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  • स्पाइसजेट को कोर्ट से बड़ा झटका, रियल एस्टेट निवेश में रिकॉर्ड 37% उछाल

    स्पाइसजेट को कोर्ट से बड़ा झटका, रियल एस्टेट निवेश में रिकॉर्ड 37% उछाल

    नई दिल्ली। देश के बिजनेस सेक्टर में एक ही दिन दो अलग-अलग तरह की खबरें सामने आई हैं, जिनमें एक तरफ विमानन क्षेत्र की कंपनी को कानूनी झटका लगा है, तो दूसरी तरफ रियल एस्टेट बाजार में निवेश में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। यह दोनों घटनाएं भारतीय अर्थव्यवस्था के दो अलग-अलग रुझानों को दर्शाती हैं।

    विमानन क्षेत्र की प्रमुख कंपनी स्पाइसजेट और उसके प्रमोटर को अदालत से बड़ा झटका लगा है। कंपनी की ओर से दायर की गई एक पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया गया है। इसके साथ ही अदालत ने कंपनी और उसके प्रमोटर पर जुर्माना भी लगाया है। इससे पहले दिए गए आदेश में कंपनी को एक बड़ी राशि जमा करने के निर्देश दिए गए थे, जिसे लेकर पुनर्विचार की मांग की गई थी, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया।

    कंपनी की ओर से यह दलील दी गई थी कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और आर्थिक दबावों के कारण उनकी वित्तीय स्थिति प्रभावित हुई है। साथ ही कुछ संपत्तियों को सुरक्षा के रूप में देने का प्रस्ताव भी रखा गया था, लेकिन अदालत ने इन तर्कों को पर्याप्त नहीं माना। इस फैसले के बाद कंपनी पर वित्तीय दबाव और बढ़ गया है।

    दूसरी ओर रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़ी रिपोर्ट में सकारात्मक संकेत सामने आए हैं। आंकड़ों के अनुसार 2026 की पहली तिमाही में इस क्षेत्र में निवेश में 37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है और कुल निवेश 1.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यह बढ़ोतरी दर्शाती है कि निवेशकों का भरोसा इस क्षेत्र में लगातार मजबूत हो रहा है।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बड़ी संपत्तियों की खरीद-फरोख्त में उल्लेखनीय तेजी देखी गई है। निवेशक अब स्थिर और आय देने वाली संपत्तियों की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। खासकर वाणिज्यिक संपत्तियों में निवेश बढ़ने से बाजार में स्थिरता और विकास दोनों का संकेत मिल रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत का रियल एस्टेट बाजार मजबूत स्थिति में बना हुआ है। घरेलू और विदेशी दोनों तरह के निवेशकों की रुचि बढ़ने से इस सेक्टर में आगे भी विस्तार की संभावना है। लगातार बढ़ता निवेश यह दिखाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक भरोसा कायम है।

    कुल मिलाकर एक तरफ स्पाइसजेट को कानूनी और वित्तीय चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश की तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था के सकारात्मक पक्ष को दर्शा रही है। दोनों घटनाएं मिलकर देश के कारोबारी माहौल की एक संतुलित तस्वीर पेश करती हैं, जिसमें चुनौतियां भी हैं और मजबूत अवसर भी लगातार बन रहे हैं।

  • भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में स्थिर सुधार, अप्रैल में PMI ने दिखाया मजबूत प्रदर्शन

    भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में स्थिर सुधार, अप्रैल में PMI ने दिखाया मजबूत प्रदर्शन

    नई दिल्ली।भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर लगातार मजबूती की ओर बढ़ रहा है और ताजा आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि औद्योगिक गतिविधियों में स्थिर सुधार देखा जा रहा है। अप्रैल महीने में मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी पीएमआई बढ़कर 54.7 पर पहुंच गया, जो पिछले महीने के 53.9 की तुलना में बेहतर प्रदर्शन को दर्शाता है। यह वृद्धि मुख्य रूप से नए ऑर्डर में बढ़ोतरी, उत्पादन में तेजी और रोजगार के अवसरों में सुधार के कारण सामने आई है।
    अप्रैल के आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है। खासकर निर्यात के क्षेत्र में सुधार देखने को मिला है, जहां पिछले कई महीनों की तुलना में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई है। इसका संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ रही है, जिससे उद्योग जगत को नई ऊर्जा मिल रही है।
    हालांकि, इस सकारात्मक रुझान के साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। वैश्विक स्तर पर जारी तनाव और अनिश्चितताओं, विशेषकर मध्य पूर्व में चल रहे हालात, का असर लागत पर दिखाई दे रहा है। इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी हुई है, जिससे उत्पादन खर्च में भी इजाफा दर्ज किया गया है। इसके साथ ही आउटपुट कीमतों में भी तेजी देखी गई है, जो पिछले कई महीनों में सबसे अधिक मानी जा रही है।
    इसके बावजूद उत्पादन गतिविधियां स्थिर बनी हुई हैं। कंपनियों ने बताया है कि घरेलू मांग और विज्ञापन गतिविधियों ने बिक्री और उत्पादन को समर्थन दिया है। हालांकि, प्रतिस्पर्धा का दबाव और कुछ ग्राहकों द्वारा ऑर्डर को अंतिम रूप देने में देरी के कारण विकास की गति थोड़ी प्रभावित हुई है।
    उद्योग जगत के प्रतिभागियों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों के बावजूद भविष्य को लेकर भरोसा बना हुआ है। कंपनियां आने वाले महीनों में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही हैं और नए निवेश तथा उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर ध्यान दे रही हैं। हालांकि, इस विश्वास में पिछले महीने की तुलना में हल्की कमी जरूर देखी गई है, लेकिन यह अभी भी एक सकारात्मक स्तर पर बना हुआ है।
    कुल मिलाकर भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर एक स्थिर और मजबूत विकास पथ पर आगे बढ़ रहा है। घरेलू मांग, निर्यात में सुधार और उत्पादन गतिविधियों की निरंतरता इस वृद्धि के प्रमुख आधार हैं। यदि वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं, तो आने वाले समय में इस क्षेत्र में और भी मजबूती देखने को मिल सकती है।
  • हॉर्मुज संकट के बीच भारत की बड़ी कामयाबी: 45 हजार टन LPG लेकर ‘सर्व शक्ति’ ने तोड़ी नाकेबंदी

    हॉर्मुज संकट के बीच भारत की बड़ी कामयाबी: 45 हजार टन LPG लेकर ‘सर्व शक्ति’ ने तोड़ी नाकेबंदी


    नई दिल्ली। हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और नाकेबंदी के बीच भारत के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। अमेरिका-ईरान तनातनी के कारण जहां इस अहम समुद्री रास्ते पर जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो चुकी है, वहीं भारत से जुड़ा एलपीजी टैंकर ‘सर्व शक्ति’ सफलतापूर्वक इस खतरनाक मार्ग को पार कर आगे बढ़ गया है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर संकट गहराता जा रहा है और भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए हर शिपमेंट बेहद अहम बन चुका है।

    मरीन ट्रैफिक डेटा के मुताबिक करीब 45 हजार टन एलपीजी लेकर चल रहा यह टैंकर ईरान के लारक और क़ेश्म द्वीप के पास से तय मार्ग का पालन करते हुए ओमान की खाड़ी में दाखिल हुआ। जहाज पर 18 भारतीय चालक दल के सदस्य मौजूद हैं और यह विशाखापत्तनम की ओर बढ़ रहा है। इस पूरे ऑपरेशन को इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि अमेरिकी नाकेबंदी के बाद यह भारत से जुड़ा पहला बड़ा एलपीजी टैंकर है जिसने हॉर्मुज का रास्ता पार किया है।

    इस कार्गो को सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने खरीदा है, हालांकि कंपनी ने आधिकारिक तौर पर कोई बयान नहीं दिया है। लेकिन ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि इस शिपमेंट का सुरक्षित पहुंचना भारत के लिए बड़ी रणनीतिक सफलता है, क्योंकि मिडिल ईस्ट से सप्लाई बाधित होने के कारण देश में एलपीजी की उपलब्धता पर दबाव बना हुआ है।

    दरअसल, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता है। ऐसे में हॉर्मुज जैसे संवेदनशील मार्ग पर रुकावट का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है। हाल के दिनों में सप्लाई में कमी के चलते कई जगहों पर घबराहट, लंबी कतारें और सीमित वितरण जैसी स्थिति देखने को मिली। यही वजह है कि सरकार ने एलपीजी टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर ईरान से बातचीत तेज की और वैकल्पिक व्यवस्थाएं भी शुरू कीं।

    बताया जा रहा है कि भारत अब तक इस संकट के बीच कम से कम आठ एलपीजी जहाजों को सुरक्षित निकालने में सफल रहा है। साथ ही घरेलू उत्पादन को भी तेजी से बढ़ाया गया है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी के मुताबिक देश में उत्पादन बढ़ाकर करीब 54 हजार टन प्रतिदिन कर दिया गया है, जबकि खपत को संतुलित करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।

    हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरना तकनीकी रूप से भी चुनौतीपूर्ण होता है। सामान्य हालात में यह सफर 10 से 14 घंटे का होता है, लेकिन मौजूदा तनाव के बीच इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप, लोकेशन गड़बड़ी और सुरक्षा जोखिमों के कारण यह और जटिल हो गया है। कई जहाज ट्रैकिंग से बचने के लिए अपने ट्रांसपोंडर तक बंद कर देते हैं।

    इन सभी चुनौतियों के बीच ‘सर्व शक्ति’ का सुरक्षित पारगमन न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए राहत भरी खबर है, बल्कि यह भी दिखाता है कि संकट के दौर में कूटनीति, रणनीति और लॉजिस्टिक्स के दम पर देश अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम है। आने वाले दिनों में हॉर्मुज की स्थिति कैसी रहती है, इस पर भारत की ऊर्जा आपूर्ति और बाजार की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।

  • इस साल भारत में चुनौतीपूर्ण रहेगा मानसून…. WMO की चेतावनी- औसत से कम होगी बारिश

    इस साल भारत में चुनौतीपूर्ण रहेगा मानसून…. WMO की चेतावनी- औसत से कम होगी बारिश


    नई दिल्ली।
    दक्षिण एशिया (South Asia), विशेषकर भारत (India) के लिए 2026 का मानसून (Monsoon) चुनौतीपूर्ण रहने के संकेत दे रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) (World Meteorological Organization -WMO). के अनुसार जून से सितंबर के बीच मानसूनी वर्षा (Monsoon Rain) औसत से कम रह सकती है, जबकि दिन और रात दोनों समय तापमान सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है।

    भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने भी 13 अप्रैल 2026 को जारी अपने पहले दीर्घावधि पूर्वानुमान में मानसून के सामान्य से कमजोर रहने की आशंका जताई है। ऐसे में कम बारिश और बढ़ती गर्मी का संयुक्त प्रभाव कृषि, जल संसाधनों और आम जीवन पर व्यापक दबाव डाल सकता है। मानसून की कमी का सबसे अधिक असर मध्य भारत के कृषि प्रधान क्षेत्रों में दिख सकता है, जहां वर्षा सामान्य से कम रहने की आशंका है।


    कई राज्यों में सामान्य से ज्यादा बारिश की संभावना

    हालांकि उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य या सामान्य से अधिक बारिश संभव है, लेकिन पूरे क्षेत्र में वर्षा का वितरण असमान रहने की संभावना है। दक्षिण एशिया में कुल सालाना वर्षा का लगभग 75 से 90 प्रतिशत हिस्सा जून से सितंबर के बीच होता है। ऐसे में इस अवधि में कमी का सीधा असर खेती, जल उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। मानसून को लेकर अनिश्चितता ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान में बुवाई की तैयारी कर रहे किसानों के लिए शुरुआती संकेत अनुकूल नहीं हैं।


    सूखे की आशंका के साथ बाढ़ का भी जोखिम

    डब्ल्यूएमओ के अनुसार 2026 में मानसून का स्वरूप असंतुलित रह सकता है, जिसमें एक ओर लंबे सूखे दौर की संभावना है तो दूसरी ओर कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ सकती हैं। ऐसी स्थिति बाढ़ का खतरा भी बढ़ा सकती है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार दक्षिण एशिया में अधिकतम और न्यूनतम दोनों तापमान सामान्य से ऊपर रहने की संभावना है। इसका अर्थ है कि दिन के साथ-साथ रात में भी गर्मी से राहत नहीं मिलेगी। लगातार उच्च तापमान लू की घटनाओं को बढ़ा सकता है, जिससे बुजुर्गों, बच्चों और कमजोर वर्गों के लिए स्वास्थ्य जोखिम बढ़ेंगे। इसके साथ ही कूलिंग की मांग बढ़ने से बिजली व्यवस्था पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।


    अल नीनो रहेगा प्रभावी

    डब्ल्यूएमओ के अनुसार 2026 के मानसून पर अल नीनो का प्रभाव पड़ सकता है। अल नीनो एक ऐसी जलवायु प्रक्रिया है जिसमें प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है, जिससे वैश्विक स्तर पर हवाओं और मौसम के पैटर्न में बदलाव आता है। इसका प्रभाव भारतीय मानसून को कमजोर करने के रूप में देखा जाता है।

    वैज्ञानिकों के अनुसार फिलहाल स्प्रिंग प्रेडिक्टेबिलिटी बैरियर का प्रभाव भी बना हुआ है। यह मार्च से मई के बीच का वह दौर होता है जब समुद्र और वायुमंडल में तेजी से बदलाव होते हैं, जिससे लंबी अवधि के मौसम पूर्वानुमान पूरी तरह सटीक नहीं रह पाते।

  • Hangor Submarine Deal: चीन ने पाकिस्तान को सौंपी पहली हैंगोर पनडुब्बी, भारत का P75-I प्रोजेक्ट अभी भी अटका, समंदर में बढ़ी नौसेना की रेस

    Hangor Submarine Deal: चीन ने पाकिस्तान को सौंपी पहली हैंगोर पनडुब्बी, भारत का P75-I प्रोजेक्ट अभी भी अटका, समंदर में बढ़ी नौसेना की रेस



    नई दिल्ली। चीन और पाकिस्तान के बीच पनडुब्बी साझेदारी ने दक्षिण एशिया में समुद्री सुरक्षा संतुलन को फिर चर्चा में ला दिया है। चीन ने पाकिस्तान नौसेना को पहली हैंगोर-क्लास पनडुब्बी सौंप दी है। यह वही डील है जिसके तहत कुल 8 आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक AIP (Air Independent Propulsion) पनडुब्बियां पाकिस्तान को मिलनी हैं।यह पनडुब्बियां चीन की Type 039 (Yuan-class) तकनीक पर आधारित हैं, जिन्हें बेहतर स्टील्थ, लंबी अवधि तक पानी के भीतर रहने की क्षमता और आधुनिक हथियार प्रणालियों के लिए जाना जाता है।

    कैसे हो रहा है पूरा प्रोजेक्ट?
    इस पूरे प्रोजेक्ट की कीमत करीब 5 अरब डॉलर बताई जा रही है।
    4 पनडुब्बियां चीन के वुचांग शिपयार्ड में बन रही हैं
    4 पनडुब्बियां पाकिस्तान के कराची शिपयार्ड (KS&EW) में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत बनाई जाएंगी
    पहली पनडुब्बी की डिलीवरी चीन के सान्या नौसैनिक बेस पर की गई, जो PLA Navy का अहम अड्डा माना जाता है।

    पाकिस्तान को क्या फायदा मिलेगा?
    इस डील को पाकिस्तान के लिए “नौसेना में JF-17 मॉडल” की तरह देखा जा रहा है।
    यानी सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि निर्माण क्षमता भी मिल रही है
    पनडुब्बियों का आंशिक निर्माण
    मेंटेनेंस और रिपेयर क्षमता
    भविष्य में तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
    हालांकि रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि असली तकनीकी नियंत्रण और हाई-एंड सिस्टम अभी भी चीन के पास ही रहेंगे।

    हैंगोर पनडुब्बी क्यों खास है?
    हैंगोर-क्लास पनडुब्बियां आधुनिक AIP तकनीक से लैस हैं, जिससे येलंबे समय तक पानी के नीचे रह सकती हैंआसानी से डिटेक्ट नहीं होतींटॉरपीडो और एंटी-शिप मिसाइलों से हमला कर सकती हैं

    कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि इनमें रणनीतिक हथियारों की क्षमता हो सकती है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है।

    भारत की चिंता क्यों बढ़ी?
    इसी बीच भारत का महत्वाकांक्षी P75-I पनडुब्बी प्रोजेक्ट अभी तक फाइनल कॉन्ट्रैक्ट स्टेज में ही अटका हुआ है।इस प्रोजेक्ट के तहत भारत को 6 एडवांस AIP पनडुब्बियां बनानी हैं, जिन्हें मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स (MDL) और जर्मनी की कंपनी TKMS मिलकर बनाएंगे।

    लेकिन समस्या ये हैप्रोजेक्ट 20 साल से ज्यादा समय से चर्चा में हैटेक्नोलॉजी ट्रांसफर और शर्तों पर बातचीत लंबी खिंच रही हैफाइनल डील अभी तक पूरी नहीं हुईअगर सब कुछ तय भी हो जाए, तो पहली पनडुब्बी को सेवा में आने में 2032 या उससे भी ज्यादा समय लग सकता है।

    भारत का मौजूदा सबमरीन बेड़ा
    भारतीय नौसेना के पास अभी लगभग 16–17 पारंपरिक पनडुब्बियां हैं, जिनमें शामिल हैं
    किलो-क्लास (रूस)
    टाइप-209 (जर्मनी)
    स्कॉर्पीन/कलवरी क्लास (फ्रांस)
    लेकिन बड़ी चुनौती यह है कि इनमें से कई पुरानी हो चुकी हैं और AIP तकनीक सीमित है, जिससे उनकी अंडरवॉटर स्टे क्षमता नई पीढ़ी की पनडुब्बियों से कम है।

    दक्षिण एशिया में अब नौसेना की दौड़ तेज हो गई है।एक तरफ पाकिस्तान चीन के सहयोग से तेजी से नई पनडुब्बियां शामिल कर रहा है, वहीं भारत अभी अपनी अगली पीढ़ी की पनडुब्बियों के लिए प्रक्रिया पूरी करने में जुटा है।विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले दशक में समुद्री शक्ति ही रणनीतिक संतुलन तय करने में सबसे बड़ा रोल निभाएगी।

  • कच्चे तेल के दाम आसमान पर… फिर भी भारत में अब तक नहीं बढ़ी पेट्रोल-डीजल की कीमत

    कच्चे तेल के दाम आसमान पर… फिर भी भारत में अब तक नहीं बढ़ी पेट्रोल-डीजल की कीमत


    नई दिल्ली।
    इंटरनेशनल मार्केट (International Market) में कच्चे तेल (Crude oil) के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन सरकारी तेल कंपनियों (Government Oil Companies) ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों (Petrol Diesel Price) में पिछले 4 साल से कोई बढ़ोतरी नहीं की है। हालांकि, बीते महीने शेल इंडिया और नायरा एनर्जी ने पेट्रोल और डीजल के रेट (Petrol Diesel Price) में इजाफा कर दिया था। शेल इंडिया ने पेट्रोल की कीमतों में 7.41 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमतों में 25.01 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। कंपनी ने 1 अप्रैल को रेट बढ़ाया था। उसके बाद से इस कंपनी ने भी कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की है। बता दें, इंडियन ऑयल के पेट्रोल पंप पर आज दिल्ली में डीजल 87.67 रुपये और पेट्रोल 101.89 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक रहा है।


    नायरा एनर्जी ने भी कीमतों में किया है इजाफा (Petrol Price Today)

    26 मार्च को नायरा एनर्जी ने पेट्रोल और डीजल के रेट में बढ़ोतरी कर दी थी। कंपनी ने तब पेट्रोल की कीमतों में 5 रुपये और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर का इजाफा किया था। मौजूदा समय में नायरा के पेट्रोल पंप पर 100.72 रुपये में पेट्रोल और डीजल 91.31 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से बिक रहा है।


    प्रीमियम पेट्रोल का रेट 160 रुपये पहुंचा (Petrol Diesel rate today)

    कंपनियों ने प्रीमियम पेट्रोल का रेट 149 रुपये से बढ़ाकर 160 रुपये प्रति लीटर कर दिया है। वहीं, प्रीमियम डीजल का रेट 91.49 रुपये से बढ़ाकर 92.99 रुपये प्रति लीटर कर दिया है।


    HP, IOCL, BPCL के पंप पर क्या है पेट्रोल का रेट? (Petrol price in your city)

    नई दिल्ली – 94.77 रुपये
    कोलकाता – 105.41 रुपये
    मुंबई – 103.54 रुपये
    चेन्नई – 101.06 रुपये
    गुरुग्राम – 95.30 रुपये
    नोएडा – 94.77 रुपये
    बेंगलुरू – 103.96 रुपये
    भुवनेश्वर – 101.03 रुपये
    चंडीगढ़ – 94.30 रुपये
    हैदराबाद – 107.46 रुपये
    जयपुर – 105.03 रुपये
    लखनऊ – 94.73 रुपये
    भोपाल- 106.40 रुपये
    इंदौर – 106.48 रुपये


    आपके शहर में डीजल का क्या है रेट? (Diesel price in your city)

    नई दिल्ली – 87.67 रुपये
    कोलकाता – 92.02 रुपये
    मुंबई – 90.03 रुपये
    गुरुग्राम – 87.77 रुपये
    नोएडा – 87.89 रुपये
    बेंगलुरू – 90.99 रुपये
    भुवनेश्वर – 92.60 रुपये
    चंडीगढ़ – 82.45 रुपये
    हैदराबाद – 95.70 रुपये
    जयपुर – 90.49 रुपये
    लखनऊ – 87.86 रुपये
    भोपाल- 91.8 रुपये
    इंदौर- 91.9 रुपये


    कच्चे तेल की कीमतों में तूफानी तेजी (crude oil price in your city)

    युद्ध की वजह से क्रूड ऑयल का रेट लगातार बढ़ रहा है। जिसकी वजह से तेल कंपनियों पर काफी दबाव है। मौजूदा समय में इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड ऑयल का रेट 100 डॉलर के पार बरकरार है।

    क्या सरकारी तेल कंपनियां भी बढ़ाएंगी रेट
    आने वाले समय में सरकारी तेल कंपनियां भी पेट्रोल और डीजल का रेट बढ़ा सकती हैं।

  • सरमा के बयान से भड़का कूटनीतिक विवाद: बांग्लादेश ने भारत के उच्चायुक्त को तलब कर जताया कड़ा विरोध

    सरमा के बयान से भड़का कूटनीतिक विवाद: बांग्लादेश ने भारत के उच्चायुक्त को तलब कर जताया कड़ा विरोध


    नई दिल्ली। भारत और बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक रिश्तों में एक नया तनाव उभरकर सामने आया है, जब असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बयान पर ढाका ने कड़ी आपत्ति जताई। गुरुवार को बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारतीय कार्यवाहक उच्चायुक्त पवन बाधे को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया और इस तरह की टिप्पणियों को ‘काउंटरप्रोडक्टिव’ बताया।

    विवाद की जड़ 26 अप्रैल को दिया गया वह बयान है, जिसमें हिमंत बिस्वा सरमा ने दावा किया था कि असम में पकड़े गए 20 विदेशी नागरिकों को ‘पुश बैक’ कर बांग्लादेश भेज दिया गया। इस बयान के सामने आते ही बांग्लादेश की ओर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। ढाका ने स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर सार्वजनिक बयानबाजी से दोनों देशों के बीच भरोसे पर असर पड़ सकता है और द्विपक्षीय संबंधों में अनावश्यक तनाव पैदा होता है।

    बांग्लादेश के अधिकारियों ने भारतीय प्रतिनिधि के समक्ष यह भी कहा कि सीमा, प्रवासन और नागरिकता जैसे विषय बेहद संवेदनशील होते हैं, जिन पर दोनों देशों के बीच पहले से स्थापित कूटनीतिक तंत्र के जरिए ही बातचीत होनी चाहिए। सार्वजनिक मंचों पर दिए गए बयान न केवल गलतफहमी बढ़ाते हैं, बल्कि सहयोग की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकते हैं।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है, जब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से मजबूत होने के बावजूद कुछ मुद्दों को लेकर संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। 1971 के मुक्ति संग्राम से लेकर अब तक दोनों देशों ने सुरक्षा, व्यापार और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में करीबी सहयोग बनाए रखा है। हालांकि अवैध प्रवासन, सीमा प्रबंधन और राजनीतिक बयानबाजी जैसे विषय समय-समय पर तनाव की वजह बनते रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया विवाद भले ही बयानबाजी तक सीमित हो, लेकिन इसका असर कूटनीतिक संवाद पर पड़ सकता है। ऐसे में दोनों देशों के लिए जरूरी है कि वे संवाद और संयम के जरिए इस तरह के मुद्दों को सुलझाएं, ताकि लंबे समय से बने भरोसे और साझेदारी को नुकसान न पहुंचे।

    फिलहाल, यह मामला इस बात का संकेत है कि पड़ोसी देशों के बीच रिश्तों को मजबूत बनाए रखने के लिए केवल नीतियां ही नहीं, बल्कि नेताओं की भाषा और सार्वजनिक बयान भी उतने ही अहम होते हैं

  • RBI ने 6 माह में भारत में शिफ्ट किया 104 टन सोना…. जानें विदेशी मुद्रा भंडार का हाल

    RBI ने 6 माह में भारत में शिफ्ट किया 104 टन सोना…. जानें विदेशी मुद्रा भंडार का हाल


    नई दिल्ली।
    भारत (India) के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India- RBI) ने पिछले छह महीनों में अपने सोने के भंडार का बड़ा हिस्सा देश के भीतर शिफ्ट किया है, जिससे गोल्ड की हिस्सेदारी भी तेजी से बढ़ी है।


    6 महीने में 104 टन सोना देश में शिफ्ट

    आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच करीब 104.23 मीट्रिक टन सोना विदेश से भारत लाया गया। इसके साथ ही देश में रखा गया कुल सोना बढ़कर 290.37 मीट्रिक टन हो गया है। हालांकि, कुल गोल्ड रिजर्व में बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। मार्च 2026 तक RBI के पास कुल 880.52 मीट्रिक टन सोना है, जो सितंबर 2025 के 880.18 टन से थोड़ा ही ज्यादा है।

    विदेश में अभी भी कितना सोना रखा है
    आरबीआई अभी भी अपने सोने का एक बड़ा हिस्सा विदेश में सुरक्षित रखता है। करीब 197.67 मीट्रिक टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटेलमेंट्स (BIS) के पास सुरक्षित रखा गया है। इसके अलावा 2.80 टन सोना गोल्ड डिपॉजिट के रूप में है।


    गोल्ड की हिस्सेदारी में तेज बढ़ोतरी

    सोने की कीमतों में आई तेजी का सीधा असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ा है।मार्च 2026 तक फॉरेक्स रिजर्व में गोल्ड की हिस्सेदारी बढ़कर 16.7% हो गई, जो छह महीने पहले 13.92% थी। यह दिखाता है कि RBI धीरे-धीरे अपने रिजर्व में गोल्ड का महत्व बढ़ा रहा है।


    विदेशी मुद्रा भंडार का हाल

    भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में विदेशी मुद्रा संपत्ति (FCA) का बड़ा हिस्सा है। कुल विदेशी मुद्रा 552.28 अरब डॉलर है। इसमें से 465.61 अरब डॉलर सिक्योरिटीज में निवेश है। 46.83 अरब डॉलर अन्य केंद्रीय बैंकों और BIS में जमा है। 39.84 अरब डॉलर विदेशी कमर्शियल बैंकों में जमा है।

    रणनीति में क्या बदलाव दिख रहा: रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि RBI धीरे-धीरे अपनी रणनीति बदल रहा है। सिक्योरिटीज और विदेशी बैंकों में जमा राशि थोड़ी घटाकर, अन्य केंद्रीय बैंकों और BIS में जमा बढ़ाई गई है।


    क्या है इसका मतलब

    विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम वैश्विक अनिश्चितता के बीच सुरक्षा बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। सोना एक सुरक्षित निवेश माना जाता है, इसलिए RBI अपने रिजर्व को ज्यादा स्थिर बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

  • भारत में आग बरसा रहा सुपर अल नीनो….IMD ने दी इस राज्य में भारी बारिश की चेतावनी

    भारत में आग बरसा रहा सुपर अल नीनो….IMD ने दी इस राज्य में भारी बारिश की चेतावनी


    नई दिल्ली।
    मौसम के बदलते मिजाज (Changing Weather patterns) और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी (Record Breaking Heat) ने इस साल चिंताएं बढ़ा दी हैं। इसका सबसे बड़ा कारण ‘अल नीनो’ (Super El Nino) का वह खतरनाक रूप है, जो इस साल पूरी दुनिया के मौसम चक्र को प्रभावित कर रहा है। प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह का पानी जब असामान्य रूप से गर्म हो जाता है, तो उस मौसमी घटना को ‘अल नीनो’ कहते हैं। इसका असर भारत (India) पर अभी से देखने को मिल रहा है।

    हालांकि दक्षिणी राज्य केरल के लिए अच्छी खबर है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने केरल के कई हिस्सों में आगामी दिनों में भारी बारिश की चेतावनी देते हुए अगले 5 दिनों का विस्तृत मौसम पूर्वानुमान जारी किया है। मौसम में हो रहे अचानक बदलाव को देखते हुए अधिकारियों ने लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है।


    इन जिलों में जारी हुआ ‘येलो अलर्ट’

    IMD के 5-दिवसीय पूर्वानुमान के अनुसार, 29 अप्रैल, 2026 के लिए केरल के चार प्रमुख जिलों में येलो अलर्ट घोषित किया गया है:- पथानामथिट्टा, इडुक्की, कुन्नूर, कासरगोड।

    मौसम विभाग के अनुसार, ‘येलो अलर्ट’ का अर्थ है कि लोगों को सतर्क रहना चाहिए क्योंकि इन क्षेत्रों में 24 घंटों के भीतर 64.5 मिमी से 115.5 मिमी के बीच भारी बारिश होने की पूरी संभावना है।


    ‘सुपर अल नीनो’ क्या है?

    जब समुद्र की सतह का तापमान अपने दीर्घकालिक औसत से 2°C (या उससे अधिक) ऊपर चला जाता है, तो यह एक असाधारण और विनाशकारी रूप ले लेता है, जिसे वैज्ञानिक ‘सुपर अल नीनो’ कहते हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और कई ग्लोबल क्लाइमेट मॉडल्स ने चेतावनी दी है कि 2026 में मई-जुलाई तक यह स्थिति हावी हो सकती है। कुछ विशेषज्ञ इसे पिछले 140 सालों के सबसे ताकतवर चक्रों में से एक मान रहे हैं। इसका सीधा असर वैश्विक तापमान में वृद्धि और मौसम के चरम रूप के तौर पर सामने आता है।

    मॉनसून और अल नीनो (El Nino) से इसका संबंध

    गर्मियों के मौसम में अचानक होने वाली यह भारी बारिश जलवायु परिवर्तन और विशेष रूप से अल नीनो प्रभाव का परिणाम है, जिसका सीधा असर भारत के मॉनसून चक्र पर पड़ता है। इसे ऐसे समझा जा सकता है।

    प्री-मॉनसून गतिविधियां: अल नीनो में प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। भले ही अल नीनो आमतौर पर भारत में मुख्य ‘दक्षिण-पश्चिम मॉनसून’ (जून से सितंबर) को कमजोर कर देता है, लेकिन मॉनसून से ठीक पहले (प्री-मॉनसून) के चरण में यह बहुत ही अस्थिर मौसम उत्पन्न कर सकता है।

    ला नीना से अल नीनो का संक्रमण: साल 2026 की शुरुआत में ‘ला नीना’ का प्रभाव कमजोर हुआ है और यह ‘अल नीनो’ की तरफ बढ़ रहा है। समुद्र के बढ़ते तापमान और स्थानीय वायुमंडलीय दबाव के इस जटिल टकराव के कारण ही केरल में एकाएक बेमौसम भारी बारिश और तूफान देखने को मिल रहे हैं।

    मॉनसून के मौसम पर ‘छाया’: यह अप्रत्याशित बारिश इस बात का संकेत है कि इस साल मुख्य मॉनसून चक्र में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। मॉनसून की शुरुआत से पहले ही कहीं अचानक तीव्र बारिश तो कहीं लू (हीटवेव) चलने जैसी स्थितियां बन रही हैं।


    भारत में अभी से इतनी ‘आग’ क्यों बरस रही है?

    अप्रैल 2026 में ही उत्तर प्रदेश (बांदा, फतेहपुर, इटावा जैसे जिले), मध्य प्रदेश और कई अन्य हिस्सों में तापमान 45-46°C को पार कर गया है। इसके पीछे कई भौगोलिक और मौसमी कारण एक साथ काम कर रहे हैं। साल की शुरुआत में ला नीना (ठंडा चरण) खत्म हो गया है और पृथ्वी तेजी से ‘अल नीनो’ के गर्म चरण में जा रही है। इससे वायुमंडल में गर्माहट काफी तेजी से बढ़ रही है।

    उत्तर और मध्य भारत के ऊपर बादलों का कोई कवर नहीं है। साफ आसमान के कारण सूरज की किरणें बिना किसी रुकावट के सीधे धरती पर पड़ रही हैं, जिससे हवा का एक ‘गर्म गुंबद’ बन गया है जो गर्मी को बाहर नहीं निकलने दे रहा। उत्तर-पश्चिमी मैदानी इलाकों की मिट्टी पूरी तरह सूख चुकी है। हवा में नमी न के बराबर है और वहां से आने वाली सूखी महाद्वीपीय हवाएं तापमान को सीधे बढ़ा रही हैं, जिससे शहरों का माहौल किसी भट्टी जैसा हो गया है।


    इस साल कैसा रहेगा मॉनसून और कब होगी बारिश?

    भारत में कृषि और अर्थव्यवस्था की धुरी माने जाने वाले मॉनसून पर इस साल ‘अल नीनो’ की स्पष्ट छाया मंडरा रही है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 13 अप्रैल 2026 को जारी अपने लंबी अवधि के पूर्वानुमान में यह तस्वीर साफ कर दी है। IMD के अनुसार, इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून (जून से सितंबर) के “सामान्य से नीचे” रहने की संभावना सबसे अधिक है। देश भर में इस बार औसतन मात्र 92% बारिश (LPA का) होने का अनुमान है।

    कब आएगा मॉनसून?

    आमतौर पर मॉनसून 1 जून को केरल तट से टकराता है। हालांकि मानसून अपने समय पर दस्तक दे सकता है, लेकिन जुलाई-अगस्त तक अल नीनो पूरी तरह हावी हो जाएगा। इससे मॉनसून की रफ्तार धीमी पड़ सकती है और बारिश के वितरण में भारी असमानता देखने को मिल सकती है। बारिश कम होने और तापमान अधिक रहने से धान, दलहन और गन्ने जैसी खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है, जो एक बड़ी आर्थिक चिंता का विषय है।

  • अपनी सेना में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में भारत दुनिया में 5वें स्थान पर….

    अपनी सेना में सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों में भारत दुनिया में 5वें स्थान पर….


    नई दिल्ली।
    साल 2025 में दुनिया भर में अपनी सेनाओं पर सबसे ज्यादा खर्च करने वाले देशों (Countries Spend Most Military) की सूची में भारत (India) पांचवें स्थान पर रहा है। भारत से आगे केवल चार देश हैं। वहीं पाकिस्तान (Pakistan) इस मामले में भारत के आसपास भी नहीं ठहरता है। पिछले साल दुनिया भर में हुए कुल सैन्य खर्च में भारत की हिस्सेदारी 3.2% रही है। आइए इस खबर को विस्तार से समझते हैं।


    भारत का रक्षा खर्च और ‘ऑपरेशन सिंदूर’

    स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) द्वारा सोमवार को जारी की गई एक नई रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका (USA), चीन, रूस और जर्मनी इस लिस्ट में सबसे आगे यानी टॉप 4 देश हैं। इसके बाद भारत नंबर 5 पर है। 2025 में भारत का सैन्य खर्च 92.1 अरब डॉलर रहा, जो कि पिछले वर्ष की तुलना में 8.9% अधिक है।

    बढ़ोतरी का कारण: इस वृद्धि का एक बड़ा कारण पिछले साल पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ‘ऑपरेशन सिंदूर’ था। इस सैन्य अभियान के दौरान सेना को युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार रखने हेतु सशस्त्र बलों ने आपातकालीन आधार पर हथियारों और साजो-सामान की कई महत्वपूर्ण खरीदारियां कीं।


    पड़ोसी देशों (चीन और पाकिस्तान) की क्या स्थिति है?

    सिपरी के आंकड़े बताते हैं कि भारत के पड़ोसियों ने भी अपनी सेना पर खर्च बढ़ाया है।

    चीन: दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा सैन्य खर्च करने वाला देश चीन है। उसने अपने रक्षा बजट में 7.4% की वृद्धि की है, जिससे उसका कुल खर्च 336 अरब डॉलर हो गया है।

    पाकिस्तान: आर्थिक चुनौतियों के बावजूद पाकिस्तान के सैन्य खर्च में 11% की वृद्धि देखी गई है। 11.9 अरब डॉलर के खर्च के साथ पाकिस्तान इस सूची के 40 देशों में 31वें स्थान पर है।


    वैश्विक परिदृश्य: दुनिया भर में रक्षा खर्च रिकॉर्ड स्तर पर

    शीर्ष तीन देश: अमेरिका, चीन और रूस मिलकर वैश्विक सैन्य खर्च का 51% हिस्सा कवर करते हैं। इन तीनों देशों ने कुल मिलाकर 1,480 अरब डॉलर खर्च किए। साल 2025 में पूरी दुनिया का सैन्य खर्च बढ़कर 2,887 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।


    यूरोप में भारी वृद्धि

    वैश्विक स्तर पर खर्च बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यूरोप रहा, जहां सैन्य खर्च में 14% की वृद्धि (कुल 864 अरब डॉलर) हुई। रूस-यूक्रेन युद्ध के चौथे साल में प्रवेश करने और यूरोपीय नाटो देशों द्वारा खुद को फिर से हथियारों से लैस करने की कोशिशों के कारण शीत युद्ध के बाद से मध्य और पश्चिमी यूरोप में यह सबसे तेज वार्षिक वृद्धि है।


    हथियारों के आयात में भारत अभी भी आगे

    मार्च में प्रकाशित सिपरी की एक अन्य रिपोर्ट “ट्रेंड्स इन इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर्स” के अनुसार- 2016-20 और 2021-25 की अवधि के बीच भारत के हथियारों के आयात में 4% की गिरावट आई है। गिरावट के बावजूद, भारत अभी भी सैन्य हार्डवेयर का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आयातक (Importer) बना हुआ है, जिसकी वैश्विक हथियारों के आयात में 8.2% हिस्सेदारी है। इसका मुख्य कारण चीन और पाकिस्तान के साथ सीमा पर चल रहा तनाव है।


    रूस पर निर्भरता कम कर रहा है भारत

    पिछले एक दशक में भारत ने अपने हथियारों की खरीद नीति में बड़ा बदलाव किया है। भारत अब रूस के बजाय पश्चिमी देशों (खासकर फ्रांस, इजरायल और अमेरिका) की ओर रुख कर रहा है। 2011-15 के दौरान भारत के कुल हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी 70% थी, जो 2016-20 में घटकर 51% और 2021-25 में 40% रह गई है। इसके बावजूद, वर्तमान में भारत को सैन्य हार्डवेयर की आपूर्ति करने वाले शीर्ष तीन देश रूस, फ्रांस और इजरायल ही हैं।


    भविष्य की तैयारियां: रक्षा बजट 2026-27

    ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की पृष्ठभूमि और मौजूदा चुनौतियों को देखते हुए, भारत सरकार ने 1 फरवरी को पेश किए गए 2026-27 के केंद्रीय बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए भारी-भरकम राशि आवंटित की है: रक्षा बजट में 15% से अधिक की बढ़ोतरी की गई है।

    इस महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए कुल 7.85 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
    इसमें से ₹2.19 लाख करोड़ का ‘पूंजीगत परिव्यय’ रखा गया है। इस फंड का इस्तेमाल सीधे तौर पर सशस्त्र बलों की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए किया जाएगा, जिसमें नए लड़ाकू विमान, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, हेलीकॉप्टर, युद्धपोत, पनडुब्बियां, आर्टिलरी गन, स्मार्ट हथियार, मिसाइलें, रॉकेट और कई तरह के मानव रहित (ड्रोन) सिस्टम खरीदना शामिल है।