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  • तमिलनाडु की राजनीति में बढ़ी नई खींचतान, गठबंधन टूटने के बाद कांग्रेस पर उदयनिधि स्टालिन का तीखा हमला चर्चा में

    तमिलनाडु की राजनीति में बढ़ी नई खींचतान, गठबंधन टूटने के बाद कांग्रेस पर उदयनिधि स्टालिन का तीखा हमला चर्चा में


    नई दिल्ली। तमिलनाडु की राजनीति में चुनावी नतीजों के बाद सियासी समीकरण तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। हालिया घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है और लंबे समय से साथ दिखाई देने वाले राजनीतिक रिश्तों में अब तनाव साफ नजर आने लगा है। चुनाव परिणामों के बाद गठबंधन की राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है, जिसके चलते पुराने सहयोगियों के बीच दूरी बढ़ती दिखाई दे रही है। इसी बदलते माहौल के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है और नेताओं के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप चर्चा का केंद्र बन गए हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी नतीजों के बाद अक्सर नए समीकरण बनते और पुराने समीकरण बदलते हैं, लेकिन इस बार स्थिति अधिक संवेदनशील दिखाई दे रही है। सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक दलों के बीच बने नए समीकरणों ने कई पुराने सहयोगियों को असहज स्थिति में ला दिया है। यही कारण है कि अब राजनीतिक मंचों से दिए जा रहे बयान भी अधिक आक्रामक और सीधे नजर आ रहे हैं।

    हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में एक प्रमुख नेता द्वारा कांग्रेस पर की गई तीखी टिप्पणी ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। उनके बयान ने केवल गठबंधन की राजनीति पर सवाल नहीं खड़े किए, बल्कि चुनावी हार और जीत के पीछे की रणनीतियों को लेकर भी नई बहस शुरू कर दी है। उनके बयान के बाद राज्य की राजनीति में नए विवाद की शुरुआत मानी जा रही है।

    राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि चुनावों के बाद बने नए गठबंधन और समर्थन के समीकरणों ने कई दलों की रणनीति को प्रभावित किया है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब लंबे समय तक साथ रहे दल अलग रास्ता चुनते हैं तो उसका असर केवल सत्ता तक सीमित नहीं रहता बल्कि संगठन और कार्यकर्ताओं के स्तर पर भी दिखाई देता है। यही कारण है कि हाल के घटनाक्रमों के बाद कार्यकर्ताओं और नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी लगातार सामने आ रही हैं।

    राजनीति में भरोसा और सहयोग दो ऐसे तत्व माने जाते हैं जिनके आधार पर गठबंधन लंबे समय तक टिकते हैं। लेकिन जब परिस्थितियां बदलती हैं तो राजनीतिक दल अपने हितों और भविष्य की रणनीतियों के अनुसार नए फैसले लेने लगते हैं। ऐसे बदलाव कई बार राजनीतिक रिश्तों में तनाव पैदा कर देते हैं। तमिलनाडु की मौजूदा स्थिति को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है, जहां चुनावी परिणामों के बाद सियासी समीकरणों में तेजी से परिवर्तन दिखाई दे रहा है।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में राज्य की राजनीति और अधिक दिलचस्प हो सकती है। नए गठबंधन, बदलते समर्थन और राजनीतिक बयानबाजी आने वाले दिनों में राजनीतिक माहौल को और प्रभावित कर सकती है। फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि चुनाव खत्म होने के बाद भी राजनीतिक संघर्ष थमा नहीं है बल्कि अब यह नए चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। तमिलनाडु की राजनीति में आने वाले समय में कई नए मोड़ देखने को मिल सकते हैं, जिन पर पूरे देश की नजर बनी रहने की संभावना है।

  • अजय राय के बयान से बढ़ा राजनीतिक घमासान, योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस को बताया हताश और मानसिक रूप से दिवालिया

    अजय राय के बयान से बढ़ा राजनीतिक घमासान, योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस को बताया हताश और मानसिक रूप से दिवालिया


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर कांग्रेस नेता अजय राय की कथित विवादित टिप्पणी के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया है। इस मामले को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह की अभद्र और असंसदीय भाषा पार्टी के राजनीतिक संस्कारों को दर्शाती है।

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए इस प्रकार की टिप्पणी न केवल अनुचित है बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भी खिलाफ है। उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी लगातार राजनीतिक हताशा और निराशा में डूबती जा रही है, जिसका असर उसके नेताओं की भाषा और व्यवहार में साफ दिखाई दे रहा है। योगी ने यह भी कहा कि कांग्रेस अब ऐसी स्थिति में पहुंच चुकी है जहां वह देशवासियों से क्षमा मांगने लायक भी नहीं बची है।

    यह विवाद उस समय बढ़ा जब सोशल मीडिया पर कांग्रेस नेता अजय राय का एक वीडियो तेजी से वायरल होने लगा। वीडियो में कथित तौर पर वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद भाजपा नेताओं ने इसे मुद्दा बनाते हुए कांग्रेस पर लगातार हमले शुरू कर दिए।

    राजनीतिक विवाद बढ़ने के बाद उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेताओं की भाषा लगातार मर्यादा से बाहर होती जा रही है और यह पार्टी की राजनीतिक हताशा को दर्शाता है। उनके अनुसार लगातार चुनावी हार और जनाधार में गिरावट के कारण कांग्रेस अब व्यक्तिगत टिप्पणियों और आक्रामक बयानबाजी का सहारा ले रही है।

    भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने भी इस मामले को लेकर कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि जब किसी राजनीतिक दल के पास जनता के सामने रखने के लिए मुद्दे नहीं बचते, तब वह व्यक्तिगत आरोपों और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने लगता है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक राजनीति में भाषा की मर्यादा बनाए रखना बेहद जरूरी है और इस तरह की टिप्पणियां राजनीतिक संस्कृति को कमजोर करती हैं।

    इस पूरे विवाद ने एक बार फिर राजनीतिक संवाद की भाषा और मर्यादा को लेकर बहस छेड़ दी है। विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच तीखी बयानबाजी पहले भी देखने को मिलती रही है, लेकिन इस तरह के विवाद अक्सर राजनीतिक माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र में असहमति और आलोचना स्वाभाविक है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में भाषा की गरिमा बनाए रखना सभी नेताओं की जिम्मेदारी होती है।

    फिलहाल यह मामला राजनीतिक स्तर पर लगातार तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है और आने वाले दिनों में इस पर और प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। भाजपा इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर हमलावर बनी हुई है, जबकि राजनीतिक गलियारों में इस बयान को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है।

  • 2029 चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज, प्रदीप गुप्ता की भविष्यवाणी ने बढ़ाई राजनीतिक बहस

    2029 चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज, प्रदीप गुप्ता की भविष्यवाणी ने बढ़ाई राजनीतिक बहस

    नई दिल्ली । देश की राजनीति को लेकर एक बार फिर बड़ा विश्लेषण सामने आया है, जिसने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। चुनावी सर्वे और राजनीतिक रुझानों पर काम करने वाली संस्था के प्रमुख प्रदीप गुप्ता ने 2029 के लोकसभा चुनाव और उससे आगे की राजनीतिक दिशा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उनके अनुसार भारतीय राजनीति में मौजूदा सत्ता संतुलन आने वाले वर्षों में भी बड़े बदलाव की ओर नहीं जाता दिखाई दे रहा है, और इसका प्रभाव लंबे समय तक बना रह सकता है।

    प्रदीप गुप्ता ने अपने विश्लेषण में कहा कि देश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव 2014 के बाद से देखा गया है, जिसने राजनीतिक परिदृश्य को काफी हद तक बदल दिया है। उनके अनुसार जिस तरह पहले कांग्रेस का लंबा शासनकाल रहा था, उसी तरह अब एक नई राजनीतिक साइकिल बन चुकी है, जो लंबी अवधि तक चल सकती है। उन्होंने संकेत दिया कि यह राजनीतिक प्रभाव करीब दो दशकों तक जारी रह सकता है, जिससे चुनावी समीकरणों में स्थिरता जैसी स्थिति बनी रह सकती है।

    उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में हुए चुनावों के परिणाम यह संकेत देते हैं कि वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व को जनता से लगातार समर्थन मिल रहा है। विभिन्न राज्यों में हुए चुनावों के नतीजों को देखते हुए उनका मानना है कि राजनीतिक प्रभाव का दायरा लगातार मजबूत हो रहा है। उनके अनुसार जब किसी दल को लगातार बड़े जनादेश मिलते हैं तो उससे अपेक्षाएं भी बढ़ जाती हैं और उसे और बेहतर प्रदर्शन करना होता है।

    कांग्रेस को लेकर अपने आकलन में उन्होंने कहा कि पार्टी को अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में अभी समय लग सकता है। उनके अनुसार पिछले लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहने के कारण संगठन और जनता के बीच विश्वास को फिर से स्थापित करने की प्रक्रिया चुनौतीपूर्ण हो सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि लोकतंत्र में राजनीतिक बदलाव हमेशा संभव होते हैं, लेकिन इसके लिए समय और मजबूत रणनीति की आवश्यकता होती है।

    अपने विश्लेषण में उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि देश के कई राज्यों में राजनीतिक प्रभाव का संतुलन स्पष्ट रूप से एक दिशा में झुका हुआ दिखाई देता है, जहां वर्तमान नेतृत्व मजबूत स्थिति में नजर आता है। इससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले वर्षों में चुनावी प्रतिस्पर्धा और अधिक रणनीतिक और जटिल हो सकती है।

    कुल मिलाकर उनके बयान ने 2029 के लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक चर्चा को और तेज कर दिया है। विभिन्न राजनीतिक दल इस तरह के आकलनों को अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं, जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि अंतिम परिणाम पूरी तरह जनता के मूड और आने वाले समय की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

  • रायबरेली में राहुल गांधी का मोदी-शाह पर तीखा हमला: बोले- देश को बेच दिया, ये लोग गद्दार हैं

    रायबरेली में राहुल गांधी का मोदी-शाह पर तीखा हमला: बोले- देश को बेच दिया, ये लोग गद्दार हैं



    रायबरेली। रायबरेली में आयोजित एक जनसभा के दौरान कांग्रेस नेता Rahul Gandhi ने केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला। अपने संबोधन में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और आरएसएस को लेकर कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए आरोप लगाया कि देश को गलत दिशा में ले जाया जा रहा है।

    राहुल गांधी ने कहा कि आने वाले समय में देश में आर्थिक संकट और महंगाई और बढ़ सकती है, जिससे आम जनता पर भारी असर पड़ेगा। उन्होंने दावा किया कि गैस, पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी होगी और किसानों को खाद की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

    उन्होंने अपने भाषण में यह भी कहा कि देश के लोकतंत्र और संविधान की रक्षा करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सत्ता में बैठे लोग जनता की समस्याओं से ध्यान भटका रहे हैं और नीतियां आम लोगों के हित में नहीं बनाई जा रही हैं।

    जनसभा के दौरान उन्होंने उपस्थित लोगों से अपील की कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की रक्षा के लिए आगे आएं और अपनी आवाज को मजबूत करें। उन्होंने यह भी कहा कि देश में आने वाले समय में आर्थिक स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है, जिसका असर सीधे आम जनता पर पड़ेगा।

    इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल गर्मा गया है और इस मुद्दे पर सियासी प्रतिक्रिया भी तेज होने की संभावना है।

  • पासपोर्ट विवाद में बढ़ी कांग्रेस नेताओं की मुश्किलें, पवन खेड़ा के बाद अब रणदीप सुरजेवाला को समन

    पासपोर्ट विवाद में बढ़ी कांग्रेस नेताओं की मुश्किलें, पवन खेड़ा के बाद अब रणदीप सुरजेवाला को समन



    नई दिल्ली। असम में कथित पासपोर्ट विवाद को लेकर कांग्रेस नेताओं की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। गुवाहाटी पुलिस की क्राइम ब्रांच ने अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला को पूछताछ के लिए समन जारी किया है। उन्हें 23 मई को क्राइम ब्रांच पुलिस स्टेशन में उपस्थित होने को कहा गया है।

    यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा के पासपोर्ट से जुड़े आरोपों से संबंधित है। असम पुलिस के अनुसार, इस प्रकरण में लगाए गए आरोपों की जांच क्राइम ब्रांच द्वारा की जा रही है।

    इससे पहले कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को भी इसी मामले में समन भेजा गया था। दरअसल, अप्रैल 2026 में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पवन खेड़ा ने आरोप लगाया था कि रिनिकी भुइयां सरमा के पास भारत के अलावा यूएई, मिस्र और एंटीगुआ जैसे देशों के पासपोर्ट भी हैं। साथ ही उन्होंने सरमा परिवार पर विदेशों में अघोषित संपत्ति रखने का आरोप लगाया था।

    इन आरोपों के बाद रिनिकी भुइयां सरमा ने गुवाहाटी क्राइम ब्रांच में पवन खेड़ा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में धोखाधड़ी, जालसाजी, चुनाव के दौरान भ्रामक बयान देने और मानहानि जैसे आरोप लगाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत मिलने के बाद पवन खेड़ा को जांच में सहयोग करने के निर्देश दिए गए थे।

    पवन खेड़ा 13 मई 2026 को गुवाहाटी क्राइम ब्रांच के सामने पेश हुए थे, जहां उनसे पहले दिन 10 घंटे से अधिक समय तक पूछताछ की गई। इसके अगले दिन 14 मई को भी उनसे करीब 8 घंटे तक सवाल-जवाब किए गए। अब उन्हें आगे की जांच के लिए 25 मई 2026 को फिर से पेश होने का निर्देश दिया गया है।

  • कर्नाटक में CM पद पर सस्पेंस बरकरार: सिद्धारमैया बनाम डीके शिवकुमार की खींचतान तेज, कांग्रेस हाईकमान पर बढ़ा दबाव

    कर्नाटक में CM पद पर सस्पेंस बरकरार: सिद्धारमैया बनाम डीके शिवकुमार की खींचतान तेज, कांग्रेस हाईकमान पर बढ़ा दबाव



    नई दिल्ली। कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद को लेकर कांग्रेस के भीतर अंदरूनी टकराव एक बार फिर खुलकर सामने आता दिख रहा है। एक तरफ मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपनी सरकार को मजबूत करने और कैबिनेट विस्तार पर जोर दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार भी नेतृत्व परिवर्तन की अपनी दावेदारी को लेकर सक्रिय हैं। इस पूरे मामले ने कांग्रेस हाईकमान के सामने एक नई राजनीतिक दुविधा खड़ी कर दी है।

    पार्टी के अंदर चल रही चर्चाओं के मुताबिक, सिद्धारमैया खेमे का फोकस कैबिनेट फेरबदल और खाली मंत्रिपदों को भरने पर है, जिससे सरकार और संगठन दोनों पर उनकी पकड़ मजबूत हो सके। उनका मानना है कि प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखना अभी प्राथमिकता होनी चाहिए और किसी भी तरह के नेतृत्व बदलाव को फिलहाल टाल देना चाहिए।

    दूसरी ओर, डीके शिवकुमार खेमे का दावा है कि संगठन को मजबूत करने और विधानसभा चुनाव में जीत दिलाने में उनकी भूमिका अहम रही है, इसलिए उन्हें भी मुख्यमंत्री पद पर अवसर मिलना चाहिए। उनके समर्थक लगातार “अगले मुख्यमंत्री” जैसे पोस्टर और सार्वजनिक कार्यक्रमों के जरिए दबाव बना रहे हैं।

    कांग्रेस आलाकमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसी एक पक्ष के समर्थन से दूसरे खेमे में असंतोष पैदा हो सकता है, जिससे राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने का खतरा है। यही वजह है कि पार्टी फिलहाल “इंतजार करो और देखो” की रणनीति पर काम कर रही है।

    हालांकि, हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि इस मुद्दे पर लंबे समय तक टालमटोल करना मुश्किल हो सकता है। आने वाले दिनों में कांग्रेस हाईकमान को यह तय करना होगा कि सिद्धारमैया के नेतृत्व को जारी रखा जाए या फिर डीके शिवकुमार को कमान सौंपकर सत्ता संतुलन बदला जाए।

  • केरल CM चेहरा तय करने की कवायद तेज, नेताओं से बातचीत के बाद अब अंतिम निर्णय का इंतजार

    केरल CM चेहरा तय करने की कवायद तेज, नेताओं से बातचीत के बाद अब अंतिम निर्णय का इंतजार

    नई दिल्ली।  केरल विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन के बाद अब Kerala में मुख्यमंत्री पद को लेकर सियासी हलचल अपने चरम पर पहुंच गई है। 140 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ ने 102 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है, लेकिन अब असली चर्चा नए मुख्यमंत्री के चयन को लेकर हो रही है।
    कांग्रेस नेतृत्व इस बार सर्वसम्मति से मुख्यमंत्री चुनने की रणनीति पर काम कर रहा है। इसी कड़ी में पार्टी के वरिष्ठ नेता Rahul Gandhi ने दिल्ली में पूर्व प्रदेश अध्यक्षों और वरिष्ठ नेताओं के साथ मैराथन बैठक की। इस दौरान उन्होंने जमीनी हालात और विधायकों की राय के साथ-साथ जनता की भावनाओं को भी समझने की कोशिश की।
    सूत्रों के मुताबिक, अब फैसला पूरी तरह कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge के हाथ में है। खरगे के बेंगलुरु से दिल्ली लौटने के बाद उनकी सोनिया गांधी से अंतिम दौर की चर्चा होगी, जिसके बाद नए मुख्यमंत्री के नाम पर औपचारिक मुहर लगाई जाएगी। माना जा रहा है कि यह घोषणा बुधवार तक हो सकती है।
    सीएम पद की दौड़ में तीन बड़े नाम सबसे आगे हैं रमेश चेन्निथला, वीडी सतीशन और एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल। इन नेताओं को लेकर पार्टी के भीतर लगातार मंथन चल रहा है। राहुल गांधी ने इन नामों पर राय जानने के लिए कई वरिष्ठ नेताओं से व्यक्तिगत बातचीत भी की है, ताकि एक ऐसा चेहरा चुना जा सके जो सभी गुटों को स्वीकार्य हो।
    इस प्रक्रिया में केवल विधायकों की राय ही नहीं, बल्कि सहयोगी दलों की भूमिका और जनता की पसंद को भी अहमियत दी जा रही है। पार्टी का कहना है कि यूडीएफ गठबंधन की एकजुटता बनाए रखना भी इस फैसले का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
    चुनाव परिणामों के बाद से ही कांग्रेस हाईकमान लगातार बैठकों में व्यस्त है और हर स्तर पर विचार-विमर्श किया जा रहा है। अजय माकन और मुकुल वासनिक जैसे पर्यवेक्षकों ने पहले ही विधायकों से फीडबैक ले लिया है, जिसे अंतिम निर्णय में शामिल किया जाएगा।
    अब पूरे राजनीतिक गलियारों की नजर इस बात पर टिकी है कि केरल की कमान आखिर किसे सौंपी जाएगी। कांग्रेस के लिए यह फैसला न सिर्फ सरकार गठन का हिस्सा है, बल्कि आने वाले वर्षों की राजनीति की दिशा भी तय करेगा।
  • मंडला दौरे पर अजय सिंह राहुल का बयान: एकजुटता से ही मिलेगी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को सफलता

    मंडला दौरे पर अजय सिंह राहुल का बयान: एकजुटता से ही मिलेगी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को सफलता


    नई दिल्ली । मंडला में शनिवार शाम कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल पहुंचे। यह दौरा प्रदेश में कांग्रेस संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को एकजुट करने के अभियान का हिस्सा बताया जा रहा है। वे इन दिनों पूरे मध्य प्रदेश का दौरा कर पार्टी को जमीनी स्तर पर फिर से सक्रिय करने की कोशिश में जुटे हैं।
    मंडला पहुंचने पर उन्होंने स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं से मुलाकात की और संगठन की वर्तमान स्थिति पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान उन्होंने साफ कहा कि यदि कांग्रेस के सभी कार्यकर्ता एकजुट होकर काम करें तो आगामी चुनावों में पार्टी की जीत पूरी तरह सुनिश्चित है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि किसी भी राजनीतिक दल में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन चुनाव के समय एकजुटता ही सबसे बड़ी ताकत होती है।
    अजय सिंह राहुल ने अपने संबोधन में संगठन की मजबूती पर जोर देते हुए कहा कि कई कार्यकर्ता लंबे समय से सक्रिय राजनीति से दूर हो गए हैं या उपेक्षा महसूस कर रहे हैं, ऐसे सभी लोगों को फिर से जोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का आधार मजबूत है, जरूरत सिर्फ उसे सही दिशा देने की है।
    अपने बयान में उन्होंने भाजपा पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि राजनीति में कोई भी दल स्थायी रूप से सत्ता में नहीं रहता और समय हमेशा बदलता है। उन्होंने भाजपा को अहंकार से बचने की सलाह देते हुए कहा कि इतिहास गवाह है कि सत्ता का संतुलन कभी भी बदल सकता है।
    इसके साथ ही उन्होंने पश्चिम बंगाल चुनाव का उदाहरण देते हुए चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। उन्होंने केंद्र सरकार पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने के आरोप भी लगाए, हालांकि इन बयानों को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।
    इस दौरान मंडला में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता मौजूद रहे, जिनमें जिलाध्यक्ष डॉ. अशोक मर्सकोले, निवास विधायक चैनसिंह वरकड़े और केवलारी विधायक रजनीश सिंह प्रमुख रूप से शामिल रहे। सभी ने संगठन को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर पार्टी को सक्रिय करने पर सहमति जताई।

  • असम-बंगाल चुनाव परिणाम पर कांग्रेस असमंजस में, शर्मनाक हार के बाद नेतृत्व पर उठे सवाल

    असम-बंगाल चुनाव परिणाम पर कांग्रेस असमंजस में, शर्मनाक हार के बाद नेतृत्व पर उठे सवाल


    नई दिल्ली।  हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने एक बार फिर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। केरल को छोड़कर असम और पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों में पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा, जिसके बाद अब संगठन के भीतर गंभीर मंथन शुरू हो गया है।
    असम और पश्चिम बंगाल में मिली हार के बाद पार्टी ने समीक्षा बैठक बुलाने का निर्णय लिया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन हारों की जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी। संगठन के भीतर अभी तक किसी भी स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं हो पाई है, जिससे असंतोष और बढ़ता जा रहा है।
    असम में हार के बाद प्रदेश प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, लेकिन पार्टी हाईकमान ने अभी तक उस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि हार की विस्तृत समीक्षा के बाद ही आगे कोई कदम उठाया जाएगा।
    पिछले कुछ वर्षों में लगातार चुनावी असफलताओं के बावजूद संगठनात्मक स्तर पर जिम्मेदारी तय न किए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यदि समय रहते जवाबदेही तय नहीं की गई, तो जमीनी स्तर पर सुधार मुश्किल होगा।
    इसी संदर्भ में पार्टी के अंदर चल रहे संगठन सृजन कार्यक्रम पर भी चर्चा हो रही है, जिसकी शुरुआत अप्रैल 2025 में अहमदाबाद अधिवेशन के दौरान की गई थी। इसका उद्देश्य जिला स्तर पर नेतृत्व को मजबूत करना और जवाबदेही तय करना था, लेकिन अब तक इसका प्रभाव सीमित ही दिखाई दिया है।
    कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने पहले भी कहा था कि जिला अध्यक्षों और स्थानीय नेतृत्व को स्थायी पद नहीं माना जाएगा और प्रदर्शन के आधार पर ही उनकी जिम्मेदारी तय की जाएगी। हालांकि जमीनी स्तर पर इस व्यवस्था का प्रभाव अभी तक पूरी तरह लागू नहीं हो सका है।
    इसी बीच, आगामी 2027 के चुनावों को देखते हुए पार्टी पर प्रदर्शन सुधारने का दबाव बढ़ रहा है। वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि संगठन को पुनर्गठित किए बिना चुनावी स्थिति में सुधार संभव नहीं है।
    वहीं दूसरी ओर, केरल में पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन को मिली सफलता के बाद वहां सरकार गठन की प्रक्रिया तेज हो गई है। मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी के भीतर कई नामों पर चर्चा चल रही है, जिनमें वीडी सतीशन, रमेश चेन्निथला और केसी वेणुगोपाल प्रमुख बताए जा रहे हैं।
    हालांकि पार्टी नेतृत्व ने अभी अंतिम फैसला हाईकमान पर छोड़ दिया है, जिससे यह स्पष्ट है कि संगठन में निर्णय प्रक्रिया अब भी केंद्रीकृत बनी हुई है।
    कुल मिलाकर, असम और बंगाल में हार के बाद कांग्रेस एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां समीक्षा तो शुरू हो चुकी है, लेकिन जवाबदेही तय करने और संगठन में वास्तविक सुधार की दिशा अभी भी स्पष्ट नहीं हो पाई है।
  • केरल में CM फेस पर सस्पेंस: राहुल का फॉर्मूला लागू, विधायक तय करेंगे मुख्यमंत्री; सतीशन-वेणुगोपाल-चेन्नीथला रेस में आगे

    केरल में CM फेस पर सस्पेंस: राहुल का फॉर्मूला लागू, विधायक तय करेंगे मुख्यमंत्री; सतीशन-वेणुगोपाल-चेन्नीथला रेस में आगे


    नई दिल्ली। केरल में चुनावी जीत के बाद सत्ता की तस्वीर तो साफ हो गई है, लेकिन मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इस पर सस्पेंस बरकरार है। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) की सरकार बनने जा रही है, लेकिन कांग्रेस के भीतर सीएम फेस को लेकर मंथन तेज हो गया है। इस बीच राहुल गांधी ने साफ संकेत दे दिए हैं कि इस बार फैसला हाईकमान नहीं, बल्कि विधायक करेंगे।

    सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी चाहते हैं कि विधायक दल की बैठक में आम सहमति से नेता चुना जाए और वही मुख्यमंत्री बने। उन्होंने अपने इस रुख की जानकारी पार्टी पर्यवेक्षकों मुकुल वासनिक और अजय माकन को भी दे दी है, जो तिरुअनंतपुरम जाकर विधायकों की राय जानेंगे।

    सीएम पद की रेस में फिलहाल तीन बड़े नाम सबसे आगे चल रहे हैं। पहला नाम है केसी वेणुगोपाल का, जो कांग्रेस संगठन में मजबूत पकड़ रखते हैं और राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं। हालांकि, पार्टी के अंदर यह भी चर्चा है कि उन्हें दिल्ली की राजनीति में बनाए रखना ज्यादा जरूरी है, जिससे उनकी दावेदारी पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

    दूसरा बड़ा नाम वी. डी. सतीशन का है, जो युवा चेहरा हैं और नेता प्रतिपक्ष के तौर पर सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं। उनकी लोकप्रियता और आक्रामक राजनीतिक शैली उनके पक्ष में जाती है, लेकिन हाल के कुछ विवाद उनकी राह में बाधा बन सकते हैं।

    तीसरे दावेदार रमेश चेन्नीथला हैं, जिन्हें अनुभव और वरिष्ठता का बड़ा फायदा मिल सकता है। पार्टी के कई वरिष्ठ नेता मानते हैं कि लंबे समय से संगठन और सरकार में उनकी भूमिका को देखते हुए उन्हें मौका मिलना चाहिए।

    इसके अलावा शशि थरूर का नाम भी चर्चा में है, लेकिन सांसद होने के कारण उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने की संभावना कम मानी जा रही है, क्योंकि इससे उपचुनाव का जोखिम खड़ा हो सकता है।

    राजनीतिक समीकरणों के बीच यह भी साफ है कि अंतिम फैसला कांग्रेस हाईकमान के शीर्ष नेताओं मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी की राय से प्रभावित होगा, लेकिन राहुल गांधी का रुख इस बार निर्णायक माना जा रहा है।

    कुल मिलाकर केरल में मुख्यमंत्री का चेहरा तय करने की जिम्मेदारी अब विधायकों के कंधों पर है। कांग्रेस इस बार किसी तरह का विवाद या असंतोष नहीं चाहती, इसलिए आम सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है। अब देखना दिलचस्प होगा कि विधायक किस नेता पर भरोसा जताते हैं और किसके सिर पर केरल का ताज सजता है।