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  • पाकिस्तान के पूर्व बल्लेबाज का बड़ा दावा, विश्व कप जीत के बाद खिलाड़ियों में बढ़ी कप्तानी की होड़ और जिम्मेदारी हुई कमजोर

    पाकिस्तान के पूर्व बल्लेबाज का बड़ा दावा, विश्व कप जीत के बाद खिलाड़ियों में बढ़ी कप्तानी की होड़ और जिम्मेदारी हुई कमजोर

    नई दिल्ली । पाकिस्तान क्रिकेट टीम के मौजूदा प्रदर्शन और लगातार बदलते हालात को लेकर पूर्व बल्लेबाज मोहम्मद यूसुफ ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने टीम की मौजूदा स्थिति के पीछे कई कारणों का जिक्र करते हुए 2021 टी20 विश्व कप में भारत के खिलाफ मिली ऐतिहासिक जीत को एक अहम मोड़ बताया। यूसुफ के मुताबिक उस मुकाबले के बाद टीम के कुछ खिलाड़ियों में आत्मसंतुष्टि बढ़ी और आगे बेहतर प्रदर्शन के लिए जरूरी निरंतरता कमजोर पड़ गई।

    2021 के टी20 विश्व कप में पाकिस्तान ने भारत को 10 विकेट से हराया था। यह विश्व कप में भारत के खिलाफ पाकिस्तान की पहली जीत थी। मुकाबले में पाकिस्तान ने 152 रन का लक्ष्य बिना कोई विकेट गंवाए हासिल किया था। बाबर आजम ने नाबाद 68 रन और मोहम्मद रिजवान ने 79 रन की पारी खेलकर टीम को शानदार जीत दिलाई थी। उस समय इस सफलता को पाकिस्तान क्रिकेट के लिए बड़ी उपलब्धि माना गया था।

    हालांकि, मोहम्मद यूसुफ का मानना है कि इसी जीत के बाद टीम के भीतर अपेक्षाओं और रवैये में बदलाव आने लगा। उनका कहना है कि खिलाड़ियों को लगा कि उन्होंने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है, जबकि किसी भी टीम के लिए एक बड़ी जीत के बाद भी लगातार सुधार और मेहनत जरूरी होती है। उनके मुताबिक सफलता के बाद जमीन से जुड़े रहना और अपनी कमियों पर काम करते रहना बेहद महत्वपूर्ण है।

    यूसुफ ने खिलाड़ियों के रवैये पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अगर कोई खिलाड़ी अच्छे प्रदर्शन के बाद खुद को बहुत बड़ा समझने लगे और विरोधी टीम का सम्मान करना कम कर दे, तो इससे समस्याएं पैदा होती हैं। उनके मुताबिक पाकिस्तान क्रिकेट में पिछले कुछ वर्षों के दौरान ऐसी कई परेशानियां सामने आई हैं, जिनका असर टीम के प्रदर्शन पर दिखाई दिया।

    पूर्व क्रिकेटर ने टीम के भीतर कप्तानी को लेकर पैदा हुई प्रतिस्पर्धा को भी नुकसानदायक बताया। उनका दावा है कि 2021 की जीत के बाद टीम में कई लोग कप्तान बनने की कोशिश में लगे रहे। इससे खिलाड़ियों का ध्यान अपने प्रदर्शन और टीम की जरूरतों से हटकर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की तरफ गया।

    पाकिस्तान ने पिछले कुछ वर्षों में वनडे विश्व कप, टी20 विश्व कप, एशिया कप और चैंपियंस ट्रॉफी जैसे बड़े टूर्नामेंटों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं किया। लगातार अस्थिरता, कप्तानी में बदलाव और टीम संयोजन से जुड़े फैसलों ने भी पाकिस्तान क्रिकेट की मुश्किलें बढ़ाई हैं।

    यूसुफ ने क्रिकेट बोर्ड की भूमिका पर भी अपनी बात रखी। उनके अनुसार बोर्ड ने टीम को संभालने के लिए कई स्तरों पर बदलाव किए और अलग-अलग कोचों को जिम्मेदारी दी। इसके बावजूद अपेक्षित सुधार नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि आखिरकार बोर्ड को कुछ कड़े फैसले लेने पड़े और वह मौजूदा फैसलों का समर्थन करते हैं।

    उनकी टिप्पणियों से साफ है कि पाकिस्तान क्रिकेट की समस्या को वह केवल खिलाड़ियों के प्रदर्शन तक सीमित नहीं मानते। उनके मुताबिक टीम के भीतर अनुशासन, जिम्मेदारी, नेतृत्व और निरंतरता जैसे पहलुओं को मजबूत करना जरूरी है। पाकिस्तान क्रिकेट के लिए आगे की राह आसान नहीं है और टीम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पुरानी प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए प्रदर्शन के साथ-साथ सोच और कार्यशैली में भी सुधार करना होगा।

  • एशियन गेम्स 2026 में गोल्ड बचाने उतरेगा भारत, 2023 की चैंपियन टीम से पुरुष और महिला स्क्वॉड में कितना बदलाव हुआ

    एशियन गेम्स 2026 में गोल्ड बचाने उतरेगा भारत, 2023 की चैंपियन टीम से पुरुष और महिला स्क्वॉड में कितना बदलाव हुआ

    नई दिल्ली । एशियन गेम्स 2023 में क्रिकेट के मैदान पर भारत ने शानदार प्रदर्शन करते हुए पुरुष और महिला दोनों वर्गों में गोल्ड मेडल अपने नाम किए थे। अब 2026 में टीम इंडिया एक बार फिर उसी सफलता को दोहराने के इरादे से मैदान में उतरेगी। हालांकि चार साल के अंतराल में दोनों टीमों की तस्वीर काफी बदल गई है। पुरुष टीम में जहां बड़े पैमाने पर बदलाव हुआ है, वहीं महिला टीम अपेक्षाकृत ज्यादा स्थिर नजर आ रही है।

    पुरुष टीम की बात करें तो 2023 में भारत की कप्तानी ऋतुराज गायकवाड़ ने संभाली थी, लेकिन 2026 में टीम की कमान श्रेयस अय्यर के हाथों में है। 2023 की 15 सदस्यीय टीम में से सिर्फ पांच खिलाड़ी ही 2026 के स्क्वॉड में जगह बनाए रखने में सफल रहे हैं। तिलक वर्मा, शिवम दुबे, वॉशिंगटन सुंदर, रवि बिश्नोई और अर्शदीप सिंह अब भी टीम का हिस्सा हैं।

    इसके अलावा पुरुष टीम में 10 नए चेहरे शामिल किए गए हैं। बल्लेबाजी में श्रेयस अय्यर और युवा वैभव सूर्यवंशी जैसे नाम हैं। ऑलराउंड विभाग में अभिषेक शर्मा, नीतीश कुमार रेड्डी और अक्षर पटेल के विकल्प मौजूद हैं। विकेटकीपिंग की जिम्मेदारी संजू सैमसन और ईशान किशन संभाल सकते हैं। गेंदबाजी में जसप्रीत बुमराह, हर्षित राणा और वरुण चक्रवर्ती जैसे नाम टीम को अतिरिक्त मजबूती देते हैं।

    2023 में भारत ने पुरुष क्रिकेट के क्वार्टर फाइनल में नेपाल को 23 रन से हराया था। इसके बाद सेमीफाइनल में बांग्लादेश को नौ विकेट से मात दी। फाइनल में भारत का सामना अफगानिस्तान से हुआ, लेकिन बारिश के कारण भारतीय पारी शुरू नहीं हो सकी और मुकाबला नो रिजल्ट रहा। बेहतर वरीयता के आधार पर भारत को गोल्ड मेडल दिया गया था।

    2026 में पुरुष टीम अपना पहला मुकाबला 28 सितंबर को निसिन के कोरोगी स्पोर्ट्स पार्क में खेलेगी। बदली हुई टीम के सामने चुनौती पिछले प्रदर्शन को दोहराने के साथ नए खिलाड़ियों के तालमेल को मजबूत करने की होगी।

    महिला टीम में पुरुषों की तुलना में बदलाव थोड़ा कम है। 2023 की 15 सदस्यीय टीम में से छह खिलाड़ी 2026 के स्क्वॉड में बरकरार हैं। स्मृति मंधाना, शेफाली वर्मा, जेमिमा रोड्रिग्स, हरमनप्रीत कौर, दीप्ति शर्मा और ऋचा घोष अब भी टीम का हिस्सा हैं। सबसे अहम बात यह है कि हरमनप्रीत कौर इस बार भी टीम की कप्तान हैं।

    महिला टीम में बल्लेबाजी की मुख्य धुरी काफी हद तक वही है। गेंदबाजी विभाग में रेणुका सिंह ठाकुर, राधा यादव, श्री चरणी और क्रांति गौड़ जैसे विकल्प मौजूद हैं। विकेटकीपिंग में ऋचा घोष के साथ गुनालन कमलिनी नया विकल्प हैं।

    2023 में महिला टीम ने फाइनल में श्रीलंका को 19 रन से हराकर गोल्ड जीता था। इससे पहले सेमीफाइनल में भारत ने बांग्लादेश को आठ विकेट से मात दी थी। 2026 में महिला टीम अपने अभियान की शुरुआत 17 सितंबर को जापान के खिलाफ पहले क्वार्टर फाइनल से करेगी।

    कुल मिलाकर 2023 से 2026 के बीच पुरुष टीम में बदलाव ज्यादा बड़ा है, जबकि महिला टीम की मुख्य बल्लेबाजी और नेतृत्व संरचना काफी हद तक बरकरार है। दोनों टीमों के सामने अब बदले हुए स्क्वॉड के साथ एशियन गेम्स में भारत का दबदबा कायम रखने और लगातार दूसरी बार क्रिकेट में गोल्ड जीतने की चुनौती होगी।

  • JPN vs IND: पहली बार भारत से टी20 इंटरनेशनल खेलेगा जापान, जानिए टीम के स्टार खिलाड़ियों और बड़े रिकॉर्ड्स की पूरी कहानी

    JPN vs IND: पहली बार भारत से टी20 इंटरनेशनल खेलेगा जापान, जानिए टीम के स्टार खिलाड़ियों और बड़े रिकॉर्ड्स की पूरी कहानी

    नई दिल्ली । क्रिकेट के मैदान पर भारत और जापान की सीनियर पुरुष टीमें पहली बार टी20 इंटरनेशनल मुकाबले में आमने-सामने होने जा रही हैं। यह ऐतिहासिक मुकाबला 22 सितंबर 2026 को जापान के तोचिगी प्रांत स्थित सानो इंटरनेशनल क्रिकेट ग्राउंड पर खेला जाएगा। दोनों टीमों के बीच होने वाला यह मुकाबला जापानी क्रिकेट के लिए बेहद खास माना जा रहा है।

    भारत और जापान इससे पहले सीनियर पुरुष टी20 इंटरनेशनल क्रिकेट में आमने-सामने नहीं आए हैं। ऐसे में 22 सितंबर को होने वाला मुकाबला दोनों देशों के क्रिकेट इतिहास में नया अध्याय जोड़ेगा। यह मैच सुजुकी कप के तहत खेला जाएगा और एशियाई खेलों से पहले भारतीय टीम के लिए भी अहम मुकाबला होगा।

    जापान की क्रिकेट टीम भारत की तरह क्रिकेट की बड़ी ताकत नहीं है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में टीम ने टी20 क्रिकेट में लगातार अपनी स्थिति मजबूत की है। जापान ने अपना पहला टी20 इंटरनेशनल मुकाबला अक्टूबर 2022 में खेला था। इसके बाद टीम ने कई अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में अच्छा प्रदर्शन करते हुए अपनी पहचान बनाई है।

    जापानी टीम में केंडल कडोवाकी-फ्लेमिंग, सबाओरिश रविचंद्रन, लैकलन यामामोटो-लेक, इब्राहिम ताकाहाशी और डेक्लान सुजुकी जैसे खिलाड़ी अहम भूमिका निभाते हैं। बल्लेबाजी की बात करें तो केंडल कडोवाकी-फ्लेमिंग जापान के टी20 इंटरनेशनल क्रिकेट में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाजों में शामिल हैं। उनके नाम 1760 रन दर्ज हैं।

    सबाओरिश रविचंद्रन जापान के प्रमुख ऑलराउंड खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। उन्होंने बल्ले और गेंद दोनों से टीम को योगदान दिया है। टी20 इंटरनेशनल में जापान की ओर से सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाजों में भी उनका नाम सबसे ऊपर है। उनके नाम 54 विकेट दर्ज हैं।

    लैकलन यामामोटो-लेक भी जापानी क्रिकेट के प्रमुख बल्लेबाजों में शामिल रहे हैं। उनके नाम टी20 इंटरनेशनल में 825 रन दर्ज हैं। फरवरी 2024 में चीन के खिलाफ उन्होंने नाबाद 134 रन की शानदार पारी खेली थी। यह जापान की ओर से टी20 इंटरनेशनल क्रिकेट में सबसे बड़ा व्यक्तिगत स्कोर है।

    जापान के गेंदबाजी रिकॉर्ड में रियो सकुरानो-थॉमस का नाम भी खास है। उन्होंने फरवरी 2024 में थाईलैंड के खिलाफ 26 रन देकर छह विकेट हासिल किए थे। यह जापान की ओर से टी20 इंटरनेशनल क्रिकेट में सर्वश्रेष्ठ व्यक्तिगत गेंदबाजी प्रदर्शन है।

    इब्राहिम ताकाहाशी भी टीम के प्रमुख खिलाड़ियों में शामिल हैं। उन्होंने जापान के लिए टी20 इंटरनेशनल क्रिकेट में 623 रन बनाए हैं और गेंदबाजी में 40 विकेट भी हासिल किए हैं। वहीं माकोटो तानियामा के नाम 38 विकेट दर्ज हैं। ऐसे में जापानी टीम के पास भारत जैसी मजबूत टीम के सामने खुद को साबित करने के लिए कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी मौजूद हैं।

    भारत के खिलाफ मुकाबला जापान के खिलाड़ियों के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगा। भारतीय टीम के पास अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का लंबा अनुभव और विश्व स्तर के खिलाड़ी हैं। इसके बावजूद जापान अपने घरेलू मैदान पर बेहतर प्रदर्शन करने की कोशिश करेगा।

    यह मुकाबला भारत और जापान के बीच खेल संबंधों के लिए भी महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों से भी इस मैच को जोड़ा गया है। इस मुकाबले के जरिए जापान में क्रिकेट को और लोकप्रिय बनाने तथा दोनों देशों के बीच खेल सहयोग को मजबूत करने की कोशिश होगी।

    22 सितंबर को होने वाला भारत-जापान टी20 इंटरनेशनल मुकाबला इसलिए भी खास रहेगा क्योंकि पहली बार दोनों देशों की सीनियर पुरुष टीमें क्रिकेट के सबसे तेज लोकप्रिय प्रारूप में आमने-सामने होंगी। जापानी खिलाड़ियों के रिकॉर्ड और भारत की मजबूत टीम के बीच यह मुकाबला क्रिकेट प्रशंसकों के लिए एक नया और यादगार अध्याय बन सकता है।

  • ND vs PAK: भारत-पाकिस्तान के महामुकाबले की बढ़ सकती है संख्या, ICC ट्राई-सीरीज या चार टीमों वाले टूर्नामेंट पर कर रहा विचार

    ND vs PAK: भारत-पाकिस्तान के महामुकाबले की बढ़ सकती है संख्या, ICC ट्राई-सीरीज या चार टीमों वाले टूर्नामेंट पर कर रहा विचार

    नई दिल्ली । क्रिकेट फैन्स के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच मुकाबलों को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। दोनों पड़ोसी देशों के बीच क्रिकेट मुकाबले हमेशा से दर्शकों के लिए बेहद खास रहे हैं और अब आने वाले समय में इनके बीच ज्यादा मैच देखने का रास्ता खुल सकता है।

    भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से द्विपक्षीय क्रिकेट सीरीज नहीं खेली जा रही है। दोनों टीमें मुख्य रूप से बहुराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में आमने-सामने आती हैं। ऐसे में दोनों देशों के क्रिकेट फैन्स को भारत-पाकिस्तान मुकाबले के लिए बड़े टूर्नामेंट का इंतजार करना पड़ता है।

    अब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के कार्यक्रम को लेकर एक नए प्रारूप पर विचार किया जा रहा है। इसमें भारत और पाकिस्तान को एक साथ शामिल करते हुए ट्राई-सीरीज या चार टीमों वाली बहुराष्ट्रीय सीरीज आयोजित करने का विकल्प सामने आया है। इस तरह के आयोजन का उद्देश्य रोमांचक मुकाबलों के साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के व्यावसायिक आकर्षण को बढ़ाना भी हो सकता है।

    अगर इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया जाता है तो भारत और पाकिस्तान के बीच एक ही टूर्नामेंट में मुकाबले होने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि अभी इसे अंतिम कार्यक्रम या आधिकारिक तौर पर तय सीरीज नहीं माना जा सकता है। प्रस्तावित प्रारूप पर चर्चा और संभावनाओं के स्तर पर ही जानकारी सामने आई है।

    भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मुकाबलों की लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। दोनों टीमों के बीच होने वाला मैच दुनियाभर में बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित करता है। यही वजह है कि किसी भी बहुराष्ट्रीय टूर्नामेंट में दोनों टीमों के आमने-सामने आने पर मुकाबले को लेकर उत्साह काफी बढ़ जाता है।

    हाल के वर्षों में दोनों टीमों के बीच मुकाबले मुख्य रूप से आईसीसी और अन्य बहुराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक सीमित रहे हैं। ऐसे में अगर नया बहुराष्ट्रीय प्रारूप तैयार होता है और उसमें भारत तथा पाकिस्तान को जगह मिलती है, तो क्रिकेट प्रशंसकों को दोनों टीमों के बीच ज्यादा मुकाबले देखने का अवसर मिल सकता है।

    ट्राई-सीरीज के प्रारूप में तीन टीमें हिस्सा लेती हैं और टूर्नामेंट के दौरान एक-दूसरे के खिलाफ मुकाबले खेले जाते हैं। इसी तरह चार टीमों के प्रारूप में मुकाबलों की संख्या और संभावित कार्यक्रम को अलग तरीके से तैयार किया जा सकता है। भारत और पाकिस्तान की मौजूदगी ऐसे किसी आयोजन को दर्शकों के लिहाज से बेहद आकर्षक बना सकती है।

    फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह की किसी सीरीज को लेकर अंतिम घोषणा नहीं हुई है। प्रस्ताव पर आगे क्या फैसला लिया जाता है और भारत तथा पाकिस्तान को इसमें किस तरह शामिल किया जाता है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।

    अगर यह योजना आकार लेती है तो क्रिकेट फैन्स के लिए यह बड़ी खुशखबरी साबित हो सकती है। भारत-पाकिस्तान मुकाबले को लेकर हमेशा रहने वाला रोमांच नए बहुराष्ट्रीय प्रारूप के जरिए और बढ़ सकता है। इससे दोनों टीमों के बीच मुकाबलों की संख्या बढ़ने की संभावना भी मजबूत हो सकती है।

  • यूरोप के डीजल बाजार में भारत की पकड़ मजबूत, बाब-अल-मंदेब मार्ग से अगस्त में 60 प्रतिशत कार्गो भारतीय रिफाइनरियों से

    यूरोप के डीजल बाजार में भारत की पकड़ मजबूत, बाब-अल-मंदेब मार्ग से अगस्त में 60 प्रतिशत कार्गो भारतीय रिफाइनरियों से


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक ऊर्जा व्यापार में भारत की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है। रूस से डीजल आपूर्ति में आई बड़ी गिरावट और अमेरिका से निर्यात कमजोर पड़ने के बीच भारतीय रिफाइनरियां यूरोप की ईंधन जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बनकर उभरी हैं। ऊर्जा बाजार से जुड़े आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में बाब-अल-मंदेब समुद्री मार्ग से यूरोप पहुंचने वाले डीजल कार्गो का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा भारत की रिफाइनरियों से आया।

    अगस्त के दौरान यूरोप की ओर जाने वाले करीब दो लाख बैरल प्रतिदिन डीजल और गैसऑयल कार्गो ने बाब-अल-मंदेब मार्ग का इस्तेमाल किया। यह मात्रा पिछले वर्ष के आसपास ही रही। हालांकि इसी रणनीतिक समुद्री मार्ग पर मार्च और अप्रैल 2026 में आवाजाही लगभग ठप हो गई थी। ऐसे समय में भारतीय रिफाइनरियों ने यूरोप की पूर्वी ईंधन आपूर्ति शृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और वैकल्पिक स्रोत की जरूरत को पूरा करने में योगदान दिया।

    भारत की बढ़ती भूमिका का प्रमुख आधार उसका विशाल रिफाइनिंग नेटवर्क है। देश में वर्तमान में करीब 258.1 मिलियन टन सालाना की स्थापित तेल शोधन क्षमता है। इस क्षमता के मामले में भारत दुनिया के प्रमुख रिफाइनिंग केंद्रों में शामिल है। देश की रिफाइनिंग क्षमता घरेलू ईंधन मांग से अधिक होने के कारण भारतीय कंपनियों के पास पेट्रोलियम उत्पादों के बड़े पैमाने पर निर्यात की पर्याप्त गुंजाइश रहती है।

    वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत ने करीब 6.15 करोड़ टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया। इससे वैश्विक परिष्कृत ईंधन बाजार में भारत की स्थिति और मजबूत हुई है। यूरोप में डीजल की मांग के बीच प्रतिबंधों, रिफाइनरी व्यवधानों और व्यापार मार्गों में बदलाव ने वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की जरूरत बढ़ाई है। भारतीय रिफाइनरियों को इसका सीधा लाभ मिल रहा है।

    हालांकि यूरोपीय बाजार में भारत की बढ़ती हिस्सेदारी के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चिंता देश को मिलने वाले कच्चे तेल की उपलब्धता को लेकर है। अगस्त में भारत को मिलने वाले कच्चे तेल और कंडेनसेट की आपूर्ति लगातार दूसरे महीने घटकर करीब 38 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई। एक साल पहले यह मात्रा लगभग 48 लाख बैरल प्रतिदिन थी। कच्चे तेल की उपलब्धता घटने पर निर्यात के लिए तैयार किए जाने वाले पेट्रोलियम उत्पादों पर भी असर पड़ सकता है।

    दूसरी ओर रूस से यूरोप जाने वाले डीजल और गैसऑयल निर्यात में भारी गिरावट आई है। अगस्त के शुरुआती 25 दिनों में रूस का समुद्री ईंधन निर्यात औसतन करीब 1.5 लाख बैरल प्रतिदिन रहा। यह पिछले वर्ष के स्तर से लगभग 6.1 लाख बैरल प्रतिदिन कम है। रूस की रिफाइनिंग और निर्यात क्षमता पर ऊर्जा अवसंरचना को निशाना बनाकर किए गए हमलों का भी असर पड़ा है।

    रूस की ओर से सितंबर की शुरुआत से डीजल निर्यात संबंधी कुछ प्रतिबंधों में राहत दिए जाने के बावजूद यूरोप को तत्काल बड़ी मात्रा में अतिरिक्त रूसी आपूर्ति मिलने की संभावना सीमित मानी जा रही है। ऐसे में यदि रूसी आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित रहती है और यूरोप में डीजल की मांग मजबूत बनी रहती है तो भारतीय रिफाइनरियों के लिए निर्यात के अवसर और बढ़ सकते हैं।

    हालांकि भारत के सामने कच्चे तेल की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने और प्रतिस्पर्धी रिफाइनिंग मार्जिन कायम रखने की चुनौती होगी। यदि दोनों परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं तो यूरोप के ईंधन बाजार में भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ सकती है। यह बदलाव भारत की उस बदलती भूमिका को भी दर्शाता है जिसमें देश केवल बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखला का महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है।

  • संयुक्त राष्ट्र के नए मानचित्र प्रस्ताव पर भारत का स्पष्ट रुख, कहा संप्रभु क्षेत्र को गलत दिखाना किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं

    संयुक्त राष्ट्र के नए मानचित्र प्रस्ताव पर भारत का स्पष्ट रुख, कहा संप्रभु क्षेत्र को गलत दिखाना किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं

    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र महासभा में दुनिया के नक्शे को अधिक वास्तविक क्षेत्रफल के साथ प्रस्तुत करने वाले Equal Earth Projection को बढ़ावा देने वाले प्रस्ताव पर भारत ने अपना रुख स्पष्ट किया है। भारत ने प्रस्ताव के मूल उद्देश्य का समर्थन करते हुए कहा है कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व वास्तविक क्षेत्रफल के अनुरूप होना चाहिए। साथ ही भारत ने यह भी साफ किया कि उसके संप्रभु क्षेत्र को किसी भी गलत या भ्रामक तरीके से दिखाना स्वीकार्य नहीं है।

    संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को पेश किए गए प्रस्ताव के पक्ष में भारत समेत 164 देशों ने मतदान किया। छह देश मतदान से दूर रहे, जबकि अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। प्रस्ताव का उद्देश्य ऐसे मानचित्र प्रक्षेपण को बढ़ावा देना है, जिसमें विभिन्न महाद्वीपों और क्षेत्रों के क्षेत्रफल को पारंपरिक नक्शों की तुलना में वास्तविक अनुपात के अधिक करीब दिखाया जा सके।

    भारत के विदेश मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को लेकर स्पष्ट किया कि इसका संबंध किसी विशेष राजनीतिक मानचित्र को स्वीकार करने से नहीं है। भारत के अनुसार, समान-क्षेत्र वाले मानचित्र प्रक्षेपण का मूल उद्देश्य दुनिया के विभिन्न हिस्सों, विशेष रूप से अफ्रीका जैसे बड़े भूभागों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अनुरूप बेहतर प्रतिनिधित्व देना है।

    भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया है, लेकिन इसके साथ अपनी स्थिति भी स्पष्ट की। भारत ने जोर दिया कि प्रस्ताव किसी विशेष मानचित्र, मानचित्र प्रक्षेपण या किसी देश की अंतरराष्ट्रीय सीमा के चित्रण को प्रमाणित नहीं करता। इसका उद्देश्य मुख्य रूप से भौगोलिक क्षेत्रफल के प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाना है।

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भारत की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि देश के आधिकारिक मानचित्र और संप्रभु क्षेत्र से जुड़े विषयों पर भारत का रुख पूरी तरह स्पष्ट है। भारत के अनुसार, जम्मू-कश्मीर और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख समेत उसका संपूर्ण संप्रभु क्षेत्र आधिकारिक भारतीय मानचित्र के अनुरूप ही प्रदर्शित किया जाना चाहिए।

    भारत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच, प्रकाशन या मानचित्र में उसके क्षेत्र को गलत तरीके से प्रदर्शित नहीं किया जाना चाहिए। भारत का कहना है कि गलत या भ्रामक नक्शे उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े गंभीर विषय हैं। ऐसे चित्रण को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    इस पूरे मामले में मानचित्रों के राजनीतिक और भौगोलिक इस्तेमाल के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है। Equal Earth Projection जैसे मानचित्र प्रक्षेपण मुख्य रूप से पृथ्वी के अलग-अलग क्षेत्रों के आकार को तुलनात्मक रूप से सही ढंग से दिखाने पर केंद्रित होते हैं। इसके विपरीत राजनीतिक मानचित्र देशों की सीमाओं, विवादित क्षेत्रों और स्थानों के नामों को प्रदर्शित करते हैं।

    भारत ने इसी अंतर को रेखांकित करते हुए कहा है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव किसी राजनीतिक सीमा या विवादित क्षेत्र की स्थिति तय नहीं करता। इसलिए प्रस्ताव के समर्थन को भारत की सीमाओं से संबंधित किसी अलग राजनीतिक स्थिति के समर्थन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

    प्रस्ताव के पारित होने के बाद दुनिया के नक्शे में बदलाव को लेकर चर्चा तेज हुई है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं बदल गई हैं। यह पहल मुख्य रूप से मानचित्र प्रक्षेपण और भौगोलिक क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व से संबंधित है।

    भारत का संदेश इस मामले में दो हिस्सों में स्पष्ट है। एक ओर उसने वास्तविक क्षेत्रफल को बेहतर तरीके से दर्शाने वाले मानचित्र प्रक्षेपण के सिद्धांत का समर्थन किया है, वहीं दूसरी ओर अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े आधिकारिक मानचित्रण पर किसी भी तरह की गलत प्रस्तुति को अस्वीकार किया है। इसी रुख के साथ भारत ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए अपनी सीमा संबंधी स्थिति दोहराई है।

  • सिंधु के पानी के इस्तेमाल की भारत की नई तैयारी, लद्दाख में पहला रॉक चेक डैम तैयार, पाक को दिया झटका

    सिंधु के पानी के इस्तेमाल की भारत की नई तैयारी, लद्दाख में पहला रॉक चेक डैम तैयार, पाक को दिया झटका


    लेह। सिंधु नदी के पानी का स्थानीय स्तर पर अधिक से अधिक उपयोग करने की दिशा में लद्दाख में एक अहम परियोजना शुरू की गई है। उपशी में सिंधु नदी पर देश का पहला रॉक चेक डैम तैयार किया गया है। डैम में फिलहाल 10 फीट तक पानी जमा हो चुका है। परियोजना का उद्देश्य लद्दाख में जल उपलब्धता बढ़ाने के साथ खेती और स्थानीय जरूरतों के लिए पानी का बेहतर इस्तेमाल करना है।

    यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया था। इसके बाद भारत संधि के तहत आने वाली छह नदियों के जल का अपने हिस्से में अधिकतम उपयोग करने की दिशा में काम कर रहा है। सिंधु नदी भी इन्हीं नदियों में शामिल है।

    उपशी में तैयार डैम के जरिए स्थानीय स्तर पर पानी रोककर उसे लद्दाख की जरूरतों में इस्तेमाल किया जाएगा। इससे सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है और नदी का जो पानी बहाव के जरिए आगे चला जाता था, उसका एक हिस्सा स्थानीय उपयोग में आ सकेगा।

    56 करोड़ से ज्यादा की लागत, 36 और डैम प्रस्तावित

    उपशी का प्रोजेक्ट लद्दाख में प्रस्तावित बड़े जल संरक्षण अभियान का शुरुआती मॉडल है। सूत्रों के मुताबिक, सिंधु नदी पर 36 और रॉक चेक डैम बनाए जाने की योजना है। इसके लिए केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा गया है।

    प्रस्तावित परियोजना के तहत लेह में 7 हिमालयन रॉक चेक डैम और कारगिल में 29 चेक डैम बनाए जाएंगे। कारगिल जिले में सिंधु नदी बटालिक सेक्टर से होकर गुजरती है। सभी प्रस्तावित परियोजनाओं पर 56 करोड़ रुपए से अधिक खर्च होने का अनुमान है।

    सीमेंट-चूने के बजाय नदी के पत्थरों से निर्माण

    उपशी के रॉक चेक डैम की निर्माण तकनीक इसे पारंपरिक बांधों से अलग बनाती है। इसे तैयार करने में सीमेंट या चूने का इस्तेमाल नहीं किया गया है। नदी के तल से निकाले गए बड़े प्राकृतिक पत्थरों को आपस में इंटरलॉक कर संरचना तैयार की गई है।

    इस डैम की पानी जमा करने की क्षमता करीब 4 करोड़ लीटर है। अधिकारियों के मुताबिक, स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल कर तैयार की गई ऐसी संरचनाएं लद्दाख जैसे क्षेत्र में जल संरक्षण के लिए उपयोगी मॉडल साबित हो सकती हैं।

    10 फीट पानी जमा, नहर से खेतों तक पहुंचेगा

    लद्दाख में खेती के लिए पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती रही है। खासकर वसंत ऋतु में बुवाई के दौरान किसानों को पानी की कमी का सामना करना पड़ता है।

    उपशी डैम में जलस्तर 10 फीट तक पहुंचने के बाद इसे इगू फे नहर के जरिए आसपास के खेतों तक पहुंचाने की योजना है। इससे सिंचाई की सुविधा बढ़ेगी और खेती योग्य जमीन को पर्याप्त पानी मिलने की उम्मीद है।

    परियोजना के आगे बढ़ने के साथ लद्दाख के दूसरे इलाकों में भी इसी तरह की जल संरक्षण संरचनाएं विकसित करने की तैयारी है।

    पानी के स्थानीय इस्तेमाल पर बढ़ा फोकस

    उपशी का यह डैम केवल एक स्थानीय जल संरक्षण परियोजना नहीं, बल्कि सिंधु नदी तंत्र में भारत के अपने हिस्से के पानी के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में उठाया गया कदम भी है। आने वाले समय में प्रस्तावित 36 अन्य डैमों पर काम आगे बढ़ता है तो लद्दाख में सिंचाई, स्थानीय जल उपलब्धता और कृषि गतिविधियों को इसका लाभ मिल सकता है।

  • 5 करोड़ की धोखाधड़ी का आरोपी भारत में गिरफ्तार, अमेरिका के मोस्ट वॉन्टेड फ्रॉड पर था 1.25 करोड़ का इनाम

    5 करोड़ की धोखाधड़ी का आरोपी भारत में गिरफ्तार, अमेरिका के मोस्ट वॉन्टेड फ्रॉड पर था 1.25 करोड़ का इनाम


    नई दिल्ली। अमेरिकी सरकारी योजनाओं में करीब 6 लाख डॉलर यानी लगभग 5 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के आरोपी मंजीत सिंह बेदी को भारत में गिरफ्तार किया गया है। अमेरिका की जांच एजेंसी FBI की मोस्ट वॉन्टेड सूची में शामिल बेदी की गिरफ्तारी पर 1.5 लाख डॉलर यानी करीब 1.25 करोड़ रुपए का इनाम घोषित था।

    FBI निदेशक काश पटेल ने खुद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर बेदी की गिरफ्तारी की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि माना जा रहा है कि बेदी पिछले साल अमेरिका से भागकर भारत पहुंचा था। FBI अब उसे अमेरिका वापस लाने की प्रक्रिया पर काम कर रही है।

    पटेल के मुताबिक करीब तीन महीने पहले नई मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट जारी होने के बाद गिरफ्तार किया गया बेदी पांचवां बड़ा जालसाज है। उनके अनुसार अब तक पकड़े गए इन आरोपियों पर सामूहिक रूप से 2 अरब डॉलर से ज्यादा की धोखाधड़ी का आरोप है। ये आरोपी गिरफ्तारी से पहले कुल मिलाकर करीब 4000 दिनों तक फरार रहे थे।

    किराना स्टोर की आड़ में SNAP कार्ड से फ्रॉड

    FBI के मुताबिक मंजीत सिंह बेदी वॉशिंगटन के टैकोमा में एक छोटी किराना दुकान चलाता था। आरोप है कि उसने अमेरिका के ‘सप्लीमेंटल न्यूट्रिशन असिस्टेंस प्रोग्राम’ यानी SNAP के तहत मिलने वाले सरकारी बेनिफिट कार्ड का गलत इस्तेमाल किया।

    जांच एजेंसी के अनुसार बेदी ग्राहकों के SNAP कार्ड से रकम काट लेता था, लेकिन उसके बदले उन्हें राशन देने के बजाय नकद पैसे देता था। इस लेनदेन में वह कुल रकम का करीब आधा हिस्सा अपने पास रख लेता था।

    FBI का आरोप है कि मार्च 2024 से जून 2025 के बीच बेदी ने अमेरिकी सरकार को कम से कम 6 लाख डॉलर का नुकसान पहुंचाया। उसके खिलाफ वायर फ्रॉड और SNAP बेनिफिट्स फ्रॉड समेत कई आरोप दर्ज किए गए हैं।

    पासपोर्ट जमा करने के आदेश के बावजूद भागा

    मामला दर्ज होने के बाद अदालत ने बेदी को तत्काल गिरफ्तार करने के बजाय तय शर्तों पर बाहर रहने की अनुमति दी थी। उसे अपना पासपोर्ट जमा करने और वॉशिंगटन राज्य की सीमा में रहने का आदेश दिया गया था।

    हालांकि, आरोप है कि बेदी इन शर्तों का उल्लंघन कर कार से कनाडा की सीमा पार कर गया। इसके बाद वह कनाडा से भारत पहुंच गया। उसके फरार होने के बाद अमेरिकी जिला अदालत ने 21 मई को उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया था। अब भारत में उसकी गिरफ्तारी के बाद FBI उसे अमेरिका वापस लाने की प्रक्रिया में जुटी है।

  • दुनिया के 64 देशों में आबादी का ग्राफ नीचे, चीन-जापान से लेकर यूरोप तक असर, भारत के लिए भी बड़ा संकेत

    दुनिया के 64 देशों में आबादी का ग्राफ नीचे, चीन-जापान से लेकर यूरोप तक असर, भारत के लिए भी बड़ा संकेत


    नई दिल्ली। कभी बढ़ती आबादी को दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था। आशंका थी कि लगातार बढ़ते इंसानों के दबाव में धरती के संसाधन कम पड़ जाएंगे। लेकिन अब जनसंख्या को लेकर तस्वीर तेजी से बदल रही है। दुनिया के 64 देश और क्षेत्र ऐसे हैं, जहां आबादी अपने उच्चतम स्तर यानी ‘पीक पॉपुलेशन’ को पार कर चुकी है और अब लगातार घट रही है। यह बदलाव किसी महामारी, युद्ध या प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं, बल्कि लोगों की जीवनशैली, परिवार और बच्चों को लेकर बदलती सोच का परिणाम है।

    इन 64 देशों में केवल छोटे या संकटग्रस्त देश ही नहीं हैं। चीन जैसी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था भी इस बदलाव का सामना कर रही है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला चीन अपने जनसंख्या शिखर को पार कर चुका है और अब वहां आबादी हर साल कम हो रही है। दक्षिण कोरिया में फर्टिलिटी रेट करीब 0.72 रह गई है। मौजूदा रुझान जारी रहा तो इस सदी के अंत तक उसकी आबादी आधे से भी कम रह सकती है। जापान और थाईलैंड भी इसी दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं।

    कौन-कौन से देश आबादी के शिखर से आगे निकल चुके?

    महाद्वीपों के हिसाब से देखें तो पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में चीन, हांगकांग, ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड इस चरण में पहुंच चुके हैं।

    यूरोप में इटली, जर्मनी, स्पेन, पोलैंड, यूक्रेन, रूस और ऑस्ट्रिया की आबादी अपने उच्चतम स्तर को पार कर चुकी है। कैरिबियन और लैटिन अमेरिका में क्यूबा, प्यूर्टो रिको, जमैका, उरुग्वे, डोमिनिका, मार्टिनिक, गुआदेलूप, कुराकाओ, मोंटसेराट, सेंट किट्स एंड नेविस, सेंट मार्टिन, सेंट विंसेंट एंड द ग्रेनेडींस, यूएस वर्जिन आइलैंड्स और फॉकलैंड आइलैंड्स जैसे क्षेत्र भी इस सूची में शामिल हैं।

    यूरोप और जापान इस बदलाव को काफी पहले महसूस करना शुरू कर चुके थे। जापान में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या का असर बाजार तक में दिखाई देता है। वहां बच्चों के खिलौनों और डायपर की तुलना में बुजुर्गों के डायपर की बिक्री अधिक हो गई है। बच्चों की संख्या घटने से हजारों स्कूल बंद हो चुके हैं। पोलैंड, रोमानिया और बुल्गारिया जैसे पूर्वी यूरोपीय देशों में कम जन्मदर के साथ युवाओं का दूसरे देशों की ओर पलायन भी आबादी घटने की बड़ी वजह है।

    2.1 बच्चे भी नहीं हो रहे पैदा

    किसी देश की आबादी को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने के लिए प्रति महिला औसतन 2.1 बच्चों की जरूरत मानी जाती है। इसे ‘रिप्लेसमेंट रेट’ कहा जाता है। लेकिन दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी ऐसे देशों में रह रही है, जहां प्रजनन दर इस स्तर से काफी नीचे जा चुकी है।

    इसके पीछे आर्थिक और सामाजिक दोनों कारण हैं। महानगरों में घर, बच्चों की परवरिश, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च परिवारों के फैसलों को प्रभावित कर रहा है। कई दंपती एक से ज्यादा बच्चे की जिम्मेदारी उठाने से बच रहे हैं। दूसरी ओर महिलाओं की शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़े हैं। करियर को प्राथमिकता देना, देर से शादी करना या बच्चे न पैदा करने का फैसला अब पहले की तुलना में अधिक स्वीकार्य हो रहा है। इन सामाजिक बदलावों का सीधा असर जनसंख्या के आंकड़ों पर पड़ रहा है।

    बाकी दुनिया के लिए खतरे की घंटी

    आज जिन देशों में आबादी बढ़ रही है, उनके लिए यह बदलाव भविष्य का संकेत है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार 2050 का दशक आते-आते ब्राजील, मैक्सिको और अर्जेंटीना जैसे दक्षिण अमेरिकी देश भी अपने जनसंख्या शिखर के करीब पहुंच जाएंगे।

    भारत के लिए यह मोड़ 2060 के दशक में आने का अनुमान है। वर्तमान में दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश भारत उस दशक में करीब 170 करोड़ की आबादी के साथ अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच सकता है। इसके बाद यहां भी आबादी घटने का दौर शुरू होने का अनुमान है।

    पूरी दुनिया के स्तर पर जनसंख्या का शिखर करीब 2084 में दिखाई दे सकता है। तब वैश्विक आबादी लगभग 10.3 अरब तक पहुंचकर अपने उच्चतम स्तर पर होगी और इसके बाद मानव इतिहास में पहली बार दुनिया की कुल आबादी का ग्राफ लगातार नीचे जाने लगेगा।

    अमेरिका की आबादी क्यों नहीं घट रही?

    कम जन्मदर के बावजूद अमेरिका फिलहाल इस संकट से उसी तरह प्रभावित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक इस सदी के अंत तक भी अमेरिका अपनी आबादी के शिखर पर नहीं पहुंचेगा। इसकी बड़ी वजह इमिग्रेशन है। अमेरिका में हर साल बड़ी संख्या में विदेशी युवा पहुंचते हैं और वहां बसते हैं। इससे कम जन्मदर के कारण पैदा हुई आबादी की कमी काफी हद तक पूरी हो जाती है।

    कम लोग, लेकिन ज्यादा बुजुर्ग

    आबादी घटने का सबसे बड़ा असर रोजगार बाजार पर पड़ेगा। कामकाजी उम्र की आबादी कम होने पर कंपनियों को कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल तेजी से बढ़ेगा।

    दूसरी चुनौती पेंशन और हेल्थकेयर की होगी। टैक्स देने वाले युवा कम होंगे, जबकि पेंशन और इलाज पर निर्भर बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी। इसका मतलब सरकारों के राजस्व पर दबाव और सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ता खर्च होगा।

    इमिग्रेशन बनेगा आर्थिक ताकत का आधार

    भविष्य में वे देश ज्यादा मजबूत स्थिति में रह सकते हैं, जो विदेशी युवाओं और कुशल कामगारों को अपने यहां आने और बसने के अवसर देंगे। इसके उलट जिन देशों की सीमाएं प्रवासियों के लिए बंद रहेंगी, उन्हें कामकाजी आबादी की कमी और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

    भारत के पास डेमोग्राफिक डिविडेंड का सीमित समय

    भारत और अफ्रीकी देशों के लिए यह बदलाव खास संदेश लेकर आया है। युवा आबादी इन देशों की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन इस ताकत का फायदा हमेशा नहीं रहेगा। अगले 20-30 साल डेमोग्राफिक डिविडेंड का लाभ उठाने के लिहाज से बेहद अहम हैं।

    अगर इस अवधि में युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, जरूरी स्किल और पर्याप्त रोजगार नहीं मिल पाया, तो आबादी घटने का दौर शुरू होने से पहले देश अपेक्षित आर्थिक समृद्धि हासिल नहीं कर पाएंगे।

    दुनिया के 64 देशों में खाली होते स्कूल, बुजुर्ग होती आबादी और बदलती शहरों की तस्वीर बता रही है कि 21वीं सदी की चुनौती अब केवल जनसंख्या को नियंत्रित करना नहीं है। असली चुनौती ऐसी दुनिया के लिए तैयारी करना है, जहां इंसान कम और उम्रदराज आबादी ज्यादा होगी। जिन देशों की नीतियां इस बदलाव के मुताबिक समय रहते बदल जाएंगी, उनके लिए घटती आबादी संकट के बजाय नई आर्थिक ताकत बन सकती है।

  • इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने से पहले खाद्य सुरक्षा, पानी और किसानों की आय पर असर का आकलन जरूरी, विशेषज्ञ ने नीति बदलाव सुझाए

    इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने से पहले खाद्य सुरक्षा, पानी और किसानों की आय पर असर का आकलन जरूरी, विशेषज्ञ ने नीति बदलाव सुझाए

    नई दिल्ली । कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने भारत की कृषि नीति में व्यापक बदलाव की जरूरत बताते हुए कहा है कि इथेनॉल उत्पादन, उर्वरक सब्सिडी और कृषि व्यापार जैसे मुद्दों पर केवल तत्काल आर्थिक लाभ को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। उनके अनुसार नीति निर्माण में खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और पर्यावरणीय स्थिरता को समान प्राथमिकता देना जरूरी है।

    शर्मा ने इथेनॉल उत्पादन के तेजी से विस्तार को लेकर विशेष चिंता जताई है। उनका कहना है कि गन्ने के साथ मक्का और चावल जैसी फसलों का इस्तेमाल भी इथेनॉल उत्पादन में बढ़ रहा है। ऐसे में यह आकलन जरूरी है कि कृषि उपज का कितना हिस्सा भोजन से ईंधन की ओर सुरक्षित रूप से मोड़ा जा सकता है। उनके मुताबिक इस बदलाव का असर खाद्य उपलब्धता, पानी की मांग और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में फसल पैटर्न पर पड़ सकता है।

    उनका तर्क है कि चीनी क्षेत्र में मौजूदा परिस्थितियों को केवल मौसम, सूखे या फसल संबंधी बीमारियों से नहीं जोड़ा जा सकता। चीनी को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने की नीति को भी व्यापक तस्वीर में देखना होगा। भारत में इथेनॉल मिश्रण को ऊर्जा सुरक्षा और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने के उपाय के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन किसानों को इससे मिलने वाले प्रत्यक्ष लाभ पर भी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए।

    शर्मा ने मक्का की कीमतों का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी कृषि उत्पाद की मांग इथेनॉल के कारण बढ़ती है, तो उसका लाभ किसानों तक पहुंचना चाहिए। उनका कहना है कि कई मौकों पर किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। इसलिए इथेनॉल नीति में किसानों की आय और न्यूनतम समर्थन मूल्य की सुरक्षा को भी शामिल किया जाना चाहिए।

    उन्होंने ब्राजील के मॉडल को भारत में बिना परिस्थितियों का आकलन किए लागू करने से सावधान किया है। उनके अनुसार भारत में जमीन, पानी और खाद्य जरूरतों की स्थिति अलग है। इसलिए ऐसी इथेनॉल रणनीति बननी चाहिए जो ऊर्जा सुरक्षा के साथ खाद्य सुरक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलन को बनाए रखे।

    फर्टिलाइजर सब्सिडी को लेकर भी शर्मा ने पुनर्विचार की जरूरत बताई। उनका कहना है कि रासायनिक उर्वरकों पर लंबे समय तक निर्भरता ने पोषक तत्वों के असंतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है। उनका सुझाव है कि सब्सिडी व्यवस्था को अचानक समाप्त करने के बजाय धीरे-धीरे टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल खेती की दिशा में बढ़ाया जाए।

    उन्होंने प्रत्यक्ष आय सहायता को कृषि नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की वकालत की। हालांकि, इसके लिए किराए पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसानों की पहचान और उन्हें योजनाओं का लाभ पहुंचाना बड़ी चुनौती है। उनका मानना है कि सरकारी सहायता वास्तविक खेती करने वाले व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए।

    न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुद्दे पर शर्मा ने किसानों के लिए भरोसेमंद मूल्य सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत बताई। उनके अनुसार केवल बाजार की शक्तियों पर निर्भर रहने से किसानों की आय में स्थिरता नहीं आ सकती। उत्पादन बढ़ने के बावजूद यदि किसान को बाजार में उचित कीमत नहीं मिलती, तो रिकॉर्ड उत्पादन का लाभ उसकी आमदनी में दिखाई नहीं देता।

    उन्होंने कहा कि भारत की कृषि नीति का लक्ष्य केवल अधिक उत्पादन हासिल करना नहीं होना चाहिए। किसानों की वास्तविक कमाई, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और खाद्य सुरक्षा को केंद्र में रखकर नीतियां तैयार करना जरूरी है। उनके मुताबिक दीर्घकालिक कृषि विकास के लिए इथेनॉल, सब्सिडी और व्यापार नीतियों के बीच बेहतर संतुलन बनाना समय की जरूरत है।