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  • भारत-यूके सीईटीए लागू, भारतीय उद्योग के लिए खुले नए अवसर; फिक्की ने बताया व्यापार और निवेश को मिलेगा बड़ा बढ़ावा

    भारत-यूके सीईटीए लागू, भारतीय उद्योग के लिए खुले नए अवसर; फिक्की ने बताया व्यापार और निवेश को मिलेगा बड़ा बढ़ावा

    नई दिल्ली । भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (सीईटीए) लागू होने के बाद भारतीय उद्योग जगत ने इसे देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। उद्योग संगठन फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) का मानना है कि यह समझौता भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के लिए नए बाजारों के द्वार खोलेगा तथा निर्यात, निवेश और औद्योगिक विकास को नई गति देगा। संगठन ने इसे भारत की वैश्विक आर्थिक भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।

    फिक्की के महासचिव अनंत स्वरूप ने समझौते के लागू होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई देते हुए कहा कि भारत-यूके सीईटीए से वस्तुओं और सेवाओं दोनों क्षेत्रों में कारोबार के नए अवसर पैदा होंगे। उनके अनुसार, नवाचार, प्रौद्योगिकी सहयोग और प्रतिभा के आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में बढ़ती साझेदारी भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत करेगी। उन्होंने कहा कि यह समझौता भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का अवसर देगा और वैश्विक मूल्य श्रृंखला में भारत की भूमिका को और सशक्त बनाएगा।

    फिक्की का कहना है कि यह समझौता भारत की मुक्त व्यापार समझौता नीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। संगठन के अनुसार, इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध और मजबूत होंगे तथा उद्योगों को नई तकनीकों, निवेश और वैश्विक सहयोग का लाभ मिलेगा। इसके साथ ही भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच नवाचार आधारित विकास को भी प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक विकास को गति मिल सकती है।

    फिक्की के अध्यक्ष अनंत गोयनका ने कहा कि उच्च गुणवत्ता वाली आर्थिक साझेदारियां भारत के ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। उनके अनुसार, यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि औद्योगिक क्षमता बढ़ाने, वैश्विक निवेश आकर्षित करने और भारतीय उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए अधिक सक्षम बनाने में भी सहायक होगा। उन्होंने कहा कि भारत तेजी से विकसित अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और ऐसे समझौते इस यात्रा को और मजबूत करेंगे।

    उद्योग संगठन का मानना है कि सीईटीए आर्थिक सहयोग के प्रति दीर्घकालिक और दूरदर्शी सोच को दर्शाता है। इससे व्यापार, निवेश, नवाचार और रोजगार के नए अवसर विकसित होने की संभावना है। साथ ही भारतीय कंपनियों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनने और विदेशी बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने का बेहतर अवसर मिलेगा। इससे घरेलू उद्योगों की उत्पादन क्षमता और प्रतिस्पर्धात्मक दक्षता में भी सुधार आने की उम्मीद जताई गई है।

    भारत-यूके व्यापार समझौता बुधवार से प्रभावी हो गया है। इसके तहत भारत के लगभग 99 प्रतिशत निर्यात को शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच उपलब्ध होगी, जिससे द्विपक्षीय व्यापार के लगभग पूरे मूल्य को लाभ मिलने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते से वस्त्र, इंजीनियरिंग, फार्मास्यूटिकल्स, कृषि उत्पाद, सूचना प्रौद्योगिकी और पेशेवर सेवाओं सहित कई क्षेत्रों को प्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर उत्पादन, सेवाओं और रोजगार की मांग बढ़ने की भी संभावना जताई जा रही है, जिससे भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच आर्थिक संबंधों को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।

  • भारत-ब्रिटेन के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ लागू, स्कॉच व्हिस्की से लग्जरी कारों तक सस्ता होगा सामान

    भारत-ब्रिटेन के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट हुआ लागू, स्कॉच व्हिस्की से लग्जरी कारों तक सस्ता होगा सामान


    नई दिल्ली। भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) बुधवार, 15 जुलाई 2026 से लागू हो गया है। इस समझौते के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार पर लगने वाले कई आयात-निर्यात शुल्क में बड़ी कटौती होगी। इसका सीधा असर भारत में आने वाले ब्रिटिश उत्पादों की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे स्कॉच व्हिस्की, लग्जरी कारों और ब्यूटी प्रोडक्ट्स समेत कई सामान सस्ते हो सकते हैं।

    भारत और ब्रिटेन के बीच इस ऐतिहासिक व्यापार समझौते की घोषणा जून 2026 में की गई थी। अब इसके लागू होने के बाद दोनों देशों के कारोबार को नई गति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    स्कॉच व्हिस्की की कीमतों में बड़ी गिरावट की उम्मीद
    भारत में अभी स्कॉच व्हिस्की पर करीब 150 फीसदी तक आयात शुल्क लगाया जाता है। लेकिन FTA लागू होने के बाद इस ड्यूटी को चरणबद्ध तरीके से घटाकर 40 फीसदी तक लाया जाएगा। इसका मतलब है कि आने वाले समय में ब्रिटेन से आने वाली स्कॉच व्हिस्की की कीमतों में करीब 110 फीसदी तक की कमी देखने को मिल सकती है। इससे भारतीय बाजार में ब्रिटिश शराब ब्रांड्स की पहुंच बढ़ सकती है।

    लैंड रोवर, जगुआर और रोल्स रॉयस जैसी कारें होंगी सस्ती
    फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के तहत ब्रिटेन से आयात होने वाली लग्जरी कारों पर भी शुल्क में बड़ी कटौती की जाएगी। ऑटोमोबाइल सेक्टर में कोटा व्यवस्था के तहत आयात शुल्क को 100 फीसदी से घटाकर 10 फीसदी तक करने का प्रावधान है।

    इससे ब्रिटेन की कंपनियों की कारें जैसे लैंड रोवर, जगुआर, रोल्स रॉयस, एस्टन मार्टिन और डिफेंडर भारतीय ग्राहकों के लिए पहले के मुकाबले सस्ती हो सकती हैं।

    नोटिफिकेशन के अनुसार, पहले साल 20,000 कारों को कम ड्यूटी पर आयात किया जा सकेगा। इनमें 3000cc से ज्यादा पेट्रोल इंजन और 2500cc से ज्यादा डीजल इंजन वाली 10,000 कारें शामिल होंगी। इन पर लगने वाली कस्टम ड्यूटी 110 फीसदी से घटकर 30 फीसदी हो जाएगी।

    वहीं, 1500cc से 3000cc तक की 5,000 कारों के आयात पर ड्यूटी 66 फीसदी से घटाकर 50 फीसदी की जाएगी। इसके बाद इसे धीरे-धीरे कम किया जाएगा और 15 साल बाद कस्टम ड्यूटी को 10 फीसदी तक लाने का लक्ष्य रखा गया है।

    ब्यूटी प्रोडक्ट्स समेत कई सामानों पर कम होगा टैरिफ
    FTA के तहत ब्यूटी और कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स समेत कई अन्य ब्रिटिश उत्पादों पर लगने वाला 22 फीसदी तक का टैरिफ या तो तुरंत खत्म किया जाएगा या फिर अगले 10 वर्षों में चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा। इससे ब्रिटेन से आयात होने वाले कई उत्पाद भारतीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध हो सकते हैं।

    UK में भारतीय सामानों को मिलेगा बड़ा फायदा
    भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते का फायदा सिर्फ ब्रिटिश उत्पादों तक सीमित नहीं रहेगा। इस डील के तहत भारत से ब्रिटेन जाने वाले कई सामानों पर भी शुल्क खत्म किया जाएगा।

    कपड़े, जूते और कुछ खाद्य उत्पादों समेत कई भारतीय वस्तुओं को ब्रिटेन में ड्यूटी फ्री या कम शुल्क के दायरे में लाया जाएगा। अभी ब्रिटेन में टेक्सटाइल गारमेंट पर 12 फीसदी, केमिकल्स पर 8 फीसदी और बेस मेटल्स पर 10 फीसदी तक ड्यूटी लगती है। FTA के बाद करीब 99 फीसदी भारतीय उत्पादों को शून्य शुल्क की सुविधा मिलने की बात कही गई है।

    दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा
    ब्रिटिश सरकार के अनुमान के मुताबिक, भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में करीब 4.8 अरब पाउंड का इजाफा हो सकता है। इसके अलावा वास्तविक वेतन में भी करीब 2.2 अरब पाउंड की बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है।

    ब्रिटेन इस समझौते को भारत के साथ अब तक का सबसे बड़ा व्यापक व्यापार समझौता बता रहा है। दोनों देशों को उम्मीद है कि यह डील निवेश, कारोबार और रोजगार के नए अवसरों को बढ़ावा देगी।

  • भारत समेत रूसी तेल खरीद वाले पांच देशों पर 100% टैरिफ…., US में कड़े प्रतिबंध वाला विधेयक पेश

    भारत समेत रूसी तेल खरीद वाले पांच देशों पर 100% टैरिफ…., US में कड़े प्रतिबंध वाला विधेयक पेश


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) के दोनों प्रमुख दलों के सीनेटरों (Senators) ने रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाने वाला बहुप्रतीक्षित विधेयक (Bill) पेश किया है। इसमें भारत समेत पांच देशों का नाम शामिल है, जिन पर रूस से तेल की खरीद जारी रखने पर शुल्क लगाया जा सकता है। कुछ सांसद इस प्रस्ताव को “लिंडसे ग्राहम रूस अकाउंटेबिलिटी बिल” (Lindsey Graham Russia Accountability Bill) कह रहे हैं। इसे मंगलवार को कैपिटल हिल में डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल और जीन शाहीन के साथ रिपब्लिकन सीनेटर रोजर विकर, केटी ब्रिट और दोनों दलों के एक दर्जन से अधिक सांसदों ने पेश किया।

    यह विधेयक सीनेटर लिंडसे ग्राहम के निधन के तुरंत बाद पेश किया गया है। ग्राहम ने करीब दो वर्षों तक इस विधेयक पर काम किया था और उनके सहयोगियों ने उन्हें इसका प्रमुख सूत्रधार बताया। इस विधेयक में ग्राहम ने रूसी तेल खरीद करने वाले देशों पर 500 फीसदी टैरिफ लगाने की सिफारिश की थी।


    अमेरिकी सांसदों ने क्यों पेश किया 100 फीसदी टैरिफ वाला बिल?

    मुख्य डेमोक्रेटिक प्रायोजक ब्लूमेंथल ने कहा कि यह विधेयक केवल शुल्क लगाने तक सीमित नहीं है। इसमें रूस की अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से, ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्र, रक्षा उद्योग, रूसी उद्योगपतियों तथा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है। विधेयक में प्रशासन को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह रूस से सबसे अधिक तेल खरीदने वाले देशों पर शून्य से अधिक दर पर शुल्क लगा सके। हालांकि, शुल्क की अधिकतम सीमा तय की गई है।

    विधेयक के अनुसार, अब शुल्क केवल रूस से तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष पांच देशों पर लागू होगा। विधेयक के प्रायोजकों ने कहा कि इस सूची में चीन और भारत सबसे ऊपर हैं। संशोधित मसौदे में पहले प्रस्तावित 500 फीसदी शुल्क को घटाकर अधिकतम 100 फीसदी कर दिया गया है।


    टैरिफ वाले देशों की सूची में भारत का भी नाम

    ब्लूमेंथल ने जिन पांच देशों का नाम लिया, उनमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। विधेयक में रूस से प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों को भी दायरे में लाने का प्रावधान है। हालांकि, जो देश अपनी कुल गैस का 15 फीसदी से कम रूस से आयात करते हैं और इन आयातों को कम करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, उन्हें इससे छूट मिलेगी। इस प्रावधान से अधिकांश यूरोपीय सहयोगी देशों को राहत मिलेगी।

    सीनेटरों ने स्पष्ट किया कि शुल्क की वास्तविक दर अभी तय नहीं की गई है। इसे विधेयक में निर्धारित नहीं किया गया है, बल्कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव) तय करेंगे। ब्लूमेंथल ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि शुल्क की दर इतनी होगी कि “चीन, भारत और रूस से तेल तथा गैस खरीदने वाले अन्य बड़े देशों को इससे हतोत्साहित किया जा सके।” हालांकि, उन्होंने कोई निश्चित प्रतिशत बताने से इनकार कर दिया।


    ट्रंप के पास छूट देने का विशेषाधिकार

    विधेयक में राष्ट्रपति को विशेष परिस्थितियों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। अगर बाद में शुल्क कम किया जाता है तो इसकी जानकारी कांग्रेस को देना भी अनिवार्य होगा। अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति के अध्यक्ष सीनेटर जेम्स रिश ने कहा कि उन्होंने एक अलग प्रावधान जोड़ने पर जोर दिया, जिसके तहत रूस के तथाकथित “शैडो फ्लीट” यानी उन तेल टैंकरों पर कार्रवाई की जाएगी, जिनका इस्तेमाल मौजूदा प्रतिबंधों से बचकर तेल निर्यात के लिए किया जाता है।

    सांसदों ने कहा कि इस विधेयक को पहले के मसौदे की तुलना में काफी सीमित किया गया है। पहले के संस्करण में कथित तौर पर 63 देशों तक पर शुल्क लगाने का प्रावधान था। ब्लूमेंथल ने कहा कि मौजूदा मसौदा केवल रूस से तेल खरीदने वाले पांच और गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों पर केंद्रित है। इनमें कुछ देशों के नाम दोनों सूचियों में शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह बदलाव ट्रंप प्रशासन के सुझाव पर किया गया है और प्रशासन ने लिखित रूप से इस विधेयक का समर्थन भी किया है।


    लिंडसे ग्राहम को लेकर क्या बोले अमेरिकी सांसद?

    सांसदों ने उम्मीद जताई कि संशोधित मसौदे को प्रतिनिधि सभा में भी व्यापक समर्थन मिलेगा, क्योंकि पहले के व्यापक प्रस्ताव पर कई सांसदों ने आपत्ति जताई थी। विधेयक की घोषणा के दौरान कई सीनेटरों ने लिंडसे ग्राहम को श्रद्धांजलि दी। सीनेटर रोजर विकर ने कहा कि ग्राहम के साथ तीन दशक से अधिक समय तक काम करने के दौरान उन्होंने कई उपलब्धियां देखीं, लेकिन “यह उनका सबसे बड़ा योगदान है।”

    सीनेटर टेड क्रूज ने कहा कि ग्राहम ने निधन से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ इस विधेयक की शर्तों पर सीधे बातचीत की थी। उन्होंने सांसदों से अपील की कि इसे भारी बहुमत से पारित कर ग्राहम को श्रद्धांजलि दी जाए। सांसदों ने कहा कि इस विधेयक को जल्द पारित करना जरूरी है। उन्होंने यूक्रेन की युद्धक्षेत्र में बढ़त और रूस की ओर से नागरिक इलाकों पर जारी हमलों का हवाला दिया।

    कई सीनेटरों ने उम्मीद जताई कि अगस्त के अंत तक सीनेट इस पर कार्रवाई कर सकती है। उनका कहना है कि पर्याप्त समर्थन मिलते ही इस पर मतदान कराया जाएगा। जब राष्ट्रपति ट्रंप के उस सुझाव के बारे में पूछा गया कि इस विधेयक में ईरान या हिजबुल्ला पर प्रतिबंधों को भी शामिल किया जा सकता है, तो ब्लूमेंथल ने कहा कि फिलहाल उनकी प्राथमिकता मौजूदा विधेयक को आगे बढ़ाने की है। हालांकि, उन्होंने भविष्य में अलग विधेयक लाने की संभावना से इनकार नहीं किया।


    भारत पर क्यों गहराया संकट?

    भारत ने अब तक रियायती दर पर रूसी कच्चे तेल की खरीद कम करने के लिए पश्चिमी देशों के दबाव को स्वीकार नहीं किया है। 2022 के बाद से रूस से भारत का तेल आयात काफी बढ़ा है और अब यह भारत के कुल तेल आयात का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। नई दिल्ली पहले भी कह चुका है कि यह व्यापार देश की ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं के हित में है। भारत का यह भी कहना रहा है कि इससे वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिलती है।

    यह विधेयक अभी सीनेट की प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद प्रतिनिधि सभा से भी पारित होना बाकी है। इसके बाद ही इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। इससे पहले व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने एएनआई से कहा कि ट्रंप प्रशासन इस रूस प्रतिबंध विधेयक का समर्थन करता है। व्हाइट हाउस के अधिकारी ने कहा कि इस विधेयक के तहत राष्ट्रपति ट्रंप को उन देशों से आने वाले आयात पर 500 फीसदी तक शुल्क लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो रूस के ऊर्जा क्षेत्र के साथ कारोबार जारी रखते हैं।

  • एजबेस्टन में गिल और अक्षर का शानदार प्रदर्शन, इंग्लैंड को 6 विकेट से हराया, भारत की जीत की ये हैं 5 बड़ी वजहें

    एजबेस्टन में गिल और अक्षर का शानदार प्रदर्शन, इंग्लैंड को 6 विकेट से हराया, भारत की जीत की ये हैं 5 बड़ी वजहें


    बर्मिंघम। भारतीय टीम ने एजबेस्टन में खेले गए पहले वनडे मुकाबले में इंग्लैंड को छह विकेट से हराकर न सिर्फ तीन मैचों की सीरीज में 1-0 की बढ़त हासिल की, बल्कि कई रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिए। कप्तान शुभमन गिल की शानदार बल्लेबाजी और अक्षर पटेल के बेहतरीन ऑलराउंड प्रदर्शन ने भारत को यादगार जीत दिलाई।

    259 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारत ने 45.2 ओवर में चार विकेट गंवाकर मुकाबला अपने नाम कर लिया। कप्तान शुभमन गिल ने 75 गेंदों में 80 रन की शानदार पारी खेली। उनकी पारी में 11 चौके और एक छक्का शामिल रहा। हालांकि, क्रैम्प और हैमस्ट्रिंग की परेशानी के कारण उन्हें रिटायर्ड हर्ट होकर मैदान छोड़ना पड़ा।

    इसके बाद अक्षर पटेल और वॉशिंगटन सुंदर ने जिम्मेदारी संभाली। दोनों ने पांचवें विकेट के लिए नाबाद 102 रनों की साझेदारी कर भारत की जीत पक्की कर दी। अक्षर ने नाबाद 57 रन बनाए, जबकि सुंदर ने नाबाद 52 रनों का योगदान दिया।

    गेंदबाजों ने पलटी इंग्लैंड की पारी
    इससे पहले इंग्लैंड ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। शुरुआत में मेजबान टीम मजबूत स्थिति में थी और एक समय उसका स्कोर 61 रन पर बिना विकेट के था।

    लेकिन भारतीय गेंदबाजों ने शानदार वापसी करते हुए इंग्लैंड को 107 रन तक पहुंचते-पहुंचते छह विकेट गंवाने पर मजबूर कर दिया। हालांकि जो रूट (76*) और लियाम डॉसन (68) ने सातवें विकेट के लिए 121 रनों की साझेदारी कर इंग्लैंड को 258 रन तक पहुंचाया।

    भारत की ओर से अक्षर पटेल ने शानदार गेंदबाजी करते हुए चार विकेट हासिल किए। प्रसिद्ध कृष्णा और गुरनूर बराड़ ने दो-दो विकेट लेकर इंग्लैंड की पारी को नियंत्रित रखा।

    भारत की जीत के 5 बड़े कारण

    1. 11 साल बाद एजबेस्टन में इंग्लैंड को मिली हार
    एजबेस्टन मैदान पर इंग्लैंड का वनडे रिकॉर्ड बेहद मजबूत रहा था। 2015 के बाद उसने इस मैदान पर लगातार आठ वनडे मुकाबले जीते थे। भारत ने 2014 के बाद पहली बार इसी मैदान पर इंग्लैंड को हराकर उसका विजयी सिलसिला तोड़ दिया।

    2. इंग्लैंड के खिलाफ लगातार छठी वनडे जीत
    भारत की यह इंग्लैंड के खिलाफ वनडे क्रिकेट में लगातार छठी जीत है। यह किसी भी दौर में इंग्लैंड के खिलाफ भारत की सबसे लंबी जीत की श्रृंखला बन गई है।

    3. गिल का एजबेस्टन में लगातार शानदार प्रदर्शन
    शुभमन गिल का एजबेस्टन से खास रिश्ता बनता जा रहा है। पिछले साल इसी मैदान पर टेस्ट मैच में 269 और 161 रन की यादगार पारियां खेलने वाले गिल ने अब वनडे में भी कप्तानी पारी खेलकर अपनी छाप छोड़ी।

    4. अक्षर पटेल का ऑलराउंड जवाब
    टी20 सीरीज में आलोचनाओं का सामना करने वाले अक्षर पटेल ने वनडे में शानदार वापसी की। उन्होंने पहले गेंद से चार विकेट लिए और फिर नाबाद 57 रन बनाकर टीम की जीत में अहम भूमिका निभाई।

    5. यूके दौरे पर भारत की पहली जीत
    इंग्लैंड और आयरलैंड के खिलाफ टी20 मुकाबलों में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद भारत को मौजूदा यूनाइटेड किंगडम दौरे पर पहली जीत मिली। इस जीत ने टीम के आत्मविश्वास को नई मजबूती दी है।

    एजबेस्टन की इस जीत में कप्तान गिल का नेतृत्व, गेंदबाजों की वापसी और अक्षर पटेल का ऑलराउंड प्रदर्शन भारत के लिए सबसे बड़ी सकारात्मक बातें रहीं।

  • भारत के बीएफएसआई सेक्टर में निवेश को मिली नई रफ्तार, दूसरी तिमाही में डील वैल्यू 58 प्रतिशत बढ़कर 3.2 अरब डॉलर पहुंची

    भारत के बीएफएसआई सेक्टर में निवेश को मिली नई रफ्तार, दूसरी तिमाही में डील वैल्यू 58 प्रतिशत बढ़कर 3.2 अरब डॉलर पहुंची

    नई दिल्ली ।भारत के बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और बीमा (बीएफएसआई) क्षेत्र में वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही के दौरान निवेश गतिविधियों में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली है। इस अवधि में कुल 65 डील्स दर्ज की गईं, जिनकी संयुक्त वैल्यू 3.2 अरब डॉलर रही। तिमाही आधार पर यह मूल्य लगभग 58 प्रतिशत अधिक रहा, जो इस क्षेत्र में निवेशकों के बढ़ते विश्वास और रणनीतिक सौदों की सक्रियता को दर्शाता है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय वित्तीय सेवाओं का बाजार निवेश आकर्षित करने में सक्षम बना हुआ है।

    तिमाही समीक्षा के अनुसार इस अवधि में बीएफएसआई सेक्टर की हिस्सेदारी कुल डील वॉल्यूम का लगभग 11 प्रतिशत और कुल डील वैल्यू का 8 प्रतिशत रही। डील वैल्यू में आई उल्लेखनीय वृद्धि के पीछे एक बड़े रणनीतिक ट्रांजैक्शन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े सौदों ने पूरे सेक्टर की निवेश क्षमता को मजबूती दी और बाजार में सकारात्मक संकेत भेजे।

    अप्रैल से जून 2026 के बीच विलय एवं अधिग्रहण यानी एमएंडए गतिविधियों में भी तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस दौरान 24 एमएंडए डील्स हुईं, जिनकी कुल वैल्यू 1.5 अरब डॉलर रही। तिमाही आधार पर एमएंडए डील्स की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि उनकी वैल्यू करीब पांच गुना बढ़ गई। इससे स्पष्ट होता है कि वित्तीय संस्थानों और निवेशकों ने विस्तार तथा रणनीतिक साझेदारियों पर अधिक ध्यान दिया।

    रिपोर्ट के अनुसार सार्वजनिक बाजार की गतिविधियों को अलग रखने पर बीएफएसआई क्षेत्र में 62 एमएंडए तथा प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल से जुड़े लेनदेन दर्ज किए गए, जिनकी कुल वैल्यू 2.8 अरब डॉलर रही। यह प्रदर्शन ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण निवेश वातावरण पूरी तरह स्थिर नहीं माना जा रहा है। इसके बावजूद भारतीय वित्तीय क्षेत्र में निवेशकों की रुचि बनी रही।

    विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों ने इस दौरान विशेष रूप से स्केलेबल, तकनीक आधारित और नियामकीय रूप से मजबूत कारोबारों को प्राथमिकता दी। पूंजी निवेश का रुख पहले की तुलना में अधिक संतुलित और सोच-समझकर किया गया। यही कारण रहा कि सीमित निवेश माहौल के बावजूद रणनीतिक डील्स ने पूरे सेक्टर के प्रदर्शन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

    समीक्षा अवधि के दौरान प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल गतिविधियों में 38 सौदे दर्ज किए गए, जिनकी कुल वैल्यू 1.3 अरब डॉलर रही। दूसरी ओर, सार्वजनिक बाजार की गतिविधियां अपेक्षाकृत धीमी रहीं। इस दौरान एक प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के माध्यम से 97 मिलियन डॉलर जुटाए गए, जबकि दो क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट के जरिए 310 मिलियन डॉलर की पूंजी हासिल की गई। इससे संकेत मिलता है कि निजी निवेश फिलहाल सार्वजनिक पूंजी बाजार की तुलना में अधिक सक्रिय बना हुआ है।

    सेगमेंट के स्तर पर फिनटेक सबसे अधिक सक्रिय क्षेत्र रहा, जहां 31 डील्स के माध्यम से 1.4 अरब डॉलर का निवेश दर्ज किया गया। वहीं वित्तीय सेवाओं और एसेट मैनेजमेंट क्षेत्र में 16 सौदों के जरिए 690 मिलियन डॉलर की डील वैल्यू सामने आई, जो पिछली तिमाही की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक रही। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां स्थिर होने और पूंजी बाजार में सुधार आने के साथ भारत का बीएफएसआई इकोसिस्टम आने वाले समय में भी घरेलू और विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना रह सकता है।

  • भारत में डेटा सेंटर सेक्टर बनेगा रोजगार का नया इंजन, 2030 तक 1 लाख इंजीनियरों की मांग का अनुमान, एआई और क्लाउड टेक्नोलॉजी से बढ़ेगी अवसरों की रफ्तार

    भारत में डेटा सेंटर सेक्टर बनेगा रोजगार का नया इंजन, 2030 तक 1 लाख इंजीनियरों की मांग का अनुमान, एआई और क्लाउड टेक्नोलॉजी से बढ़ेगी अवसरों की रफ्तार

    नई दिल्ली ।भारत में तेजी से बढ़ता डेटा सेंटर उद्योग आने वाले वर्षों में रोजगार सृजन का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है। डिजिटल सेवाओं के विस्तार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीकों के बढ़ते उपयोग और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग में लगातार वृद्धि के बीच एक नई रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2030 तक इस क्षेत्र में करीब एक लाख कुशल इंजीनियरों और तकनीकी पेशेवरों की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते योग्य मानव संसाधन तैयार किए गए, तो यह क्षेत्र देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था को नई गति देने के साथ लाखों युवाओं के लिए करियर के बेहतर अवसर भी उपलब्ध कराएगा।

    रिपोर्ट के अनुसार भारत की स्थापित डेटा सेंटर क्षमता वर्तमान लगभग 1.5 गीगावाट से बढ़कर दशक के अंत तक करीब 6.5 गीगावाट तक पहुंचने की संभावना है। इसी के साथ देश का डेटा सेंटर बाजार 22 अरब डॉलर से अधिक का आकार प्राप्त कर सकता है। बढ़ती डिजिटल सेवाओं, ई-कॉमर्स, वित्तीय तकनीकों, सरकारी डिजिटल परियोजनाओं और एआई आधारित अनुप्रयोगों ने डेटा प्रोसेसिंग और स्टोरेज की जरूरतों को पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ा दिया है।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि डेटा सेंटर क्षेत्र में अब तक 126 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धताएं सामने आ चुकी हैं। लगातार हो रहे निवेश के कारण यह उद्योग देश के सबसे तेजी से विकसित होने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में शामिल हो गया है। नई परियोजनाओं के शुरू होने से निर्माण, संचालन, रखरखाव और तकनीकी प्रबंधन जैसे अनेक क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद है।

    हालांकि रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि शिक्षा संस्थानों, उद्योग जगत और नीति-निर्माताओं के बीच बेहतर समन्वय नहीं हुआ तो भविष्य में कुशल पेशेवरों की कमी इस क्षेत्र की प्रगति में बड़ी चुनौती बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती तकनीकों के अनुरूप प्रशिक्षण कार्यक्रम, उद्योग आधारित पाठ्यक्रम और व्यावहारिक कौशल विकास पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार केवल तकनीकी निवेश नहीं, बल्कि भारत के युवाओं के लिए दीर्घकालिक रोजगार और कौशल विकास का बड़ा अवसर है। एआई इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड ऑपरेशंस, ऑटोमेशन, पावर सिस्टम और क्रिटिकल फैसिलिटी मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही प्लेटफॉर्म इंजीनियरिंग, डेवऑप्स, एमएलऑप्स और डेटा सेंटर ऑटोमेशन जैसी आधुनिक तकनीकी भूमिकाएं भी तेजी से उभर रही हैं।

    अनुमान है कि आने वाले वर्षों में एआई आधारित वर्कलोड भारत की कुल डेटा सेंटर क्षमता का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा बन जाएगा। ऐसे में डेटा सेंटर उद्योग में काम करने वाले इंजीनियरों के लिए एआई इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा दक्षता और आधुनिक कंप्यूटिंग प्रणालियों की समझ आवश्यक कौशल के रूप में विकसित होगी। इससे तकनीकी शिक्षा और उद्योग की आवश्यकताओं के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत भी बढ़ेगी।

    रिपोर्ट के अनुसार भविष्य के डेटा सेंटर केवल डिजिटल स्टोरेज तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ऊर्जा प्रबंधन, उन्नत कूलिंग सिस्टम और अत्याधुनिक तकनीकी अवसंरचना पर आधारित होंगे। इसी कारण एआई इंफ्रास्ट्रक्चर ऑपरेशंस इंजीनियर, लिक्विड कूलिंग इंजीनियर, एनर्जी ऑप्टिमाइजेशन स्पेशलिस्ट, क्रिटिकल फैसिलिटीज इंजीनियर और पावर सिस्टम विशेषज्ञ जैसे नए पदों की मांग लगातार बढ़ने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत समय रहते कुशल कार्यबल तैयार करने में सफल रहता है, तो डेटा सेंटर उद्योग आने वाले वर्षों में देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था और रोजगार परिदृश्य दोनों को नई मजबूती प्रदान करेगा।

  • प्रत्यक्ष कर संग्रह में मजबूत उछाल, चालू वित्त वर्ष में 7.74 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा कलेक्शन, अर्थव्यवस्था की मजबूती के मिले संकेत

    प्रत्यक्ष कर संग्रह में मजबूत उछाल, चालू वित्त वर्ष में 7.74 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा कलेक्शन, अर्थव्यवस्था की मजबूती के मिले संकेत


    नई दिल्ली ।
    चालू वित्त वर्ष में भारत के प्रत्यक्ष कर संग्रह में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे देश की आर्थिक गतिविधियों और कर संग्रह व्यवस्था की मजबूती के संकेत मिले हैं। 13 जुलाई तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह सालाना आधार पर 16.11 प्रतिशत बढ़कर 7.74 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इस वृद्धि में कॉरपोरेट टैक्स, गैर-कॉरपोरेट टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) के बेहतर प्रदर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कर संग्रह में यह तेजी सरकार के राजस्व आधार को मजबूत करने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था में जारी सकारात्मक गतिविधियों को भी दर्शाती है।

    आंकड़ों के अनुसार, रिफंड की राशि को समायोजित करने के बाद शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 16.4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 6.51 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। इसी अवधि में करदाताओं को जारी किए गए रिफंड भी बढ़े हैं और उनका कुल मूल्य 1.22 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 14.57 प्रतिशत अधिक है। इससे यह संकेत मिलता है कि एक ओर सरकार का कर संग्रह बढ़ रहा है तो दूसरी ओर पात्र करदाताओं को समय पर रिफंड भी जारी किए जा रहे हैं।

    कॉरपोरेट कर संग्रह में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। रिफंड समायोजन के बाद कॉरपोरेट टैक्स से प्राप्त राजस्व 2.40 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 1.97 लाख करोड़ रुपये था। वहीं गैर-कॉरपोरेट कर संग्रह बढ़कर 3.85 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो एक वर्ष पहले 3.44 लाख करोड़ रुपये था। इससे स्पष्ट होता है कि कंपनियों के साथ-साथ व्यक्तिगत और अन्य श्रेणी के करदाताओं का योगदान भी लगातार बढ़ रहा है।

    यदि सकल कर संग्रह की बात करें तो कॉरपोरेट टैक्स 3.35 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष समान अवधि में यह 2.90 लाख करोड़ रुपये था। इसी प्रकार गैर-कॉरपोरेट कर संग्रह भी बढ़कर 4.12 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो पिछले वर्ष 3.58 लाख करोड़ रुपये था। यह वृद्धि विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में कारोबार और आय में सुधार का संकेत मानी जा रही है।

    सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स के मोर्चे पर भी मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया गया। रिफंड समायोजन के बाद एसटीटी का शुद्ध संग्रह 26,428.96 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले वर्ष समान अवधि में यह 17,875.88 करोड़ रुपये था। शेयर बाजार में बढ़ी गतिविधियों और निवेशकों की भागीदारी को इस बढ़ोतरी का प्रमुख कारण माना जा रहा है। हालांकि अन्य करों के मद में इस अवधि के दौरान संग्रह मामूली रूप से नकारात्मक दर्ज किया गया।

    प्रत्यक्ष कर के इन आंकड़ों में कॉरपोरेट संस्थाओं के अलावा व्यक्तिगत करदाता, हिंदू अविभाजित परिवार, साझेदारी फर्म, व्यक्तियों के समूह, स्थानीय निकाय तथा अन्य कानूनी संस्थाओं द्वारा जमा किए गए कर भी शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष कर संग्रह में लगातार हो रही वृद्धि से सरकार को विकास योजनाओं और सार्वजनिक निवेश के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध होंगे। साथ ही यह भी संकेत मिलता है कि देश की आर्थिक गतिविधियां स्थिर गति से आगे बढ़ रही हैं और घरेलू मांग तथा औद्योगिक प्रदर्शन राजस्व वृद्धि को समर्थन दे रहे हैं।

  • हॉर्मुज संकट से भारत पर बढ़ा आर्थिक दबाव, महंगा तेल, कमजोर रुपया और बढ़ती महंगाई से आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ सकता है असर

    हॉर्मुज संकट से भारत पर बढ़ा आर्थिक दबाव, महंगा तेल, कमजोर रुपया और बढ़ती महंगाई से आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ सकता है असर

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में हॉर्मुज स्ट्रेट के आसपास बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच फिर से गहराते टकराव का असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा चलता है तो भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों को महंगे तेल, बढ़ती महंगाई, कमजोर रुपये और ऊंचे आयात बिल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव आम लोगों की रसोई से लेकर परिवहन, उद्योग और अर्थव्यवस्था तक महसूस किया जा सकता है।

    हॉर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल है। वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल के बड़े हिस्से और बड़ी मात्रा में एलएनजी की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या जहाजों की आवाजाही में बाधा अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों को तेजी से प्रभावित करती है। हाल के दिनों में कई जहाजों ने सुरक्षा कारणों से इस मार्ग पर संचालन सीमित किया है, जिससे समुद्री परिवहन और बीमा लागत भी बढ़ी है।

    भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 से 90 प्रतिशत आयात करता है। इनमें से बड़ी मात्रा हॉर्मुज स्ट्रेट के रास्ते देश तक पहुंचती है। यदि इस समुद्री मार्ग पर लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो भारत को वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदना पड़ सकता है, जिससे परिवहन लागत और आयात व्यय दोनों बढ़ेंगे। इसका प्रभाव पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधनों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

    रसोई गैस को लेकर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और इन आयातों का अधिकांश भाग हॉर्मुज मार्ग से होकर आता है। यदि आपूर्ति प्रभावित होती है या अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज वृद्धि होती है तो घरेलू गैस सिलेंडर की लागत बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में सरकार के सामने सब्सिडी बढ़ाने या उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त कीमत का बोझ डालने जैसे विकल्प सामने आ सकते हैं।

    महंगे कच्चे तेल का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता। डीजल की कीमतों में वृद्धि से माल ढुलाई महंगी होती है, जिसका प्रभाव फल, सब्जियां, दूध, अनाज, निर्माण सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। इससे खुदरा महंगाई बढ़ने की संभावना रहती है। साथ ही तेल आयात के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च होने से रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य आयातित वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं।

    ऊंची तेल कीमतों का असर सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर भी पड़ सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं और घरेलू स्तर पर कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी नहीं की जाती, तो कंपनियों पर लागत का अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है। वहीं तेल उत्पादन से जुड़ी कंपनियों को ऊंचे वैश्विक दामों का लाभ मिलने की संभावना रहती है, जबकि विमानन, परिवहन, रसायन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है।

    ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए भारत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार भी कर रहा है। सरकार भविष्य में आपूर्ति बाधित होने की स्थिति से निपटने के लिए अतिरिक्त भंडारण क्षमता विकसित करने और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि हॉर्मुज जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों पर बढ़ता तनाव केवल भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और आम नागरिकों के दैनिक खर्च से भी जुड़ा हुआ है।

  • होर्मुज स्ट्रेट में भारतीय नाविक की मौत पर भारत का कड़ा रुख, ईरानी दूतावास तलब, समुद्री सुरक्षा को लेकर जताई गंभीर चिंता

    होर्मुज स्ट्रेट में भारतीय नाविक की मौत पर भारत का कड़ा रुख, ईरानी दूतावास तलब, समुद्री सुरक्षा को लेकर जताई गंभीर चिंता


    नई दिल्ली ।
    होर्मुज स्ट्रेट क्षेत्र में एक व्यापारी जहाज पर हुए हमले में भारतीय नाविक की मौत के बाद भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। इस घटना के बाद विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास के वरिष्ठ अधिकारियों को तलब कर अपनी चिंता और आपत्ति दर्ज कराई। सरकार ने विशेष रूप से समुद्री मार्गों पर कार्यरत भारतीय नागरिकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए कहा कि इस संवेदनशील क्षेत्र में काम करने वाले भारतीय नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।

    विदेश मंत्रालय में हुई बैठक के दौरान भारतीय अधिकारियों ने ईरानी पक्ष के समक्ष समुद्री सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दों को उठाया। इस दौरान ईरानी दूतावास के वरिष्ठ राजनयिक, जिनमें उप मिशन प्रमुख भी शामिल थे, विदेश मंत्रालय पहुंचे। भारत ने स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया के समुद्री मार्गों पर बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक व्यापारी जहाजों पर कार्यरत हैं और किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव उनके जीवन और सुरक्षा पर सीधा प्रभाव डाल सकता है।

    घटना ऐसे समय सामने आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच लगातार सैन्य कार्रवाई और जवाबी हमलों की खबरें सामने आई हैं। इसी क्रम में होर्मुज स्ट्रेट के निकट संयुक्त अरब अमीरात से जुड़े दो वाणिज्यिक जहाजों पर हमला हुआ, जिसमें एक भारतीय नाविक की जान चली गई। इस हमले में कई अन्य चालक दल के सदस्य भी घायल हुए, जिनमें भारतीय नागरिक शामिल बताए गए हैं। कुछ घायलों की स्थिति गंभीर बताई जा रही है।

    हमले के बाद दोनों जहाजों में आग लग गई थी, जिस पर बाद में काबू पा लिया गया। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, प्रभावित जहाजों पर मौजूद चालक दल को सुरक्षित निकालने के लिए राहत एवं बचाव अभियान भी चलाया गया। घटना के बाद क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों और वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है।

    संयुक्त अरब अमीरात ने भी इस हमले की कड़ी निंदा की है। यूएई ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध बताया और कहा कि वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए गंभीर खतरा है। साथ ही यह भी कहा गया कि ऐसी घटनाओं का उचित जवाब देने का अधिकार सुरक्षित है। इस बयान के बाद पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता व्यक्त की जा रही है।

    होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी समुद्री मार्ग से विभिन्न देशों तक पहुंचती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य टकराव न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर भी व्यापक असर डाल सकता है।

    भारत सरकार लगातार इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। विदेश मंत्रालय संबंधित देशों के संपर्क में रहकर भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास कर रहा है। सरकार का कहना है कि विदेशों में कार्यरत भारतीयों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और आवश्यकता पड़ने पर हर आवश्यक राजनयिक कदम उठाया जाएगा। मौजूदा घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का प्रभाव केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा और भारतीय नागरिकों पर भी सीधे तौर पर पड़ सकता है।

  • E20 पेट्रोल विवाद पर केंद्र सरकार सख्त, राज्यों को मिलावटी ईंधन बेचने वालों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश, गुणवत्ता से समझौते पर जीरो टॉलरेंस

    E20 पेट्रोल विवाद पर केंद्र सरकार सख्त, राज्यों को मिलावटी ईंधन बेचने वालों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश, गुणवत्ता से समझौते पर जीरो टॉलरेंस


    नई दिल्ली ।
    देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर चल रही चर्चाओं और उपभोक्ताओं की शिकायतों के बीच केंद्र सरकार ने फ्यूल की गुणवत्ता को लेकर सख्त रुख अपनाया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने सभी राज्यों को स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए कहा है कि पेट्रोल में मिलावट, सप्लाई व्यवस्था में लापरवाही या गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। मंत्रालय ने ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है और स्पष्ट किया है कि सरकार की नीति इस विषय में पूरी तरह जीरो टॉलरेंस की है।

    सरकार का कहना है कि यदि किसी वाहन में ईंधन भरवाने के बाद तकनीकी समस्या सामने आती है तो हर मामले के लिए E20 पेट्रोल को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। मंत्रालय के अनुसार, कई बार पेट्रोल की गुणवत्ता में कमी, भंडारण व्यवस्था की खामियां, सप्लाई चेन में गड़बड़ी या ईंधन में मिलावट जैसी वजहों से वाहन प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए जांच का केंद्र वास्तविक कारण होना चाहिए, न कि मानकों के अनुरूप तैयार किए गए E20 ईंधन पर सीधे सवाल उठाना।

    केंद्र ने राज्यों को यह भी निर्देश दिया है कि पेट्रोल पंपों, भंडारण केंद्रों और वितरण व्यवस्था की नियमित निगरानी की जाए। यदि कहीं ईंधन में मिलावट, रखरखाव में लापरवाही या गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ तत्काल कानूनी कार्रवाई की जाए। हालांकि सरकार ने यह जानकारी साझा नहीं की है कि अब तक किन राज्यों में ऐसे मामले सामने आए हैं या कितनी कार्रवाई की गई है।

    सरकार ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि निर्धारित मानकों के अनुसार तैयार किया गया E20 पेट्रोल सुरक्षित है और इसका उद्देश्य स्वच्छ ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देना है। मंत्रालय के अनुसार, सही गुणवत्ता वाले E20 पेट्रोल से सामान्य परिस्थितियों में वाहनों को नुकसान नहीं होना चाहिए। यदि कहीं वाहन में खराबी आती है तो उसके पीछे फ्यूल की गुणवत्ता या वितरण प्रक्रिया से जुड़ी अन्य कमियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

    इधर, पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर कई वाहन मालिकों ने E20 पेट्रोल को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। कुछ लोगों ने दावा किया है कि इस ईंधन के उपयोग के बाद उनकी कार या बाइक का माइलेज कम हुआ है, जबकि कुछ ने इंजन की कार्यक्षमता प्रभावित होने, ईंधन प्रणाली पर असर पड़ने और वाहन के बीच रास्ते में बंद होने जैसी शिकायतें भी सामने रखी हैं। इन दावों के कारण आम उपभोक्ताओं के बीच E20 पेट्रोल को लेकर भ्रम और आशंकाएं बढ़ी हैं।

    इस मुद्दे ने राजनीतिक स्वरूप भी ले लिया है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने E20 पेट्रोल के विरोध में ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है। उन्होंने लोगों से इस अभियान से जुड़ने की अपील करते हुए कहा है कि सरकार को वाहन मालिकों की चिंताओं को गंभीरता से सुनना चाहिए और उन्हें विकल्प उपलब्ध कराने चाहिए। उनका आरोप है कि पर्याप्त तैयारी के बिना E20 पेट्रोल को लागू किया जा रहा है, जबकि बड़ी संख्या में लोग माइलेज घटने और वाहन संबंधी समस्याओं की शिकायत कर रहे हैं।

    केंद्र सरकार का कहना है कि स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण ईंधन उपलब्ध कराना उसकी प्राथमिकता है। इसी उद्देश्य से राज्यों को निगरानी मजबूत करने, मिलावट रोकने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि उपभोक्ताओं का भरोसा बना रहे और ईंधन की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके।