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  • बाजार में गिरावट के बीच ब्रोकरेज हाउस का बड़ा भरोसा, JM Financial और Motilal Oswal ने Vedanta Aluminium, TCS और Dr Reddy's पर जताया विश्वास, 12 महीनों में 25% तक रिटर्न की संभावना

    बाजार में गिरावट के बीच ब्रोकरेज हाउस का बड़ा भरोसा, JM Financial और Motilal Oswal ने Vedanta Aluminium, TCS और Dr Reddy's पर जताया विश्वास, 12 महीनों में 25% तक रिटर्न की संभावना

    नई दिल्ली । शेयर बाजार ने सप्ताह का समापन दबाव के साथ किया, जहां वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और निवेशकों की सतर्कता का असर घरेलू बाजार पर भी देखने को मिला। निफ्टी 50 और बीएसई सेंसेक्स दोनों प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ बंद हुए। हालांकि बाजार की इस कमजोरी के बीच प्रमुख ब्रोकरेज फर्म JM Financial और Motilal Oswal ने कुछ चुनिंदा कंपनियों के शेयरों को लेकर सकारात्मक रुख बनाए रखा है। दोनों संस्थानों का मानना है कि मौजूदा स्तरों पर कुछ गुणवत्ता वाले शेयर निवेशकों को अगले 12 महीनों में आकर्षक रिटर्न दे सकते हैं।

    JM Financial ने फार्मास्युटिकल क्षेत्र की प्रमुख कंपनी Dr Reddy’s Laboratories पर अपनी ‘बाय’ रेटिंग बरकरार रखी है। ब्रोकरेज ने कंपनी के लिए 1,561 रुपये का लक्ष्य मूल्य निर्धारित किया है। यह लक्ष्य मौजूदा बाजार भाव की तुलना में करीब 25 प्रतिशत से अधिक संभावित बढ़त का संकेत देता है। हाल ही में कंपनी ने Semaglutide की व्यावसायिक आपूर्ति में देरी की जानकारी दी थी, जिसका कारण API के कुछ वैलिडेशन बैच का निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतरना बताया गया।

    ब्रोकरेज का मानना है कि इस अस्थायी चुनौती के बावजूद कंपनी की दीर्घकालिक विकास संभावनाएं मजबूत बनी हुई हैं। आने वाले वर्षों में नए उत्पादों की लॉन्चिंग और विस्तारित पोर्टफोलियो से कंपनी की आय में सकारात्मक योगदान मिलने की उम्मीद जताई गई है। इसी आधार पर JM Financial ने स्टॉक को मौजूदा मूल्यांकन पर निवेश के लिए आकर्षक माना है।

    वहीं Motilal Oswal ने Vedanta Aluminium पर पहली बार अपनी कवरेज शुरू करते हुए ‘बाय’ रेटिंग जारी की है। ब्रोकरेज ने कंपनी के शेयर के लिए 540 रुपये का लक्ष्य मूल्य तय किया है, जो हालिया बंद भाव की तुलना में लगभग 22 प्रतिशत संभावित बढ़त दर्शाता है। ब्रोकरेज के अनुसार डिमर्जर के बाद कंपनी अब भारत की सबसे बड़ी शुद्ध प्राइमरी एल्युमिनियम उत्पादक बन चुकी है और वैश्विक स्तर पर भी इसकी स्थिति काफी मजबूत हुई है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्पादन क्षमता, परिचालन दक्षता और बढ़ती वैश्विक मांग को देखते हुए कंपनी के दीर्घकालिक प्रदर्शन की संभावनाएं बेहतर दिखाई देती हैं। यही कारण है कि ब्रोकरेज ने इसे धातु क्षेत्र के प्रमुख निवेश विकल्पों में शामिल किया है।

    आईटी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी Tata Consultancy Services पर भी Motilal Oswal ने अपनी सकारात्मक राय कायम रखी है। ब्रोकरेज ने स्टॉक पर ‘बाय’ रेटिंग बरकरार रखते हुए 2,350 रुपये का लक्ष्य मूल्य दिया है, जो मौजूदा स्तर से करीब 14 प्रतिशत की संभावित बढ़त का संकेत देता है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव, टैरिफ से जुड़े जोखिम और कॉरपोरेट ग्राहकों की सतर्क रणनीति के कारण आईटी सेक्टर पर फिलहाल दबाव बना हुआ है।

    इसके बावजूद ब्रोकरेज का मानना है कि आने वाली तिमाहियों में तकनीकी सेवाओं की मांग में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिल सकता है। कंपनी की प्रबंधन टिप्पणी भी पहले की तुलना में अधिक सकारात्मक रही है, जिससे दीर्घकालिक निवेशकों के लिए यह शेयर आकर्षक माना जा रहा है।

    कुल मिलाकर, बाजार में मौजूदा उतार-चढ़ाव और वैश्विक चुनौतियों के बीच ब्रोकरेज फर्मों का मानना है कि मजबूत बुनियादी स्थिति वाली कंपनियों में चरणबद्ध निवेश की रणनीति बेहतर साबित हो सकती है। Vedanta Aluminium, Dr Reddy’s Laboratories और Tata Consultancy Services ऐसे ही शेयरों में शामिल हैं, जिनमें अगले एक वर्ष के दौरान बेहतर प्रदर्शन की संभावना जताई गई है।

  • होर्मुज संकट की वापसी से वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ी हलचल, अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच भारत के लिए रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने की सलाह

    होर्मुज संकट की वापसी से वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ी हलचल, अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच भारत के लिए रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने की सलाह

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तेज हुए सैन्य संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंताओं को बढ़ा दिया है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य पर आवाजाही प्रभावित किए जाने के बाद दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति मार्गों में से एक पर संकट गहरा गया है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है और तेल तथा गैस की वैश्विक आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। इस स्थिति का असर ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों, विशेषकर भारत, पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की कुल समुद्री तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा वहन करता है। ऐसे में इस मार्ग में किसी भी प्रकार की रुकावट का सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है, जिससे पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस जैसी आवश्यक ईंधन वस्तुओं की लागत पर दबाव बढ़ सकता है।

    अर्थशास्त्री और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इस स्थिति को भारत के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी बताया है। उनका कहना है कि देश को अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का तेजी से विस्तार करना चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी वैश्विक आपूर्ति संकट का प्रभाव सीमित किया जा सके। उनके अनुसार सीमित आपूर्ति मार्गों और कम आपातकालीन भंडार पर अत्यधिक निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा करती है।

    उन्होंने कहा कि पिछले होर्मुज संकट ने यह स्पष्ट कर दिया था कि केवल एक या दो आपूर्ति मार्गों पर निर्भर रहना दीर्घकालिक समाधान नहीं है। भारत को विभिन्न देशों से ऊर्जा आयात बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू भंडारण क्षमता में भी उल्लेखनीय वृद्धि करनी होगी। वर्तमान में देश के रणनीतिक कच्चे तेल भंडार की क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है, जिसे विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर स्थित भंडारण केंद्रों में सुरक्षित रखा जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पिछली बार उत्पन्न संकट के दौरान भारत ने वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों और सरकार द्वारा अपनाई गई रणनीतियों के कारण स्थिति को अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से संभाला था। ऊर्जा आयात के विविधीकरण, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने और आपूर्ति श्रृंखला को लचीला बनाने जैसे कदमों ने संभावित संकट के प्रभाव को काफी हद तक कम किया। यही अनुभव भविष्य की रणनीति तैयार करने में भी उपयोगी माना जा रहा है।

    ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों के अनुसार केवल तेल ही नहीं, बल्कि हर महत्वपूर्ण संसाधन के लिए आपूर्ति के अनेक स्रोत विकसित करना समय की आवश्यकता है। किसी एक क्षेत्र या मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता भू-राजनीतिक तनाव के समय आर्थिक जोखिम को बढ़ा सकती है। इसलिए भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा का सबसे प्रभावी रास्ता रणनीतिक भंडार का विस्तार और आयात स्रोतों का व्यापक विविधीकरण माना जा रहा है।

    इस बीच पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव लंबे समय तक बना रहता है या आपूर्ति बाधित होती है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। ऐसे परिदृश्य में भारत के लिए समय रहते ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े दीर्घकालिक निवेश और रणनीतिक तैयारी को प्राथमिकता देना आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • भारतीय बाजार में लौटा विदेशी निवेश का विश्वास, मजबूत अर्थव्यवस्था और स्थिर रुपया बने एफपीआई आकर्षण की बड़ी वजह

    भारतीय बाजार में लौटा विदेशी निवेश का विश्वास, मजबूत अर्थव्यवस्था और स्थिर रुपया बने एफपीआई आकर्षण की बड़ी वजह


    नई दिल्ली । भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत बुनियाद, रुपए की अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति और निवेश से जुड़े नीतिगत सुधारों का असर अब विदेशी पोर्टफोलियो निवेश पर भी दिखाई देने लगा है। जुलाई के शुरुआती दिनों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजार में शुद्ध निवेश किया है, जिससे घरेलू वित्तीय बाजारों में सकारात्मक माहौल बना है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की स्थिर आर्थिक स्थिति और सुधारवादी नीतियां वैश्विक निवेशकों का विश्वास लगातार मजबूत कर रही हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा डेट निवेश से जुड़े कर नियमों में किए गए बदलावों ने विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार को अधिक आकर्षक बनाया है। इसके साथ ही रुपए में अपेक्षाकृत स्थिरता रहने से मुद्रा जोखिम कम हुआ है, जिससे विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ा है। इन दोनों कारणों ने जुलाई के पहले दस दिनों में विदेशी निवेश प्रवाह को सकारात्मक दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    आंकड़ों के अनुसार विदेशी निवेशकों ने जुलाई की शुरुआत में शेयर और अन्य निवेश श्रेणियों में उल्लेखनीय निवेश किया है। इसके अलावा डेट मार्केट में भी निवेश लगातार बढ़ रहा है। यह संकेत देता है कि विदेशी निवेशक केवल इक्विटी बाजार ही नहीं, बल्कि भारतीय ऋण बाजार में भी दीर्घकालिक संभावनाएं देख रहे हैं। इससे भारतीय वित्तीय बाजारों की मजबूती और निवेशकों के बढ़ते विश्वास का संकेत मिलता है।

    आर्थिक जानकारों का कहना है कि भारत के मजबूत व्यापक आर्थिक संकेतक भी इस बदलाव की प्रमुख वजह हैं। नियंत्रित महंगाई, बेहतर आर्थिक विकास दर, मजबूत बैंकिंग व्यवस्था और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार ने वैश्विक निवेशकों के बीच भारत की छवि को और मजबूत किया है। यही कारण है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद विदेशी निवेशक भारत को अपेक्षाकृत सुरक्षित और बेहतर निवेश गंतव्य के रूप में देख रहे हैं।

    विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि वैश्विक स्तर पर कुछ अन्य बाजारों में निवेश घटने का लाभ भी भारत को मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय निवेशक अपने निवेश पोर्टफोलियो में बदलाव करते हुए ऐसे देशों की ओर रुख कर रहे हैं जहां आर्थिक आधार मजबूत हो और भविष्य में बेहतर प्रतिफल की संभावना दिखाई देती हो। भारत इस समय ऐसे प्रमुख बाजारों में शामिल है, जहां विकास की संभावनाएं लगातार बनी हुई हैं।

    हालांकि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव अभी भी निवेशकों की चिंता का विषय बने हुए हैं। पश्चिम एशिया की परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का असर समय-समय पर वैश्विक वित्तीय बाजारों पर पड़ सकता है। इसके बावजूद यदि अंतरराष्ट्रीय हालात अधिक नहीं बिगड़ते हैं तो भारत में विदेशी निवेश का सकारात्मक रुख आगे भी जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कंपनियों के तिमाही नतीजे, प्रमुख आर्थिक आंकड़े और वैश्विक घटनाक्रम निवेशकों की रणनीति तय करेंगे। यदि घरेलू आर्थिक संकेतक मजबूत बने रहते हैं और नीतिगत स्थिरता कायम रहती है, तो विदेशी निवेश में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इससे भारतीय पूंजी बाजार को मजबूती मिलेगी, निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा और देश की आर्थिक विकास यात्रा को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।

  • 'हाई-फ्रीक्वेंसी इकोनॉमिक बैरोमीटर' से आर्थिक निगरानी होगी और मजबूत, छोटे कारोबारियों को मिलेगा बड़ा सहारा, नीति निर्माण में आएगी नई तेजी

    'हाई-फ्रीक्वेंसी इकोनॉमिक बैरोमीटर' से आर्थिक निगरानी होगी और मजबूत, छोटे कारोबारियों को मिलेगा बड़ा सहारा, नीति निर्माण में आएगी नई तेजी

    नई दिल्ली । देश की अर्थव्यवस्था को अधिक आधुनिक, पारदर्शी और डेटा आधारित बनाने की दिशा में केंद्र सरकार 14 जुलाई को ‘हाई-फ्रीक्वेंसी इकोनॉमिक बैरोमीटर’ लॉन्च करने जा रही है। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य अर्थव्यवस्था की स्थिति का लगभग वास्तविक समय में आकलन करना है, जिससे सरकार तेजी और अधिक सटीकता के साथ आर्थिक नीतियां तैयार कर सके। व्यापारिक संगठनों ने इस पहल को छोटे कारोबारियों, खुदरा व्यापारियों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया है।

    इस नई प्रणाली के तहत अर्थव्यवस्था से जुड़े विभिन्न प्रमुख संकेतकों को एक मंच पर जोड़ा जाएगा। इनमें जीएसटी संग्रह, यूपीआई लेनदेन, ई-वे बिल, माल ढुलाई, बिजली की खपत, बैंकिंग गतिविधियां, डिजिटल कॉमर्स और अन्य महत्वपूर्ण आर्थिक आंकड़े शामिल होंगे। इन सभी सूचनाओं के आधार पर सरकार को देश की आर्थिक गतिविधियों का अधिक सटीक और त्वरित आकलन प्राप्त होगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक आर्थिक आंकड़ों के प्रकाशित होने में अक्सर समय लगता है, जिससे बदलती परिस्थितियों के अनुसार त्वरित निर्णय लेना कठिन हो जाता है। ऐसे में हाई-फ्रीक्वेंसी इकोनॉमिक बैरोमीटर सरकार को वास्तविक समय के करीब आर्थिक संकेत उपलब्ध कराएगा, जिससे बदलते बाजार और उपभोक्ता व्यवहार के अनुरूप नीतियां तैयार करना आसान होगा।

    व्यापारिक संगठनों का कहना है कि इस पहल का सबसे बड़ा लाभ छोटे व्यापारियों, खुदरा कारोबारियों, स्टार्टअप्स और एमएसएमई क्षेत्र को मिलेगा। बाजार की मांग, उपभोक्ता व्यवहार और आर्थिक रुझानों की समय पर जानकारी मिलने से कारोबारी अपने निवेश, उत्पादन और व्यापारिक रणनीति को अधिक प्रभावी ढंग से तय कर सकेंगे। इससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और कारोबार का विस्तार करने में भी मदद मिलेगी।

    आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता, आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाएं, महंगाई का दबाव और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक परिस्थितियां लगातार अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं। ऐसे समय में यह बैरोमीटर एक प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की तरह कार्य कर सकता है, जिससे संभावित आर्थिक चुनौतियों की पहले ही पहचान कर समय रहते आवश्यक कदम उठाए जा सकेंगे।

    इस पहल से नीति निर्माण की प्रक्रिया भी अधिक वैज्ञानिक और डेटा आधारित बनने की उम्मीद है। सरकार विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे बदलावों की निगरानी कर आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू कर सकेगी। इससे न केवल प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी, बल्कि निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होगा और उद्योग जगत को स्थिर एवं स्पष्ट आर्थिक संकेत प्राप्त होंगे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल तकनीक और डेटा विश्लेषण पर आधारित ऐसी पहलें भविष्य की अर्थव्यवस्था की आवश्यकता हैं। यदि इस प्रणाली का प्रभावी क्रियान्वयन होता है तो भारत की आर्थिक निगरानी व्यवस्था पहले से अधिक मजबूत होगी। साथ ही व्यापार, निवेश, रोजगार और आर्थिक विकास को नई गति मिलने की संभावना बढ़ेगी। आने वाले वर्षों में यह व्यवस्था देश की आर्थिक नीति निर्माण प्रणाली को अधिक पारदर्शी, तेज और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • टी20 की करारी हार का वनडे में हिसाब चुकता करने उतरेगी टीम इंडिया: रोहित, विराट और बुमराह की वापसी से बढ़ेगा हौसला

    टी20 की करारी हार का वनडे में हिसाब चुकता करने उतरेगी टीम इंडिया: रोहित, विराट और बुमराह की वापसी से बढ़ेगा हौसला

    नई दिल्ली । हाल ही में संपन्न हुई टी20 अंतरराष्ट्रीय सीरीज में मेजबान इंग्लैंड के हाथों 4-0 से करारी शिकस्त का सामना करने के बाद अब भारतीय क्रिकेट टीम के सामने वनडे प्रारूप में जोरदार वापसी करने की बेहद कड़ी चुनौती है। श्रेयस अय्यर की कप्तानी में युवा खिलाड़ियों से सजी भारतीय टीम टी20 सीरीज के दौरान पूरी तरह दिशाहीन और बेअसर साबित हुई थी। इस निराशाजनक प्रदर्शन के ठीक बाद, अब भारतीय टीम प्रबंधन और प्रशंसकों की निगाहें आगामी तीन मैचों की वनडे सीरीज पर टिक गई हैं, जहाँ भारत अपने सबसे अनुभवी और दिग्गज खिलाड़ियों के दम पर इंग्लैंड की सरजमीं पर पलटवार करने का प्रयास करेगा।

    इस वनडे सीरीज के लिए भारतीय टीम का संतुलन और ताकत पूरी तरह से बदली हुई नजर आएगी, क्योंकि टीम के दो सबसे बड़े स्तंभ रोहित शर्मा और विराट कोहली की टीम में वापसी हो रही है। ये दोनों ही महान बल्लेबाज टी20 और टेस्ट क्रिकेट से संन्यास ले चुके हैं और अब अपनी पूरी ऊर्जा सिर्फ एक दिवसीय प्रारूप में भारत को जीत दिलाने में लगा रहे हैं। इंग्लैंड की मुश्किल और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में इन दोनों सीनियर खिलाड़ियों का लंबा अनुभव भारतीय बल्लेबाजी क्रम को वो मजबूती प्रदान करेगा, जिसकी टी20 सीरीज के दौरान भारी कमी महसूस की गई थी।

    टी20 सीरीज के आखिरी मुकाबले में साउथेम्प्टन के मैदान पर इंग्लैंड के बल्लेबाजों ने भारतीय गेंदबाजों की जमकर क्लास ली थी और जोस बटलर के धुआंधार 131 रनों की बदौलत 257 रनों का विशाल स्कोर खड़ा किया था, जिसके जवाब में भारतीय टीम दबाव नहीं झेल सकी और 56 रनों से मैच हार गई। लगातार दो टी20 सीरीज गंवाने के बाद भारतीय टीम की रणनीतियों पर तीखे सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में वनडे सीरीज में कप्तान शुभमन गिल की अगुवाई में रोहित शर्मा नई गेंद के खिलाफ आक्रामक शुरुआत देने की जिम्मेदारी संभालेंगे, तो वहीं विराट कोहली मध्यक्रम में पारी को स्थिरता और मजबूती देंगे।

    भारतीय टीम के लिए एक और बड़ी राहत की बात स्टार तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह की वापसी है। टी20 सीरीज के दौरान भारतीय तेज गेंदबाजी आक्रमण पूरी तरह से बेअसर रहा था और रन्स रोकने में नाकाम साबित हुआ था। बुमराह के आने से टीम को शुरुआती ओवरों में विकेट निकालने की क्षमता मिलेगी और साथ ही डेथ ओवरों में विपक्षी बल्लेबाजों पर अंकुश लगाया जा सकेगा। बुमराह के साथ कुलदीप यादव, अक्षर पटेल और वॉशिंगटन सुंदर जैसे स्पिनर्स मिलकर इंग्लैंड के बल्लेबाजी क्रम को रोकने की रणनीति तैयार करेंगे।

    यह वनडे सीरीज भारतीय टीम के लिए केवल एक ट्रॉफी जीतने का जरिया नहीं है, बल्कि पिछले कुछ हफ्तों में लगातार मिली हार के कारण ड्रेसिंग रूम के गिरे हुए मनोबल और खोए हुए आत्मविश्वास को वापस पाने का एक बड़ा मंच भी है। भारतीय टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर और उपकप्तान श्रेयस अय्यर पर भी इस सीरीज के जरिए टीम संयोजन को सही करने का भारी दबाव होगा। भारत और इंग्लैंड के बीच इस हाई-वोल्टेज वनडे सीरीज का पहला मुकाबला 14 जुलाई को बर्मिंघम के प्रतिष्ठित एजबेस्टन मैदान पर खेला जाएगा।

  • भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में जोरदार उछाल, 674.19 अरब डॉलर पर पहुंचा फॉरेक्स रिजर्व; गोल्ड रिजर्व भी मजबूत हुआ

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में जोरदार उछाल, 674.19 अरब डॉलर पर पहुंचा फॉरेक्स रिजर्व; गोल्ड रिजर्व भी मजबूत हुआ

    नई दिल्ली । भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत देते हुए देश के विदेशी मुद्रा भंडार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 3 जुलाई 2026 को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 7.26 अरब डॉलर बढ़कर 674.193 अरब डॉलर तक पहुंच गया। पिछले सप्ताह आई गिरावट के बाद यह वृद्धि देश की बाहरी वित्तीय स्थिति के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है।

    आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में केवल विदेशी मुद्रा भंडार ही नहीं, बल्कि देश के स्वर्ण भंडार के मूल्य में भी अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई। रिपोर्टिंग सप्ताह के दौरान गोल्ड रिजर्व का मूल्य 2.669 अरब डॉलर बढ़कर 105.205 अरब डॉलर हो गया। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पास भारत के स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (एसडीआर) में भी वृद्धि दर्ज हुई और इसका मूल्य बढ़कर 18.623 अरब डॉलर पर पहुंच गया।

    इससे पहले 26 जून 2026 को समाप्त सप्ताह में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 5.65 अरब डॉलर की गिरावट दर्ज की गई थी। हालांकि हाल के सप्ताहों में भंडार में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, लेकिन इसके बावजूद भारत दुनिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाले देशों में अपनी मजबूत स्थिति बनाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच देश की वित्तीय स्थिरता को मजबूत आधार प्रदान करता है।

    हालांकि वर्तमान स्तर अभी भी फरवरी 2026 में दर्ज रिकॉर्ड उच्च स्तर 728.494 अरब डॉलर से नीचे है, फिर भी हालिया बढ़ोतरी को सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार आयात भुगतान, विनिमय दर की स्थिरता बनाए रखने और वैश्विक वित्तीय झटकों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होता है और अर्थव्यवस्था की साख को बल मिलता है।

    इस बीच, आरबीआई की संशोधित फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट बैंक (एफसीएनआर-बी) जमा योजना का भी सकारात्मक असर दिखाई देने लगा है। बैंकिंग क्षेत्र के अनुसार, इस योजना के तहत विदेशों से धन का प्रवाह धीरे-धीरे बढ़ रहा है। शुरुआती चरण में बैंकों ने लगभग 3 से 4 अरब डॉलर तक की जमा राशि जुटाई है और आने वाले समय में इसमें और तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है।

    बैंकिंग क्षेत्र का अनुमान है कि संशोधित एफसीएनआर-बी योजना के माध्यम से समय के साथ 40 से 50 अरब डॉलर तक की नई जमा राशि आकर्षित की जा सकती है। विशेष रूप से खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों के बीच इस योजना को लेकर रुचि बढ़ने की संभावना व्यक्त की जा रही है। बैंक इस उद्देश्य से जागरूकता अभियान भी चला रहे हैं और प्रवासी भारतीय ग्राहकों से सीधे संपर्क कर योजना की जानकारी उपलब्ध करा रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऊंची ब्याज दरें, आरबीआई द्वारा हेजिंग लागत से जुड़ी सुविधा और बेहतर निवेश विकल्प इस योजना को अधिक आकर्षक बना रहे हैं। यदि आने वाले महीनों में विदेशी निवेश और एनआरआई जमा में निरंतर बढ़ोतरी जारी रहती है, तो इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को और मजबूती मिल सकती है। यह स्थिति न केवल देश की बाहरी वित्तीय क्षमता को मजबूत करेगी, बल्कि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता और निवेशकों के विश्वास को भी और सुदृढ़ बनाएगी।

  • Q1 नतीजों से पहले इन 9 शेयरों पर बढ़ा भरोसा, Ratnamani Metals और L&T समेत कई दिग्गज कंपनियों की रेटिंग में सुधार से निवेशकों की बढ़ीं उम्मीदें

    Q1 नतीजों से पहले इन 9 शेयरों पर बढ़ा भरोसा, Ratnamani Metals और L&T समेत कई दिग्गज कंपनियों की रेटिंग में सुधार से निवेशकों की बढ़ीं उम्मीदें

    नई दिल्ली । पहली तिमाही के वित्तीय नतीजों का दौर शुरू होने के साथ ही शेयर बाजार की नजर अब कंपनियों के प्रदर्शन पर केंद्रित हो गई है। वैश्विक स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसी चुनौतियों के बावजूद घरेलू निवेशकों का ध्यान उन कंपनियों पर है जिनसे बेहतर आय और मजबूत भविष्य की उम्मीद की जा रही है। ऐसे माहौल में कई प्रमुख कंपनियों के शेयरों को लेकर विश्लेषकों का भरोसा पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुआ है, जिससे निवेशकों की दिलचस्पी भी बढ़ती दिखाई दे रही है।

    हालिया मूल्यांकन के अनुसार नौ बड़ी और मिडकैप कंपनियों की औसत रेटिंग पिछले एक महीने में बेहतर हुई है। इनमें Ratnamani Metals, Larsen & Toubro, Atul Ltd, Jio Financial Services, Maruti Suzuki, Bharti Airtel और अन्य प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। रेटिंग में सुधार इस बात का संकेत माना जाता है कि बाजार विशेषज्ञ इन कंपनियों की कारोबारी स्थिति, आय क्षमता और आने वाले समय में विकास की संभावनाओं को पहले से अधिक मजबूत मान रहे हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि पहली तिमाही के नतीजे इस बार बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जिन कंपनियों की आय अनुमान से बेहतर रहेगी या जो आने वाली तिमाहियों के लिए सकारात्मक मार्गदर्शन देंगी, उनके शेयरों में बेहतर प्रदर्शन देखने को मिल सकता है। यही कारण है कि निवेशक केवल बाजार की दैनिक चाल पर ध्यान देने के बजाय मजबूत बुनियादी स्थिति वाली कंपनियों की पहचान करने पर अधिक जोर दे रहे हैं।

    इंफ्रास्ट्रक्चर, मेटल, ऑटोमोबाइल, दूरसंचार और वित्तीय सेवाओं से जुड़ी कंपनियों में सकारात्मक रुझान दिखाई देना इस बात का संकेत है कि विभिन्न क्षेत्रों में कारोबार धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है। बड़े प्रोजेक्ट, बढ़ती मांग, पूंजीगत निवेश और बेहतर परिचालन क्षमता जैसी बातें इन कंपनियों के पक्ष में काम कर रही हैं। इसी वजह से कई ब्रोकरेज और रिसर्च संस्थानों ने इनके प्रति अपना दृष्टिकोण पहले की तुलना में अधिक सकारात्मक किया है।

    बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि केवल रेटिंग में सुधार के आधार पर निवेश का निर्णय लेना उचित नहीं होगा। निवेशकों को कंपनी की वित्तीय स्थिति, आय में वृद्धि, नकदी प्रवाह, कर्ज का स्तर, प्रबंधन की रणनीति और उद्योग की संभावनाओं का भी सावधानी से आकलन करना चाहिए। हालांकि किसी शेयर की रेटिंग में लगातार सुधार यह संकेत जरूर देता है कि उसके मूलभूत कारकों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं।

    आने वाले दिनों में विभिन्न क्षेत्रों की बड़ी कंपनियां अपने तिमाही नतीजे घोषित करेंगी। इन परिणामों से यह स्पष्ट होगा कि कंपनियां बदलते वैश्विक और घरेलू आर्थिक माहौल में किस तरह प्रदर्शन कर रही हैं। यदि उम्मीद के अनुरूप या उससे बेहतर नतीजे सामने आते हैं तो बाजार में निवेशकों का विश्वास और मजबूत हो सकता है। ऐसे समय में मजबूत फंडामेंटल, स्थिर कारोबार और बेहतर विकास क्षमता वाली कंपनियां निवेशकों की पहली पसंद बन सकती हैं, जबकि कमजोर प्रदर्शन करने वाली कंपनियों पर दबाव भी बढ़ सकता है। कुल मिलाकर पहली तिमाही के नतीजे आने वाले सप्ताहों में शेयर बाजार की दिशा और निवेशकों की रणनीति तय करने में अहम भूमिका निभाने वाले हैं।

  • 120 साल पुरानी Eveready के सामने नई चुनौती, बैटरी कारोबार पर बढ़ा लागत और नियमों का दबाव; ₹200 करोड़ के Alkaline प्लांट से भविष्य की रणनीति मजबूत

    120 साल पुरानी Eveready के सामने नई चुनौती, बैटरी कारोबार पर बढ़ा लागत और नियमों का दबाव; ₹200 करोड़ के Alkaline प्लांट से भविष्य की रणनीति मजबूत


    नई दिल्ली । देश की सबसे पुरानी और प्रमुख ड्राई-सेल बैटरी कंपनियों में शामिल Eveready अपने पारंपरिक कारोबार के लिए एक नए दौर की चुनौतियों का सामना कर रही है। करीब 120 वर्षों के इतिहास वाली यह कंपनी आज भी भारतीय ड्राई-सेल बैटरी बाजार में लगभग 52 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती है और हर वर्ष 1.3 अरब से अधिक बैटरियों की बिक्री करती है। इसके बावजूद बदलते बाजार, बढ़ती लागत और नए नियामकीय प्रावधानों ने कंपनी के पारंपरिक बैटरी कारोबार पर दबाव बढ़ा दिया है। ऐसे माहौल में कंपनी ने भविष्य की मांग को ध्यान में रखते हुए अल्कलाइन बैटरी उत्पादन पर विशेष जोर देना शुरू किया है।

    हाल के वर्षों में वैश्विक स्तर पर जिंक की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। ड्राई-सेल बैटरियों के निर्माण में जिंक एक प्रमुख कच्चा माल है, इसलिए इसकी लागत बढ़ने का सीधा असर उत्पादन खर्च पर पड़ रहा है। इसके साथ ही रुपये में कमजोरी के कारण आयातित कच्चे माल की कीमत भी बढ़ गई है। इससे कंपनियों के लिए लागत को नियंत्रित करना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। ऐसे समय में मुनाफे को बनाए रखना बैटरी उद्योग के लिए बड़ी परीक्षा बन गया है।

    उद्योग के सामने दूसरी महत्वपूर्ण चुनौती सरकार के नए बैटरी वेस्ट मैनेजमेंट नियम हैं। इन नियमों के तहत कंपनियों को केवल बैटरी बेचने तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि इस्तेमाल हो चुकी बैटरियों को वापस एकत्रित कर उनके सुरक्षित रीसाइक्लिंग की व्यवस्था भी सुनिश्चित करनी होगी। इससे कंपनियों पर अतिरिक्त परिचालन और अनुपालन लागत बढ़ने की संभावना है। पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन उद्योग के लिए यह एक नई जिम्मेदारी भी लेकर आया है।

    इसी बदलते परिदृश्य को देखते हुए Eveready ने लगभग 200 करोड़ रुपये के निवेश से देश का पहला आधुनिक अल्कलाइन बैटरी उत्पादन संयंत्र स्थापित किया है। कंपनी का मानना है कि आने वाले वर्षों में अल्कलाइन बैटरियों की मांग तेजी से बढ़ेगी, क्योंकि ये सामान्य जिंक-कार्बन बैटरियों की तुलना में अधिक समय तक चलती हैं और बेहतर प्रदर्शन देती हैं। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, स्मार्ट गैजेट्स और उच्च ऊर्जा खपत वाले उत्पादों में अल्कलाइन बैटरियों की उपयोगिता लगातार बढ़ रही है।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय उपभोक्ताओं की पसंद भी धीरे-धीरे बदल रही है। अब ग्राहक अधिक टिकाऊ और बेहतर प्रदर्शन देने वाले उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक ड्राई-सेल बैटरियों पर निर्भर रहना किसी भी कंपनी के लिए दीर्घकालिक रणनीति नहीं माना जा सकता। इसी कारण कंपनियां नए उत्पादों, उन्नत तकनीक और बेहतर गुणवत्ता वाली बैटरियों के विकास पर निवेश बढ़ा रही हैं।

    Eveready का उद्देश्य केवल मौजूदा बाजार हिस्सेदारी बनाए रखना नहीं, बल्कि तेजी से बदलते बैटरी उद्योग में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को और मजबूत करना भी है। कंपनी का मानना है कि नवाचार, आधुनिक उत्पादन क्षमता और पर्यावरणीय नियमों के अनुरूप कारोबार का विस्तार भविष्य में उसकी विकास रणनीति का आधार बनेगा। यदि अल्कलाइन बैटरियों की मांग अनुमान के अनुरूप बढ़ती है, तो यह निवेश कंपनी को नए अवसरों का लाभ उठाने के साथ-साथ बदलते बाजार में दीर्घकालिक मजबूती भी प्रदान कर सकता है।

  • चुनौतीपूर्ण माहौल में TCS के तिमाही नतीजे जारी, मुनाफे में हल्की गिरावट के बावजूद 12 रुपये प्रति शेयर अंतरिम डिविडेंड का ऐलान

    चुनौतीपूर्ण माहौल में TCS के तिमाही नतीजे जारी, मुनाफे में हल्की गिरावट के बावजूद 12 रुपये प्रति शेयर अंतरिम डिविडेंड का ऐलान

    नई दिल्ली । देश की प्रमुख सूचना प्रौद्योगिकी सेवा कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के वित्तीय परिणाम जारी कर दिए हैं। कंपनी ने तिमाही आधार पर शुद्ध लाभ में हल्की गिरावट दर्ज की है, जबकि सालाना आधार पर लाभ और राजस्व दोनों में वृद्धि देखने को मिली है। साथ ही कंपनी ने अपने शेयरधारकों को 12 रुपये प्रति इक्विटी शेयर का अंतरिम डिविडेंड देने की घोषणा भी की है, जिससे निवेशकों को अतिरिक्त लाभ मिलेगा।

    अप्रैल से जून 2026 की अवधि में टीसीएस का समेकित शुद्ध लाभ 13,349 करोड़ रुपये रहा, जो पिछली तिमाही की तुलना में लगभग तीन प्रतिशत कम है। हालांकि, पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में कंपनी के लाभ में करीब पांच प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह प्रदर्शन ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक आईटी उद्योग पर आर्थिक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक चुनौतियों का प्रभाव बना हुआ है।

    कंपनी की परिचालन आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली। पहली तिमाही में टीसीएस का राजस्व बढ़कर 72,275 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 14 प्रतिशत अधिक है। वहीं, तिमाही आधार पर भी कंपनी की आय में करीब दो प्रतिशत का इजाफा हुआ। इससे संकेत मिलता है कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद कंपनी की सेवाओं की मांग बनी हुई है और उसका कारोबार स्थिर गति से आगे बढ़ रहा है।

    निदेशक मंडल ने निवेशकों के लिए 12 रुपये प्रति इक्विटी शेयर के अंतरिम डिविडेंड को मंजूरी दी है। इसके लिए 15 जुलाई 2026 को रिकॉर्ड डेट निर्धारित की गई है, जबकि पात्र निवेशकों को 31 जुलाई 2026 को डिविडेंड का भुगतान किया जाएगा। कंपनी के इस फैसले को निवेशकों के प्रति सकारात्मक संकेत माना जा रहा है और इससे शेयरधारकों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।

    कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक के. कृतिवासन ने कहा कि वैश्विक बाजार में अनिश्चितताओं के बावजूद टीसीएस ने मजबूत कारोबारी प्रदर्शन बनाए रखा है। उन्होंने बताया कि पहली तिमाही में कंपनी को 9.5 अरब डॉलर के नए ऑर्डर प्राप्त हुए हैं। इनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित बड़े ट्रांसफॉर्मेशन प्रोजेक्ट भी शामिल हैं, जो भविष्य में कंपनी की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कंपनी के एआई कारोबार का वार्षिक राजस्व रन रेट बढ़कर 2.6 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ते अवसरों को दर्शाता है।

    परिचालन प्रदर्शन की बात करें तो पहली तिमाही में कंपनी का ऑपरेटिंग मार्जिन 24 प्रतिशत और नेट मार्जिन 19.2 प्रतिशत रहा। परिचालन गतिविधियों से कंपनी ने 12,412 करोड़ रुपये का नकद प्रवाह अर्जित किया, जो उसके शुद्ध लाभ का लगभग 93 प्रतिशत है। तिमाही के अंत तक टीसीएस में कुल 5,93,798 कर्मचारी कार्यरत थे, जबकि आईटी सेवाओं के कारोबार में पिछले 12 महीनों की एट्रिशन दर 13.6 प्रतिशत दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत ऑर्डर बुक, एआई क्षेत्र में बढ़ती हिस्सेदारी और स्थिर वित्तीय प्रदर्शन आने वाली तिमाहियों में कंपनी की विकास यात्रा को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • भारत में 10 साल में 94 हजार सरकारी स्कूल बंद, हर दिन 25 स्कूलों पर लगा ताला, छात्रों के नामांकन में गिरावट

    भारत में 10 साल में 94 हजार सरकारी स्कूल बंद, हर दिन 25 स्कूलों पर लगा ताला, छात्रों के नामांकन में गिरावट


    नई दिल्ली। देश में स्कूली शिक्षा को लेकर नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 वर्षों में भारत में करीब 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। इसका मतलब है कि औसतन हर दिन 25 सरकारी स्कूलों पर ताला लगा। इस दौरान सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में भी 2.26 करोड़ की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।

    नीति आयोग की रिपोर्ट ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया: टेम्पोरल एनालिसिस एंड पॉलिसी रोडमैप फॉर क्वालिटी एनहांसमेंट’ के अनुसार, वर्ष 2014-15 में देश में सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख थी, जो 2024-25 में घटकर 10.13 लाख रह गई। इसी अवधि में सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या भी 83 हजार से घटकर 79 हजार हो गई। वहीं दूसरी ओर निजी स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख पहुंच गई।

    छात्रों के नामांकन में भी आई बड़ी गिरावट
    रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014-15 में देशभर के स्कूलों में कुल 26.95 करोड़ छात्रों का नामांकन था, जो 2024-25 में घटकर 24.69 करोड़ रह गया। यानी एक दशक में 2.26 करोड़ छात्रों की कमी दर्ज की गई।

    क्यों घट रही है बच्चों की संख्या?
    रिपोर्ट में इसके पीछे कई कारण बताए गए हैं। इनमें घटती प्रजनन दर के कारण स्कूल जाने योग्य बच्चों की संख्या में कमी, कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का आपस में विलय और उच्च कक्षाओं में छात्रों को स्कूल से जुड़े रखने की चुनौती प्रमुख हैं।

    स्कूलों के विलय पर उठे सवाल
    केंद्र सरकार और नीति आयोग ने संसाधनों के बेहतर उपयोग के उद्देश्य से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का विलय किया है। हालांकि शिक्षा क्षेत्र से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस नीति का असर नामांकन पर भी पड़ा है। उनका तर्क है कि जब गांव या मोहल्ले का नजदीकी स्कूल बंद हो जाता है, तो दूरी बढ़ने के कारण कई बच्चे, खासकर लड़कियां, पढ़ाई छोड़ देती हैं।

    बड़ी कक्षाओं में बढ़ रहा ड्रॉपआउट
    रिपोर्ट में माध्यमिक स्तर पर बढ़ते ड्रॉपआउट को गंभीर चिंता का विषय बताया गया है। पहली से पांचवीं कक्षा तक स्कूल छोड़ने की दर सिर्फ 0.3 प्रतिशत है, लेकिन छठी से आठवीं तक यह बढ़कर 3.5 प्रतिशत हो जाती है। वहीं नौवीं और दसवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते ड्रॉपआउट दर 11.5 प्रतिशत हो जाती है।

    आठवीं से नौवीं कक्षा में जाने वाले छात्रों की दर भी 2014-15 के 91.58 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में 86.6 प्रतिशत रह गई है। पुडुचेरी और केरल जैसे राज्यों में यह दर 99.6 प्रतिशत है, जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में यह अपेक्षाकृत कम दर्ज की गई है।

    यूपी और एमपी में सबसे ज्यादा स्कूलों का विलय
    रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में सबसे बड़े स्तर पर स्कूलों का विलय किया गया। दोनों राज्यों को मिलाकर करीब 40 हजार स्कूल बंद या मर्ज किए गए हैं।

    9वीं के छात्रों की बुनियादी पढ़ाई भी कमजोर
    नीति आयोग की रिपोर्ट में छात्रों के सीखने के स्तर को लेकर भी चिंता जताई गई है। अध्ययन में पाया गया कि कक्षा 9 के कई छात्र बीजगणित और ज्यामिति जैसे विषयों के साथ-साथ प्रतिशत, भिन्न और अनुपात जैसी बुनियादी गणितीय अवधारणाओं को समझने में भी कठिनाई महसूस कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह शुरुआती कक्षाओं में सीखने की कमियों के आगे तक बने रहने का संकेत है।