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  • पाकिस्तान के नक्शे में बड़े बदलाव की चर्चा, 12 से 15 प्रांत बनाने की योजना, विवाद बढ़ा

    पाकिस्तान के नक्शे में बड़े बदलाव की चर्चा, 12 से 15 प्रांत बनाने की योजना, विवाद बढ़ा


    इस्लामाबाद। पाकिस्तान में चार बड़े प्रांतों को छोटे प्रशासनिक हिस्सों में बांटने की चर्चा ने राजनीतिक विवाद बढ़ा दिया है। मीडिया रिपोर्टों में सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर को इस विचार का समर्थक बताया गया है, जबकि पाकिस्तान के योजना मंत्री अहसान इकबाल भी 12 से 15 नए प्रांत बनाने या 160 सशक्त जिला प्रशासनिक इकाइयां गठित करने का विकल्प सामने रख चुके हैं। हालांकि, इस दिशा में अंतिम फैसला होने की पुष्टि नहीं है और प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक सहमति भी नहीं बनी है।

    पाकिस्तान में इस बहस के केंद्र में केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति का बंटवारा भी है। पंजाब और सिंध जैसे प्रभावशाली प्रांतों के छोटे हिस्सों में बंटने से चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। दूसरी ओर, समर्थकों का तर्क है कि छोटे प्रशासनिक क्षेत्र बनने से आम लोगों तक सरकारी सेवाएं पहुंचाना आसान हो सकता है।

    चार प्रांतों की जगह 12 से 15 बनाने का विचार
    पाकिस्तान फिलहाल चार प्रांतों—पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान—में बंटा है। इनकी आबादी, क्षेत्रफल और राजनीतिक प्रभाव में काफी अंतर है। द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट के हवाले से आई खबरों में इन प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने की संभावना जताई गई है। एक विकल्प में 12 से 15 नए प्रांत बनाने, जबकि दूसरे में 160 छोटे प्रशासनिक क्षेत्र तैयार करने की बात है।

    योजना मंत्री अहसान इकबाल ने भी सितंबर में प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की जरूरत बताते हुए इन विकल्पों पर राष्ट्रीय और राजनीतिक चर्चा कराने की बात कही थी। उनके मुताबिक, करीब 26 करोड़ की आबादी वाले देश में मौजूदा व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है और प्रांतीय स्तर पर सत्ता के केंद्रीकरण से स्वास्थ्य, शिक्षा तथा अन्य सेवाओं की डिलीवरी प्रभावित हुई है।

    हालांकि, दोनों विकल्पों में बुनियादी अंतर है। नए प्रांत बनाने से देश की संघीय संरचना और प्रांतीय सीमाओं में बदलाव होगा, जबकि सशक्त जिला प्रशासन की व्यवस्था में मौजूदा प्रांतों को बनाए रखते हुए स्थानीय स्तर पर अधिकार और संसाधन बढ़ाए जा सकते हैं।

    पंजाब की आबादी, बलूचिस्तान का क्षेत्रफल
    पाकिस्तान में नए प्रांत बनाने के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क प्रशासनिक असमानता का दिया जा रहा है। पंजाब देश का सबसे अधिक आबादी वाला प्रांत है। वहीं, बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से सबसे बड़ा है, लेकिन उसकी आबादी पंजाब की तुलना में काफी कम है।

    इतने बड़े और विविध क्षेत्रों का प्रशासन चलाना चुनौतीपूर्ण माना जाता है। दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों को सरकारी सेवाओं तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है। इस लिहाज से छोटे प्रांतों या सशक्त जिला प्रशासन को सेवाओं की पहुंच बेहतर करने के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

    लेकिन प्रशासनिक सीमाएं बदलना अपने आप में आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं है। नए प्रांत बनाने पर अलग प्रशासनिक ढांचा, सरकारी संस्थान और अन्य व्यवस्थाएं खड़ी करनी पड़ेंगी। इससे खर्च बढ़ सकता है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह सवाल भी अहम है कि सरकार इतने बड़े पुनर्गठन का खर्च कैसे उठाएगी।

    असीम मुनीर की बढ़ती ताकत के बीच क्यों उठे सवाल?
    पाकिस्तान में सेना लंबे समय से राजनीति और शासन व्यवस्था में प्रभावशाली भूमिका निभाती रही है। ऐसे में प्रांतों के पुनर्गठन की चर्चा को केवल प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसके संभावित राजनीतिक नतीजों पर भी सवाल उठ रहे हैं।

    द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट पर आधारित विश्लेषणों में आशंका जताई गई है कि बड़े प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने से केंद्र के सामने मौजूद क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति कमजोर हो सकती है। छोटे प्रांतों की सरकारें संसाधनों और प्रशासनिक फैसलों के लिए केंद्र पर अधिक निर्भर हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में केंद्र और सैन्य प्रतिष्ठान का प्रभाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, यह प्रस्ताव के संभावित राजनीतिक असर का विश्लेषण है, न कि इसके घोषित उद्देश्य का प्रमाण।

    पंजाब और सिंध का बंटवारा सबसे संवेदनशील
    पंजाब और सिंध पाकिस्तान की राजनीति में अहम स्थान रखते हैं। पंजाब को पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) का मजबूत आधार माना जाता है, जबकि सिंध में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) का प्रभाव रहा है।

    इन प्रांतों की बड़ी आबादी और चुनावी ताकत उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण बनाती है। यदि इनके क्षेत्रीय और प्रशासनिक ढांचे में बदलाव होता है, तो राजनीतिक दलों के प्रभाव और चुनावी समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है।

    सिंध में इस मुद्दे पर विरोध खुलकर सामने आ चुका है। सितंबर 2026 में सिंध विधानसभा ने प्रांत को बांटने या उसकी क्षेत्रीय सीमाएं बदलने के प्रस्तावों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था। मुख्यमंत्री मुराद अली शाह ने भी सिंध की भौगोलिक एकता से समझौता नहीं करने की बात कही। इससे स्पष्ट है कि नए प्रांतों का विचार केवल प्रशासनिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रांतीय पहचान और राजनीतिक अधिकारों से भी जुड़ा है।

    इमरान खान की पार्टी वाले प्रांत में भी तनाव
    पाकिस्तान में प्रांतों के पुनर्गठन की बहस ऐसे समय चल रही है, जब केंद्र और खैबर पख्तूनख्वा की सरकार के बीच राजनीतिक तनाव बना हुआ है। यह प्रांत पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के शासन में है।

    इमरान खान जेल में हैं और उनकी पार्टी के समर्थक उनकी रिहाई की मांग करते रहे हैं। इस बीच PTI और केंद्र के बीच टकराव ने संघीय राजनीति को और जटिल बनाया है। खैबर पख्तूनख्वा उग्रवादी हिंसा की समस्या से भी जूझ रहा है।

    ऐसे माहौल में प्रांतीय सीमाओं में बदलाव की किसी भी योजना को राजनीतिक नजरिए से देखा जाना स्वाभाविक है। यदि नए प्रांत बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो यह तय करना भी चुनौती होगा कि उनकी सीमाएं कैसे तय होंगी और स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व किस तरह सुनिश्चित किया जाएगा।

    बलूचिस्तान में संसाधन और स्थानीय अधिकार भी मुद्दा
    बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी हिंसा और केंद्र के साथ संसाधनों के बंटवारे को लेकर विवाद रहे हैं। ऐसे में प्रांत का पुनर्गठन जमीन, प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय राजनीतिक अधिकारों से जुड़े सवाल खड़े कर सकता है।

    पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भी शासन व्यवस्था, महंगाई, करों और आर्थिक परिस्थितियों को लेकर असंतोष सामने आता रहा है। इन परिस्थितियों में देश के प्रशासनिक नक्शे में बड़े बदलाव के लिए केवल सरकारी निर्णय पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया, राजनीतिक सहमति और संबंधित क्षेत्रों की चिंताओं पर विचार करना भी जरूरी होगा।

    क्या वास्तव में बदल जाएगा पाकिस्तान का नक्शा?
    फिलहाल नए प्रांतों की चर्चा को अंतिम सरकारी निर्णय मानना जल्दबाजी होगी। पाकिस्तान में इस विषय पर राजनीतिक बहस चल रही है, लेकिन सितंबर में आई रिपोर्टों के मुताबिक, अतिरिक्त प्रांतों या प्रशासनिक इकाइयों के गठन पर कोई औपचारिक प्रस्ताव संघीय कैबिनेट के सामने नहीं रखा गया था।

    छोटे प्रांतों के समर्थक इसे बेहतर प्रशासन और सरकारी सेवाओं की पहुंच बढ़ाने का रास्ता मानते हैं। विरोध करने वालों की चिंता प्रांतीय पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर है। इसलिए पाकिस्तान के सामने असली चुनौती केवल प्रांतों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि यह तय करने की है कि बदलाव से अधिकार और संसाधन आम लोगों तक पहुंचेंगे या केंद्र की शक्ति और मजबूत होगी।

  • इमरान खान की रिहाई के लिए बढ़ा लॉन्ग मार्च, शहबाज शरीफ ने बातचीत की पेशकश की

    इमरान खान की रिहाई के लिए बढ़ा लॉन्ग मार्च, शहबाज शरीफ ने बातचीत की पेशकश की

    नई दिल्ली ।पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की जेल से रिहाई की मांग को लेकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन लगातार आगे बढ़ रहा है। 4 अक्टूबर को खैबर पख्तूनख्वा के लक्की मरवत जिले से शुरू हुआ इमरान समर्थकों का लॉन्ग मार्च अब राजधानी इस्लामाबाद से करीब 180 किलोमीटर दूर रह गया है। खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी के नेतृत्व में मार्च आगे बढ़ रहा है। राजधानी की ओर बढ़ते प्रदर्शन के बीच प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इमरान समर्थकों से बातचीत की पेशकश की है।

    शहबाज शरीफ ने प्रदर्शनकारियों से लॉन्ग मार्च और धरना खत्म करने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन खत्म करने के बाद सरकार उनके साथ बैठकर बातचीत करने के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे एक दिन पहले ही सरकार ने इमरान समर्थकों के साथ बातचीत से इनकार कर दिया था। हालांकि, सरकार की ओर से बातचीत की पेशकश किए जाने के बाद भी प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

    इमरान खान के समर्थकों ने प्रधानमंत्री की बातचीत की पेशकश ठुकरा दी है। उनका कहना है कि वे इमरान खान की रिहाई की मांग से पीछे नहीं हटेंगे। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग पूर्व प्रधानमंत्री को जेल से रिहा करना है। उनका मार्च खैबर पख्तूनख्वा से आगे बढ़ते हुए राजधानी की ओर जा रहा है। इस बीच सरकार के सामने प्रदर्शन को नियंत्रित करने और राजधानी तक इसके पहुंचने से रोकने की चुनौती बनी हुई है।

    प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने प्रदर्शन को लेकर चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा कि इस तरह के आंदोलन से देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए किए जा रहे प्रयास प्रभावित हो सकते हैं। उनके मुताबिक सरकार पिछले ढाई साल से अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए काम कर रही है और इसमें बाधा डालने की किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कानून अपना काम करेगा और लोगों की जान तथा संपत्ति की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है।

    राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर इमरान समर्थकों का मार्च पंजाब प्रांत तक पहुंचता है और उसे वहां अधिक जनसमर्थन मिलता है, तो शहबाज सरकार पर दबाव और बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में प्रदर्शन को नियंत्रित करना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इमरान खान की राजनीतिक लोकप्रियता को देखते हुए उनके समर्थकों की बढ़ती संख्या पाकिस्तान की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर असर डाल सकती है।

    इस पूरे घटनाक्रम में सेना प्रमुख असीम मुनीर की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं हो रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इमरान खान के समर्थकों के आंदोलन के जरिए शहबाज शरीफ सरकार पर दबाव बन सकता है। उनके अनुसार, यदि सरकार प्रदर्शन को रोकने में कमजोर दिखाई देती है तो इससे प्रधानमंत्री की राजनीतिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। हालांकि, शहबाज शरीफ के सत्ता से हटने को लेकर किए जा रहे दावे फिलहाल राजनीतिक विश्लेषण और अटकलों पर आधारित हैं।

    फिलहाल इमरान खान के समर्थकों का लॉन्ग मार्च इस्लामाबाद की ओर बढ़ रहा है और सरकार ने बातचीत का रास्ता खोलने की कोशिश की है। दूसरी ओर प्रदर्शनकारी इमरान की रिहाई की मांग पर कायम हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में मार्च की दिशा, उसे मिलने वाला समर्थन और सरकार की प्रतिक्रिया पाकिस्तान के राजनीतिक घटनाक्रम के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

  • 2015 में यमन युद्ध से दूर रहा था पाकिस्तान, अब सऊदी के साथ हूतियों के खिलाफ कितना कारगर होगा गठजोड़?

    2015 में यमन युद्ध से दूर रहा था पाकिस्तान, अब सऊदी के साथ हूतियों के खिलाफ कितना कारगर होगा गठजोड़?


    नई दिल्ली। 2015 में सऊदी अरब के आग्रह के बावजूद पाकिस्तान ने यमन में हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान में शामिल होने से इनकार कर दिया था। अब 11 साल बाद सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच बने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते को लागू करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या यह गठजोड़ हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब की सैन्य ताकत को निर्णायक बढ़त दिला पाएगा?

    2015 में संसद ने युद्ध से दूर रहने का फैसला किया था
    मार्च 2015 में सऊदी अरब ने पाकिस्तान से यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ अभियान के लिए लड़ाकू विमान, नौसैनिक जहाज और सैनिक उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था। इस मुद्दे पर पाकिस्तान की संसद में पांच दिन तक बहस हुई। 10 अप्रैल 2015 को संसद ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर यमन संघर्ष में पाकिस्तान को तटस्थ रखने का फैसला किया।

    हालांकि, पाकिस्तान ने सऊदी अरब के समर्थन को स्पष्ट रखा था। संसद के प्रस्ताव में कहा गया था कि सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता या मक्का-मदीना के पवित्र स्थलों को खतरा होने की स्थिति में पाकिस्तान उसके साथ खड़ा रहेगा। उस समय पाकिस्तान ने संघर्ष का सैन्य हिस्सा बनने के बजाय राजनयिक भूमिका निभाने पर जोर दिया था।

    11 साल बाद बदले हालात, लागू हुआ मक्का रक्षा समझौता
    7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब के मक्का में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के मुताबिक, तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों पर हमले के तौर पर माना जाएगा और रक्षा सहयोग को मजबूत किया जाएगा।

    यमन में हूतियों के हमले बढ़ने के बीच 5 अक्टूबर को रियाद में समझौते की रणनीतिक समिति की आपात बैठक हुई। इसके बाद तीनों देशों ने सामूहिक रक्षा प्रतिबद्धताओं को लागू करने और सऊदी अरब में आवश्यक सैन्य बलों तथा क्षमताओं की तेजी से तैनाती की दिशा में कदम उठाने पर सहमति जताई। हालांकि, कितने सैनिक भेजे जाएंगे और उनकी सटीक भूमिका क्या होगी, इसका पूरा विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।

    कागज पर बड़ी सैन्य ताकत, लेकिन यमन में चुनौती अलग
    सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये की संयुक्त सैन्य क्षमता हूतियों की तुलना में काफी बड़ी है। सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम हैं। पाकिस्तान बड़ी थल सेना और वायुसेना के साथ सैन्य अभियान का अनुभव रखता है। वहीं तुर्किये के पास ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसी क्षमताएं हैं।

    लेकिन यमन का भूगोल किसी भी बड़ी सैन्य ताकत के लिए चुनौती पैदा करता है। उत्तरी यमन के पहाड़ी इलाके, गुफाएं और सुरंगें हूतियों को छिपकर हमला करने की क्षमता देते हैं। उनके पास मोबाइल मिसाइल लॉन्चर और अपेक्षाकृत बिखरी हुई सैन्य संरचना भी है। ऐसे में सिर्फ हवाई हमलों या बड़ी सैन्य ताकत के दम पर उन्हें पूरी तरह पराजित करना आसान नहीं होगा।

    सऊदी अरब पहले भी लंबी लड़ाई में उलझ चुका है
    सऊदी नेतृत्व वाला गठबंधन 2015 से यमन में सैन्य अभियान चलाता रहा है, लेकिन वह हूतियों को पूरी तरह खत्म नहीं कर सका। बाद के वर्षों में अमेरिका और ब्रिटेन ने भी हूती ठिकानों पर हमले किए, लेकिन संगठन की मिसाइल और ड्रोन क्षमता बनी रही।

    मौजूदा संघर्ष में भी हूतियों ने सऊदी क्षेत्र और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता दिखाई है। 7 अक्टूबर को भी हूतियों ने मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जबकि सऊदी नेतृत्व वाली सेनाएं यमन में अपने अभियान को आगे बढ़ा रही हैं।

    पाकिस्तान और तुर्किये की भूमिका निर्णायक हो सकती है, लेकिन…
    विश्लेषण के मुताबिक, पाकिस्तान और तुर्किये सऊदी अरब की एयर डिफेंस, खुफिया जानकारी, निगरानी और सैन्य तकनीकी क्षमताओं को मजबूत कर सकते हैं। तुर्किये ने पहले ही कहा है कि वह सऊदी अरब की जरूरत के मुताबिक सैन्य तकनीकी सहायता देने के लिए तैयार है।

    हालांकि, मौजूदा समझौते का सार्वजनिक स्वरूप मुख्य रूप से सऊदी अरब की रक्षा और सामूहिक प्रतिरोध क्षमता मजबूत करने पर केंद्रित है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान और तुर्किये यमन के अंदर सीधे जमीनी युद्ध या हूती ठिकानों के खिलाफ संयुक्त हमलों में किस स्तर तक शामिल होंगे। सितंबर में हुई सैन्य बैठकों के बाद भी उपलब्ध बयानों में संयुक्त जमीनी अभियान या सीधे हमलों की घोषणा नहीं हुई थी।

    हूतियों को पूरी तरह हराना अब भी बड़ी चुनौती
    सऊदी अरब को पाकिस्तान और तुर्किये का सैन्य सहयोग मिलने से उसकी रक्षा क्षमता और यमन में उसके समर्थित बलों को बढ़त मिल सकती है। तीनों देशों की संयुक्त ताकत हूतियों पर भारी दबाव डाल सकती है और उनके मिसाइल-ड्रोन हमलों से निपटने में मदद कर सकती है।

    लेकिन सना और उत्तरी यमन के पहाड़ी इलाकों पर कब्जा कर हूतियों के संगठनात्मक और सैन्य ढांचे को पूरी तरह खत्म करना अलग चुनौती है। यमन की लंबी लड़ाई का अनुभव भी यही बताता है कि हवाई शक्ति और आधुनिक हथियारों के बावजूद हूतियों को निर्णायक रूप से समाप्त करना आसान नहीं रहा है। इसलिए पाकिस्तान और तुर्किये की भागीदारी सऊदी अरब की स्थिति मजबूत कर सकती है, लेकिन इससे हूतियों का पूरी तरह सफाया तय नहीं माना जा सकता।

  • हूतियों के खिलाफ सक्रिय होगा मक्का डिफेंस पैक्ट? सऊदी में पाकिस्तान और तुर्की के सैन्य अधिकारियों की अहम बैठक आज

    हूतियों के खिलाफ सक्रिय होगा मक्का डिफेंस पैक्ट? सऊदी में पाकिस्तान और तुर्की के सैन्य अधिकारियों की अहम बैठक आज

    नई दिल्ली ।सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के सैन्य गठबंधन की अहम बैठक सोमवार को रियाद में हो रही है। तीनों देशों की स्ट्रैटेजिक पॉलिटिकल एंड डिफेंस कमेटी की इस बैठक में मक्का रक्षा समझौते के भविष्य पर चर्चा होगी। बैठक ऐसे समय हो रही है जब सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच तनाव बना हुआ है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या मौजूदा परिस्थितियों में मक्का रक्षा समझौते को सक्रिय किया जाएगा और क्या पाकिस्तान तथा तुर्की सऊदी अरब के समर्थन में हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में शामिल होंगे।

    रियाद में होने वाली बैठक में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री तथा सेना प्रमुख शामिल होंगे। बैठक के दौरान सऊदी अरब पर हूतियों की ओर से किए जा रहे हमलों से निपटने के तरीकों पर चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा तीनों देशों के बीच हुए सैन्य समझौते के काम करने के तरीके और गठबंधन को भविष्य में अधिक संस्थागत रूप देने के लिए उठाए जाने वाले अगले कदमों पर भी विचार किया जाएगा। बैठक को इस समझौते की आगे की दिशा तय करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    मक्का रक्षा समझौते पर 7 अगस्त को तीनों देशों के नेताओं ने हस्ताक्षर किए थे। समझौते में सामूहिक रक्षा से जुड़ा एक प्रावधान शामिल है। इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर होने वाले सशस्त्र हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। समझौते के बाद से पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब इसके संस्थागत और सैन्य ढांचे को विकसित करने पर काम कर रहे हैं। हाल के दिनों में हूतियों की ओर से सऊदी अरब को ड्रोन और मिसाइलों से निशाना बनाए जाने के कारण इस समझौते की भूमिका को लेकर चर्चा बढ़ गई है।

    सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है। दूसरी ओर, ईरान समर्थित हूती विद्रोही राजधानी सना सहित उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं। हूतियों और सऊदी अरब के बीच जारी टकराव ने मक्का रक्षा समझौते के सामूहिक रक्षा प्रावधान को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब रियाद में होने वाली बैठक में यह देखा जाएगा कि मौजूदा स्थिति में तीनों देशों के बीच हुआ सैन्य समझौता किस तरह आगे बढ़ता है और सऊदी अरब की सुरक्षा से जुड़े मामलों में इसकी भूमिका क्या होगी।

    पाकिस्तान ने सऊदी अरब पर हूतियों के हमलों की निंदा की है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा है कि उनका देश समझौते के तहत सऊदी अरब की रक्षा के लिए हर संभव कोशिश करेगा। तुर्की के नेताओं ने भी सऊदी अरब पर हुए हूती हमलों की कई मंचों पर आलोचना की है। हालांकि, पाकिस्तान और तुर्की की ओर से हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब के सैन्य अभियानों में सीधे तौर पर शामिल होने की पुष्टि नहीं की गई है। इसी वजह से यह सवाल बना हुआ है कि मक्का रक्षा समझौते के तहत किए गए वादे को व्यवहार में किस तरह लागू किया जाएगा और क्या दोनों देश सऊदी अरब के लिए चल रही सैन्य कार्रवाई में सीधे शामिल होंगे।

  • पाकिस्तान से बातचीत पर मणिशंकर अय्यर का सवाल, बोले- सर्जिकल स्ट्राइक कर सकते हैं तो आमने-सामने बैठने का साहस क्यों नहीं?

    पाकिस्तान से बातचीत पर मणिशंकर अय्यर का सवाल, बोले- सर्जिकल स्ट्राइक कर सकते हैं तो आमने-सामने बैठने का साहस क्यों नहीं?

    नई दिल्ली। पाकिस्तान के साथ बातचीत को लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने केंद्र की एनडीए सरकार पर सवाल उठाए हैं। रविवार को पांचवें ‘हल्ला बोल कॉन्क्लेव’ में बोलते हुए अय्यर ने कहा कि सरकार के पास पाकिस्तान के खिलाफ ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करने का साहस है, लेकिन दोनों देशों के बीच विवादों के समाधान के लिए आमने-सामने बैठकर बातचीत करने की इच्छाशक्ति नहीं है।

    अय्यर ने भारत-पाकिस्तान के बीच संवाद दोबारा शुरू करने की वकालत करते हुए अटारी-वाघा सीमा पर बातचीत का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि अतीत के मुद्दों को लेकर लगातार बहस करते रहना विदेश नीति नहीं है। उनके मुताबिक, बातचीत के जरिए यह तय किया जाना चाहिए कि किन मुद्दों का समाधान संभव है और किनका फिलहाल नहीं।

    ‘सर्जिकल स्ट्राइक कर सकते हैं तो बात क्यों नहीं?’

    अय्यर ने कहा कि भारत के पास पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक करने का साहस है, तो फिर उसके साथ आमने-सामने बैठकर बातचीत करने का साहस क्यों नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि भारत पाकिस्तान से बात क्यों नहीं कर सकता और दोनों देशों के बीच दोस्ती की कोशिश क्यों नहीं हो सकती।

    उन्होंने यह भी पूछा कि दुनिया में क्या कोई ऐसा देश है, जिसके साथ भारत पाकिस्तान की तुलना में ज्यादा सहज हो सकता है? साथ ही उन्होंने सवाल उठाया कि क्या पाकिस्तान के लिए भी भारत से ज्यादा आसानी से बातचीत करने वाला कोई दूसरा देश है?

    अटारी-वाघा सीमा पर टेबल लगाने का सुझाव

    भारत-पाकिस्तान के बीच पहले हुई बातचीत की प्रक्रियाओं का उल्लेख करते हुए अय्यर ने कहा कि दोनों देशों को फिर से बातचीत की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने इसके लिए अटारी-वाघा सीमा पर ही बैठक आयोजित करने का सुझाव दिया।

    अय्यर ने कहा कि सीमा पर एक टेबल रखी जा सकती है, ताकि पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल को बातचीत के लिए पाकिस्तान से बाहर आने की जरूरत न पड़े और भारतीय प्रतिनिधियों को भी बातचीत के लिए भारत से बाहर न जाना पड़े। उनके मुताबिक, इसी जगह से संवाद को लगातार आगे बढ़ाया जा सकता है।

    उन्होंने कहा कि बातचीत के दौरान जिन मुद्दों पर समाधान निकलता है, उन पर कार्रवाई की जानी चाहिए। जिन मुद्दों पर सहमति नहीं बनती, उन्हें फिलहाल लंबित रखा जा सकता है और माहौल बदलने के बाद उन पर दोबारा चर्चा की जा सकती है।

    ‘अतीत पर बहस करना विदेश नीति नहीं’

    अय्यर ने कहा कि अतीत की घटनाओं को लेकर बहस करते रहना विदेश नीति नहीं है। उनके अनुसार, किसी भी रचनात्मक निष्कर्ष तक पहुंचने का रास्ता बातचीत से ही निकल सकता है, भले ही इसमें कितना भी समय क्यों न लगे।

    उन्होंने अमेरिका और रूस के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका ने रूस के साथ अपने मतभेदों के बावजूद राजनयिक संबंध नहीं तोड़े और बातचीत का रास्ता खुला रखा। अय्यर ने कहा कि समझदार देश एक-दूसरे से बात करते हैं, जबकि बातचीत बंद करने से समस्याओं का समाधान नहीं होता।

    महबूबा मुफ्ती की सलाह का किया जिक्र

    देश के राजनीतिक हालात से जुड़े सवाल पर अय्यर ने पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती की उस सलाह का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कश्मीर के नेताओं से एकजुट होने की बात कही थी।

    अय्यर ने कहा कि जिस तरह कश्मीर के मुद्दे पर अलग-अलग नेताओं के बजाय एकजुट होकर अपनी बात रखने की जरूरत है, उसी तरह राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में भी गैर-हिंदुत्व राजनीतिक समूहों को एकजुट होना होगा।

    उन्होंने दावा किया कि यदि वे दिल्ली में सत्ता में होते तो जम्मू-कश्मीर को दोबारा राज्य का दर्जा मिल गया होता और संभवतः अनुच्छेद 370 तथा 35ए भी किसी बदले हुए स्वरूप में वापस आ सकते थे। उन्होंने कहा कि अगर प्रगति चाहिए तो असहमत लोगों को एकजुट होना होगा और ऐसी एकजुटता से पाकिस्तान के साथ भी नई पहल की जा सकती है।

    भारत-पाक संबंधों पर अय्यर का पुराना रुख

    पाकिस्तान के साथ बातचीत की वकालत मणिशंकर अय्यर पहले भी करते रहे हैं। 2024 में उन्होंने भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री एस. जयशंकर की पाकिस्तान यात्रा को लेकर भी लिखा था कि दोनों देशों के बीच मतभेदों के बावजूद संवाद ही संबंध सुधारने का रास्ता है। हालांकि उन्होंने उस समय भी स्पष्ट किया था कि ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं और कांग्रेस का आधिकारिक रुख नहीं हैं।

    वहीं, भारत सरकार का हालिया रुख यह रहा है कि पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय बातचीत के लिए आतंकवाद से मुक्त अनुकूल माहौल जरूरी है। इसके बावजूद भारत ने सितंबर 2026 में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में हिस्सा लेने के लिए एक वरिष्ठ अधिकारी को इस्लामाबाद भेजा था।

  • सिंधु जल संधि पर फिर भड़का पाकिस्तान, ‘बोला-भारत पानी को हथियार बना रहा

    सिंधु जल संधि पर फिर भड़का पाकिस्तान, ‘बोला-भारत पानी को हथियार बना रहा


    इस्लामाबाद।
    सिंधु जल संधि (IWT) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। पाकिस्तान के सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने भारत पर पानी को ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान सिंधु जल संधि को लेकर अपने रुख पर कायम है और इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहेगा। तरार ने यह भी दावा किया कि संधि को भारत एकतरफा तरीके से बदल, रद्द या स्थगित नहीं कर सकता।

    तरार ने बुधवार को इस्लामाबाद स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रैटेजिक स्टडीज में सिंधु जल संधि पर एक रिपोर्ट जारी करने के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान शांतिप्रिय देश है, लेकिन वह भारत को पानी को हथियार बनाने की अनुमति नहीं दे सकता, क्योंकि उनके मुताबिक सिंधु का पानी पाकिस्तान के 24 करोड़ लोगों का बुनियादी अधिकार है।

    ‘संधि को एकतरफा नहीं रोका जा सकता’

    अताउल्लाह तरार ने कहा कि सिंधु जल संधि दोनों देशों के बीच एक कानूनी समझौता है और उनके अनुसार यह दोनों पक्षों के लिए बाध्यकारी है। उन्होंने दावा किया कि विवाद होने की स्थिति में भी दोनों देशों को संधि में तय शर्तों और विवाद समाधान की प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।

    पाकिस्तानी मंत्री ने कहा कि अगर कोई देश स्थापित विवाद समाधान तंत्र के बावजूद किसी बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय जल संधि को एकतरफा तरीके से स्थगित कर सकता है, तो इसका असर दुनिया में सीमा-पार जल प्रबंधन की व्यवस्था पर पड़ सकता है।

    उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ बातचीत जारी रखेगा और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए कानूनी तथा कूटनीतिक माध्यमों का इस्तेमाल करेगा।

    PCA के फैसले का भी दिया हवाला

    तरार ने स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) के अगस्त 2026 के फैसले का हवाला देते हुए दावा किया कि इससे पाकिस्तान के इस रुख को मजबूती मिली है कि संधि की स्थिति को एकतरफा कार्रवाई से नहीं बदला जा सकता।

    हालांकि, PCA के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 31 अगस्त 2026 को कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सिंधु जल संधि की स्थिति और रतले जलविद्युत परियोजना से संबंधित अंतरिम उपायों पर फैसला जारी किया था। PCA की वेबसाइट पर संबंधित मामले में फैसलों की सूची भी उपलब्ध है।

    शहबाज शरीफ के UN भाषण का जिक्र

    तरार ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के भाषण का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि शरीफ ने सिंधु के पानी को पाकिस्तान और पूरे क्षेत्र के लिए ‘जीवनरेखा’ बताया था।

    तरार के मुताबिक, पाकिस्तान का सिंधु जल संधि पर रुख पूरी तरह स्पष्ट है और वह इसे क्षेत्र में शांति तथा स्थिरता का माध्यम मानता है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इस मामले में अंतरराष्ट्रीय संगठनों और दूसरे देशों के साथ संपर्क बनाए रखेगा।

    1960 में हुई थी सिंधु जल संधि

    भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर सितंबर 1960 में हस्ताक्षर हुए थे। विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुए इस समझौते में सिंधु नदी प्रणाली की नदियों के जल के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और दायित्व तय किए गए थे।

    मौजूदा विवाद में दोनों देशों के रुख अलग हैं। पाकिस्तान संधि को बाध्यकारी बताते हुए इसके प्रावधानों को जारी रखने की मांग कर रहा है, जबकि भारत ने संधि को लेकर अपनी अलग स्थिति अपनाई है। PCA के आधिकारिक रिकॉर्ड में 31 अगस्त 2026 को ‘संधि की स्थिति’ पर अवॉर्ड दर्ज है और संबंधित मध्यस्थता मामला फिलहाल PCA के रिकॉर्ड में लंबित मामलों में शामिल है।

    इस बीच अताउल्लाह तरार ने कहा कि पाकिस्तान अपने कानूनी और कूटनीतिक पक्ष को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने रखता रहेगा। उन्होंने सीमा-पार जल समझौतों पर इस विवाद के संभावित व्यापक प्रभावों का भी मुद्दा उठाया।

  • सऊदी अरब की रक्षा के लिए पाकिस्तान का बड़ा ऐलान, कहा- जो सैन्य संसाधन हैं, सब उपलब्ध कराएंगे

    सऊदी अरब की रक्षा के लिए पाकिस्तान का बड़ा ऐलान, कहा- जो सैन्य संसाधन हैं, सब उपलब्ध कराएंगे


    नई दिल्ली। सऊदी अरब पर हमला होने की स्थिति में पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमताओं का इस्तेमाल उसकी रक्षा के लिए कर सकता है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने कहा है कि सऊदी अरब की रक्षा के लिए पाकिस्तान के पास उपलब्ध सैन्य संसाधन इस्तेमाल के लिए उपलब्ध रहेंगे। उनका यह बयान यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब पर बढ़ते मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच आया है।

    रोम दौरे के दौरान मंगलवार को मीडिया से बातचीत में आसिफ से पूछा गया कि क्या पाकिस्तानी सेना यमन में ईरानी ठिकानों पर हवाई हमलों में शामिल हुई है। उन्होंने इसकी न तो पुष्टि की और न ही इनकार किया। हालांकि, उन्होंने कहा कि पाकिस्तान नए रक्षा समझौते के तहत सऊदी अरब की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और उसके पास उपलब्ध सैन्य क्षमताएं जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब के लिए उपलब्ध रहेंगी। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि रियाद ने पाकिस्तान से सैन्य सहायता मांगी है या नहीं।

    पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किए के रक्षा समझौते का क्या मतलब?

    पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए ने 7 अगस्त को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। तीनों देशों ने इसे रक्षात्मक समझौता बताया है और कहा है कि यह किसी खास देश के खिलाफ नहीं है।

    ख्वाजा आसिफ का ताजा बयान इस समझौते की व्यावहारिक भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब समर्थित बलों के बीच संघर्ष तेज हुआ है। इससे पहले भी आसिफ कह चुके हैं कि अगर यमन का संघर्ष सऊदी अरब तक फैलता है तो मक्का रक्षा समझौता सक्रिय हो सकता है।

    हूती हमलों से सऊदी अरब की सुरक्षा पर बढ़ी चिंता

    आसिफ के मुताबिक हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। उन्होंने कहा कि हूतियों ने हाल में यमन के लाल सागर तट पर स्थित बंदरगाह शहर मोखा और लाल सागर के कई द्वीपों पर कब्जा किया है। इससे बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास उनकी मौजूदगी बढ़ी है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है।

    उन्होंने यह भी कहा कि हूती विद्रोहियों और इराक में उनके सहयोगी मिलिशिया समूहों ने सऊदी अरब की तेल सुविधाओं को निशाना बनाया है। उनके मुताबिक, सऊदी टैंकरों को इस जलमार्ग से गुजरने से रोकने की कोशिश भी की गई है।

    आसिफ ने हूतियों को हमलावर बताते हुए कहा कि सऊदी अरब का कोई भी दुश्मन पाकिस्तान का दुश्मन है।

    अभी तैयार हो रहा गठबंधन का ढांचा

    मक्का में हुए रक्षा समझौते के बाद तीनों देशों के बीच सैन्य सहयोग को लागू करने का ढांचा अभी विकसित किया जा रहा है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किए के सैन्य प्रमुखों ने हाल में रियाद में बैठक की थी। इसमें खुफिया जानकारी साझा करने, सैन्य समन्वय और क्षमताओं को एक-दूसरे से जोड़ने सहित क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा हुई।

    समझौते के तहत सचिवालय और अन्य संचालन व्यवस्था तैयार की जा रही है। इसके पूर्ण संचालन की प्रक्रिया अभी स्पष्ट रूप से तय नहीं हुई है। समझौते का पूरा पाठ भी सार्वजनिक नहीं किया गया है।

    ईरान से बातचीत का रास्ता भी खुला रखना चाहता है पाकिस्तान

    सऊदी अरब को सैन्य समर्थन की प्रतिबद्धता जताने के साथ पाकिस्तान ईरान के साथ कूटनीतिक संपर्क भी बनाए रखना चाहता है। आसिफ ने कहा है कि पाकिस्तान क्षेत्रीय संघर्ष को खत्म करने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत दोबारा शुरू कराने के पक्ष में है।

    पाकिस्तान ने इसी साल अप्रैल में इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत की मेजबानी की थी। हालांकि, बाद में क्षेत्रीय संघर्ष फिर बढ़ गया और बातचीत के लिए तय समयसीमा आगे नहीं बढ़ सकी।

    इस तरह पाकिस्तान एक ओर नए रक्षा समझौते के तहत सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए अपनी सैन्य क्षमताएं उपलब्ध कराने की बात कह रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ कूटनीतिक संवाद और क्षेत्रीय तनाव कम करने की कोशिशों को भी जारी रखने की स्थिति में है।

  • रूपपुर परमाणु संयंत्र के लिए यूरेनियम की खेप अटकी, पाकिस्तानी एयरस्पेस मंजूरी नहीं मिलने से विमान बांग्लादेश नहीं पहुंच सका

    रूपपुर परमाणु संयंत्र के लिए यूरेनियम की खेप अटकी, पाकिस्तानी एयरस्पेस मंजूरी नहीं मिलने से विमान बांग्लादेश नहीं पहुंच सका

    नई दिल्ली ।बांग्लादेश के रूपपुर न्यूक्लियर पावर प्लांट के लिए रूस से भेजी जा रही यूरेनियम की खेप तय समय पर नहीं पहुंच सकी है। यूनिट-2 के लिए न्यूक्लियर फ्यूल लेकर आने वाले कार्गो विमान को पाकिस्तानी एयरस्पेस इस्तेमाल करने की मंजूरी नहीं मिलने के कारण उसकी उड़ान प्रभावित हुई। अब यूरेनियम की नई खेप अक्टूबर के पहले सप्ताह में बांग्लादेश पहुंचने की उम्मीद जताई गई है।

    बांग्लादेश के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री फकीर महबूब अनाम के मुताबिक, यूरेनियम लेकर आने वाले कार्गो विमान के 24 सितंबर को बांग्लादेश पहुंचने की उम्मीद थी। हालांकि, पाकिस्तानी एयरस्पेस के इस्तेमाल की अनुमति नहीं मिलने के कारण विमान तय कार्यक्रम के अनुसार नहीं पहुंच सका।

    एयरस्पेस क्लियरेंस नहीं मिलने की वजह फिलहाल स्पष्ट नहीं है। मंत्री ने बताया कि यूरेनियम की डिलीवरी के लिए नई तारीख प्रस्तावित की गई है और रूस की ओर से इसके अक्टूबर के पहले सप्ताह में बांग्लादेश पहुंचने की बात कही गई है।

    इस मामले में बांग्लादेश के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के संयुक्त सचिव शेख मोहम्मद तौहिदुल इस्लाम ने भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विमान के आने से पहले एयरपोर्ट पर आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई थीं और अधिकारी उसके पहुंचने का इंतजार कर रहे थे।

    उनके अनुसार, रोसाटॉम के संपर्क अधिकारी ने जानकारी दी कि एयरस्पेस क्लियर नहीं है। इसके चलते यूरेनियम को भेजना संभव नहीं हो सका। अब खेप की उड़ान को दोबारा निर्धारित किया जाना पड़ सकता है। हालांकि, इस दौरान यह स्पष्ट नहीं हो सका कि किस देश की ओर से एयरस्पेस को ब्लॉक किया गया था।

    रूपपुर न्यूक्लियर पावर प्लांट बांग्लादेश का पहला परमाणु ऊर्जा संयंत्र है। इसका निर्माण रूस की स्टेट एटॉमिक एनर्जी कॉरपोरेशन रोसाटॉम की तकनीकी सहायता से किया जा रहा है। परियोजना की निगरानी बांग्लादेश एटॉमिक एनर्जी कमीशन कर रहा है।

    यह संयंत्र बांग्लादेश के पाबना जिले के ईश्वरडी उपजिला के पाकशी यूनियन में पद्मा नदी के किनारे रूपपुर गांव में बनाया जा रहा है। परियोजना में तीसरी पीढ़ी के दो VVER-1200 रिएक्टर लगाए जा रहे हैं। दोनों रिएक्टरों की संयुक्त क्षमता 2,400 मेगावाट बेसलोड बिजली उत्पादन की होगी।

    रूपपुर परियोजना की यूनिट-1 के लिए लो-एनरिच्ड यूरेनियम फ्यूल की पहली खेप पहले ही रूस से बांग्लादेश पहुंच चुकी है। इस खेप में 164 नए फ्यूल असेंबली शामिल थे। इन्हें रूस के नोवोसिबिर्स्क केमिकल कंसंट्रेट्स प्लांट में तैयार किया गया था और भारी क्षमता वाले रूसी कार्गो विमान के जरिए ढाका के हजरत शाहजलाल इंटरनेशनल एयरपोर्ट लाया गया था।

    ढाका पहुंचने के बाद रेडिएशन-शील्डेड कंटेनरों को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच पाबना के ईश्वरडी स्थित रूपपुर प्लांट तक पहुंचाया गया था। इसके लिए बांग्लादेश सेना और कानून-प्रवर्तन एजेंसियों की निगरानी में विशेष ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया था।

    अक्टूबर 2023 में प्लांट साइट पर यूरेनियम फ्यूल के आधिकारिक हैंडओवर का समारोह भी आयोजित किया गया था। अब यूनिट-2 के लिए आने वाली नई खेप की डिलीवरी एयरस्पेस क्लियरेंस से जुड़ी समस्या के कारण निर्धारित समय से आगे खिसक गई है। रूस की ओर से इसे अक्टूबर के पहले सप्ताह में बांग्लादेश पहुंचाने की नई समयसीमा बताई गई है।

  • Pakistan : पुलिस चेकपॉइंट पर आत्मघाती हमला…पीड़ितों को बचाने जा रही एंबुलेंस पर गोलीबारी

    Pakistan : पुलिस चेकपॉइंट पर आत्मघाती हमला…पीड़ितों को बचाने जा रही एंबुलेंस पर गोलीबारी


    इस्लामाबाद।
    उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान (North-western Pakistan) में शनिवार को सड़क किनारे बने पुलिस चेकपॉइंट (Police checkpoint) पर हुए आत्मघाती बम हमले की जगह पर पहुंची एक एम्बुलेंस पर बंदूकधारियों ने गोलीबारी की।

    प्रांतीय आपातकालीन सेवा के प्रवक्ता बिलाल फैजी ने बताया कि विस्फोटक से लदे वाहन से किया गया यह हमला खैबर पख्तूनख्वा प्रांत (Khyber Pakhtunkhwa province) के डेरा इस्माइल खान (Dera Ismail Khan) जिले में हुआ। स्थानीय पुलिस प्रमुख सफदर बलोच ने कहा कि मारे गए और घायल हुए लोगों में ज्यादातर सुरक्षाकर्मी और राहगीर थे।


    अस्पताल ले जाते वक्त हुई एंबुलेंस पर गोलीबारी

    धमाके से बड़ा चेकपॉइंट तबाह हो गया और चश्मदीदों ने बताया कि हमले के बाद गोलियां चलने की आवाज भी सुनाई दी। फैजी ने बताया कि जब इमरजेंसी टीमें पीड़ितों को पास के अस्पताल ले जा रही थीं तो बंदूकधारियों ने एम्बुलेंस पर गोलीबारी की, जिसमें एक बचावकर्मी की मौत हो गई और दो अन्य घायल हो गए। उन्होंने कहा कि आत्मघाती बम धमाके में मारे गए लोगों में दो महिलाएं और एक बच्चा भी शामिल था।

    टीटीपी ने ली हमले की जिम्मेदारी
    पाकिस्तानी तालिबान यानी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान में हथियारबंद समूहों की हिंसा में तेजी आई है। इनमें से ज्यादातर हमलों की जिम्मेदारी टीटीपी और प्रतिबंधित बलूच लिबरेशन आर्मी ने ली है। बलूच लिबरेशन आर्मी एक अलगाववादी समूह है जो मुख्य रूप से पड़ोसी बलूचिस्तान प्रांत में सक्रिय है।

    पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हमले की निंदा की और पीड़ितों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की। जरदारी ने आम नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों को निशाना बनाए जाने को बेहद निंदनीय बताया और पाकिस्तानी तालिबान के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि यह संगठन विदेशी मदद से घिनौनी और बर्बर हरकतें कर रहा है।

  • UNGA में जयशंकर का PAK को कड़ा संदेश, बोले- दोस्ती और सद्भावना आतंकवाद के साथ नहीं चल सकते

    UNGA में जयशंकर का PAK को कड़ा संदेश, बोले- दोस्ती और सद्भावना आतंकवाद के साथ नहीं चल सकते


    नई दिल्ली। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में आतंकवाद को लेकर भारत का रुख दोहराते हुए कहा कि आतंकवाद के खिलाफ किसी तरह की ढील नहीं दी जा सकती। उन्होंने बिना पाकिस्तान का नाम लिए कहा कि एक देश लगातार आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है और हाल ही में उसने तथ्यों को भी गलत तरीके से पेश किया।

    जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद फैलाने वालों को अपना रवैया बदलना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आतंकवाद के साथ दोस्ती और सद्भावना की बात साथ-साथ नहीं चल सकती। भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी जीरो टॉलरेंस की नीति पर कायम है और इस मुद्दे पर लगातार अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अपना पक्ष रखता रहा है।

    शांति और सुरक्षा के लिए बना था संयुक्त राष्ट्र
    न्यूयॉर्क में UNGA को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना दुनिया में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से हुई थी। इसके बावजूद आज भी संघर्ष और टकराव दुनिया के सामने बड़ी चुनौतियों के रूप में मौजूद हैं।

    उन्होंने कहा कि शांति बनाए रखने में नाकामी का असर केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विकास और प्रगति भी प्रभावित होती है। वैश्वीकृत दुनिया में किसी एक हिस्से में होने वाले युद्ध और संघर्ष का असर दूसरे हिस्सों पर भी पड़ता है। ऐसे में तनाव कम करना और संवाद के जरिए समाधान तलाशना जरूरी है।

    समुद्री कर्मचारियों और कमर्शियल शिपिंग की सुरक्षा पर जोर
    जयशंकर ने कमर्शियल शिपिंग और समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों और समुद्री कर्मचारियों को निशाना बनाना स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    उन्होंने सभी पक्षों से संयम बरतने, तनाव कम करने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की। इससे पहले भारत और लाइबेरिया की ओर से समुद्री सुरक्षा और सीफेयरर्स की सुरक्षा को लेकर ‘ग्रुप ऑफ फ्रेंड्स’ पहल पर भी जोर दिया गया है। जयशंकर ने कहा था कि दुनिया में जारी संघर्षों का असर भोजन, ईंधन, उर्वरक और वित्त जैसी बुनियादी जरूरतों पर भी पड़ रहा है।

    यूक्रेन युद्ध पर बोले- अंतहीन युद्ध खत्म होना चाहिए
    यूक्रेन में जारी संघर्ष का जिक्र करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि यह युद्ध पांचवें साल में पहुंच गया है और यह गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि अब अंतहीन युद्ध की समाप्ति होनी चाहिए।

    जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि संघर्षों का समाधान केवल सैन्य रास्ते से नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति के जरिए तलाशा जाना चाहिए। उनका संबोधन ऐसे समय हुआ है, जब संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस भी यूक्रेन में तत्काल युद्धविराम और लंबे समय तक कायम रहने वाली शांति की जरूरत पर जोर दे चुके हैं।

    फिलिस्तीनियों के लिए भारत की मानवीय मदद जारी
    पश्चिम एशिया की स्थिति पर जयशंकर ने कहा कि भारत फिलिस्तीनी लोगों के लिए मानवीय सहायता और राहत कार्यों में मदद कर रहा है। भारत लंबे समय से फिलिस्तीन के मुद्दे पर मानवीय सहायता और दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन की बात करता रहा है। संयुक्त राष्ट्र में भी भारत ने स्वतंत्र, संप्रभु और व्यवहार्य फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना के साथ इजराइल के साथ शांति और सुरक्षा में रहने वाले दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन दोहराया है।

    जयशंकर ने कहा कि शांति का मतलब केवल युद्ध का खत्म होना नहीं है। यदि दुनिया लगातार खतरों और दबावों से घिरी रहेगी तो स्थिरता और सुरक्षा कमजोर होगी। स्थायी शांति के लिए स्थिरता, सुरक्षा और भरोसे का माहौल बनाना जरूरी है। इनमें से किसी भी आधार को कमजोर करने से शांति की स्थिति भी प्रभावित होगी।

    हथियार की तरह इस्तेमाल हो रही अर्थव्यवस्था और तकनीक
    विदेश मंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के दशकों बाद भी दुनिया में हर चीज को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। प्रतिस्पर्धा की सोच हावी हो रही है और संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है।

    उन्होंने वित्त और बाजारों तक पहुंच सीमित करने, सप्लाई चेन में रुकावट डालने और तकनीक को रोकने जैसे कदमों का जिक्र किया। उनका कहना था कि ऐसे उपायों का असर सिर्फ संबंधित देशों तक नहीं रहता, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और विकास पर भी पड़ता है।

    ग्लोबल साउथ के सामने 4F का संकट
    जयशंकर ने ग्लोबल साउथ की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि विकासशील देशों के सामने चुनौतियां और गंभीर हैं। उन्होंने ‘4F’ संकट की बात कही। इसमें Food यानी भोजन, Fuel यानी ईंधन, Fertilizer यानी उर्वरक और Finance यानी वित्त शामिल हैं।

    उनके मुताबिक दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी संघर्षों और तनाव का सीधा असर इन चारों क्षेत्रों पर पड़ रहा है। ऐसे में वैश्विक संस्थाओं और देशों के सामने चुनौती यह है कि वे स्थिरता और भरोसे का ऐसा वातावरण तैयार करें, जिससे विकासशील देशों की बुनियादी जरूरतों और विकास पर संकट का असर कम हो।

    पश्चिम एशिया में टू-स्टेट सॉल्यूशन पर भारत का रुख
    पश्चिम एशिया में स्थायी शांति के सवाल पर जयशंकर ने कहा कि भारत का दृढ़ विश्वास है कि टू-स्टेट सॉल्यूशन यानी दो-राष्ट्र समाधान जरूरी है। इसके तहत इजराइल और फिलिस्तीन को शांति और सुरक्षा के साथ रहने का रास्ता तलाशने की बात कही जाती है।

    संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस भी 81वें महासभा सत्र के दौरान दो-राष्ट्र समाधान को पश्चिम एशिया में स्थायी शांति का महत्वपूर्ण आधार बता चुके हैं।

    जयशंकर के संबोधन में आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, फिलिस्तीन को मानवीय सहायता और ग्लोबल साउथ की आर्थिक चुनौतियों जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। भारत ने इस दौरान आतंकवाद के खिलाफ अपने रुख को दोहराने के साथ वैश्विक स्तर पर शांति, स्थिरता और संवाद की जरूरत पर जोर दिया।