या में पर्यटक गोवा को अपनी पसंदीदा जगहों की सूची में शामिल करते हैं। यहां समुद्र किनारे आराम करने से लेकर ऐतिहासिक स्थलों को देखने और स्थानीय खानपान का स्वाद लेने तक पर्यटकों के लिए कई अनुभव मौजूद हैं। परिवार के साथ यात्रा करने वाले लोग हों या दोस्तों के साथ छुट्टियां बिताने वाले युवा गोवा हर तरह के यात्रियों को अलग अनुभव दे सकता है।

    गोवा की यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण यहां के समुद्र तट हैं। सुबह और शाम के समय समुद्र किनारे टहलना सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा देखना तथा लहरों के बीच समय बिताना यात्रा को खास बना देता है। कई पर्यटक समुद्र तटों पर आराम करने और प्रकृति के बीच कुछ शांत पल बिताने के लिए पहुंचते हैं। वहीं रोमांच पसंद करने वाले लोगों के लिए समुद्र से जुड़ी विभिन्न गतिविधियां यात्रा को और भी रोमांचक बना सकती हैं। हालांकि किसी भी एडवेंचर गतिविधि को करते समय सुरक्षा नियमों का पालन करना और अधिकृत संचालकों की सेवाएं लेना जरूरी है।

    गोवा केवल समुद्र तटों तक सीमित नहीं है। यहां की पुरानी इमारतें चर्च और सांस्कृतिक धरोहर भी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। गोवा के कई हिस्सों में पुर्तगाली स्थापत्य और स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। पुरानी गलियों में घूमते हुए रंगीन घरों और ऐतिहासिक इमारतों को देखना एक अलग अनुभव देता है। यात्रा के दौरान स्थानीय बाजारों में घूमना भी अच्छा विकल्प हो सकता है। यहां पर्यटक स्थानीय हस्तशिल्प कपड़े और स्मृति चिन्ह देख सकते हैं। खरीदारी करते समय बजट का ध्यान रखना जरूरी है ताकि यात्रा का खर्च अनावश्यक रूप से न बढ़े।

    गोवा का स्थानीय खानपान भी इसकी यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यहां विभिन्न प्रकार के समुद्री भोजन के साथ शाकाहारी विकल्प भी मिलते हैं। स्थानीय स्वाद और पारंपरिक व्यंजनों का अनुभव लेने के लिए साफ और विश्वसनीय स्थानों का चुनाव करना बेहतर रहता है। यात्रा के दौरान पर्याप्त पानी पीना और भोजन में संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है क्योंकि मौसम और यात्रा की थकान का असर स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

    अगर आप गोवा जाने की योजना बना रहे हैं तो यात्रा से पहले मौसम और ठहरने की व्यवस्था की जानकारी जरूर कर लें। व्यस्त पर्यटन सीजन में होटल और यात्रा सेवाओं की मांग बढ़ सकती है इसलिए पहले से योजना बनाने से सुविधा मिलती है। यात्रा के लिए अपने बजट को ठहरने खाने स्थानीय परिवहन और घूमने की गतिविधियों के अनुसार तय करना चाहिए। परिवार के साथ जा रहे हैं तो अपेक्षाकृत शांत और सुविधाजनक जगहों का चुनाव बेहतर हो सकता है जबकि दोस्तों के साथ यात्रा करने वाले लोग अपनी पसंद के अनुसार अलग अनुभव चुन सकते हैं।

    गोवा की यात्रा को यादगार बनाने के लिए केवल लोकप्रिय जगहों की सूची पूरी करने के बजाय वहां के माहौल और संस्कृति को समझने का प्रयास भी करना चाहिए। समुद्र किनारे शांत समय बिताना स्थानीय बाजारों में घूमना ऐतिहासिक स्थलों को देखना और स्थानीय भोजन का स्वाद लेना यात्रा को अधिक खास बना सकता है। पर्यटकों को पर्यावरण की सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए और समुद्र तटों तथा सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने से बचना चाहिए।

    कुल मिलाकर गोवा में घूमना फिरना प्रकृति रोमांच संस्कृति और आराम का शानदार अनुभव दे सकता है। सही योजना और बजट के साथ की गई यात्रा परिवार और दोस्तों के साथ यादगार पल बनाने का अवसर बन सकती है। चाहे आप समुद्र किनारे सुकून चाहते हों या नई जगहों को करीब से देखना चाहते हों गोवा हर यात्री को अपनी पसंद के अनुसार कुछ न कुछ खास अनुभव देने की क्षमता रखता है।

  • Nifty vs Sensex: आखिर निवेशकों के लिए कौन सा इंडेक्स है ज्यादा बेहतर, 50 शेयरों वाला निफ्टी या 30 कंपनियों वाला सेंसेक्स

    Nifty vs Sensex: आखिर निवेशकों के लिए कौन सा इंडेक्स है ज्यादा बेहतर, 50 शेयरों वाला निफ्टी या 30 कंपनियों वाला सेंसेक्स


    नई दिल्ली। शेयर बाजार में निवेश करने वाले लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि निफ्टी बेहतर है या सेंसेक्स। रोजाना बाजार की खबरों में इन दोनों इंडेक्स के चढ़ने और गिरने की चर्चा होती है लेकिन कई निवेशक इनके बीच का वास्तविक अंतर नहीं समझ पाते। पहली बात यह जानना जरूरी है कि निफ्टी और सेंसेक्स दोनों भारत के प्रमुख शेयर बाजार इंडेक्स हैं और दोनों का उद्देश्य देश की बड़ी कंपनियों तथा बाजार की दिशा का संकेत देना है। हालांकि दोनों की संरचना और कवरेज में अंतर है। निफ्टी 50 नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई की 50 प्रमुख कंपनियों को दर्शाता है जबकि सेंसेक्स बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज यानी बीएसई की 30 बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन को दिखाता है। दोनों इंडेक्स फ्री फ्लोट मार्केट कैपिटलाइजेशन के आधार पर तैयार किए जाते हैं और इनमें शामिल बड़ी कंपनियों का प्रदर्शन इंडेक्स की दिशा पर असर डालता है।

    अगर केवल कंपनियों की संख्या के आधार पर देखा जाए तो निफ्टी का दायरा सेंसेक्स से बड़ा है। निफ्टी में 50 कंपनियां शामिल होने के कारण इसमें सेक्टरों की भागीदारी अपेक्षाकृत व्यापक मानी जाती है। सेंसेक्स में केवल 30 कंपनियां हैं लेकिन इनमें भी भारत की कई बड़ी और प्रभावशाली कंपनियां शामिल रहती हैं। यही कारण है कि दोनों इंडेक्स अक्सर एक जैसी दिशा में चलते दिखाई देते हैं। जब देश के बड़े बैंक आईटी कंपनियां ऊर्जा क्षेत्र या दूसरे प्रमुख सेक्टरों के शेयरों में तेजी या गिरावट आती है तो उसका असर निफ्टी और सेंसेक्स दोनों पर पड़ सकता है।

    निवेशकों के लिए यह समझना भी जरूरी है कि किसी इंडेक्स का अंक अधिक होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह दूसरे इंडेक्स से बेहतर है। कई नए निवेशक सेंसेक्स के बड़े अंक को देखकर इसे निफ्टी से अधिक मजबूत या महंगा मान लेते हैं लेकिन यह सही तरीका नहीं है। दो इंडेक्स की तुलना हमेशा प्रतिशत के आधार पर की जानी चाहिए। सेंसेक्स में 500 अंकों की गिरावट और निफ्टी में 200 अंकों की गिरावट को सीधे तुलना नहीं किया जा सकता क्योंकि दोनों का स्तर अलग है। इसलिए बाजार की वास्तविक चाल समझने के लिए प्रतिशत बदलाव अधिक महत्वपूर्ण होता है।

    अगर कोई निवेशक लंबी अवधि के लिए इंडेक्स फंड या ईटीएफ के जरिए निवेश करने पर विचार कर रहा है तो निफ्टी 50 को अक्सर व्यापक कवरेज के कारण देखा जाता है। निफ्टी 50 भारत की 50 प्रमुख कंपनियों और कई महत्वपूर्ण सेक्टरों को कवर करता है तथा यह फंड पोर्टफोलियो की तुलना और इंडेक्स आधारित निवेश के लिए व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। वहीं सेंसेक्स उन निवेशकों के लिए भी उपयोगी बेंचमार्क है जो भारत की चुनिंदा 30 बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन के आधार पर बाजार की दिशा समझना चाहते हैं।

    हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि हर निवेशक के लिए केवल निफ्टी ही बेहतर है या सेंसेक्स ही सबसे अच्छा विकल्प है। दोनों प्रमुख बाजार इंडेक्स हैं और लंबी अवधि में इनके प्रदर्शन की दिशा अक्सर काफी हद तक मिलती जुलती रही है। सही विकल्प निवेशक के लक्ष्य जोखिम लेने की क्षमता निवेश अवधि और चुने गए निवेश उत्पाद के खर्च जैसे कारकों पर निर्भर करता है। इंडेक्स फंड या ईटीएफ चुनते समय केवल निफ्टी या सेंसेक्स का नाम देखने के बजाय एक्सपेंस रेशियो ट्रैकिंग एरर और निवेश की अवधि पर भी ध्यान देना चाहिए।

    कुल मिलाकर बाजार को व्यापक रूप से समझने और 50 बड़ी कंपनियों की भागीदारी देखने के लिए निफ्टी 50 को अधिक विस्तृत प्रतिनिधित्व वाला इंडेक्स माना जा सकता है जबकि सेंसेक्स 30 प्रमुख कंपनियों के जरिए बाजार की एक महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करता है। दोनों में से कौन बेहतर है इसका जवाब हर निवेशक के लिए अलग हो सकता है। निवेश का फैसला केवल इंडेक्स के पिछले प्रदर्शन के आधार पर नहीं बल्कि अपने वित्तीय लक्ष्य और जोखिम क्षमता को ध्यान में रखकर करना चाहिए। शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है इसलिए बिना समझे केवल तेजी के दौर को देखकर निवेश करने के बजाय पूरी जानकारी और जरूरत पड़ने पर योग्य वित्तीय सलाहकार की सलाह के साथ कदम उठाना बेहतर है।

    निफ्टी 50 में 50 कंपनियां और सेंसेक्स में 30 कंपनियां शामिल हैं तथा दोनों फ्री फ्लोट मार्केट कैपिटलाइजेशन पद्धति का उपयोग करते हैं। निफ्टी का कवरेज अपेक्षाकृत व्यापक है लेकिन दोनों प्रमुख इंडेक्स भारत की बड़ी कंपनियों और बाजार की दिशा को दर्शाते हैं।

  • कचरा गाड़ी चोरी का पुलिस ने किया खुलासा: कोलारस से साढ़ौरा तक 50 CCTV ने जोड़ा पूरा रास्ता, डीजल खत्म होने पर छोड़ने का शक

    कचरा गाड़ी चोरी का पुलिस ने किया खुलासा: कोलारस से साढ़ौरा तक 50 CCTV ने जोड़ा पूरा रास्ता, डीजल खत्म होने पर छोड़ने का शक


    शिवपुरी । शिवपुरी जिले के कोलारस में नगर परिषद की कचरा उठाने वाली सरकारी गाड़ी चोरी होने के मामले में पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। 31 अगस्त की रात नगर परिषद परिसर से चोरी हुई टाटा ट्रिपर गाड़ी को पुलिस ने अशोकनगर जिले के साढ़ौरा से बरामद कर लिया है। वाहन की तलाश में पुलिस ने कोलारस से साढ़ौरा तक करीब 50 CCTV कैमरों की फुटेज खंगाली और एक के बाद एक मिले सुरागों को जोड़ते हुए चोरी हुई गाड़ी तक पहुंच गई। फिलहाल वाहन को पुलिस ने अपने कब्जे में लेकर कोलारस थाने पहुंचा दिया है जबकि CCTV फुटेज में नजर आए संदिग्ध की तलाश जारी है।

    जानकारी के मुताबिक नगर परिषद कोलारस की टाटा ट्रिपर कचरा गाड़ी क्रमांक MP33L2598 को 31 अगस्त की रात करीब 9:30 बजे नगर परिषद कार्यालय परिसर से चोरी कर लिया गया था। रात में गाड़ी के गायब होने की जानकारी मिलने के बाद नगर परिषद कर्मचारियों ने आसपास के इलाके में तलाश शुरू की लेकिन वाहन का कोई पता नहीं चला। इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई और मामले की जांच शुरू हुई।

    जांच के दौरान पुलिस को महत्वपूर्ण सुराग उस समय मिला जब CCTV फुटेज में चोरी की गई गाड़ी रात करीब 9:40 बजे रेलवे स्टेशन रोड की तरफ जाती दिखाई दी। इसके कुछ देर बाद रात करीब 10 बजे यही वाहन पूरनखेड़ी टोल प्लाजा से गुजरता हुआ नजर आया। टोल प्लाजा के कैमरों में गाड़ी को ले जाते हुए एक संदिग्ध व्यक्ति भी दिखाई दिया। इस फुटेज ने पुलिस की जांच को नई दिशा दी।

    नगर परिषद के मुख्य नगर पालिका अधिकारी की शिकायत पर कोलारस थाने में मामला दर्ज किया गया। थाना प्रभारी पुनीत बाजपेई के नेतृत्व में पुलिस टीम ने वाहन की तलाश शुरू की। पुलिस ने केवल एक या दो स्थानों के CCTV पर निर्भर रहने के बजाय पूरे संभावित रास्ते की फुटेज खंगालना शुरू किया। कोलारस से साढ़ौरा तक अलग अलग स्थानों पर लगे करीब 50 CCTV कैमरों की रिकॉर्डिंग देखी गई। कई कैमरों में वाहन की गतिविधियों को जोड़ते हुए पुलिस ने उसके संभावित मार्ग का पता लगाया।

    लगातार जांच के बाद पुलिस को जानकारी मिली कि चोरी की गई सरकारी गाड़ी अशोकनगर जिले के साढ़ौरा तक पहुंच चुकी है। इसके बाद पुलिस टीम ने साढ़ौरा रेलवे स्टेशन और उसके आसपास के इलाकों में तलाश शुरू की। इसी दौरान चोरी हुई टाटा ट्रिपर गाड़ी बरामद कर ली गई। वाहन को पुलिस ने कब्जे में लेकर कोलारस थाने भेज दिया।

    पुलिस की जांच में एक और अहम बात सामने आई है। बरामद गाड़ी के टैंक में डीजल नहीं मिला है। ऐसे में प्रारंभिक तौर पर आशंका जताई जा रही है कि रास्ते में डीजल खत्म होने के बाद संदिग्ध ने गाड़ी को साढ़ौरा रेलवे स्टेशन के पास छोड़ दिया और वहां से ट्रेन पकड़कर फरार हो गया। हालांकि यह अभी पुलिस का प्रारंभिक अनुमान है। आरोपी ने वाहन को क्यों छोड़ा और वह किस दिशा में फरार हुआ इसकी पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही होगी।

    अब पुलिस का पूरा ध्यान CCTV फुटेज में दिखाई दे रहे संदिग्ध की पहचान और गिरफ्तारी पर है। पुलिस फुटेज के आधार पर आरोपी की तस्वीर और हुलिए का मिलान कर रही है। साथ ही यह भी पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि चोरी की वारदात अकेले व्यक्ति ने की थी या इसके पीछे कोई और भी शामिल था। नगर परिषद परिसर से सरकारी वाहन चोरी होने के कारण पुलिस मामले को गंभीरता से ले रही है।

    फिलहाल चोरी हुई कचरा गाड़ी बरामद होने से नगर परिषद और पुलिस ने राहत की सांस ली है लेकिन इस मामले की जांच अभी पूरी नहीं हुई है। 50 CCTV कैमरों से मिले सुरागों ने पुलिस को वाहन तक तो पहुंचा दिया है अब सबसे बड़ी चुनौती उस व्यक्ति तक पहुंचना है जिसने सरकारी गाड़ी को नगर परिषद परिसर से चोरी किया था।

  • शिवपुरी में बारिश बनी आफत: मकान का आधा हिस्सा गिरने से लाखों का नुकसान, हादसे के वक्त घर में नहीं था कोई शख्स

    शिवपुरी में बारिश बनी आफत: मकान का आधा हिस्सा गिरने से लाखों का नुकसान, हादसे के वक्त घर में नहीं था कोई शख्स


    शिवपुरी । शिवपुरी शहर में लगातार चार दिनों तक हुई तेज बारिश के बाद अब इसका असर शहर के कमजोर मकानों पर दिखाई देने लगा है। मंगलवार शाम नवाब साहब रोड पर उस समय हड़कंप मच गया जब एक मकान का करीब आधा हिस्सा अचानक भरभराकर नीचे आ गिरा। मकान का छज्जा बाथरूम और पीछे का बड़ा हिस्सा कुछ ही सेकंड में मलबे में बदल गया। मकान का हिस्सा गिरने के साथ ही वहां खड़ी तीन मोटरसाइकिलें भी मलबे के नीचे दब गईं और बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं। गनीमत रही कि जिस वक्त यह हादसा हुआ उस समय कोई व्यक्ति मलबे की चपेट में नहीं आया और एक बड़ा हादसा टल गया।

    घटना के बाद आसपास रहने वाले लोगों में अफरा तफरी मच गई। मकान का हिस्सा गिरने की आवाज सुनकर बड़ी संख्या में लोग मौके पर पहुंचे। देखते ही देखते सड़क और मकान के आसपास मलबा फैल गया था। स्थानीय लोगों ने परिवार की मदद करते हुए मलबा हटाने का काम शुरू किया। मलबे में दबे वाहनों को बाहर निकालने का प्रयास किया गया। इस दौरान सामने आया कि तीनों मोटरसाइकिलों को काफी नुकसान पहुंचा है।

    मकान मालिक सुनील रजक के मुताबिक पिछले चार दिनों से शिवपुरी में लगातार तेज बारिश हो रही थी। बारिश का पानी मकान की दीवारों और निर्माण वाले हिस्सों में लगातार पहुंच रहा था। इससे मकान का पिछला हिस्सा धीरे धीरे कमजोर हो गया। मंगलवार शाम अचानक मकान की संरचना ने जवाब दे दिया और छज्जे के साथ बाथरूम तथा पीछे का हिस्सा भरभराकर गिर गया। हादसा इतनी तेजी से हुआ कि परिवार को संभलने का मौका तक नहीं मिला। हालांकि किस्मत अच्छी रही कि उस समय कोई व्यक्ति उस हिस्से में मौजूद नहीं था।

    मकान का हिस्सा गिरने से केवल भवन को ही नुकसान नहीं हुआ बल्कि वहां खड़ी तीन मोटरसाइकिलें भी मलबे में दब गईं। परिवार के मुताबिक तीनों बाइक की कुल कीमत करीब ढाई लाख रुपए है। इसके अलावा मकान के अंदर रखा सामान भी मलबे में दब गया जिससे नुकसान और बढ़ गया। मकान के क्षतिग्रस्त हिस्से की मरम्मत और दोबारा निर्माण में करीब ढाई लाख रुपए का खर्च आने का अनुमान लगाया जा रहा है। इस तरह मकान और मोटरसाइकिलों को मिलाकर करीब पांच लाख रुपए के नुकसान की आशंका है।

    बारिश के कारण मकान की स्थिति पहले से कमजोर होने की बात सामने आने के बाद स्थानीय लोगों के बीच भी चिंता बढ़ गई है। लगातार बारिश के दौरान पुराने और कमजोर मकानों को लेकर खतरा बढ़ जाता है। खासकर ऐसे मकानों में जहां दीवारों में पहले से दरारें हों या पानी लगातार रिस रहा हो वहां अचानक हिस्सा गिरने की आशंका बनी रहती है। नवाब साहब रोड की घटना ने भी इसी खतरे की ओर ध्यान खींचा है।

    हादसे के बाद प्रभावित परिवार ने प्रशासन से मौके का निरीक्षण कराने की मांग की है। परिवार चाहता है कि राजस्व और नगर प्रशासन की टीम मौके पर पहुंचकर वास्तविक नुकसान का आकलन करे। इसके साथ ही नियमानुसार राहत और मुआवजा उपलब्ध कराया जाए। परिवार का कहना है कि बारिश के कारण हुए इस नुकसान ने आर्थिक परेशानी बढ़ा दी है और मकान के क्षतिग्रस्त हिस्से को दोबारा सुरक्षित बनाने के लिए बड़ी रकम की जरूरत होगी।

    फिलहाल घटना में किसी व्यक्ति के घायल होने की जानकारी नहीं है। लेकिन जिस तरह मकान का बड़ा हिस्सा अचानक गिरा उसने आसपास रहने वाले लोगों को जरूर डरा दिया है। चार दिन की बारिश के बाद सामने आई इस घटना ने यह भी साफ कर दिया है कि लगातार बारिश के बीच कमजोर भवनों की स्थिति की जांच बेहद जरूरी है ताकि किसी अगले हादसे से पहले जरूरी कदम उठाए जा सकें।

  • 5-डे बैंकिंग वीक की मांग पर बैंककर्मियों का बड़ा आंदोलन: सितंबर में दो बार काम बंद, 26 से 30 सितंबर तक लगातार 5 दिन असर

    5-डे बैंकिंग वीक की मांग पर बैंककर्मियों का बड़ा आंदोलन: सितंबर में दो बार काम बंद, 26 से 30 सितंबर तक लगातार 5 दिन असर


    भोपाल । मध्य प्रदेश में सितंबर का महीना बैंक ग्राहकों के लिए परेशानी भरा हो सकता है। प्रदेश की करीब 7 हजार बैंक शाखाओं में इस महीने दो अलग-अलग मौकों पर बैंकिंग सेवाएं प्रभावित होने की संभावना है। करीब 40 हजार बैंककर्मी 5 दिवसीय बैंकिंग सप्ताह लागू करने समेत कई लंबित मांगों को लेकर हड़ताल पर जाने की तैयारी में हैं। पहली हड़ताल 11 सितंबर को प्रस्तावित है। इसके बाद 12 और 13 सितंबर को शनिवार और रविवार की छुट्टी होने के कारण लगातार तीन दिन बैंकिंग कामकाज प्रभावित हो सकता है। महीने के आखिरी सप्ताह में भी बैंकिंग सेवाओं पर बड़ा असर पड़ने की संभावना है। 26 और 27 सितंबर को शनिवार और रविवार की छुट्टी के बाद 28 29 और 30 सितंबर को बैंककर्मियों की हड़ताल प्रस्तावित है। इस तरह लगातार पांच दिन बैंकिंग गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।

    हड़ताल के दौरान बैंक की रोजमर्रा की कई सेवाओं पर असर पड़ सकता है। नकद जमा और निकासी से लेकर चेक क्लियरेंस KYC अपडेट लॉकर से जुड़े काम और अन्य शाखा आधारित सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। हालांकि डिजिटल बैंकिंग सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं होंगी लेकिन जिन कामों के लिए ग्राहकों को शाखा जाना जरूरी होता है उनके लिए परेशानी बढ़ सकती है। ऐसे में ग्राहकों को सलाह दी जा रही है कि जरूरी बैंकिंग काम पहले ही निपटा लें ताकि हड़ताल के दौरान उन्हें किसी तरह की दिक्कत का सामना न करना पड़े।

    बैंक यूनियनों का सबसे प्रमुख मुद्दा 5 दिवसीय बैंकिंग सप्ताह लागू करना है। फिलहाल बैंक कर्मचारियों को महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को छुट्टी मिलती है। यूनियनों की मांग है कि महीने के सभी शनिवार को अवकाश घोषित किया जाए। इसके बदले सोमवार से शुक्रवार तक रोजाना बैंकिंग समय में करीब 40 मिनट की बढ़ोतरी का प्रस्ताव रखा गया है। यूनियनों का तर्क है कि इससे कर्मचारियों को बेहतर कार्य संतुलन मिलेगा और बैंकिंग व्यवस्था को भी पांच कार्य दिवसों के आधार पर व्यवस्थित किया जा सकेगा।

    यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस यानी UFBU ने 5 दिवसीय बैंकिंग सप्ताह के साथ स्केल IV और उससे ऊपर के अधिकारियों के लिए लागू की गई PLI योजना को वापस लेने की मांग भी उठाई है। यूनियनों का आरोप है कि नई PLI व्यवस्था से कर्मचारियों के बीच असमानता बढ़ सकती है। उनका कहना है कि अधिकारियों के सीमित वर्ग को प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन देने की व्यवस्था बैंक कर्मचारियों के बीच विभाजन पैदा कर सकती है।

    बैंक यूनियनों के मुताबिक पेंशन अपडेशन और पेंशनभोगियों के एक्स ग्रेशिया की समीक्षा जैसे कई मुद्दे भी लंबे समय से लंबित हैं। NPS को OPS में बदलने और सभी पेंशनभोगियों के लिए समान DA व्यवस्था लागू करने की मांग भी उठाई जा रही है। इसके अलावा बैंकों में पर्याप्त संख्या में क्लर्क सब स्टाफ और आर्म्ड गार्ड्स की भर्ती करने की मांग है। ग्रेच्युटी की सीमा बढ़ाने का मुद्दा भी यूनियनों के एजेंडे में शामिल है।

    यूनियनों का कहना है कि इन मांगों का समाधान किए बिना सरकार अगले वेतन संशोधन समझौते को जल्द पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। बैंक कर्मचारियों ने 27 अगस्त को देशभर में प्रदर्शन भी किए थे। अब सितंबर में प्रस्तावित हड़ताल को आंदोलन को आगे बढ़ाने के कदम के तौर पर देखा जा रहा है।

    हालांकि हड़ताल से पहले सरकार और बैंक संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच नई दिल्ली में बैठक प्रस्तावित है। यदि बातचीत के दौरान 5 दिवसीय बैंकिंग सप्ताह और अन्य मांगों पर सहमति बनती है तो हड़ताल के फैसले में बदलाव की संभावना हो सकती है। वहीं यदि बातचीत बेनतीजा रहती है तो 11 सितंबर और 28 से 30 सितंबर की हड़ताल का असर देशभर की बैंकिंग व्यवस्था पर पड़ सकता है।

    UFBU ने इसके बाद 26 अक्टूबर 2026 से अनिश्चितकालीन राष्ट्रव्यापी बैंक हड़ताल का भी ऐलान किया है। ऐसे में सितंबर की प्रस्तावित हड़तालों के साथ बैंक कर्मचारियों और सरकार के बीच बातचीत का परिणाम आगे की बैंकिंग व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • अंबानी को एक दिन में ₹20 हजार करोड़ का झटका, मस्क की दौलत ₹3.23 लाख करोड़ बढ़ी

    अंबानी को एक दिन में ₹20 हजार करोड़ का झटका, मस्क की दौलत ₹3.23 लाख करोड़ बढ़ी


    नई दिल्ली। दुनिया के दिग्गज अरबपतियों की संपत्ति में शेयर बाजार की चाल के साथ बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी की नेटवर्थ में बुधवार को 2.11 अरब डॉलर यानी 20 हजार करोड़ रुपए से अधिक की गिरावट आई। इसका असर उनकी वैश्विक रैंकिंग पर भी पड़ा और वे ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स में एक स्थान नीचे खिसककर 24वें नंबर पर पहुंच गए। उनकी कुल संपत्ति अब 86 अरब डॉलर बताई गई है।

    इसके उलट दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क के लिए मंगलवार का दिन बेहद शानदार रहा। स्पेसएक्स और टेस्ला के शेयरों में जोरदार तेजी से उनकी संपत्ति में एक ही दिन में 34.1 अरब डॉलर से ज्यादा का इजाफा हुआ। भारतीय मुद्रा में यह रकम 3.20 लाख करोड़ रुपए से अधिक बैठती है। मस्क की नेटवर्थ अब 938 अरब डॉलर हो गई है और वे खरबपति बनने के बेहद करीब पहुंच गए हैं।

    कभी एशिया के सबसे अमीर थे अंबानी

    मुकेश अंबानी की संपत्ति एक समय 100 अरब डॉलर का आंकड़ा पार कर चुकी थी और वे एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति थे। अब तस्वीर बदल गई है। चीन के झांग यिमिंग उनसे आगे निकल चुके हैं। झांग की नेटवर्थ 92.8 अरब डॉलर है और वे दुनिया के अमीरों की सूची में 21वें स्थान पर हैं।

    अंबानी इस साल अब तक 21.7 अरब डॉलर गंवा चुके हैं। वहीं झांग यिमिंग की संपत्ति में इस साल 27.7 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई है। एशिया के अमीरों में अब गौतम अडानी पहले स्थान पर हैं। उनकी नेटवर्थ 109 अरब डॉलर है और वैश्विक सूची में वे 18वें नंबर पर हैं। इस साल अडानी की संपत्ति में 24.1 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है।

    रिलायंस के शेयरों में गिरावट बनी वजह

    अरबपतियों की संपत्ति में बदलाव का सीधा संबंध उनके पास मौजूद कंपनियों के शेयरों से होता है। मुकेश अंबानी की नेटवर्थ का बड़ा हिस्सा रिलायंस इंडस्ट्रीज में उनकी हिस्सेदारी से जुड़ा है। मंगलवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज का शेयर 1.34 प्रतिशत गिर गया। शेयर में इस गिरावट का असर अंबानी की संपत्ति पर पड़ा और उनकी नेटवर्थ करीब 2.11 अरब डॉलर घट गई।

    खरबपति बनने से 62 अरब डॉलर दूर मस्क

    एलन मस्क की संपत्ति में मंगलवार को आए उछाल ने उन्हें खरबपति बनने की दौड़ में और आगे कर दिया। ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के मुताबिक उनकी नेटवर्थ अब 938 अरब डॉलर है। यानी 1 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा छूने के लिए उन्हें करीब 62 अरब डॉलर और चाहिए।

    मस्क की संपत्ति में यह तेज बढ़ोतरी मुख्य रूप से स्पेसएक्स और टेस्ला के शेयरों में आई तेजी से हुई है।

    दुनिया के टॉप-10 अरबपति

    ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के मुताबिक शीर्ष 10 अमीरों की सूची में एलन मस्क सबसे आगे हैं। उनके बाद लैरी पेज और जेफ बेजोस का नंबर है।

    अरबपति नेटवर्थ अरब डॉलर में
    एलन मस्क 938
    लैरी पेज 291
    जेफ बेजोस 279
    सर्गेई ब्रिन 270
    माइकल डेल 254
    मार्क जुकरबर्ग 218
    लैरी एलिसन 217
    जेनसेन हुआंग 187
    स्टीव बाल्मर 173
    बर्नार्ड अर्नाल्ट 149

    टॉप-10 में अमेरिकी अरबपतियों का दबदबा है। इस सूची में फ्रांस के बर्नार्ड अर्नाल्ट अकेले गैर-अमेरिकी अरबपति हैं। ब्लूमबर्ग के अनुसार अर्नाल्ट इस साल अब तक 58.7 अरब डॉलर गंवा चुके हैं और फिलहाल 10वें स्थान पर हैं।

    अब नजर इस बात पर है कि क्या अर्नाल्ट अपनी टॉप-10 रैंकिंग बचा पाएंगे। अगर उनकी संपत्ति में और गिरावट आती है और वॉरेन बफेट की नेटवर्थ बढ़ती है, तो बफेट 10वें स्थान पर पहुंच सकते हैं। बफेट फिलहाल 144 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ 11वें नंबर पर हैं। ऐसे में आने वाले हफ्तों में यह तस्वीर साफ हो सकती है कि दुनिया के शीर्ष 10 अरबपतियों की सूची पर अमेरिकी अरबपतियों का पूरी तरह कब्जा होता है या नहीं।

  • 7 साल के किराए पर 4000 एनालाइजर लेने की तैयारी: टेंडर की शर्तों में पुराने उपकरणों का अनुभव क्यों बना आधार, उठे गंभीर सवाल

    7 साल के किराए पर 4000 एनालाइजर लेने की तैयारी: टेंडर की शर्तों में पुराने उपकरणों का अनुभव क्यों बना आधार, उठे गंभीर सवाल


    भोपाल । मध्य प्रदेश में किसानों से खरीदे जाने वाले खाद्यान्न की गुणवत्ता जांचने के लिए प्रस्तावित एआई बेस्ड ऑटोमेटिक फूड ग्रेन एनालाइजर की टेंडर प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में है। एमपी स्टेट सिविल सप्लाईज कॉरपोरेशन करीब 4000 मशीनें 7 साल की अवधि के लिए किराए पर लेने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए जारी 2026 के टेंडर में निविदाकर्ताओं से एआई बेस्ड फूड ग्रेन एनालाइजर की सप्लाई इंस्टॉलेशन और इम्प्लीमेंटेशन का 5 साल का अनुभव मांगा गया था। दस्तावेजों की पड़ताल में यह सवाल सामने आया है कि जिन कंपनियों को तकनीकी बिड में योग्य माना गया उनमें से कुछ ने पुराने ग्रेन एनालाइजर और एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर जैसे उपकरणों की सप्लाई को अनुभव के तौर पर पेश किया है।

    सबसे बड़ा सवाल तकनीक की समयसीमा को लेकर है। चैटजीपीटी नवंबर 2022 में सार्वजनिक रूप से लॉन्च हुआ जबकि गूगल का बार्ड 2023 में भारत आया जिसे अब जेमिनी के नाम से जाना जाता है। ऐसे में टेंडर में एआई आधारित ग्रेन एनालाइजर के लिए पांच साल के अनुभव की शर्त ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार कुछ कंपनियों ने 2014 से 2021 के बीच सप्लाई किए गए एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर ग्रेन फिजिकल एनालाइजर ऑटोमेटिक ग्रेन एनालाइजर और ग्रेन ग्रेडिंग डिवाइस के रिकॉर्ड को अनुभव के तौर पर पेश किया। सवाल यह है कि क्या इन पुराने उपकरणों में वही एआई तकनीक मौजूद थी जिसकी मांग मौजूदा टेंडर में की गई है और अगर थी तो उसे साबित करने वाले तकनीकी दस्तावेज क्या हैं।

    दस्तावेजों में अमलिका मर्केन्टाइल की ओर से ओईएम नेबुला इनोवेशन का अनुभव प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख है। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक नेबुला इनोवेशन ने जनवरी और सितंबर 2023 में एफसीआई को कुल 400 एआई बेस्ड एनालाइजर सप्लाई किए थे। इसके बाद नवंबर 2024 में ओडिशा मंडी बोर्ड को 248 एआई बेस्ड एनालाइजर की सप्लाई का रिकॉर्ड बताया गया है। वहीं पुराने रिकॉर्ड में 2020 में राजस्थान मंडी बोर्ड को 136 ग्रेन फिजिकल एनालाइजर और हरियाणा मंडी बोर्ड को 54 ऑटोमेटिक ग्रेन एनालाइजर की सप्लाई का उल्लेख है। 2021 में गुजरात के डायरेक्टोरेट ऑफ फॉरेंसिक साइंस को एक ग्रेन ग्रेडिंग डिवाइस दिए जाने का रिकॉर्ड भी अनुभव में शामिल किया गया।

    इसी तरह फर्टिस इंडिया की ओर से भी नेबुला इनोवेशन के अनुभव प्रमाण प्रस्तुत किए गए। दूसरी कंपनी एयरपे पेमेंट सर्विसेस ने ओईएम ज्यूटैक ओप्टो इलेक्ट्रॉनिक का अनुभव लगाया। इसमें 2014 में फिक्की रिसर्च एंड एनालिसिस सेंटर को एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर सप्लाई करने के अलावा 2018 में पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और 2020 में मदुरा कोट्स तथा महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ को उपकरण उपलब्ध कराने के दस्तावेज बताए गए हैं।

    टेंडर प्रक्रिया में एक और महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है। शुरुआत में अनुभव की शर्त निविदाकर्ता के लिए रखी गई थी लेकिन बाद में इसमें संशोधन कर ओईएम के अनुभव को भी शामिल कर लिया गया। इस पूरी प्रक्रिया में सात बार संशोधन किए जाने की बात सामने आई है। यही बदलाव अब टेंडर की पारदर्शिता और पात्रता के मानकों को लेकर चर्चा का कारण बन रहे हैं।

    मामले में असली सवाल यह नहीं है कि पुराने उपकरणों को अनुभव माना गया या नहीं बल्कि यह है कि जिस तकनीक के आधार पर आज की मशीनों की क्षमता तय की जा रही है क्या वही तकनीकी विशेषताएं पुराने उपकरणों में भी मौजूद थीं। अगर पुराने एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर या पारंपरिक ग्रेन एनालाइजर को एआई बेस्ड फूड ग्रेन एनालाइजर के अनुभव के बराबर माना गया है तो उसके तकनीकी आधार और प्रमाण क्या हैं यह स्पष्ट होना जरूरी है।

    क्योंकि मामला केवल टेंडर में कंपनियों के चयन तक सीमित नहीं है। हजारों मशीनों को सात साल की लंबी अवधि के लिए किराए पर लेने की योजना है और इनका इस्तेमाल किसानों से खरीदे जाने वाले खाद्यान्न की गुणवत्ता जांचने में किया जाना है। ऐसे में मशीनों की तकनीकी क्षमता उनकी सटीकता और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता सीधे तौर पर सार्वजनिक हित से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि टेंडर में अनुभव की शर्त पुराने उपकरणों के रिकॉर्ड और सात बार किए गए संशोधनों को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।

    अब निगाह इस बात पर है कि कॉरपोरेशन इन सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या यह साफ करता है कि जिन कंपनियों को तकनीकी रूप से योग्य माना गया उनके अनुभव में वास्तव में एआई आधारित तकनीक मौजूद थी या पुराने उपकरणों को नए एआई सिस्टम के अनुभव के रूप में स्वीकार किया गया। जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पूरी प्रक्रिया तकनीकी जरूरत के मुताबिक हुई है या टेंडर की शर्तों में हुए बदलावों ने पात्रता का दायरा बदल दिया।

  • बंडा शराब कांड में मौतों की गिनती बनी बड़ा सवाल: सरकार के 19 आंकड़े पर पटवारी ने उठाए सवाल, बोले- सही संख्या बताएं

    बंडा शराब कांड में मौतों की गिनती बनी बड़ा सवाल: सरकार के 19 आंकड़े पर पटवारी ने उठाए सवाल, बोले- सही संख्या बताएं


    भोपाल । सागर जिले के बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब पीने से हुई मौतों के मामले ने अब राजनीतिक तकरार का रूप ले लिया है। त्रासदी के बाद मृतकों की संख्या को लेकर सरकार और विपक्ष के दावे अलग अलग सामने आ रहे हैं। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल ने जहां 19 मृतकों के नाम सार्वजनिक कर पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दावा किया है कि इस घटना में 50 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। दोनों पक्षों के अलग आंकड़ों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली और आधिकारिक जानकारी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

    मंत्री प्रहलाद पटेल ने सोशल मीडिया के जरिए 19 मृतकों की सूची सार्वजनिक की। इसके साथ ही उन्होंने प्रभावित परिवारों को सरकारी योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता देने की बात कही। मंत्री के मुताबिक संबल योजना में पंजीकृत श्रमिकों के परिवारों को पात्रता के अनुसार 4 लाख रुपए की अनुग्रह राशि दी जाएगी। वहीं ऐसे परिवार जो इस योजना के दायरे में नहीं आते हैं उन्हें मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान और सहायता कोष के माध्यम से आर्थिक मदद उपलब्ध कराने की बात कही गई है। सरकार की ओर से यह कदम मृतकों के परिवारों को तत्काल राहत देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

    दूसरी ओर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार और जिला प्रशासन के आंकड़ों पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। पटवारी का कहना है कि बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब की वजह से मरने वालों की संख्या 50 से ज्यादा है और सरकार को वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। उन्होंने प्रशासन की ओर से अलग अलग समय पर बताए गए आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठाया। पटवारी के मुताबिक सागर जिला प्रशासन कभी 13 तो कभी 15 मौतों की जानकारी देता रहा जबकि अब सरकार के वरिष्ठ मंत्री खुद 19 मृतकों के नाम सार्वजनिक कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर वास्तविक संख्या कितनी है।

    पटवारी सोमवार को प्रभावित गांवों के दौरे पर भी पहुंचे थे। उन्होंने मृतकों के परिवारों से मुलाकात कर हालात का जायजा लिया और सरकार से पीड़ितों की मदद बढ़ाने की मांग की। पटवारी ने मृतकों में बड़ी संख्या लोधी समाज के लोगों की होने का हवाला देते हुए मंत्री प्रहलाद पटेल से भी प्रभावित परिवारों के बीच पहुंचकर उनकी सहायता करने की अपील की थी। इसके बाद मंत्री की ओर से मृतकों के नामों की सूची जारी की गई।

    इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मुद्दा अब मौतों की सही संख्या को लेकर बन गया है। एक तरफ सरकार की ओर से 19 मृतकों के नाम सार्वजनिक किए जा चुके हैं तो दूसरी तरफ विपक्ष 50 से ज्यादा मौतों का दावा कर रहा है। ऐसे में आम लोगों और प्रभावित परिवारों के बीच भी यह सवाल उठ रहा है कि सरकारी रिकॉर्ड में कितनी मौतें दर्ज हैं और वास्तविक रूप से कितने परिवार इस त्रासदी से प्रभावित हुए हैं।

    जहरीली शराब कांड के बाद प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। शराब की बिक्री और उसकी गुणवत्ता की निगरानी से लेकर समय पर कार्रवाई और पीड़ितों की पहचान तक कई स्तरों पर जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है। विपक्ष लगातार सरकार पर दबाव बना रहा है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और मौतों के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।

    फिलहाल मंत्री प्रहलाद पटेल द्वारा जारी 19 मृतकों की सूची और जीतू पटवारी के 50 से ज्यादा मौतों के दावे ने मामले को और गंभीर बना दिया है। अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल प्रभावित परिवारों को राहत पहुंचाने की नहीं बल्कि मौतों की वास्तविक संख्या स्पष्ट करने की भी है। जब तक आधिकारिक आंकड़ा पूरी तरह सामने नहीं आता तब तक बंडा जहरीली शराब कांड को लेकर उठ रहे सवाल और राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप जारी रहने की संभावना है।