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  • सौरभ शुक्ला बोले जिंदगी में परफेक्शन नहीं अपूर्णता में ही छुपी है असली ताकत

    सौरभ शुक्ला बोले जिंदगी में परफेक्शन नहीं अपूर्णता में ही छुपी है असली ताकत


    नई दिल्ली :अभिनेता और फिल्ममेकर सौरभ शुक्ला ने जीवन और रिश्तों को लेकर एक गहरा और विचारोत्तेजक दृष्टिकोण साझा किया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस दुनिया में परफेक्शन जैसी कोई चीज नहीं होती और इंसान स्वभाव से अपूर्ण होता है। उनके अनुसार यही अपूर्णता जीवन को आगे बढ़ने का अवसर देती है और इसमें सुधार की हमेशा गुंजाइश बनी रहती है।

    आईएएनएस से बातचीत में सौरभ शुक्ला ने कहा कि अगर कोई चीज पूरी तरह से परफेक्ट हो जाए तो उसमें आगे बढ़ने या कुछ नया सीखने की संभावना समाप्त हो जाती है। उन्होंने कहा कि अपूर्णता ही वह तत्व है जो इंसान को लगातार बेहतर बनने के लिए प्रेरित करता है। उनके मुताबिक परफेक्शन भले ही सुनने में आकर्षक लगे, लेकिन वास्तव में यह एक स्थिर और बोरिंग स्थिति है, जबकि अपूर्णता जीवन को गतिशील बनाए रखती है।

    उन्होंने यह भी कहा कि इंसान अक्सर अपने जीवन में परफेक्ट रिश्तों या परफेक्ट शादी की तलाश करता है, लेकिन यह एक भ्रम है। वास्तविकता यह है कि हर रिश्ता अपूर्ण होता है और उसकी असली खूबसूरती भी इन्हीं खामियों को स्वीकार करने में है। जब हम अपने साथी की कमियों को समझते हैं और उन्हें स्वीकार करते हैं, तभी एक मजबूत और गहरा रिश्ता बनता है।

    सौरभ शुक्ला ने रिश्तों में ईमानदारी को सबसे महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना है कि किसी भी रिश्ते में पारदर्शिता और सच्चाई का होना बेहद जरूरी है। यदि कोई व्यक्ति अपने रिश्ते में सच को छुपाता है, तो भले ही वह बात उस समय संभल जाए, लेकिन भविष्य में यह बड़े नुकसान का कारण बन सकती है। उन्होंने कहा कि जब सच्चाई सामने आती है तो सबसे ज्यादा दर्द इस बात का होता है कि आपको पहले ही यह नहीं बताया गया।

    उन्होंने आगे कहा कि रिश्तों में झूठ या छुपाव धीरे धीरे भरोसे को कमजोर करता है। इससे शक पैदा होता है और व्यक्ति हर बात पर संदेह करने लगता है। ऐसे में रिश्ता कमजोर हो जाता है और उसकी नींव हिल जाती है। सौरभ शुक्ला ने कहा कि रिश्तों को मजबूत बनाए रखने के लिए ईमानदारी और खुलापन सबसे जरूरी तत्व हैं।

    उन्होंने एक दार्शनिक दृष्टिकोण रखते हुए यह भी कहा कि इंसान के नजरिए से इस जीवन में एक ही चीज को पूरी तरह परफेक्ट माना जा सकता है और वह है मृत्यु। उनके अनुसार जीवन के बाद क्या होता है, यह किसी को नहीं पता, लेकिन जीवन में अपूर्णता ही हमें आगे बढ़ने और सीखने का अवसर देती है।

    सौरभ शुक्ला ने अपने फिल्मी करियर का जिक्र करते हुए भी कहा कि उनकी हाल ही में रिलीज फिल्म में भी यही थीम देखने को मिलती है, जहां रिश्तों में छिपे सच और उससे पैदा होने वाले बदलावों को दिखाया गया है। उन्होंने कहा कि जीवन की तरह फिल्मों में भी असली कहानी तब शुरू होती है जब किरदार अपनी कमजोरियों और सच्चाइयों का सामना करते हैं।

    उनके विचार जीवन के इस सरल लेकिन गहरे सत्य को उजागर करते हैं कि परफेक्शन की तलाश छोड़कर जब हम अपनी अपूर्णताओं को अपनाते हैं, तभी जीवन में असली संतुलन और संतोष संभव होता है।

  • जयपुर फुट ने बदली किस्मत सुधा चंद्रन बनीं इंटरनेशनल सेलिब्रिटी…

    जयपुर फुट ने बदली किस्मत सुधा चंद्रन बनीं इंटरनेशनल सेलिब्रिटी…


    नई दिल्ली: प्रसिद्ध अभिनेत्री और नृत्यांगना सुधा चंद्रन की जीवन यात्रा संघर्ष, हिम्मत और प्रेरणा की मिसाल है। एक समय ऐसा भी आया जब एक दुर्घटना ने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय अपने साहस और दृढ़ संकल्प से नई शुरुआत की। आज वह अपनी सफलता का बड़ा श्रेय जयपुर फुट को देती हैं, जिसने उन्हें फिर से खड़े होकर आगे बढ़ने का हौसला दिया

    एक पुराने वीडियो में सुधा चंद्रन भावुक होकर डॉ. पी.के. सेठी और राजस्थान का आभार व्यक्त करती नजर आती हैं। वह कहती हैं कि आज वह जो कुछ भी हैं, उसमें जयपुर फुट का सबसे बड़ा योगदान है। इसी कृत्रिम पैर की मदद से उन्होंने न केवल चलना सीखा, बल्कि नृत्य और अभिनय की दुनिया में भी दमदार वापसी की

    सुधा चंद्रन की यह कहानी केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हजारों दिव्यांगों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बन चुकी है। उनका मानना है कि यदि व्यक्ति के अंदर मजबूत इच्छाशक्ति हो और सही समर्थन मिले, तो वह किसी भी मुश्किल को पार कर सकता है। जयपुर फुट जैसी सुलभ और प्रभावी तकनीक ने न केवल उनका जीवन बदला, बल्कि देश-विदेश में कई लोगों को नई उम्मीद भी दी है

    उन्होंने समाज में दिव्यांगता को लेकर बने नजरिए पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि वह ‘हैंडिकैप’ या ‘दिव्यांग’ जैसे शब्दों को समाज की सोच से हटाना चाहती हैं और लोगों को यह समझाना चाहती हैं कि किसी भी शारीरिक कमी के बावजूद व्यक्ति अपनी पहचान बना सकता है

    उनकी संघर्षपूर्ण कहानी को नाचे मयूरी फिल्म के जरिए भी दर्शाया गया, जिसमें उन्होंने खुद अपनी भूमिका निभाई थी। इस फिल्म ने उनकी जिंदगी के उस दौर को सामने रखा, जब उन्होंने एक हादसे के बाद फिर से अपने सपनों को जिया

    टेलीविजन पर भी सुधा चंद्रन ने अपनी अलग पहचान बनाई। कहीं किसी रोज में ‘रमोला सिकंद’ के किरदार ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। उनका अनोखा अंदाज और स्टाइल दर्शकों को बेहद पसंद आया

     सुधा चंद्रन की कहानी यह सिखाती है कि जिंदगी में चाहे कितनी भी बड़ी मुश्किल क्यों न आए, हिम्मत और सही सहयोग से उसे हराया जा सकता है। ‘जयपुर फुट’ उनके लिए सिर्फ एक कृत्रिम पैर नहीं, बल्कि एक नई जिंदगी की शुरुआत साबित हुआ

  • चेतावनियों को दरकिनार कर रणदीप हुड्डा ने बनाई ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ फिल्म की अनसुनी कहानी

    चेतावनियों को दरकिनार कर रणदीप हुड्डा ने बनाई ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ फिल्म की अनसुनी कहानी

    नई दिल्ली:  अभिनेता रणदीप हुड्डा ने अपनी पहली डायरेक्टोरियल फिल्म ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ के जरिए न सिर्फ अपने अभिनय का बल्कि निर्देशन का भी एक नया आयाम प्रस्तुत किया यह फिल्म भले ही बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल नहीं कर सकी हो लेकिन इसके निर्माण की कहानी बेहद प्रेरणादायक और संघर्षों से भरी रही

    इस फिल्म को बनाने से पहले रणदीप हुड्डा को कई लोगों ने यह चेतावनी दी थी कि वे इस तरह की संवेदनशील और ऐतिहासिक फिल्म का हिस्सा न बनें क्योंकि इसका उनके करियर पर नकारात्मक असर पड़ सकता है कई शुभचिंतकों ने उन्हें यह फिल्म छोड़ने की सलाह दी लेकिन रणदीप ने इन सभी चेतावनियों को दरकिनार करते हुए इसे बनाने का निर्णय लिया और खुद ही इस प्रोजेक्ट की कमान संभाल ली

    फिल्म की कहानी को पर्दे पर जीवंत बनाने के लिए रणदीप हुड्डा ने असाधारण मेहनत की उन्होंने वीर सावरकर के किरदार में ढलने के लिए 32 किलो तक वजन कम किया और खुद को मानसिक रूप से भी उस दौर की परिस्थितियों में ढालने का प्रयास किया काला पानी की सजा के दौरान सावरकर की स्थिति को समझने के लिए उन्होंने खुद को अंधेरे कमरे में बंद रखना शुरू कर दिया और दिन में केवल एक बार भोजन किया ताकि किरदार की गहराई को महसूस किया जा सके

    फिल्म के लिए रिसर्च के दौरान रणदीप ने पाया कि सावरकर के बारे में अंग्रेजी साहित्य में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है इस कारण उन्होंने विभिन्न किताबों और स्रोतों का अध्ययन किया और एक आधारभूत स्क्रिप्ट तैयार की हालांकि पूरी स्क्रिप्ट और संवाद तैयार करने के लिए उन्होंने अपने सह लेखक के साथ मिलकर मात्र तीन दिनों में पूरी पटकथा लिख डाली इस दौरान उन्होंने लगातार 12-12 घंटे काम किया

    इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए रणदीप हुड्डा ने न केवल अपनी मेहनत बल्कि अपनी निजी संपत्ति का भी एक हिस्सा लगाया यह उनके समर्पण और जुनून को दर्शाता है कई लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है कि फिल्म के निर्माण के दौरान उन्हें बॉलीवुड इंडस्ट्री से अपेक्षित समर्थन भी नहीं मिला

    फिल्म को लेकर कुछ रचनात्मक मतभेद भी सामने आए जिसके चलते निर्देशक महेश मांजरेकर ने इस प्रोजेक्ट को बीच में ही छोड़ दिया इसके बाद रणदीप ने खुद ही फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी संभाली और इसे पूरा किया

    फिल्म रिलीज के बाद यह विवादों में भी रही और इसका बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन भी अपेक्षा के अनुसार नहीं रहा लेकिन इसके बावजूद यह फिल्म रणदीप हुड्डा के साहस और समर्पण का प्रतीक बन गई जो यह दिखाती है कि एक कलाकार अपने जुनून के लिए किस हद तक जा सकता है

  • बॉलीवुड की सबसे चर्चित दुश्मनी दोस्ती में बदली कैटरीना की पार्टी से ईद तक का सफर

    बॉलीवुड की सबसे चर्चित दुश्मनी दोस्ती में बदली कैटरीना की पार्टी से ईद तक का सफर


    नई दिल्ली: मायानगरी मुंबई में रिश्तों का बदलता रंग अक्सर सुर्खियां बनता रहा है और ऐसा ही एक चर्चित किस्सा जुड़ा है सलमान खान और शाहरुख खान के बीच हुई उस कड़वाहट से जिसने एक समय पूरे बॉलीवुड को दो हिस्सों में बांट दिया था यह विवाद साल 2008 में कैटरीना कैफ की बर्थडे पार्टी के दौरान शुरू हुआ था

    कहा जाता है कि उस रात एक मामूली मजाक और तकरार ने अचानक गंभीर रूप ले लिया और दोनों सुपरस्टार्स के बीच तीखी बहस हो गई हालात इतने बिगड़ गए कि बात हाथापाई तक पहुंचने की चर्चा भी सामने आई हालांकि मौके पर मौजूद लोगों ने स्थिति को संभाल लिया इस घटना के बाद दोनों के रिश्तों में ऐसी दरार आई जो अगले पांच साल तक बनी रही

    इस विवाद के पीछे कई वजहें बताई जाती हैं कुछ लोग इसे ईगो क्लैश मानते हैं तो कुछ इसे उस समय के टीवी शोज की प्रतिस्पर्धा से जोड़कर देखते हैं दरअसल उस दौर में सलमान खान का शो दस का दम काफी सफल रहा था वहीं शाहरुख खान क्या आप पांचवी पास से तेज हैं होस्ट कर रहे थे जो टीआरपी की रेस में पीछे था बताया जाता है कि इसी बात को लेकर मजाक में शुरू हुई छींटाकशी धीरे धीरे गंभीर विवाद में बदल गई

    इस झगड़े का असर सिर्फ दोनों कलाकारों तक सीमित नहीं रहा बल्कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री पर पड़ा बॉलीवुड मानो दो खेमों में बंट गया था निर्माता और निर्देशकों के बीच भी असमंजस की स्थिति बन गई थी कि किसके साथ काम किया जाए क्योंकि एक के साथ काम करने पर दूसरे की नाराजगी का डर बना रहता था अवॉर्ड शो और सार्वजनिक मंचों पर भी दोनों एक दूसरे से दूरी बनाकर रखते थे

    लेकिन वक्त के साथ हालात बदले और साल 2013 में एक खास मौके ने इस जमी बर्फ को पिघला दिया बाबा सिद्दिकी की ईद पार्टी में दोनों खान आमने सामने आए इस मुलाकात को खास बनाने में सलीम खान की भी अहम भूमिका रही बताया जाता है कि जानबूझकर ऐसी बैठने की व्यवस्था की गई जिससे बातचीत की शुरुआत हो सके

    जब सलमान वहां पहुंचे और उन्होंने अपने पिता के पास शाहरुख को बैठे देखा तो उन्होंने पहल करते हुए बातचीत शुरू की इस मुलाकात ने पांच साल पुरानी कड़वाहट को खत्म कर दिया और दोनों ने गिले शिकवे भुलाकर दोस्ती का हाथ बढ़ाया

    बाद में खुद सलमान खान ने भी माना कि वह विवाद बेहद बचकाना था और समय के साथ यह समझ आ गया कि ऐसी बातों का कोई मतलब नहीं होता इस सुलह के बाद न केवल उनके फैंस बल्कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री ने राहत की सांस ली क्योंकि लंबे समय से बंटी हुई बॉलीवुड की दुनिया एक बार फिर एकजुट हो गई

  • फैशन जगत में शोक की लहर मनीष मल्होत्रा की मां का निधन अंतिम विदाई में उमड़े सितारे

    फैशन जगत में शोक की लहर मनीष मल्होत्रा की मां का निधन अंतिम विदाई में उमड़े सितारे

    नई दिल्ली:प्रसिद्ध फैशन डिजाइनर मनीष मल्होत्रा के जीवन में एक गहरा और भावुक क्षण तब आया जब उनकी मां सुदर्शन मल्होत्रा ने 94 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर सामने आते ही फिल्म और फैशन जगत में शोक की लहर दौड़ गई और कई दिग्गज हस्तियां मनीष मल्होत्रा के आवास पर पहुंचकर उन्हें सांत्वना देने के लिए उपस्थित हुईं। यह दृश्य बेहद भावुक था जहां एक ओर दुख का माहौल था तो दूसरी ओर सितारे इस कठिन समय में परिवार के साथ मजबूती से खड़े नजर आए।

    श्रद्धांजलि देने पहुंचे प्रमुख चेहरों में कई बड़े नाम शामिल थे जिनमें ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन जैसे लोकप्रिय कलाकार भी मौजूद रहे। इसके अलावा कियारा आडवाणी और सिद्धार्थ मल्होत्रा, करण जौहर, करिश्मा कपूर, रवीना टंडन, उर्मिला मातोंडकर, अनन्या पांडे, संजय कपूर और उनकी बेटी शनाया, रोनित रॉय, अलवीरा खान, वरुण धवन और नताशा दलाल, अर्जुन कपूर, सोनाली बेंद्रे और नुसरत भरूचा जैसे कई सितारे भी अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचे। यह उपस्थिति इस बात का संकेत है कि मनीष मल्होत्रा इंडस्ट्री में कितने सम्मानित और प्रिय हैं।

    मनीष मल्होत्रा और उनकी मां के बीच गहरा और मजबूत रिश्ता रहा है। सुदर्शन मल्होत्रा हमेशा अपने बेटे के सपनों और करियर के पीछे एक मजबूत स्तंभ की तरह खड़ी रहीं। मनीष ने कई बार इंटरव्यू और सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी मां के प्रति अपने प्रेम और कृतज्ञता को व्यक्त किया है। मदर्स डे पर लिखे गए उनके भावुक शब्द इस रिश्ते की गहराई को दर्शाते हैं जहां उन्होंने अपनी मां को अपनी ताकत और प्रेरणा बताया था।

    अपने एक पोस्ट में मनीष ने लिखा था कि उनकी मां ने बचपन से ही उनके कपड़ों और फिल्मों के प्रति जुनून को प्रोत्साहित किया और हमेशा उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। यह रिश्ता केवल मां और बेटे का नहीं बल्कि एक मार्गदर्शक और प्रेरणा स्रोत का भी था जिसने मनीष मल्होत्रा के करियर को आकार दिया।

    परिवार की ओर से जारी आधिकारिक बयान में बताया गया कि सुदर्शन मल्होत्रा का अंतिम संस्कार 20 मार्च 2026 को सुबह 10 बजे मुंबई के सांता क्रूज़ पश्चिम स्थित हिंदू श्मशान घाट में किया जाएगा। बयान में यह भी कहा गया कि वह अपने पीछे एक लंबी और समृद्ध जीवन यात्रा, अनमोल यादें और एक मजबूत विरासत छोड़कर गई हैं जो हमेशा परिवार को मार्गदर्शन देती रहेगी।

    मनीष मल्होत्रा के लिए यह समय बेहद कठिन है और पूरी इंडस्ट्री उनके साथ खड़ी नजर आ रही है। इस दुखद घड़ी में हर कोई प्रार्थना कर रहा है कि परिवार को इस क्षति को सहने की शक्ति मिले और सुदर्शन मल्होत्रा की आत्मा को शांति प्राप्त हो।

  • रिश्तों की सच्चाई पर्दे के पीछे होती है डेजी शाह को अब भी है पलाश स्मृति के फिर साथ आने की उम्मीद

    रिश्तों की सच्चाई पर्दे के पीछे होती है डेजी शाह को अब भी है पलाश स्मृति के फिर साथ आने की उम्मीद


    नई दिल्ली। म्यूजिक कंपोजर से डायरेक्टर बने पलाश मुच्छल और भारतीय महिला क्रिकेट टीम की स्टार बल्लेबाज़ स्मृति मंधाना की शादी कभी फैंस के लिए किसी सपने से कम नहीं थी लेकिन यह सपना 25 नवंबर 2025 को हकीकत बनने से पहले ही टूट गया। सांगली में होने वाली इस शादी को सेरेमनी से ठीक एक दिन पहले अचानक रद्द कर दिया गया जिसने दोनों के चाहने वालों को हैरान और मायूस कर दिया। शुरुआत में इसकी वजह स्मृति के पिता की खराब तबीयत बताई गई लेकिन धीरे धीरे सोशल मीडिया और खबरों में कई तरह के आरोप प्रत्यारोप सामने आने लगे जिससे मामला और उलझता चला गया।

    अब इस पूरे विवाद पर बॉलीवुड एक्ट्रेस डेजी शाह ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। खास बात यह है कि डेजी शाह जल्द ही पलाश मुच्छल की अगली डायरेक्टोरियल फिल्म में नजर आने वाली हैं ऐसे में उनका बयान और भी अहम माना जा रहा है। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान डेजी ने न सिर्फ इस मुद्दे पर खुलकर बात की बल्कि एक संतुलित और परिपक्व सोच भी सामने रखी।

    डेजी शाह ने बताया कि शादी कैंसिल होने के बाद पलाश सीधे उनसे संपर्क करने में हिचकिचा रहे थे। उन्हें कुछ अनजान लोगों के जरिए फिल्म का ऑफर मिला जो उन्हें थोड़ा असामान्य लगा। डेजी के अनुसार उनकी पलाश की बहन पलक से अच्छी दोस्ती है इसलिए उन्हें उम्मीद थी कि अगर पलाश सच में उन्हें फिल्म में लेना चाहते तो वह सीधे या परिवार के माध्यम से संपर्क करते। इस अजीब स्थिति को समझने के लिए डेजी ने खुद पहल की और पलाश को मैसेज कर पूरी बात पूछी। इस पर पलाश ने जवाब दिया कि मौजूदा हालात को देखते हुए वह किसी से सीधे बातचीत करने से बच रहे हैं क्योंकि उन्हें डर था कि बात का गलत मतलब निकाला जा सकता है।

    डेजी ने इस पूरे मामले पर अपनी राय रखते हुए कहा कि वह किसी की निजी जिंदगी के आधार पर उसे जज करने में विश्वास नहीं रखतीं। उनका मानना है कि पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ को अलग अलग रखना चाहिए। उन्होंने साफ तौर पर कहा हमें नहीं पता कि असल में क्या हुआ है। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं और हम सिर्फ सुनी सुनाई बातों के आधार पर अपनी राय बना लेते हैं। यह दो परिवारों का निजी मामला है और सच्चाई क्या है यह वही लोग बेहतर जानते हैं।

    डेजी शाह ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका यह नजरिया किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं है बल्कि वह निष्पक्ष रहने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी इंसान को उसके निजी जीवन की घटनाओं के आधार पर जज करना सही नहीं है खासकर तब जब पूरी सच्चाई सामने न आई हो। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि मीडिया और सोशल मीडिया पर जो बातें सामने आती हैं वे हमेशा पूरी सच्चाई नहीं होतीं।

    अंत में डेजी ने उम्मीद जताई कि पलाश और स्मृति के बीच चीजें फिर से ठीक हो सकती हैं। उन्होंने कहा वे दोनों बहुत प्यारी जोड़ी हैं और मुझे उम्मीद है कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा और वे फिर से साथ आ सकते हैं। डेजी का यह बयान न केवल उनके संवेदनशील और संतुलित नजरिए को दर्शाता है बल्कि यह भी बताता है कि रिश्तों को समझने के लिए धैर्य और निष्पक्षता कितनी जरूरी होती है।

  • ‘धुरंधर’ को लेकर कमल जैन ने की तारीफ बोले यह फिल्म दर्शकों को खींचने वाला सिनेमाई अनुभव

    ‘धुरंधर’ को लेकर कमल जैन ने की तारीफ बोले यह फिल्म दर्शकों को खींचने वाला सिनेमाई अनुभव


    फिल्म ‘मणिकर्णिका: द क्वीन ऑफ झांसी’ के निर्माता कमल जैन ने अपनी नई फिल्म ‘धुरंधर’ को लेकर बेहद सकारात्मक राय व्यक्त की है। उनके अनुसार ‘धुरंधर’ केवल एक फिल्म नहीं बल्कि एक ऐसा सिनेमाई अनुभव है जो दर्शकों को न सिर्फ जोड़ता है बल्कि उन्हें पूरी तरह से अपनी कहानी में खींच लेता है। उन्होंने इसे एक ऐसा प्रोजेक्ट बताया है जो दर्शकों के देखने के नजरिए को बदलने की क्षमता रखता है।

    कमल जैन का मानना है कि असली सफलता सिर्फ एक अच्छी कहानी से नहीं आती, बल्कि उसमें मौजूद उस खास जादू से आती है जो दर्शकों को बांधकर रखता है। उन्होंने कहा कि ‘मैजिक ही असल में बिकता है’ और यही वह तत्व है जो किसी फिल्म को सामान्य से अलग बनाता है। उनके अनुसार ‘धुरंधर’ में वही दुर्लभ जादू मौजूद है, जिसे हमने पहले भी ‘दीवार’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘भाग मिल्खा भाग’, ‘एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’, ‘विकी डोनर’ और ‘संजू’ जैसी फिल्मों में देखा है।

    उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि इस तरह के जादू के लिए जरूरी है कि फिल्म के क्रिएटर्स की सोच और इरादे मजबूत हों। जब प्रोड्यूसर की व्यावसायिक दृष्टि और निर्देशक की रचनात्मक सोच एक साथ मिलकर काम करती हैं, तब एक बेहतरीन सिनेमाई अनुभव तैयार होता है। ‘धुरंधर’ इसी तरह की मजबूत सिनर्जी का उदाहरण है, जहां कहानी, निर्देशन और प्रस्तुति एक दूसरे के साथ तालमेल बनाते हैं।

    कमल जैन ने यह भी कहा कि आज के दौर में जब दुनिया पूरी तरह से कनेक्टेड है, तब फिल्में सिर्फ दर्शकों तक पहुंचती नहीं बल्कि उन्हें सिनेमाघरों तक खींचने की क्षमता भी रखती हैं। ‘धुरंधर’ भी इसी तरह का प्रभाव छोड़ने में सक्षम दिखाई देती है, जो दर्शकों को थिएटर तक आकर्षित करने का दम रखती है।

    उन्होंने फिल्म की टीम की भी सराहना की और कहा कि इसमें मेकर्स की स्पष्टता और मजबूत सोच साफ दिखाई देती है। आदित्य की लेखनी, निर्देशन, संगीत और कलाकारों का प्रदर्शन कहानी को और गहराई प्रदान करता है। साथ ही ज्योति देशपांडे की मजबूत मार्केटिंग और वितरण रणनीति ने इसे एक बड़े सिनेमाई प्रोजेक्ट में बदल दिया है।

    कमल जैन के अनुसार जब कंटेंट खुद बोलने लगता है और दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बन जाता है, तब वह केवल एक फिल्म नहीं रहता बल्कि एक प्रभावशाली अनुभव बन जाता है। यही ‘धुरंधर’ की खासियत है, जो कहानी कहने की कला को एक नई ऊंचाई पर ले जाती है।

     कमल जैन की राय के अनुसार ‘धुरंधर’ एक ऐसी फिल्म है जो सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि दर्शकों के दिल और दिमाग दोनों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। यह फिल्म उस स्तर पर खड़ी दिखाई देती है जहां कला, कहानी और प्रस्तुति का संगम एक यादगार अनुभव तैयार करता है
  • धुरंधर 2 रिव्यू: रणवीर सिंह का जलवा बरकरार, लेकिन पहले पार्ट की तरह धमाका नहीं

    धुरंधर 2 रिव्यू: रणवीर सिंह का जलवा बरकरार, लेकिन पहले पार्ट की तरह धमाका नहीं


    नई दिल्ली । रणवीर सिंह की फिल्म धुरंधर: द रिवेंज रिलीज हो चुकी है और पहले पार्ट की सफलता के बाद इस फिल्म को लेकर हाइप तो जबरदस्त था। दर्शकों ने एडवांस बुकिंग कर अपनी वफादारी दिखाई लेकिन कुछ शहरों में प्रीव्यू शोज़ कैंसल होने से निराशा भी हुई। जो लोग फिल्म देखने पहुंचे उनके लिए अनुभव मिला लेकिन पूरी तरह संतोषजनक नहीं।

    कहानी
    फिल्म की कहानी छह चैप्टर में बंटी है। शुरुआत में जसकीरत सिंह रांगी रणवीर सिंह और उसके परिवार की पृष्ठभूमि दिखाई जाती है। पिता भी फौजी थे और जसकीरत भी फौज में भर्ती होने वाला था लेकिन परिवार की रक्षा के लिए उसे बंदूक उठानी पड़ती है। अपनी खुद की जंग लड़ते हुए जसकीरत देश के लिए एजेंट बनता है और पाकिस्तान में हमजा अली मजारी के रूप में काम करता है।

    पहले पार्ट की कहानी रहमान डकैत अक्षय खन्ना की मौत पर खत्म हुई थी। इस पार्ट में जसकीरत हमजा उसका भाई उजैर दानिश पंडोर को सत्ता में बैठाकर अपने मिशन में आगे बढ़ता है। मेजर इकबाल अर्जुन रामपाल उसे उसके बड़े साहब से मिलवाते हैं जिससे कहानी आगे बढ़ती है।

    अभिनय

    रणवीर सिंह पूरे चार घंटे स्क्रीन पर छाए रहते हैं। उनके एक्शन इमोशन और गुस्से के सीन परफेक्ट हैं। अर्जुन रामपाल को अधिक स्क्रीन स्पेस मिला है लेकिन उनके किरदार में उतनी गहराई नहीं। संजय दत्त और सारा अर्जुन के सीन सीमित हैं जबकि माधवन और राकेश बेदी बीच-बीच में फिल्म में जान डालते हैं।

    निर्देशन

    आदित्य धर का रिसर्च और डिटेल्ड वर्क काबिल-ए-तारीफ है। उन्होंने नोटबंदी अतीक अहमद और दाऊद इब्राहिम का कनेक्शन कहानी में जोड़ा है। लेकिन पहले पार्ट के मुकाबले इस बार कहानी में सरप्राइज एलिमेंट कम हैं और कई सीन लंबी खींची गई लगती हैं। शुरुआत और क्लाइमैक्स दमदार हैं लेकिन बीच का हिस्सा थोड़ा धीमा और अनुमानित लगता है।

    संगीत
    संगीत इस बार पहले पार्ट जितना प्रभावशाली नहीं। एक-दो गाने छोड़कर बाकी यादगार नहीं हैं और रोमांटिक सॉन्ग थोड़े जबरन ठूंसे हुए लगते हैं।

    देखें या नहीं
    अगर आपने पहला पार्ट देखा है तो यह जरूर देखें। हाइप या सेलेब्स के रिव्यू से प्रभावित न हों। फिल्म ठीक-ठाक एंटरटेनमेंट देती है लेकिन पहले पार्ट जैसी रोमांचक सरप्राइज और दमदार कहानी की उम्मीदें कम रखें।

  • अमिताभ बच्चन के लिए गाने से मना कर दिया था किशोर कुमार ने, कहा क्या तुम मुझे तानसेन समझते हो?

    अमिताभ बच्चन के लिए गाने से मना कर दिया था किशोर कुमार ने, कहा क्या तुम मुझे तानसेन समझते हो?


    नई दिल्ली । बॉलीवुड के अमिताभ बच्चन को लेकर कई किस्से मशहूर हैं लेकिन उनमें से एक बेहद मज़ेदार और कम जानी-पहचानी कहानी है। यह कहानी जुड़ी है उनकी फिल्म ‘नमक हलाल से जिसमें किशोर कुमार ने एक गाने के लिए शुरू में मना कर दिया था।

    कहानी यह है कि फिल्म के गाने कि पग घुंघरू बांध मीरा नाची थीं को कंपोज़ किया था बप्पी लहरी ने। बप्पी लहरी चाहते थे कि यह गाना उनके मामा किशोर कुमार गाएं। जब उन्होंने किशोर कुमार को यह गाना पहली बार सुनाया तो किशोर कुमार ने बेहद मज़ाकिया अंदाज में प्रतिक्रिया दी यह गाना है या कहानी? मैं यह नहीं गाऊंगा। क्या तुम मुझे तानसेन समझते हो?”

    किशोर कुमार के अनुसार यह गाना इतना लंबा और जटिल था कि उन्होंने शुरू में इसे गाने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि लोग इतनी बड़ी-बड़ी रचनाएँ लेकर आते हैं और इसे गाना आसान नहीं है। लेकिन बप्पी लहरी की लगातार समझाइश और मनाने के बाद किशोर कुमार आखिरकार राज़ी हो गए और उन्होंने यह गाना गाया।

    फिल्म के निर्देशक थे प्रकाश मेहरा और इस फिल्म का बजट करीब 2 करोड़ 80 लाख रुपये था। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने जबरदस्त सफलता हासिल की और कुल ग्रॉस कलेक्शन करीब 12 करोड़ 64 लाख रुपये रहा। इस गाने ने दर्शकों के बीच खासा लोकप्रियता हासिल की और किशोर कुमार की आवाज़ को अमिताभ बच्चन की अदाकारी के साथ जोड़कर यादगार बना दिया।

    यह किस्सा यह दिखाता है कि भले ही किशोर कुमार जैसी महान आवाज़ वाले कलाकार के लिए भी कभी-कभी किसी गाने की शुरुआत चुनौतीपूर्ण होती थी लेकिन आखिरकार उनकी प्रतिभा और समझाइश ने हर बाधा पार कर दी। गाने और कहानी के बीच का यह मज़ेदार संवाद आज भी बॉलीवुड प्रेमियों के बीच चर्चित है।

  • शूटिंग के दौरान अजीब वाकया जब एक युवक ने मनोज बाजपेयी को जड़ दिया जोरदार थप्पड़

    शूटिंग के दौरान अजीब वाकया जब एक युवक ने मनोज बाजपेयी को जड़ दिया जोरदार थप्पड़


    नई दिल्ली । बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता मनोज बाजपेयी ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान अपने करियर से जुड़ा एक चौंकाने वाला किस्सा साझा किया जिसने सभी को हैरान कर दिया। यह घटना उनकी चर्चित फिल्म गली गुलियां की शूटिंग के दौरान हुई थी जब एक आम युवक ने अचानक गुस्से में आकर उन्हें थप्पड़ जड़ दिया।

    मनोज बाजपेयी ने बताया कि फिल्म की शूटिंग एक बेहद संकरी और सुनसान गली में हो रही थी जिसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया था ताकि शूटिंग बिना किसी व्यवधान के पूरी हो सके। आसपास के लोगों को भी कुछ समय के लिए रुकने के लिए कहा गया था। सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था तभी अचानक 21 22 साल का एक युवक वहां आ गया।

    अभिनेता के अनुसार वह युवक बिना किसी की बात सुने आगे बढ़ने लगा और उसने साफ कह दिया कि उसे अपने काम से जाना है और वह किसी भी हालत में रुकेगा नहीं। टीम ने पहले उसे समझाने की कोशिश की लेकिन जब वह नहीं माना तो आखिरकार उसे जाने दिया गया।

    यहीं से कहानी ने अप्रत्याशित मोड़ लिया। मनोज बाजपेयी ने बताया कि जब वह युवक उनके पास से गुजर रहा था तो उसने अचानक उनके कूल्हे पर जोरदार थप्पड़ मार दिया। यह घटना इतनी अचानक हुई कि कोई भी कुछ समझ नहीं पाया। अभिनेता ने कहा कि वह युवक शायद इस बात से नाराज था कि उसे शूटिंग के कारण रोका गया और वह अपनी झुंझलाहट निकालना चाहता था।

    मनोज बाजपेयी ने इस घटना को याद करते हुए कहा कि शूटिंग के दौरान ऐसे कई अजीब और अप्रत्याशित अनुभव होते हैं जिनके लिए कोई भी तैयार नहीं होता। हालांकि यह घटना चौंकाने वाली थी लेकिन उन्होंने इसे हल्के फुल्के अंदाज में साझा किया।

    फिल्म गली गुलियां भले ही बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाई लेकिन समीक्षकों ने इसकी कहानी और मनोज बाजपेयी के अभिनय की खूब तारीफ की थी। फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की मानसिक स्थिति को दर्शाती है जो अपने आसपास हो रही घटनाओं को लेकर गहरे मानसिक तनाव में होता है और चाइल्ड एब्यूज जैसे गंभीर मुद्दे को उठाती है।

    वर्क फ्रंट की बात करें तो मनोज बाजपेयी लगातार अलग अलग और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में उनका नाम भागम भाग 2 को लेकर चर्चा में है। इसके अलावा वह फिल्म घूसखोर पंडित को लेकर भी सुर्खियों में रहे जिसमें उन्होंने एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी का किरदार निभाया। यह फिल्म अपने टाइटल को लेकर विवादों में भी रही। यह किस्सा एक बार फिर दिखाता है कि फिल्मी दुनिया के पीछे कई अनदेखे और अनसुने अनुभव छिपे होते हैं जो सितारों के जीवन को आम लोगों से अलग और कभी कभी चुनौतीपूर्ण बना देते हैं।