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  • 7 साल के किराए पर 4000 एनालाइजर लेने की तैयारी: टेंडर की शर्तों में पुराने उपकरणों का अनुभव क्यों बना आधार, उठे गंभीर सवाल

    7 साल के किराए पर 4000 एनालाइजर लेने की तैयारी: टेंडर की शर्तों में पुराने उपकरणों का अनुभव क्यों बना आधार, उठे गंभीर सवाल


    भोपाल । मध्य प्रदेश में किसानों से खरीदे जाने वाले खाद्यान्न की गुणवत्ता जांचने के लिए प्रस्तावित एआई बेस्ड ऑटोमेटिक फूड ग्रेन एनालाइजर की टेंडर प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में है। एमपी स्टेट सिविल सप्लाईज कॉरपोरेशन करीब 4000 मशीनें 7 साल की अवधि के लिए किराए पर लेने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए जारी 2026 के टेंडर में निविदाकर्ताओं से एआई बेस्ड फूड ग्रेन एनालाइजर की सप्लाई इंस्टॉलेशन और इम्प्लीमेंटेशन का 5 साल का अनुभव मांगा गया था। दस्तावेजों की पड़ताल में यह सवाल सामने आया है कि जिन कंपनियों को तकनीकी बिड में योग्य माना गया उनमें से कुछ ने पुराने ग्रेन एनालाइजर और एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर जैसे उपकरणों की सप्लाई को अनुभव के तौर पर पेश किया है।

    सबसे बड़ा सवाल तकनीक की समयसीमा को लेकर है। चैटजीपीटी नवंबर 2022 में सार्वजनिक रूप से लॉन्च हुआ जबकि गूगल का बार्ड 2023 में भारत आया जिसे अब जेमिनी के नाम से जाना जाता है। ऐसे में टेंडर में एआई आधारित ग्रेन एनालाइजर के लिए पांच साल के अनुभव की शर्त ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार कुछ कंपनियों ने 2014 से 2021 के बीच सप्लाई किए गए एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर ग्रेन फिजिकल एनालाइजर ऑटोमेटिक ग्रेन एनालाइजर और ग्रेन ग्रेडिंग डिवाइस के रिकॉर्ड को अनुभव के तौर पर पेश किया। सवाल यह है कि क्या इन पुराने उपकरणों में वही एआई तकनीक मौजूद थी जिसकी मांग मौजूदा टेंडर में की गई है और अगर थी तो उसे साबित करने वाले तकनीकी दस्तावेज क्या हैं।

    दस्तावेजों में अमलिका मर्केन्टाइल की ओर से ओईएम नेबुला इनोवेशन का अनुभव प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख है। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक नेबुला इनोवेशन ने जनवरी और सितंबर 2023 में एफसीआई को कुल 400 एआई बेस्ड एनालाइजर सप्लाई किए थे। इसके बाद नवंबर 2024 में ओडिशा मंडी बोर्ड को 248 एआई बेस्ड एनालाइजर की सप्लाई का रिकॉर्ड बताया गया है। वहीं पुराने रिकॉर्ड में 2020 में राजस्थान मंडी बोर्ड को 136 ग्रेन फिजिकल एनालाइजर और हरियाणा मंडी बोर्ड को 54 ऑटोमेटिक ग्रेन एनालाइजर की सप्लाई का उल्लेख है। 2021 में गुजरात के डायरेक्टोरेट ऑफ फॉरेंसिक साइंस को एक ग्रेन ग्रेडिंग डिवाइस दिए जाने का रिकॉर्ड भी अनुभव में शामिल किया गया।

    इसी तरह फर्टिस इंडिया की ओर से भी नेबुला इनोवेशन के अनुभव प्रमाण प्रस्तुत किए गए। दूसरी कंपनी एयरपे पेमेंट सर्विसेस ने ओईएम ज्यूटैक ओप्टो इलेक्ट्रॉनिक का अनुभव लगाया। इसमें 2014 में फिक्की रिसर्च एंड एनालिसिस सेंटर को एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर सप्लाई करने के अलावा 2018 में पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और 2020 में मदुरा कोट्स तथा महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ को उपकरण उपलब्ध कराने के दस्तावेज बताए गए हैं।

    टेंडर प्रक्रिया में एक और महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है। शुरुआत में अनुभव की शर्त निविदाकर्ता के लिए रखी गई थी लेकिन बाद में इसमें संशोधन कर ओईएम के अनुभव को भी शामिल कर लिया गया। इस पूरी प्रक्रिया में सात बार संशोधन किए जाने की बात सामने आई है। यही बदलाव अब टेंडर की पारदर्शिता और पात्रता के मानकों को लेकर चर्चा का कारण बन रहे हैं।

    मामले में असली सवाल यह नहीं है कि पुराने उपकरणों को अनुभव माना गया या नहीं बल्कि यह है कि जिस तकनीक के आधार पर आज की मशीनों की क्षमता तय की जा रही है क्या वही तकनीकी विशेषताएं पुराने उपकरणों में भी मौजूद थीं। अगर पुराने एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर या पारंपरिक ग्रेन एनालाइजर को एआई बेस्ड फूड ग्रेन एनालाइजर के अनुभव के बराबर माना गया है तो उसके तकनीकी आधार और प्रमाण क्या हैं यह स्पष्ट होना जरूरी है।

    क्योंकि मामला केवल टेंडर में कंपनियों के चयन तक सीमित नहीं है। हजारों मशीनों को सात साल की लंबी अवधि के लिए किराए पर लेने की योजना है और इनका इस्तेमाल किसानों से खरीदे जाने वाले खाद्यान्न की गुणवत्ता जांचने में किया जाना है। ऐसे में मशीनों की तकनीकी क्षमता उनकी सटीकता और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता सीधे तौर पर सार्वजनिक हित से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि टेंडर में अनुभव की शर्त पुराने उपकरणों के रिकॉर्ड और सात बार किए गए संशोधनों को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।

    अब निगाह इस बात पर है कि कॉरपोरेशन इन सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या यह साफ करता है कि जिन कंपनियों को तकनीकी रूप से योग्य माना गया उनके अनुभव में वास्तव में एआई आधारित तकनीक मौजूद थी या पुराने उपकरणों को नए एआई सिस्टम के अनुभव के रूप में स्वीकार किया गया। जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पूरी प्रक्रिया तकनीकी जरूरत के मुताबिक हुई है या टेंडर की शर्तों में हुए बदलावों ने पात्रता का दायरा बदल दिया।

  • बंडा शराब कांड में मौतों की गिनती बनी बड़ा सवाल: सरकार के 19 आंकड़े पर पटवारी ने उठाए सवाल, बोले- सही संख्या बताएं

    बंडा शराब कांड में मौतों की गिनती बनी बड़ा सवाल: सरकार के 19 आंकड़े पर पटवारी ने उठाए सवाल, बोले- सही संख्या बताएं


    भोपाल । सागर जिले के बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब पीने से हुई मौतों के मामले ने अब राजनीतिक तकरार का रूप ले लिया है। त्रासदी के बाद मृतकों की संख्या को लेकर सरकार और विपक्ष के दावे अलग अलग सामने आ रहे हैं। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल ने जहां 19 मृतकों के नाम सार्वजनिक कर पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दावा किया है कि इस घटना में 50 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। दोनों पक्षों के अलग आंकड़ों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली और आधिकारिक जानकारी को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

    मंत्री प्रहलाद पटेल ने सोशल मीडिया के जरिए 19 मृतकों की सूची सार्वजनिक की। इसके साथ ही उन्होंने प्रभावित परिवारों को सरकारी योजनाओं के तहत आर्थिक सहायता देने की बात कही। मंत्री के मुताबिक संबल योजना में पंजीकृत श्रमिकों के परिवारों को पात्रता के अनुसार 4 लाख रुपए की अनुग्रह राशि दी जाएगी। वहीं ऐसे परिवार जो इस योजना के दायरे में नहीं आते हैं उन्हें मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान और सहायता कोष के माध्यम से आर्थिक मदद उपलब्ध कराने की बात कही गई है। सरकार की ओर से यह कदम मृतकों के परिवारों को तत्काल राहत देने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

    दूसरी ओर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार और जिला प्रशासन के आंकड़ों पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। पटवारी का कहना है कि बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब की वजह से मरने वालों की संख्या 50 से ज्यादा है और सरकार को वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए। उन्होंने प्रशासन की ओर से अलग अलग समय पर बताए गए आंकड़ों को लेकर भी सवाल उठाया। पटवारी के मुताबिक सागर जिला प्रशासन कभी 13 तो कभी 15 मौतों की जानकारी देता रहा जबकि अब सरकार के वरिष्ठ मंत्री खुद 19 मृतकों के नाम सार्वजनिक कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर वास्तविक संख्या कितनी है।

    पटवारी सोमवार को प्रभावित गांवों के दौरे पर भी पहुंचे थे। उन्होंने मृतकों के परिवारों से मुलाकात कर हालात का जायजा लिया और सरकार से पीड़ितों की मदद बढ़ाने की मांग की। पटवारी ने मृतकों में बड़ी संख्या लोधी समाज के लोगों की होने का हवाला देते हुए मंत्री प्रहलाद पटेल से भी प्रभावित परिवारों के बीच पहुंचकर उनकी सहायता करने की अपील की थी। इसके बाद मंत्री की ओर से मृतकों के नामों की सूची जारी की गई।

    इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मुद्दा अब मौतों की सही संख्या को लेकर बन गया है। एक तरफ सरकार की ओर से 19 मृतकों के नाम सार्वजनिक किए जा चुके हैं तो दूसरी तरफ विपक्ष 50 से ज्यादा मौतों का दावा कर रहा है। ऐसे में आम लोगों और प्रभावित परिवारों के बीच भी यह सवाल उठ रहा है कि सरकारी रिकॉर्ड में कितनी मौतें दर्ज हैं और वास्तविक रूप से कितने परिवार इस त्रासदी से प्रभावित हुए हैं।

    जहरीली शराब कांड के बाद प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। शराब की बिक्री और उसकी गुणवत्ता की निगरानी से लेकर समय पर कार्रवाई और पीड़ितों की पहचान तक कई स्तरों पर जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है। विपक्ष लगातार सरकार पर दबाव बना रहा है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और मौतों के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं।

    फिलहाल मंत्री प्रहलाद पटेल द्वारा जारी 19 मृतकों की सूची और जीतू पटवारी के 50 से ज्यादा मौतों के दावे ने मामले को और गंभीर बना दिया है। अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल प्रभावित परिवारों को राहत पहुंचाने की नहीं बल्कि मौतों की वास्तविक संख्या स्पष्ट करने की भी है। जब तक आधिकारिक आंकड़ा पूरी तरह सामने नहीं आता तब तक बंडा जहरीली शराब कांड को लेकर उठ रहे सवाल और राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप जारी रहने की संभावना है।

  • बच्चों की मौत के बाद बालाघाट में बढ़ी चिंता: सरकारी दावों पर सवाल, इलाज के बाद फिर बीमार पड़ रहे मासूम

    बच्चों की मौत के बाद बालाघाट में बढ़ी चिंता: सरकारी दावों पर सवाल, इलाज के बाद फिर बीमार पड़ रहे मासूम


    भोपाल । मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के आदिवासी इलाकों में पिछले ढाई महीने से बच्चों की लगातार हो रही मौतों ने पूरे प्रदेश को चिंता में डाल दिया है। जून के आखिरी सप्ताह से बैहर और बिरसा ब्लॉक के कई बैगा और गोंड बहुल गांवों में बच्चों के बीमार पड़ने का सिलसिला शुरू हुआ था जो अब तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। सबसे बड़ा सवाल मौतों की संख्या को लेकर है। शुरुआत में प्रशासन की ओर से केवल 8 बच्चों की मौत की बात सामने आई लेकिन गांवों में पहुंची जमीनी पड़ताल और स्थानीय लोगों के दावों के बाद यह आंकड़ा लगातार बढ़ता गया। अलग अलग रिपोर्टों में अब 30 से ज्यादा बच्चों की मौत की बात सामने आ रही है जबकि प्रशासन की ओर से अभी तक मौतों का कोई स्पष्ट और आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है।

    सोनगुड्डा बोंदारी कुंडेकसा कोरका गठिया मछूलदा और मातला जैसे गांवों से बच्चों के बीमार होने और मौत की खबरें सामने आईं। ग्रामीणों का आरोप है कि कई मौतें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज तक नहीं हुईं। अडोरी पंचायत के सरपंच ने तो अपनी पंचायत में ही 9 बच्चों की मौत का दावा किया है। दूसरी ओर सरकार की मेडिकल स्क्रीनिंग में बीमारी की गंभीर स्थिति सामने आई है। केंद्रीय टीम ने इलाके में 32433 लोगों की जांच की जिसमें 7711 बच्चे गंभीर कुपोषित पाए गए। इनमें 518 बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती करना पड़ा। वहीं 13406 बच्चे डायरिया से पीड़ित मिले जबकि 274 बच्चों में गंभीर निमोनिया के लक्षण पाए गए। जुलाई से अब तक 431 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया जिनमें से 379 बच्चों को उपचार के बाद छुट्टी दी जा चुकी है जबकि 52 बच्चे अब भी इलाजरत हैं।

    इन मौतों के पीछे किसी एक बीमारी को जिम्मेदार नहीं माना जा रहा है। कई बच्चों में मलेरिया डायरिया खसरा और चर्म रोग जैसी समस्याएं सामने आईं लेकिन लगभग सभी मामलों में कुपोषण एक बड़ी साझा समस्या बनकर उभरा। यही कुपोषण बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर रहा है और सामान्य दिखने वाली बीमारियों को भी गंभीर बना रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों का शरीर संक्रमण से मुकाबला नहीं कर पाता। जिंक विटामिन ए और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों की कमी के कारण डायरिया और निमोनिया जैसी बीमारियां भी उनके लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं।

    बालाघाट पहले से ही मलेरिया के लिहाज से संवेदनशील जिला रहा है। पिछले वर्ष प्रदेश में दर्ज 2126 मलेरिया मामलों में 685 मामले अकेले बालाघाट से सामने आए थे। इस वर्ष जुलाई तक प्रदेश में मिले 583 मामलों में भी 174 मामले बालाघाट के थे। इसके साथ ही बैगा समुदाय की बस्तियां जंगल और दुर्गम क्षेत्रों में होने के कारण स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। साफ पानी की कमी और लंबे समय तक पोषण आहार नहीं मिलने की समस्या ने हालात को और गंभीर किया है।

    सबसे चिंता की बात यह है कि इलाज के बाद घर लौटने वाले कुछ बच्चे दोबारा बीमार होकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पताल में इलाज कर देना पर्याप्त नहीं है बल्कि बच्चों के पोषण और गांव के स्वास्थ्य वातावरण पर भी लगातार निगरानी जरूरी है। डायरिया होने पर तत्काल ओआरएस देना जिंक की खुराक पूरी करना और बच्चे की हालत बिगड़ने पर बिना देरी स्वास्थ्य केंद्र ले जाना जरूरी बताया गया है।

    मामले में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे हैं। गलत आंकड़े बताए जाने के आरोपों के बाद तत्कालीन सीएमएचओ को हटाया गया। एक बच्चे की मौत के बाद बिना पोस्टमार्टम अंतिम संस्कार कराए जाने के ग्रामीण आरोपों ने भी विवाद बढ़ाया। अस्पतालों में फोटो और मीडिया कवरेज पर रोक लगाने का आदेश जारी होने और कुछ ही घंटों में वापस लिए जाने से भी पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हुए।

    सरकार ने स्थिति संभालने के लिए कई कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रभावित बैगा गांव पहुंचे और मृत बच्चों के परिवारों से मुलाकात कर आर्थिक सहायता की घोषणा की। जिला अस्पताल के बच्चों के वार्ड की क्षमता बढ़ाई गई है। छह मोबाइल मेडिकल यूनिट तैनात की गई हैं और निगरानी का दायरा बढ़ाया गया है। गांवों में सफाई अभियान और कीटनाशक छिड़काव भी कराया गया है।

    इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल अभी भी वहीं खड़ा है कि आखिर इन बच्चों की मौतों की वास्तविक संख्या कितनी है और बीमारी की जड़ क्या है। कुपोषण मलेरिया संक्रमण दूषित पानी और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था सभी एक साथ जिम्मेदार हैं या इसके पीछे कोई और कारण भी है यह स्पष्ट होना बाकी है। ऐसे में जरूरी है कि मौतों के आंकड़ों को पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किया जाए और हर प्रभावित गांव की स्वतंत्र जांच कराई जाए। क्योंकि बालाघाट की इन आदिवासी बस्तियों में सवाल सिर्फ बीमार बच्चों का नहीं बल्कि उन परिवारों के भरोसे का भी है जो अपने बच्चों को बचाने के लिए अब भी जवाब का इंतजार कर रहे हैं।

  • मास्टर प्लान के लिए भोपाल में दौड़े शहरवासी: मसूद ने सरकार को घेरा अरेरा कॉलोनी की जर्जर सड़कें भी जल्द बनाएं

    मास्टर प्लान के लिए भोपाल में दौड़े शहरवासी: मसूद ने सरकार को घेरा अरेरा कॉलोनी की जर्जर सड़कें भी जल्द बनाएं


    भोपाल । भोपाल में लंबे समय से अटके मास्टर प्लान को लागू कराने की मांग अब सड़क तक पहुंच गई है। राजधानी में बुधवार को कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद की अगुआई में रन फॉर मास्टर प्लान दौड़ आयोजित की गई जिसमें बड़ी संख्या में युवा महिलाएं छात्र व्यापारी और शहर के अलग अलग क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल हुए। 11 नंबर बस स्टॉप से शुरू हुई इस मैराथन के जरिए लोगों ने सरकार से भोपाल का मास्टर प्लान जल्द लागू करने की मांग उठाई। दौड़ के दौरान शहर के विकास और भविष्य की जरूरतों को लेकर आवाज बुलंद की गई। प्रतिभागियों का कहना था कि राजधानी जैसे तेजी से बढ़ते शहर के लिए स्पष्ट मास्टर प्लान बेहद जरूरी है क्योंकि इसके अभाव में विकास कार्यों से लेकर जमीन के उपयोग और यातायात व्यवस्था तक कई स्तरों पर परेशानियां सामने आ रही हैं।

    विधायक आरिफ मसूद ने कहा कि भोपाल का मास्टर प्लान करीब दो दशक से अटका हुआ है और इसका खामियाजा सीधे आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब उज्जैन का मास्टर प्लान सामने आ सकता है तो भोपाल का मास्टर प्लान आखिर क्यों अटका हुआ है। उनका कहना था कि एक ही प्रदेश में शहरों के लिए अलग अलग रवैया नहीं होना चाहिए। भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी है और यहां भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकास की स्पष्ट दिशा तय होना जरूरी है।

    मसूद ने कहा कि इस आंदोलन के पीछे किसी राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं बल्कि शहर के लोगों की बुनियादी जरूरतें हैं। बच्चे युवा महिलाएं व्यापारी और आम नागरिक एक ही मांग कर रहे हैं कि भोपाल का मास्टर प्लान जल्द लागू किया जाए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं लेकिन शहर के विकास के मामले में किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक मास्टर प्लान के अभाव में कई क्षेत्रों में निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

    इस दौरान मास्टर प्लान के साथ अरेरा कॉलोनी और आई टू से आई एट क्षेत्र की सड़कों का मुद्दा भी जोरशोर से उठाया गया। इन इलाकों में सीवेज लाइन और अन्य निर्माण कार्यों के लिए खोदी गई सड़कों की हालत खराब होने से लोगों को आवाजाही में परेशानी हो रही है। मसूद ने मांग की कि सड़क निर्माण का काम तत्काल शुरू कराया जाए। उन्होंने कहा कि सड़क का भूमिपूजन कौन करता है या निर्माण का श्रेय किसे मिलता है इससे उन्हें कोई मतलब नहीं है। जरूरत यह है कि लोगों को जल्द राहत मिले और पूरी अरेरा कॉलोनी की सड़कों को व्यवस्थित तरीके से बनाया जाए।

    मैराथन में स्पाइडर मैन का मास्क पहनकर पहुंचे एक युवक ने भी लोगों का ध्यान खींचा। खुद को स्पीडी बताने वाले युवक ने कहा कि वह भोपाल के भविष्य के लिए मास्टर प्लान लागू कराने की मांग को लेकर दौड़ में शामिल हुआ है। उसका कहना था कि मास्टर प्लान के अभाव में शहर में ट्रैफिक और आम लोगों की आवाजाही से जुड़ी परेशानियां बढ़ रही हैं।

    भोपाल में मास्टर प्लान के लंबे समय से लंबित रहने का असर जमीन के उपयोग नए निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों पर भी दिखाई दे रहा है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत नगर निगम की ओर से की जा रही सीलिंग कार्रवाई को लेकर भी व्यापारियों और संपत्ति मालिकों में चिंता बनी हुई है। शहर में विकास के नियमों को लेकर स्पष्टता नहीं होने से कई लोगों के सामने असमंजस की स्थिति है। ऐसे में रन फॉर मास्टर प्लान के जरिए उठी आवाज ने सरकार के सामने राजधानी के भविष्य की योजना को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

  • कहीं नेता के लिए रुकी जनसुनवाई, कहीं फरियादी खुद विधायक को घर ले गई: अधूरे ब्रिज पर नारे और पंडितजी का बंगला भी चर्चा में

    कहीं नेता के लिए रुकी जनसुनवाई, कहीं फरियादी खुद विधायक को घर ले गई: अधूरे ब्रिज पर नारे और पंडितजी का बंगला भी चर्चा में


    भोपाल । मध्य प्रदेश में राजनीति और नौकरशाही की ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं जिनमें कहीं आम और खास के बीच का फर्क दिखाई देता है तो कहीं जनता और जनप्रतिनिधि के बीच सीधे संवाद की एक उम्मीद नजर आती है। शिवपुरी में जनसुनवाई के दौरान भाजपा नेता के पहुंचते ही कलेक्टर का कुर्सी से उठकर उनसे मिलना और फिर उन्हें अपने केबिन में लेकर जाना चर्चा का विषय बन गया। दूसरी ओर गुना में एक बुजुर्ग महिला कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह का हाथ पकड़कर उन्हें अपने आधे अधूरे घर तक ले गई। इन दोनों घटनाओं ने लोकतंत्र और प्रशासन की प्राथमिकताओं पर अपने अपने तरीके से सवाल खड़े किए हैं।

    शिवपुरी में कलेक्टर जनसुनवाई कर रहे थे और आम लोग अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे हुए थे। इसी दौरान भाजपा जिला अध्यक्ष वहां पहुंचे। बताया गया कि कलेक्टर ने उनसे मुलाकात की और फिर जनसुनवाई के बीच ही उन्हें अपने केबिन में लेकर चले गए। कुछ देर बाद कलेक्टर वापस लौटे और लोगों की समस्याएं सुनने का सिलसिला फिर शुरू हुआ लेकिन तब तक यह दृश्य चर्चा में आ चुका था। सवाल यह उठने लगा कि यदि कोई आम व्यक्ति अपनी समस्या लेकर जनसुनवाई में पहुंचता है तो उसे अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है लेकिन किसी राजनीतिक पदाधिकारी के आने पर प्राथमिकता बदल क्यों जाती है। यह घटना भले कुछ मिनटों की रही हो लेकिन आम और खास के बीच व्यवहार के अंतर को लेकर बहस जरूर छेड़ गई।

    इसके विपरीत गुना जिले में राघौगढ़ विधानसभा क्षेत्र के दौरे पर पहुंचे कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह के सामने एक बुजुर्ग महिला ने अपनी परेशानी सीधे रखी। महिला विधायक का हाथ पकड़कर उन्हें अपने घर तक ले गई और अपना अधूरा मकान दिखाया। उसने बताया कि घर में प्लास्टर और पुताई का काम अब तक पूरा नहीं हो पाया है। विधायक ने महिला को मदद और घर का काम पूरा कराने का भरोसा दिया। यह दृश्य राजनीति की तस्वीर के रूप में चर्चा में रहा लेकिन इसके पीछे एक बड़ा संदेश भी छिपा है कि जनता को अपने प्रतिनिधियों तक बिना डर और संकोच पहुंचने का अधिकार होना चाहिए। लोकतंत्र की असली खूबसूरती तभी है जब कोई आम नागरिक बेझिझक अपने जनप्रतिनिधि का हाथ पकड़कर अपनी परेशानी बता सके।

    उधर इंदौर जिले के महू में अधूरे रेलवे ओवरब्रिज को लेकर राजनीतिक विरोध का अलग तरीका देखने को मिला। ब्रिज निर्माण में हो रही देरी से नाराज कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उसकी बाउंड्री पर सरकार नेता और ठेकेदार को निशाने पर लेते हुए नारे लिखवा दिए। काम की धीमी रफ्तार और विकास के नाम पर सवाल उठाते इन स्लोगन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गईं। इसके बाद प्रशासन ने बाउंड्री पर लिखे नारों को सफेद रंग से पुतवा दिया। कांग्रेस ने इसी मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन और कीर्तन भी किया। विपक्ष का तर्क है कि यदि निर्माण कार्य पूरा करने में भी उतनी ही तेजी दिखाई जाती जितनी नारों को मिटाने में दिखाई गई तो शायद विरोध की जरूरत ही नहीं पड़ती।

    राजनीति के इन खुले दृश्यों के बीच भोपाल की अंदरूनी सियासत से जुड़ी चर्चा भी सुर्खियों में रही। खबर में एक ऐसे भाजपा नेता का जिक्र है जिन्हें पंडितजी के नाम से संबोधित किया गया है और जो विधायक या मंत्री न होने के बावजूद अपना सरकारी बंगला 2028 तक बचाने में सफल रहे हैं। चर्चा है कि बंगले को लेकर बदलाव की तैयारी थी लेकिन दिल्ली स्तर पर हस्तक्षेप के बाद मामला बदल गया। बंगला समाज सेवा के नाम पर आवंटित बताया जा रहा है जबकि राजनीतिक गलियारों में इसे भविष्य की सियासत के केंद्र के रूप में भी देखा जा रहा है।

    कुल मिलाकर मध्य प्रदेश की इन घटनाओं ने सत्ता राजनीति और प्रशासन की कई परतें खोल दी हैं। कहीं आम आदमी इंतजार करता दिखाई देता है और खास व्यक्ति को प्राथमिकता मिलती नजर आती है तो कहीं एक बुजुर्ग महिला सीधे अपने विधायक तक पहुंचकर अपनी समस्या बताती है। अधूरे विकास कार्यों पर विपक्ष नारे लिखकर सरकार को घेरता है और दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में बंगले बचाने की सियासत चलती है। यही राजनीति और व्यवस्था की वह तस्वीर है जिसमें सवाल भी हैं और उम्मीदें भी।

  • शिवपुरी में नशे का खौफनाक VIDEO सामने आया: खुलेआम स्मैक बेचते दिखे युवक और सड़क पर सिरिंज से नशा करता मिला दूसरा युवक

    शिवपुरी में नशे का खौफनाक VIDEO सामने आया: खुलेआम स्मैक बेचते दिखे युवक और सड़क पर सिरिंज से नशा करता मिला दूसरा युवक


    शिवपुरी । शिवपुरी शहर में नशे के कारोबार और खुलेआम नशीले पदार्थों के सेवन को लेकर सामने आए दो वीडियो ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर में एक तरफ पुलिस की ओर से नशे से दूरी है जरूरी अभियान चलाया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ सामने आए वीडियो में कथित तौर पर नशे की खरीद बिक्री और सेवन के दृश्य दिखाई दे रहे हैं। दोनों वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए वीडियो में नजर आ रहे युवकों की पहचान शुरू कर दी है।

    पहला वीडियो शिवपुरी के लुधावली क्षेत्र के वार्ड नंबर 17 का बताया जा रहा है। वीडियो में कुछ युवक एक स्थान पर नजर आ रहे हैं। इसमें दो युवक एक लड़के को कथित तौर पर स्मैक बेचते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो के सामने आने के बाद इलाके में नशे के कारोबार को लेकर चर्चा तेज हो गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि सार्वजनिक स्थान पर नशीले पदार्थ की खरीद बिक्री हो रही है तो इस पर निगरानी रखने वाली व्यवस्था को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई। हालांकि वीडियो में दिखाई दे रहे युवकों की वास्तविक पहचान और वहां मौजूद पदार्थ की पुष्टि पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगी।

    इसी बीच दूसरा वीडियो भी सामने आया है जो हवाई पट्टी के पास लगने वाली रेत मंडी का बताया जा रहा है। इस वीडियो में एक युवक सड़क किनारे बैठा दिखाई देता है और उसके हाथ में सिरिंज नजर आती है। वीडियो के मुताबिक युवक कथित तौर पर सिरिंज के जरिए नशा कर रहा था। वहां मौजूद दो लोगों ने युवक को इस तरह खुलेआम नशा करते देखा तो उसे पकड़ लिया और सड़क पर नशा करने को लेकर फटकार लगाई।

    पूछताछ के दौरान युवक ने खुद को ईंट के कारोबार से जुड़ा बताया। उसने यह भी बताया कि वह फिजिकल थाना क्षेत्र का रहने वाला है। वीडियो सामने आने के बाद यह मामला भी पुलिस के संज्ञान में आया है। सार्वजनिक स्थान पर इस तरह नशीले पदार्थ का सेवन दिखाई देना शहर में नशे की समस्या की गंभीरता को सामने लाता है।

    इन दोनों वीडियो के सामने आने के बाद अब पुलिस की भूमिका अहम हो गई है। देहात थाना प्रभारी विकास यादव ने बताया कि स्मैक बेचने और खरीदने से जुड़ा वीडियो सामने आया है। वीडियो में दिखाई दे रहे युवकों की पहचान की जा रही है। पहचान होने के बाद मामले में कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

    फिलहाल पुलिस वीडियो की जांच कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि वीडियो में दिखाई दे रहे युवक कौन हैं और नशे से जुड़े इस पूरे मामले के पीछे कौन लोग सक्रिय हैं। यदि जांच में नशीले पदार्थ की खरीद बिक्री की पुष्टि होती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इन घटनाओं ने एक बार फिर शहर में नशे के खिलाफ लगातार निगरानी और सख्त कार्रवाई की जरूरत को सामने ला दिया है।

  • इंटर्न डॉक्टरों के प्रदर्शन का बड़ा असर: गांधी मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी सेवाएं भी बंद मरीजों की बढ़ी परेशानी

    इंटर्न डॉक्टरों के प्रदर्शन का बड़ा असर: गांधी मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी सेवाएं भी बंद मरीजों की बढ़ी परेशानी


    भोपाल। गांधी मेडिकल कॉलेज में इंटर्न डॉक्टरों की हड़ताल का असर अब स्वास्थ्य सेवाओं पर साफ दिखाई देने लगा है। स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे इंटर्न डॉक्टरों ने अस्पताल की कई सेवाओं से दूरी बना ली है। हालात यहां तक पहुंच गए कि इमरजेंसी सेवाएं भी प्रभावित हुईं। अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों और उनके परिजनों को इलाज के लिए परेशान होना पड़ा। अचानक सेवाओं के प्रभावित होने से अस्पताल परिसर में अफरा तफरी का माहौल बन गया।

    इंटर्न डॉक्टर लंबे समय से अपने स्टाइपेंड में बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि मौजूदा स्टाइपेंड उनकी जिम्मेदारियों और काम के मुकाबले काफी कम है। डॉक्टरों का तर्क है कि इंटर्नशिप के दौरान उन्हें अस्पताल में नियमित रूप से मरीजों की देखभाल करनी पड़ती है। ओपीडी से लेकर वार्ड और इमरजेंसी तक अलग अलग जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। इसके बावजूद उन्हें मिलने वाला स्टाइपेंड उनकी जरूरतों के हिसाब से पर्याप्त नहीं है। इसी मांग को लेकर डॉक्टरों ने काम बंद आंदोलन का रास्ता अपनाया है।

    प्रदर्शन के बीच गांधी मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी सेवाओं के प्रभावित होने की जानकारी सामने आने के बाद अस्पताल प्रबंधन में भी हलचल बढ़ गई। इमरजेंसी में आने वाले मरीजों के लिए किसी भी तरह की देरी गंभीर परेशानी का कारण बन सकती है। ऐसे में डॉक्टरों के काम से अलग होने के कारण मरीजों और उनके परिजनों की चिंता बढ़ गई। कई लोग इलाज और चिकित्सकीय सलाह के लिए अस्पताल पहुंचे लेकिन सेवाओं के प्रभावित होने से उन्हें इंतजार करना पड़ा।

    मामले की जानकारी डीन डॉ. झारोकर मालवीय ने दी। उन्होंने बताया कि इंटर्न डॉक्टरों के आंदोलन और सेवाओं के प्रभावित होने की स्थिति सामने आई है। डॉक्टरों की मांगों को लेकर प्रशासन और संबंधित अधिकारियों के स्तर पर बातचीत का दौर भी चल रहा है। हालांकि आंदोलनकारी डॉक्टर अपनी मांगों पर स्पष्ट निर्णय चाहते हैं और इसी वजह से विरोध लगातार जारी है।

    इंटर्न डॉक्टरों का कहना है कि वे अपनी मांगों को लेकर कई बार जिम्मेदार अधिकारियों तक बात पहुंचा चुके हैं। उनका कहना है कि केवल आश्वासन से अब आंदोलन खत्म नहीं होगा। डॉक्टर स्टाइपेंड में उचित बढ़ोतरी के साथ अपनी दूसरी मांगों पर भी ठोस कार्रवाई चाहते हैं। जब तक उन्हें संतोषजनक फैसला नहीं मिलता तब तक आंदोलन जारी रखने की बात कही जा रही है।

    गांधी मेडिकल कॉलेज में सेवाओं के प्रभावित होने का सीधा असर आम मरीजों पर पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों में बड़ी संख्या में गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार इलाज के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में डॉक्टरों की हड़ताल लंबी खिंचने पर मरीजों की परेशानी और बढ़ सकती है। अस्पताल प्रबंधन के सामने चुनौती यह है कि आंदोलन के बीच जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं को किस तरह सुचारू रखा जाए।

    फिलहाल इंटर्न डॉक्टर अपनी मांगों को लेकर पीछे हटने के मूड में नजर नहीं आ रहे हैं। वहीं अस्पताल प्रशासन भी स्थिति को संभालने और मरीजों को जरूरी उपचार उपलब्ध कराने की कोशिश में जुटा है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और डॉक्टरों के बीच बातचीत से कोई ठोस समाधान निकलता है या नहीं। अगर जल्द फैसला नहीं हुआ तो गांधी मेडिकल कॉलेज में स्वास्थ्य सेवाओं पर संकट और गहरा सकता है।

  • बछ बारस पर उज्जैन में दिखा कृष्ण का बाल रूप: 10 फीट ऊपर बंधी माखन मटकी फूटी, भक्तों में बंटा प्रसाद

    बछ बारस पर उज्जैन में दिखा कृष्ण का बाल रूप: 10 फीट ऊपर बंधी माखन मटकी फूटी, भक्तों में बंटा प्रसाद


    उज्जैन । उज्जैन शहर के मध्य स्थित सिंधिया ट्रस्ट के द्वारकाधीश गोपाल मंदिर में बछ बारस के अवसर पर मंगलवार को पारंपरिक मटकी फोड़ आयोजन किया गया। जन्माष्टमी के चार दिन बाद होने वाले इस आयोजन में भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की झांकी ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। मंदिर के मुख्य द्वार पर करीब 10 फीट की ऊंचाई पर माखन से भरी मटकी बांधी गई थी। दोपहर करीब 12 बजे कृष्ण के रूप में सजे एक छोटे बालक को मंदिर से बाहर लाया गया। बाल कृष्ण ने लाठी की मदद से ऊंचाई पर बंधी मटकी फोड़ी। मटकी टूटते ही पूरा मंदिर परिसर नंद के आनंद भयो जय कन्हैयालाल की के जयकारों से गूंज उठा।

    मटकी फूटने के बाद उसमें रखा माखन श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद के रूप में बांटा गया। भक्तों को माखन के साथ मिश्री और धानी का प्रसाद भी वितरित किया गया। आयोजन को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर में मौजूद रहे। इस दौरान धार्मिक उत्साह और भक्ति का माहौल नजर आया। मटकी फोड़ने की परंपरा के बाद भगवान द्वारकाधीश की चांदी की पादुकाओं का विधिवत पूजन किया गया। इसके बाद दोपहर करीब एक बजे मंदिर में दिन के समय शयन आरती संपन्न हुई।

    मंदिर से जुड़े श्रद्धालु संजय मालिया के अनुसार यह आयोजन वर्षों पुरानी परंपरा का हिस्सा है। जन्माष्टमी के बाद चार दिनों तक भगवान की रात में शयन आरती नहीं की जाती। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में भगवान के सोने और जागने का कोई निश्चित समय नहीं माना जाता। बछ बारस के दिन मटकी फोड़ने के बाद भगवान के शयन की परंपरा निभाई जाती है। इसी कारण साल में एक बार दिन के समय शयन आरती की जाती है।

    इस आयोजन की एक खास बात यह भी रही कि बच्चों को राधा और कृष्ण के रूप में सजाया गया। मंदिर के व्यवस्थापक और पुजारी परिवार के सदस्य मुख्य द्वार पर पहुंचे और परंपरागत तरीके से मटकी फोड़ कार्यक्रम संपन्न कराया। बाल कृष्ण के रूप में सजे बच्चे को देखकर श्रद्धालुओं में खास उत्साह दिखाई दिया। मटकी फूटने के बाद भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया और भगवान द्वारकाधीश के दर्शन किए।

    गोपाल मंदिर में बछ बारस का यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ उज्जैन की समृद्ध कृष्ण भक्ति परंपरा को भी दर्शाता है। जन्माष्टमी के उत्सव के बाद होने वाला यह आयोजन श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। बाल कृष्ण के हाथों माखन की मटकी फूटने के साथ मंदिर परिसर में उमड़ा उल्लास पूरे आयोजन का सबसे आकर्षक दृश्य रहा।

  • जबलपुर में साइबर ठगी का हैरान करने वाला मामला: मोबाइल बंद होने के बाद खाते से निकले 88 हजार, 3 UPI ट्रांजैक्शन से उड़ाई रकम

    जबलपुर में साइबर ठगी का हैरान करने वाला मामला: मोबाइल बंद होने के बाद खाते से निकले 88 हजार, 3 UPI ट्रांजैक्शन से उड़ाई रकम


    जबलपुर । जबलपुर में साइबर ठगी का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसमें मोबाइल अचानक बंद होने के बाद युवक को लगा कि फोन में तकनीकी खराबी आ गई है लेकिन कुछ देर बाद जब वह नया मोबाइल खरीदने पहुंचा तो उसके होश उड़ गए। बैंक खाते में करीब 88 हजार रुपए होने के बावजूद मोबाइल से भुगतान नहीं हो सका। खाते में सिर्फ 36 पैसे बचे थे। जब मिनी स्टेटमेंट निकलवाया गया तो पता चला कि खाते से तीन अलग-अलग UPI ट्रांजैक्शन के जरिए 88 हजार 542 रुपए निकाले जा चुके हैं।

    मामला राजीव गांधी नगर निवासी 46 वर्षीय वीरेन्द्र बावरिया का है। वीरेन्द्र जबलपुर नगर निगम में ठेकेदारी करते हैं। उन्होंने इस मामले की शिकायत कैंट थाने में दर्ज कराई है। पुलिस ने अज्ञात साइबर ठगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4) के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

    घटना 9 अगस्त की बताई जा रही है। वीरेन्द्र काम पर जाने से पहले भैंसासुर रोड स्थित एक दुकान पर रुके थे। वहां उन्होंने QR कोड स्कैन कर 150 रुपए का UPI भुगतान किया। इसके बाद वह तीन पत्ती चौक स्थित नगर निगम कार्यालय पहुंच गए। दोपहर करीब डेढ़ बजे उनका ओप्पो एंड्रॉयड मोबाइल अचानक ऑटो अपडेट होने लगा। अपडेट की प्रक्रिया के दौरान फोन बंद हो गया और इसके बाद दोबारा चालू नहीं हुआ।

    वीरेन्द्र को लगा कि फोन की बैटरी या सॉफ्टवेयर में कोई खराबी आ गई है। वह फोन लेकर ITI माढ़ोताल स्थित कटंगी रोड की एक मोबाइल दुकान पर पहुंचे। दुकानदार ने फोन चेक करने के बाद बताया कि बैटरी पूरी तरह डिस्चार्ज है और पुरानी बैटरी ठीक से काम नहीं कर रही है। फोन की समस्या के चलते वीरेन्द्र ने नया मोबाइल खरीदने का फैसला किया।

    उन्होंने उसी दुकान से करीब 14 हजार रुपए का नया मोबाइल लेने की बात तय की। भुगतान के लिए उन्होंने PhonePe का इस्तेमाल करने की कोशिश की लेकिन स्क्रीन पर बैलेंस कम होने का मैसेज दिखाई दिया। यह देखकर वह हैरान रह गए क्योंकि उन्हें खाते में पर्याप्त रकम होने की उम्मीद थी। बैंक खाते की जानकारी लेने पर पता चला कि उसमें सिर्फ 36 पैसे बचे हैं।

    इसके बाद वीरेन्द्र पास के SBI ATM पहुंचे और मिनी स्टेटमेंट निकाला। स्टेटमेंट देखते ही उन्हें खाते से रकम निकलने की जानकारी मिली। उनके Union Bank of India की सदर शाखा के खाते से तीन अलग-अलग UPI ट्रांजैक्शन किए गए थे। पहले 29 हजार रुपए फिर 50 हजार रुपए और इसके बाद 9 हजार 542 रुपए खाते से ट्रांसफर किए गए। कुल 88 हजार 542 रुपए की रकम उनके खाते से निकल चुकी थी।

    वीरेन्द्र का कहना है कि उन्होंने ये ट्रांजैक्शन नहीं किए थे। मोबाइल बंद होने और खाते से रकम निकलने के बीच संबंध को लेकर अब पुलिस साइबर एंगल से जांच कर रही है। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि मोबाइल बंद होने के दौरान खाते तक ठगों की पहुंच कैसे बनी और UPI ट्रांजैक्शन किस माध्यम से किए गए।

    इस घटना ने मोबाइल यूजर्स के लिए भी चिंता बढ़ा दी है। अचानक मोबाइल बंद होने या अपडेट होने जैसी स्थिति में लोग अक्सर इसे सामान्य तकनीकी समस्या मान लेते हैं। लेकिन इस मामले में मोबाइल की खराबी सामने आने के बाद बैंक खाते से बड़ी रकम निकलने का पता चला। फिलहाल पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और ट्रांजैक्शन की जानकारी के आधार पर साइबर ठगों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है।

  • 5 लाख पेंशनर सड़क पर उतरने की तैयारी में: महंगाई राहत का एरियर और कैशलेस इलाज नहीं मिला तो होगा बड़ा आंदोलन

    5 लाख पेंशनर सड़क पर उतरने की तैयारी में: महंगाई राहत का एरियर और कैशलेस इलाज नहीं मिला तो होगा बड़ा आंदोलन


    जबलपुर । मध्यप्रदेश में पेंशनरों की लंबित मांगों को लेकर आंदोलन की तैयारी तेज हो गई है। जबलपुर में प्रमुख पेंशनर संगठनों की संयुक्त बैठक में सरकार के सामने अपनी मांगें रखने के साथ आंदोलन की रणनीति पर भी चर्चा की गई। पेंशनरों ने साफ चेतावनी दी है कि अगर दिवाली से पहले उनकी मांगों का समाधान नहीं किया गया तो प्रदेशभर के करीब 5 लाख पेंशनर भोपाल में विशाल रैली निकालेंगे। संगठन ने जरूरत पड़ने पर अर्धनग्न प्रदर्शन करने की भी चेतावनी दी है।

    जबलपुर के विक्टोरिया अस्पताल के मीटिंग हॉल में हुई बैठक में नगर निगम विद्युत मंडल और राज्य सरकार के अलग-अलग विभागों से जुड़े पेंशनर संगठनों के पदाधिकारी और सदस्य शामिल हुए। बैठक में सबसे प्रमुख मुद्दा पेंशनरों को मिलने वाली महंगाई राहत का लंबित एरियर रहा। संगठनों का कहना है कि लंबे समय से महंगाई राहत के एरियर का भुगतान रुका हुआ है और पेंशनरों को इसका नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने सरकार से एरियर सहित भुगतान जल्द करने की मांग की है।

    पेंशनरों ने स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर भी नाराजगी जाहिर की। उनका कहना है कि 5 लाख रुपए तक के आयुष्मान कार्ड की सुविधा होने के बावजूद कई पेंशनरों को इसका वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है। कई अस्पतालों में इलाज से इनकार किए जाने की शिकायतें सामने आती हैं। संगठनों ने मांग की है कि मध्यप्रदेश में भी उत्तर प्रदेश बिहार और छत्तीसगढ़ की तर्ज पर पेंशनरों के लिए बेहतर और कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा लागू की जाए ताकि इलाज के लिए उन्हें आर्थिक परेशानी का सामना न करना पड़े।

    बैठक में नेताओं को मिलने वाली पेंशन का मुद्दा भी उठाया गया। पेंशनर संगठनों ने देश में एक व्यक्ति एक पेंशन का नियम लागू करने की मांग की। पदाधिकारियों का कहना है कि एक कर्मचारी को जीवनभर एक पेंशन पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है जबकि कई नेताओं को अलग-अलग पदों के आधार पर एक से अधिक पेंशन मिलने की व्यवस्था है। संगठन ने इस व्यवस्था में बदलाव की मांग करते हुए कहा कि एक व्यक्ति एक पेंशन का नियम लागू होने से सरकारी खजाने पर पड़ने वाला बोझ कम हो सकता है।

    पेंशनर संगठनों ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर सितंबर के भीतर उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। इसके बाद नवंबर में जबलपुर में प्रदेश स्तरीय सम्मेलन आयोजित करने की तैयारी भी है। इसी सम्मेलन में संगठन के आगामी कार्यक्रमों और नेतृत्व से जुड़े फैसले लिए जाएंगे।

    बैठक में शामिल पेंशनर संगठनों ने सरकार से टकराव के बजाय बातचीत के जरिए समस्याओं का समाधान करने की अपील की है। हालांकि संगठनों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अगर लंबे समय से लंबित मांगों पर कोई कार्रवाई नहीं होती है तो प्रदेशभर के पेंशनर एकजुट होकर भोपाल में बड़ा आंदोलन करेंगे। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार और पेंशनर संगठनों के बीच यह मुद्दा और गरमाने की संभावना है।