Category: Economy

  • कीमती धातुओं में जबरदस्त तेजी, गोल्ड-सिल्वर मार्केट ने बनाया नया रिकॉर्ड; क्या है वजह?

    कीमती धातुओं में जबरदस्त तेजी, गोल्ड-सिल्वर मार्केट ने बनाया नया रिकॉर्ड; क्या है वजह?


    नई दिल्ली। पिछले 48 घंटों में सोना और चांदी की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है जिसने निवेशकों और खरीदारों दोनों को हैरान कर दिया है। घरेलू वायदा बाजार एमसीएक्स से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक कीमती धातुओं में तेज खरीदारी देखने को मिली है। महज दो दिनों के भीतर सोने की कीमत में 5750 रुपये प्रति 10 ग्राम की बढ़ोतरी दर्ज की गई जबकि चांदी ने 11000 रुपये से अधिक की छलांग लगाकर बाजार में नई हलचल पैदा कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और भू राजनीतिक घटनाक्रमों ने निवेशकों का रुख एक बार फिर सुरक्षित निवेश की ओर मोड़ दिया है।

    एमसीएक्स के ताजा आंकड़ों के अनुसार बुधवार रात सोना लगभग 148650 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ जबकि सोमवार को यह 142900 रुपये के स्तर पर था। यानी केवल 48 घंटे में सोने की कीमत 5750 रुपये बढ़ गई। इसी अवधि में चांदी 216506 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर करीब 227590 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गई। इस तरह चांदी में भी 11084 रुपये की तेज बढ़त दर्ज की गई।

    हालांकि इतनी तेज रिकवरी के बावजूद दोनों कीमती धातुएं अभी भी अपने ऑल टाइम हाई से नीचे कारोबार कर रही हैं। सोना जनवरी में बने अपने रिकॉर्ड स्तर 193096 रुपये प्रति 10 ग्राम से अभी भी लगभग 44446 रुपये सस्ता है। वहीं चांदी भी अपने रिकॉर्ड स्तर 420048 रुपये प्रति किलोग्राम से करीब 192458 रुपये नीचे बनी हुई है। इसका मतलब है कि हालिया तेजी के बावजूद लंबी अवधि के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचने में अभी काफी दूरी बाकी है।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी में मजबूत खरीदारी देखने को मिली। सोना 4300 डॉलर प्रति औंस के स्तर को पार कर गया जो पिछले कई महीनों की सबसे बड़ी तेजी मानी जा रही है। चांदी में भी लगातार मजबूती दर्ज की गई और निवेशकों ने सुरक्षित निवेश के तौर पर इन दोनों धातुओं में दिलचस्पी दिखाई। वैश्विक बाजार में आई इस तेजी का सीधा असर भारतीय बाजार पर भी देखने को मिला।

    विशेषज्ञों के अनुसार इस उछाल की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया से आई सकारात्मक खबरें हैं। ईरान और ओमान के बीच संभावित समझौते तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा सुचारु रूप से खोलने की उम्मीद ने वैश्विक बाजार की धारणा बदल दी है। इससे कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम हुआ और महंगाई को लेकर निवेशकों की चिंता भी कुछ हद तक घटी। इसी कारण वित्तीय बाजारों में स्थिरता लौटने लगी और सोने जैसी सुरक्षित संपत्तियों में निवेश बढ़ गया।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान के साथ बातचीत को लेकर दिए गए सकारात्मक बयान ने भी बाजार को मजबूती दी है। निवेशकों को उम्मीद है कि तनाव कम होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी। इसके साथ ही अमेरिकी केंद्रीय बैंक की ब्याज दरों को लेकर भी बाजार की उम्मीदें बदली हैं। अब माना जा रहा है कि इस वर्ष ब्याज दरों में अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी होगी। कम ब्याज दरों का माहौल आमतौर पर सोने और चांदी जैसी कीमती धातुओं के लिए सकारात्मक माना जाता है क्योंकि इन पर ब्याज नहीं मिलता और निवेशक इन्हें सुरक्षित विकल्प के रूप में चुनते हैं।

    बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में सोने और चांदी की चाल पूरी तरह वैश्विक घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी मौद्रिक नीति पर निर्भर करेगी। यदि भू राजनीतिक तनाव कम होता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनी रहती है तो कीमतों में उतार चढ़ाव जारी रह सकता है। ऐसे में निवेशकों को जल्दबाजी के बजाय बाजार की दिशा पर नजर रखते हुए सोच समझकर निवेश करना चाहिए।

  • UPI, डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड, जानिए कौन-सा पेमेंट विकल्प सबसे सस्ता, सुरक्षित और सबसे ज्यादा फायदेमंद

    UPI, डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड, जानिए कौन-सा पेमेंट विकल्प सबसे सस्ता, सुरक्षित और सबसे ज्यादा फायदेमंद

    नई दिल्ली । भारत में डिजिटल भुगतान तेजी से आम लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। बाजार, ऑनलाइन शॉपिंग, बिल भुगतान या यात्रा टिकट बुकिंग जैसे अधिकांश काम अब UPI, डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड के माध्यम से आसानी से किए जा रहे हैं। ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर भुगतान का सबसे सस्ता और फायदेमंद तरीका कौन-सा है। इसका जवाब उपयोग के उद्देश्य, खर्च की आदत और मिलने वाले लाभों पर निर्भर करता है।

    सामान्य तौर पर बैंक खाते से किए जाने वाले UPI भुगतान पर ग्राहकों से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाता। अधिकांश लेनदेन बिना किसी अतिरिक्त लागत के पूरे हो जाते हैं और भुगतान की पूरी राशि सीधे सामने वाले के खाते में पहुंचती है। यही कारण है कि रोजमर्रा की खरीदारी, छोटे भुगतान और तत्काल लेनदेन के लिए UPI को सबसे सुविधाजनक और किफायती विकल्प माना जाता है। इसकी तेज प्रक्रिया और व्यापक स्वीकार्यता ने इसे देश का सबसे लोकप्रिय डिजिटल भुगतान माध्यम बना दिया है।

    वहीं डेबिट और क्रेडिट कार्ड के माध्यम से किए जाने वाले भुगतान में कुछ परिस्थितियों में अतिरिक्त शुल्क जुड़ सकता है। कई मामलों में बैंक और पेमेंट नेटवर्क व्यापारियों से मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR वसूलते हैं। हालांकि यह शुल्क आमतौर पर ग्राहक से सीधे नहीं लिया जाता, लेकिन कुछ व्यापारी या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म सुविधा शुल्क के रूप में इसकी भरपाई ग्राहकों से कर सकते हैं। विशेष रूप से ऑनलाइन टिकट बुकिंग या कुछ सेवाओं में अतिरिक्त शुल्क देखने को मिल सकता है।

    क्रेडिट कार्ड का सबसे बड़ा लाभ इसके साथ मिलने वाले रिवॉर्ड पॉइंट्स, कैशबैक, विशेष छूट और अन्य प्रीमियम सुविधाएं हैं। कई कार्डधारकों को एयरपोर्ट लाउंज एक्सेस, यात्रा बीमा, शॉपिंग ऑफर और ब्याज-मुक्त क्रेडिट अवधि जैसी सुविधाएं भी मिलती हैं। यदि उपभोक्ता समय पर पूरा बिल चुका देता है तो इन सुविधाओं का लाभ बिना अतिरिक्त ब्याज के उठाया जा सकता है। लेकिन निर्धारित समय तक भुगतान नहीं करने पर ब्याज और लेट फीस का बोझ काफी बढ़ सकता है।

    डेबिट कार्ड उन लोगों के लिए बेहतर माना जाता है जो सीधे अपने बैंक खाते से भुगतान करना चाहते हैं और कर्ज से बचना चाहते हैं। इसमें खर्च उसी राशि तक सीमित रहता है जो खाते में उपलब्ध होती है। दूसरी ओर क्रेडिट कार्ड जिम्मेदारी के साथ उपयोग करने पर अधिक लाभ दे सकता है, लेकिन लापरवाही की स्थिति में यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी बन सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे और नियमित भुगतान के लिए UPI सबसे सस्ता और आसान विकल्प है, जबकि बड़े खर्च, ऑनलाइन खरीदारी और रिवॉर्ड्स का लाभ लेने के इच्छुक उपभोक्ताओं के लिए क्रेडिट कार्ड अधिक उपयोगी हो सकता है। वहीं डेबिट कार्ड उन लोगों के लिए संतुलित विकल्प है जो सीधे बैंक खाते से सुरक्षित भुगतान करना पसंद करते हैं। इसलिए किसी एक माध्यम को सभी परिस्थितियों में सर्वोत्तम नहीं कहा जा सकता, बल्कि आवश्यकता और भुगतान की प्रकृति के अनुसार सही विकल्प चुनना अधिक लाभदायक होता है।

  • सेंसेक्स निफ्टी में गुरुवार को रहेगा उतार चढ़ाव या मिलेगी तेजी निवेश से पहले जान लें अहम संकेत

    सेंसेक्स निफ्टी में गुरुवार को रहेगा उतार चढ़ाव या मिलेगी तेजी निवेश से पहले जान लें अहम संकेत


    नई दिल्ली। गुरुवार के कारोबारी सत्र में भारतीय शेयर बाजार की नजर घरेलू और वैश्विक दोनों तरह के संकेतों पर रहेगी। पिछले कुछ दिनों से बाजार में लगातार उतार चढ़ाव देखने को मिल रहा है और निवेशक हर नए आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। ऐसे में गुरुवार का दिन भी निवेशकों के लिए काफी अहम माना जा रहा है क्योंकि कई ऐसे फैक्टर हैं जो बाजार की दिशा तय कर सकते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक बाजारों का रुख भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत पर असर डाल सकता है। अगर अमेरिका और एशियाई बाजारों से सकारात्मक संकेत मिलते हैं तो सेंसेक्स और निफ्टी मजबूत शुरुआत कर सकते हैं। वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव और डॉलर इंडेक्स की चाल भी निवेशकों की रणनीति को प्रभावित कर सकती है। विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीदारी या बिकवाली भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

    गुरुवार के कारोबार में बैंकिंग आईटी ऑटो फार्मा और एफएमसीजी सेक्टर के शेयरों पर खास नजर रहेगी। अगर इन प्रमुख सेक्टर्स में खरीदारी का माहौल बना रहता है तो बाजार को मजबूती मिल सकती है। दूसरी ओर मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी अच्छी गतिविधि देखने को मिल सकती है क्योंकि हाल के दिनों में इन शेयरों में निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है।

    विश्लेषकों का कहना है कि निवेशकों को किसी भी अफवाह या छोटी अवधि की तेजी को देखकर जल्दबाजी में निवेश नहीं करना चाहिए। बाजार में उतार चढ़ाव सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है और लंबी अवधि के निवेशकों को मजबूत कंपनियों पर ही भरोसा बनाए रखना चाहिए। अच्छे वित्तीय प्रदर्शन मजबूत प्रबंधन और भविष्य की विकास संभावनाओं वाली कंपनियां लंबे समय में बेहतर रिटर्न देने की क्षमता रखती हैं।

    गुरुवार को कई कंपनियों के तिमाही नतीजे भी निवेशकों के लिए अहम रहेंगे। उम्मीद से बेहतर या कमजोर परिणाम संबंधित शेयरों के साथ पूरे सेक्टर की चाल को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा देश और विदेश से आने वाले आर्थिक आंकड़ों पर भी बाजार की नजर रहेगी। महंगाई ब्याज दर और औद्योगिक उत्पादन से जुड़े संकेत भविष्य की निवेश रणनीति तय करने में मदद करेंगे।

    विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि नए निवेशक बिना पूरी जानकारी के किसी भी शेयर में पैसा लगाने से बचें। निवेश से पहले कंपनी की वित्तीय स्थिति कारोबार का भविष्य और जोखिम का सही आकलन करना जरूरी है। अगर किसी शेयर में बहुत तेजी आ चुकी है तो उसमें प्रवेश करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए। वहीं गिरावट के दौरान मजबूत कंपनियों में चरणबद्ध तरीके से निवेश करना बेहतर रणनीति हो सकती है।

    कुल मिलाकर गुरुवार का कारोबारी सत्र कई महत्वपूर्ण संकेतों के बीच शुरू होगा। बाजार में तेजी और गिरावट दोनों की संभावना बनी रहेगी इसलिए निवेशकों को धैर्य के साथ सोच समझकर निर्णय लेना चाहिए। सही रिसर्च और संतुलित निवेश रणनीति ही लंबे समय में बेहतर लाभ दिलाने का सबसे सुरक्षित तरीका मानी जाती है।

  • EPFO का ई-ऑफिस सिस्टम होगा अपग्रेड, शाम 6 से 9:30 बजे तक कई डिजिटल सेवाएं रहेंगी प्रभावित

    EPFO का ई-ऑफिस सिस्टम होगा अपग्रेड, शाम 6 से 9:30 बजे तक कई डिजिटल सेवाएं रहेंगी प्रभावित

    नई दिल्ली । कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) ने अपने सभी सदस्यों, नियोक्ताओं और संबंधित अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण सूचना जारी की है। संगठन का ई-ऑफिस सिस्टम 5 अगस्त की शाम 6:00 बजे से रात 9:30 बजे तक निर्धारित तकनीकी अपग्रेडेशन के कारण अस्थायी रूप से उपलब्ध नहीं रहेगा। इस दौरान ई-ऑफिस से जुड़ी कई आंतरिक डिजिटल सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए उपयोगकर्ताओं को सलाह दी गई है कि जिन कार्यों की समय-सीमा निकट है, उन्हें निर्धारित समय से पहले पूरा कर लें।

    यह तकनीकी कार्य राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा किया जाएगा। अपग्रेडेशन के तहत ई-ऑफिस पोर्टल के मौजूदा संस्करण को नए और अधिक उन्नत संस्करण में बदला जाएगा। इसके साथ ही ई-फाइल सिस्टम का नया संस्करण भी लागू किया जाएगा, जिससे डिजिटल फाइल प्रबंधन और सिस्टम की कार्यक्षमता में सुधार होने की उम्मीद है। पूरे अपग्रेडेशन की अवधि लगभग साढ़े तीन घंटे निर्धारित की गई है।

    रखरखाव के दौरान ई-ऑफिस प्लेटफॉर्म पर आंतरिक फाइल प्रोसेसिंग, डिजिटल दस्तावेजों की आवाजाही और कार्यालयी कार्य अस्थायी रूप से रुक सकते हैं। इसका असर कुछ ऑनलाइन सेवाओं और भविष्य निधि से जुड़े कार्यों पर भी पड़ सकता है। विशेष रूप से पीएफ क्लेम की प्रोसेसिंग में मामूली देरी संभव है। इसके अलावा उमंग (UMANG) ऐप के माध्यम से उपलब्ध कुछ संबंधित सेवाओं के संचालन पर भी अस्थायी प्रभाव पड़ सकता है।

    ईपीएफओ ने उपयोगकर्ताओं से अनुरोध किया है कि वे इस निर्धारित समय से पहले अपने आवश्यक ऑनलाइन कार्य, दस्तावेजों की प्रक्रिया और अन्य समयबद्ध गतिविधियां पूरी कर लें। इससे अपग्रेडेशन के दौरान किसी प्रकार की असुविधा से बचा जा सकेगा। संगठन ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह अस्थायी व्यवधान केवल सिस्टम को अधिक सक्षम और सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से किया जा रहा है।

    तकनीकी उन्नयन के बाद ई-ऑफिस प्लेटफॉर्म की कार्यक्षमता पहले की तुलना में बेहतर होने की उम्मीद है। नए संस्करण के लागू होने से सिस्टम की गति बढ़ेगी, फाइलों की प्रोसेसिंग अधिक तेज होगी और डिजिटल सेवाओं की दक्षता में सुधार आएगा। साथ ही डेटा सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा स्तर भी जोड़े जाएंगे, जिससे उपयोगकर्ताओं की वित्तीय और व्यक्तिगत जानकारी की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि समय-समय पर होने वाले ऐसे तकनीकी अपग्रेडेशन से डिजिटल सेवाओं की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बढ़ती है। इससे भविष्य में सिस्टम के धीमा होने, अचानक बंद होने या तकनीकी बाधाओं की संभावना कम होती है। ईपीएफओ ने भरोसा दिलाया है कि निर्धारित रखरखाव कार्य पूरा होने के बाद सभी सेवाएं सामान्य रूप से पुनः शुरू कर दी जाएंगी और उपयोगकर्ताओं को पहले से अधिक बेहतर डिजिटल अनुभव मिलेगा।

  • SC का प्रस्ताव- वाहन का बीमा नहीं तो तेल नहीं…, पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू करने की तैयारी

    SC का प्रस्ताव- वाहन का बीमा नहीं तो तेल नहीं…, पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू करने की तैयारी


    नई दिल्ली
    । देश में बिना बीमा (Uninsured) के सड़कों पर फर्राटे भर रहे वाहनों (Vehicles) पर लगाम लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने प्रस्ताव दिया है. इसमें ‘वाहन का बीमा नहीं तो तेल नहीं’ अभियान (‘No vehicle insurance, no fuel’ campaign ) को पायलट प्रोजेक्ट (Pilot project) के रूप में लागू करने का प्रपोजल दिया गया है।

    सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण यानी IRDAI और सड़क परिवहन मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वे एक ऐसा पायलट प्रोजेक्ट तैयार करें जिसके तहत पेट्रोल पंपों पर ईंधन देने से पहले वाहन के वैध इंश्योरेंस की जांच की जा सके और बीमा न होने पर तेल देने से मना किया जा सके।

    सुप्रीम कोर्ट ने सड़क सुरक्षा और बीमा नियमों को सख्त करने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है. कोर्ट ने सड़क परिवहन मंत्रालय और IRDAI को पेट्रोल पंपों पर ईंधन, ANPR कैमरे, और नई गाड़ियों के बीमा को लेकर बड़े आदेश दिए हैं.कोर्ट ने सड़क परिवहन मंत्रालय और IRDAI को एक ऐसा पायलट प्रोजेक्ट तैयार करने को कहा है, जिसके तहत पेट्रोल पंपों पर वैध वाहन बीमा न होने पर गाड़ियों को ईंधन यानी पेट्रोल डीजल देने पर रोक लगाई जा सके।

    हाईवे और सड़कों पर लगे ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) कैमरों को ‘वाहन VAHAN’ पोर्टल और बीमा डेटाबेस से जोड़ा जाएगा. इससे बिना बीमा वाली गाड़ियों के अपने आप ई-चालान कट सकेंगे.नई गाड़ियों के लिए बीमा अवधि बढ़ाते हुए कोर्ट ने नई प्राइवेट कारों के लिए अनिवार्य थर्ड-पार्टी बीमा अवधि 3 साल से बढ़ाकर 4 साल कर दी।

    जबकि नए दोपहिया वाहनों के लिए इसे 5 साल से बढ़ाकर 6 साल कर दिया गया है.पुलिस के लिए मोबाइल ऐप भी होगा. सड़क पर चेकिंग के लिए ट्रैफिक पुलिस को ऐसे मोबाइल ऐप या हैंडहेल्ड डिवाइस दिए जाएंगे, जिससे वे पलभर में गाड़ी के बीमा की जांच कर सकें।

  • बुधवार का शेयर बाजार आउटलुक ग्लोबल संकेतों और कंपनियों के नतीजों से तय होगी बाजार की दिशा

    बुधवार का शेयर बाजार आउटलुक ग्लोबल संकेतों और कंपनियों के नतीजों से तय होगी बाजार की दिशा


    नई दिल्ली । बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि बुधवार का सत्र कई अहम घरेलू और वैश्विक संकेतों के आधार पर तय होगा। पिछले कुछ दिनों से भारतीय शेयर बाजार में उतार चढ़ाव का माहौल बना हुआ है और ऐसे में निवेशक हर नई खबर पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। सेंसेक्स और निफ्टी की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि विदेशी बाजारों का रुख कैसा रहता है और घरेलू स्तर पर आर्थिक गतिविधियों से जुड़े संकेत क्या मिलते हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार बुधवार को सबसे ज्यादा नजर विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई की खरीद और बिकवाली पर रहेगी। यदि विदेशी निवेशकों की ओर से बाजार में खरीदारी जारी रहती है तो बाजार को मजबूती मिल सकती है। वहीं अगर बिकवाली का दबाव बढ़ता है तो बाजार में गिरावट देखने को मिल सकती है। घरेलू संस्थागत निवेशकों की सक्रियता भी बाजार की चाल तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

    अंतरराष्ट्रीय बाजारों का प्रदर्शन भी भारतीय शेयर बाजार पर असर डालेगा। अमेरिका और एशियाई बाजारों की चाल निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव और डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति भी बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारकों में शामिल रहेगी। यदि कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आती है तो इसका असर कई सेक्टरों पर पड़ सकता है जबकि रुपये में मजबूती निवेशकों का भरोसा बढ़ा सकती है।

    कॉरपोरेट कंपनियों के तिमाही नतीजे भी बुधवार के कारोबार में अहम भूमिका निभाएंगे। जिन कंपनियों के वित्तीय परिणाम उम्मीद से बेहतर आएंगे उनके शेयरों में अच्छी खरीदारी देखने को मिल सकती है। वहीं कमजोर नतीजों वाली कंपनियों के शेयर दबाव में आ सकते हैं। बैंकिंग आईटी ऑटो फार्मा और एफएमसीजी सेक्टर पर निवेशकों की विशेष नजर बनी रहेगी क्योंकि इन क्षेत्रों की बड़ी कंपनियों के प्रदर्शन का सीधा असर प्रमुख सूचकांकों पर पड़ता है।

    बाजार विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल निवेशकों को जल्दबाजी में बड़े निवेश से बचना चाहिए और गुणवत्ता वाले शेयरों पर ही फोकस करना चाहिए। लंबी अवधि के निवेशकों के लिए बाजार में आने वाले उतार चढ़ाव अवसर भी बन सकते हैं लेकिन अल्पकालिक निवेश करने वालों को जोखिम प्रबंधन के साथ आगे बढ़ना चाहिए। किसी भी खबर के आधार पर भावनात्मक निर्णय लेने के बजाय निवेश से पहले पूरी जानकारी और विश्लेषण करना बेहतर रहेगा।

    बुधवार के कारोबार में बाजार की शुरुआत हल्की तेजी या कमजोरी के साथ हो सकती है लेकिन दिनभर विभिन्न आर्थिक और वैश्विक संकेतों के आधार पर उतार चढ़ाव बना रह सकता है। ऐसे में निवेशकों के लिए जरूरी होगा कि वे बाजार की हर गतिविधि पर नजर रखें और सोच समझकर निवेश संबंधी निर्णय लें। विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत आर्थिक आधार और लंबी अवधि की विकास संभावनाओं के चलते भारतीय शेयर बाजार भविष्य में सकारात्मक प्रदर्शन कर सकता है लेकिन फिलहाल सतर्कता के साथ निवेश करना ही सबसे बेहतर रणनीति मानी जा रही है।

  • UPI पेमेंट सिस्टम में हो सकता है बड़ा बदलाव, सरकार डिजिटल भुगतान व्यवस्था को टिकाऊ बनाने की तैयारी में

    UPI पेमेंट सिस्टम में हो सकता है बड़ा बदलाव, सरकार डिजिटल भुगतान व्यवस्था को टिकाऊ बनाने की तैयारी में

    नई दिल्ली । देश में डिजिटल भुगतान का सबसे बड़ा माध्यम बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को लेकर बड़े बदलाव की चर्चा तेज हो गई है। सरकार डिजिटल भुगतान प्रणाली को अधिक टिकाऊ और मजबूत बनाने के लिए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) से जुड़े नियमों में बदलाव की संभावनाओं पर विचार कर रही है। हालांकि अभी इस संबंध में कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है और मौजूदा व्यवस्था पहले की तरह जारी है।

    चर्चा के अनुसार बड़े कारोबारियों द्वारा किए जाने वाले उच्च मूल्य के UPI लेनदेन पर सीमित MDR लागू किया जा सकता है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य छोटे व्यापारियों और आम उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना डिजिटल भुगतान प्रणाली के संचालन, तकनीकी विकास और सुरक्षा से जुड़ी लागत के लिए स्थायी व्यवस्था तैयार करना है।

    वर्तमान में बैंक-टू-बैंक UPI भुगतान पर किसी प्रकार का MDR लागू नहीं है। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में देशभर में UPI का उपयोग तेजी से बढ़ा है। लाखों व्यापारी और करोड़ों उपभोक्ता रोजाना बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के डिजिटल भुगतान का उपयोग कर रहे हैं। इस व्यवस्था ने नकदरहित लेनदेन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    डिजिटल भुगतान से जुड़े संस्थानों का मानना है कि भुगतान नेटवर्क का विस्तार, साइबर सुरक्षा, सर्वर क्षमता और नई तकनीकों के विकास पर लगातार निवेश करना पड़ता है। ऐसे में लंबे समय तक इस व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए एक संतुलित राजस्व मॉडल की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसी कारण MDR व्यवस्था में सीमित बदलाव की संभावना पर विचार किया जा रहा है।

    यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो यह मुख्य रूप से बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों और अधिक मूल्य वाले लेनदेन तक सीमित रह सकता है। आम उपभोक्ताओं से सीधे अतिरिक्त शुल्क वसूले जाने का कोई अंतिम निर्णय फिलहाल नहीं हुआ है। सरकार का उद्देश्य डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना और साथ ही भुगतान प्रणाली को आर्थिक रूप से मजबूत बनाए रखना बताया जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि MDR केवल बड़े व्यापारियों तक सीमित रहता है तो सामान्य ग्राहकों पर इसका सीधा असर नहीं पड़ेगा। हालांकि कुछ मामलों में व्यापारियों की लागत बढ़ने पर उसका प्रभाव वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर दिखाई दे सकता है। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले सभी पक्षों के हितों को ध्यान में रखा जाएगा।

    डिजिटल भुगतान ने देश में वित्तीय लेनदेन की तस्वीर बदल दी है। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों तक UPI का व्यापक उपयोग हो रहा है। इसी वजह से सरकार और संबंधित संस्थाएं ऐसी व्यवस्था विकसित करना चाहती हैं, जिससे डिजिटल भुगतान की गति भी बनी रहे और इसका संचालन भी लंबे समय तक प्रभावी ढंग से किया जा सके।

    फिलहाल UPI उपयोगकर्ताओं के लिए कोई नया शुल्क लागू नहीं हुआ है और न ही नए नियम प्रभावी हुए हैं। यदि भविष्य में इस संबंध में कोई निर्णय लिया जाता है तो उसके बाद ही नई व्यवस्था लागू होगी। तब तक आम लोग पहले की तरह बिना किसी बदलाव के UPI के माध्यम से भुगतान कर सकेंगे।

  • सेबी के नए सीएएस सिस्टम से बढ़ी उलझन, बीएसई और एनएसई पर एक ही शेयर के क्लोजिंग भाव में बड़ा अंतर

    सेबी के नए सीएएस सिस्टम से बढ़ी उलझन, बीएसई और एनएसई पर एक ही शेयर के क्लोजिंग भाव में बड़ा अंतर

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार में बाजार बंद होने के बाद शेयरों के अंतिम भाव को लेकर नई स्थिति सामने आई है। बाजार नियामक द्वारा लागू किए गए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (सीएएस) सिस्टम के बाद बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज पर कई प्रमुख कंपनियों के शेयर अलग-अलग क्लोजिंग प्राइस पर बंद हुए। इससे निवेशकों, ट्रेडर्स और बाजार पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के बीच चर्चा तेज हो गई है कि एक ही समय पर कारोबार समाप्त होने के बावजूद दोनों एक्सचेंजों पर अंतिम भाव में इतना अंतर क्यों दिखाई दे रहा है।

    मंगलवार के कारोबारी सत्र में कई बड़ी कंपनियों के शेयरों में यह अंतर स्पष्ट रूप से देखने को मिला। ट्रेंट का शेयर बीएसई पर बढ़त के साथ 3,070 रुपये पर बंद हुआ, जबकि एनएसई पर इसका क्लोजिंग भाव 3,107.70 रुपये दर्ज किया गया। इसी तरह भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) के शेयर में भी दोनों एक्सचेंजों पर अलग-अलग प्रदर्शन देखने को मिला। बीएसई पर यह बढ़त के साथ बंद हुआ, जबकि एनएसई पर हल्की गिरावट दर्ज की गई।

    बजाज फाइनेंस के शेयरों में भी दोनों एक्सचेंजों के क्लोजिंग प्राइस में उल्लेखनीय अंतर दिखाई दिया। बीएसई पर शेयर बढ़त के साथ बंद हुआ, जबकि एनएसई पर इसमें गिरावट दर्ज की गई। महिंद्रा एंड महिंद्रा, बजाज फिनसर्व, टाइटन, टीसीएस, अल्ट्राटेक सीमेंट सहित कई अन्य प्रमुख कंपनियों के शेयरों में भी इसी तरह का अंतर देखने को मिला। इससे यह स्पष्ट हुआ कि नया सिस्टम लागू होने के बाद दोनों एक्सचेंजों की क्लोजिंग प्रक्रिया अलग-अलग परिणाम दे रही है।

    कारोबार की शुरुआत से ही दोनों प्रमुख सूचकांकों की चाल में भी अंतर दिखाई दिया। शुरुआती कारोबार में जहां सेंसेक्स बढ़त के साथ खुला, वहीं निफ्टी कमजोरी के साथ कारोबार करता नजर आया। दिनभर के उतार-चढ़ाव के बाद बाजार बंद होने पर भी दोनों सूचकांकों के प्रदर्शन में अंतर बना रहा। सेंसेक्स गिरावट के साथ बंद हुआ, जबकि निफ्टी में अपेक्षाकृत अधिक कमजोरी दर्ज की गई। दोनों सूचकांकों की क्लोजिंग के बीच प्रतिशत के आधार पर भी अंतर देखा गया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सीएएस प्रणाली का उद्देश्य बाजार बंद होने के समय अंतिम कीमतों की खोज को अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाना है। हालांकि शुरुआती चरण में दोनों एक्सचेंजों पर उपलब्ध ऑर्डर, मांग और आपूर्ति के अलग-अलग स्वरूप के कारण अंतिम क्लोजिंग प्राइस में अंतर देखने को मिल सकता है। ऐसे में निवेशकों को यह समझना होगा कि दोनों एक्सचेंज स्वतंत्र रूप से अपने-अपने क्लोजिंग ऑक्शन के आधार पर अंतिम मूल्य निर्धारित करते हैं।

    बाजार विश्लेषकों का कहना है कि नए सिस्टम को पूरी तरह स्थिर होने में कुछ समय लग सकता है। शुरुआती दिनों में निवेशकों के लिए यह बदलाव नया अनुभव है, इसलिए भ्रम की स्थिति स्वाभाविक मानी जा रही है। यदि भविष्य में भी यह अंतर लगातार बना रहता है तो बाजार सहभागियों को अपनी निवेश और ट्रेडिंग रणनीतियों में आवश्यक बदलाव करने पड़ सकते हैं।

    फिलहाल निवेशकों को सलाह दी जा रही है कि वे किसी भी निवेश निर्णय से पहले संबंधित एक्सचेंज पर दर्ज आधिकारिक क्लोजिंग प्राइस और बाजार के समग्र रुझान का सावधानीपूर्वक अध्ययन करें। नए सिस्टम के प्रभाव का वास्तविक आकलन आने वाले कारोबारी सत्रों में अधिक स्पष्ट रूप से सामने आने की संभावना है।

  • सरकार ने LIC में 6.5 फीसदी हिस्सेदारी बिक्री शुरू की, शेयर 8 प्रतिशत तक टूटने से बाजार में हलचल

    सरकार ने LIC में 6.5 फीसदी हिस्सेदारी बिक्री शुरू की, शेयर 8 प्रतिशत तक टूटने से बाजार में हलचल

    नई दिल्ली । देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के शेयर मंगलवार को तेज दबाव में दिखाई दिए। केंद्र सरकार द्वारा ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) के माध्यम से अपनी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया शुरू किए जाने के बाद कंपनी के शेयर में कारोबार के दौरान लगभग 8 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि बाद में शेयर में कुछ सुधार देखने को मिला, लेकिन दिनभर निवेशकों के बीच इस फैसले को लेकर चर्चा बनी रही।

    सरकार ने एलआईसी में अपनी 2.5 प्रतिशत मूल हिस्सेदारी बिक्री के साथ 4 प्रतिशत तक का ग्रीनशू विकल्प भी रखा है। इस तरह कुल 6.5 प्रतिशत हिस्सेदारी बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध कराई गई है। इस हिस्सेदारी बिक्री से केंद्र सरकार को 31 हजार करोड़ रुपये से अधिक जुटाने की उम्मीद है। यह सार्वजनिक क्षेत्र की किसी प्रमुख वित्तीय संस्था में सरकार की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी बिक्री में शामिल माना जा रहा है।

    ऑफर फॉर सेल के लिए प्रति शेयर 382 रुपये का फ्लोर प्राइस तय किया गया है, जो बाजार मूल्य से लगभग 10 प्रतिशत कम है। इसी वजह से बाजार खुलते ही एलआईसी के शेयर पर दबाव बढ़ गया और निवेशकों ने बिकवाली शुरू कर दी। कारोबार के दौरान शेयर लगभग 390.70 रुपये तक फिसल गया। बाद में कुछ खरीदारी लौटने से गिरावट सीमित हुई, लेकिन शेयर दिनभर दबाव में ही कारोबार करता रहा।

    शेयर में आई गिरावट का असर कंपनी के कुल बाजार पूंजीकरण पर भी दिखाई दिया। एलआईसी का मार्केट कैप घटकर लगभग 5.03 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि ओएफएस के दौरान फ्लोर प्राइस कम तय होने के कारण अल्पकालिक दबाव बनना सामान्य स्थिति है। हालांकि दीर्घकाल में कंपनी के प्रदर्शन और निवेशकों की भागीदारी पर बाजार की नजर बनी रहेगी।

    सरकार की ओर से यह ऑफर दो दिनों के लिए खोला गया है। पहले दिन गैर-खुदरा यानी संस्थागत निवेशकों को आवेदन का अवसर दिया गया है, जबकि दूसरे दिन खुदरा निवेशक भी इसमें भाग ले सकेंगे। इस प्रक्रिया के माध्यम से सरकार अपनी हिस्सेदारी घटाने के साथ-साथ सार्वजनिक शेयरधारिता बढ़ाने के लक्ष्य को भी पूरा करना चाहती है।

    वर्तमान में एलआईसी में केंद्र सरकार की लगभग 96.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है। नियामकीय प्रावधानों के अनुसार सूचीबद्ध कंपनियों में न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता बनाए रखना आवश्यक होता है। ऐसे में इस हिस्सेदारी बिक्री को उसी दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सरकार का उद्देश्य बाजार में अधिक सार्वजनिक भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ पूंजी जुटाना भी है।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में निवेशकों की प्रतिक्रिया, ओएफएस को मिलने वाला प्रतिसाद और एलआईसी के शेयर का प्रदर्शन इस प्रक्रिया की सफलता तय करेगा। फिलहाल निवेशकों की नजर इस हिस्सेदारी बिक्री और इसके बाजार पर पड़ने वाले प्रभाव पर बनी हुई है।

  • रिकॉर्ड स्तर से नरम पड़े सोने के दाम, छोटे निवेशकों में नियमित डिजिटल गोल्ड खरीदारी का बढ़ा रुझान

    रिकॉर्ड स्तर से नरम पड़े सोने के दाम, छोटे निवेशकों में नियमित डिजिटल गोल्ड खरीदारी का बढ़ा रुझान

    नई दिल्ली । सोने की कीमतें अपने सर्वकालिक उच्च स्तर से नीचे आने के बावजूद लगातार उतार-चढ़ाव का सामना कर रही हैं। इसी कारण बड़ी राशि एकमुश्त निवेश करने के बजाय अब बड़ी संख्या में खुदरा निवेशक छोटी-छोटी रकम के नियमित निवेश की रणनीति अपना रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से सोने में निवेश का चलन तेजी से बढ़ रहा है और इसे बदलते बाजार माहौल में अपेक्षाकृत संतुलित विकल्प माना जा रहा है।

    घरेलू बाजार में 24 कैरेट सोने का भाव मंगलवार को करीब 1.43 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास बना हुआ है। यह कीमत इस वर्ष जनवरी के अंत में दर्ज हुए लगभग 1.78 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड स्तर से काफी नीचे है। उस समय वैश्विक अनिश्चितताओं और सुरक्षित निवेश की बढ़ी मांग के कारण सोने ने ऐतिहासिक ऊंचाई हासिल की थी। इसके बाद बाजार में कई बार तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सोने की कीमतों पर अमेरिकी ब्याज दरों की संभावित दिशा, डॉलर की मजबूती और अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक परिस्थितियों का सीधा प्रभाव पड़ता है। हाल ही में अमेरिकी केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किए जाने के बाद भी निवेशकों की नजर आगामी मौद्रिक नीति पर बनी हुई है। इसी वजह से सोने के बाजार में अनिश्चितता का माहौल कायम है।

    बाजार विश्लेषकों ने भले ही निकट अवधि के लिए अपने अनुमान में कुछ संशोधन किया हो, लेकिन मध्यम अवधि में सोने को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण अभी भी बरकरार है। इसका प्रमुख कारण विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा लगातार सोने की खरीद और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच सुरक्षित निवेश की मांग को माना जा रहा है। हालांकि मजबूत डॉलर और बढ़ती बॉन्ड यील्ड समय-समय पर कीमतों पर दबाव भी बना सकती हैं।

    ऐसे वातावरण में निवेशकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सही समय पर खरीदारी की रहती है। यदि कोई निवेशक एक साथ बड़ी राशि लगाता है तो ऊंचे भाव पर खरीदारी का जोखिम रहता है, जबकि अधिक इंतजार करने पर कीमतें फिर बढ़ सकती हैं। इस स्थिति में नियमित अंतराल पर छोटी राशि का निवेश अलग-अलग कीमतों पर खरीदारी का अवसर देता है और औसत लागत को संतुलित करने में मदद करता है।

    डिजिटल गोल्ड प्लेटफॉर्म इसी रणनीति को आसान बना रहे हैं। निवेशक बेहद कम राशि से भी 24 कैरेट डिजिटल गोल्ड खरीद सकते हैं और नियमित निवेश के लिए स्वचालित योजना का लाभ उठा सकते हैं। इससे छोटे निवेशकों को अपनी आय और बचत के अनुसार धीरे-धीरे सोने में निवेश बढ़ाने की सुविधा मिल रही है।

    डिजिटल गोल्ड में खरीदे गए सोने के बराबर भौतिक सोना सुरक्षित वॉल्ट में संरक्षित रखा जाता है। निवेशक जरूरत पड़ने पर अपनी होल्डिंग बाजार भाव पर बेच सकते हैं या निर्धारित शर्तों के अनुसार उसे प्रमाणित भौतिक सोने में बदलकर घर भी मंगवा सकते हैं। इस सुविधा ने डिजिटल माध्यम से सोने में निवेश को पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक बना दिया है।

    हालांकि विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि सोने को पूरे निवेश का आधार नहीं बल्कि विविधीकृत निवेश पोर्टफोलियो का हिस्सा माना जाना चाहिए। बाजार में उतार-चढ़ाव आगे भी जारी रह सकता है, लेकिन नियमित और छोटी राशि के निवेश की रणनीति जोखिम को संतुलित करने का एक व्यावहारिक विकल्प बनकर उभर रही है। इसी कारण बड़ी संख्या में खुदरा निवेशक अब सही समय का इंतजार करने के बजाय अनुशासित और नियमित निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं।