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  • एजबेस्टन में गिल और अक्षर का शानदार प्रदर्शन, इंग्लैंड को 6 विकेट से हराया, भारत की जीत की ये हैं 5 बड़ी वजहें

    एजबेस्टन में गिल और अक्षर का शानदार प्रदर्शन, इंग्लैंड को 6 विकेट से हराया, भारत की जीत की ये हैं 5 बड़ी वजहें


    बर्मिंघम। भारतीय टीम ने एजबेस्टन में खेले गए पहले वनडे मुकाबले में इंग्लैंड को छह विकेट से हराकर न सिर्फ तीन मैचों की सीरीज में 1-0 की बढ़त हासिल की, बल्कि कई रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिए। कप्तान शुभमन गिल की शानदार बल्लेबाजी और अक्षर पटेल के बेहतरीन ऑलराउंड प्रदर्शन ने भारत को यादगार जीत दिलाई।

    259 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारत ने 45.2 ओवर में चार विकेट गंवाकर मुकाबला अपने नाम कर लिया। कप्तान शुभमन गिल ने 75 गेंदों में 80 रन की शानदार पारी खेली। उनकी पारी में 11 चौके और एक छक्का शामिल रहा। हालांकि, क्रैम्प और हैमस्ट्रिंग की परेशानी के कारण उन्हें रिटायर्ड हर्ट होकर मैदान छोड़ना पड़ा।

    इसके बाद अक्षर पटेल और वॉशिंगटन सुंदर ने जिम्मेदारी संभाली। दोनों ने पांचवें विकेट के लिए नाबाद 102 रनों की साझेदारी कर भारत की जीत पक्की कर दी। अक्षर ने नाबाद 57 रन बनाए, जबकि सुंदर ने नाबाद 52 रनों का योगदान दिया।

    गेंदबाजों ने पलटी इंग्लैंड की पारी
    इससे पहले इंग्लैंड ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी का फैसला किया। शुरुआत में मेजबान टीम मजबूत स्थिति में थी और एक समय उसका स्कोर 61 रन पर बिना विकेट के था।

    लेकिन भारतीय गेंदबाजों ने शानदार वापसी करते हुए इंग्लैंड को 107 रन तक पहुंचते-पहुंचते छह विकेट गंवाने पर मजबूर कर दिया। हालांकि जो रूट (76*) और लियाम डॉसन (68) ने सातवें विकेट के लिए 121 रनों की साझेदारी कर इंग्लैंड को 258 रन तक पहुंचाया।

    भारत की ओर से अक्षर पटेल ने शानदार गेंदबाजी करते हुए चार विकेट हासिल किए। प्रसिद्ध कृष्णा और गुरनूर बराड़ ने दो-दो विकेट लेकर इंग्लैंड की पारी को नियंत्रित रखा।

    भारत की जीत के 5 बड़े कारण

    1. 11 साल बाद एजबेस्टन में इंग्लैंड को मिली हार
    एजबेस्टन मैदान पर इंग्लैंड का वनडे रिकॉर्ड बेहद मजबूत रहा था। 2015 के बाद उसने इस मैदान पर लगातार आठ वनडे मुकाबले जीते थे। भारत ने 2014 के बाद पहली बार इसी मैदान पर इंग्लैंड को हराकर उसका विजयी सिलसिला तोड़ दिया।

    2. इंग्लैंड के खिलाफ लगातार छठी वनडे जीत
    भारत की यह इंग्लैंड के खिलाफ वनडे क्रिकेट में लगातार छठी जीत है। यह किसी भी दौर में इंग्लैंड के खिलाफ भारत की सबसे लंबी जीत की श्रृंखला बन गई है।

    3. गिल का एजबेस्टन में लगातार शानदार प्रदर्शन
    शुभमन गिल का एजबेस्टन से खास रिश्ता बनता जा रहा है। पिछले साल इसी मैदान पर टेस्ट मैच में 269 और 161 रन की यादगार पारियां खेलने वाले गिल ने अब वनडे में भी कप्तानी पारी खेलकर अपनी छाप छोड़ी।

    4. अक्षर पटेल का ऑलराउंड जवाब
    टी20 सीरीज में आलोचनाओं का सामना करने वाले अक्षर पटेल ने वनडे में शानदार वापसी की। उन्होंने पहले गेंद से चार विकेट लिए और फिर नाबाद 57 रन बनाकर टीम की जीत में अहम भूमिका निभाई।

    5. यूके दौरे पर भारत की पहली जीत
    इंग्लैंड और आयरलैंड के खिलाफ टी20 मुकाबलों में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद भारत को मौजूदा यूनाइटेड किंगडम दौरे पर पहली जीत मिली। इस जीत ने टीम के आत्मविश्वास को नई मजबूती दी है।

    एजबेस्टन की इस जीत में कप्तान गिल का नेतृत्व, गेंदबाजों की वापसी और अक्षर पटेल का ऑलराउंड प्रदर्शन भारत के लिए सबसे बड़ी सकारात्मक बातें रहीं।

  • भारत के बीएफएसआई सेक्टर में निवेश को मिली नई रफ्तार, दूसरी तिमाही में डील वैल्यू 58 प्रतिशत बढ़कर 3.2 अरब डॉलर पहुंची

    भारत के बीएफएसआई सेक्टर में निवेश को मिली नई रफ्तार, दूसरी तिमाही में डील वैल्यू 58 प्रतिशत बढ़कर 3.2 अरब डॉलर पहुंची

    नई दिल्ली ।भारत के बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और बीमा (बीएफएसआई) क्षेत्र में वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही के दौरान निवेश गतिविधियों में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली है। इस अवधि में कुल 65 डील्स दर्ज की गईं, जिनकी संयुक्त वैल्यू 3.2 अरब डॉलर रही। तिमाही आधार पर यह मूल्य लगभग 58 प्रतिशत अधिक रहा, जो इस क्षेत्र में निवेशकों के बढ़ते विश्वास और रणनीतिक सौदों की सक्रियता को दर्शाता है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय वित्तीय सेवाओं का बाजार निवेश आकर्षित करने में सक्षम बना हुआ है।

    तिमाही समीक्षा के अनुसार इस अवधि में बीएफएसआई सेक्टर की हिस्सेदारी कुल डील वॉल्यूम का लगभग 11 प्रतिशत और कुल डील वैल्यू का 8 प्रतिशत रही। डील वैल्यू में आई उल्लेखनीय वृद्धि के पीछे एक बड़े रणनीतिक ट्रांजैक्शन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े सौदों ने पूरे सेक्टर की निवेश क्षमता को मजबूती दी और बाजार में सकारात्मक संकेत भेजे।

    अप्रैल से जून 2026 के बीच विलय एवं अधिग्रहण यानी एमएंडए गतिविधियों में भी तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस दौरान 24 एमएंडए डील्स हुईं, जिनकी कुल वैल्यू 1.5 अरब डॉलर रही। तिमाही आधार पर एमएंडए डील्स की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि उनकी वैल्यू करीब पांच गुना बढ़ गई। इससे स्पष्ट होता है कि वित्तीय संस्थानों और निवेशकों ने विस्तार तथा रणनीतिक साझेदारियों पर अधिक ध्यान दिया।

    रिपोर्ट के अनुसार सार्वजनिक बाजार की गतिविधियों को अलग रखने पर बीएफएसआई क्षेत्र में 62 एमएंडए तथा प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल से जुड़े लेनदेन दर्ज किए गए, जिनकी कुल वैल्यू 2.8 अरब डॉलर रही। यह प्रदर्शन ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण निवेश वातावरण पूरी तरह स्थिर नहीं माना जा रहा है। इसके बावजूद भारतीय वित्तीय क्षेत्र में निवेशकों की रुचि बनी रही।

    विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों ने इस दौरान विशेष रूप से स्केलेबल, तकनीक आधारित और नियामकीय रूप से मजबूत कारोबारों को प्राथमिकता दी। पूंजी निवेश का रुख पहले की तुलना में अधिक संतुलित और सोच-समझकर किया गया। यही कारण रहा कि सीमित निवेश माहौल के बावजूद रणनीतिक डील्स ने पूरे सेक्टर के प्रदर्शन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

    समीक्षा अवधि के दौरान प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल गतिविधियों में 38 सौदे दर्ज किए गए, जिनकी कुल वैल्यू 1.3 अरब डॉलर रही। दूसरी ओर, सार्वजनिक बाजार की गतिविधियां अपेक्षाकृत धीमी रहीं। इस दौरान एक प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के माध्यम से 97 मिलियन डॉलर जुटाए गए, जबकि दो क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट के जरिए 310 मिलियन डॉलर की पूंजी हासिल की गई। इससे संकेत मिलता है कि निजी निवेश फिलहाल सार्वजनिक पूंजी बाजार की तुलना में अधिक सक्रिय बना हुआ है।

    सेगमेंट के स्तर पर फिनटेक सबसे अधिक सक्रिय क्षेत्र रहा, जहां 31 डील्स के माध्यम से 1.4 अरब डॉलर का निवेश दर्ज किया गया। वहीं वित्तीय सेवाओं और एसेट मैनेजमेंट क्षेत्र में 16 सौदों के जरिए 690 मिलियन डॉलर की डील वैल्यू सामने आई, जो पिछली तिमाही की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक रही। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां स्थिर होने और पूंजी बाजार में सुधार आने के साथ भारत का बीएफएसआई इकोसिस्टम आने वाले समय में भी घरेलू और विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना रह सकता है।

  • भारत में डेटा सेंटर सेक्टर बनेगा रोजगार का नया इंजन, 2030 तक 1 लाख इंजीनियरों की मांग का अनुमान, एआई और क्लाउड टेक्नोलॉजी से बढ़ेगी अवसरों की रफ्तार

    भारत में डेटा सेंटर सेक्टर बनेगा रोजगार का नया इंजन, 2030 तक 1 लाख इंजीनियरों की मांग का अनुमान, एआई और क्लाउड टेक्नोलॉजी से बढ़ेगी अवसरों की रफ्तार

    नई दिल्ली ।भारत में तेजी से बढ़ता डेटा सेंटर उद्योग आने वाले वर्षों में रोजगार सृजन का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है। डिजिटल सेवाओं के विस्तार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीकों के बढ़ते उपयोग और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग में लगातार वृद्धि के बीच एक नई रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2030 तक इस क्षेत्र में करीब एक लाख कुशल इंजीनियरों और तकनीकी पेशेवरों की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते योग्य मानव संसाधन तैयार किए गए, तो यह क्षेत्र देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था को नई गति देने के साथ लाखों युवाओं के लिए करियर के बेहतर अवसर भी उपलब्ध कराएगा।

    रिपोर्ट के अनुसार भारत की स्थापित डेटा सेंटर क्षमता वर्तमान लगभग 1.5 गीगावाट से बढ़कर दशक के अंत तक करीब 6.5 गीगावाट तक पहुंचने की संभावना है। इसी के साथ देश का डेटा सेंटर बाजार 22 अरब डॉलर से अधिक का आकार प्राप्त कर सकता है। बढ़ती डिजिटल सेवाओं, ई-कॉमर्स, वित्तीय तकनीकों, सरकारी डिजिटल परियोजनाओं और एआई आधारित अनुप्रयोगों ने डेटा प्रोसेसिंग और स्टोरेज की जरूरतों को पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ा दिया है।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि डेटा सेंटर क्षेत्र में अब तक 126 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धताएं सामने आ चुकी हैं। लगातार हो रहे निवेश के कारण यह उद्योग देश के सबसे तेजी से विकसित होने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में शामिल हो गया है। नई परियोजनाओं के शुरू होने से निर्माण, संचालन, रखरखाव और तकनीकी प्रबंधन जैसे अनेक क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद है।

    हालांकि रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि शिक्षा संस्थानों, उद्योग जगत और नीति-निर्माताओं के बीच बेहतर समन्वय नहीं हुआ तो भविष्य में कुशल पेशेवरों की कमी इस क्षेत्र की प्रगति में बड़ी चुनौती बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती तकनीकों के अनुरूप प्रशिक्षण कार्यक्रम, उद्योग आधारित पाठ्यक्रम और व्यावहारिक कौशल विकास पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार केवल तकनीकी निवेश नहीं, बल्कि भारत के युवाओं के लिए दीर्घकालिक रोजगार और कौशल विकास का बड़ा अवसर है। एआई इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड ऑपरेशंस, ऑटोमेशन, पावर सिस्टम और क्रिटिकल फैसिलिटी मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही प्लेटफॉर्म इंजीनियरिंग, डेवऑप्स, एमएलऑप्स और डेटा सेंटर ऑटोमेशन जैसी आधुनिक तकनीकी भूमिकाएं भी तेजी से उभर रही हैं।

    अनुमान है कि आने वाले वर्षों में एआई आधारित वर्कलोड भारत की कुल डेटा सेंटर क्षमता का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा बन जाएगा। ऐसे में डेटा सेंटर उद्योग में काम करने वाले इंजीनियरों के लिए एआई इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा दक्षता और आधुनिक कंप्यूटिंग प्रणालियों की समझ आवश्यक कौशल के रूप में विकसित होगी। इससे तकनीकी शिक्षा और उद्योग की आवश्यकताओं के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत भी बढ़ेगी।

    रिपोर्ट के अनुसार भविष्य के डेटा सेंटर केवल डिजिटल स्टोरेज तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ऊर्जा प्रबंधन, उन्नत कूलिंग सिस्टम और अत्याधुनिक तकनीकी अवसंरचना पर आधारित होंगे। इसी कारण एआई इंफ्रास्ट्रक्चर ऑपरेशंस इंजीनियर, लिक्विड कूलिंग इंजीनियर, एनर्जी ऑप्टिमाइजेशन स्पेशलिस्ट, क्रिटिकल फैसिलिटीज इंजीनियर और पावर सिस्टम विशेषज्ञ जैसे नए पदों की मांग लगातार बढ़ने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत समय रहते कुशल कार्यबल तैयार करने में सफल रहता है, तो डेटा सेंटर उद्योग आने वाले वर्षों में देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था और रोजगार परिदृश्य दोनों को नई मजबूती प्रदान करेगा।

  • प्रत्यक्ष कर संग्रह में मजबूत उछाल, चालू वित्त वर्ष में 7.74 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा कलेक्शन, अर्थव्यवस्था की मजबूती के मिले संकेत

    प्रत्यक्ष कर संग्रह में मजबूत उछाल, चालू वित्त वर्ष में 7.74 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा कलेक्शन, अर्थव्यवस्था की मजबूती के मिले संकेत


    नई दिल्ली ।
    चालू वित्त वर्ष में भारत के प्रत्यक्ष कर संग्रह में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे देश की आर्थिक गतिविधियों और कर संग्रह व्यवस्था की मजबूती के संकेत मिले हैं। 13 जुलाई तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह सालाना आधार पर 16.11 प्रतिशत बढ़कर 7.74 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इस वृद्धि में कॉरपोरेट टैक्स, गैर-कॉरपोरेट टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) के बेहतर प्रदर्शन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कर संग्रह में यह तेजी सरकार के राजस्व आधार को मजबूत करने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था में जारी सकारात्मक गतिविधियों को भी दर्शाती है।

    आंकड़ों के अनुसार, रिफंड की राशि को समायोजित करने के बाद शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 16.4 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 6.51 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। इसी अवधि में करदाताओं को जारी किए गए रिफंड भी बढ़े हैं और उनका कुल मूल्य 1.22 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 14.57 प्रतिशत अधिक है। इससे यह संकेत मिलता है कि एक ओर सरकार का कर संग्रह बढ़ रहा है तो दूसरी ओर पात्र करदाताओं को समय पर रिफंड भी जारी किए जा रहे हैं।

    कॉरपोरेट कर संग्रह में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। रिफंड समायोजन के बाद कॉरपोरेट टैक्स से प्राप्त राजस्व 2.40 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 1.97 लाख करोड़ रुपये था। वहीं गैर-कॉरपोरेट कर संग्रह बढ़कर 3.85 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो एक वर्ष पहले 3.44 लाख करोड़ रुपये था। इससे स्पष्ट होता है कि कंपनियों के साथ-साथ व्यक्तिगत और अन्य श्रेणी के करदाताओं का योगदान भी लगातार बढ़ रहा है।

    यदि सकल कर संग्रह की बात करें तो कॉरपोरेट टैक्स 3.35 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष समान अवधि में यह 2.90 लाख करोड़ रुपये था। इसी प्रकार गैर-कॉरपोरेट कर संग्रह भी बढ़कर 4.12 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो पिछले वर्ष 3.58 लाख करोड़ रुपये था। यह वृद्धि विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में कारोबार और आय में सुधार का संकेत मानी जा रही है।

    सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स के मोर्चे पर भी मजबूत प्रदर्शन दर्ज किया गया। रिफंड समायोजन के बाद एसटीटी का शुद्ध संग्रह 26,428.96 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले वर्ष समान अवधि में यह 17,875.88 करोड़ रुपये था। शेयर बाजार में बढ़ी गतिविधियों और निवेशकों की भागीदारी को इस बढ़ोतरी का प्रमुख कारण माना जा रहा है। हालांकि अन्य करों के मद में इस अवधि के दौरान संग्रह मामूली रूप से नकारात्मक दर्ज किया गया।

    प्रत्यक्ष कर के इन आंकड़ों में कॉरपोरेट संस्थाओं के अलावा व्यक्तिगत करदाता, हिंदू अविभाजित परिवार, साझेदारी फर्म, व्यक्तियों के समूह, स्थानीय निकाय तथा अन्य कानूनी संस्थाओं द्वारा जमा किए गए कर भी शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष कर संग्रह में लगातार हो रही वृद्धि से सरकार को विकास योजनाओं और सार्वजनिक निवेश के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध होंगे। साथ ही यह भी संकेत मिलता है कि देश की आर्थिक गतिविधियां स्थिर गति से आगे बढ़ रही हैं और घरेलू मांग तथा औद्योगिक प्रदर्शन राजस्व वृद्धि को समर्थन दे रहे हैं।

  • हॉर्मुज संकट से भारत पर बढ़ा आर्थिक दबाव, महंगा तेल, कमजोर रुपया और बढ़ती महंगाई से आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ सकता है असर

    हॉर्मुज संकट से भारत पर बढ़ा आर्थिक दबाव, महंगा तेल, कमजोर रुपया और बढ़ती महंगाई से आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ सकता है असर

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में हॉर्मुज स्ट्रेट के आसपास बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच फिर से गहराते टकराव का असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा चलता है तो भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों को महंगे तेल, बढ़ती महंगाई, कमजोर रुपये और ऊंचे आयात बिल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव आम लोगों की रसोई से लेकर परिवहन, उद्योग और अर्थव्यवस्था तक महसूस किया जा सकता है।

    हॉर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल है। वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल के बड़े हिस्से और बड़ी मात्रा में एलएनजी की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या जहाजों की आवाजाही में बाधा अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों को तेजी से प्रभावित करती है। हाल के दिनों में कई जहाजों ने सुरक्षा कारणों से इस मार्ग पर संचालन सीमित किया है, जिससे समुद्री परिवहन और बीमा लागत भी बढ़ी है।

    भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 से 90 प्रतिशत आयात करता है। इनमें से बड़ी मात्रा हॉर्मुज स्ट्रेट के रास्ते देश तक पहुंचती है। यदि इस समुद्री मार्ग पर लंबे समय तक व्यवधान बना रहता है तो भारत को वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदना पड़ सकता है, जिससे परिवहन लागत और आयात व्यय दोनों बढ़ेंगे। इसका प्रभाव पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधनों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

    रसोई गैस को लेकर भी स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और इन आयातों का अधिकांश भाग हॉर्मुज मार्ग से होकर आता है। यदि आपूर्ति प्रभावित होती है या अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज वृद्धि होती है तो घरेलू गैस सिलेंडर की लागत बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में सरकार के सामने सब्सिडी बढ़ाने या उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त कीमत का बोझ डालने जैसे विकल्प सामने आ सकते हैं।

    महंगे कच्चे तेल का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता। डीजल की कीमतों में वृद्धि से माल ढुलाई महंगी होती है, जिसका प्रभाव फल, सब्जियां, दूध, अनाज, निर्माण सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। इससे खुदरा महंगाई बढ़ने की संभावना रहती है। साथ ही तेल आयात के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च होने से रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और अन्य आयातित वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं।

    ऊंची तेल कीमतों का असर सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर भी पड़ सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं और घरेलू स्तर पर कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी नहीं की जाती, तो कंपनियों पर लागत का अतिरिक्त बोझ बढ़ सकता है। वहीं तेल उत्पादन से जुड़ी कंपनियों को ऊंचे वैश्विक दामों का लाभ मिलने की संभावना रहती है, जबकि विमानन, परिवहन, रसायन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है।

    ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए भारत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार भी कर रहा है। सरकार भविष्य में आपूर्ति बाधित होने की स्थिति से निपटने के लिए अतिरिक्त भंडारण क्षमता विकसित करने और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि हॉर्मुज जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों पर बढ़ता तनाव केवल भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और आम नागरिकों के दैनिक खर्च से भी जुड़ा हुआ है।

  • होर्मुज स्ट्रेट में भारतीय नाविक की मौत पर भारत का कड़ा रुख, ईरानी दूतावास तलब, समुद्री सुरक्षा को लेकर जताई गंभीर चिंता

    होर्मुज स्ट्रेट में भारतीय नाविक की मौत पर भारत का कड़ा रुख, ईरानी दूतावास तलब, समुद्री सुरक्षा को लेकर जताई गंभीर चिंता


    नई दिल्ली ।
    होर्मुज स्ट्रेट क्षेत्र में एक व्यापारी जहाज पर हुए हमले में भारतीय नाविक की मौत के बाद भारत सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। इस घटना के बाद विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास के वरिष्ठ अधिकारियों को तलब कर अपनी चिंता और आपत्ति दर्ज कराई। सरकार ने विशेष रूप से समुद्री मार्गों पर कार्यरत भारतीय नागरिकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाते हुए कहा कि इस संवेदनशील क्षेत्र में काम करने वाले भारतीय नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।

    विदेश मंत्रालय में हुई बैठक के दौरान भारतीय अधिकारियों ने ईरानी पक्ष के समक्ष समुद्री सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दों को उठाया। इस दौरान ईरानी दूतावास के वरिष्ठ राजनयिक, जिनमें उप मिशन प्रमुख भी शामिल थे, विदेश मंत्रालय पहुंचे। भारत ने स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया के समुद्री मार्गों पर बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक व्यापारी जहाजों पर कार्यरत हैं और किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव उनके जीवन और सुरक्षा पर सीधा प्रभाव डाल सकता है।

    घटना ऐसे समय सामने आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच लगातार सैन्य कार्रवाई और जवाबी हमलों की खबरें सामने आई हैं। इसी क्रम में होर्मुज स्ट्रेट के निकट संयुक्त अरब अमीरात से जुड़े दो वाणिज्यिक जहाजों पर हमला हुआ, जिसमें एक भारतीय नाविक की जान चली गई। इस हमले में कई अन्य चालक दल के सदस्य भी घायल हुए, जिनमें भारतीय नागरिक शामिल बताए गए हैं। कुछ घायलों की स्थिति गंभीर बताई जा रही है।

    हमले के बाद दोनों जहाजों में आग लग गई थी, जिस पर बाद में काबू पा लिया गया। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, प्रभावित जहाजों पर मौजूद चालक दल को सुरक्षित निकालने के लिए राहत एवं बचाव अभियान भी चलाया गया। घटना के बाद क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों और वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है।

    संयुक्त अरब अमीरात ने भी इस हमले की कड़ी निंदा की है। यूएई ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध बताया और कहा कि वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाना क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए गंभीर खतरा है। साथ ही यह भी कहा गया कि ऐसी घटनाओं का उचित जवाब देने का अधिकार सुरक्षित है। इस बयान के बाद पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता व्यक्त की जा रही है।

    होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस इसी समुद्री मार्ग से विभिन्न देशों तक पहुंचती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य टकराव न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर भी व्यापक असर डाल सकता है।

    भारत सरकार लगातार इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। विदेश मंत्रालय संबंधित देशों के संपर्क में रहकर भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास कर रहा है। सरकार का कहना है कि विदेशों में कार्यरत भारतीयों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और आवश्यकता पड़ने पर हर आवश्यक राजनयिक कदम उठाया जाएगा। मौजूदा घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का प्रभाव केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा और भारतीय नागरिकों पर भी सीधे तौर पर पड़ सकता है।

  • E20 पेट्रोल विवाद पर केंद्र सरकार सख्त, राज्यों को मिलावटी ईंधन बेचने वालों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश, गुणवत्ता से समझौते पर जीरो टॉलरेंस

    E20 पेट्रोल विवाद पर केंद्र सरकार सख्त, राज्यों को मिलावटी ईंधन बेचने वालों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश, गुणवत्ता से समझौते पर जीरो टॉलरेंस


    नई दिल्ली ।
    देशभर में E20 पेट्रोल को लेकर चल रही चर्चाओं और उपभोक्ताओं की शिकायतों के बीच केंद्र सरकार ने फ्यूल की गुणवत्ता को लेकर सख्त रुख अपनाया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने सभी राज्यों को स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए कहा है कि पेट्रोल में मिलावट, सप्लाई व्यवस्था में लापरवाही या गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। मंत्रालय ने ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है और स्पष्ट किया है कि सरकार की नीति इस विषय में पूरी तरह जीरो टॉलरेंस की है।

    सरकार का कहना है कि यदि किसी वाहन में ईंधन भरवाने के बाद तकनीकी समस्या सामने आती है तो हर मामले के लिए E20 पेट्रोल को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। मंत्रालय के अनुसार, कई बार पेट्रोल की गुणवत्ता में कमी, भंडारण व्यवस्था की खामियां, सप्लाई चेन में गड़बड़ी या ईंधन में मिलावट जैसी वजहों से वाहन प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए जांच का केंद्र वास्तविक कारण होना चाहिए, न कि मानकों के अनुरूप तैयार किए गए E20 ईंधन पर सीधे सवाल उठाना।

    केंद्र ने राज्यों को यह भी निर्देश दिया है कि पेट्रोल पंपों, भंडारण केंद्रों और वितरण व्यवस्था की नियमित निगरानी की जाए। यदि कहीं ईंधन में मिलावट, रखरखाव में लापरवाही या गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ तत्काल कानूनी कार्रवाई की जाए। हालांकि सरकार ने यह जानकारी साझा नहीं की है कि अब तक किन राज्यों में ऐसे मामले सामने आए हैं या कितनी कार्रवाई की गई है।

    सरकार ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि निर्धारित मानकों के अनुसार तैयार किया गया E20 पेट्रोल सुरक्षित है और इसका उद्देश्य स्वच्छ ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देना है। मंत्रालय के अनुसार, सही गुणवत्ता वाले E20 पेट्रोल से सामान्य परिस्थितियों में वाहनों को नुकसान नहीं होना चाहिए। यदि कहीं वाहन में खराबी आती है तो उसके पीछे फ्यूल की गुणवत्ता या वितरण प्रक्रिया से जुड़ी अन्य कमियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

    इधर, पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर कई वाहन मालिकों ने E20 पेट्रोल को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। कुछ लोगों ने दावा किया है कि इस ईंधन के उपयोग के बाद उनकी कार या बाइक का माइलेज कम हुआ है, जबकि कुछ ने इंजन की कार्यक्षमता प्रभावित होने, ईंधन प्रणाली पर असर पड़ने और वाहन के बीच रास्ते में बंद होने जैसी शिकायतें भी सामने रखी हैं। इन दावों के कारण आम उपभोक्ताओं के बीच E20 पेट्रोल को लेकर भ्रम और आशंकाएं बढ़ी हैं।

    इस मुद्दे ने राजनीतिक स्वरूप भी ले लिया है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने E20 पेट्रोल के विरोध में ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है। उन्होंने लोगों से इस अभियान से जुड़ने की अपील करते हुए कहा है कि सरकार को वाहन मालिकों की चिंताओं को गंभीरता से सुनना चाहिए और उन्हें विकल्प उपलब्ध कराने चाहिए। उनका आरोप है कि पर्याप्त तैयारी के बिना E20 पेट्रोल को लागू किया जा रहा है, जबकि बड़ी संख्या में लोग माइलेज घटने और वाहन संबंधी समस्याओं की शिकायत कर रहे हैं।

    केंद्र सरकार का कहना है कि स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को गुणवत्तापूर्ण ईंधन उपलब्ध कराना उसकी प्राथमिकता है। इसी उद्देश्य से राज्यों को निगरानी मजबूत करने, मिलावट रोकने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि उपभोक्ताओं का भरोसा बना रहे और ईंधन की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके।

  • ईरान-अमेरिका तनाव के बीच भारत का कड़ा संदेश, भारतीय नाविक की मौत पर ईरान के डिप्टी राजदूत तलब, होर्मुज में बढ़ा सैन्य और समुद्री संकट

    ईरान-अमेरिका तनाव के बीच भारत का कड़ा संदेश, भारतीय नाविक की मौत पर ईरान के डिप्टी राजदूत तलब, होर्मुज में बढ़ा सैन्य और समुद्री संकट

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच लगातार बढ़ रहे सैन्य तनाव के बीच भारत ने अपने एक नागरिक की मौत के मामले में कड़ा राजनयिक कदम उठाया है। होर्मुज जलडमरूमध्य के निकट हुए हमले में एक भारतीय नाविक की मृत्यु के बाद भारत सरकार ने ईरान के डिप्टी राजदूत को तलब कर अपनी गंभीर आपत्ति दर्ज कराई। विदेश मंत्रालय ने इस घटना पर चिंता व्यक्त करते हुए भारतीय नागरिकों और समुद्री जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    हाल के दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के समुद्री क्षेत्र में लगातार सैन्य गतिविधियां तेज हुई हैं। तेल टैंकरों और व्यापारिक जहाजों पर हमलों की घटनाओं ने वैश्विक समुद्री परिवहन को प्रभावित किया है। इसी दौरान एक हमले में भारतीय चालक दल का सदस्य जान गंवा बैठा, जबकि कई अन्य लोग घायल हुए। इस घटना के बाद भारत ने राजनयिक माध्यमों से अपना विरोध दर्ज कराया और पूरे मामले पर विस्तृत जानकारी मांगी है।

    भारत ने स्पष्ट किया कि किसी भी संघर्ष की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। भारतीय नागरिकों और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। इसी उद्देश्य से ईरान के प्रतिनिधि को तलब कर घटना पर आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगा गया। इससे पहले भी क्षेत्र में भारतीय जहाजों से जुड़ी घटनाओं पर भारत संबंधित देशों के समक्ष अपनी चिंता दर्ज करा चुका है।

    दूसरी ओर, पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियां लगातार तेज बनी हुई हैं। विभिन्न क्षेत्रों में मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें सामने आई हैं। कई देशों ने समुद्री सुरक्षा को लेकर अपने जहाजों और नागरिकों के लिए अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह जारी की है। क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर भी दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

    रणनीतिक दृष्टि से होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक कच्चे तेल और गैस की बड़ी मात्रा इसी रास्ते से गुजरती है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी उसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

    भारत लगातार यह रुख दोहराता रहा है कि सभी पक्ष संयम बरतें और विवादों का समाधान संवाद तथा कूटनीतिक माध्यमों से किया जाए। सरकार का मानना है कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन वैश्विक स्थिरता के लिए आवश्यक है। इसी कारण भारत क्षेत्र की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और जरूरत पड़ने पर अपने नागरिकों तथा समुद्री हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठा रहा है।

    भारतीय नाविक की मौत के बाद उठाया गया यह राजनयिक कदम दर्शाता है कि विदेशों में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर भारत किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। आने वाले दिनों में क्षेत्र की परिस्थितियों और संबंधित देशों की प्रतिक्रिया के आधार पर आगे की कूटनीतिक और सुरक्षा संबंधी रणनीति तय की जा सकती है। फिलहाल पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता और बढ़ा दी है।

  • ईरान-अमेरिका तनाव का भारत पर असर, बढ़ा आयात खर्च, जून में व्यापार घाटा 30.4 अरब डॉलर पर पहुंचा

    ईरान-अमेरिका तनाव का भारत पर असर, बढ़ा आयात खर्च, जून में व्यापार घाटा 30.4 अरब डॉलर पर पहुंचा


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के कारण भारत का आयात बिल बढ़ गया है। इसका सीधा असर देश के व्यापार घाटे पर पड़ा है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 में भारत का व्यापार घाटा बढ़कर करीब 30.4 अरब डॉलर पहुंच गया, जो पिछले पांच महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहा और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो भारत पर आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है।

    महंगे तेल ने बढ़ाया आयात खर्च
    भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ता है। जून महीने में कच्चे तेल का आयात 40 प्रतिशत से अधिक बढ़कर करीब 19.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसके पीछे मध्य-पूर्व में बढ़ा तनाव और सप्लाई को लेकर बनी अनिश्चितता को प्रमुख कारण माना जा रहा है।

    इसके अलावा खाद, इलेक्ट्रॉनिक सामान और मशीनरी के आयात में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके चलते जून में भारत का कुल आयात बढ़कर 70.8 अरब डॉलर हो गया।

    निर्यात बढ़ा, लेकिन घाटे पर नहीं लगी लगाम
    भारत के लिए राहत की बात यह रही कि जून में निर्यात में भी वृद्धि दर्ज की गई। देश का कुल निर्यात करीब 40.4 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल की तुलना में बेहतर प्रदर्शन है।

    इंजीनियरिंग उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां और रसायनों की विदेशी मांग मजबूत रही। इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में लगातार सुधार देखा गया, वहीं हीरे और आभूषणों के निर्यात में भी बढ़ोतरी हुई। हालांकि, आयात में हुई तेज वृद्धि के मुकाबले निर्यात की रफ्तार कम रही, जिसके कारण व्यापार घाटा बढ़ गया।

    आम लोगों पर क्या हो सकता है असर?
    व्यापार घाटे में बढ़ोतरी का असर केवल सरकारी आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता। यदि कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ सकती है, जिसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। इसके अलावा उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ने से कंपनियां अपने उत्पादों के दाम बढ़ा सकती हैं, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। इसी वजह से सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

    आगे की चुनौती और सरकार की रणनीति
    आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो भारत का आयात बिल ऊंचा बना रह सकता है। इससे चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। सरकार फिलहाल निर्यात बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के प्रयासों में जुटी है। इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में बढ़ता निर्यात सकारात्मक संकेत दे रहा है।

    हालांकि, भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए वैश्विक बाजार की स्थिति अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतें और भू-राजनीतिक हालात देश की आर्थिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर विवाद की खबरों को सर्जियो गोर ने बताया गलत, बोले- बातचीत सकारात्मक दिशा में जारी

    भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर विवाद की खबरों को सर्जियो गोर ने बताया गलत, बोले- बातचीत सकारात्मक दिशा में जारी


    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील को लेकर चल रही अटकलों पर अब अमेरिकी पक्ष की ओर से सफाई सामने आई है। भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने उन खबरों को खारिज कर दिया है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता अटक गया है या किसी पक्ष ने इसे अस्वीकार कर दिया है।

    सर्जियो गोर ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि ऐसी खबरें गलत हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और अमेरिका दोनों ही व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए प्रतिबद्ध हैं और हाल की बातचीत सकारात्मक रही है।

    सर्जियो गोर ने कहा- किसी पक्ष ने डील रिजेक्ट नहीं की
    अमेरिकी राजदूत ने एक्स पर लिखा, “फेक न्यूज अलर्ट! किसी ने कुछ भी रिजेक्ट नहीं किया है।” उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत सकारात्मक माहौल में आगे बढ़ रही है और ट्रेड डील को पूरा करने के लिए दोनों पक्ष सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। उन्होंने एक मीडिया रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि संबंधित पक्षों को इससे बेहतर काम करना चाहिए।

    भारत सरकार ने भी रिपोर्टों को बताया भ्रामक
    भारत सरकार ने भी उन दावों को खारिज किया है, जिनमें कहा गया था कि नई दिल्ली व्यापार समझौते में देरी कर रही है या पीछे हट गई है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इन दावों को झूठा, आधारहीन और भ्रामक बताया। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता लगातार जारी है और समझौते की दिशा में काफी प्रगति हुई है।

    गोयल ने यह भी कहा कि भारत ने अमेरिका के साथ ट्रेड डील से दूरी नहीं बनाई है और न ही जानबूझकर इसमें देरी की जा रही है। उन्होंने रॉयटर्स की रिपोर्ट में किए गए दावों को पूरी तरह गलत बताया।

    क्या थी रिपोर्ट में कही गई बात?
    इससे पहले समाचार एजेंसी की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत और अमेरिका बेहतर शर्तों की तलाश में व्यापार समझौते को लेकर सहमति तक नहीं पहुंच सके हैं।

    रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत अपने आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए किसी ऐसे समझौते में जल्दबाजी नहीं करना चाहता, जिससे घरेलू स्तर पर नुकसान हो। इसमें यह भी दावा किया गया था कि दोनों देश अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेसन ग्रीयर की भारत यात्रा के दौरान अंतरिम समझौते की शर्तों को अंतिम रूप देने में सफल नहीं हो पाए।

    रिपोर्ट के अनुसार, एक भारतीय अधिकारी ने दावा किया था कि अमेरिका की ओर से कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला है। इनमें चीन जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को लेकर टैरिफ लाभ और समझौते के बाद नए अमेरिकी शुल्कों से सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल बताए गए थे।

    संवेदनशील क्षेत्रों पर भारत का रुख
    रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि भारत कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जल्दबाजी में कोई समझौता नहीं करना चाहता। भारत का जोर ऐसे व्यापार समझौते पर है, जो दोनों देशों के हितों के अनुरूप हो। फिलहाल भारत और अमेरिका दोनों की ओर से यही संकेत दिए गए हैं कि बातचीत जारी है और ट्रेड डील को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।