नई दिल्ली । दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को आयोजित ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली के जरिए इंडिया गठबंधन ने एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर गठबंधन के घटक दलों के नेता एक मंच पर नजर आए और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के मुद्दे पर चुनाव आयोग के खिलाफ आवाज बुलंद की। हालांकि, विपक्षी दलों की यह एकजुटता चुनावी मैदान में कितनी टिक पाएगी, इस पर सवाल बने हुए हैं। कई राज्यों में गठबंधन के घटक दल एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मुकाबले में हैं।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, विपक्षी दलों के बीच साझा मुद्दों पर सहमति और चुनावी रणनीति में तालमेल दो अलग-अलग चुनौतियां हैं। उत्तर प्रदेश में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच खींचतान जारी है। ऐसे में गठबंधन के सामने चुनौती है कि केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ साझा मोर्चा बनाने के साथ-साथ चुनावी स्तर पर भी तालमेल कायम रखा जाए।
कई राज्यों में घटक दल आमने-सामने
विपक्षी एकता की राह में राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां बड़ी चुनौती हैं। केरल में कांग्रेस और वामपंथी दल एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के अलग चुनाव लड़ने से तृणमूल कांग्रेस को कई सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा। आम आदमी पार्टी फिलहाल इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है, जबकि वर्ष 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में उसके मैदान में उतरने से कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन पर असर पड़ने की बात कही गई थी।
पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों के बीच इसी तरह के टकराव सामने आते रहे हैं। इससे साझा विपक्षी मोर्चे की संभावनाओं को झटका लगा है। अब कांग्रेस सहित गठबंधन के दूसरे दल एक बार फिर विपक्षी एकता को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
साझा एजेंडे और नेतृत्व पर सहमति की जरूरत
चुनावी रणनीतिकारों का मानना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और अन्य मुद्दों पर एकजुटता के साथ इंडिया गठबंधन को अपने नेतृत्व और साझा चुनावी एजेंडे पर भी स्पष्टता लानी होगी। इसका उद्देश्य यह है कि जिन राज्यों में भाजपा के खिलाफ विपक्षी दल चुनाव लड़ें, वहां मतों का बंटवारा कम से कम हो और भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ न मिले
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राहुल गांधी ने शिव बारात का दिया उदाहरण
रैली में राहुल गांधी ने शिव बारात का जिक्र करते हुए कहा कि भगवान शिव की बारात में कोई भी शामिल हो सकता है और कोई भी नाच सकता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता किशोर कुमार झा ने कहा कि राहुल के इस उदाहरण से स्पष्ट है कि लंबी लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने के लिए सभी विपक्षी दलों की एकजुटता जरूरी है।
रैली से कुनबा बढ़ाने के संकेत
‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली के जरिए इंडिया गठबंधन ने अपने दायरे का विस्तार करने के संकेत भी दिए। इस दौरान क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक मजबूरियां और नए समूहों के साथ तालमेल की संभावनाएं भी सामने आईं। आम तौर पर वामपंथी दलों से दूरी रखने वाली तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), युवाओं और वामपंथी दलों के साथ एकजुटता जताई। उन्होंने कहा कि सभी को मिलकर यह लड़ाई लड़नी होगी।
ममता बनर्जी के इस रुख से सीजेपी के भी आंदोलन से जुड़ने की अटकलें तेज हुई हैं। इससे एक दिन पहले सीजेपी के अभिजीत दीपके ने ममता बनर्जी से मुलाकात की थी। ऐसे में रैली के जरिए विपक्षी दलों ने साझा संघर्ष का दायरा बढ़ाने का संदेश तो दिया है, लेकिन चुनावी गठबंधन में आपसी तालमेल कायम रखना उनके लिए बड़ी चुनौती बना रहेगा।
