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  • 2018 की टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट अदालत की कार्यवाही रद्द करने से किया इनकार, छह सप्ताह की राहत जारी

    2018 की टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट अदालत की कार्यवाही रद्द करने से किया इनकार, छह सप्ताह की राहत जारी



    नई दिल्ली ।
    कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ 2018 में की गई टिप्पणी से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट से झटका लगा है। अदालत ने उनके खिलाफ मजिस्ट्रेट अदालत की ओर से जारी समन और मामले की आगे की कार्यवाही को रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। हालांकि, राहुल गांधी को तत्काल राहत देते हुए अदालत ने 2021 में जारी अंतरिम आदेश को छह सप्ताह के लिए बढ़ा दिया है।

    पूरा मामला सितंबर 2018 का है। उस समय राजस्थान में आयोजित एक चुनावी रैली के दौरान राहुल गांधी ने राफेल डील का मुद्दा उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा था। अपने भाषण में उन्होंने प्रधानमंत्री के लिए ‘कमांडर-इन-चीफ’ और ‘चौकीदार चोर है’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। इसके बाद उन्होंने भाषण का वीडियो अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर भी साझा किया था।

    राहुल गांधी की इस टिप्पणी को लेकर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमाल ने वर्ष 2019 में मुंबई की गिरगांव मजिस्ट्रेट अदालत में आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता की ओर से तर्क दिया गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। ऐसे में उनके खिलाफ चोरी से जुड़ी आपत्तिजनक टिप्पणी से पार्टी और उसके कार्यकर्ताओं की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है।

    शिकायत पर कार्रवाई करते हुए अगस्त 2019 में मजिस्ट्रेट अदालत ने राहुल गांधी के खिलाफ समन जारी किया था। इसके बाद राहुल गांधी ने समन को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उन्होंने अदालत से मानहानि मामले की कार्यवाही के साथ मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा जारी समन को भी रद्द करने का अनुरोध किया था।

    राहुल गांधी के वकीलों ने हाई कोर्ट में दलील दी कि शिकायत दर्ज कराने वाला व्यक्ति इस मामले में सीधे तौर पर पीड़ित पक्ष नहीं है। उनका कहना था कि राहुल गांधी की टिप्पणी किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि एक व्यक्ति विशेष को लेकर थी। इसी आधार पर वकीलों ने दावा किया कि किसी पार्टी कार्यकर्ता को इस तरह की टिप्पणी के आधार पर मानहानि का मुकदमा दायर करने का कानूनी अधिकार नहीं बनता।

    इस दलील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एन. आर. बोरकर की एकल पीठ ने राहुल गांधी की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने शशि थरूर से संबंधित पुराने फैसले का भी संदर्भ दिया। कोर्ट ने कहा कि भाजपा एक पंजीकृत और पहचान योग्य राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी है तथा प्रधानमंत्री उसके प्रमुख प्रतिनिधि हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री के खिलाफ की गई टिप्पणी से पार्टी के कार्यकर्ताओं की मानहानि होने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

    हाई कोर्ट ने यह भी माना कि मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश में ऐसा कोई गैर-कानूनी या अनुचित आधार नहीं है, जिसके चलते उसे रद्द किया जाए। इसी कानूनी आधार पर राहुल गांधी की याचिका को खारिज कर दिया गया।

    हालांकि, फैसले के बावजूद राहुल गांधी को छह सप्ताह की अंतरिम राहत मिली है। उनके वकीलों के अनुरोध पर अदालत ने 2021 में जारी अंतरिम आदेश की अवधि बढ़ा दी है। इसके तहत अगले छह सप्ताह तक मजिस्ट्रेट अदालत में मामले की सुनवाई स्थगित रहेगी और राहुल गांधी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने से भी छूट मिलेगी। इस अवधि में वह हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं।

  • राहुल गांधी ने कांग्रेस में संगठनात्मक बदलाव तेज किया, 120 युवा नेताओं के इंटरव्यू के बाद राष्ट्रीय सचिवों की नई टीम बनेगी

    राहुल गांधी ने कांग्रेस में संगठनात्मक बदलाव तेज किया, 120 युवा नेताओं के इंटरव्यू के बाद राष्ट्रीय सचिवों की नई टीम बनेगी

    नई दिल्ली । लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी कांग्रेस संगठन में बड़े बदलाव की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। पार्टी के भीतर संगठन को पुराने तौर-तरीकों से बाहर निकालकर युवा, सक्रिय और जमीन से जुड़े नेतृत्व को आगे लाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली नियुक्तियों में अब केवल राजनीतिक वरिष्ठता के बजाय नेताओं के संगठनात्मक काम, जमीनी सक्रियता और नेतृत्व क्षमता को अधिक महत्व देने की तैयारी है।

    कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव पद के लिए चयन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। सोमवार को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने 30 नेताओं के इंटरव्यू लिए। इस प्रक्रिया में संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल भी शामिल हैं। चयन प्रक्रिया के तहत नेताओं को 10-10 के समूह में इंटरव्यू के लिए दिल्ली बुलाया जा रहा है।

    इंटरव्यू के दौरान राहुल गांधी उम्मीदवारों से उनके पिछले संगठनात्मक काम, राजनीतिक अनुभव और भविष्य की रणनीति से जुड़े सवाल कर रहे हैं। चयन प्रक्रिया में नेताओं के कामकाज और उनकी संगठनात्मक भूमिका को महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। शॉर्टलिस्ट किए गए नेताओं का विस्तृत कामकाजी रिपोर्ट कार्ड पहले से ही पार्टी नेतृत्व के पास मौजूद है।

    कांग्रेस राष्ट्रीय सचिवों की मौजूदा टीम में भी बड़े फेरबदल की तैयारी कर रही है। पार्टी की योजना मौजूदा 60 फीसदी से अधिक सचिवों को बदलकर नए चेहरों को जिम्मेदारी देने की है। कुल 120 नेताओं के इंटरव्यू की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राष्ट्रीय सचिवों की नियुक्ति की जाएगी। इससे राष्ट्रीय संगठन में बड़ी संख्या में नए और अपेक्षाकृत युवा चेहरों के आने की संभावना है।

    चयन प्रक्रिया में ‘संगठन सृजन’ अभियान के दौरान ऑब्जर्वर के तौर पर काम कर चुके नेताओं को विशेष प्राथमिकता मिलने की बात सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी नेतृत्व ऐसे नेताओं को आगे लाना चाहता है, जिन्होंने संगठन के साथ सीधे जमीन पर काम किया है और अलग-अलग क्षेत्रों में संगठनात्मक गतिविधियों को करीब से समझा है।

    राहुल गांधी लंबे समय से कांग्रेस में युवा नेतृत्व और प्रतिभा आधारित चयन की पैरवी करते रहे हैं। यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई में इंटरव्यू आधारित चयन की प्रक्रिया इसी सोच का हिस्सा रही है। अब प्रदेश और जिला स्तर पर युवा चेहरों को जिम्मेदारी देने के बाद राष्ट्रीय संगठन में भी इसी मॉडल को आगे बढ़ाने की तैयारी है।

    कांग्रेस का लक्ष्य अलग-अलग राज्यों और सामाजिक वर्गों से आने वाले ऐसे नेताओं की टीम तैयार करना है, जो सक्रिय हों, संगठन को मजबूत करने की क्षमता रखते हों और जमीनी स्तर पर काम का अनुभव रखते हों। राष्ट्रीय संगठन में प्रस्तावित बदलाव को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

    करीब दो दशक से राहुल गांधी कांग्रेस में नई पीढ़ी के नेतृत्व को आगे लाने की जरूरत पर जोर देते रहे हैं। राष्ट्रीय सचिवों की नई टीम के चयन की मौजूदा प्रक्रिया को उनके इसी ‘जनरेशन चेंज’ अभियान को संगठनात्मक रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे पार्टी के राष्ट्रीय संगठन में नए चेहरों को जिम्मेदारी मिलने और कामकाज के तरीके में बदलाव की उम्मीद बढ़ी है।

  • वडोदरा में पीएम मोदी का जेन-जी से संवाद, ‘धुरंधर’ के गाने पर रैंप वॉक और राहुल गांधी पर तीखा तंज

    वडोदरा में पीएम मोदी का जेन-जी से संवाद, ‘धुरंधर’ के गाने पर रैंप वॉक और राहुल गांधी पर तीखा तंज


    नई दिल्ली ।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को गुजरात के वडोदरा में जेन-जी युवाओं के साथ करीब 25 मिनट तक संवाद किया। कार्यक्रम में करीब छह हजार युवाओं को शामिल किया गया था। इस दौरान प्रधानमंत्री ने युवाओं से झूठे दावों और भ्रामक बातों से सावधान रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि लोग झूठ की गूंज के जरिए युवाओं को गुमराह करने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन उन्हें सच्चाई के साथ खड़ा रहना चाहिए। उनके इस बयान को राहुल गांधी और कांग्रेस के ‘छात्रों की गूंज’ अभियान पर तंज के तौर पर देखा गया।

    युवाओं के बीच पहुंचने के लिए कार्यक्रम स्थल पर खास तौर पर Y आकार का रैंप तैयार किया गया था। भाषण से पहले प्रधानमंत्री इसी रैंप पर चलते हुए युवाओं के बीच पहुंचे। मंच पर पहुंचते ही क्वीन का लोकप्रिय गीत ‘वी विल रॉक यू’ बजाया गया। इसके बाद फिल्म ‘धुरंधर’ का गीत ‘आरी आरी’ भी सुनाई दिया। कार्यक्रम के दौरान एक छात्र ने प्रधानमंत्री को तस्वीर भेंट की, जबकि युवाओं ने मोबाइल फोन से उनका वीडियो भी बनाया।

    प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर को तेजी से विकसित हो रहे भारत की जीवनरेखा बताया। उन्होंने कहा कि पहले यात्री और मालगाड़ियां एक ही ट्रैक पर चलती थीं, जिससे दोनों की गति प्रभावित होती थी। अब अलग ट्रैक की व्यवस्था से माल परिवहन को गति मिली है। प्रधानमंत्री के मुताबिक, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर रोज करीब 430 मालगाड़ियां चल रही हैं।

    उन्होंने मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट से डबल कंटेनर मालगाड़ी के संचालन का भी उल्लेख किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि इससे एक बार में 250 से अधिक ट्रकों के बराबर माल मुंबई से वडोदरा पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रकों से सामान पहुंचाने में करीब 30 घंटे लग सकते हैं, जबकि फ्रेट कॉरिडोर के जरिए यह दूरी करीब 10 घंटे में पूरी हो सकती है।

    फ्रेट कॉरिडोर के इतिहास का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इस परियोजना पर 2004 में विचार शुरू हुआ था और 2006 में विशेष कंपनी बनाई गई थी। उनके अनुसार, 2014 तक फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल तक जाती रहीं। उन्होंने कहा कि 2014 के बाद सरकार ने परियोजना को गति दी और करीब 2,000 किलोमीटर फ्रेट कॉरिडोर का काम पूरा किया।

    प्रधानमंत्री ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में भारत को सुपरपावर बनाने के लिए पूरे इकोसिस्टम की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि इसके लिए यूरेनियम और रेयर अर्थ मटेरियल की उपलब्धता बढ़ाने के साथ युवाओं की स्किल ट्रेनिंग और अपग्रेडेशन पर भी काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अब केवल डिग्री नहीं, बल्कि कौशल पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है।

    जेन-जी से संवाद को लेकर प्रधानमंत्री पिछले कुछ समय से युवाओं के बीच सक्रिय नजर आए हैं। जुलाई में उन्होंने सेल्फी वीडियो के जरिए युवाओं से संवाद किया था। इसके बाद उन्होंने युवाओं के सुझावों पर प्रतिक्रिया दी और सोशल मीडिया के अनौपचारिक अंदाज में भी उनसे जुड़ने की कोशिश की। अगस्त में मंत्रियों को विश्वविद्यालयों में छात्रों के साथ समय बिताने और सरकारी स्कूलों का दौरा करने का निर्देश दिया गया था।

    देश की राजनीति में जेन-जी की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान 18 से 29 वर्ष आयु के मतदाताओं की हिस्सेदारी 22.78 प्रतिशत थी। ऐसे में भाजपा, कांग्रेस और आरएसएस तीनों ही युवाओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। प्रधानमंत्री के वडोदरा कार्यक्रम में इसी व्यापक प्रयास की झलक दिखाई दी।

  • मध्यप्रदेश के सागर में संदिग्ध जहरीली शराब से मौतों पर सरकार सख्त, कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

    मध्यप्रदेश के सागर में संदिग्ध जहरीली शराब से मौतों पर सरकार सख्त, कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

    मध्यप्रदेश। के सागर जिले के बंडा क्षेत्र में संदिग्ध जहरीली शराब पीने से हुई मौतों का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक हादसे में मृतकों की संख्या बढ़कर 11 तक पहुंच गई है। हालांकि, इस बढ़े हुए आंकड़े की आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। घटना के बाद प्रशासन और सरकार की सक्रियता बढ़ गई है।

    बताया जा रहा है कि संदिग्ध शराब के सेवन के बाद कई लोगों की तबीयत बिगड़ी थी। इसके बाद प्रभावित लोगों को उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। घटना में कई परिवारों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। प्रशासन की ओर से पूरे मामले की जानकारी जुटाई जा रही है और यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि संदिग्ध शराब कहां से आई तथा इसके पीछे कौन लोग जिम्मेदार हैं।

    घटना की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि जहरीली या अवैध शराब के कारोबार से जुड़े किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। प्रशासन को मामले की तह तक जाकर जिम्मेदार लोगों की पहचान करने और उनके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

    उपमुख्यमंत्री एवं आबकारी मंत्री जगदीश देवड़ा ने घटना को लेकर अधिकारियों से जानकारी ली। उन्होंने सागर के कलेक्टर और पुलिस अधिकारियों से पूरे घटनाक्रम की जानकारी हासिल की। स्थिति का जायजा लेने और जांच की निगरानी के लिए आबकारी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी को मौके पर भेजे जाने की जानकारी भी सामने आई है।

    घटना के बाद क्षेत्र में अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई तेज किए जाने की बात कही गई है। प्रशासन की ओर से संदिग्ध ठिकानों पर जांच और छापेमारी की जा रही है। अधिकारियों का उद्देश्य अवैध शराब की आपूर्ति से जुड़े नेटवर्क का पता लगाना और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकना है। मामले में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    इस बीच घटना को लेकर प्रदेश की राजनीति भी गरमा गई है। कांग्रेस ने इस मामले को लेकर भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस प्रवक्ता अभिनव बारोलिया ने आरोप लगाया कि प्रदेश में भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के कारण अवैध शराब का कारोबार बढ़ रहा है। उन्होंने सरकार के सुशासन के दावों पर भी सवाल उठाए।

    कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मध्यप्रदेश में पहले भी शराब से जुड़े गंभीर हादसे सामने आ चुके हैं और इसके बावजूद अवैध शराब के नेटवर्क पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाया है। पार्टी ने सरकार से जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने तथा पूरे नेटवर्क की जांच कराने की मांग की है।

    हालांकि, कांग्रेस के इन राजनीतिक आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल प्रशासन का मुख्य फोकस घटना की वास्तविक वजह पता लगाने, संदिग्ध शराब की जांच कराने, प्रभावित लोगों को उपचार उपलब्ध कराने और जिम्मेदार लोगों तक पहुंचने पर है। मौतों के अंतिम आंकड़े और हादसे की पूरी तस्वीर आधिकारिक जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

  • विजय को PM कैंडिडेट बनाने की मांग से कांग्रेस नाराज, अब TVK की सहयोगी दलों की बुलाई गई है बैठक

    विजय को PM कैंडिडेट बनाने की मांग से कांग्रेस नाराज, अब TVK की सहयोगी दलों की बुलाई गई है बैठक


    चेन्नई। तमिलनाडु में सत्ता के गठबंधन के बीच अब राष्ट्रीय राजनीति को लेकर खींचतान शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय को 2029 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष का प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाने की मांग TVK के भीतर तेज हो रही है। पार्टी नेताओं के इन बयानों से उसकी प्रमुख सहयोगी कांग्रेस असहज है। इसी बीच TVK ने 9 सितंबर को सहयोगी दलों की बैठक बुलाई है, जिसे मौजूदा राजनीतिक तनाव के बीच काफी अहम माना जा रहा है।

    TVK सरकार में मंत्री आधव अर्जुन, राज मोहन और आर. निर्मल कुमार ने CPI(M), CPI और MDMK को बैठक में शामिल होने का न्योता दिया है। हालांकि गठबंधन की सबसे बड़ी सहयोगी कांग्रेस को बैठक में बुलाया गया है या नहीं, इसकी अभी पुष्टि नहीं हुई है। बैठक का एजेंडा भी आधिकारिक तौर पर स्पष्ट नहीं किया गया है।

    PM पद को लेकर क्यों गरमाया मामला?
    बैठक ऐसे समय हो रही है जब TVK के कुछ विधायक खुले तौर पर विजय को 2029 के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की मांग कर रहे हैं। विधायक कनिमोझी ने दावा किया कि 2029 में विजय TVK की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। उन्होंने यहां तक कहा कि देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, इसका फैसला दिल्ली नहीं बल्कि तमिलनाडु करेगा।

    कनिमोझी ने विजय को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव लाने वाला नेता बताते हुए एक और बड़ा दावा किया। उनके मुताबिक राहुल गांधी अंततः विजय की उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के समर्थन से ही विजय मुख्यमंत्री बने हैं और आगे राहुल ही उनका हाथ पकड़कर उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाएंगे।

    रानीपेट की विधायक आई. ताहिरा, ऊर्जा संसाधन एवं कानून मंत्री आर. निर्मल कुमार समेत TVK के कई अन्य नेताओं ने भी विजय की राष्ट्रीय भूमिका की पैरवी की है।

    कांग्रेस ने साफ किया- राहुल गांधी ही पसंद
    TVK नेताओं के बयानों पर कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया है कि 2029 के प्रधानमंत्री पद को लेकर उसकी पसंद राहुल गांधी हैं। कांग्रेस विधायक दल की नेता थरहाई कथबर्ट ने विजय को PM उम्मीदवार बनाने के अभियान को TVK के कुछ पहली बार चुने गए विधायकों का ‘फैन माइंडसेट’ करार दिया।

    कांग्रेस का कहना है कि विजय पहले ही राहुल गांधी को गठबंधन का उम्मीदवार स्वीकार कर चुके हैं। ऐसे में कुछ विधायकों के व्यक्तिगत बयान पार्टी की तय रणनीति नहीं माने जा सकते।

    तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मणिकम टैगोर ने भी विजय की PM दावेदारी से जुड़े बयानों को मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का चुनाव आखिरकार देश के मतदाता ही करेंगे।

    कांग्रेस का साथ जरूरी, अपने दम पर बहुमत नहीं
    विजय की सरकार की मजबूरी यह है कि TVK के पास अकेले बहुमत नहीं है। सरकार कांग्रेस, वामपंथी दलों, VCK और IUML के समर्थन पर टिकी है। TVK की सबसे बड़ी सहयोगी कांग्रेस के राज्य सरकार में पांच विधायक और दो मंत्री हैं।

    ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर विजय और राहुल गांधी को लेकर टकराव लंबा खिंचता है तो इसका असर राज्य सरकार की स्थिरता पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि 9 सितंबर की बैठक को गठबंधन के भीतर पैदा हुई तल्खी कम करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।

    INDIA ब्लॉक में नहीं, फिर भी कांग्रेस सरकार में
    TVK अभी औपचारिक रूप से INDIA ब्लॉक का हिस्सा नहीं बनी है। इसके बावजूद तमिलनाडु में कांग्रेस उसकी सरकार का हिस्सा है। इससे दोनों दलों को राज्य में साथ काम करते हुए राष्ट्रीय राजनीति में अलग-अलग रुख अपनाने की गुंजाइश मिलती है।

    हालांकि विजय को PM बनाने की मांग और कांग्रेस की राहुल गांधी को लेकर स्पष्ट पसंद ने गठबंधन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब बड़ा सवाल यही है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले क्या राज्य में विजय-कांग्रेस की साझेदारी राष्ट्रीय नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं के टकराव के बावजूद कायम रह पाएगी?

  • आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों के बीच जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने सरकार की प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों के बीच जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने सरकार की प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    नई दिल्ली ।आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को लेकर देश के कई हिस्सों में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच कांग्रेस ने जातिगत जनगणना के मुद्दे पर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि सरकार जिस तरीके से जातिगत आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है, उससे सामाजिक न्याय के उद्देश्य को पूरा करना मुश्किल होगा। उन्होंने मौजूदा प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्ति जताते हुए व्यापक और वैज्ञानिक तरीके से जातियों की गणना कराने की मांग की है।

    जयराम रमेश ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध है तो उसे वर्तमान प्रक्रिया में बदलाव करना चाहिए। कांग्रेस का तर्क है कि जनगणना में केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित जानकारी दर्ज करने से देश की अन्य जातियों की वास्तविक सामाजिक और आर्थिक स्थिति का व्यापक आकलन नहीं हो पाएगा।

    कांग्रेस ने विशेष रूप से इस बात पर सवाल उठाया है कि जनगणना के फॉर्म में एससी और एसटी के लिए अलग व्यवस्था है, जबकि अन्य जातियों के लिए उसी तरह का स्पष्ट कॉलम उपलब्ध नहीं कराया गया है। पार्टी का कहना है कि जातिगत जनगणना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसके जरिए देश के विभिन्न सामाजिक समूहों की संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति की वास्तविक तस्वीर सामने आनी चाहिए।

    जयराम रमेश ने कहा कि जातिगत आंकड़ों का सही संग्रह सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों के लिए महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, अलग-अलग समुदायों की जनसंख्या, सामाजिक स्थिति और आर्थिक परिस्थितियों का विश्वसनीय आकलन होने पर ही नीतियां अधिक प्रभावी ढंग से तैयार की जा सकती हैं। कांग्रेस इसी आधार पर जातियों की गिनती के लिए अधिक स्पष्ट और वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाने पर जोर दे रही है।

    कांग्रेस महासचिव ने बिहार और तेलंगाना में अपनाई गई व्यवस्थाओं का राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन करने की मांग भी रखी है। उन्होंने सरकार से विशेषज्ञों के साथ चर्चा करने और सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाने की अपील की है, ताकि जातिगत जनगणना की प्रक्रिया को लेकर व्यापक सहमति बनाई जा सके।

    उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस नेतृत्व की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जातिगत जनगणना को लेकर कई बार पत्र लिखे जा चुके हैं। कांग्रेस के मुताबिक, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 20 अगस्त को प्रधानमंत्री को 21 पन्नों का पत्र भेजा था। इससे पहले खरगे ने अप्रैल 2023 और मई 2025 में भी इस मुद्दे पर पत्र लिखे थे। कांग्रेस का दावा है कि इन पत्रों का अब तक जवाब नहीं मिला है।

    कांग्रेस ने जनगणना में जाति संबंधी जानकारी दर्ज करने के लिए अपनाए जा रहे खुले प्रश्न वाले तरीके पर भी सवाल उठाया है। पार्टी का कहना है कि यदि प्रक्रिया स्पष्ट और मानकीकृत नहीं होगी तो आंकड़ों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। कांग्रेस के अनुसार, सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों के लिए सटीक आंकड़े बेहद आवश्यक हैं।

    यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब दिल्ली, जयपुर, लखनऊ और पटना समेत कई शहरों में आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। आरक्षण के पक्ष और विरोध में सामने आ रहे अलग-अलग राजनीतिक तथा सामाजिक रुख के बीच जातिगत जनगणना का मुद्दा भी बहस के केंद्र में आ गया है।

    कांग्रेस का कहना है कि जातिगत जनगणना को व्यापक, पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से पूरा किया जाना चाहिए। पार्टी के मुताबिक, इससे सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को समझने और भविष्य की नीतियों को बेहतर आधार देने में मदद मिल सकती है। वहीं, इस मुद्दे पर सरकार की प्रक्रिया और कांग्रेस की आपत्तियों को लेकर राजनीतिक बहस आगे भी जारी रहने के आसार हैं।

  • सपा के साथ आम आदमी पार्टी की संभावित एंट्री से INDIA गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस के सामने नई चुनौती

    सपा के साथ आम आदमी पार्टी की संभावित एंट्री से INDIA गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस के सामने नई चुनौती

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पहले ही साथ चुनाव लड़ने की तैयारी का संकेत दे चुके हैं, लेकिन अब आम आदमी पार्टी की संभावित एंट्री ने विपक्षी गठबंधन की रणनीति को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। माना जा रहा है कि अगर सपा और आप के बीच सीटों को लेकर सहमति बनती है तो कांग्रेस के सामने गठबंधन के भीतर नई चुनौती खड़ी हो सकती है।

    सियासी हलकों में चर्चा है कि समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में आम आदमी पार्टी को विधानसभा चुनाव के लिए करीब 15 से 20 सीटें देने पर विचार कर सकती है। इस संभावना को सपा प्रमुख अखिलेश यादव और आप नेता संजय सिंह के बीच हुई मुलाकातों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद यूपी की चुनावी रणनीति को लेकर अटकलें तेज हुई हैं।

    संजय सिंह और अखिलेश यादव की इसी साल अप्रैल में मुलाकात हुई थी। इसके बाद 23 अगस्त को भी दोनों नेताओं के बीच मुलाकात हुई। सूत्रों के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के लिए 15 से 20 सीटों की मांग कर सकती है। हालांकि, सीटों के बंटवारे को लेकर अभी अंतिम फैसला सामने नहीं आया है।

    सपा और कांग्रेस के बीच संभावित गठबंधन के बीच आप को साथ लाने की कोशिश कांग्रेस के लिए आसान नहीं मानी जा रही है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि 2027 में उत्तर प्रदेश के साथ पंजाब और गोवा में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले से मौजूद है। ऐसे में दोनों दलों को एक ही गठबंधन में लाने का फैसला कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है।

    इसके अलावा आम आदमी पार्टी के INDIA गठबंधन से दूरी बनाने वाले बयानों ने भी स्थिति को जटिल बनाया है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद आप की उत्तर प्रदेश में प्रत्यक्ष चुनावी भूमिका नहीं रही थी। पार्टी ने यूपी में अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे और समाजवादी पार्टी को समर्थन दिया था।

    2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 349 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। पार्टी को कुल 3 लाख 47 हजार 187 वोट मिले थे। हालांकि उसका प्रदर्शन व्यापक रूप से प्रभावी नहीं रहा, लेकिन कुछ विधानसभा क्षेत्रों में उसे अपेक्षाकृत अधिक मत मिले थे। रुधौली में आप उम्मीदवार को 24,367 और खलीलाबाद में 25,123 वोट मिले थे।

    इसके अलावा लोनी, साहिबाबाद, नोएडा और मोहनलालगंज जैसे क्षेत्रों में भी पार्टी के उम्मीदवारों को पांच हजार से अधिक वोट मिले थे। यही कारण है कि आगामी चुनाव में आप इन क्षेत्रों को संभावित सीट दावेदारी के आधार के रूप में देख सकती है। यदि सपा इन क्षेत्रों में आप को जगह देती है तो सीट बंटवारे की प्रक्रिया में कांग्रेस की भूमिका और रणनीति महत्वपूर्ण हो जाएगी।

    2024 के लोकसभा चुनाव में आप ने उत्तर प्रदेश से उम्मीदवार नहीं उतारे थे और सपा को समर्थन दिया था। चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल ने लखनऊ में अखिलेश यादव के साथ प्रेस वार्ता भी की थी। वहीं दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान सपा ने कांग्रेस के बजाय आम आदमी पार्टी का समर्थन किया था।

    ऐसे में उत्तर प्रदेश में सपा, कांग्रेस और आप के संभावित समीकरण को लेकर राजनीतिक नजरें टिकी हैं। यदि आप की गठबंधन में औपचारिक एंट्री होती है तो सीटों के बंटवारे के साथ-साथ तीनों दलों के बीच क्षेत्रीय प्रभाव और चुनावी रणनीति को लेकर भी बातचीत करनी होगी। फिलहाल सपा और आप के बीच संभावित तालमेल की चर्चा ने यूपी की विपक्षी राजनीति में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है।

  • सपा के साथ आए तो चमकी सहयोगियों की किस्मत? कांग्रेस से बसपा और जयंत-राजभर तक, 4 चुनावों के आंकड़ों से समझिए समीकरण

    सपा के साथ आए तो चमकी सहयोगियों की किस्मत? कांग्रेस से बसपा और जयंत-राजभर तक, 4 चुनावों के आंकड़ों से समझिए समीकरण


    नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के चवन्नी को रुपया बनाने वाले बयान के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में गठबंधन की राजनीति को लेकर नई बहस छिड़ गई है। अखिलेश यादव ने 16 अगस्त को सहयोगी दलों पर तंज कसते हुए कहा था कि उनकी पार्टी ने कई ऐसे गठबंधन किए जिनमें छोटे दलों को साथ लेकर उन्हें राजनीतिक ताकत दी लेकिन बाद में वही सहयोगी उन्हें छोड़कर चले गए। उनके इस बयान पर राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख जयंत चौधरी के समर्थकों और बसपा प्रमुख मायावती की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चुनावी आंकड़े भी अखिलेश के दावे को मजबूती देते हैं और सपा के साथ गठबंधन करने वाले दलों को वास्तव में राजनीतिक फायदा मिला।

    अगर 2024 के लोकसभा चुनाव से शुरुआत करें तो तस्वीर काफी दिलचस्प नजर आती है। समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 62 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और 37 सीटों पर जीत दर्ज की। यह उसके लिए बड़ी वापसी थी क्योंकि इससे पहले लगातार दो लोकसभा चुनाव में पार्टी महज पांच पांच सीटों पर सिमट गई थी। इसी चुनाव में कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन में 17 सीटों पर मैदान में उतरी और छह सीटें जीतने में सफल रही। 2019 में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक सीट मिली थी। इस लिहाज से सपा के साथ गठबंधन के बाद उसके प्रदर्शन में बड़ा सुधार हुआ।

    2024 में जन अधिकार पार्टी को भी सपा के साथ गठबंधन का फायदा मिला। पार्टी के प्रमुख बाबू सिंह कुशवाहा को जौनपुर सीट से सपा के चुनाव चिह्न पर मैदान में उतारा गया और उन्होंने जीत दर्ज कर पहली बार लोकसभा का रास्ता तय किया। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी ललितेश पति त्रिपाठी भदोही से चुनाव हार गए और पार्टी का खाता नहीं खुल सका।

    अब 2019 के लोकसभा चुनाव पर नजर डालें तो सपा और बसपा ने लंबे अंतराल के बाद साथ चुनाव लड़ा था। बसपा ने 38 और सपा ने 37 सीटों पर चुनाव लड़ा। बसपा ने 10 सीटें जीतीं जबकि सपा के खाते में सिर्फ पांच सीटें आईं। खास बात यह थी कि 2014 में बसपा एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई थी। इस लिहाज से 2019 में उसका प्रदर्शन बड़ी वापसी माना गया। हालांकि चुनाव परिणाम आने के बाद दोनों दलों का गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला और बसपा ने सपा से दूरी बना ली।

    2022 के विधानसभा चुनाव में भी सपा ने कई छोटे दलों को अपने साथ जोड़ा। जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल ने 33 सीटों पर चुनाव लड़कर आठ सीटें जीतीं। 2017 में रालोद के खाते में सिर्फ एक सीट आई थी। इसी तरह ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने 19 सीटों पर चुनाव लड़कर छह सीटें जीतीं। हालांकि अपना दल कमेरावादी की पल्लवी पटेल को सिराथू से बड़ी जीत मिली लेकिन पार्टी का प्रदर्शन सीमित रहा। दूसरी ओर महान दल और जनवादी पार्टी समाजवादी गठबंधन के बावजूद कोई सीट नहीं जीत सके।

    2017 में सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था लेकिन दोनों दलों को बड़ा फायदा नहीं मिला। सपा 298 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ 47 सीटें जीत सकी जबकि कांग्रेस 105 सीटों पर लड़कर सात सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को 2012 की तुलना में 21 सीटों का नुकसान हुआ था।

    इन आंकड़ों को देखें तो 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव तथा 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन करने वाले कई बड़े दलों के प्रदर्शन में सुधार जरूर दिखाई देता है। हालांकि हर सहयोगी को समान सफलता नहीं मिली। कुछ दलों को सीटें मिलीं तो कुछ गठबंधन के बावजूद चुनावी जमीन मजबूत नहीं कर सके। यही वजह है कि अखिलेश के बयान को लेकर राजनीतिक बहस आंकड़ों के साथ साथ गठबंधन की रणनीति और सीट बंटवारे तक पहुंच गई है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा और उसके संभावित सहयोगियों के बीच यह सियासी रिश्ता किस दिशा में जाता है।

  • युवा, बेरोजगारी और महंगाई को लेकर कांग्रेस का केंद्र पर हमला, इमरान मसूद और रेणुका चौधरी ने उठाए सवाल हेडलाइन 2:

    युवा, बेरोजगारी और महंगाई को लेकर कांग्रेस का केंद्र पर हमला, इमरान मसूद और रेणुका चौधरी ने उठाए सवाल हेडलाइन 2:


    नई दिल्ली । 
    राष्ट्रगीत, झंडा फहराने और राष्ट्रगान को लेकर राजनीतिक बहस के बीच कांग्रेस ने केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है। कांग्रेस नेताओं ने देशभक्ति से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ युवाओं की बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, टैक्स का बोझ और महंगी होती ईएमआई जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाते हुए सरकार से इन पर चर्चा करने की मांग की है।

    कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने राष्ट्रगीत को लेकर बीजेपी पर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी को राष्ट्रगीत के मुद्दे पर अचानक इतना जोर देने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है। मसूद ने कहा कि देश में जब राष्ट्रगीत गाने को लेकर विरोध और कार्रवाई की स्थिति बनी थी, तब बीजेपी के लोग इस तरह सामने नहीं आए थे।

    उन्होंने आजादी के बाद के राजनीतिक इतिहास का उल्लेख करते हुए बीजेपी पर आरोप लगाया कि उसके लोगों ने लंबे समय तक राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और झंडा फहराने जैसे विषयों को लेकर वह भूमिका नहीं निभाई, जिसका दावा अब किया जा रहा है। मसूद ने कहा कि देश की जनता शिक्षित है और राजनीतिक दलों के पुराने रुख तथा उनके वर्तमान बयानों के बीच अंतर को समझती है।

    मसूद ने यह भी कहा कि आज सूचना तकनीक के दौर में लोगों के पास पुराने घटनाक्रमों और बयानों को जानने के कई साधन मौजूद हैं। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जिक्र करते हुए कहा कि किसी भी पुराने तथ्य की जानकारी हासिल की जा सकती है। उनके अनुसार देशभक्ति से जुड़े इतिहास को किसी एक संगठन या विचारधारा तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

    कांग्रेस नेता ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास व्यापक रहा है और इसमें अलग-अलग विचारधाराओं तथा समुदायों से जुड़े लोगों ने योगदान दिया था। इसलिए देशभक्ति पर किसी एक संगठन या राजनीतिक विचारधारा का अधिकार नहीं माना जा सकता। उनके इस बयान के जरिए कांग्रेस ने राष्ट्रवाद की मौजूदा राजनीतिक बहस को स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक इतिहास से जोड़ने की कोशिश की।

    वहीं कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने सरकार और बीजेपी नेताओं से जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर चर्चा करने की अपील की। उन्होंने रोजगार की स्थिति को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि देश के युवाओं के सामने नौकरियों की चुनौती बनी हुई है। चौधरी ने कहा कि राजनीतिक बहस को उन मुद्दों पर भी केंद्रित किया जाना चाहिए जिनका सीधा असर आम लोगों के जीवन पर पड़ता है।

    रेणुका चौधरी ने बढ़ती महंगाई, टैक्स के बोझ और ईएमआई महंगी होने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि आम लोगों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है और ऐसे समय में सरकार को इन समस्याओं पर जवाब देना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रुपये की स्थिति में गिरावट का असर लोगों की आर्थिक परिस्थितियों पर पड़ रहा है।

    कांग्रेस नेताओं के इन बयानों से स्पष्ट है कि पार्टी राष्ट्रगीत और देशभक्ति से जुड़ी बहस के समानांतर आर्थिक और रोजगार संबंधी मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाना चाहती है। पार्टी का कहना है कि युवाओं के लिए रोजगार, महंगाई से राहत और आम परिवारों पर बढ़ते आर्थिक बोझ जैसे विषयों पर सरकार को जवाब देना चाहिए।

    दूसरी ओर, राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह बहस केवल राष्ट्रगीत की स्वीकार्यता तक सीमित रहने के बजाय देशभक्ति की राजनीतिक व्याख्या और जनता से जुड़े आर्थिक मुद्दों तक भी फैल सकती है।

  • E20 पेट्रोल पर सियासी बहस तेज, कांग्रेस ने गन्ने से इथेनॉल उत्पादन और चीनी कीमतों पर उठाए सवाल

    E20 पेट्रोल पर सियासी बहस तेज, कांग्रेस ने गन्ने से इथेनॉल उत्पादन और चीनी कीमतों पर उठाए सवाल


    नई दिल्ली । 
    देश में चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण वाली E20 नीति को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस ने केंद्र सरकार की इथेनॉल नीति पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि गन्ने और अनाज के एक हिस्से का इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन में होने से खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ रहा है।

    कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा किया कि लोगों को एक तरफ सड़क पर वाहन चलाने के दौरान और दूसरी तरफ रसोई में खाद्य सामग्री खरीदते समय कीमत चुकानी पड़ रही है। उन्होंने E20 नीति की दोबारा समीक्षा करने और उपभोक्ताओं को बिना इथेनॉल वाला पेट्रोल उपलब्ध कराने का विकल्प देने की मांग की है।

    कांग्रेस की ओर से चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को लेकर गन्ने के इस्तेमाल का मुद्दा उठाया गया है। पार्टी का दावा है कि लगभग 25 लाख टन चीनी बनाने में इस्तेमाल होने वाला गन्ना इथेनॉल उत्पादन की ओर गया। जयराम रमेश ने इसी संदर्भ में चीनी और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का मुद्दा उठाया।

    उन्होंने दावा किया कि पिछले तीन महीनों में चीनी की कीमत 48 रुपये से बढ़कर 67 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। कांग्रेस ने गुड़, चावल और मक्के के आटे जैसी कुछ अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी का उल्लेख किया है। हालांकि, अलग-अलग बाजारों और क्षेत्रों में इन वस्तुओं की कीमतों में अंतर हो सकता है।

    E20 पेट्रोल को लेकर कांग्रेस ने वाहनों के माइलेज का मुद्दा भी उठाया है। पार्टी का कहना है कि पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ने से कुछ वाहनों में ईंधन दक्षता प्रभावित हो सकती है। खासकर पुराने वाहनों को लेकर भी कांग्रेस ने संभावित तकनीकी समस्याओं की चिंता जताई है।

    कांग्रेस की मांग है कि उपभोक्ताओं को उनकी जरूरत और वाहन की तकनीकी क्षमता के अनुसार बिना इथेनॉल वाला पेट्रोल खरीदने का विकल्प मिलना चाहिए। पार्टी का तर्क है कि ईंधन संबंधी नीतियों में उपभोक्ता हितों और वाहन मालिकों की अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है।

    दूसरी ओर, चीनी की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए केंद्र सरकार ने कदम उठाया है। सरकार ने 20 अगस्त को 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी को बिना आयात शुल्क के देश में लाने की मंजूरी दी। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखना और कीमतों पर दबाव कम करना है।

    दिल्ली में 21 अगस्त को चीनी की कीमत करीब 65 रुपये प्रति किलोग्राम बताई गई। कीमतों में बढ़ोतरी और सरकार के आयात फैसले के बाद E20 नीति को लेकर राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई है। कांग्रेस इसे खाद्य महंगाई और वाहन माइलेज से जोड़ रही है, जबकि सरकार का चीनी आयात का कदम बाजार में आपूर्ति बढ़ाने की दिशा में है।

    इथेनॉल मिश्रण नीति का उद्देश्य पेट्रोल में वैकल्पिक ईंधन की हिस्सेदारी बढ़ाना, आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना और किसानों के लिए गन्ने तथा अन्य फीडस्टॉक से अतिरिक्त बाजार तैयार करना रहा है। हालांकि, खाद्य वस्तुओं की कीमतों और वाहन ईंधन दक्षता पर इसके प्रभाव को लेकर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस जारी है।

    आने वाले समय में चीनी की कीमतों, घरेलू आपूर्ति और E20 ईंधन के वास्तविक प्रभाव के आंकड़े इस बहस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल कांग्रेस ने नीति की समीक्षा और उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प देने की मांग को केंद्र में रखा है, जबकि सरकार का ताजा कदम चीनी की उपलब्धता बढ़ाकर बाजार कीमतों को नियंत्रित करने पर केंद्रित है।