Category: Economy

  • सरकार अगले महीने एआई नियमों पर जारी करेगी परामर्श पत्र, डीपफेक और सुरक्षित तकनीकी इस्तेमाल पर रहेगा मुख्य फोकस

    सरकार अगले महीने एआई नियमों पर जारी करेगी परामर्श पत्र, डीपफेक और सुरक्षित तकनीकी इस्तेमाल पर रहेगा मुख्य फोकस

    नई दिल्ली ।केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि सरकार अगले महीने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई से जुड़े नियमों पर एक परामर्श पत्र जारी करेगी। इसका मुख्य उद्देश्य एआई के सुरक्षित इस्तेमाल को सुनिश्चित करना और तेजी से बढ़ रहे डीपफेक के खतरे से निपटना होगा। सरकार की ओर से एआई के इस्तेमाल से जुड़े जोखिमों को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा को नियमन का प्रमुख आधार बनाने की बात कही गई है।

    एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वैष्णव ने कहा कि वह विभाग से एआई नियमन को लेकर एक चर्चा पत्र तैयार करने का अनुरोध करेंगे। उन्होंने कहा कि इस दस्तावेज का प्रमुख फोकस सुरक्षा पर होना चाहिए। उनके मुताबिक, एआई के इस्तेमाल से जुड़ा सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा है और इसे गंभीरता से संबोधित करने की जरूरत है। उन्होंने डीपफेक को बड़ी समस्या बताते हुए कहा कि इससे समाज में गंभीर दुष्प्रभाव पैदा हो सकते हैं।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा कि लोग कई बार डीपफेक सामग्री को वास्तविक मान लेते हैं। इससे गलत धारणाएं बन सकती हैं और लोग भ्रामक जानकारी के आधार पर फैसले ले सकते हैं। प्रस्तावित परामर्श पत्र केवल एआई के नियमन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें कौशल विकास और सुरक्षा जैसे पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाएगा। साथ ही यह सुनिश्चित करने पर जोर होगा कि एआई तकनीक के विस्तार के दौरान कोई भी पीछे न छूटे।

    वैष्णव ने कहा कि एआई से जुड़े नियामक ढांचे में मानव हित सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि एआई को केवल कानून बनाकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसके लिए तकनीक और नियमन दोनों को साथ लेकर चलना जरूरी होगा। उन्होंने इसे टेक्नो-लीगल समाधान की जरूरत बताया और कहा कि इस प्रक्रिया में उद्योग, विशेषज्ञों तथा अन्य हितधारकों की भागीदारी भी आवश्यक है।

    मंत्री ने एआई से जुड़े जोखिमों, साइबर हमलों और डीपफेक जैसी चुनौतियों से निपटने में उद्योग जगत की जिम्मेदारी पर भी जोर दिया। सरकार पहले ही इंडिया एआई गवर्नेंस गाइडलाइन्स जारी कर चुकी है, जिसमें सुरक्षित, जिम्मेदार और मानव-केंद्रित एआई इस्तेमाल के लिए ढांचा दिया गया है। इन दिशा-निर्देशों में भ्रामक सूचना, डीपफेक, एल्गोरिदमिक पक्षपात और एआई से होने वाले संभावित सामाजिक नुकसान को प्रमुख जोखिमों में शामिल किया गया है।

    दिशा-निर्देशों में एआई से जुड़ी कानूनी खामियों की पहचान, जवाबदेही, डेटा संरक्षण, कॉपीराइट, कंटेंट प्रमाणीकरण और जनरेटिव एआई के दुरुपयोग जैसे मुद्दों की समीक्षा की सिफारिश की गई है। इसके अलावा एआई गवर्नेंस और इकोनॉमिक ग्रुप, टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी एक्सपर्ट कमिटी तथा एआई सेफ्टी इंस्टीट्यूट जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं का प्रावधान किया गया है। सरकार इंडिया एआई मिशन के तहत सेफ एंड ट्रस्टेड एआई पहल पर भी काम कर रही है, जिसमें डीपफेक पहचान, गोपनीयता-सुरक्षित एआई, एल्गोरिदमिक पक्षपात कम करने और एआई जोखिम मूल्यांकन से जुड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं।

  • भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट, सेंसेक्स 1045 अंक टूटा और निफ्टी 52 हफ्तों के निचले स्तर पर बंद

    भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट, सेंसेक्स 1045 अंक टूटा और निफ्टी 52 हफ्तों के निचले स्तर पर बंद

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार के कारोबार में भारी गिरावट दर्ज की गई। सेंसेक्स 1,045.46 अंक यानी 1.44 प्रतिशत फिसलकर 71,593.24 पर बंद हुआ। वहीं नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 371.25 अंक यानी 1.64 प्रतिशत की गिरावट के साथ 22,231.80 पर बंद हुआ। पूरे कारोबारी सत्र के दौरान बाजार पर बिकवाली का दबाव बना रहा और प्रमुख सूचकांक लगातार कमजोरी में रहे।

    कारोबार के दौरान निफ्टी ने 22,179.90 का न्यूनतम स्तर छुआ। यह उसका 52 हफ्तों का निचला स्तर रहा। बाजार में गिरावट का असर केवल बड़े शेयरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी कमजोरी देखी गई। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 1,500.10 अंक यानी 2.53 प्रतिशत गिरकर 57,882.50 पर रहा। निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स भी 456.85 अंक यानी 2.34 प्रतिशत की गिरावट के साथ 19,050.10 पर बंद हुआ।

    गुरुवार को लगभग सभी प्रमुख सेक्टर सूचकांक लाल निशान में बंद हुए। निफ्टी मेटल में 3.55 प्रतिशत, निफ्टी रियल्टी में 3.16 प्रतिशत और निफ्टी एनर्जी में 2.82 प्रतिशत की गिरावट रही। निफ्टी कमोडिटीज 2.81 प्रतिशत, निफ्टी मीडिया 2.79 प्रतिशत, निफ्टी इंडिया डिफेंस 2.76 प्रतिशत और निफ्टी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग 2.61 प्रतिशत नीचे रहे। इसके अलावा निफ्टी ऑयल एंड गैस में 2.52 प्रतिशत और निफ्टी ऑटो में 2.49 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

    निफ्टी पीएसई 2.40 प्रतिशत, निफ्टी हेल्थकेयर 2.33 प्रतिशत और निफ्टी फार्मा 2.32 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुए। बाजार के प्रमुख शेयरों में आईटीसी, इंडिगो, पावर ग्रिड, बीईएल, एनटीपीसी, मारुति सुजुकी, टाटा स्टील, अल्ट्राटेक सीमेंट, एलएंडटी, भारती एयरटेल, एशियन पेंट्स, बजाज फिनसर्व, सन फार्मा, एचडीएफसी बैंक, इटरनल और एचयूएल प्रमुख गिरावट वाले शेयरों में रहे। दूसरी ओर टेक महिंद्रा, एक्सिस बैंक और इन्फोसिस बढ़त के साथ बंद हुए।

    बाजार में गिरावट की प्रमुख वजहों में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, रुपये की कमजोरी और विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली बताई गई। कच्चे तेल की कीमत 103 डॉलर प्रति बैरल बताई गई, जबकि डॉलर के मुकाबले रुपया 97 के स्तर पर रहा। इन परिस्थितियों के बीच बाजार के सभी प्रमुख सेक्टरों में बिकवाली देखने को मिली। मेटल और रियल्टी सेक्टर में सबसे ज्यादा कमजोरी रही।

    हालांकि, बाजार में गिरावट के बीच कुछ शेयरों ने बेहतर प्रदर्शन किया। दूसरी तिमाही के शुरुआती नतीजों में अच्छा प्रदर्शन करने वाली कुछ कंपनियों के शेयरों में मजबूती देखी गई। सेन्को गोल्ड का शेयर कारोबार के दौरान 11.9 प्रतिशत तक चढ़ा, हालांकि बाद में बाजार का रुख कमजोर होने से इसकी बढ़त कम हो गई। वहीं पीएनजीएस रेवा डायमंड ज्वेलरी के शेयरों में लगातार चौथे दिन तेजी बनी रही। कंपनी की ओर से इस सप्ताह मजबूत नतीजे जारी किए जाने के बाद उसके शेयरों में यह तेजी देखने को मिली। कुल मिलाकर गुरुवार का कारोबारी सत्र भारतीय शेयर बाजार के लिए तेज गिरावट वाला रहा और निफ्टी 52 हफ्तों के निचले स्तर तक पहुंच गया।

  • भारत के क्रेडिट बाजार का एयूएम जून में 18 प्रतिशत बढ़कर 142 लाख करोड़ रुपए पहुंचा, असुरक्षित ऋणों में भी तेज वृद्धि

    भारत के क्रेडिट बाजार का एयूएम जून में 18 प्रतिशत बढ़कर 142 लाख करोड़ रुपए पहुंचा, असुरक्षित ऋणों में भी तेज वृद्धि


    नई दिल्ली ।भारत के क्रेडिट बाजार में वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के दौरान मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है। जून 2026 तक कुल एसेट्स अंडर मैनेजमेंट यानी एयूएम बढ़कर 142 लाख करोड़ रुपए हो गया। यह पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 18 प्रतिशत अधिक है। क्रेडिट बाजार की इस वृद्धि के बीच ऋण की गुणवत्ता में भी सुधार देखने को मिला है और जून में नेट 30+ डिलिंक्वेंसी घटकर 3 प्रतिशत रह गई।

    वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कुल लोन सोर्सिंग वैल्यू 20 लाख करोड़ रुपए रही। इसमें सालाना आधार पर 18 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि, पिछली तिमाही यानी वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही की तुलना में वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी रही। इसके बावजूद क्रेडिट बाजार में विभिन्न ऋण उत्पादों की मांग बनी रही और कई श्रेणियों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    असुरक्षित ऋण इस वृद्धि के प्रमुख योगदानकर्ताओं में शामिल रहे। इस श्रेणी में नए ऋण वितरण की मात्रा 26 प्रतिशत बढ़ी। पर्सनल लोन और कंज्यूमर लोन ने असुरक्षित ऋणों की वृद्धि को गति दी। क्रेडिट कार्ड सेगमेंट में भी दोबारा तेजी के संकेत मिले हैं। हालांकि, खुदरा ऋण पोर्टफोलियो के कुल मूल्य में सुरक्षित ऋणों की हिस्सेदारी अभी भी प्रमुख बनी हुई है।

    क्रेडिट गुणवत्ता के स्तर पर जून 2026 में नेट 30+ डिलिंक्वेंसी 3 प्रतिशत रही, जबकि जून 2025 में यह 4.1 प्रतिशत थी। इस गिरावट से ऋण चूक से जुड़े दबाव में कमी का संकेत मिलता है। वहीं, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों यानी एनबीएफसी की उपभोग आधारित ऋण उत्पादों में स्थिति मजबूत हुई है। पर्सनल लोन, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स लोन और दोपहिया वाहन ऋण में उनकी हिस्सेदारी बढ़ रही है।

    बैंकों की स्थिति बड़े टिकट आकार वाले सुरक्षित ऋण उत्पादों में मजबूत बनी हुई है। होम लोन और ऑटो लोन जैसे क्षेत्रों में बैंक प्रमुख भूमिका में हैं। उत्पादवार आंकड़ों के अनुसार, पर्सनल लोन एयूएम 14 प्रतिशत बढ़कर 16.2 लाख करोड़ रुपए हो गया। नए पर्सनल लोन वितरण में 32 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 3 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया। क्रेडिट कार्ड एयूएम 3.15 लाख करोड़ रुपए रहा, जिसमें 0.1 प्रतिशत की मामूली कमी दर्ज हुई। हालांकि, नए कार्ड जारी होने और उनके उपयोग में सुधार के संकेत मिले हैं।

    कंज्यूमर ड्यूरेबल्स लोन एयूएम 37 प्रतिशत बढ़कर 1.1 लाख करोड़ रुपए हो गया, जबकि टू-व्हीलर लोन एयूएम बढ़कर 1.8 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया। होम लोन एयूएम में भी 13 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई और यह 43.6 लाख करोड़ रुपए रहा। औसत होम लोन टिकट साइज एक साल पहले के 32.2 लाख रुपए से बढ़कर 34.8 लाख रुपए हो गया। रिपोर्ट के अनुसार, क्रेडिट बाजार की वृद्धि, ऋण उत्पादों में मांग और बेहतर एसेट क्वालिटी बाजार के विस्तार की स्थिति को दर्शाती है।

  • व्यापारी संगठनों ने नए UPI MDR फ्रेमवर्क को त्योहारी सीजन तक टालने की मांग की, बिक्री प्रभावित होने की जताई आशंका

    व्यापारी संगठनों ने नए UPI MDR फ्रेमवर्क को त्योहारी सीजन तक टालने की मांग की, बिक्री प्रभावित होने की जताई आशंका


    नई दिल्ली ।
    व्यापारी संगठनों ने 15 अक्टूबर से लागू होने वाले नए यूपीआई एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट फ्रेमवर्क को त्योहारी सीजन तक टालने की अपील की है। संगठनों ने भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) से इस प्रस्ताव को त्योहारी सीजन और अगले साल की शुरुआत तक लागू नहीं करने का अनुरोध किया है। व्यापारियों का कहना है कि यदि बदलाव तय समय पर लागू किया गया तो त्योहारी सीजन के दौरान उनकी बिक्री पर असर पड़ सकता है।

    नए एमडीआर फ्रेमवर्क के तहत 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर चुनिंदा व्यापारी श्रेणियों के लिए 5 रुपये का एक समान शुल्क लागू किया जाएगा। इसके अलावा 2,000 रुपये से अधिक के बड़े पर्सन-टू-मर्चेंट यानी पी2एम भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाया जाएगा। इस शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये निर्धारित की गई है।

    प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर व्यापारी संगठनों की मुख्य चिंता त्योहारी सीजन में लेनदेन और बिक्री पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर है। संगठनों ने इसी वजह से नए फ्रेमवर्क को कुछ समय के लिए टालने की अपील की है। उनका आग्रह है कि इसे त्योहारी खरीदारी की अवधि समाप्त होने और अगले साल की शुरुआत तक लागू न किया जाए।

    एनपीसीआई के अनुमान के अनुसार, प्रस्तावित बदलाव का असर मर्चेंट ट्रांजैक्शन के केवल 4 प्रतिशत हिस्से पर पड़ेगा। संस्था के मुताबिक 95 प्रतिशत से अधिक पर्सन-टू-मर्चेंट यूपीआई भुगतान इस एमडीआर फ्रेमवर्क के दायरे से बाहर रहेंगे। वहीं, पीयर-टू-पीयर यानी पी2पी मर्चेंट मॉडल का इस्तेमाल करने वाले छोटे व्यापारियों को जीरो एमडीआर की सुविधा पहले की तरह मिलती रहेगी।

    आम यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए मुफ्त यूपीआई इस्तेमाल को लेकर किसी मासिक कोटे या सीमा का प्रावधान नहीं किया गया है। उपयोगकर्ता तय मुफ्त फ्रेमवर्क के तहत लेनदेन जारी रख सकेंगे और उन पर एमडीआर शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इस तरह प्रस्तावित बदलाव का सीधा दायरा मुख्य रूप से कुछ विशेष व्यापारी श्रेणियों और निर्धारित भुगतान लेनदेन तक सीमित रहेगा।

    नए फ्रेमवर्क में छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष फंड बनाने का भी प्रावधान है। इसके लिए कुल एमडीआर कलेक्शन का 5 प्रतिशत हिस्सा निर्धारित किया गया है। एमडीआर से मिलने वाली राशि को अलग-अलग कंपनियों के बीच वितरित किया जाएगा। इस राशि का इस्तेमाल यूपीआई के विस्तार, साइबर सुरक्षा और इनोवेशन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जाएगा।

    इसके साथ ही एनपीसीआई ने बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि व्यापारी एमडीआर शुल्क का बोझ ग्राहकों पर न डालें। ऐसे में नए फ्रेमवर्क में शुल्क व्यवस्था के साथ व्यापारियों और ग्राहकों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर भी स्पष्ट प्रावधान रखे गए हैं। फिलहाल व्यापारी संगठन नए एमडीआर फ्रेमवर्क को लागू करने की तारीख आगे बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, ताकि त्योहारी अवधि के दौरान उनकी बिक्री पर संभावित असर से बचा जा सके।

  • भारत की अर्थव्यवस्था अगले दशक में दोगुनी होकर 8 ट्रिलियन डॉलर पार कर सकती है, सुधारों और निवेश से बढ़ेगी विकास क्षमता

    भारत की अर्थव्यवस्था अगले दशक में दोगुनी होकर 8 ट्रिलियन डॉलर पार कर सकती है, सुधारों और निवेश से बढ़ेगी विकास क्षमता

    नई दिल्ली । भारत की अर्थव्यवस्था अगले एक दशक में दोगुनी होकर 8 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो सकती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में किए गए संरचनात्मक सुधारों, बुनियादी ढांचे में लगातार निवेश और अर्थव्यवस्था के औपचारिककरण ने विकास की क्षमता को मजबूत किया है। इन बदलावों से वैश्विक निवेशकों के लिए भारत में बड़े अवसर पैदा हो रहे हैं।

    रिपोर्ट के मुताबिक, भारत पहले ही 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का आंकड़ा पार कर चुका है। मौजूदा आर्थिक गति को देखते हुए देश अगले 10 वर्षों में अपनी अर्थव्यवस्था का आकार एक बार फिर दोगुना करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। रिपोर्ट में लंबे समय तक लागू किए गए आर्थिक सुधारों के प्रभाव को भारत की विकास क्षमता के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जहां लगातार लागू किए गए संरचनात्मक सुधारों का असर व्यापक स्तर पर दिखाई दे रहा है। वर्ष 2014 के बाद कई प्रमुख आर्थिक सुधार लागू किए गए, जिनमें वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता यानी आईबीसी, श्रम बाजार का औपचारिककरण, डिजिटलीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास में बड़े निवेश शामिल हैं। इन सुधारों ने अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता को बढ़ाने में भूमिका निभाई है।

    रिपोर्ट के अनुसार, इन बदलावों के आधार पर भारत लगभग 11 प्रतिशत नॉमिनल जीडीपी वृद्धि के मार्ग पर बना रह सकता है। साथ ही, पहले से लागू किए गए कई सुधारों का पूरा लाभ अभी अर्थव्यवस्था को मिलना बाकी है। इस वजह से भारत की आर्थिक विकास की संभावनाओं को अंतिम चरण में नहीं माना गया है और आने वाले समय में भी उल्लेखनीय अवसर बने रहने की बात कही गई है।

    औपचारिक अर्थव्यवस्था के विस्तार को भी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण बताया गया है। इसके अनुसार, औपचारिक अर्थव्यवस्था के बढ़ने से भारतीय कारोबारों और नकदी प्रवाह से जुड़े जोखिम प्रीमियम में कमी आई है। इससे लंबी अवधि के निवेश और आर्थिक विकास के लिए अधिक अनुकूल माहौल तैयार हुआ है। बुनियादी ढांचे में लगातार निवेश को भी विकास क्षमता मजबूत करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल किया गया है।

    प्रौद्योगिकी क्षेत्र को लेकर रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को भारतीय आईटी सेवा उद्योग के लिए संभावित अवसर के रूप में देखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार, एआई भारतीय आईटी कंपनियों के लिए केवल चुनौती नहीं है, बल्कि वे अपनी सेवाओं में इसका अधिक इस्तेमाल कर सकती हैं। इससे कंपनियों की उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ सकती है।

    रिपोर्ट में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स यानी जीसीसी को भी भारत की आर्थिक वृद्धि के नए इंजन के रूप में उभरता क्षेत्र बताया गया है। पारंपरिक आईटी सेवाओं के साथ जीसीसी क्षेत्र का विस्तार हो रहा है और बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में अपने वैश्विक संचालन केंद्र स्थापित कर रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सेवा क्षेत्र पहले से भारत की रियल जीडीपी वृद्धि में आधे से अधिक योगदान दे रहा है और आने वाले वर्षों में इसकी भूमिका और मजबूत हो सकती है।

  • टाटा ट्रस्ट में सत्ता की लड़ाई तेज, सात ट्रस्टों के 84 कैविएट से मचा हड़कंप, नोएल-नेविल टाटा पर क्यों बढ़ा दबाव

    टाटा ट्रस्ट में सत्ता की लड़ाई तेज, सात ट्रस्टों के 84 कैविएट से मचा हड़कंप, नोएल-नेविल टाटा पर क्यों बढ़ा दबाव


    नई दिल्ली। टाटा समूह से जुड़े ट्रस्टों के भीतर चल रहा विवाद अब खुलकर सामने आता दिखाई दे रहा है। महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के सामने सात ट्रस्टों की ओर से कुल 84 कैविएट दाखिल किए जाने के बाद इस पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है। इन कैविएट में नोएल टाटा और नेविल टाटा को कैविएटर बनाया गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि ट्रस्ट से जुड़े किसी मामले में चैरिटी कमिश्नर की ओर से कोई आदेश जारी करने से पहले संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया जाए। बड़ी संख्या में कैविएट दाखिल होने को टाटा ट्रस्ट के भीतर बढ़ते मतभेदों का अहम संकेत माना जा रहा है।

    मामले का केंद्र सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट यानी एसडीटीटी में शासन व्यवस्था और निर्णय लेने के अधिकारों से जुड़ा विवाद बताया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार नोएल टाटा और नेविल टाटा के खिलाफ अलग-अलग मुद्दे उठाए गए हैं और इसी वजह से कानूनी स्तर पर पहले से अपनी स्थिति सुरक्षित करने की कोशिश की जा रही है। फिलहाल टाटा ट्रस्ट की ओर से इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है।

    विवाद की एक अहम कड़ी नोएल टाटा की नियुक्ति और उनके स्थायी ट्रस्टी के रूप में बने रहने से जुड़ी है। श्रीनिवासन की ओर से नोएल टाटा की नियुक्ति की जांच की मांग उठाई गई है। साथ ही यह सवाल भी उठाया गया है कि नोएल टाटा को टाटा ट्रस्ट का चेयरमैन बनाने का आधार क्या था और वह इस पद पर किस प्रक्रिया के तहत बने हुए हैं। इन सवालों ने ट्रस्ट की आंतरिक व्यवस्था और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर बहस तेज कर दी है।

    मामला सिर्फ नियुक्ति तक सीमित नहीं है। एसडीटीटी से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण फैसलों में नोएल टाटा की भागीदारी और उनके मतदान अधिकारों पर भी रोक लगाने की मांग की गई है। इसमें टाटा संस के निदेशकों प्रतिनिधियों या प्रॉक्सी की नियुक्ति और उन्हें किसी तरह के निर्देश देने से जुड़े मामले भी शामिल हैं। ऐसे में विवाद का असर टाटा समूह की शीर्ष स्तर की निर्णय प्रक्रिया पर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है।

    इस बीच सर रतन टाटा ट्रस्ट को लेकर भी पहले से स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं है। महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर की ओर से ट्रस्ट के कामकाज पर कुछ प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं। इन प्रतिबंधों के चलते ट्रस्ट फिलहाल बैठक नहीं कर पा रहा है। जब तक यह रोक नहीं हटती तब तक बैठक आयोजित करने में भी अड़चन बनी रहेगी।

    टाटा ट्रस्ट की संरचना और टाटा संस में ट्रस्टों की भूमिका को देखते हुए यह विवाद काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ट्रस्टों के फैसलों का असर समूह की कंपनियों और उसके प्रशासनिक ढांचे पर भी पड़ सकता है। ऐसे में 84 कैविएट दाखिल होने के बाद अब निगाहें महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर की आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह साफ हो सकता है कि इन आपत्तियों और आरोपों पर क्या रुख अपनाया जाता है और नोएल टाटा तथा अन्य संबंधित पक्षों की भूमिका को लेकर विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।

  • कारोबारियों के लिए आसान होगा जीएसटी सिस्टम? रिफंड का दायरा बढ़ाने और पंजीकरण प्रक्रिया सरल करने पर मंथन

    कारोबारियों के लिए आसान होगा जीएसटी सिस्टम? रिफंड का दायरा बढ़ाने और पंजीकरण प्रक्रिया सरल करने पर मंथन


    नई दिल्ली। जीएसटी व्यवस्था को कारोबारियों के लिए आसान और अधिक सुविधाजनक बनाने की दिशा में सरकार कई बड़े बदलावों पर विचार कर रही है। जीएसटी काउंसिल की गुरुवार को होने वाली अहम बैठक में रिफंड पंजीकरण और रिटर्न दाखिल करने से जुड़े कई प्रस्तावों पर फैसला हो सकता है। बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण करेंगी। प्रस्तावों को मंजूरी मिलने की स्थिति में कारोबारियों को जीएसटी से जुड़ी कई प्रक्रियाओं में राहत मिल सकती है और टैक्स व्यवस्था को पहले की तुलना में सरल बनाने की कोशिश की जा सकती है।

    बैठक में इनपुट टैक्स क्रेडिट यानी आईटीसी से जुड़े नियमों में भी बदलाव पर विचार होने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक आईटीसी पर लगी कुछ मौजूदा पाबंदियों में ढील दी जा सकती है। सामान्य कारोबारी खर्चों को भी इनपुट टैक्स क्रेडिट के दायरे में शामिल करने का प्रावधान किया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो कारोबारियों के लिए टैक्स क्रेडिट का इस्तेमाल करने की गुंजाइश बढ़ सकती है और कारोबारी खर्चों पर कर का बोझ कम करने में मदद मिल सकती है।

    पंजीकरण को लेकर भी कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित हैं। एक राज्य में जीएसटी पंजीकरण कराकर पूरे देश में कारोबार करने की अनुमति देने के प्रस्ताव पर विचार किया जा सकता है। मौजूदा व्यवस्था में अलग अलग राज्यों में कारोबार करने वाले व्यवसायों के लिए पंजीकरण से जुड़ी प्रक्रियाएं अधिक जटिल हो सकती हैं। ऐसे में एकीकृत पंजीकरण की व्यवस्था लागू होने पर कारोबारियों के लिए अनुपालन प्रक्रिया आसान हो सकती है।

    सरकार की ओर से जीएसटी पंजीकरण प्रक्रिया को लेकर भी आंकड़े सामने रखे गए हैं। सरकार का कहना है कि 61 प्रतिशत करदाताओं का पंजीकरण बिना अधिकारी के हस्तक्षेप के तीन कार्यदिवस के भीतर किया जा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि पंजीकरण प्रक्रिया को डिजिटल और कम हस्तक्षेप वाली बनाने पर जोर दिया जा रहा है। प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य भी कारोबारियों के लिए प्रक्रिया को सरल और तेज बनाना बताया जा रहा है।

    रिटर्न दाखिल करने की प्रक्रिया में भी बदलाव की तैयारी है। प्रस्ताव के मुताबिक ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें खरीदार के लेजर में संबंधित बदलाव स्वतः दर्ज हो जाएं। इससे रिटर्न से जुड़ी प्रक्रियाओं में मानवीय हस्तक्षेप कम करने और लेनदेन से संबंधित जानकारी को अधिक व्यवस्थित तरीके से दर्ज करने में मदद मिल सकती है।

    जीएसटी से जुड़े नोटिस को लेकर भी कारोबारियों को राहत मिल सकती है। प्रस्ताव के तहत एक तय सीमा से कम मामलों में नोटिस जारी नहीं करने की व्यवस्था पर विचार किया जा रहा है। इससे छोटे मामलों में कारोबारियों को बार बार नोटिस और अनुपालन संबंधी प्रक्रिया से गुजरने की परेशानी कम हो सकती है। हालांकि किस सीमा तक के मामलों को इस प्रावधान में शामिल किया जाएगा यह काउंसिल के फैसले के बाद ही स्पष्ट होगा।

    रिफंड व्यवस्था में बदलाव भी बैठक के प्रमुख प्रस्तावों में शामिल है। रिफंड का दायरा सेवाओं के साथ साथ संयंत्र और मशीनरी पर चुकाए गए कर तक बढ़ाने का प्रस्ताव सामने आया है। अगर इसे मंजूरी मिलती है तो पात्र कारोबारियों के लिए रिफंड प्राप्त करने का दायरा बढ़ सकता है। इससे खास तौर पर ऐसे व्यवसायों को फायदा मिलने की उम्मीद है जिनमें मशीनरी और संयंत्र पर बड़ा निवेश किया जाता है।

    जीएसटी काउंसिल की बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इसमें टैक्स व्यवस्था को सरल बनाने के साथ कारोबारियों की अनुपालन संबंधी परेशानियों को कम करने पर चर्चा होगी। हालांकि ये सभी प्रस्ताव फिलहाल बैठक में विचार के स्तर पर हैं। अंतिम तस्वीर काउंसिल के फैसले के बाद ही साफ होगी। यदि प्रस्तावों को मंजूरी मिलती है तो रिफंड आईटीसी पंजीकरण और रिटर्न दाखिल करने जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जीएसटी व्यवस्था में बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

  • आम आदमी को झटका…. महंगाई पर लगाम कसने के बहाने बढ़ाया रेपो रेट… अब EMI करेगी जेब ढ़ीली!

    आम आदमी को झटका…. महंगाई पर लगाम कसने के बहाने बढ़ाया रेपो रेट… अब EMI करेगी जेब ढ़ीली!


    नई दिल्ली।
    तकनीकी रूप से बताया जाए तो रेपो रेट (Repo Rate) वह ब्याज दर होती है जिस पर रिजर्व बैंक (Reserve Bank) देश के कमर्शियल बैंकों (Commercial Banks) को उनके दैनिक कामकाज के लिए कर्ज देता है. देखने-सुनने में यह भले दो बैंकों के बीच की बात लगे, लेकिन जैसे ही रेप रेप बढ़ने की खबर आती है, आम आदमी की जेब पर इसका असर बेहद पेंचीदा और खर्चीला हो जाता है. साढ़े तीन साल बाद RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की है. इसके पीछे तर्क ये दिया गया है कि ईरान वॉर (Iran War) के कारण देश में बढ़ती महंगाई को 6 फीसदी के भीतर रोके रखने के लिए यह कदम उठाया गया है।

    रिजर्व बैंक की दलील और उसके सामने के हालात अपनी जगह है, लेकिन आपकी और हमारी रसोई तक पहुंचने वाला यह एक बड़ा झटका भी है. बैंक को मिलने वाला महंगा कर्ज घूम-फिरकर आखिरकार आम इंसान की EMI, मकान के सपने और महीने के बजट पर ही भारी पड़ता है।

    रेपो रेट बढ़ने की पूरी कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. 2020 में जब कोविड महामारी की वजह से सब कुछ बंद पड़ गया था, तब बाजार में पैसे का बहाव बनाए रखने के लिए रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें घटा दी थीं, ताकि लोग आसानी से लोन ले सकें और ठप पड़ी अर्थव्यवस्था में थोड़ी जान आए. लेकिन महामारी का दौर ढलते ही दुनिया में एक के बाद एक नए संकट शुरू हो गए।


    Repo Rate बढ़ा, अब 20, 30 और 50 लाख के लोन पर कितनी कटेगी EMI?

    पहले रूस-यूक्रेन का झगड़ा और अब ईरान-अमेरिका के बीच जारी जंग ने कच्चे तेल से लेकर दुनिया भर के बाजारों में आग लगा दी है. भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल बाहर से मंगवाता है. जब दुनिया में तेल महंगा होता है, तो देश के भीतर माल ढुलाई महंगी हो जाती है, जिससे बाजार में हर चीज का भाव चढ़ जाता है. इस वैश्विक उथल-पुथल ने भारत में महंगाई को इस कदर भड़का दिया कि रिजर्व बैंक को साढ़े तीन साल बाद दरों में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी का फैसला लेना ही पड़ा.


    रिजर्व बैंक की नजरिया: महंगाई की आग बुझाने की मजबूरी

    रिजर्व बैंक की अपनी एक तय जिम्मेदारी है- बाजार में घूम रहे पैसे को इस तरह संभालना कि कीमतें काबू से बाहर न जाएं. जब बाजार में महंगाई का ग्राफ ऊपर भागने लगता है, तो रिजर्व बैंक का मानना होता है कि लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसा थोड़ा कम किया जाए. ताकि डिमांड घटे और कीमतें स्थिर हों।

    अर्थशास्त्री इस पहलू पर सहमति देते हुए समझाते हैं कि जब महंगाई लंबी खिंच जाती है, तो वह आम परिवार की पूरी बचत को निगल जाती है. रिजर्व बैंक ने रेपो रेट बढ़ाकर एक तरह से ब्रेक लगाने की कोशिश की है. उसके लिए प्राथमिकता विकास की रफ्तार से ज्यादा इस बात की है कि रोजमर्रा के सामान इतने महंगे न हो जाएं कि आम इंसान की खरीदने की ताकत ही खत्म हो जाए।


    मोदी सरकार का नजरिया: भले राजनीतिक जोखिम हो, अर्थव्यवस्था का संतुलन जरूरी

    मोदी सरकार के लिए रिजर्व बैंक का यह फैसला एक कड़वी दवा जैसा है. एक तरफ सरकार चाहती है कि देश में नए उद्योग लगें, लोग कारोबार शुरू करें और युवाओं को नौकरियां मिलें, जिसके लिए सस्ते लोन की जरूरत होती है. कर्ज महंगा होने से व्यापार की रफ्तार धीमी पड़ने का डर रहता है. इतना ही नहीं, सरकार यह अच्छी तरह जानती है कि रेपो रेट बढ़ने से जब EMI बढ़ेगी, तो भी लोग सरकार को ही कोसेंगे।

    लेकिन दूसरी तरफ, सरकार यह भी अच्छी तरह जानती है कि आम इंसान के लिए महंगाई से बड़ा कोई दर्द नहीं होता. अगर राशन, तेल और सब्जियों के दाम लगातार बढ़ते रहे, तो जनता का गुस्सा सीधे सरकार पर ही फूटता है. इसलिए सरकार के नजरिये से यह कदम भले ही थोड़े समय के लिए अप्रिय हो, लेकिन देश की आर्थिक साख बचाए रखने और रुपये को टूटने से रोकने के लिए यह कदम उठाना उसकी भी एक राजनीतिक मजबूरी बन गया है।


    आम नागरिक का संकट: बजट और सपनों पर टूटा पहाड़

    मध्यमवर्गीय और कामकाजी परिवारों के लिए इस फैसले का मतलब है हर महीने का गणित गड़बड़ा जाना. जब रिजर्व बैंक से बैंकों को महंगा कर्ज मिलेगा, तो बैंक बिना देर किए इसका बोझ अपने ग्राहकों पर डाल देंगे. इसका सबसे बड़ा थप्पड़ उन लोगों को लगेगा जिन्होंने होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन ले रखा है।

  • इस कार कंपनी में बड़ी छंटनी की तैयारी… 1 लाख कर्मियों को दिखाएगी बाहर का रास्ता!

    इस कार कंपनी में बड़ी छंटनी की तैयारी… 1 लाख कर्मियों को दिखाएगी बाहर का रास्ता!


    नई दिल्ली
    । लग्जरी स्पोर्ट्स कार (Luxury Sports Car Manufacturer) बनाने वाली कंपनी पोर्शे (Porsche) बड़े रीस्ट्रक्चरिंग प्लान की तैयारी कर रही है। कंपनी 2030 तक करीब 9,000 नौकरियों में कटौती कर सकती है। यह उसके कुल वर्कफोर्स का लगभग 25% है। कंपनी के मुताबिक, पहले से घोषित कटौती को शामिल करने पर कुल वर्कफोर्स रिडक्शन (Workforce reduction) करीब 30% तक पहुंच सकती है। चीन में बिक्री में गिरावट और ईवी स्ट्रेटजी में महंगे बदलावों ने कंपनी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसके अलावा पोर्शे की मदर कंपनी फॉक्सवैगन ग्रुप में करीब 1 लाख जॉब कम करने पर काम कर रही है। आइए इसको जरा विस्तार से समझते हैं।

    पोर्शे के CEO माइकल लीटर्स ने 7 अक्टूबर को Stuttgart के पास कंपनी के Weissach डेवलपमेंट सेंटर में कैपिटल मार्केट डे के दौरान नई रणनीति पेश की। ‘Sportwagenschmiede ’35’ नाम की इस योजना का फोकस कम गाड़ियां बेचकर ज्यादा कमाई करने पर है, यानी कंपनी अब बिक्री की संख्या बढ़ाने के बजाय महंगे और ज्यादा प्राफिटेबल मॉडल्स पर ध्यान देगी।

    कंपनी की फाइनेंशियल स्थिति पर नजर डालें तो पोर्शे का ऑपरेटिंग प्रॉफिट मार्जिन पिछले साल घटकर सिर्फ 1.1% रह गया, जो 2023 में 18% था। अब कंपनी लंबे समय में इसे फिर से 10% से 15% के बीच लाने का लक्ष्य रख रही है। पोर्शे का कहना है कि रिकवरी में कई साल लग सकते हैं। खर्च घटाने के लिए उत्पादन कर्मियों की लागत में 30% तक और डेवलपमेंट कॉस्ट में 20% तक कटौती की योजना है। वहीं, मैनेजमेंट पोजिशन में करीब 40% की कमी की जा सकती है।

    पोर्शे (Porsche) की परेशानी में चीनी मार्केट की भूमिका भी बड़ी है। 2026 की पहली छमाही में चीन में कंपनी की बिक्री करीब एक-तिहाई घट गई। चीन कभी पोर्शे (Porsche) की कुल बिक्री का एक-तिहाई से ज्यादा हिस्सा देता था, लेकिन 2030 तक कंपनी को उम्मीद है कि यह हिस्सा करीब 10% तक सिमट सकता है। CEO Leiters के मुताबिक, पुराने सेल्स लेवल पर किसी भी कीमत पर लौटने की कोशिश करना ब्रांड के लिए फायदेमंद नहीं होगा।

    महंगी होंगी Porsche की कारें
    अब पोर्शे (Porsche) अपनी स्ट्रेटजी में कम लेकिन महंगे व्हीकल बेचने पर जोर दे रही है। कंपनी खासतौर पर 911 जैसे हाई-एंड स्पोर्ट्स कार पर ध्यान बढ़ाएगी। टॉप मॉडल्स की एवरेज कीमत करीब 20% बढ़ाने का लक्ष्य है। इसके साथ ही मॉडल वैरिएंट की संख्या भी लगभग 20% कम की जा सकती है। कंपनी अब सालाना 2 लाख से कम व्हीकल बेचकर भी अपने खर्च और प्रॉफिटेबिलिटी को बेहतर करना चाहती है। पिछले साल पोर्शे ने दुनिया भर में 2,79,449 व्हीकल डिलीवर किए थे।

    प्रोडक्ट स्ट्रेटजी में भी बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। कंपनी 2028 में इलेक्ट्रिक 718 Boxster और Cayman मॉडल्स लाने की तैयारी कर रही है। इसके अलावा एक नया कंबस्टन-इंजन SUV और 911 से ऊपर पोजिशन किया जाने वाला सुपरकार प्लेटफॉर्म भी प्लांड है। पोर्शे (Porsche) का लक्ष्य ऐसे प्रीमियम मॉडल्स के जरिए डिमांड और मार्जिन को मजबूत करना है।

    पूरे ग्रुप में 1 लाख जॉब्स खत्म करने का प्लान
    पोर्शे (Porsche) की मुश्किलों का असर उसकी पैरेंट कंपनी फॉक्सवैगन पर भी पड़ रहा है। लाइव मिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फॉक्सवैगन के पास पोर्शे की 75% हिस्सेदारी है और वह पूरे ग्रुप में करीब 1 लाख जॉब्स कम करने पर काम कर रही है।

  • शेयर बाजार में बढ़ी बेचैनी, सेंसेक्स-निफ्टी लुढ़के, अब 8 अक्टूबर के बाद किस ओर जाएगी बाजार की चाल

    शेयर बाजार में बढ़ी बेचैनी, सेंसेक्स-निफ्टी लुढ़के, अब 8 अक्टूबर के बाद किस ओर जाएगी बाजार की चाल


    नई दिल्ली। 8 अक्टूबर को भारतीय शेयर बाजार के कारोबार पर निवेशकों की नजर टिकी हुई है। इससे पहले 7 अक्टूबर का कारोबारी सत्र बाजार के लिए काफी उतार चढ़ाव वाला रहा। RBI की मौद्रिक नीति के फैसले के बाद बाजार में दबाव बढ़ा और सेंसेक्स 429 अंक की गिरावट के साथ 72638.70 के स्तर पर बंद हुआ। निफ्टी भी 173 अंक फिसलकर 22603.05 के स्तर पर पहुंच गया। बाजार में आई इस कमजोरी ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है और अब 8 अक्टूबर के कारोबार में बाजार किस दिशा में जाता है इस पर सबकी नजर रहेगी।

    दरअसल भारतीय रिजर्व बैंक ने 7 अक्टूबर को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 फीसदी कर दिया। करीब चार साल में यह पहली बड़ी दर बढ़ोतरी है। इसके साथ ही RBI ने अपनी नीति का रुख न्यूट्रल से बदलकर कैलिब्रेटेड टाइटनिंग कर दिया। बाजार के लिए यह संकेत महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्याज दरों में बढ़ोतरी से कंपनियों की उधारी लागत प्रभावित हो सकती है और ब्याज दर पर निर्भर सेक्टरों में दबाव बढ़ सकता है।

    7 अक्टूबर को बाजार में ज्यादातर प्रमुख सेक्टरों में कमजोरी देखने को मिली। मेटल शेयरों पर खास दबाव रहा और निफ्टी मेटल इंडेक्स करीब 2.3 फीसदी नीचे रहा। रियल एस्टेट और ऑटो जैसे ब्याज दर से प्रभावित होने वाले सेक्टर भी दबाव में रहे। दूसरी तरफ बैंकिंग शेयरों में कुछ मजबूती देखने को मिली। RBI के फैसले के बाद बैंक निफ्टी ने दिन के निचले स्तर से करीब 600 अंक की रिकवरी भी दिखाई। इससे संकेत मिलता है कि बाजार में पूरी तरह से बिकवाली का माहौल नहीं है बल्कि अलग अलग सेक्टरों में निवेशकों की रणनीति अलग रह सकती है।

    शेयरों की बात करें तो टाइटन में करीब 4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई और यह निफ्टी के प्रमुख कमजोर शेयरों में रहा। अदाणी एंटरप्राइजेज और हिंदाल्को इंडस्ट्रीज में भी दबाव दिखाई दिया। इसके उलट कोटक महिंद्रा बैंक में करीब 1.9 फीसदी की तेजी रही। ऐसे में 8 अक्टूबर को निवेशकों की नजर उन शेयरों पर रह सकती है जिनमें मजबूत कारोबार और बेहतर तिमाही प्रदर्शन की उम्मीद है।

    बाजार के लिए कच्चे तेल की कीमत भी बड़ा संकेत बनी हुई है। ब्रेंट क्रूड 102 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है। महंगे तेल का असर भारत के आयात बिल के साथ महंगाई और कंपनियों की लागत पर पड़ सकता है। इसके अलावा रुपये की कमजोरी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी बाजार की धारणा को प्रभावित कर रही है। 7 अक्टूबर को विदेशी संस्थागत निवेशकों ने करीब 2961 करोड़ रुपये के शेयर बेचे जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 5088 करोड़ रुपये की खरीदारी की।

    कुल मिलाकर 8 अक्टूबर का कारोबार बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। RBI की सख्त नीति कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें कमजोर रुपया और वैश्विक बाजारों के संकेत मिलकर बाजार में उतार चढ़ाव बढ़ा सकते हैं। वहीं मजबूत आर्थिक विकास का अनुमान बाजार के लिए सकारात्मक पक्ष है। RBI ने वित्त वर्ष 2027 के लिए GDP वृद्धि का अनुमान बढ़ाकर 7.1 फीसदी किया है। ऐसे में निवेशकों को बाजार की तेजी या गिरावट देखकर जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय जोखिम और कंपनी के प्रदर्शन को ध्यान में रखना जरूरी होगा।