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  • अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों की नागरिकता बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की रोक खारिज की, लाखों भारतीय परिवारों को बड़ी राहत

    अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों की नागरिकता बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप की रोक खारिज की, लाखों भारतीय परिवारों को बड़ी राहत

    नई दिल्ली । अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने जन्म के आधार पर नागरिकता यानी बर्थराइट सिटिजनशिप को बरकरार रखते हुए ट्रंप प्रशासन के उस प्रयास को खारिज कर दिया है, जिसके तहत अमेरिका में जन्म लेने वाले कुछ बच्चों को नागरिकता देने पर रोक लगाने की कोशिश की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी संविधान के 14वें संशोधन के तहत अमेरिका में जन्म लेने वाले अधिकांश बच्चों को नागरिकता का अधिकार प्राप्त रहेगा। इस फैसले को अमेरिका में रह रहे लाखों भारतीय परिवारों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

    सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से दिए अपने फैसले में कहा कि राष्ट्रपति के कार्यकारी आदेश के जरिए संविधान में प्रदत्त अधिकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि जन्म के आधार पर नागरिकता का सिद्धांत अमेरिकी संविधान में स्पष्ट रूप से स्थापित है और इसमें बदलाव केवल संवैधानिक संशोधन के माध्यम से ही संभव है। इस निर्णय के साथ ट्रंप प्रशासन का वह आदेश प्रभावी नहीं हो सका, जिसमें अवैध प्रवासियों और अस्थायी वीजा धारकों के अमेरिका में जन्मे बच्चों को नागरिकता से वंचित करने की बात कही गई थी।

    बर्थराइट सिटिजनशिप का आधार अमेरिकी संविधान का 14वां संशोधन है, जो वर्ष 1868 में लागू हुआ था। इसके अनुसार अमेरिका में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति, जो अमेरिकी कानून के अधिकार क्षेत्र में आता है, अमेरिकी नागरिक माना जाएगा। इसी प्रावधान को लेकर विवाद पैदा हुआ था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इसे पूरी तरह वैध और प्रभावी माना है।

    अदालत ने अपने निर्णय में वर्ष 1898 के ऐतिहासिक वुंग किम आर्क मामले का भी उल्लेख किया। उस फैसले में भी यह सिद्धांत स्थापित किया गया था कि अमेरिका में जन्म लेने वाला बच्चा अमेरिकी नागरिक होगा, भले ही उसके माता-पिता किसी अन्य देश के नागरिक हों। सुप्रीम कोर्ट ने इस पुराने कानूनी सिद्धांत को दोबारा स्वीकार करते हुए कहा कि संविधान की मूल भावना में किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया जा सकता।

    इस फैसले का सबसे अधिक प्रभाव उन लाखों विदेशी नागरिकों पर पड़ेगा जो अमेरिका में नौकरी, व्यवसाय या शिक्षा के उद्देश्य से रह रहे हैं। भारतीय समुदाय भी इससे सीधे तौर पर लाभान्वित होगा। अमेरिका में बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर एच-1बी, एल-1 और अन्य कार्य वीजा पर कार्यरत हैं, जबकि हजारों छात्र एफ-1 वीजा पर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। अब उनके अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों की नागरिकता को लेकर किसी प्रकार की कानूनी अनिश्चितता नहीं रहेगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला ग्रीन कार्ड का इंतजार कर रहे भारतीय परिवारों के लिए भी राहत लेकर आया है। हालांकि इस निर्णय का स्थायी निवास या वीजा प्रक्रिया पर कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन अमेरिका में जन्मे बच्चों की नागरिकता पहले की तरह सुरक्षित बनी रहेगी। इससे लंबे समय से अमेरिका में रह रहे भारतीय परिवारों की चिंता काफी हद तक कम होगी।

    हालांकि अदालत के इस फैसले के बाद भी बर्थ टूरिज्म यानी केवल बच्चे को अमेरिकी नागरिकता दिलाने के उद्देश्य से अमेरिका जाने की प्रवृत्ति को वैधता नहीं मिली है। अमेरिकी प्रशासन पहले की तरह वीजा नियमों और जांच प्रक्रिया के माध्यम से ऐसे मामलों पर सख्ती जारी रख सकेगा। वहीं कुछ राजनीतिक समूह भविष्य में संवैधानिक संशोधन की मांग उठा सकते हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में जन्म के आधार पर नागरिकता का संवैधानिक प्रावधान पूरी तरह प्रभावी रहेगा।

  • यूक्रेन की बढ़ती स्ट्राइक क्षमता से रूस पर नया दबाव, मिसाइल हमलों का दायरा बढ़ा; क्या युद्ध निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है?

    यूक्रेन की बढ़ती स्ट्राइक क्षमता से रूस पर नया दबाव, मिसाइल हमलों का दायरा बढ़ा; क्या युद्ध निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है?

    नई दिल्ली । रूस और यूक्रेन के बीच चार वर्षों से जारी युद्ध अब ऐसे चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां संघर्ष का प्रभाव केवल सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। हालिया विश्लेषणों के अनुसार यूक्रेन ने अपनी लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है, जिसके चलते रूस के बड़े हिस्से में मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ गया है। इससे युद्ध का रणनीतिक स्वरूप बदलता नजर आ रहा है और रूस के भीतर भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियां गहराने लगी हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार यूक्रेन अब अपनी स्वदेशी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों और आधुनिक ड्रोन प्रणाली का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहा है। इन हथियारों की मदद से वह रूस के भीतर स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों, रक्षा उत्पादन इकाइयों और रणनीतिक ढांचे को निशाना बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है। हाल के महीनों में रूस के कई ऐसे क्षेत्रों में भी मिसाइल अलर्ट जारी किए गए हैं, जो पहले इस प्रकार के खतरे से अपेक्षाकृत दूर माने जाते थे।

    बताया गया है कि पिछले कुछ समय में रूस के मध्य, दक्षिणी और वोल्गा क्षेत्र के अनेक हिस्सों में संभावित मिसाइल हमलों की चेतावनी जारी करनी पड़ी। इससे यह संकेत मिलता है कि यूक्रेन अब केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस के अंदर काफी दूर स्थित लक्ष्यों तक भी अपनी पहुंच बना चुका है। इससे रूस की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन की इस रणनीति का प्रमुख उद्देश्य रूस की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के साथ-साथ उस पर राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ाना भी है। लंबे समय से जारी युद्ध के बीच कीव चाहता है कि रूस पर इतना दबाव बने कि वह भविष्य में वार्ता के विकल्प पर गंभीरता से विचार करने को मजबूर हो। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इन हमलों का रूस के राजनीतिक नेतृत्व के निर्णयों पर कितना प्रभाव पड़ेगा।

    रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि रूस की बड़ी आबादी अब ऐसे क्षेत्रों में रह रही है जहां कम से कम एक बार मिसाइल हमले का अलर्ट जारी किया जा चुका है। इससे युद्ध का असर आम नागरिकों तक भी महसूस होने लगा है। लगातार बढ़ते सुरक्षा अलर्ट और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर हमलों के कारण रूस को अपनी वायु रक्षा प्रणाली और सैन्य संसाधनों का व्यापक स्तर पर पुनर्विन्यास करना पड़ रहा है।

    यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पहले भी दावा कर चुके हैं कि देश ने ऐसी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल विकसित की है, जो 1,500 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य भेदने में सक्षम है। हाल के महीनों में रूस के भीतर रक्षा उद्योग से जुड़े कई ठिकानों पर हमलों की खबरें भी सामने आई हैं, जिन्हें यूक्रेन अपनी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।

    हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन की बढ़ी हुई मारक क्षमता निश्चित रूप से रूस पर दबाव बढ़ा रही है, लेकिन केवल इन हमलों के आधार पर युद्ध की दिशा बदलने या रूस को तत्काल शांति वार्ता के लिए बाध्य मान लेना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच संघर्ष अभी भी कई सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक कारकों से प्रभावित है। ऐसे में आने वाले समय में युद्ध की दिशा और संभावित वार्ता की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

    संक्षिप्त सार:
    यूक्रेन की लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल और ड्रोन क्षमता में वृद्धि से रूस के अंदर हमलों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। विश्लेषणों के अनुसार अब रूस के बड़े हिस्से में मिसाइल अलर्ट जारी किए जा रहे हैं, जिससे युद्ध का रणनीतिक संतुलन बदलता दिखाई दे रहा है।

    English Keywords:
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    नई दिल्ली । विश्व

    रूस और यूक्रेन के बीच चार वर्षों से जारी युद्ध अब ऐसे चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां संघर्ष का प्रभाव केवल सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। हालिया विश्लेषणों के अनुसार यूक्रेन ने अपनी लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है, जिसके चलते रूस के बड़े हिस्से में मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ गया है। इससे युद्ध का रणनीतिक स्वरूप बदलता नजर आ रहा है और रूस के भीतर भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियां गहराने लगी हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार यूक्रेन अब अपनी स्वदेशी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों और आधुनिक ड्रोन प्रणाली का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहा है। इन हथियारों की मदद से वह रूस के भीतर स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों, रक्षा उत्पादन इकाइयों और रणनीतिक ढांचे को निशाना बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है। हाल के महीनों में रूस के कई ऐसे क्षेत्रों में भी मिसाइल अलर्ट जारी किए गए हैं, जो पहले इस प्रकार के खतरे से अपेक्षाकृत दूर माने जाते थे।

    बताया गया है कि पिछले कुछ समय में रूस के मध्य, दक्षिणी और वोल्गा क्षेत्र के अनेक हिस्सों में संभावित मिसाइल हमलों की चेतावनी जारी करनी पड़ी। इससे यह संकेत मिलता है कि यूक्रेन अब केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस के अंदर काफी दूर स्थित लक्ष्यों तक भी अपनी पहुंच बना चुका है। इससे रूस की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन की इस रणनीति का प्रमुख उद्देश्य रूस की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के साथ-साथ उस पर राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ाना भी है। लंबे समय से जारी युद्ध के बीच कीव चाहता है कि रूस पर इतना दबाव बने कि वह भविष्य में वार्ता के विकल्प पर गंभीरता से विचार करने को मजबूर हो। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इन हमलों का रूस के राजनीतिक नेतृत्व के निर्णयों पर कितना प्रभाव पड़ेगा।

    रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि रूस की बड़ी आबादी अब ऐसे क्षेत्रों में रह रही है जहां कम से कम एक बार मिसाइल हमले का अलर्ट जारी किया जा चुका है। इससे युद्ध का असर आम नागरिकों तक भी महसूस होने लगा है। लगातार बढ़ते सुरक्षा अलर्ट और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर हमलों के कारण रूस को अपनी वायु रक्षा प्रणाली और सैन्य संसाधनों का व्यापक स्तर पर पुनर्विन्यास करना पड़ रहा है।

    यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पहले भी दावा कर चुके हैं कि देश ने ऐसी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल विकसित की है, जो 1,500 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य भेदने में सक्षम है। हाल के महीनों में रूस के भीतर रक्षा उद्योग से जुड़े कई ठिकानों पर हमलों की खबरें भी सामने आई हैं, जिन्हें यूक्रेन अपनी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।

    हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन की बढ़ी हुई मारक क्षमता निश्चित रूप से रूस पर दबाव बढ़ा रही है, लेकिन केवल इन हमलों के आधार पर युद्ध की दिशा बदलने या रूस को तत्काल शांति वार्ता के लिए बाध्य मान लेना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच संघर्ष अभी भी कई सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक कारकों से प्रभावित है। ऐसे में आने वाले समय में युद्ध की दिशा और संभावित वार्ता की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

  • चीनी विमान खरीद सौदे ने नेपाल को कर्ज और घाटे में धकेला, वर्षों से खड़े विमानों पर उठे सवाल; सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को जारी किया नोटिस

    चीनी विमान खरीद सौदे ने नेपाल को कर्ज और घाटे में धकेला, वर्षों से खड़े विमानों पर उठे सवाल; सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को जारी किया नोटिस

    नई दिल्ली । नेपाल सरकार द्वारा एक दशक पहले चीन से खरीदे गए विमानों का सौदा एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। वर्षों से परिचालन से बाहर पड़े इन विमानों के कारण सरकारी एयरलाइन पर बढ़ते आर्थिक बोझ और कर्ज को लेकर नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत ने यह जानना चाहा है कि भारी वित्तीय नुकसान और कथित अनियमितताओं के बावजूद इस खरीद प्रक्रिया की व्यापक जांच अब तक क्यों नहीं कराई गई। इस घटनाक्रम ने सरकारी खरीद, वित्तीय प्रबंधन और विमानन नीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    यह सौदा वर्ष 2014 से 2018 के बीच हुआ था, जब नेपाल ने चीन से अनुदान और रियायती ऋण के माध्यम से छह टर्बोप्रॉप विमान प्राप्त किए थे। इनमें चार Y12E और दो MA60 विमान शामिल थे। इन विमानों को देश के दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों में हवाई संपर्क मजबूत करने के उद्देश्य से खरीदा गया था। हालांकि समय के साथ यह परियोजना अपने मूल उद्देश्य को पूरा करने में सफल नहीं हो सकी और अधिकांश विमान परिचालन से बाहर हो गए।

    वर्तमान स्थिति यह है कि छह में से पांच विमान कई वर्षों से काठमांडू स्थित त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर निष्क्रिय अवस्था में खड़े हैं। इनका संचालन बंद होने के बावजूद पार्किंग और रखरखाव पर लगातार खर्च हो रहा है, जिससे सरकारी एयरलाइन का वित्तीय दबाव बढ़ता जा रहा है। वहीं छठा विमान वर्ष 2020 में नेपालगंज हवाई अड्डे पर रनवे दुर्घटना का शिकार हो गया था और अब उपयोग के योग्य नहीं माना जाता। दुर्घटनाग्रस्त विमान का बीमा दावा मिलने के बावजूद वह अब केवल कबाड़ के रूप में रह गया है।

    नेपाल एयरलाइंस ने इन विमानों को दोबारा संचालन में लाने और लीज पर देने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। एयरलाइन का कहना है कि इन विमानों के संचालन की लागत अत्यधिक अधिक है। ईंधन की ज्यादा खपत, स्पेयर पार्ट्स की सीमित उपलब्धता, रखरखाव पर बढ़ता खर्च और कम व्यावसायिक उपयोगिता के कारण इनका संचालन आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं रहा। इसके अलावा नेपाल के पर्वतीय हवाई अड्डों की भौगोलिक परिस्थितियों में इन विमानों की उपयोगिता भी सीमित पाई गई।

    जांच में यह पहलू भी सामने आया कि एयरलाइन के पास इन विमानों के संचालन के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित पायलट, प्रशिक्षक और तकनीकी इंजीनियर उपलब्ध नहीं थे। आवश्यक स्पेयर पार्ट्स की समय पर आपूर्ति नहीं होने से भी संचालन प्रभावित हुआ। इन सभी कारणों ने मिलकर परियोजना को लगातार घाटे का सौदा बना दिया और सरकारी एयरलाइन की वित्तीय स्थिति पर अतिरिक्त दबाव डाला।

    हाल ही में इस पूरे मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई, जिसमें विमान खरीद प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच की मांग की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इतने बड़े आर्थिक नुकसान और संभावित अनियमितताओं के बावजूद संबंधित एजेंसियों ने प्रभावी जांच नहीं की। अब अदालत द्वारा सरकार से जवाब मांगे जाने के बाद इस विवादित खरीद सौदे की समीक्षा और संभावित जांच की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है। नेपाल में इस मामले को सार्वजनिक धन के उपयोग, सरकारी जवाबदेही और दीर्घकालिक आर्थिक निर्णयों के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

  • सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की फिर बढ़ी बयानबाजी, बिलावल भुट्टो ने परमाणु सिद्धांत का हवाला देकर भारत को दी चेतावनी

    सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान की फिर बढ़ी बयानबाजी, बिलावल भुट्टो ने परमाणु सिद्धांत का हवाला देकर भारत को दी चेतावनी

    नई दिल्ली । भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि को लेकर जारी तनाव के बीच पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के चेयरमैन और पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी ने भारत के खिलाफ कड़ा बयान दिया है। इस्लामाबाद में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में उन्होंने सिंधु जल संधि के मुद्दे को पाकिस्तान के राष्ट्रीय अस्तित्व से जोड़ते हुए कहा कि जल संसाधनों को नुकसान पहुंचाने की किसी भी कोशिश को गंभीर सुरक्षा चुनौती माना जाएगा। उनके इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच जल विवाद को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने के संकेत मिले हैं।

    अपने संबोधन में बिलावल भुट्टो ने भारत पर सिंधु जल संधि को कमजोर करने और पानी को रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सिंधु नदी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, कृषि और करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। ऐसे में जल अधिकारों से जुड़े किसी भी कदम का असर केवल संसाधनों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिरता से भी जुड़ा विषय बन जाएगा।

    बिलावल ने पाकिस्तान की परमाणु नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के सुरक्षा सिद्धांत में कुछ ऐसी परिस्थितियों का उल्लेख है, जिनमें अर्थव्यवस्था या जल संसाधनों को गंभीर क्षति पहुंचाने की कोशिश राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए खतरा मानी जाती है। हालांकि उन्होंने किसी प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई की घोषणा नहीं की, लेकिन उनके बयान को भारत के प्रति कड़ी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

    इस्लामाबाद में आयोजित इस सम्मेलन में पाकिस्तान के कई मंत्री, सांसद, जल विशेषज्ञ और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़े विशेषज्ञ भी मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने सिंधु जल संधि के भविष्य, क्षेत्रीय जल सुरक्षा और दक्षिण एशिया में बढ़ते तनाव पर चर्चा की। सम्मेलन में भारत के हालिया रुख की आलोचना करते हुए संधि को बहाल करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

    भारत द्वारा सिंधु जल संधि को लेकर अपनाए गए रुख के बाद पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान का कहना है कि उसकी कृषि व्यवस्था का बड़ा हिस्सा सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के जल पर निर्भर है। इसलिए इस संधि में किसी भी प्रकार का बदलाव उसके लिए गंभीर चिंता का विषय है।

    दूसरी ओर, भारत का कहना है कि उसने सिंधु नदी का जल प्रवाह पूरी तरह नहीं रोका है। पाकिस्तान की ओर जाने वाली नदियों का पानी अब भी अपनी प्राकृतिक दिशा में बह रहा है। भारत ने केवल संधि के तहत उपलब्ध कुछ सहयोगी व्यवस्थाओं और प्रक्रियाओं को निलंबित करने का निर्णय लिया है। भारतीय पक्ष का मानना है कि राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सिंधु जल संधि दशकों से भारत और पाकिस्तान के बीच सबसे महत्वपूर्ण जल समझौतों में शामिल रही है। दोनों देशों के बीच राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी तनाव के बावजूद यह संधि लंबे समय तक लागू रही। ऐसे में हाल के तीखे राजनीतिक बयान और बढ़ती कूटनीतिक तल्खी इस संवेदनशील मुद्दे को फिर से अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला रहे हैं। आने वाले समय में दोनों देशों के रुख और संभावित कूटनीतिक प्रयासों पर क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।

  • नवीन श्रम संहिताएं श्रमिकों को अधिक से अधिक लाभ दिलाएंगी : श्रम मंत्री पटेल

    नवीन श्रम संहिताएं श्रमिकों को अधिक से अधिक लाभ दिलाएंगी : श्रम मंत्री पटेल


    भोपाल । श्रमिकों के हितों को ध्यान में रखते हुए नवीन श्रम संहिताओं के नियमों को बनाया जाए। नियमों की व्याख्या इस तरह हो कि आम श्रमिक भी आसानी से समझ सके। इन्हें अधिक सरल, व्यवहारिक और श्रमिक-केंद्रित बनाया जाए। यह बात पंचायत एवं ग्रामीण विकास एवं श्रम मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने विकास भवन में प्रदेश की नवीन श्रम संहिताओं के प्रस्तावित राज्य नियमों की समीक्षा करते हुए कही। मंत्री पटेल ने कहा कि नई श्रम संहिताओं का उद्देश्य श्रमिकों को अधिक सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के साथ श्रमिक एवं नियोक्ता के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना है।

    मंत्री पटेल ने श्रमिक कल्याण मंडलों एवं विभिन्न बोर्डों की संरचना में श्रमिक क्षेत्रों में कार्य करने वाले अनुभवी कार्यकर्ताओं को भी शामिल करने के निर्देश दिए। उन्होंने समूह बीमा योजना के नियम इस प्रकार तैयार करने पर बल दिया, जिससे असंगठित कर्मकारों को अधिकतम लाभ मिल सके। साथ ही संबल योजना का दायरा बढ़ाकर अधिक से अधिक पात्र श्रमिकों को लाभान्वित करने के निर्देश भी दिए। उन्होंने कहा कि श्रमिकों के अंशदान में सरकार अथवा नियोक्ता की सहभागिता से योजनाओं का क्रियान्वयन अधिक सहज एवं प्रभावी होगा। मंत्री पटेल ने प्रस्तावित नियमों में कुछ प्रावधानों को और अधिक स्पष्ट एवं संवेदनशील बनाने पर जोर दिया। बीमा न्यायालय की कार्य प्रणाली, अर्द्धन्यायिक व्यवस्था तथा श्रमिकों को समयबद्ध न्याय उपलब्ध कराने के विभिन्न प्रावधानों पर भी विस्तृत चर्चा की गई।

    राष्ट्रीय फ्लोर वेज तथा न्यूनतम मजदूरी निर्धारण के संबंध में मंत्री पटेल ने कहा कि कृषि श्रमिकों की कार्यकुशलता, बाजार की वास्तविक परिस्थितियों तथा विशेष रूप से जनजातीय क्षेत्रों में प्रचलित मजदूरी दरों का समुचित अध्ययन कर व्यावहारिक निर्णय लिए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि श्रमिक हितों को ध्यान में रखते हुए मजदूरी निर्धारण की प्रक्रिया अधिक यथार्थपरक बनाई जाए। श्रमजीवी पत्रकारों के संबंध में विशेष प्रावधानों पर चर्चा करते हुए मंत्री पटेल ने कहा कि कोई भी निर्णय लेने से पहले पत्रकार संगठनों एवं उनके प्रतिनिधियों से संवाद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की समस्याओं को संवेदनशीलता के साथ सुनकर उनके हितों के अनुरूप नियम तैयार किए जाएं।

    मंत्री पटेल अन्तर्राज्यीय प्रवासी कर्मकारों के ऑनलाइन पंजीयन के लिए डिजिटल पोर्टल विकसित करने पर भी विशेष जोर दिया गया। मंत्री पटेल ने कहा कि प्रवासी श्रमिकों का सटीक डेटाबेस तैयार होने से उनके हितों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होगी। उन्होंने पंचायत सचिवों एवं नगरीय निकायों के वार्ड स्तर के अधिकारियों की जिम्मेदारी एवं जवाबदेही भी तय करने के निर्देश दिए। श्रमिकों की दुर्घटनाओं की त्वरित सूचना एवं सहायता के लिए सक्रिय पोर्टल तथा टोल-फ्री हेल्पलाइन विकसित करने के भी निर्देश दिए गए। ट्रांसजेंडर एवं दिव्यांगजनों के लिए कार्य स्थलों पर सुलभ स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं गरिमा से संबंधित प्रावधानों को स्पष्ट रूप से शामिल करने पर भी बल दिया गया। निरीक्षक प्रणाली के स्थान पर सुविधा प्रदाता (फैसिलिटेटर) आधारित व्यवस्था को प्रभावी रूप से लागू करने पर भी चर्चा हुई।

    बैठक में विभाग के सचिव रघुराज राजेन्द्रन ने नवीन श्रम संहिताओं के प्रमुख प्रावधानों का विस्तृत प्रस्तुतीकरण दिया। उन्होंने बताया कि 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समाहित कर 4 नई श्रम संहिताएं तैयार की गई हैं। इनका उद्देश्य सूचना आधारित पंजीयन व्यवस्था को बढ़ावा देना, नियोक्ता एवं कर्मचारी के बीच बेहतर संबंध स्थापित करना तथा उद्योगों को सुगम कार्य वातावरण उपलब्ध कराना है। उन्होंने बताया कि नई व्यवस्था में तकनीक आधारित पंजीयन, संस्थानों को 24×7 संचालन की सुविधा, पृथक बीमा न्यायालय, अपील प्राधिकरण, राष्ट्रीय फ्लोर वेज, असंगठित, गिग एवं प्लेटफॉर्म कर्मकारों के सामाजिक सुरक्षा प्रावधान, फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों के लिए एक वर्ष की सेवा पर ग्रेच्युटी की पात्रता तथा श्रमजीवी पत्रकारों एवं अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों से संबंधित नए प्रावधान शामिल किए गए हैं। बैठक में विभागीय वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

  • भारत के लिए राहतभरा कदम, अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों को प्रतिबंध सूची से हटाया, व्यापारिक गतिविधियों को मिलेगी नई गति

    भारत के लिए राहतभरा कदम, अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों को प्रतिबंध सूची से हटाया, व्यापारिक गतिविधियों को मिलेगी नई गति

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के आर्थिक एवं रणनीतिक संबंधों के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका ने चार भारतीय कंपनियों को अपनी प्रतिबंध सूची से हटा दिया है। इन कंपनियों पर पहले रूस से जुड़े सैन्य-औद्योगिक नेटवर्क को उन्नत तकनीक और उपकरणों की आपूर्ति करने के आरोप लगाए गए थे। अब प्रतिबंध हटने के बाद इन कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय कारोबारी गतिविधियों को सामान्य रूप से आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है।

    प्रतिबंध सूची से हटाई गई कंपनियों में हैदराबाद की आरआरजी इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड और लोकेश मशीन्स लिमिटेड, अहमदाबाद की गैलेक्सी बियरिंग्स तथा नई दिल्ली की शौर्य एयरोनॉटिक्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं। इन सभी कंपनियों के नाम अब अमेरिकी प्रतिबंधित संस्थाओं की सूची से हटा दिए गए हैं, जिससे उनके अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेनदेन पर लगी बाधाएं समाप्त हो गई हैं।

    इन कंपनियों पर पहले विभिन्न प्रकार के औद्योगिक उपकरण, मशीन टूल्स, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स, रोलर बियरिंग्स तथा अन्य दोहरे उपयोग वाली तकनीकों के निर्यात से जुड़े आरोप लगाए गए थे। अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि इन उत्पादों का उपयोग रूस के सैन्य-औद्योगिक ढांचे में किया जा सकता है। इन्हीं आरोपों के आधार पर वर्ष 2024 में इनके खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की गई थी।

    प्रतिबंध लगने के बाद संबंधित कंपनियों के लिए कई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और कारोबारी लेनदेन प्रभावित हुए थे। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में काम करने वाली कंपनियों के लिए ऐसी कार्रवाई का सीधा असर निर्यात, बैंकिंग सेवाओं और विदेशी साझेदारियों पर पड़ता है। अब प्रतिबंध हटने से इन कंपनियों को वैश्विक बाजार में फिर से सामान्य कारोबारी अवसर मिलने की संभावना बढ़ गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते आर्थिक सहयोग और विश्वास का संकेत भी माना जा सकता है। दोनों देश रक्षा, प्रौद्योगिकी, विनिर्माण और व्यापार सहित कई क्षेत्रों में लगातार सहयोग बढ़ा रहे हैं। ऐसे में प्रतिबंध हटने से उद्योग जगत को सकारात्मक संदेश मिलने की उम्मीद है।

    हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने इस फैसले के साथ यह स्पष्ट किया है कि निर्यात नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से जुड़े नियमों का पालन सभी कंपनियों के लिए अनिवार्य रहेगा। वैश्विक व्यापार में संवेदनशील तकनीकों और दोहरे उपयोग वाले उपकरणों के निर्यात पर विभिन्न देशों की निगरानी पहले की तरह जारी रहेगी।

    उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम भारतीय कंपनियों के लिए राहत लेकर आया है और भविष्य में दोनों देशों के बीच औद्योगिक सहयोग, निवेश और उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्र में साझेदारी को भी नई गति मिल सकती है। साथ ही यह निर्णय उन भारतीय निर्यातकों के लिए भी सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, जो वैश्विक बाजार में अपनी उपस्थिति लगातार मजबूत करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

  • अफगानिस्तान एयरस्ट्राइक पर भारत-पाकिस्तान आमने-सामने, इस्लामाबाद ने कार्रवाई को बताया जायज़, नई दिल्ली ने कहा- संप्रभुता पर हमला

    अफगानिस्तान एयरस्ट्राइक पर भारत-पाकिस्तान आमने-सामने, इस्लामाबाद ने कार्रवाई को बताया जायज़, नई दिल्ली ने कहा- संप्रभुता पर हमला

    नई दिल्ली । अफगानिस्तान में हाल ही में हुई एयरस्ट्राइक को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव और बढ़ गया है। भारत द्वारा इस कार्रवाई की आलोचना किए जाने के बाद पाकिस्तान ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए अपनी सैन्य कार्रवाई को उचित और आवश्यक बताया है। दोनों देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर ऐसे समय सामने आया है, जब क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दे पहले से ही संवेदनशील बने हुए हैं।

    पाकिस्तान ने अपने आधिकारिक रुख में कहा कि सीमा पार मौजूद आतंकवादी ढांचे के खिलाफ की गई कार्रवाई उसके राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के अनुरूप थी। इस्लामाबाद का दावा है कि उसने अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में रहते हुए अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया। साथ ही पाकिस्तान ने भारत पर आरोप लगाया कि वह अफगानिस्तान की भूमि का इस्तेमाल पाकिस्तान विरोधी गतिविधियों के लिए किए जाने का समर्थन करता है तथा आतंकवादी संगठनों को सहायता उपलब्ध कराता रहा है।

    भारत ने इन आरोपों को पहले भी निराधार बताया है और अफगानिस्तान में हुई एयरस्ट्राइक पर कड़ी आपत्ति जताई थी। भारतीय पक्ष का कहना है कि किसी भी संप्रभु देश की सीमा के भीतर इस प्रकार की सैन्य कार्रवाई क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए गंभीर चिंता का विषय है। भारत ने इसे अफगानिस्तान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन बताते हुए नागरिकों की मौत पर भी गहरी संवेदना व्यक्त की थी।

    भारत का यह भी कहना है कि क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता का समाधान सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि संवाद और सहयोग के माध्यम से निकाला जाना चाहिए। नई दिल्ली ने दोहराया कि वह अफगानिस्तान की संप्रभुता, स्वतंत्रता और क्षेत्रीय अखंडता के समर्थन के अपने रुख पर कायम है।

    दूसरी ओर अफगानिस्तान ने भी पाकिस्तान की कार्रवाई पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। अफगान प्रशासन का दावा है कि हवाई हमलों में आतंकवादी नहीं बल्कि बड़ी संख्या में आम नागरिक प्रभावित हुए हैं। उसके अनुसार महिलाओं और बच्चों सहित कई लोगों की मौत हुई तथा अनेक नागरिक घायल हुए। अफगानिस्तान ने इस घटना को अंतरराष्ट्रीय मानवीय सिद्धांतों और अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया है।

    हालांकि पाकिस्तान का दावा इससे अलग है। उसका कहना है कि सीमा क्षेत्र में मौजूद आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया गया और कार्रवाई पूरी तरह लक्षित थी। इस्लामाबाद का कहना है कि उसका उद्देश्य केवल सुरक्षा खतरों को समाप्त करना था और नागरिकों को नुकसान पहुंचाना उसकी नीति नहीं है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने दक्षिण एशिया और आसपास के क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चिंताओं को एक बार फिर बढ़ा दिया है। भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के अलग-अलग दावों के बीच घटनाओं की वास्तविक स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ती बयानबाज़ी और सीमा पार सैन्य कार्रवाइयों से क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में आने वाले समय में कूटनीतिक संवाद, संयम और पारदर्शिता ही तनाव कम करने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • ईरान-इजरायल तनाव फिर चरम पर, नेतन्याहू ने दोहराई सैन्य कार्रवाई की चेतावनी, तेहरान बोला- बातचीत विफल हुई तो युद्ध के लिए तैयार

    ईरान-इजरायल तनाव फिर चरम पर, नेतन्याहू ने दोहराई सैन्य कार्रवाई की चेतावनी, तेहरान बोला- बातचीत विफल हुई तो युद्ध के लिए तैयार


    नई दिल्ली ।
    मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच जारी कूटनीतिक प्रयासों के समानांतर इजरायल की ओर से आए सख्त बयानों ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ तो ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई की जा सकती है। इसके जवाब में ईरान ने भी साफ कर दिया है कि वह बातचीत को प्राथमिकता देता है, लेकिन वार्ता विफल होने की स्थिति में हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार है।

    इजरायल के प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके देश ने पहले भी अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्णायक कदम उठाए हैं और भविष्य में भी आवश्यकता पड़ने पर ऐसा करने से पीछे नहीं हटेगा। उनका कहना था कि ईरान की परमाणु गतिविधियों को लेकर इजरायल किसी भी संभावित खतरे को स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने संकेत दिया कि यदि सुरक्षा संबंधी चिंताएं दूर नहीं हुईं तो आगे भी सैन्य विकल्प खुले रहेंगे।

    इजरायल लंबे समय से यह रुख अपनाता रहा है कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसी कारण वह अपने सुरक्षा हितों के अनुरूप स्वतंत्र कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित मानता है। हालिया बयान को भी इसी नीति का विस्तार माना जा रहा है, जिसने क्षेत्र में नई बहस छेड़ दी है।

    इस बीच अमेरिका लगातार दोनों पक्षों के बीच तनाव कम करने की कोशिशों में जुटा हुआ है। वॉशिंगटन का मानना है कि बढ़ते सैन्य तनाव से क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो सकती है और कूटनीतिक प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं। इसी वजह से सभी पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के रास्ते को प्राथमिकता देने की अपील की जा रही है।

    दूसरी ओर ईरान ने भी अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा कि वह मौजूदा वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि कूटनीतिक समाधान ही सबसे बेहतर विकल्प है और इसी दिशा में प्रयास जारी हैं। हालांकि, साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि बातचीत किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती या देश की सुरक्षा को चुनौती मिलती है तो ईरान आवश्यक जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार रहेगा।

    ईरानी संसद के शीर्ष नेतृत्व ने कहा कि देश अपनी रक्षा क्षमता और राष्ट्रीय हितों से किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं करेगा। उनका कहना था कि परमाणु कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप संचालित किया जा रहा है और शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक विकसित करना ईरान का वैध अधिकार है। उन्होंने दोहराया कि देश अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन करता रहेगा, लेकिन अपने अधिकारों की रक्षा भी करेगा।

    विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात बेहद संवेदनशील हैं। एक ओर कूटनीतिक वार्ता जारी है, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों की सख्त बयानबाजी से तनाव बढ़ने की आशंका भी बनी हुई है। यदि संवाद सफल रहता है तो क्षेत्र में स्थिरता की संभावना मजबूत हो सकती है, लेकिन बातचीत विफल होने पर हालात फिर से सैन्य टकराव की ओर बढ़ सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयासों की सफलता पूरे क्षेत्र की शांति और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

  • भोपाल के मोहम्मद कोनैन दाद भारतीय जूनियर हॉकी टीम में शामिल, बेल्जियम दौरे पर दिखाएंगे दम

    भोपाल के मोहम्मद कोनैन दाद भारतीय जूनियर हॉकी टीम में शामिल, बेल्जियम दौरे पर दिखाएंगे दम


    भोपाल । मध्यप्रदेश राज्य हॉकी अकादमी, भोपाल के प्रतिभाशाली खिलाड़ी मोहम्मद कोनैन दाद का चयन 5 से 18 जुलाई तक होने वाले भारतीय जूनियर पुरुष हॉकी टीम के बेल्जियम दौरे के लिए भारतीय टीम में हुआ है। इस दौरे के दौरान भारतीय जूनियर टीम बेल्जियम में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मुकाबलों में भाग लेते हुए अपनी तैयारियों को और मजबूत करेगी। मोहम्मद कोनैन डैड फॉरवर्ड खिलाड़ी के रूप में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करेंगे।

    अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मध्यप्रदेश की सशक्त उपस्थिति
    मोहम्मद कोनैन दाद का भारतीय जूनियर टीम में चयन मध्यप्रदेश राज्य हॉकी अकादमी में खिलाड़ियों को दिए जा रहे उच्च स्तरीय प्रशिक्षण, वैज्ञानिक खेल सुविधाओं एवं उत्कृष्ट कोचिंग व्यवस्था का परिणाम है। यह उपलब्धि प्रदेश की खेल प्रतिभाओं के निरंतर उभरते स्तर को दर्शाती है तथा मध्यप्रदेश को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय हॉकी मानचित्र पर नई पहचान दिला रही है।

    मेहनत, अनुशासन और उत्कृष्ट प्रदर्शन का मिला प्रतिफल
    मोहम्मद कोनैन दाद ने विभिन्न राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन, तेज़ खेल कौशल एवं निरंतर मेहनत के बल पर भारतीय जूनियर टीम में स्थान बनाया है। उनका चयन उनके समर्पण, अनुशासन और उत्कृष्ट प्रदर्शन का प्रतिफल है। बेल्जियम दौरे के दौरान वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत और मध्यप्रदेश की प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे।

    प्रदेश के युवा हॉकी खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा
    मोहम्मद कोनैन दाद की यह उपलब्धि प्रदेश के उभरते हॉकी खिलाड़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि सही मार्गदर्शन, नियमित अभ्यास और दृढ़ संकल्प के साथ खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बना सकते हैं। उनकी सफलता प्रदेश में हॉकी के प्रति युवाओं के उत्साह को और अधिक प्रोत्साहित करेगी।

    खेल मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने दी शुभकामनाएँ
    खेल एवं युवा कल्याण मंत्री विश्वास कैलाश सारंग ने मोहम्मद कोनैन दाद को भारतीय जूनियर पुरुष हॉकी टीम में चयनित होने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि मध्यप्रदेश के खिलाड़ी लगातार अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का गौरव बढ़ा रहे हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि मोहम्मद कोनैन डैड बेल्जियम दौरे में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए भारत और मध्यप्रदेश का नाम रोशन करेंगे।

  • मध्यप्रदेश सरकार ने की 24 घंटे नवकरणीय ऊर्जा उपलब्ध कराने की शुरुआत

    मध्यप्रदेश सरकार ने की 24 घंटे नवकरणीय ऊर्जा उपलब्ध कराने की शुरुआत


    भोपाल । मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि मध्यप्रदेश सरकार ने 24 घंटे नवकरणीय ऊर्जा उपलब्ध कराने की महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत कर दी है। मध्यप्रदेश, स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में एक नए अध्याय की शुरुआत कर रहा है। उन्होंने बताया कि दावोस में की गई घोषणा के अनुरूप प्रदेश, 24 घंटे हरित ऊर्जा देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव 24 घंटे नवकरणीय ऊर्जा परियोजना के लिए, मध्यप्रदेश भवन नई दिल्ली में बुधवार को आयोजित प्री-बिड मीटिंग को समत्व भवन (मुख्यमंत्री निवास) से वर्चुअली संबोधित कर रहे थे। नई दिल्ली में हुई बैठक में नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा मंत्री राकेश शुक्ला, अपर मुख्य सचिव मनु श्रीवास्तव तथा विभिन्न कपंनियों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

    मध्यप्रदेश का ट्रैक रिकॉर्ड सबसे बेहतर
    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर परियोजना ने देश में सबसे कम सौर टैरिफ स्थापित कर भारत को वैश्विक पहचान दिलाई। शाजापुर-नीमच सोलर पार्कों ने 2.14 रूपए प्रति यूनिट का प्रदेश में सबसे कम टैरिफ अर्जित किया। हाल ही में मुरैना की 4 घंटे की स्टोरेज प्लस परियोजना के लिए 2.70 रूपए प्रति यूनिट पर पीपीए हुआ, यह देश की सबसे प्रतिस्पर्धी ऊर्जा भंडारण परियोजनाओं में से एक है।

    मध्यप्रदेश है देश का सबसे निवेश मित्र राज्य
    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि राज्य सरकार निवेशकों को पारदर्शी नीतियाँ, त्वरित निर्णय और उत्कृष्ट अधोसंरचना उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने देश-विदेश के निवेशकों से मध्यप्रदेश की ऊर्जा क्रांति के सहभागी बनने का अनुरोध किया।

    ऊर्जा में आत्मनिर्भरता है हमारा लक्ष्य
    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि केवल परियोजनाएँ स्थापित करना नहीं, बल्कि हरित ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास के क्षेत्र में मध्यप्रदेश को देश का अग्रणी राज्य बनाना राज्य सरकार का उद्देश्य है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने विश्वास जताया कि रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर परियोजना और सभी हितधारकों के संयुक्त प्रयास से 24 घंटे नवकरणीय ऊर्जा परियोजना भारत की ऊर्जा सुरक्षा और हरित विकास की दिशा में ऐतिहासिक सिद्ध होगी। नई दिल्ली की प्री-बिड मीटिंग में टाटा पॉवर, रिलायंस एनर्जी, टोरेंट पॉवर, जिंदल रिन्युएबल, एन.टी.पी.सी., अडानी ग्रीन्स, हिन्दुस्तान पॉवर, महिंद्रा सिस्टम आदि के प्रतिनिधि उपस्थित थे।