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  • Su-57D फाइटर जेट: रूस का नया दो-सीट स्टील्थ विमान, भारत के लिए क्यों माना जा रहा है संभावित गेमचेंजर

    Su-57D फाइटर जेट: रूस का नया दो-सीट स्टील्थ विमान, भारत के लिए क्यों माना जा रहा है संभावित गेमचेंजर


    नई दिल्ली। रूस के सुखोई डिजाइन ब्यूरो के मुख्य टेस्ट पायलट सर्गेई बोगदान ने Su-57D दो-सीट स्टील्थ फाइटर जेट को लेकर कई अहम जानकारियां साझा की हैं। इस विमान ने 19 मई को अपनी पहली उड़ान भरी है और इसे भविष्य के युद्धों में कमांड और कंट्रोल क्षमता वाला एक एडवांस प्लेटफॉर्म बताया जा रहा है।

    पायलट के अनुसार, Su-57D में दूसरा कॉकपिट केवल सह-पायलट के लिए नहीं बल्कि एक ऐसे कमांडर के लिए है जो हवा में रहते हुए पूरे ऑपरेशन को नियंत्रित कर सकता है। यह विमान युद्ध के दौरान कम्युनिकेशन बाधित होने पर भी मिशन को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ाने में सक्षम माना जा रहा है।

    एयरबोर्न कमांड सेंटर की तरह काम करेगा विमान
    Su-57D को केवल फाइटर जेट नहीं बल्कि एक फ्लाइंग कमांड सेंटर के रूप में देखा जा रहा है, जो ड्रोन और अन्य युद्ध प्रणालियों को नियंत्रित करने की क्षमता रखता है। इसे ‘लॉयल विंगमैन’ ड्रोन नेटवर्क के साथ जोड़कर बड़े पैमाने पर ऑपरेशन चलाने के लिए डिजाइन किया जा रहा है।

    रूसी विशेषज्ञों का दावा है कि यह जेट भविष्य में जटिल मिशनों में तेजी से निर्णय लेने और दुश्मन की रक्षा प्रणालियों को बाधित करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

    भारत के संदर्भ में रणनीतिक महत्व
    रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह विमान भारतीय वायुसेना के साथ जुड़ता है तो लद्दाख और तवांग जैसे संवेदनशील इलाकों में चीनी एयर डिफेंस सिस्टम के खिलाफ गहरे हमलों में मदद मिल सकती है। यह भारतीय स्वदेशी ड्रोन प्रोजेक्ट CATS के साथ भी इंटीग्रेट होकर नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध क्षमता को मजबूत कर सकता है।हालांकि भारत पहले ही रूस के FGFA प्रोजेक्ट से बाहर हो चुका है, लेकिन दो-सीट Su-57D के आने के बाद रक्षा हलकों में एक बार फिर इस प्लेटफॉर्म को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    चीन की रणनीति और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा
    चीन पहले से ही दो-सीट 5th जनरेशन फाइटर और ड्रोन-नेटवर्क आधारित एयर वॉरफेयर सिस्टम पर काम कर रहा है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को भी इसी तरह की क्षमता विकसित करनी होगी ताकि तिब्बत क्षेत्र में किसी भी रणनीतिक चुनौती का जवाब दिया जा सके।

  • मुजफ्फरनगर में फेरीवालों की पिटाई, भीड़ ने चाचा-भतीजे को पीटा; पुलिस ने बचाई जान

    मुजफ्फरनगर में फेरीवालों की पिटाई, भीड़ ने चाचा-भतीजे को पीटा; पुलिस ने बचाई जान




    नई दिल्ली। मुजफ्फरनगर (नई मंडी कोतवाली क्षेत्र) की वसुंधरा कॉलोनी में रविवार देर शाम उस समय हड़कंप मच गया जब कपड़े की फेरी लगाने पहुंचे आमिर मलिक और जावेद को स्थानीय लोगों ने संदिग्ध समझकर पीट दिया। दोनों रिश्ते में चाचा-भतीजे हैं और फेरी लगाकर कपड़े बेचने का काम करते हैं।

    जानकारी के अनुसार, दोनों पहले भी कॉलोनी में सामान बेचने आ चुके थे और कुछ लोगों के बुलाने पर ही दोबारा वहां पहुंचे थे। लेकिन देर शाम और रात होने के कारण कुछ लोगों को उन पर शक हुआ, जिसके बाद भीड़ इकट्ठा हो गई और दोनों के साथ मारपीट शुरू कर दी गई।

    मारपीट में दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें घायल अवस्था में दोनों दिखाई दे रहे हैं।सूचना मिलने पर नई मंडी पुलिस मौके पर पहुंची और दोनों को भीड़ से बचाकर अपनी हिरासत में लिया। इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया।

    पुलिस जांच में क्या आया सामने
    सीओ नई मंडी राजू कुमार साव के अनुसार, शुरुआती जांच में दोनों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं मिला है। वे फेरी लगाकर कपड़े बेचने का काम करते हैं और पहले भी इलाके में आ चुके हैं। पुलिस अब स्थानीय लोगों से पूछताछ कर रही है और पूरे मामले की जांच जारी है।

  • रामचरितमानस पर सपा का बदला रुख: अखिलेश यादव ने इसे बताया ‘सांस्कृतिक संविधान’, यूपी की राजनीति में फिर गरमाई बहस

    रामचरितमानस पर सपा का बदला रुख: अखिलेश यादव ने इसे बताया ‘सांस्कृतिक संविधान’, यूपी की राजनीति में फिर गरमाई बहस




    लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर रामचरितमानस को लेकर समाजवादी पार्टी का रुख चर्चा में है। लोकसभा चुनाव से पहले जिस मुद्दे पर सपा के भीतर विवाद और राजनीतिक टकराव देखने को मिला था, अब उसी पर पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का रुख काफी नरम और अलग नजर आ रहा है।

    हाल ही में लखनऊ में अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान एक वकील के साथ हुई मारपीट की घटना के बाद मामला फिर सुर्खियों में आया। बताया गया कि वकील के हाथ में रामचरितमानस की प्रति थी। इसी घटना के बाद अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए रामचरितमानस को “सांस्कृतिक संविधान का एक रूप” और “नैतिक आचार संहिता” बताया, जिससे राजनीतिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है।

    पहले विवाद, अब नया रुख
    लोकसभा चुनाव 2024 से पहले समाजवादी पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य ने रामचरितमानस के कुछ दोहों को लेकर विवादित बयान दिया था। उन्होंने इन दोहों को महिलाओं, दलितों और पिछड़ों के प्रति अपमानजनक बताते हुए उन्हें हटाने की मांग की थी। इस बयान के बाद बीजेपी ने सपा पर तीखा हमला बोला था और मामला राजनीतिक रूप से काफी गरमा गया था।

    बाद में यह विवाद इतना बढ़ा कि स्वामी प्रसाद मौर्य ने समाजवादी पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। उस समय अखिलेश यादव ने इस पूरे विवाद पर खुलकर कोई सख्त रुख नहीं अपनाया था, लेकिन अब उनका बदला हुआ स्टैंड राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

    चुनावी रणनीति या जनभावना का असर?
    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगले विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी अपनी छवि को व्यापक जनसमर्थन के अनुरूप ढालने की कोशिश कर रही है। रामचरितमानस जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर नरम रुख अपनाकर सपा आम मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।

    वहीं बीजेपी का आरोप है कि सपा राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए अब धार्मिक प्रतीकों का सहारा ले रही है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि जो लोग पहले भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठाते रहे हैं, वे अब धार्मिक ग्रंथों का सम्मान दिखा रहे हैं।

    विपक्ष और सहयोगी दलों की प्रतिक्रिया
    इस मुद्दे पर कांग्रेस ने अखिलेश यादव के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि रामचरितमानस भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का हिस्सा है और इसे राजनीति से अलग रखकर देखा जाना चाहिए। वहीं बसपा ने इस पूरे मामले पर टिप्पणी से दूरी बनाए रखी है।

    यूपी की सियासत में नया मोड़
    रामचरितमानस को लेकर सपा के बदले सुर ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सांस्कृतिक और धार्मिक विमर्श को केंद्र में ला दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले चुनावों में यह मुद्दा सियासी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।फिलहाल यह साफ है कि यूपी की राजनीति में धर्म और संस्कृति एक बार फिर रणनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा बनते जा रहे हैं।

  • ममता सरकार पर बढ़ा दबाव: 91 पार्षदों के इस्तीफे के दावे ने बदला बंगाल की राजनीति का समीकरण

    ममता सरकार पर बढ़ा दबाव: 91 पार्षदों के इस्तीफे के दावे ने बदला बंगाल की राजनीति का समीकरण

    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया और बड़ा सियासी घटनाक्रम चर्चा का विषय बना हुआ है। राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को लेकर उठे एक बड़े दावे ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। दावा किया जा रहा है कि पार्टी के 91 पार्षदों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया है, जिसके बाद स्थानीय निकायों से लेकर राज्य की राजनीति तक कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इस घटनाक्रम को लेकर सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज होता दिखाई दे रहा है।

    बताया जा रहा है कि विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहे हैं। इसी बीच बड़ी संख्या में पार्षदों के सामूहिक इस्तीफे का दावा सामने आने से राजनीतिक समीकरणों को लेकर अटकलें बढ़ गई हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि स्थानीय स्तर पर पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ रहा है और इसका असर अब संगठनात्मक ढांचे पर भी दिखाई देने लगा है।

    राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, स्थानीय निकायों में प्रशासनिक और वित्तीय मामलों की समीक्षा तथा विभिन्न स्तरों पर जांच की प्रक्रिया तेज होने के बाद कई नेताओं में असहजता बढ़ी है। इसी वजह से स्थानीय स्तर पर राजनीतिक हलचल और तेज होती दिखाई दे रही है। कई दावे ऐसे भी सामने आए हैं जिनमें कहा जा रहा है कि आने वाले समय में और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी माना जा रहा है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बाद नगर निकायों की कार्यप्रणाली को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। यदि बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों के इस्तीफे की स्थिति बनती है तो प्रशासनिक व्यवस्था पर उसका असर पड़ना स्वाभाविक माना जा रहा है। स्थानीय स्तर पर कई विकास परियोजनाओं और नागरिक सुविधाओं से जुड़े काम प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से स्थानीय निकायों की मजबूत संरचना के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे में यदि जमीनी स्तर पर राजनीतिक बदलाव के संकेत दिखाई देते हैं तो इसका असर बड़े चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम लोगों की भी नजर बनी हुई है।

    वहीं दूसरी ओर इस पूरे मामले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे बड़े राजनीतिक बदलाव की शुरुआत मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे राजनीतिक रणनीति और दबाव की राजनीति से जोड़कर देख रहे हैं। राजनीतिक माहौल में बढ़ी इस हलचल ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति आने वाले दिनों में और अधिक दिलचस्प मोड़ ले सकती है।

    फिलहाल इस दावे को लेकर चर्चा और बहस का दौर जारी है। आने वाले समय में यदि इस पूरे घटनाक्रम पर अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आती है तो राज्य की राजनीति में इसके व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। बंगाल का सियासी तापमान फिलहाल बढ़ा हुआ है और सभी की नजर अब अगले घटनाक्रम पर टिकी हुई है।

  • बिजली कटौती से नहीं रुकेगी नमो भारत ट्रेन, NCRTC ने बताया, मजबूत मल्टी-लेयर बैकअप सिस्टम से पूरी तरह सुरक्षित संचालन

    बिजली कटौती से नहीं रुकेगी नमो भारत ट्रेन, NCRTC ने बताया, मजबूत मल्टी-लेयर बैकअप सिस्टम से पूरी तरह सुरक्षित संचालन




    नई दिल्ली। दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ कॉरिडोर पर चल रही नमो भारत (RRTS) ट्रेन को लेकर यात्रियों के बीच बिजली कटौती के दौरान सेवा बाधित होने की आशंका जताई जा रही थी, खासकर गुड़गांव में हाल ही में मेट्रो सेवा प्रभावित होने की घटना के बाद। लेकिन नेशनल कैपिटल रीजन ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (NCRTC) ने साफ किया है कि नमो भारत ट्रेन का सिस्टम सामान्य मेट्रो या ट्रेनों की तुलना में कहीं अधिक आधुनिक और सुरक्षित है, जिससे बिजली फेल होने की स्थिति में भी संचालन रुकने की संभावना बेहद कम है।

    NCRTC के अनुसार नमो भारत ट्रेनें 25 केवी (किलोवोल्ट) 50 हर्ट्ज ओवरहेड इलेक्ट्रिक सिस्टम से चलती हैं, जिसे ओवरहेड कैटेनरी सिस्टम (OCS) के जरिए सप्लाई दी जाती है। पूरा कॉरिडोर अलग-अलग बड़े सब-स्टेशनों और मल्टी-ग्रिड नेटवर्क से जुड़ा हुआ है, जिससे किसी एक स्थान पर फॉल्ट आने पर दूसरा ग्रिड तुरंत पावर सपोर्ट संभाल लेता है और ट्रेन संचालन बाधित नहीं होता।

    रीजनरेटिव ब्रेकिंग से खुद बनती है बिजली
    इस ट्रेन की एक खास तकनीक रीजनरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम है, जिसमें ट्रेन ब्रेक लगाने के दौरान अपनी गतिज ऊर्जा को बिजली में बदलकर वापस ग्रिड में भेजती है। इससे लगभग 30 प्रतिशत तक ऊर्जा की बचत होती है और सिस्टम को अतिरिक्त पावर सपोर्ट भी मिलता है, जो आपात स्थिति में मददगार साबित होता है।

    SCADA सिस्टम से रियल टाइम निगरानी
    पूरे 82 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर की निगरानी के लिए SCADA (Supervisory Control and Data Acquisition) सिस्टम लगाया गया है। यह सिस्टम हर सब-स्टेशन और पावर फ्लो पर लगातार नजर रखता है और किसी भी तकनीकी खराबी की स्थिति में तुरंत पावर को दूसरे स्रोत की ओर डायवर्ट कर देता है, जिससे सेवा बिना रुके जारी रहती है।

    पूरी तरह बिजली गुल होने पर भी सुरक्षित संचालन
    NCRTC के अनुसार, यदि किसी वजह से मुख्य बिजली आपूर्ति पूरी तरह बाधित हो जाती है, तब भी ट्रेनों और स्टेशनों में लगी बैकअप बैटरियां जरूरी सिस्टम जैसे लाइट, एयर कंडीशनिंग, कंट्रोल सिस्टम और इमरजेंसी गेट को चालू रखती हैं। इससे यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित रहती है और किसी भी तरह की आपात स्थिति में ट्रेन को सुरक्षित तरीके से रोका जा सकता है।

    गुड़गांव घटना से तुलना नहीं संभव
    हाल ही में गुड़गांव में बिजली बाधित होने से रैपिड मेट्रो सेवा प्रभावित हुई थी, लेकिन NCRTC का दावा है कि नमो भारत का पावर इंफ्रास्ट्रक्चर मल्टी-लेयर बैकअप सिस्टम पर आधारित है, इसलिए ऐसी स्थिति यहां बनने की संभावना बेहद कम है। इस तकनीकी मजबूती के चलते दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ कॉरिडोर पर यात्रा करने वाले लाखों यात्रियों को भरोसेमंद और निर्बाध सेवा मिलने का दावा किया गया है।

  • पंजाब निकाय चुनाव में तनाव की एंट्री: प्रत्याशी पर हमला, बूथ कैप्चरिंग के आरोप और सुरक्षा पर सवाल

    पंजाब निकाय चुनाव में तनाव की एंट्री: प्रत्याशी पर हमला, बूथ कैप्चरिंग के आरोप और सुरक्षा पर सवाल

    नई दिल्ली। पंजाब में निकाय चुनाव के लिए मतदान के दौरान राज्य का राजनीतिक माहौल लगातार गर्माता नजर आया। सुबह मतदान शुरू होने के साथ ही कई क्षेत्रों में मतदाताओं की लंबी कतारें दिखाई दीं, लेकिन दिन बढ़ने के साथ कुछ इलाकों से विवाद, झड़प और आरोप-प्रत्यारोप की खबरें सामने आने लगीं। चुनावी प्रक्रिया के बीच कई घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था और कानून-व्यवस्था को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए। हालांकि प्रशासन ने दावा किया कि अधिकांश क्षेत्रों में मतदान शांतिपूर्ण तरीके से जारी रहा और सुरक्षा एजेंसियां हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

    राज्य के विभिन्न नगर निगम, नगर कौंसिल और नगर पंचायतों में हजारों उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं और लाखों मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। चुनाव को लेकर इस बार विशेष सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। संवेदनशील और अतिसंवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया तथा मतदान केंद्रों पर विशेष निगरानी रखी गई। इसके बावजूद कुछ स्थानों पर घटनाओं ने चुनावी माहौल को तनावपूर्ण बना दिया।

    सबसे अधिक चर्चा उस घटना की रही जिसमें एक कांग्रेस उम्मीदवार पर कथित हमले की बात सामने आई। इस घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई। विपक्षी नेताओं ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि चुनावी माहौल में हिंसा और डर का माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है। घटना के बाद राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं में भी नाराजगी देखने को मिली और कई नेताओं ने तत्काल कार्रवाई की मांग की।

    इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में बूथ कैप्चरिंग के आरोप भी लगाए गए। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने एक-दूसरे पर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगाया। कई जगहों पर कार्यकर्ताओं के बीच कहासुनी और धक्का-मुक्की की घटनाएं भी सामने आईं। कुछ स्थानों पर पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा ताकि स्थिति को नियंत्रण में रखा जा सके। हालांकि प्रशासन ने अधिकांश आरोपों को जांच का विषय बताते हुए शांतिपूर्ण मतदान का भरोसा जताया।

    मतदान के दौरान राज्य में लोगों का उत्साह भी देखने को मिला। सुबह से ही कई मतदान केंद्रों पर लंबी कतारें नजर आईं। महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग लाइन की व्यवस्था की गई थी ताकि मतदान प्रक्रिया सुचारु बनी रहे। दिव्यांग मतदाताओं के लिए भी विशेष व्यवस्थाओं की बात कही गई थी, हालांकि कुछ स्थानों पर सुविधाओं की कमी की शिकायतें भी सामने आईं।

    चुनाव आयोग की ओर से मतदान प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए रिकॉर्डिंग और निगरानी की विशेष व्यवस्था की गई। प्रशासन का कहना है कि मतदान केंद्रों के अंदर और बाहर गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है और किसी भी शिकायत पर तत्काल कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों का कहना है कि शाम तक मतदान प्रक्रिया पूरी होने के बाद परिणामों और मतदान प्रतिशत पर भी विशेष नजर रहेगी।

    पंजाब की राजनीति के लिए यह चुनाव बेहद अहम माना जा रहा है। स्थानीय निकाय चुनावों के परिणाम आने वाले समय में राजनीतिक दलों की ताकत और जनसमर्थन की दिशा तय कर सकते हैं। फिलहाल पूरे राज्य की नजर मतदान प्रक्रिया और उससे जुड़ी गतिविधियों पर बनी हुई है, जबकि राजनीतिक दल अपने-अपने दावों और आरोपों के साथ चुनावी माहौल को और अधिक सक्रिय बनाए हुए हैं।

  • शिवपुरी में गंगा दशहरा पर विवाद: नपा अध्यक्ष ने लगाया अपमान का आरोप, प्रदेश नेतृत्व से शिकायत की बात कही

    शिवपुरी में गंगा दशहरा पर विवाद: नपा अध्यक्ष ने लगाया अपमान का आरोप, प्रदेश नेतृत्व से शिकायत की बात कही


    शिवपुरी। शिवपुरी जिले के गोरखनाथ मंदिर परिसर में गंगा दशहरा के अवसर पर आयोजित ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ कार्यक्रम उस समय विवादों में आ गया, जब नगर पालिका अध्यक्ष गायत्री शर्मा मंच से नाराज होकर अचानक नीचे उतर गईं और कार्यक्रम स्थल से चली गईं। इस घटना के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।

    कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत और माल्यार्पण किया जा रहा था। इसी दौरान नगर पालिका अध्यक्ष गायत्री शर्मा असंतुष्ट नजर आईं और कुछ ही देर बाद उन्होंने मंच छोड़ दिया। बताया जा रहा है कि मंच पर उनके साथ हुए व्यवहार को लेकर वे काफी नाराज थीं।

    नगर पालिका अध्यक्ष ने इस पूरे मामले के लिए मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) ईशांक धाकड़ पर गंभीर आरोप लगाए हैं। गायत्री शर्मा का कहना है कि यह कार्यक्रम नगर पालिका परिषद द्वारा आयोजित किया गया था, लेकिन सीएमओ द्वारा उनके लिए मंच पर कुर्सी तक की व्यवस्था नहीं की गई, जिसे उन्होंने अपमानजनक बताया।

    उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब सम्मान समारोह चल रहा था, तब उनका नाम मंच से नहीं पुकारा गया, जिससे उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित महसूस हुआ। इस घटना के बाद वे नाराज होकर मंच से उतर गईं।

    गायत्री शर्मा ने इसे महिला जनप्रतिनिधियों के सम्मान से जोड़ते हुए कहा कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक स्तर पर महिला जनप्रतिनिधियों के साथ इस तरह का व्यवहार चिंता का विषय है।

    उन्होंने यह भी कहा कि वह इस पूरे मामले की शिकायत प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व तक करेंगी। उनके अनुसार, वे केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, प्रदेश के प्रभारी मंत्री प्रद्युमन सिंह तोमर, भाजपा जिला अध्यक्ष और अन्य वरिष्ठ नेताओं से इस घटना की शिकायत करेंगी।

    वहीं दूसरी ओर, मुख्य नगर पालिका अधिकारी ईशांक धाकड़ ने सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि नगर पालिका अध्यक्ष मंच पर मौजूद थीं और कार्यक्रम के दौरान उनका नाम भी सम्मानपूर्वक लिया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि वे अचानक मंच छोड़कर क्यों चली गईं।

    इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मंच पर प्रदेश सरकार के प्रभारी मंत्री प्रद्युमन सिंह तोमर, भाजपा जिला अध्यक्ष जसवंत जाटव, कलेक्टर अर्पित वर्मा और एसपी यांगचेन डोलकर भूटिया भी मौजूद थे। घटना के बाद कार्यक्रम की चर्चा अब प्रशासनिक समन्वय और राजनीतिक विवाद के रूप में की जा रही है।

    फिलहाल मामला स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है और आगे इसकी शिकायत उच्च स्तर तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।

  • सिरसौद में राशन वितरण पर बवाल: हितग्राहियों ने गेहूं-चावल में कटौती और अवैध वसूली के लगाए आरोप

    सिरसौद में राशन वितरण पर बवाल: हितग्राहियों ने गेहूं-चावल में कटौती और अवैध वसूली के लगाए आरोप


    शिवपुरी । शिवपुरी जिले के करेरा अनुविभाग के सिरसौद गांव में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत राशन वितरण को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें निर्धारित मात्रा से कम गेहूं और चावल दिया जा रहा है, साथ ही राशन देने के बदले अतिरिक्त पैसे भी वसूले जा रहे हैं।

    मामला तब सामने आया जब ग्रामीणों ने राशन वितरण के दौरान बनाए गए वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिए। इन वीडियो के सामने आने के बाद गांव में हड़कंप मच गया और लोगों ने खुलकर अपनी शिकायतें दर्ज करानी शुरू कर दीं।

    ग्रामीणों के अनुसार, कई हितग्राहियों को 2 से 3 किलो तक कम राशन दिया जा रहा है। इसके अलावा प्रति व्यक्ति 10 से 20 रुपये तक अतिरिक्त वसूली भी की जा रही है। लोगों का आरोप है कि यह प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है, लेकिन अब जाकर मामला उजागर हुआ है।

    प्रेम नारायण नामक ग्रामीण ने बताया कि उन्हें दो महीने के राशन के बदले 22 किलो गेहूं और 6 किलो चावल मिला, जबकि निर्धारित मात्रा से 2 किलो कम अनाज दिया गया। साथ ही उनसे 10 रुपये अतिरिक्त लिए गए। इसी तरह पुष्पेंद्र लोधी ने भी आरोप लगाया कि उन्हें 20 किलो गेहूं और 8 किलो चावल के बजाय कम मात्रा में राशन मिला और 10 रुपये अतिरिक्त वसूले गए।

    अन्य ग्रामीणों ने भी समान आरोप लगाए हैं। मुकेश पाल ने कहा कि उन्हें 60 किलो गेहूं और 10 किलो चावल दिया गया, लेकिन उसमें भी 2 किलो की कमी पाई गई और 20 रुपये अतिरिक्त लिए गए। वहीं धनीराम शिवहरे का कहना है कि दो व्यक्तियों के हिस्से का राशन लेने पर उन्हें 3 किलो अनाज कम मिला और अतिरिक्त पैसे भी लिए गए।

    इन आरोपों के बाद गांव में नाराजगी बढ़ गई है और लोग राशन दुकान की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। वायरल वीडियो ने मामले को और गंभीर बना दिया है, जिसके बाद प्रशासनिक जांच की मांग भी तेज हो गई है।

    दूसरी ओर, राशन दुकान के सेल्समैन सुमित लोधी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि वह पहली बार राशन वितरण कर रहे हैं और इससे पहले किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यह कार्य किया जाता था। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग जानबूझकर उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।

    फिलहाल मामला तूल पकड़ चुका है और स्थानीय प्रशासन से जांच की उम्मीद की जा रही है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बड़ी अनियमितताओं का संकेत होगा।

  • बिस्तर विवाद में बड़ा हादसा: मां-बेटी की बहस के दौरान पिता को आया हार्ट अटैक, मौके पर मौत

    बिस्तर विवाद में बड़ा हादसा: मां-बेटी की बहस के दौरान पिता को आया हार्ट अटैक, मौके पर मौत


    ग्वालियर । ग्वालियर के चिटनिस की गोठ स्थित वैकुंठ अपार्टमेंट में एक मामूली घरेलू विवाद ने बड़ा और दुखद रूप ले लिया, जब मां-बेटी के बीच झगड़े के दौरान पिता की अचानक मौत हो गई। शुरुआती जानकारी के अनुसार यह मामला बिस्तर को लेकर हुए विवाद से शुरू हुआ, जो देखते ही देखते परिवार के लिए त्रासदी बन गया।

    जानकारी के अनुसार, मृतक की पहचान अनिल कपूर के रूप में हुई है, जो अपनी पत्नी रितु कपूर और बेटी मानसी कपूर के साथ रहते थे। मानसी हाल ही में अपनी शादी के बाद कुछ दिनों के लिए मायके आई हुई थी। इसी दौरान घर में बिस्तर पर सोने को लेकर मां-बेटी के बीच कहासुनी शुरू हो गई।

    बताया जाता है कि रात के समय रितु कपूर बेटी के बिस्तर पर सो गईं, जिससे मानसी नाराज हो गई और दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। देखते ही देखते बात इतनी बढ़ गई कि घर में तनावपूर्ण माहौल बन गया और परिजनों के बीच जोरदार बहस शुरू हो गई।

    इसी विवाद को शांत कराने के लिए अनिल कपूर बीच-बचाव करने पहुंचे। परिजनों के अनुसार, वह दोनों को समझाने की कोशिश कर ही रहे थे कि अचानक उन्हें सीने में तेज दर्द महसूस हुआ और वह जमीन पर गिर पड़े। परिवार के लोग तुरंत उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। प्रारंभिक तौर पर उनकी मौत का कारण हार्ट अटैक माना जा रहा है।

    घटना के बाद पूरे परिवार में मातम पसर गया। मां-बेटी दोनों सदमे में हैं और घर का माहौल पूरी तरह शोकाकुल हो गया है। मृतक की बेटी मानसी का रो-रोकर बुरा हाल है।

    परिवार के संबंधों को लेकर भी इस मामले में कई भावनात्मक पहलू सामने आए हैं। जानकारी के अनुसार अनिल कपूर की पहली पत्नी की मृत्यु 2019 में हो चुकी थी। बाद में रितु कपूर, जो पहले उनकी साली थीं, उन्होंने अनिल कपूर से विवाह किया था। पारिवारिक रिश्तों के इस जटिल स्वरूप ने भी मामले को और भावनात्मक बना दिया है।

    पुलिस ने घटना को लेकर जांच शुरू कर दी है, हालांकि शुरुआती निष्कर्ष में इसे प्राकृतिक हार्ट अटैक से हुई मौत माना जा रहा है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी।

    यह घटना एक बार फिर यह संदेश देती है कि घरेलू विवादों में बढ़ता तनाव कभी-कभी गंभीर परिणामों में बदल सकता है। छोटी-छोटी बातों पर होने वाले झगड़े मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकते हैं।

  • 21 दिन की पैरोल पर बाहर आया डेरा प्रमुख, सिरसा पहुंचने के साथ ही बढ़ी राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियां

    21 दिन की पैरोल पर बाहर आया डेरा प्रमुख, सिरसा पहुंचने के साथ ही बढ़ी राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियां

    नई दिल्ली। डेरा प्रमुख गुरमीत सिंह एक बार फिर पैरोल पर जेल से बाहर आने के बाद सुर्खियों में है। मंगलवार सुबह वह रोहतक की सुनारिया जेल से बाहर निकला और कड़े सुरक्षा इंतजामों के बीच सिरसा स्थित डेरा मुख्यालय पहुंच गया। उसके सिरसा पहुंचते ही पूरे इलाके में हलचल बढ़ गई और प्रशासनिक एजेंसियां पूरी तरह सतर्क नजर आईं। सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए पहले से ही डेरे के आसपास विशेष बंदोबस्त किए गए थे और किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए अतिरिक्त निगरानी रखी गई थी।

    जानकारी के अनुसार, डेरा प्रमुख को 21 दिन की पैरोल मिली है। सुबह तड़के ही उसके जेल से बाहर आने की प्रक्रिया शुरू हुई और कुछ समय बाद वह सुरक्षा घेरे में सिरसा के लिए रवाना हुआ। उसके साथ करीबी लोग भी मौजूद थे और वाहनों का काफिला विशेष सुरक्षा व्यवस्था के साथ आगे बढ़ा। सिरसा पहुंचने से पहले ही डेरे के आसपास बड़ी संख्या में अनुयायियों की मौजूदगी देखने को मिली। कई लोग उसके आगमन का इंतजार कर रहे थे, जिसके चलते प्रशासन ने पहले से सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर दी थी।

    गुरमीत सिंह पहले भी कई बार पैरोल और फरलो पर जेल से बाहर आ चुका है। इस बार की रिहाई को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं क्योंकि बीते वर्षों में उसकी पैरोल को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। हर बार उसके बाहर आने पर समर्थकों और विरोधियों के बीच अलग-अलग तरह की चर्चाएं शुरू हो जाती हैं। यही कारण है कि प्रशासन भी इस पूरे मामले को संवेदनशील मानते हुए अतिरिक्त सावधानी बरत रहा है।

    डेरा प्रमुख फिलहाल साध्वी यौन शोषण मामले में सजा काट रहा है। हालांकि उससे जुड़े कई अन्य मामलों में समय-समय पर कानूनी स्थिति में बदलाव देखने को मिला है। इसी वजह से उसके नाम को लेकर राजनीतिक और सामाजिक चर्चाएं भी लगातार बनी रहती हैं। उसके सिरसा आने के बाद एक बार फिर पूरे इलाके में गतिविधियां बढ़ गई हैं।

    बताया जा रहा है कि पिछली पैरोल के दौरान भी उसने डेरे से जुड़े कई कामों की समीक्षा की थी। उस समय पुराने परिसर के पुनर्निर्माण और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर गतिविधियां तेज हुई थीं। इस बार भी माना जा रहा है कि वह डेरे से जुड़े विभिन्न कार्यों पर ध्यान दे सकता है। हालांकि अभी आधिकारिक तौर पर उसके कार्यक्रमों को लेकर ज्यादा जानकारी सामने नहीं आई है।

    पैरोल पर उसकी यह रिहाई एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। लगातार मिल रही पैरोल और उससे जुड़े घटनाक्रमों को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर आम लोगों के बीच बहस का दौर शुरू हो गया है। फिलहाल प्रशासन की नजर पूरे घटनाक्रम पर बनी हुई है और सुरक्षा एजेंसियां हालात पर लगातार निगरानी रख रही हैं। आने वाले दिनों में उसकी गतिविधियों और मुलाकातों पर भी सभी की नजर बनी रह सकती है।