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  • RBI ने Paytm Payments Bank को शेड्यूल्ड बैंकों की सूची से भी हटाया, अप्रैल में लाइसेंस हुआ था रद्द

    RBI ने Paytm Payments Bank को शेड्यूल्ड बैंकों की सूची से भी हटाया, अप्रैल में लाइसेंस हुआ था रद्द


    नई दिल्ली। पेटीएम पेमेंट्स बैंक लिमिटेड (PPBL) के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक और बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ने PPBL को RBI एक्ट, 1934 की दूसरी अनुसूची यानी शेड्यूल्ड बैंकों की सूची से बाहर कर दिया है। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है, जब अप्रैल 2026 में RBI पहले ही बैंक का लाइसेंस रद्द कर चुका है और उसके बाद बैंक को बंद करने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है।

    31 जुलाई को जारी हुई थी अधिसूचना
    RBI ने 7 अक्टूबर को बताया कि पेटीएम पेमेंट्स बैंक को दूसरी अनुसूची से बाहर करने की अधिसूचना 31 जुलाई 2026 को जारी की गई थी। इसे सितंबर में भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया गया। इसका मतलब है कि PPBL अब RBI एक्ट की दूसरी अनुसूची में शामिल शेड्यूल्ड बैंकों की सूची का हिस्सा नहीं है।

    साधारण भाषा में समझें तो RBI एक्ट की दूसरी अनुसूची में शामिल बैंकों को शेड्यूल्ड बैंक कहा जाता है। इन बैंकों पर संबंधित नियामकीय व्यवस्था लागू होती है और उन्हें कानून के तहत कुछ सुविधाएं और अधिकार मिलते हैं। PPBL को इस सूची से बाहर करना उसके खिलाफ चल रही लंबी नियामकीय कार्रवाई का अगला कदम है।

    कार्रवाई की शुरुआत 2022 में हुई थी
    पेटीएम पेमेंट्स बैंक के खिलाफ RBI की सख्ती अचानक शुरू नहीं हुई थी। मार्च 2022 में केंद्रीय बैंक ने PPBL को नए ग्राहक जोड़ने से रोक दिया था। RBI ने उस समय बैंक में गंभीर निगरानी संबंधी चिंताओं का हवाला दिया था। साथ ही बैंक को अपनी IT व्यवस्था की व्यापक जांच के लिए बाहरी IT ऑडिट कंपनी नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद बैंक पर नियामकीय दबाव लगातार बढ़ता गया और 2024 में RBI ने कई कारोबारी गतिविधियों पर रोक लगा दी।

    जनवरी-फरवरी 2024 में और कड़ी हुई पाबंदियां
    31 जनवरी 2024 और 16 फरवरी 2024 को RBI ने PPBL पर अतिरिक्त कारोबारी पाबंदियां लगाईं। बैंक को ग्राहकों के खातों, वॉलेट और अन्य प्रीपेड साधनों में नए जमा, क्रेडिट या टॉप-अप लेने से रोक दिया गया। इन पाबंदियों के कारण PPBL की सामान्य बैंकिंग गतिविधियां काफी सीमित हो गई थीं।

    अप्रैल 2026 में रद्द कर दिया गया बैंकिंग लाइसेंस
    PPBL के खिलाफ कार्रवाई का सबसे बड़ा कदम 24 अप्रैल 2026 को आया, जब RBI ने उसका बैंकिंग लाइसेंस रद्द कर दिया। केंद्रीय बैंक ने कहा था कि बैंक का कामकाज उसके और जमाकर्ताओं के हितों के लिए नुकसानदायक तरीके से चलाया जा रहा था। RBI के अनुसार, बैंक का प्रबंधन भी जमाकर्ताओं और जनहित के लिहाज से उचित नहीं था तथा बैंक अपने पेमेंट्स बैंक लाइसेंस की शर्तों का पालन करने में विफल रहा था।

    RBI ने यह भी कहा था कि बैंक को जारी रखना जनहित में उपयोगी नहीं होगा। लाइसेंस रद्द होने के बाद बैंक को बैंकिंग कारोबार करने से रोक दिया गया और RBI ने उसके समापन की प्रक्रिया के लिए हाई कोर्ट का रुख किया।

    दिल्ली हाई कोर्ट ने भी वाइंडिंग अप का आदेश दिया
    लाइसेंस रद्द होने के बाद पेटीएम पेमेंट्स बैंक को बंद करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी PPBL के वाइंडिंग अप का आदेश दिया। यानी अब बैंक को सामान्य बैंकिंग संस्था के रूप में जारी रखने के बजाय कानूनी प्रक्रिया के तहत बंद किया जाना है।

    ग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा?
    RBI की ताजा कार्रवाई मुख्य रूप से PPBL की शेड्यूल्ड बैंक की स्थिति से जुड़ी है। ग्राहकों के लिहाज से बड़ी बात यह है कि बैंक पर पहले ही नए ग्राहक जोड़ने और नए जमा, क्रेडिट व वॉलेट टॉप-अप जैसी गतिविधियों पर रोक लग चुकी थी। इसके बाद अप्रैल 2026 में बैंकिंग लाइसेंस भी रद्द कर दिया गया।

    वहीं Paytm ऐप की कई सेवाएं पेटीएम पेमेंट्स बैंक से अलग दूसरे बैंकों के जरिए चलती हैं। इसलिए PPBL के खिलाफ हुई इस कार्रवाई को Paytm ऐप की सभी सेवाओं के बंद होने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। Paytm ने भी स्पष्ट किया है कि उसके UPI, QR पेमेंट, Soundbox, कार्ड मशीन और पेमेंट गेटवे जैसी सेवाएं मल्टी-बैंक व्यवस्था के तहत चलती हैं।

    इस तरह PPBL के खिलाफ कार्रवाई का क्रम अब एक और चरण में पहुंच गया है—पहले नए ग्राहक जोड़ने पर रोक, फिर 2024 में जमा और टॉप-अप जैसी गतिविधियों पर पाबंदी, अप्रैल 2026 में बैंकिंग लाइसेंस रद्द और अब शेड्यूल्ड बैंकों की सूची से बाहर किया जाना। इसके साथ बैंक के वाइंडिंग अप की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है।

  • शेयर बाजार में फिर बढ़ा दबाव, सेंसेक्स 429 अंक गिरा; मेटल और रियल्टी शेयरों में सबसे ज्यादा कमजोरी दिखी

    शेयर बाजार में फिर बढ़ा दबाव, सेंसेक्स 429 अंक गिरा; मेटल और रियल्टी शेयरों में सबसे ज्यादा कमजोरी दिखी

    नई दिल्ली:  भारतीय शेयर बाजार बुधवार के कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ। कारोबार के अंत में सेंसेक्स 429.11 अंक यानी 0.59 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 72,638.70 पर रहा। वहीं निफ्टी 173.05 अंक यानी 0.76 प्रतिशत गिरकर 22,603.05 पर बंद हुआ। बाजार में सबसे ज्यादा दबाव मेटल और रियल्टी शेयरों में देखने को मिला।

    सेक्टोरल इंडेक्स की बात करें तो निफ्टी मेटल 2.33 प्रतिशत और निफ्टी रियल्टी 1.77 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुए। इसके अलावा निफ्टी ऑटो में 1.58 प्रतिशत, निफ्टी कमोडिटीज में 1.43 प्रतिशत, निफ्टी इंडिया डिफेंस में 1.41 प्रतिशत, निफ्टी आईटी में 1.34 प्रतिशत और निफ्टी पीएसई में 1.22 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई। इन क्षेत्रों में बिकवाली ने बाजार के प्रमुख सूचकांकों पर दबाव बढ़ाया।

    बुधवार को कुछ सेक्टरों ने बाजार की व्यापक कमजोरी के बीच बेहतर प्रदर्शन किया। निफ्टी पीएसयू बैंक 1 प्रतिशत की तेजी के साथ बंद हुआ। निफ्टी मीडिया में 0.69 प्रतिशत और निफ्टी प्राइवेट बैंक में 0.08 प्रतिशत की बढ़त रही। इस तरह बैंकिंग क्षेत्र के कुछ हिस्सों में मजबूती दिखाई दी, जबकि ज्यादातर प्रमुख सेक्टर लाल निशान में रहे।

    मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में कारोबार एक जैसा नहीं रहा। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 378.60 अंक यानी 0.63 प्रतिशत गिरकर 59,382.60 पर बंद हुआ। इसके विपरीत निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 58.25 अंक यानी 0.30 प्रतिशत की बढ़त के साथ 19,506.95 पर बंद हुआ। इससे बाजार के अलग-अलग हिस्सों में निवेशकों की गतिविधि में अंतर देखने को मिला।

    सेंसेक्स में शामिल शेयरों में कोटक महिंद्रा बैंक, भारती एयरटेल, आईसीआईसीआई बैंक और बजाज फाइनेंस बढ़त के साथ बंद हुए। दूसरी ओर टाइटन, बीईएल, एशियन पेंट्स, इन्फोसिस, एलएंडटी, टाटा स्टील, एमएंडएम, एचसीएल टेक, पावर ग्रिड, एनटीपीसी, इंडिगो, एचयूएल, सन फार्मा, मारुति सुजुकी, अल्ट्राटेक सीमेंट और टेक महिंद्रा में गिरावट रही।

    बाजार में गिरावट को लेकर जानकारों ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से उम्मीद के मुताबिक ब्याज दर बढ़ाए जाने के बाद घरेलू बाजार ने मौद्रिक नीति के रुख में बदलाव पर तेजी से प्रतिक्रिया दी। नीति रुख के न्यूट्रल से कैलिब्रेटेड टाइटनिंग की ओर जाने को ब्याज दर चक्र में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा गया, जिसका असर निवेशकों की धारणा पर पड़ा।

    इसके अलावा अमेरिकी फेडरल ओपन मार्केट कमेटी की बैठक से पहले अमेरिकी यील्ड में बढ़ोतरी और डॉलर की मजबूती के बीच रुपया भी दबाव में रहा। विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार निकासी ने भी घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ाया। इन वैश्विक और घरेलू कारकों के बीच बुधवार को शेयर बाजार में बिकवाली का रुख हावी रहा।

    ऊंची ब्याज दरों के माहौल में बैंकिंग शेयरों को मार्जिन से संभावित लाभ की उम्मीद का फायदा मिला और इस क्षेत्र के कुछ शेयरों ने बाजार की कमजोरी के विपरीत प्रदर्शन किया। हालांकि, बाजार के अधिकांश हिस्सों में बिकवाली का दबाव बना रहा और इसके चलते सेंसेक्स तथा निफ्टी दोनों गिरावट के साथ बंद हुए।

  • पीयूष गोयल की अमेरिकी कंपनियों से अहम मुलाकातें, भारत में निवेश बढ़ाने को लेकर इन क्षेत्रों पर हुई चर्चा

    पीयूष गोयल की अमेरिकी कंपनियों से अहम मुलाकातें, भारत में निवेश बढ़ाने को लेकर इन क्षेत्रों पर हुई चर्चा

    नई दिल्ली ।केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने न्यूयॉर्क में अमेरिका की कई प्रमुख कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की। इन बैठकों में भारत में निवेश बढ़ाने, कारोबार के विस्तार और दोनों देशों के बीच आर्थिक एवं वाणिज्यिक संबंधों को मजबूत करने के अवसरों पर चर्चा हुई। बातचीत के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों में उपलब्ध संभावनाओं और भारत में कंपनियों की भागीदारी बढ़ाने के तरीकों पर विचार किया गया।

    पीयूष गोयल ने ब्लैकस्टोन के अध्यक्ष एवं मुख्य परिचालन अधिकारी जोनाथन ग्रे और अंतरराष्ट्रीय प्राइवेट इक्विटी कारोबार के चेयरमैन प्रकाश मेलवानी के साथ बैठक की। इसमें भारत में निवेश और साझेदारी को आगे बढ़ाने के साथ विभिन्न प्रमुख क्षेत्रों में निवेश के विस्तार की संभावनाओं पर चर्चा हुई। बैठक में भारत में कारोबार के लिए मौजूद अवसरों पर भी विचार-विमर्श किया गया।

    उन्होंने न्यूबर्गर बरमन के चेयरमैन एवं सीईओ जॉर्ज वॉकर और उनकी नेतृत्व टीम से भी मुलाकात की। इस दौरान वित्तीय सेवाओं और वेल्थ मैनेजमेंट के क्षेत्र में निवेश सहयोग को और मजबूत करने के अवसरों पर बातचीत हुई। भारत में इन क्षेत्रों से जुड़े कारोबारी अवसरों और भविष्य की साझेदारी की संभावनाओं को चर्चा में शामिल किया गया।

    एस्टी लॉडर कंपनीज के अध्यक्ष एवं सीईओ स्टेफान डी फावेरी के साथ हुई बैठक में भारत के तेजी से बढ़ते ब्यूटी और पर्सनल केयर बाजार पर चर्चा की गई। इस दौरान भारत में विनिर्माण गतिविधियों और स्थानीय सोर्सिंग को बढ़ाने की संभावनाओं पर भी विचार हुआ। बैठक में भारतीय बाजार की जरूरतों और कंपनी की संभावित भागीदारी से जुड़े विषयों पर बातचीत की गई।

    आईबीएम के चेयरमैन और सीईओ अरविंद कृष्णा के साथ बैठक में भारत में कंपनी की भागीदारी को और मजबूत करने पर चर्चा हुई। बातचीत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर, क्वांटम कंप्यूटिंग और अन्य उभरती तकनीकों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर विशेष रूप से विचार किया गया। तकनीकी क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने के अवसर भी चर्चा का हिस्सा रहे।

    पीयूष गोयल ने मेटलाइफ के अध्यक्ष एवं सीईओ मिशेल ए. खलाफ से भी मुलाकात की। बैठक में भारत के बीमा और वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों तथा कंपनी के संभावित विस्तार पर चर्चा हुई। इसके अलावा जनरल अटलांटिक के चेयरमैन एवं सीईओ विलियम ई. फोर्ड के साथ निवेश और व्यापारिक सहयोग को मजबूत करने की संभावनाओं पर विचार किया गया।

    एआईए ग्रुप के गैर-कार्यकारी चेयरमैन मार्क टकर के साथ हुई बातचीत में भारत के बीमा और वित्तीय सेवाओं के अवसरों पर चर्चा की गई। इस दौरान वर्ष 2047 तक सभी के लिए बीमा के लक्ष्य को भी रेखांकित किया गया। बैठक में इस क्षेत्र में निवेश और कारोबारी भागीदारी बढ़ाने की संभावनाओं पर विचार हुआ।

    इन बैठकों में वित्तीय सेवाओं, विनिर्माण, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और निवेश से जुड़े अवसरों पर व्यापक चर्चा हुई। भारत में अमेरिकी कंपनियों की कारोबारी भागीदारी बढ़ाने और दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी को मजबूत करने के उपायों पर भी विचार-विमर्श किया गया।

  • आरबीआई ने महंगाई का अनुमान 5.2 प्रतिशत रखा, खाद्य और ईंधन कीमतों के दबाव के बीच रेपो रेट में भी 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी

    आरबीआई ने महंगाई का अनुमान 5.2 प्रतिशत रखा, खाद्य और ईंधन कीमतों के दबाव के बीच रेपो रेट में भी 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति का अनुमान 5.2 प्रतिशत रखा है। केंद्रीय बैंक ने कहा है कि महंगाई का परिदृश्य पिछले वर्ष की तुलना में अब उतना अनुकूल नहीं है। खाद्य और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के साथ आपूर्ति पक्ष से जुड़े जोखिम भी बढ़े हैं। मौद्रिक नीति समिति के फैसलों की घोषणा करते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने महंगाई के ताजा अनुमान और उससे जुड़े जोखिमों की जानकारी दी।

    आरबीआई के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में CPI महंगाई 4.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। तीसरी तिमाही में इसके बढ़कर 6 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। वहीं, वित्त वर्ष 2027-28 की पहली तिमाही के लिए महंगाई का अनुमान 5.6 प्रतिशत रखा गया है। चालू वित्त वर्ष के लिए कोर मुद्रास्फीति का अनुमान 4.4 प्रतिशत है।

    गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि अगस्त में CPI महंगाई बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई, जबकि इससे पहले यह 4.5 प्रतिशत थी। इस बढ़ोतरी में खाद्य और ईंधन कीमतों में तेजी की अहम भूमिका रही। उन्होंने कहा कि कोर मुद्रास्फीति में भी वृद्धि हुई है। इससे संकेत मिलता है कि कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव अब अर्थव्यवस्था के अधिक क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है।

    केंद्रीय बैंक के मुताबिक खाद्य महंगाई अब केवल कुछ चुनिंदा वस्तुओं तक सीमित नहीं रही है। चीनी और प्याज जैसी वस्तुओं की कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। अगस्त में ईंधन महंगाई बढ़ने के पीछे प्रतिकूल आधार प्रभाव भी एक कारण रहा। आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में कोर मुद्रास्फीति 4.2 प्रतिशत रही। वहीं, कीमती धातुओं को अलग रखने पर कोर मुद्रास्फीति 2.9 प्रतिशत दर्ज की गई।

    आरबीआई ने आने वाले महीनों में आपूर्ति पक्ष से जुड़े जोखिमों के बने रहने की आशंका जताई है। कमजोर मानसून, जारी अल नीनो परिस्थितियां, ऊंची ऊर्जा कीमतें और अन्य कमोडिटी की मजबूत कीमतें महंगाई पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं। केंद्रीय बैंक ने इस स्थिति को महंगाई के मौजूदा परिदृश्य के लिए प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है।

    आरबीआई के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि CPI बास्केट में शामिल उन वस्तुओं का हिस्सा, जिनकी महंगाई दर 4 प्रतिशत से अधिक है, अगस्त में बढ़कर करीब 37 प्रतिशत हो गया। इससे यह संकेत मिलता है कि कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव अधिक वस्तुओं तक फैल रहा है। केंद्रीय बैंक ने इसी व्यापक दबाव को महंगाई के बदलते परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना है।

    संजय मल्होत्रा ने कहा कि महंगाई और उसका आउटलुक पिछले वर्ष की तुलना में अब उतना अनुकूल नहीं है। अगले तीन तिमाहियों में औसत CPI मुद्रास्फीति करीब 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि कोर मुद्रास्फीति लगभग 4.4 प्रतिशत रह सकती है। इस आकलन के बीच मौद्रिक नीति को लेकर भी बदलाव किया गया है।

    आरबीआई ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया है। गवर्नर के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में नीतिगत ब्याज दरों का पुनर्संतुलन आवश्यक हो गया था। महंगाई के बढ़ते दबाव, खाद्य और ऊर्जा कीमतों में तेजी तथा आपूर्ति संबंधी जोखिमों को देखते हुए केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अपने मुद्रास्फीति अनुमान को 5.2 प्रतिशत पर रखा है।

  • आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 का जीडीपी अनुमान 7.1 प्रतिशत पर रखा, महंगाई को लेकर बढ़ी चिंता

    आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 का जीडीपी अनुमान 7.1 प्रतिशत पर रखा, महंगाई को लेकर बढ़ी चिंता


    नई दिल्ली ।
    भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 7.1 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं और महंगाई से जुड़े जोखिमों के बावजूद घरेलू आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। केंद्रीय बैंक ने आर्थिक वृद्धि को लेकर भरोसा जताया है, लेकिन बढ़ती महंगाई और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को लेकर सतर्क रुख अपनाया है।

    आरबीआई के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही। दूसरी तिमाही के लिए 7.2 प्रतिशत, तीसरी तिमाही के लिए 6.9 प्रतिशत और चौथी तिमाही के लिए 6.8 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भी आर्थिक वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। आरबीआई के मुताबिक घरेलू मांग और निवेश गतिविधियां आर्थिक वृद्धि को समर्थन दे रही हैं।

    गवर्नर ने बताया कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में कारोबारी गतिविधियां विस्तार की स्थिति में हैं। दूसरी तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज पीएमआई वृद्धि क्षेत्र में बने रहे, हालांकि पिछली तिमाही की तुलना में इनकी गति कुछ धीमी हुई है। केंद्रीय बैंक का आकलन है कि घरेलू मांग, निवेश, सेवाओं की मजबूती और विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार अर्थव्यवस्था को आगे भी सहारा दे सकते हैं।

    महंगाई के मोर्चे पर आरबीआई ने खाद्य कीमतों में बढ़ते दबाव को लेकर चिंता जताई है। गवर्नर के अनुसार खाद्य मुद्रास्फीति का दबाव अब व्यापक रूप ले रहा है और चीनी तथा प्याज जैसी वस्तुओं की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अगस्त में खाद्य और ईंधन महंगाई दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसमें आधार प्रभाव की भी भूमिका रही। आरबीआई महंगाई की स्थिति पर नजर रखने के लिए महंगाई अपेक्षाओं, कंपनियों के मूल्य निर्धारण व्यवहार, कोर इन्फ्लेशन और अन्य आर्थिक संकेतकों का आकलन कर रहा है।

    केंद्रीय बैंक ने नीतिगत दरों में बढ़ोतरी के साथ अन्य प्रमुख दरों में भी बदलाव किया है। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी दर को 5.25 प्रतिशत और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी दर तथा बैंक रेट को 5.75 प्रतिशत किया गया है। वैश्विक स्तर पर भी महंगाई के दबाव बढ़ने की आशंका के बीच प्रमुख केंद्रीय बैंकों द्वारा मौद्रिक नीति को सख्त किए जाने का उल्लेख किया गया है। पश्चिम एशिया में तनाव और 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने कच्चे तेल के दाम भी वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के लिए महत्वपूर्ण जोखिम माने जा रहे हैं।

    व्यापार के मोर्चे पर भारत का व्यापार घाटा जुलाई और अगस्त में बढ़कर 58.7 अरब डॉलर हो गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 55.1 अरब डॉलर था। आरबीआई के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक सामान और कच्चे तेल के आयात ने इसमें भूमिका निभाई। वैश्विक व्यापार वृद्धि में नरमी, ऊंची ऊर्जा कीमतें और व्यापार नीति से जुड़ी अनिश्चितताएं चालू खाते के घाटे के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं।

    वहीं वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 13.8 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 9.6 अरब डॉलर से अधिक है। महंगाई के निकट भविष्य के परिदृश्य को लेकर आरबीआई ने दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी, अल नीनो की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को आपूर्ति पक्ष के दबाव के प्रमुख कारणों में शामिल किया है। पूरे वित्त वर्ष में सीपीआई महंगाई 5.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें दूसरी तिमाही में 4.9 प्रतिशत, तीसरी में 6 प्रतिशत और चौथी में 5.7 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई है।

  • RBI ने अचानक बढ़ाया रेपो रेट, महंगे हो सकते हैं होम लोन और EMI, महंगाई के बीच क्यों लिया गया बड़ा फैसला

    RBI ने अचानक बढ़ाया रेपो रेट, महंगे हो सकते हैं होम लोन और EMI, महंगाई के बीच क्यों लिया गया बड़ा फैसला

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक ने बुधवार को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का ऐलान किया। इसके साथ नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत से बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो गई है। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार है जब केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में वृद्धि की है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताएं बनी हुई हैं और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी महंगाई के दबाव को बढ़ा रही है।

    यह फैसला आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति की तीन दिवसीय बैठक के बाद लिया गया। केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीति के दूसरे हिस्सों में भी बदलाव किया है। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी यानी एसडीएफ दर को बढ़ाकर 5.25 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीं, मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी यानी एमएसएफ दर और बैंक रेट को 5.75 प्रतिशत पर समायोजित किया गया है।

    रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक अवधि के लिए धन उपलब्ध कराता है। इसमें बढ़ोतरी होने पर बैंकों के लिए केंद्रीय बैंक से कर्ज लेना महंगा हो जाता है। इसका असर आगे चलकर ग्राहकों को दिए जाने वाले कर्ज पर पड़ सकता है। होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरों में वृद्धि होने पर नई और मौजूदा ईएमआई महंगी होने की संभावना रहती है।

    आरबीआई ने रेपो रेट बढ़ाने के पीछे वैश्विक अनिश्चितताओं और बढ़ते महंगाई दबाव को प्रमुख वजहों में रखा है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए कहा कि दुनिया में मुद्रास्फीति के दोबारा तेज होने की आशंका बनी हुई है। इसी वजह से कई प्रमुख केंद्रीय बैंक अपनी मौद्रिक नीतियों को और सख्त करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं।

    कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी भी केंद्रीय बैंक के लिए चिंता का विषय है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने से परिवहन और उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है, जिसका असर घरेलू और वैश्विक महंगाई पर पड़ सकता है।

    देश में महंगाई के ताजा आंकड़े भी दबाव की ओर संकेत कर रहे हैं। अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई आधारित महंगाई दर बढ़कर 4.82 प्रतिशत पहुंच गई थी, जबकि जुलाई में यह 4.45 प्रतिशत थी। इस बढ़ोतरी ने कीमतों को लेकर आरबीआई की चिंताओं को बढ़ाया है। इसके अलावा अल नीनो प्रभाव और कम वर्षा के कारण रबी फसल के उत्पादन पर जोखिम भी बना हुआ है।

    रेपो रेट में बढ़ोतरी की संभावना को लेकर अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों के बीच पहले से चर्चा थी। एसबीआई रिसर्च ने बढ़ते महंगाई दबाव, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, बदलती तरलता स्थिति और जोखिमों के दोबारा आकलन को देखते हुए समय रहते कदम उठाने की जरूरत बताई थी।

    आरबीआई के इस फैसले का सीधा असर बैंकिंग व्यवस्था और कर्ज की लागत पर पड़ सकता है। ब्याज दरों में बदलाव का असर किस तरह और कितनी तेजी से ग्राहकों तक पहुंचेगा, यह बैंकों के कर्ज और जमा दरों में किए जाने वाले अगले बदलावों पर निर्भर करेगा। फिलहाल केंद्रीय बैंक का फैसला महंगाई और वैश्विक जोखिमों के बीच मौद्रिक नीति को संतुलित रखने की दिशा में उठाया गया कदम है।

  • वैश्विक तनाव और महंगे कच्चे तेल के बीच RBI MPC का फैसला आज, रेपो रेट में बढ़ोतरी की संभावना

    वैश्विक तनाव और महंगे कच्चे तेल के बीच RBI MPC का फैसला आज, रेपो रेट में बढ़ोतरी की संभावना


    नई दिल्ली:
    भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति बुधवार को अपनी द्विमासिक समीक्षा बैठक के फैसलों की घोषणा करेगी। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय समिति ऐसे समय में अपना निर्णय सुनाने जा रही है, जब देश और दुनिया में महंगाई तथा ऊर्जा कीमतों को लेकर चिंताएं बढ़ी हुई हैं। इस बैठक पर निवेशकों, उद्योग जगत, कर्ज लेने वालों और वित्तीय बाजारों की नजर बनी हुई है। समिति के सामने महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है।

    एमपीसी की बैठक बढ़ती खुदरा महंगाई, 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने कच्चे तेल के दाम और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव की पृष्ठभूमि में हो रही है। इन परिस्थितियों का असर वित्तीय बाजारों और नीति निर्माताओं की चिंताओं पर भी पड़ा है। आरबीआई ने पिछली समीक्षा में रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा था। हालांकि, इस बार कई अर्थशास्त्री और बाजार विशेषज्ञ ब्याज दर में बढ़ोतरी की संभावना जता रहे हैं। ऐसा होने पर फरवरी 2023 के बाद यह पहली दर बढ़ोतरी हो सकती है।

    बैंक ऑफ अमेरिका का अनुमान है कि आरबीआई दिसंबर तक इंतजार करने के बजाय अक्टूबर की बैठक में ही रेपो रेट में 25 आधार अंक यानी 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर सकता है। उसके मुताबिक, करीब दो वर्षों की मौद्रिक सहजता के बाद केंद्रीय बैंक अब नीतिगत समर्थन को धीरे-धीरे वापस लेने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। वहीं, एसबीआई रिसर्च ने भी 25 आधार अंकों की दर वृद्धि की संभावना को मजबूत बताया है। इसके पीछे बढ़ता मुद्रास्फीति दबाव, कमजोर होती वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां, बदलती तरलता स्थिति और वैश्विक जोखिमों का दोबारा आकलन प्रमुख कारण बताए गए हैं।

    एसबीआई रिसर्च के अर्थशास्त्रियों के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में बाद में कार्रवाई करने के बजाय पहले से कदम उठाना अधिक विवेकपूर्ण हो सकता है। महंगाई के आंकड़े भी आरबीआई के सामने चुनौती बढ़ा रहे हैं। अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई में यह 4.45 प्रतिशत थी। इसके अलावा मजबूत अल नीनो प्रभाव और अक्टूबर में सामान्य से कम बारिश की आशंका से रबी फसलों के उत्पादन पर असर पड़ने की चिंता है। इससे आने वाले समय में खाद्य महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है।

    वैश्विक स्तर पर बढ़ती बॉन्ड यील्ड और ऊंची ऊर्जा कीमतें भी ब्याज दरों को लंबे समय तक मौजूदा स्तर पर बनाए रखने की चुनौती बढ़ा रही हैं। ऐसे में आरबीआई के फैसले में महंगाई के साथ आर्थिक गतिविधियों और वित्तीय परिस्थितियों को भी महत्व मिलने की उम्मीद है। बाजार की नजर सिर्फ रेपो रेट पर नहीं, बल्कि महंगाई अनुमान, आर्थिक वृद्धि के आकलन और भविष्य की मौद्रिक नीति के रुख पर भी रहेगी। एमपीसी के ये संकेत आने वाले महीनों में बाजार और ब्याज दरों की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।

  • त्योहारों पर महंगाई का तड़का…. कीमतें बढ़ाने की जगह छोटे पैक… सामान की मात्रा भी घटी

    त्योहारों पर महंगाई का तड़का…. कीमतें बढ़ाने की जगह छोटे पैक… सामान की मात्रा भी घटी


    नई दिल्ली।
    दशहरा (Dussehra) और दिवाली (Diwali) से पहले रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले सामान की बढ़ती कीमतों (Rising Prices) का असर अब अलग तरीके से दिखाई दे रहा है। कच्चे माल और उत्पादन से जुड़ी लागत बढ़ने के बीच कंपनियां हर पैकेट की कीमत सीधे बढ़ाने (Directly Increasing Price) से बच रही हैं। इसके बजाय छोटे पैक में सामान की मात्रा घटाई (Reduced Quantity Small packs) जा रही है। कई मामलों में मात्रा में 2 से 7 फीसदी तक की कमी की जा रही है। वहीं बड़े पैक की कीमत सीधे 5 से 6 फीसदी तक बढ़ाई जा रही है। इसका मतलब है कि ग्राहक को कई सामान पहले जितने ही रुपये में मिलेंगे, लेकिन पैकेट में सामान कुछ कम होगा।


    कंपनियां पैकेट में सामान कम क्यों कर रही हैं?

    एफएमसीजी कंपनियों के सामने इस समय लागत बढ़ने और ग्राहकों को कीमत का झटका देने से बचने की दोहरी चुनौती है। पाम ऑयल, पैकेजिंग, कच्चे तेल से जुड़े उत्पादों और दूसरी जिंसों की कीमत बढ़ने से कंपनियों की लागत बढ़ रही है। दूसरी ओर ग्राहक रोजमर्रा की चीजों की कीमत को लेकर काफी सतर्क हैं। ऐसे में कंपनियां ऐसी कीमत बनाए रखना चाहती हैं, जिससे बिक्री की मात्रा पर ज्यादा असर न पड़े। इसलिए छोटे पैक में कीमत बढ़ाने के बजाय सामान की मात्रा कम करना आसान विकल्प माना जा रहा है। ग्राहक को पैकेट की कीमत पहले जैसी दिखाई देती है, लेकिन उसमें मिलने वाला सामान कम हो जाता है।


    किन रोजमर्रा के सामान पर इसका असर दिख रहा है?

    यह बदलाव बिस्कुट, नमकीन, स्नैक्स, नूडल्स, हेयर ऑयल, साबुन, शैंपू, डिटर्जेंट, चीनी और चाय जैसी रोजमर्रा की चीजों में देखने को मिल रहा है। बिस्कुट, नमकीन और स्नैक्स बनाने वाली कई कंपनियों ने बढ़ी लागत से निपटने के लिए कुछ उत्पादों की कीमतें बढ़ाई हैं। बीकाजी फूड्स के मनोज वर्मा के मुताबिक, पिछले छह-सात महीनों में औसत कच्चे माल की लागत करीब 7 फीसदी बढ़ी है। पाम ऑयल, पैकेजिंग और दूसरी जिंसों की कीमतों में बढ़ोतरी इसका प्रमुख कारण है। यानी कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ा है और उसका असर किसी न किसी रूप में ग्राहकों तक पहुंच रहा है।


    दूध और घी की कीमतों पर कितना दबाव है?

    त्योहारी सीजन में डेयरी उत्पादों की लागत पर भी दबाव बढ़ रहा है। पारस डेयरी के विपणन अधिकारी वीपीएस मलिक के मुताबिक, त्योहारी सीजन में दूध की कीमत 3 रुपये प्रति लीटर तक और बढ़ सकती है। घी की कीमत पहले ही 25 से 30 रुपये प्रति किलो बढ़ चुकी है। इसके अलावा इतनी ही और बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है। इसका सीधा असर उन परिवारों के बजट पर पड़ सकता है, जिनके घर में दूध और घी की नियमित खपत होती है। त्योहारों के दौरान मिठाइयों और दूसरे खाद्य पदार्थों में डेयरी उत्पादों का इस्तेमाल बढ़ने से भी कीमतों पर नजर बनी हुई है।


    10, 20 और 50 रुपये के पैक पर कंपनियों की नजर क्यों है?

    डाटा रिसर्च फर्म नीलसन इंडिया के प्रीतम भादुड़ी के मुताबिक, कंपनियों के लिए 10, 20 और 50 रुपये कीमत वाले छोटे पैक काफी महत्वपूर्ण हैं। इन पैकों की कीमत बढ़ने पर ग्राहक को सामान तुरंत महंगा महसूस हो सकता है। इसलिए इन पैकों में मात्रा घटाना कंपनियों के लिए आसान रास्ता बन जाता है। दूसरी तरफ बड़े पैक में कीमत बढ़ाने की गुंजाइश ज्यादा होती है। आधुनिक रिटेल और ई-कॉमर्स में बिकने वाले बड़े पैक पर कंपनियां बढ़ी लागत का कुछ हिस्सा सीधे ग्राहक पर डाल सकती हैं। इस तरह कंपनियां छोटे पैक में कीमत को नियंत्रित रखने और बड़े पैक में दाम बढ़ाने की रणनीति अपना रही हैं। इसका असर ग्राहक की जेब पर सिर्फ कीमत बढ़ने से नहीं, बल्कि कम सामान मिलने के रूप में भी पड़ सकता है।

  • डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड में क्या अंतर, एक्सपेंस रेशियो और निवेशक की जरूरत से समझें सही प्लान

    डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड में क्या अंतर, एक्सपेंस रेशियो और निवेशक की जरूरत से समझें सही प्लान

    नई दिल्ली: म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय एक ही स्कीम के तहत डायरेक्ट और रेगुलर प्लान का विकल्प मिलता है। दोनों प्लान में फंड मैनेजर और निवेश का पोर्टफोलियो समान हो सकता है, लेकिन इनके खर्च और मिलने वाले रिटर्न में अंतर हो सकता है। इसका प्रमुख कारण एक्सपेंस रेशियो है। डायरेक्ट प्लान में निवेशक म्यूचुअल फंड कंपनी या डायरेक्ट प्लान की सुविधा देने वाले प्लेटफॉर्म के जरिए सीधे निवेश करता है और बीच में डिस्ट्रीब्यूटर नहीं होता। वहीं, रेगुलर प्लान में निवेश डिस्ट्रीब्यूटर या एजेंट के माध्यम से किया जाता है।

    डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के बीच सबसे बड़ा अंतर डिस्ट्रीब्यूटर से जुड़े खर्च का है। डायरेक्ट प्लान में डिस्ट्रीब्यूटर का कमीशन शामिल नहीं होता, इसलिए इसका एक्सपेंस रेशियो आमतौर पर रेगुलर प्लान से कम रहता है। रेगुलर प्लान में डिस्ट्रीब्यूटर से जुड़ा खर्च शामिल होने के कारण उसका एक्सपेंस रेशियो अधिक हो सकता है। इसी वजह से दोनों प्लान की एनएवी अलग-अलग होती है। लंबे समय तक निवेश करने पर खर्च में छोटा अंतर भी कंपाउंडिंग के कारण कुल निवेश राशि पर असर डाल सकता है। हालांकि, हर स्कीम में डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के खर्च का अंतर समान नहीं होता। इसलिए निवेश से पहले संबंधित स्कीम का वास्तविक टोटल एक्सपेंस रेशियो यानी TER देखना जरूरी है।

    रेगुलर प्लान को केवल इसलिए खराब विकल्प नहीं माना जा सकता कि इसमें खर्च अधिक होता है। पहली बार म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले ऐसे लोगों के लिए यह उपयोगी हो सकता है, जिन्हें खुद स्कीम चुनने, जोखिम समझने या पोर्टफोलियो संभालने में परेशानी होती है। ऐसे निवेशकों को डिस्ट्रीब्यूटर या एजेंट से निवेश संबंधी मदद और मार्गदर्शन मिल सकता है। इस सुविधा की लागत निवेशक को अधिक एक्सपेंस रेशियो के रूप में चुकानी पड़ती है। इसलिए रेगुलर प्लान चुनने का मतलब केवल अधिक खर्च करना नहीं है, बल्कि इसके साथ मिलने वाली निवेश संबंधी सहायता को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

    वहीं, डायरेक्ट प्लान उन निवेशकों के लिए उपयोगी हो सकता है जो अलग-अलग म्यूचुअल फंड की तुलना कर सकते हैं, जोखिम को समझते हैं और अपने निवेश की नियमित निगरानी के लिए समय निकाल सकते हैं। इसमें निवेशक को स्कीम चुनने से लेकर निवेश करने और पोर्टफोलियो पर नजर रखने तक की जिम्मेदारी खुद निभानी होती है। केवल इस आधार पर डायरेक्ट प्लान चुनना सही नहीं होगा कि इसमें रिटर्न अधिक दिखाई देता है। कम खर्च इसका एक प्रमुख लाभ है, लेकिन निवेश से जुड़े फैसले और उनकी जिम्मेदारी भी निवेशक की ही होती है।

    इसलिए डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के बीच चुनाव केवल एक्सपेंस रेशियो देखकर नहीं करना चाहिए। निवेशक को अपनी जानकारी, जोखिम समझने की क्षमता और निवेश को संभालने के लिए उपलब्ध समय को भी ध्यान में रखना चाहिए। अगर निवेशक खुद रिसर्च करके फंड चुन सकता है और पोर्टफोलियो की निगरानी कर सकता है तो डायरेक्ट प्लान पर विचार किया जा सकता है। वहीं, निवेश के फैसलों में लगातार सहायता और मार्गदर्शन की जरूरत होने पर रेगुलर प्लान उपयोगी हो सकता है। दोनों विकल्पों में चुनाव निवेशक की अपनी जरूरत और निवेश संभालने की क्षमता के आधार पर किया जाना चाहिए।

  • शेयर बाजार में आज बन सकती है तेजी की तस्वीर, इन सेक्टर्स और शेयरों पर रहेगी निवेशकों की नजर

    शेयर बाजार में आज बन सकती है तेजी की तस्वीर, इन सेक्टर्स और शेयरों पर रहेगी निवेशकों की नजर


    नई दिल्ली। आज शेयर बाजार में कारोबार के दौरान निवेशकों की नजर वैश्विक संकेतों के साथ घरेलू बाजार की दिशा पर रहेगी। बीते कारोबारी सत्रों में बाजार में उतार चढ़ाव देखने को मिला है ऐसे में आज भी सेंसेक्स और निफ्टी की चाल पर निवेशकों की खास नजर रहने वाली है। बाजार की दिशा तय करने में वैश्विक शेयर बाजारों का रुख विदेशी निवेशकों की गतिविधियां कच्चे तेल की कीमतें रुपये की चाल और आर्थिक आंकड़ों की भूमिका अहम रह सकती है। निवेशकों के लिए जरूरी होगा कि वे केवल बाजार में तेजी देखकर जल्दबाजी में खरीदारी करने के बजाय कंपनियों के प्रदर्शन और बाजार की मौजूदा स्थिति को समझकर फैसला लें।

    आज के कारोबार में बैंकिंग आईटी ऑटो फार्मा और मेटल जैसे प्रमुख सेक्टर चर्चा में रह सकते हैं। इन सेक्टरों में होने वाली खरीदारी या बिकवाली का सीधा असर बाजार के प्रमुख सूचकांकों पर दिखाई दे सकता है। खासतौर पर बड़ी कंपनियों के शेयरों में हलचल बाजार की दिशा को प्रभावित कर सकती है। अगर घरेलू बाजार को वैश्विक संकेतों से समर्थन मिलता है और विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दबाव कम होता है तो बाजार में खरीदारी लौट सकती है। दूसरी ओर कमजोर वैश्विक संकेत और ऊंचे स्तरों पर मुनाफावसूली बाजार में दबाव बढ़ा सकती है।

    निवेशकों की नजर आज विदेशी संस्थागत निवेशकों और घरेलू संस्थागत निवेशकों के रुख पर भी रहेगी। विदेशी निवेशकों की लगातार खरीदारी बाजार के लिए सकारात्मक संकेत मानी जाती है जबकि भारी बिकवाली से बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। इसके अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति भी आईटी और निर्यात से जुड़ी कंपनियों के शेयरों को प्रभावित कर सकती है। कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव का असर भारत की अर्थव्यवस्था और कुछ प्रमुख कंपनियों पर पड़ सकता है इसलिए कमोडिटी बाजार के संकेत भी महत्वपूर्ण रहेंगे।

    बाजार में कारोबार करने वाले निवेशकों के लिए आज सपोर्ट और रेजिस्टेंस स्तर भी अहम रहेंगे। अगर निफ्टी अपने महत्वपूर्ण स्तरों के ऊपर मजबूती बनाए रखता है तो खरीदारी का भरोसा बढ़ सकता है जबकि अहम सपोर्ट स्तर टूटने पर बिकवाली का दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। सेंसेक्स में भी इसी तरह ऊपरी और निचले स्तरों पर बाजार की प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है। ऐसे माहौल में छोटे निवेशकों को बाजार में अचानक आने वाली तेजी या गिरावट के आधार पर भावनात्मक फैसला लेने से बचना चाहिए।

    शेयर बाजार में हमेशा जोखिम बना रहता है और किसी भी शेयर की पिछली तेजी इस बात की गारंटी नहीं होती कि आगे भी उसमें वैसा ही प्रदर्शन देखने को मिलेगा। इसलिए निवेशकों को कंपनी के फंडामेंटल्स कमाई कारोबार की स्थिति कर्ज और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर निवेश का निर्णय लेना चाहिए। आज के कारोबार में बाजार की शुरुआत भले ही सकारात्मक या नकारात्मक संकेतों के साथ हो लेकिन पूरे दिन वैश्विक संकेतों और संस्थागत निवेशकों की गतिविधियों के कारण तस्वीर बदल सकती है। ऐसे में सतर्क रणनीति अपनाना और जोखिम के अनुसार निवेश करना ही बेहतर विकल्प माना जा सकता है।