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  • स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग पर नहीं माने इंटर्न डॉक्टर, MP में OPD का बहिष्कार: हमीदिया में इलाज प्रभावित, CM हाउस के रास्ते बंद

    स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग पर नहीं माने इंटर्न डॉक्टर, MP में OPD का बहिष्कार: हमीदिया में इलाज प्रभावित, CM हाउस के रास्ते बंद


    भोपाल । मध्यप्रदेश में एमबीबीएस इंटर्न डॉक्टरों का स्टाइपेंड बढ़ाने को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब और तेज हो गया है। सोमवार सुबह से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन मंगलवार को भी जारी रहा। पुलिस की कार्रवाई से नाराज इंटर्न डॉक्टरों ने प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में ओपीडी बंद रखने का फैसला किया है। भोपाल के साथ ही इंदौर रतलाम और अन्य शहरों के सरकारी अस्पतालों में भी इंटर्न डॉक्टरों के आंदोलन का असर देखने को मिल रहा है। ओपीडी सेवाएं प्रभावित होने से इलाज और जांच के लिए अस्पताल पहुंचे मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है हालांकि इमरजेंसी सेवाओं को चालू रखा गया है।

    राजधानी भोपाल में इंटर्न डॉक्टर रातभर से कमला पार्क क्षेत्र की सड़क पर बैठे हुए हैं। डॉक्टरों ने सड़क पर प्रदर्शन करते हुए अपनी मांगों के समर्थन में विरोध दर्ज कराया। उनका कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर आधिकारिक रूप से बातचीत नहीं होती और स्टाइपेंड बढ़ाने को लेकर स्पष्ट निर्णय नहीं लिया जाता तब तक आंदोलन जारी रहेगा। प्रदर्शन के कारण यातायात व्यवस्था भी प्रभावित हुई है। स्थिति को देखते हुए पुलिस ने मुख्यमंत्री निवास की ओर जाने वाले रास्तों को बंद कर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है। अस्पताल परिसर और आसपास के इलाकों में भी पुलिस बल तैनात किया गया है।

    भोपाल के हमीदिया अस्पताल में आंदोलन का सबसे ज्यादा असर ओपीडी सेवाओं पर दिखाई दे रहा है। प्रदर्शन के कारण ओपीडी पूरी तरह बंद रही जबकि ऑपरेशन थिएटर के काम का भी बहिष्कार किया जा रहा है। इलाज और जांच के लिए दूरदराज से पहुंचे मरीजों को परेशान होना पड़ा। अस्पताल के तीन गेटों में से केवल गेट नंबर दो से प्रवेश की व्यवस्था की गई है। इमरजेंसी गेट बंद होने के कारण आपातकालीन मरीजों को भी इसी गेट से अस्पताल में प्रवेश करना पड़ रहा है जिससे अस्पताल के बाहर वाहनों और लोगों की आवाजाही बढ़ गई है और ट्रैफिक पर भी दबाव बना हुआ है।

    इधर इंदौर में भी इंटर्न डॉक्टरों ने एमवाय अस्पताल परिसर में विरोध रैली निकालकर आंदोलन को समर्थन दिया। भोपाल में प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई के विरोध में इंटर्न और रेजिडेंट डॉक्टर एकजुट हुए और अपनी मांगों के समर्थन में नारे लगाए। डॉक्टरों का कहना है कि वे लंबे समय से स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग कर रहे हैं और शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज करा रहे थे। उनका आरोप है कि भोपाल में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने वाटर कैनन और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया जिसके विरोध में अब प्रदेश के अलग अलग शहरों में भी प्रदर्शन तेज हो गया है।

    आंदोलन के बीच डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ला की अध्यक्षता में वरिष्ठ डॉक्टरों और अधिकारियों के साथ बैठक भी हुई। बैठक में इंटर्न डॉक्टरों की दो प्रमुख मांगों पर चर्चा की गई जिसमें स्टाइपेंड बढ़ाने और प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई का मुद्दा शामिल रहा। स्वास्थ्य मंत्री ने बातचीत को सकारात्मक बताया और कहा कि इंटर्न डॉक्टरों के प्रतिनिधि भी बैठक में शामिल हुए थे। मुख्यमंत्री के वापस आने के बाद इस मुद्दे पर फिर से चर्चा किए जाने की बात कही गई है।

    हालांकि इंटर्न डॉक्टरों का कहना है कि वे केवल मौखिक आश्वासन पर आंदोलन समाप्त नहीं करेंगे। उनका साफ कहना है कि स्टाइपेंड बढ़ाने का लिखित आदेश मिलने तक उनका विरोध जारी रहेगा। डॉक्टरों ने यह भी तर्क दिया है कि उत्तर प्रदेश में इंटर्न डॉक्टरों का स्टाइपेंड बढ़ाया गया है इसलिए मध्यप्रदेश सरकार को भी इस दिशा में जल्द निर्णय लेना चाहिए।

    फिलहाल सरकार और इंटर्न डॉक्टरों के बीच बातचीत जारी है लेकिन आंदोलन समाप्त होने को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। एक ओर सरकार समाधान के लिए बातचीत कर रही है तो दूसरी ओर इंटर्न डॉक्टर लिखित आदेश की मांग पर अड़े हुए हैं। ऐसे में आंदोलन का सीधा असर सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों पर पड़ रहा है और लोगों की नजर अब सरकार और डॉक्टरों के बीच होने वाली अगली बातचीत पर टिकी हुई है।

  • छाले मुंह में और दर्द कान में आखिर ऐसा क्यों होता है शरीर की नसों का ये कनेक्शन आपको हैरान कर देगा

    छाले मुंह में और दर्द कान में आखिर ऐसा क्यों होता है शरीर की नसों का ये कनेक्शन आपको हैरान कर देगा


    नई दिल्ली । मुंह में छाले होना एक आम समस्या है और ज्यादातर लोग इसे कुछ दिनों में अपने आप ठीक होने वाली परेशानी मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन कई बार मुंह में छाले होने के साथ कान में भी दर्द महसूस होने लगता है। ऐसी स्थिति में लोगों के मन में सवाल उठता है कि जब परेशानी मुंह के अंदर है तो कान में दर्द आखिर क्यों हो रहा है। दरअसल मुंह कान गले और चेहरे के आसपास के हिस्सों के बीच नसों का जटिल नेटवर्क मौजूद होता है। इसी वजह से एक जगह होने वाली परेशानी का असर दूसरी जगह दर्द के रूप में महसूस हो सकता है।

    मुंह में मौजूद छाले खासतौर पर जीभ के पीछे या मुंह के ऐसे हिस्से में हों जहां नसों की संवेदनशीलता अधिक हो तो उनका दर्द आसपास के हिस्सों तक महसूस हो सकता है। इसे referred pain यानी दूसरी जगह महसूस होने वाला दर्द कहा जाता है। ऐसे मामलों में दर्द का वास्तविक स्रोत मुंह में हो सकता है लेकिन व्यक्ति को उसका असर कान के आसपास महसूस होता है। यह स्थिति हर व्यक्ति में एक जैसी नहीं होती और दर्द की तीव्रता भी अलग हो सकती है।

    कान में दर्द के पीछे केवल मुंह के छाले ही जिम्मेदार नहीं होते। दांतों में संक्रमण मसूड़ों की परेशानी गले में सूजन टॉन्सिल की समस्या या जबड़े के आसपास होने वाली दिक्कत भी कान तक दर्द पहुंचा सकती है। कई बार कान में संक्रमण होने पर भी दर्द आसपास के चेहरे और जबड़े के हिस्से में महसूस होता है। इसलिए केवल कान में दर्द होने के आधार पर इसका कारण तय करना सही नहीं है।

    मुंह के छाले कई वजहों से हो सकते हैं। तनाव नींद की कमी मुंह में चोट बहुत ज्यादा मसालेदार भोजन या पोषण संबंधी कमी कुछ लोगों में छालों की समस्या से जुड़ी हो सकती है। आमतौर पर छोटे छाले कुछ समय में ठीक हो जाते हैं। इस दौरान बहुत ज्यादा तीखा या खट्टा भोजन खाने से बचना राहत दे सकता है। पर्याप्त पानी पीना और मुंह की साफ सफाई बनाए रखना भी जरूरी है।

    अगर छाले के साथ कान में हल्का दर्द है और कुछ दिनों में दोनों समस्याएं कम हो रही हैं तो आमतौर पर ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं होती। लेकिन अगर दर्द लगातार बढ़ रहा है या छाला बार बार हो रहा है तो इसकी वजह समझना जरूरी है। खासतौर पर यदि छाला लंबे समय तक ठीक न हो मुंह में लगातार सूजन या खून आए निगलने में परेशानी हो तेज बुखार हो या कान से संबंधित अन्य लक्षण दिखाई दें तो डॉक्टर या विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।

    बार बार होने वाले मुंह के छालों को भी केवल सामान्य समस्या मानकर लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कुछ मामलों में डॉक्टर जांच के बाद पोषण संबंधी कमी संक्रमण या किसी अन्य कारण की पहचान कर सकते हैं। इसी तरह लगातार कान दर्द होने पर ईएनटी विशेषज्ञ से जांच कराना उपयोगी हो सकता है।

    कुल मिलाकर मुंह के छाले और कान के दर्द के बीच सीधा संबंध हर मामले में नहीं होता लेकिन शरीर में नसों और आसपास के अंगों के आपसी कनेक्शन के कारण एक जगह की समस्या का दर्द दूसरी जगह महसूस हो सकता है। इसलिए दर्द की सही वजह समझना सबसे जरूरी है। घरेलू उपायों से राहत न मिले या लक्षण लगातार बने रहें तो विशेषज्ञ की सलाह लेना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।

  • रामायण पर कास्टिंग विवाद: रणबीर कपूर को भगवान राम के रूप में स्वीकार नहीं कर पाए रामानंद सागर के पोते, बोले नए चेहरे को मिलना चाहिए था मौका

    रामायण पर कास्टिंग विवाद: रणबीर कपूर को भगवान राम के रूप में स्वीकार नहीं कर पाए रामानंद सागर के पोते, बोले नए चेहरे को मिलना चाहिए था मौका


    नई दिल्ली । दर्शकों को ‘रामायण’ जैसा लोकप्रिय सीरियल देने वाले मशहूर फिल्म निर्माता रामानंद सागर के पोते शिव सागर ने नितेश तिवारी की फिल्म ‘रामायण’ में रणबीर कपूर की कास्टिंग पर नाराजगी जताई है। शिव सागर का कहना है कि संदीप रेड्डी वांगा की फिल्म ‘एनिमल’ में नैतिक रूप से जटिल किरदार निभाने के बाद उनके लिए रणबीर कपूर को भगवान राम के रूप में स्वीकार करना मुश्किल है।

    शिव सागर ने कहा कि एक कास्टिंग को छोड़कर उन्हें फिल्म की बाकी कास्टिंग काफी पसंद है। व्यक्तिगत रूप से वह रणबीर कपूर को भगवान राम के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि ‘एनिमल’ के बाद उनके लिए रणबीर को राम के तौर पर देखना मुश्किल है। उनके मुताबिक भगवान राम की भूमिका के लिए किसी नए चेहरे को लिया जाना चाहिए था।

    उन्होंने कहा कि फिल्म में यश और साई पल्लवी जैसे कलाकार अच्छे लग रहे हैं। उनके अनुसार इन कलाकारों के साथ कोई पुरानी छवि या पिछली भूमिकाओं का बोझ नहीं जुड़ा है। शिव सागर का मानना है कि इसी वजह से पौराणिक किरदारों के लिए अक्सर नए चेहरों को मौका दिया जाता है, ताकि दर्शकों के मन में कलाकार की कोई पुरानी छवि पहले से मौजूद न हो।

    हालांकि, शिव सागर ने यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत तौर पर उन्हें रणबीर कपूर से कोई परेशानी नहीं है। उन्होंने रणबीर को एक अच्छा अभिनेता बताया और कहा कि दर्शकों ने उन्हें अलग-अलग तरह के किरदारों में देखा है। उनके मुताबिक रणबीर को इस प्रोजेक्ट में इसलिए चुना गया होगा क्योंकि फिल्म की मार्केटिंग के लिहाज से उनकी लोकप्रियता महत्वपूर्ण हो सकती है। उनका मानना है कि रणबीर के बिना फिल्म की मार्केटिंग उतनी प्रभावी नहीं होती, इसलिए इस पहलू को भी ध्यान में रखा गया होगा।

    शिव सागर ने यह भी कहा कि रणबीर कपूर को ‘रामायण’ में देखने के बाद दर्शक उन्हें किस तरह स्वीकार करते हैं, इसका फैसला जनता ही करेगी। उनके मुताबिक भगवान राम और रामायण को लेकर भारतीय दर्शकों की भावनाएं बेहद गहरी हैं। उन्होंने कहा कि भारत में राम को केवल पौराणिक कथा का हिस्सा नहीं माना जाता, बल्कि लोग उन्हें अपने इतिहास और आस्था से जोड़कर देखते हैं। ऐसे में भगवान राम की भूमिका को लेकर दर्शकों की संवेदनशीलता स्वाभाविक है।

    इसी बीच कर्जत में राम मंदिर का निर्माण भी सागर परिवार के लिए बेहद खास पड़ाव बन गया है। मंदिर का सपना सबसे पहले रामानंद सागर ने देखा था, जिन्होंने 1987 में लोकप्रिय टीवी सीरियल ‘रामायण’ बनाया था। उनके बेटे प्रेम सागर ने इस सपने को आगे बढ़ाया और राजस्थान से भगवान राम की मूर्ति भी मंगवाई थी।

    प्रेम सागर के निधन के बाद उनके बेटे शिव सागर ने कर्जत में मंदिर का निर्माण कार्य पूरा किया। इस तरह रामानंद सागर की तीन पीढ़ियों से जुड़ा यह सपना आखिरकार पूरा हुआ। एक तरफ परिवार भगवान राम से जुड़े अपने सपने को पूरा कर चुका है, वहीं दूसरी तरफ शिव सागर ने नई फिल्म में भगवान राम की भूमिका के लिए रणबीर कपूर की कास्टिंग को लेकर अपनी स्पष्ट निजी राय रखी है।

  • आशा भोसले जयंती पर याद आए उनके अनसुने किस्से, गायिकी के साथ खाना बनाने में भी माहिर थीं ताई, लता दीदी पर भी चिल्लाई थीं

    आशा भोसले जयंती पर याद आए उनके अनसुने किस्से, गायिकी के साथ खाना बनाने में भी माहिर थीं ताई, लता दीदी पर भी चिल्लाई थीं

    नई दिल्ली । ‘अभी न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं’ जैसे सदाबहार गीतों से लोगों के दिलों में अपनी खास जगह बनाने वालीं आशा भोसले की आज 93वीं जयंती है। इस साल यह पहला जन्मदिन है जब आशा ताई हमारे बीच मौजूद नहीं हैं। उन्होंने अपने जन्मदिन से करीब पांच महीने पहले 12 अप्रैल 2026 को दुनिया को अलविदा कह दिया था। अपनी मखमली आवाज से सिनेमाई दुनिया में हजारों गाने देने वाली आशा भोसले की जिंदगी में संघर्ष से लेकर सफलता तक कई दिलचस्प पड़ाव आए।

    आशा भोसले का जन्म संगीत से जुड़े परिवार में हुआ था। उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर मशहूर थिएटर कलाकार और शास्त्रीय गायक थे। आशा का बचपन सुरों और संगीत के माहौल में बीता। जब वह महज 9 साल की थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद परिवार आर्थिक संकट में घिर गया और जीवनयापन के लिए पुणे और कोल्हापुर से होते हुए परिवार मुंबई आ गया।

    कम उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाने के लिए आशा भोसले ने गायकी की दुनिया में कदम रखा। उन्होंने महज 10 साल की उम्र में मराठी फिल्म ‘मझा बल’ के लिए ‘चला चला नव बाला’ गाना गाया था। साल 1943 में रिकॉर्ड किया गया यह गीत उनके शुरुआती फिल्मी सफर का अहम पड़ाव बना। आगे चलकर उन्होंने हिंदी सहित कई भाषाओं में हजारों गीत गाए और लोकगीत, गजल, शास्त्रीय संगीत, कव्वाली और बॉलीवुड गीतों में अपनी अलग पहचान बनाई।

    करियर के शुरुआती दौर में आशा भोसले को काफी संघर्ष करना पड़ा। उस समय गीता दत्त, शमशाद बेगम और लता मंगेशकर का दबदबा था। कई बार जब दूसरी गायिकाएं किसी गाने को छोड़ देती थीं, तब वह आशा को मिलता था। इसी वजह से 1950 के दशक में उन्होंने वैम्प्स और बैड गर्ल्स के किरदारों के लिए कई गाने गाए। इस दौर में यह अफवाह भी रही कि आशा अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर को प्रतिद्वंद्वी मानती थीं।

    हालांकि दोनों बहनों के बीच रिश्ता बेहद खास था। एक इंटरव्यू में आशा ने बताया था कि फिल्म ‘बसंत बहार’ के गीत ‘कर गया रे मुझपे जादू’ की रिकॉर्डिंग के दौरान वह लता दीदी पर चिल्ला पड़ी थीं। दोनों इस राग भैरवी आधारित गीत की कई बार रिहर्सल कर चुकी थीं। रिकॉर्डिंग के दिन आशा को एक और गाना रिकॉर्ड करने जाना था। करीब एक घंटे तक इंतजार करने के बाद उन्होंने रिहर्सल रूम में जाकर लता से कहा कि अब चलिए, वह और इंतजार नहीं कर सकतीं। इसके बाद लता ने मुस्कुराकर उनका गुस्सा शांत किया और दोनों रिकॉर्डिंग के लिए चली गईं।

    आशा भोसले की जिंदगी में निजी उतार-चढ़ाव भी रहे। 16 साल की उम्र में उन्होंने गणपत राव भोसले से शादी की। शादी के बाद उन्हें परिवार से दूरियां भी झेलनी पड़ीं। बाद में 1960 में वह अपने बच्चों के साथ मां के घर लौट आईं। इसके बाद उन्होंने फिर से गायकी शुरू की। आगे चलकर उनकी मुलाकात राहुल देव बर्मन यानी आरडी बर्मन से हुई और दोनों ने 1980 में शादी कर ली। आरडी बर्मन ने 4 जनवरी 1994 को कार्डियक अरेस्ट के कारण अंतिम सांस ली।

    गायकी के अलावा आशा भोसले को खाना बनाने का भी बेहद शौक था। वह स्वादिष्ट व्यंजन बनाने में माहिर थीं और उनके हाथ का कढ़ाई गोश्त और बिरयानी बेहद पसंद किए जाते थे। उन्होंने खुद बताया था कि अगर वह गायिका नहीं बनतीं तो अच्छी कुक बनकर पैसे कमातीं। उन्होंने विदेश में अपने नाम से रेस्तरां भी खोले थे। यही वजह है कि आशा ताई की पहचान केवल सुरों की महारानी के रूप में नहीं, बल्कि बेहतरीन पाक कला के लिए भी रही।

    आशा भोसले का 92 साल की उम्र में निधन हुआ। उनका आखिरी गाना ‘द शैडोई लाइट’ था, जिसे उन्होंने गोरिल्लाज के साथ रिकॉर्ड किया था और यह 27 फरवरी 2026 को रिलीज हुआ था। उनकी आवाज, संघर्ष और जिंदगी से जुड़े किस्से आज भी उन्हें संगीत प्रेमियों के बीच हमेशा खास बनाए रखते हैं।

  • ब्रेन एजिंग को धीमा करने का असरदार फॉर्मूला! उम्र बढ़ने पर भी दिमाग को जवान रखने में मदद कर सकता है संगीत

    ब्रेन एजिंग को धीमा करने का असरदार फॉर्मूला! उम्र बढ़ने पर भी दिमाग को जवान रखने में मदद कर सकता है संगीत


    नई दिल्ली । उम्र बढ़ना जीवन (Life)की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और इसके साथ शरीर के साथ-साथ दिमाग में भी कई तरह के बदलाव आने लगते हैं। बढ़ती उम्र में अक्सर लोगों को चीजें याद रखने में परेशानी होने लगती है किसी व्यक्ति(Decline) का नाम तुरंत याद नहीं आता या फिर एक साथ कई काम करने में पहले जैसी आसानी महसूस नहीं होती। सोचने समझने और जानकारी को प्रोसेस करने की गति भी समय के साथ प्रभावित हो सकती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि उम्र बढ़ने के साथ दिमागी क्षमता में गिरावट को पूरी तरह स्वीकार कर लिया जाए। विशेषज्ञों और अध्ययनों के अनुसार स्वस्थ जीवनशैली के साथ कुछ मानसिक गतिविधियां दिमाग को लंबे समय तक सक्रिय और मजबूत बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। इनमें संगीत सीखना और किसी वाद्य यंत्र को बजाने का अभ्यास एक दिलचस्प और प्रभावी तरीका माना जा रहा है।

    उम्र के साथ मस्तिष्क में धीरे-धीरे संरचनात्मक बदलाव होते हैं। कई लोगों में न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन बनाने और सूचनाओं को तेजी से प्रोसेस करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। मेडिकल रिपोर्ट्स में बताया गया है कि 40 वर्ष की आयु के बाद मस्तिष्क में होने वाले कुछ बदलाव अधिक स्पष्ट हो सकते हैं। इस प्रक्रिया को ब्रेन एट्रोफी या ब्रेन श्रिंकेज कहा जाता है। हालांकि हर व्यक्ति में इसका असर एक जैसा नहीं होता। व्यक्ति की जीवनशैली शिक्षा तनाव का स्तर सामाजिक सक्रियता और शारीरिक स्वास्थ्य जैसे कई कारक दिमाग पर उम्र के प्रभाव को प्रभावित कर सकते हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि कम उम्र से ही खानपान और जीवनशैली को बेहतर बनाने पर ध्यान देना जरूरी है। नियमित एक्सरसाइज अच्छी नींद संतुलित भोजन और मानसिक रूप से सक्रिय रहने की आदत ब्रेन हेल्थ को बनाए रखने में मदद कर सकती है। इसके साथ ही संगीत से जुड़ी गतिविधियां दिमाग के लिए खासतौर पर उपयोगी हो सकती हैं। किसी संगीत वाद्य यंत्र को सीखते समय दिमाग के कई हिस्से एक साथ सक्रिय होते हैं और यही इसे एक तरह का फुल ब्रेन वर्कआउट बनाता है।

    जब कोई व्यक्ति पियानो गिटार तबला वायलिन या अन्य वाद्य यंत्र बजाना सीखता है तो हाथों और अंगुलियों की गतिविधि के लिए मोटर कॉर्टेक्स सक्रिय होता है। स्वर और ताल को पहचानने के लिए ऑडिटरी सिस्टम काम करता है जबकि याददाश्त और एकाग्रता से जुड़े हिस्सों को भी लगातार सक्रिय रहना पड़ता है। संगीत के दौरान भावनात्मक प्रतिक्रिया और रचनात्मकता भी दिमाग की गतिविधियों का हिस्सा बनती है। यही कारण है कि संगीत प्रशिक्षण को मानसिक लचीलापन बढ़ाने वाली गतिविधियों में शामिल किया जाता है।

    अध्ययनों के अनुसार उम्र बढ़ने के बावजूद मस्तिष्क में नई तंत्रिका कड़ियां बनाने की क्षमता बनी रह सकती है। ऐसे में लगातार नई चीजें सीखना और दिमाग को चुनौती देने वाली गतिविधियों में शामिल होना उपयोगी हो सकता है। संगीत सीखना इस दिशा में एक रोचक विकल्प है क्योंकि इसमें सुनना समझना याद रखना हाथों की गतिविधियों को नियंत्रित करना और भावनात्मक रूप से जुड़ना एक साथ शामिल होता है।

    बढ़ती उम्र के साथ दिमाग की कोशिकाओं के बीच संचार की गति धीमी पड़ सकती है और स्मृति ध्यान तथा निर्णय क्षमता से जुड़े हिस्सों में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। कुछ अध्ययनों में उम्र के साथ ग्रे मैटर और व्हाइट मैटर में भी कमी की बात सामने आई है। फिर भी स्वस्थ जीवनशैली और मानसिक सक्रियता इन बदलावों की गति को प्रभावित कर सकती है। महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद होने वाले हार्मोनल बदलाव भी स्मृति और संज्ञानात्मक क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में महिलाओं के लिए भी संगीत योग ध्यान और सामाजिक जुड़ाव जैसी गतिविधियां ब्रेन हेल्थ को बेहतर बनाए रखने में सहायक हो सकती हैं।

    कुल मिलाकर बढ़ती उम्र को दिमाग की कमजोरी का अंतिम संकेत मानने की जरूरत नहीं है। नियमित शारीरिक गतिविधि पर्याप्त नींद संतुलित खानपान मानसिक व्यायाम और संगीत जैसी नई चीजें सीखने की आदत दिमाग को सक्रिय रखने में मदद कर सकती है। उम्र चाहे जो भी हो दिमाग को चुनौती देना और लगातार कुछ नया सीखते रहना मानसिक सेहत के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

  • रोहित शर्मा की टीवी पर एंट्री से उठे संन्यास के सवाल, जानिए BCCI के नियम क्या कहते हैं और वनडे करियर पर कितना पड़ेगा असर

    रोहित शर्मा की टीवी पर एंट्री से उठे संन्यास के सवाल, जानिए BCCI के नियम क्या कहते हैं और वनडे करियर पर कितना पड़ेगा असर

    नई दिल्ली । ‘हिटमैन’ के नाम से मशहूर रोहित शर्मा क्रिकेट के मैदान से इतर अब टीवी स्क्रीन पर भी नजर आने वाले हैं। पूर्व भारतीय कप्तान ‘फैमिली फुल हाउस’ से बतौर होस्ट टेलीविजन डेब्यू करने जा रहे हैं। शो का प्रीमियर 19 सितंबर 2026 को होगा। रोहित का यह नया कदम उनके क्रिकेट करियर के आखिरी दौर की ओर इशारा जरूर करता है, लेकिन इसे संन्यास का संकेत मानना जल्दबाजी होगी।

    रोहित शर्मा का सपना भारतीय टीम के लिए वनडे वर्ल्ड कप जीतना है। जब महेंद्र सिंह धोनी की अगुवाई में भारतीय टीम ने क्रिकेट वर्ल्ड कप 2011 जीता था, तो रोहित शर्मा उस टीम का हिस्सा नहीं थे। रोहित की कप्तानी में भारत ने 2023 के वर्ल्ड कप में फाइनल तक का सफर तय किया, जहां उसे निराशा हाथ लगी।

    रोहित शर्मा टेस्ट और टी20 इंटरनेशनल से पहले ही संन्यास ले चुके हैं। हालांकि, वनडे क्रिकेट में उनका सफर जारी है और वह भारतीय टीम की योजनाओं का हिस्सा हैं। टीवी शो की मेजबानी उनके करियर का एक नया पहलू जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने वनडे क्रिकेट छोड़ने का मन बना लिया है।

    ‘फैमिली फुल हाउस’ एक फैमिली एंटरटेनमेंट शो है, जिसमें रोहित शर्मा होस्ट की भूमिका निभाएंगे। शो का पूरा फॉर्मेट अभी सामने नहीं आया है, लेकिन इसके प्रमोशन ने पहले ही लोगों का ध्यान खींच लिया है। प्रोमो में रोहित के कप्तानी के दिनों के चर्चित ‘गार्डन’ कमेंट को भी दोबारा दिखाया गया है। इससे साफ है कि शो में उनके क्रिकेट करियर और उनकी मजेदार शख्सियत की झलक भी देखने को मिल सकती है।

    रोहित शर्मा के टीवी डेब्यू के बाद उनके क्रिकेट भविष्य को लेकर सवाल उठना लाजिमी है, लेकिन टीवी शो की मेजबानी और इंटरनेशनल क्रिकेट को एक साथ जारी रखने में कोई आधिकारिक बाध्यता नहीं है। भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड के नियम में ये कहीं नहीं लिखा है कि इंटरनेशनल क्रिकेट में एक्टिव क्रिकेटर्स टीवी शो होस्ट नहीं कर सकते।

    रोहित शर्मा की नजरें 2027 वनडे विश्व कप पर अभी से हैं। लॉर्ड्स में भारत के पिछले ओडीआई मैच में रोहित ने शानदार शतक लगाया था। वह इस ऐतिहासिक मैदान पर ओडीआई शतक लगाने वाले पहले भारतीय बल्लेबाज भी बने। इस प्रदर्शन ने एक बार फिर ओडीआई क्रिकेट में उनकी उपयोगिता को सामने रखा।

    रोहित शर्मा आईपीएल में मुंबई इंडियंस के लिए भी खेलते हैं। यानी फिलहाल उनके करियर में क्रिकेट और मनोरंजन, दोनों की भूमिका बढ़ती दिखाई दे रही है। टीवी पर नई पारी की शुरुआत रोहित के करियर में बड़ा बदलाव जरूर है, लेकिन अभी इसे क्रिकेट से विदाई नहीं माना जा सकता। खासकर ओडीआई और 2027 विश्व कप को लेकर उनकी योजनाएं अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।

  • Shubman Gill को अभिषेक शर्मा के पिता ने दिए 5000 रुपये, मैच के तुरंत बाद वायरल तस्वीर ने जीता फैन्स का ध्यान

    Shubman Gill को अभिषेक शर्मा के पिता ने दिए 5000 रुपये, मैच के तुरंत बाद वायरल तस्वीर ने जीता फैन्स का ध्यान

    नई दिल्ली । भारतीय टीम के कप्तान शुभमन गिल इन दिनों शेर-ए-पंजाब टी20 लीग में बल्ले से दमखम दिखा रहे हैं। फाजिल्का फाल्कन्स की तरफ से सीजन का पहला मैच खेलने उतरे शुभमन गिल ने अपने खेल से फैन्स का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

    मैच के बाद शेर-ए-पंजाब टी20 लीग में कुछ ऐसा हुआ, जिसने फैन्स का दिल जीत लिया। मैच खत्म होने के बाद शुभमन गिल को अभिषेक शर्मा के पापा राजकुमार शर्मा से 5000 रुपये का खास इनाम मिला।

    दरअसल, लुधियाना लायंस के खिलाफ खेले गए इस रोमांचक मुकाबले में गिल ने महज 21 गेंदों में 40 रनों की तूफानी पारी खेली। अपनी इस पारी के दौरान उन्होंने मैदान के चारों तरफ शॉट लगाए और सबसे ज्यादा 7 शानदार चौके और 1 गगनचुंबी छक्का जड़ा।

    मैच में सबसे ज्यादा चौके लगाने वाले शुभमन गिल के प्रदर्शन से खुश होकर अभिषेक शर्मा के पिता ने गिल को शाबाशी के तौर पर 5000 रुपये का इनाम थमाया। ये पांच हजार रुपये टूर्नामेंट की तरफ से दिए गए हैं, लेकिन गिल को यह अभिषेक के पिता के हाथों से मिला है। शुभमन गिल के साथ अभिषेक शर्मा के पिता की तस्वीर भी तेजी से ध्यान खींच रही है।

    गिल की इस विस्फोटक शुरुआत की बदौलत फाजिल्का फाल्कन्स ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 9 विकेट खोकर 170 रन बनाए। जवाब में अर्शदीप सिंह की कप्तानी वाली लुधियाना लायंस की टीम आखिरी गेंद तक लड़ी, लेकिन 169 रन ही बना सकी और फाल्कन्स ने यह मैच 1 रन के बेहद नजदीकी अंतर से जीत लिया।

    लुधियाना के गेंदबाज कार्तिक चड्ढा ने बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 4 ओवर में सिर्फ 9 रन देकर 4 विकेट चटकाए, जिसमें शुभमन गिल का बड़ा विकेट भी शामिल था। गिल के आउट होने के बाद प्रेरित दत्ता ने 36 रन और जयवीर भिंडर ने 21 रन बनाकर टीम का स्कोर 170 तक पहुंचाया।

    लुधियाना को जीत के लिए आखिरी ओवर में 19 रन चाहिए थे। 16 गेंदों में 37 रन जड़ने वाले माधव पठानिया ने पूरी ताकत झोंकी, लेकिन आखिरी गेंद पर छक्के की जगह सिर्फ चौका ही मार सके। इस तरह शुभमन गिल की टीम फाजिल्का फाल्कन्स एक रन से मैच जीतने में सफल रही।

  • World Physiotherapy Day 2026: स्ट्रोक के बाद फिजियोथेरेपी क्यों है बेहद जरूरी, जानिए मूवमेंट, बैलेंस और रिकवरी में इसके बड़े फायदे

    World Physiotherapy Day 2026: स्ट्रोक के बाद फिजियोथेरेपी क्यों है बेहद जरूरी, जानिए मूवमेंट, बैलेंस और रिकवरी में इसके बड़े फायदे

    नई दिल्ली । दुनियाभर में 8 सितंबर को विश्व फिजियोथेरेपी दिवस 2026 मनाया जाता है। इसका मकसद लोगों को फिजियोथेरेपी के फायदों के बारे में जागरूक करना है। इस बार की थीम हार्ट डिजीज और स्ट्रोक की रोकथाम, प्रबंधन और रिहैबिलिटेशन में फिजियोथेरेपी की भूमिका पर केंद्रित है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि फिजियोथेरेपी केवल हड्डियों की बीमारियों के लिए नहीं बल्कि स्ट्रोक के बाद रिहैबिलिटेशन के लिए भी जरूरी है।

    एक्सपर्ट्स का कहना है कि फिजियोथेरेपी को लोग अक्सर केवल कमर, घुटने या कंधे के दर्द से जोड़कर देखते हैं, लेकिन इसका दायरा इससे कहीं बड़ा है। नियमित और सही तरीके से की गई फिजियोथेरेपी हार्ट डिजीज से बचाव में मदद कर सकती है। दूसरी तरफ, अगर किसी व्यक्ति को स्ट्रोक आ जाता है तो रिहैबिलिटेशन के लिए भी फिजियोथेरेपी जरूरी है। इसकी मदद से स्ट्रोक के बाद आने वाली परेशानी को काबू में किया जा सकता है।

    स्ट्रोक के बाद मरीज में हाथ-पैर की कमजोरी, चलने में परेशानी, संतुलन बिगड़ना और रोजमर्रा के काम करने में दिक्कत हो सकती है। विशेषज्ञ के अनुसार, मरीज की स्थिति के अनुरूप फिजियोथेरेपी और रिहैबिलिटेशन से मूवमेंट और बैलेंस बेहतर करने में मदद मिल सकती है। स्ट्रोक के बाद रिहैबिलिटेशन को केवल अस्पताल तक सीमित नहीं रखना चाहिए। मरीज और परिवार को घर पर भी सुरक्षित तरीके से एक्सरसाइज करनी चाहिए।

    फिजियोथेरेपी में टेक्नोलॉजी का बढ़ता इस्तेमाल फिजियोथेरेपी भी अब तेजी से टेक्नोलॉजी आधारित हो रही है। मोशन एनालिसिस, सेंसर-बेस्ड मॉनिटरिंग, वियरेबल डिवाइस, डिजिटल एक्सरसाइज प्रोग्राम और रोबोटिक रिहैबिलिटेशन जैसी तकनीकें आ रही हैं।

    डॉ. इंद्रमणि उपाध्याय बताते हैं कि आज की सबसे बड़ी समस्या ‘कम मूवमेंट वाली लाइफस्टाइल’ है। ऑफिस में घंटों बैठना, स्क्रीन टाइम बढ़ना और एक्सरसाइज की कमी शरीर को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है। ऐसे में हर उम्र के व्यक्ति के लिए एक्सरसाइज करना जरूरी है। इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि ये आपको हार्ट डिजीज से लेकर कई बीमारियों से बचा सकती है।

  • स्ट्रोक के बाद कमजोरी और बिगड़े संतुलन से मिलेगी राहत! फिजियोथेरेपी क्यों है मरीजों के लिए जरूरी, डॉक्टर से समझें

    स्ट्रोक के बाद कमजोरी और बिगड़े संतुलन से मिलेगी राहत! फिजियोथेरेपी क्यों है मरीजों के लिए जरूरी, डॉक्टर से समझें

    नई दिल्ली । हर साल 8 सितंबर को विश्व फिजियोथेरेपी दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को फिजियोथेरेपी के महत्व और इसके स्वास्थ्य संबंधी फायदों के प्रति जागरूक करना है। आमतौर पर लोग फिजियोथेरेपी को केवल कमर दर्द घुटनों के दर्द कंधे की समस्या या हड्डियों से जुड़ी परेशानियों से जोड़कर देखते हैं लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इसका दायरा इससे कहीं ज्यादा बड़ा है। सही समय पर और विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार की गई फिजियोथेरेपी हार्ट हेल्थ को बेहतर बनाए रखने के साथ ही स्ट्रोक के बाद मरीज के रिहैबिलिटेशन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    स्ट्रोक के बाद मरीज को कई तरह की शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। कई लोगों में हाथ और पैरों में कमजोरी आ जाती है जबकि कुछ मरीजों को चलने फिरने में परेशानी होने लगती है। शरीर का संतुलन बिगड़ना और रोजमर्रा के सामान्य कामों को करने में कठिनाई भी स्ट्रोक के बाद होने वाली समस्याओं में शामिल हो सकती है। ऐसे समय में मरीज की स्थिति के अनुसार शुरू किया गया फिजियोथेरेपी और रिहैबिलिटेशन कार्यक्रम उसकी मूवमेंट और बैलेंस को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि स्ट्रोक के बाद रिहैबिलिटेशन को केवल अस्पताल तक सीमित नहीं रखना चाहिए। मरीज के उपचार और उसकी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए घर पर भी सुरक्षित तरीके से एक्सरसाइज और गतिविधियां जारी रखना उपयोगी हो सकता है। हालांकि किसी भी प्रकार की एक्सरसाइज बिना डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह के शुरू नहीं करनी चाहिए। हर स्ट्रोक मरीज की स्थिति अलग हो सकती है इसलिए उसके लिए रिहैबिलिटेशन का तरीका भी व्यक्तिगत जरूरतों के अनुसार तय किया जाना जरूरी है।

    फिजियोथेरेपी का मुख्य उद्देश्य केवल दर्द कम करना नहीं है बल्कि शरीर की कार्यक्षमता और मूवमेंट को बेहतर बनाने में मदद करना भी है। स्ट्रोक के बाद शरीर के प्रभावित हिस्सों को दोबारा सक्रिय करने के लिए नियमित और सही अभ्यास महत्वपूर्ण हो सकता है। एक्सरसाइज और रिहैबिलिटेशन की मदद से मरीज को शरीर की गतिविधियों पर बेहतर नियंत्रण पाने और संतुलन सुधारने में सहायता मिल सकती है। इससे धीरे-धीरे रोजमर्रा के कामों को करने में भी मदद मिल सकती है।

    आज फिजियोथेरेपी का क्षेत्र तेजी से तकनीक आधारित भी होता जा रहा है। मोशन एनालिसिस सेंसर बेस्ड मॉनिटरिंग वियरेबल डिवाइस डिजिटल एक्सरसाइज प्रोग्राम और रोबोटिक रिहैबिलिटेशन जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है। इन आधुनिक तरीकों की मदद से मरीज की गतिविधियों को बेहतर तरीके से समझने और उसकी प्रगति पर नजर रखने में सहायता मिल सकती है।

    विश्व फिजियोथेरेपी दिवस के मौके पर विशेषज्ञ कम मूवमेंट वाली लाइफस्टाइल को भी बड़ी समस्या मानते हैं। आज के समय में घंटों तक ऑफिस में बैठे रहना बढ़ता स्क्रीन टाइम और एक्सरसाइज की कमी शरीर को धीरे-धीरे कमजोर कर सकती है। शारीरिक गतिविधि कम होने से कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए केवल बीमारी या दर्द होने के बाद ही नहीं बल्कि स्वस्थ रहने के लिए भी हर उम्र के लोगों को अपनी दिनचर्या में नियमित शारीरिक गतिविधि को शामिल करना चाहिए।

    कुल मिलाकर फिजियोथेरेपी को केवल हड्डियों और जोड़ों के दर्द तक सीमित समझना सही नहीं है। स्ट्रोक के बाद सही रिहैबिलिटेशन मरीज की मूवमेंट और संतुलन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। विशेषज्ञ की निगरानी में नियमित एक्सरसाइज और सक्रिय जीवनशैली अपनाकर शरीर की कार्यक्षमता को बेहतर बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा सकता है।

  • कॉपर की कीमत ने तोड़े सारे रिकॉर्ड….ऑल टाइम हाई पर पहुंचे भाव

    कॉपर की कीमत ने तोड़े सारे रिकॉर्ड….ऑल टाइम हाई पर पहुंचे भाव


    नई दिल्ली।
    कॉपर (Copper) की कीमतों ने सोमवार को नया रिकॉर्ड (New record) बना दिया। दुनिया के प्रमुख कमोडिटी बाजार लंदन मेटल एक्सचेंज (London Metal Exchange- LME) पर कॉपर की कीमत (Copper Price) बढ़कर 14,533 डॉलर प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गई। इसने जनवरी में बने 14,527.50 डॉलर प्रति टन के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। हालांकि, बाद में कीमत थोड़ी नरम हुई और 0.7% की बढ़त के साथ करीब 14,518 डॉलर प्रति टन पर कारोबार करती रही। कॉपर की कीमत में इस तेजी की सबसे बड़ी वजह अमेरिका के बाहर सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंता है।

    इसके अलावा कमजोर अमेरिकी डॉलर ने भी मेटल्स की कीमतों को सपोर्ट दिया है। डॉलर कमजोर होने पर दूसरी करेंसी रखने वाले खरीदारों के लिए डॉलर में कीमत वाले मेटल अपेक्षाकृत सस्ते हो जाते हैं, जिससे डिमांड को सपोर्ट मिलता है।


    अमेरिका में रिकॉर्ड स्तर पर कॉपर का स्टॉक

    कॉपर की ग्लोबल सप्लाई को लेकर सबसे दिलचस्प स्थिति अमेरिका और बाकी दुनिया के बीच देखने को मिल रही है। अमेरिका में कॉपर का स्टॉक रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। COMEX के गोदामों में कॉपर का स्टॉक करीब 7,66,795 शॉर्ट टन, यानी लगभग 6.96 लाख मीट्रिक टन हो गया है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि संभावित अमेरिकी आयात शुल्क की आशंका के चलते ट्रेडर्स और प्रोड्यूसर्स ने बड़ी मात्रा में कॉपर अमेरिका भेजना शुरू कर दिया था। जानकारों के मुताबिक, जब तक टैरिफ को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है, तब तक कॉपर की कीमतें ऊंची रह सकती हैं और अमेरिका की ओर मेटल का फ्लो जारी रह सकता है।


    गोदामों में कॉपर का स्टॉक घटा

    दूसरी तरफ अमेरिका के बाहर कॉपर की उपलब्धता कम होती दिखाई दे रही है। लंदन मेटल एक्सचेंज में कैंसल्ड वारंट्स का स्तर 51% तक पहुंच गया है। इसका मतलब है कि 1.21 लाख टन से ज्यादा कॉपर आने वाले हफ्तों में एक्सचेंज के सिस्टम से बाहर जा सकता है। वहीं, शंघाई फ्यूचर्स एक्सचेंज के गोदामों में कॉपर का स्टॉक मार्च के मध्य से करीब 85% घटकर 63,000 टन रह गया है। यह जनवरी 2024 के बाद सबसे निचला स्तर है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा कॉपर उपभोक्ता है, इसलिए वहां घटते स्टॉक ने सप्लाई को लेकर चिंता और बढ़ा दी है।


    दूसरे बेस मेटल्स पर भी असर

    कॉपर की कीमतों में तेजी का असर दूसरे बेस मेटल्स पर भी दिखाई दिया। जिंक 1.1% चढ़कर 3,988 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गया, जबकि एल्युमिनियम 0.7% बढ़कर 3,315 डॉलर और टिन 0.4% बढ़कर 55,100 डॉलर प्रति टन हो गया। दूसरी ओर, निकेल 0.7% गिरकर 16,725 डॉलर और लेड 0.3% कमजोर होकर 1,903 डॉलर प्रति टन पर आ गया। कुल मिलाकर, अमेरिका में बढ़ते स्टॉक और अमेरिका के बाहर घटती उपलब्धता ने कॉपर मार्केट में एक बड़ा अंतर पैदा कर दिया है। अगर वैश्विक सप्लाई पर दबाव आगे भी बना रहता है, तो कॉपर की कीमतों में तेजी का सिलसिला जारी रहने की संभावना पर बाजार की नजर बनी रहेगी।