Category: Economy

  • भारत के टेक्सटाइल और परिधान निर्यात ने पार किया ₹3.25 लाख करोड़ का आंकड़ा, वैश्विक बाजारों में बढ़ी मांग

    भारत के टेक्सटाइल और परिधान निर्यात ने पार किया ₹3.25 लाख करोड़ का आंकड़ा, वैश्विक बाजारों में बढ़ी मांग

    नई दिल्ली । भारत का कपड़ा और परिधान उद्योग वैश्विक बाजार में लगातार अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। केंद्र सरकार ने संसद में जानकारी दी कि वर्ष 2025-26 के दौरान देश का कपड़ा और परिधान निर्यात, जिसमें हस्तशिल्प भी शामिल है, बढ़कर ₹3,25,339 करोड़ तक पहुंच गया। यह आंकड़ा वर्ष 2023-24 के ₹2,97,004 करोड़ के मुकाबले उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है। इस अवधि में निर्यात में 4.7 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई, जो भारतीय टेक्सटाइल उद्योग की बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और वैश्विक मांग का संकेत है।

    सरकार के अनुसार भारतीय कपड़ा और परिधान उत्पादों के प्रमुख निर्यात बाजारों में अमेरिका, बांग्लादेश, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन और जर्मनी शामिल रहे। इन देशों में भारतीय उत्पादों की मांग लगातार बनी रही, जिससे निर्यात को गति मिली। इसके अलावा वर्ष 2025-26 के दौरान 2024-25 की तुलना में 100 से अधिक देशों को होने वाले निर्यात में भी वृद्धि दर्ज की गई, जो भारतीय उद्योग के लिए नए अवसरों का संकेत माना जा रहा है।

    केंद्र सरकार ने कहा कि टेक्सटाइल और परिधान क्षेत्र के निर्यात की नियमित निगरानी की जा रही है। सरकार उद्योग जगत, निर्यातकों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ मिलकर ऐसी रणनीतियों पर काम कर रही है, जिनसे वैश्विक चुनौतियों का प्रभाव कम किया जा सके और भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता को और मजबूत बनाया जा सके। इसका उद्देश्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय वस्त्र उद्योग की हिस्सेदारी को विस्तार देना है।

    सरकार ने यह भी बताया कि पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं लागू की गई हैं। इनमें पीएम मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन एंड अपैरल पार्क योजना, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना, राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन, समर्थ योजना, सिल्क समग्र-2, राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम, राष्ट्रीय हस्तशिल्प विकास कार्यक्रम और अन्य निर्यात प्रोत्साहन योजनाएं शामिल हैं। इन पहलों का सकारात्मक प्रभाव उत्पादन, निवेश और निर्यात वृद्धि के रूप में सामने आया है।

    निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार ने 40 प्राथमिकता वाले देशों को ध्यान में रखते हुए बाजार विविधीकरण की रणनीति भी अपनाई है। साथ ही भारत के विभिन्न मुक्त व्यापार समझौते भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सरकार का मानना है कि ब्रिटेन के साथ व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते के अलावा यूरोपीय संघ और न्यूजीलैंड के साथ होने वाले मुक्त व्यापार समझौते भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के लिए नए निर्यात अवसर पैदा करेंगे और वैश्विक बाजारों तक पहुंच को और आसान बनाएंगे।

    सरकार ने यह भी बताया कि पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में समुद्री परिवहन से जुड़ी चुनौतियों का असर कम करने के लिए विशेष राहत पहल शुरू की गई है, ताकि निर्यातकों को किसी प्रकार की अतिरिक्त कठिनाई का सामना न करना पड़े। इसके अलावा घरेलू उद्योग को पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 1 जून से 31 अक्टूबर 2026 तक कपास के आयात पर सीमा शुल्क अस्थायी रूप से माफ किया गया है। इससे उत्पादन लागत को नियंत्रित रखने और निर्यात क्षमता बढ़ाने में सहायता मिलने की उम्मीद है।

    आगे की रणनीति के तहत सरकार ने वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक के लिए ‘मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी’ को भी मंजूरी दी है। इस मिशन का उद्देश्य कपास उत्पादन से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों को दूर करना, उत्पादकता बढ़ाना और गुणवत्ता में सुधार लाना है। सरकार का मानना है कि बेहतर गुणवत्ता वाला कच्चा माल उपलब्ध होने से भारतीय टेक्सटाइल उद्योग वैश्विक बाजार में और अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगा तथा आने वाले वर्षों में निर्यात में नई ऊंचाइयों को हासिल करने में सफल रहेगा।

  • देश में जल्द शुरू होगा प्लास्टिक करेंसी नोटों का परीक्षण, सरकार ने स्पष्ट किया- कागजी नोट नहीं होंगे बंद

    देश में जल्द शुरू होगा प्लास्टिक करेंसी नोटों का परीक्षण, सरकार ने स्पष्ट किया- कागजी नोट नहीं होंगे बंद

    नई दिल्ली । देश में करेंसी व्यवस्था को अधिक टिकाऊ और सुरक्षित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने ₹10 और ₹20 मूल्यवर्ग के पॉलिमर यानी प्लास्टिक नोटों के परीक्षण को मंजूरी दे दी है। इन नोटों को शुरुआत में सीमित स्तर पर फील्ड ट्रायल के रूप में जारी किया जाएगा। सरकार का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य नए प्रकार की करेंसी की उपयोगिता, टिकाऊपन और व्यवहारिक प्रभाव का आकलन करना है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि मौजूदा कागजी नोटों का चलन जारी रहेगा और उन्हें तत्काल बंद करने की कोई योजना नहीं है।

    सरकार के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक के प्रस्ताव पर सहमति देते हुए पहले चरण में ₹10 और ₹20 के 100-100 करोड़ पॉलिमर नोट परीक्षण के लिए जारी किए जाएंगे। इन नोटों का विभिन्न भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों में उपयोग कर उनकी गुणवत्ता, मजबूती और संचालन क्षमता का अध्ययन किया जाएगा। ट्रायल के परिणाम संतोषजनक रहने पर आगे इन नोटों के नियमित उपयोग को लेकर निर्णय लिया जाएगा।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि देश में पहले से प्रचलित कागजी नोट पूरी तरह वैध बने रहेंगे। नागरिकों को किसी भी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि प्लास्टिक नोटों के आने से कागजी नोट अमान्य नहीं होंगे। दोनों प्रकार की करेंसी एक साथ चलन में रह सकती हैं। फिलहाल पूरे देश में कागजी नोटों को पॉलिमर नोटों से बदलने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।

    पॉलिमर नोटों को पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक टिकाऊ माना जाता है। इनकी उम्र सामान्य नोटों से अधिक होती है और ये नमी, धूल तथा बार-बार इस्तेमाल के बावजूद लंबे समय तक सुरक्षित रह सकते हैं। इसके अलावा इनमें आधुनिक सुरक्षा फीचर्स शामिल करना अपेक्षाकृत आसान होता है, जिससे नकली नोट तैयार करना कठिन हो जाता है। लंबे समय तक उपयोग योग्य होने के कारण इनकी बार-बार छपाई की आवश्यकता भी कम पड़ती है।

    दुनिया के कई देशों में पॉलिमर करेंसी का सफल उपयोग किया जा रहा है। सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने वर्ष 1988 में इस तकनीक को अपनाया था। इसके बाद अनेक देशों ने भी अपने कुछ या सभी मूल्यवर्ग के नोट पॉलिमर सामग्री पर छापने शुरू किए। इन देशों के अनुभवों के आधार पर पॉलिमर नोटों को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प माना गया है।

    भारत में यह परियोजना अभी शुरुआती चरण में है। परीक्षण के दौरान यह भी देखा जाएगा कि आम लोगों, बैंकों, एटीएम नेटवर्क और अन्य वित्तीय संस्थानों के लिए इन नोटों का उपयोग कितना व्यावहारिक रहता है। इसके साथ ही परिवहन, रखरखाव और दीर्घकालिक लागत पर भी विस्तृत मूल्यांकन किया जाएगा, ताकि भविष्य में बड़े स्तर पर निर्णय लेने से पहले सभी पहलुओं का अध्ययन किया जा सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परीक्षण सफल रहता है तो इससे करेंसी प्रबंधन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि सरकार ने फिलहाल यह स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल परीक्षण चरण है और इसका उद्देश्य नई तकनीक की उपयोगिता को परखना है। इसलिए आम लोगों को अपने पास मौजूद कागजी नोटों को लेकर किसी तरह की भ्रम की स्थिति में आने की आवश्यकता नहीं है। आने वाले समय में ट्रायल के नतीजों के आधार पर ही आगे की रणनीति तय की जाएगी।

  • वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में एचयूएल की आय बढ़ी, लेकिन मुनाफे में कमी से शेयर 5 प्रतिशत से अधिक फिसले

    वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में एचयूएल की आय बढ़ी, लेकिन मुनाफे में कमी से शेयर 5 प्रतिशत से अधिक फिसले


    नई दिल्ली । देश की प्रमुख एफएमसीजी कंपनियों में शामिल हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (एचयूएल) ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के वित्तीय परिणाम जारी किए हैं। अप्रैल से जून 2026 की अवधि में कंपनी के स्टैंडअलोन मुनाफे में सालाना आधार पर लगभग 4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। बढ़ती लागत का असर कंपनी की लाभप्रदता पर साफ दिखाई दिया, जबकि कुल आय में अच्छी बढ़ोतरी दर्ज की गई। तिमाही नतीजों के बाद निवेशकों की प्रतिक्रिया भी नकारात्मक रही और शेयर बाजार में कंपनी के शेयरों में पांच प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखने को मिली।

    कंपनी के अनुसार, पहली तिमाही में उसका स्टैंडअलोन शुद्ध लाभ घटकर 2,631 करोड़ रुपये रह गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 2,732 करोड़ रुपये था। इसी प्रकार कंसोलिडेटेड आधार पर भी कंपनी का मुनाफा करीब 3.17 प्रतिशत घटकर 2,680 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो एक वर्ष पहले इसी अवधि में 2,741 करोड़ रुपये था। इससे स्पष्ट है कि आय में वृद्धि के बावजूद बढ़ते खर्च ने कंपनी के मुनाफे को प्रभावित किया।

    वित्तीय परिणामों में यह भी सामने आया कि अप्रैल-जून तिमाही के दौरान कंपनी की कुल आय में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि में कुल आय सालाना आधार पर लगभग 9.8 प्रतिशत बढ़कर 17,529 करोड़ रुपये पहुंच गई, जबकि पिछले वर्ष की समान तिमाही में यह 15,958 करोड़ रुपये थी। इससे संकेत मिलता है कि कंपनी के उत्पादों की मांग और कारोबार का विस्तार जारी रहा, लेकिन बढ़ी हुई लागत ने आय में हुई वृद्धि का पूरा लाभ मुनाफे में नहीं बदलने दिया।

    कंपनी का कुल खर्च भी इसी अवधि में उल्लेखनीय रूप से बढ़ा। पहली तिमाही में कुल व्यय करीब 10 प्रतिशत बढ़कर 13,822 करोड़ रुपये हो गया, जबकि एक वर्ष पहले समान अवधि में यह 12,565 करोड़ रुपये था। कंपनी का मानना है कि मध्य पूर्व क्षेत्र में बढ़ी भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण लागत पर अतिरिक्त दबाव बना, जिसका सीधा असर लाभ पर पड़ा।

    कंपनी की मुख्य कार्यकारी अधिकारी और प्रबंध निदेशक प्रिया नायर ने कहा कि वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूती बनाए रखी है। उन्होंने बताया कि सरकार और केंद्रीय बैंक की सक्रिय नीतियों ने आर्थिक गतिविधियों को समर्थन दिया, जिससे बाजार में मांग स्थिर बनी रही। उनके अनुसार कंपनी का प्रदर्शन उसके मजबूत ब्रांड पोर्टफोलियो, प्रतिस्पर्धी उत्पादों और रणनीतिक योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को दर्शाता है।

    उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी लगातार बाजार विस्तार, वितरण नेटवर्क को मजबूत करने और अपने उत्पाद पोर्टफोलियो में निवेश कर रही है। इन पहलों का उद्देश्य दीर्घकालिक विकास को गति देना और बदलते बाजार माहौल में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त बनाए रखना है। कंपनी का विश्वास है कि ये निवेश आने वाले समय में बेहतर व्यावसायिक प्रदर्शन की नींव तैयार करेंगे।

    हालांकि, तिमाही नतीजों के तुरंत बाद शेयर बाजार में निवेशकों की प्रतिक्रिया कमजोर रही। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में दोपहर के कारोबार के दौरान एचयूएल का शेयर लगभग 5.60 प्रतिशत की गिरावट के साथ 2,052 रुपये पर कारोबार करता दिखाई दिया। इससे यह संकेत मिला कि बाजार ने मुनाफे में आई गिरावट और बढ़ती लागत को लेकर सतर्क रुख अपनाया है। आने वाली तिमाहियों में कंपनी के लिए लागत नियंत्रण, मांग में निरंतरता और लाभप्रदता में सुधार प्रमुख चुनौतियां और प्राथमिकताएं बनी रहेंगी।

  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए फार्मा क्षेत्र में अनुसंधान और निवेश को मिलेगा प्रोत्साहन : पीयूष गोयल

    वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए फार्मा क्षेत्र में अनुसंधान और निवेश को मिलेगा प्रोत्साहन : पीयूष गोयल

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने देश के फार्मास्युटिकल क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी और नवाचार आधारित बनाने की दिशा में अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार ऐसा वातावरण तैयार करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, जहां अनुसंधान, नई तकनीक और उन्नत चिकित्सा समाधानों को बढ़ावा मिले। इसके साथ ही आम लोगों तक किफायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना भी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।

    हाल ही में इंडियन फार्मास्युटिकल अलायंस के प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई बैठक में फार्मा क्षेत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व संगठन के अध्यक्ष डॉ. शारविल पटेल ने किया। बैठक में सरकार और उद्योग जगत के बीच बेहतर सहयोग स्थापित करने तथा भारतीय फार्मा उद्योग को वैश्विक स्तर पर अधिक मजबूत बनाने के उपायों पर विचार किया गया।

    बैठक के दौरान अनुसंधान एवं विकास, क्लीनिकल रिसर्च और उन्नत उपचार तकनीकों में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया। चर्चा में यह भी माना गया कि यदि इन क्षेत्रों में अधिक निवेश आकर्षित किया जाता है तो भारत का फार्मा इनोवेशन इकोसिस्टम और मजबूत होगा तथा नई दवाओं और उपचार पद्धतियों के विकास को गति मिलेगी। इससे देश की वैज्ञानिक क्षमता बढ़ने के साथ-साथ वैश्विक बाजारों में भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति भी मजबूत होगी।

    पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार उद्योग के साथ मिलकर ऐसा अनुकूल वातावरण तैयार करना चाहती है, जहां नवाचार को प्रोत्साहन मिले और निवेशकों का भरोसा लगातार बढ़े। उनका मानना है कि अनुसंधान आधारित विकास ही भविष्य में भारतीय फार्मा उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विकास की इस प्रक्रिया में आम नागरिकों के लिए सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना समान रूप से महत्वपूर्ण रहेगा।

    भारत का फार्मास्युटिकल उद्योग पहले से ही दुनिया के प्रमुख दवा उद्योगों में गिना जाता है। विशेष रूप से कम लागत वाली जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दुनिया के अनेक देशों में भारतीय दवाओं की मांग लगातार बनी हुई है, जिससे यह क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था और निर्यात में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसी कारण सरकार घरेलू विनिर्माण क्षमता, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न स्तरों पर लगातार पहल कर रही है।

    फार्मा और हेल्थकेयर क्षेत्र के हालिया कारोबारी आंकड़े भी इस उद्योग की बढ़ती संभावनाओं को दर्शाते हैं। वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में इस क्षेत्र में 13.9 अरब डॉलर मूल्य के 65 सौदे दर्ज किए गए। बड़े विदेशी अधिग्रहण को अलग रखने के बाद भी कुल सौदों का मूल्य पिछली तिमाही की तुलना में 12 प्रतिशत अधिक रहा, जो निवेशकों के बढ़ते विश्वास का संकेत माना जा रहा है।

    इसी अवधि में विलय एवं अधिग्रहण गतिविधियों में भी उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। कुल 35 एमएंडए सौदों का मूल्य 13.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया। लेनदेन की संख्या में तिमाही आधार पर 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि कुल सौदों का मूल्य अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया। उल्लेखनीय है कि कुल एमएंडए मूल्य में लगभग 96 प्रतिशत योगदान विदेशी अधिग्रहणों का रहा, जिससे स्पष्ट होता है कि भारतीय फार्मा कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी मौजूदगी लगातार मजबूत कर रही हैं।

  • एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस का संयुक्त घाटा वित्त वर्ष 26 में 22,238 करोड़ रुपये पहुंचा, सुधार प्रक्रिया लंबी रहने के संकेत

    एयर इंडिया और एयर इंडिया एक्सप्रेस का संयुक्त घाटा वित्त वर्ष 26 में 22,238 करोड़ रुपये पहुंचा, सुधार प्रक्रिया लंबी रहने के संकेत

    नई दिल्ली । टाटा समूह के स्वामित्व वाली एयर इंडिया और उसकी सहायक बजट एयरलाइन एयर इंडिया एक्सप्रेस को वित्त वर्ष 2025-26 में संयुक्त रूप से 22,238 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ है। यह पिछले वित्त वर्ष के 10,859 करोड़ रुपये के घाटे की तुलना में दोगुने से भी अधिक है। इसी अवधि में दोनों एयरलाइंस की संयुक्त आय में भी लगभग 9 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि कंपनी का पुनर्गठन अभी चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है।

    वार्षिक वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों एयरलाइंस की कुल संयुक्त आय 71,870 करोड़ रुपये रही। परिचालन गतिविधियों के बावजूद बढ़ते खर्च, आधुनिकीकरण की प्रक्रिया और अन्य परिचालन चुनौतियों का असर कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन पर दिखाई दिया। हालांकि प्रबंधन का कहना है कि वर्तमान चरण को लंबे समय तक चलने वाली परिवर्तन प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।

    एयर इंडिया ने इस दौरान 51,452 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित किया, जबकि उसका शुद्ध घाटा 15,368 करोड़ रुपये रहा। दूसरी ओर एयर इंडिया एक्सप्रेस का राजस्व 19,088 करोड़ रुपये दर्ज किया गया और कंपनी को 6,767 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ। दोनों कंपनियों के संयुक्त परिणाम बताते हैं कि एयरलाइन समूह अभी भी व्यापक पुनर्गठन और निवेश के दौर में है।

    वर्तमान शेयरधारिता संरचना के अनुसार एयर इंडिया में 73.82 प्रतिशत हिस्सेदारी टाटा संस के पास है, जबकि 25.1 प्रतिशत हिस्सेदारी सिंगापुर एयरलाइंस के स्वामित्व में है। इसके अलावा 1.08 प्रतिशत हिस्सेदारी कर्मचारियों के पास है, जो वर्ष 2022 में निजीकरण के बाद लागू की गई कर्मचारी शेयर लाभ योजना के तहत प्रदान की गई थी।

    एयर इंडिया के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने शेयरधारकों के नाम अपने संदेश में कहा कि किसी वैश्विक स्तर की एयरलाइन का निर्माण अल्प अवधि में संभव नहीं होता। उनके अनुसार एयर इंडिया के व्यापक परिवर्तन को कुछ तिमाहियों के प्रदर्शन से नहीं आंका जाना चाहिए, क्योंकि ऐसी संस्थाओं का विकास वर्षों की निरंतर प्रक्रिया का परिणाम होता है।

    उन्होंने कहा कि एयर इंडिया का पुनरुद्धार लगभग पांच से दस वर्षों की यात्रा है। जब टाटा समूह ने वर्ष 2022 में एयरलाइन का अधिग्रहण किया था, तब कंपनी कई परिचालन और संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही थी। इन चुनौतियों में पुराने सिस्टम और प्रक्रियाओं का आधुनिकीकरण, विमान बेड़े का नवीनीकरण, तकनीकी विशेषज्ञों की उपलब्धता बढ़ाना, संगठनात्मक संस्कृति में सुधार और वैश्विक स्तर की परिचालन क्षमता विकसित करना शामिल है।

    चेयरमैन ने यह भी संकेत दिया कि विमानों के पुर्जों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में लंबे समय से बनी हुई बाधाओं ने भी सुधार प्रक्रिया की गति को प्रभावित किया है। इसके बावजूद कंपनी अपने बेड़े के विस्तार, सेवा गुणवत्ता में सुधार और परिचालन दक्षता बढ़ाने की दिशा में लगातार निवेश कर रही है।

    वित्तीय परिणाम यह दर्शाते हैं कि एयर इंडिया का पुनर्गठन अभी शुरुआती चरणों से आगे बढ़ते हुए एक लंबी रणनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। टाटा समूह एयरलाइन को प्रतिस्पर्धी और वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाने के उद्देश्य से लगातार निवेश कर रहा है। आने वाले वर्षों में आधुनिकीकरण, परिचालन सुधार और सेवा विस्तार की योजनाओं का प्रभाव कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन पर दिखाई देने की उम्मीद की जा रही है।

  • सोना और चांदी कमजोर रुख के साथ खुले, निवेशकों की सतर्कता के बीच दोनों धातुओं के भाव लुढ़के

    सोना और चांदी कमजोर रुख के साथ खुले, निवेशकों की सतर्कता के बीच दोनों धातुओं के भाव लुढ़के

    नई दिल्ली । मंगलवार को घरेलू सर्राफा और वायदा बाजार में सोना तथा चांदी दोनों कीमती धातुओं की कीमतों की शुरुआत गिरावट के साथ हुई। वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों और अमेरिकी केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति बैठक से पहले निवेशकों के सतर्क रुख का असर भारतीय बाजार पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। कारोबार की शुरुआत से ही दोनों धातुओं में बिकवाली का दबाव बना रहा, जिसके कारण कीमतों में उल्लेखनीय कमजोरी दर्ज की गई।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोने के 5 अगस्त 2026 डिलीवरी वाले वायदा अनुबंध की शुरुआत पिछले कारोबारी सत्र के बंद भाव 1,43,063 रुपये प्रति 10 ग्राम की तुलना में 1,42,353 रुपये प्रति 10 ग्राम पर हुई। शुरुआती कारोबार के दौरान सोने की कीमतों में लगातार दबाव बना रहा और सुबह लगभग 10 बजे तक यह 1,129 रुपये यानी 0.79 प्रतिशत की गिरावट के साथ 1,41,934 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर कारोबार करता देखा गया।

    कारोबार के दौरान सोने ने 1,41,808 रुपये प्रति 10 ग्राम का निचला स्तर भी छुआ, जबकि दिन का उच्चतम स्तर 1,42,353 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया। यह संकेत देता है कि बाजार में खरीदारी की तुलना में बिकवाली का दबाव अधिक बना रहा और निवेशकों ने फिलहाल सतर्क रणनीति अपनाई।

    चांदी की कीमतों में भी इसी तरह की कमजोरी देखने को मिली। एमसीएक्स पर 4 सितंबर 2026 डिलीवरी वाले चांदी के वायदा अनुबंध की शुरुआत पिछले बंद भाव 2,21,173 रुपये प्रति किलोग्राम के मुकाबले 2,20,555 रुपये प्रति किलोग्राम पर हुई। शुरुआती कारोबार में गिरावट और तेज हुई तथा सुबह तक चांदी का भाव 3,940 रुपये यानी करीब 1.78 प्रतिशत टूटकर 2,17,233 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया।

    दिन के शुरुआती कारोबार के दौरान चांदी ने 2,16,592 रुपये प्रति किलोग्राम का न्यूनतम स्तर दर्ज किया, जबकि इसका उच्चतम स्तर 2,20,555 रुपये प्रति किलोग्राम रहा। इससे स्पष्ट है कि निवेशकों की सतर्कता का असर चांदी के बाजार पर भी समान रूप से दिखाई दिया।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कीमती धातुओं का रुख कमजोर रहा। वैश्विक कारोबार के दौरान सोने की कीमत लगभग 0.76 प्रतिशत गिरकर 4,045 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच गई, जबकि चांदी में 2.06 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और इसका भाव लगभग 57.53 डॉलर प्रति औंस रहा। अंतरराष्ट्रीय बाजार की यह कमजोरी भारतीय बाजार के लिए भी दबाव का प्रमुख कारण बनी।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की दो दिवसीय बैठक शुरू होने से पहले निवेशक किसी बड़े निवेश निर्णय से बच रहे हैं। बैठक के नतीजे और ब्याज दरों पर आने वाला फैसला वैश्विक वित्तीय बाजारों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसी वजह से सोना और चांदी जैसे सुरक्षित निवेश विकल्पों में फिलहाल सीमित गतिविधि देखने को मिल रही है।

    विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने तथा हालिया महंगाई और रोजगार से जुड़े आर्थिक आंकड़ों ने यह संभावना मजबूत की है कि फेडरल रिजर्व अपनी जुलाई बैठक में ब्याज दरों को यथावत रख सकता है। हालांकि तेल की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी भविष्य में महंगाई पर दबाव बढ़ा सकती है, लेकिन फिलहाल बाजार की नजर पूरी तरह फेड के फैसले पर टिकी हुई है। ऐसे में आने वाले दिनों में सोना और चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना बनी हुई है।

  • भारतीय शेयर बाजार ने सपाट रुख के साथ की शुरुआत, आईटी सेक्टर में खरीदारी से बाजार को मिला सहारा

    भारतीय शेयर बाजार ने सपाट रुख के साथ की शुरुआत, आईटी सेक्टर में खरीदारी से बाजार को मिला सहारा

    नई दिल्ली । सप्ताह के दूसरे कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार ने लगभग सपाट रुख के साथ कारोबार की शुरुआत की। शुरुआती सत्र में सेंसेक्स और निफ्टी सीमित बढ़त के साथ कारोबार करते दिखाई दिए। बाजार में निवेशकों का रुझान संतुलित रहा, जबकि आईटी क्षेत्र के शेयरों में अच्छी खरीदारी ने प्रमुख सूचकांकों को शुरुआती समर्थन प्रदान किया। दूसरी ओर, ऊर्जा, रक्षा और सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े कुछ प्रमुख सेक्टरों में दबाव भी देखने को मिला।

    कारोबार की शुरुआत में सेंसेक्स करीब 32 अंकों की मामूली बढ़त के साथ 76,861 के स्तर पर पहुंच गया, जबकि निफ्टी भी लगभग 6 अंकों की बढ़त के साथ 24,002 के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया। शुरुआती कारोबार से संकेत मिला कि निवेशक फिलहाल बड़े फैसले लेने के बजाय चुनिंदा सेक्टरों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और बाजार सीमित दायरे में बना हुआ है।

    आईटी सेक्टर ने शुरुआती कारोबार में सबसे मजबूत प्रदर्शन किया। निफ्टी आईटी सूचकांक दो प्रतिशत से अधिक की बढ़त के साथ सबसे अधिक लाभ दर्ज करने वाला सेक्टर रहा। इसके अलावा रियल्टी, एफएमसीजी, मीडिया, सर्विसेज, हेल्थकेयर और फार्मा से जुड़े शेयरों में भी सकारात्मक रुख दिखाई दिया। इन क्षेत्रों में खरीदारी से बाजार को स्थिरता मिली और प्रमुख सूचकांक शुरुआती बढ़त बनाए रखने में सफल रहे।

    इसके विपरीत रक्षा, ऊर्जा, सार्वजनिक उपक्रम, पीएसयू बैंक, मैन्युफैक्चरिंग, कमोडिटी, इंफ्रास्ट्रक्चर, मेटल और ऑटो सेक्टर के शेयरों में दबाव देखने को मिला। इन क्षेत्रों में बिकवाली के कारण बाजार की तेजी सीमित रही और निवेशकों ने सतर्कता के साथ कारोबार किया। इससे स्पष्ट हुआ कि विभिन्न सेक्टरों में निवेशकों का रुख फिलहाल एक समान नहीं है।

    लार्जकैप कंपनियों के साथ-साथ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी सीमित दायरे में कारोबार देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप 100 सूचकांक मामूली बढ़त के साथ कारोबार करता रहा, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 में हल्की कमजोरी दर्ज की गई। इससे संकेत मिला कि व्यापक बाजार में भी निवेशकों की गतिविधि संतुलित बनी हुई है और फिलहाल बड़े उतार-चढ़ाव देखने को नहीं मिल रहे हैं।

    सेंसेक्स की प्रमुख कंपनियों में टीसीएस, टेक महिंद्रा, इन्फोसिस, एचसीएल टेक, हिंदुस्तान यूनिलीवर, एशियन पेंट्स, सन फार्मा, इंडिगो, आईटीसी, अल्ट्राटेक सीमेंट, एलएंडटी और बजाज फिनसर्व के शेयरों में बढ़त दर्ज की गई। वहीं भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, एनटीपीसी, पावर ग्रिड, एसबीआई, टाटा स्टील, टाइटन, भारती एयरटेल, ट्रेंट, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक और महिंद्रा एंड महिंद्रा के शेयरों में शुरुआती कमजोरी देखी गई।

    वैश्विक बाजारों का रुख भी मिश्रित रहा। एशियाई बाजारों में टोक्यो, शंघाई, हांगकांग और सोल के प्रमुख सूचकांक दबाव में कारोबार करते दिखाई दिए, जबकि अमेरिकी शेयर बाजार पिछले कारोबारी सत्र में बढ़त के साथ बंद हुए थे। अंतरराष्ट्रीय संकेतों का असर भारतीय बाजार पर सीमित रूप से दिखाई दिया और निवेशकों ने घरेलू कारकों पर अधिक ध्यान दिया।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल बाजार में सकारात्मक माहौल बना हुआ है, लेकिन बीच-बीच में मुनाफावसूली और सीमित दायरे का कारोबार जारी रह सकता है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में नरमी भी निवेशकों के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के बाद ब्रेंट क्रूड 85 डॉलर प्रति बैरल से नीचे बना हुआ है, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड लगभग 82 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। कम होती तेल कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था और बाजार की धारणा को आगे भी समर्थन दे सकती हैं।

  • टाटा संस के रेवन्यू में 9.1% का उछाल…. एक शेयर पर 1,10,717 रुपये डिविडेंड देने की सिफारिश

    टाटा संस के रेवन्यू में 9.1% का उछाल…. एक शेयर पर 1,10,717 रुपये डिविडेंड देने की सिफारिश


    नई दिल्ली।
    टाटा संस (Tata Sons) के चेयरमैन एन चंद्रशेखर (Chairman N. Chandrasekaran) ने बताया कि टाटा संस का रेवन्यू (Tata Sons Revenue) बीते वित्त वर्ष 9.1 प्रतिशत बढ़कर 42,367 करोड़ रुपये रहा है। वित्त वर्ष 2025 में टाटा संस का रेवन्यू (Tata Sons Revenue) 38835 करोड़ रुपये रहा था। वहीं, टैक्स भुगतान के बाद प्रॉफिट 21.8 प्रतिशत बढ़कर 31,961 करोड़ रुपये हो गया। इससे पहले के फाइनेंशियल ईयर में कंपनी का प्रॉफिट 26232 करोड़ रुपये था। कंपनी के निदेशक मंडल ने 1,10,717 रुपये प्रति शेयर के डिविडेंड की सिफारिश की है। यह शेयरधारकों की मंजूरी पर निर्भर है। बता दें, टाटा संस की शेयर बाजारों में लिस्टिंग नहीं हुई है।

    एन. चंद्रशेखरन ने कहा है कि टाटा ग्रुप का वित्तीय प्रदर्शन बीते वित्त वर्ष 2025-26 में मजबूत रहा है। समूह का कुल रेवन्यू 7.8 प्रतिशत बढ़कर 16,24,030 करोड़ रुपये और नेट प्रॉफिट 51.9 प्रतिशत बढ़कर 1,70,525 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। चंद्रशेखरन ने कंपनी की सालाना रिपोर्ट 2025-26 में शेयरधारकों को संबोधित करते कहा कि वर्ष 2025-26 वैश्विक संघर्षों और ग्लोबल स्टेज पर एआई में अभूतपूर्व निवेश का साल रहा। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद टाटा समूह ने वित्तीय मोर्चे पर मजबूत प्रदर्शन किया।

    उन्होंने कहा, ”एकीकृत स्तर पर वित्त वर्ष 2025-26 में टाटा समूह का रेवन्यू 7.8 प्रतिशत बढ़कर 16,24,030 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जबकि शुद्ध लाभ 51.9 प्रतिशत बढ़कर 1,70,525 करोड़ रुपये हो गया।” वित्त वर्ष 2025-26 में टाटा समूह का राजस्व वित्त वर्ष 2019-20 की तुलना में 2.1 गुना और लाभ 5.4 गुना हो गया है। यह समूह की विभिन्न कंपनियों में किए गए सुधारों का परिणाम है।

    टाटा के लिए इस समय सबसे बड़ी चिंता एयर इंडिया है। कंपनी का घाटा वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर 22,238 करोड़ रुपये हो गया है। एक साल पहले इसी वित्त वर्ष के दौरान कंपनी का घाटा 10,859 करोड़ रुपये रहा था। चंद्रशेखरन ने कहा कि एयर इंडिया के लिए यह साल काफी संघर्षपूर्ण रहा। वो कहते हैं कि तेल की कीमतों में उछाल, कई रूट्स का बंद होना, AI171 का क्रैश होना, पश्चिम एशिया में तनाव का बुरा असर पड़ा है। जिसकी वजह से एयर इंडिया को काफी नुकसान हुआ है। वो कहते हैं इतिहास की हर बड़ी एयरलाइन को खड़ा होने में दशकों का समय लगा है….। एयर इंडिया के परिवर्तन की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

  • E20 पेट्रोल की कीमत पर बड़ा खुलासा किसानों से लेकर कच्चे तेल तक समझिए क्यों नहीं घट रहे पेट्रोल के दाम

    E20 पेट्रोल की कीमत पर बड़ा खुलासा किसानों से लेकर कच्चे तेल तक समझिए क्यों नहीं घट रहे पेट्रोल के दाम


    नई दिल्ली । देशभर में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण यानी E20 ईंधन की आपूर्ति तेज़ी से बढ़ाई जा रही है। सरकार का लक्ष्य आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना और घरेलू स्तर पर तैयार होने वाले जैव ईंधन को बढ़ावा देना है। हालांकि आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब एथेनॉल भारत में ही तैयार होता है तो फिर E20 पेट्रोल सामान्य पेट्रोल से सस्ता क्यों नहीं मिलता। अब सरकार ने संसद में इस सवाल का विस्तृत जवाब देते हुए इसकी असली वजह स्पष्ट कर दी है।

    सरकार के मुताबिक मौजूदा परिस्थितियों में एथेनॉल कोई बहुत सस्ता ईंधन नहीं है। एथेनॉल का उत्पादन किसानों से खरीदे गए मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से किया जाता है। किसानों को उचित मूल्य देने की नीति के तहत सरकार एथेनॉल की खरीद तय दरों पर करती है। इसके अलावा परिवहन भंडारण और कर जैसे अतिरिक्त खर्च भी इसमें शामिल होते हैं। यही कारण है कि E20 पेट्रोल तैयार करने की कुल लागत सामान्य पेट्रोल के बराबर या कई बार उससे अधिक हो जाती है।

    सरकार ने यह भी बताया कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत सामान्य स्तर पर रहती है तब एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की लागत में कोई बड़ी कमी नहीं आती। यदि भविष्य में कच्चे तेल की कीमतें बहुत अधिक बढ़ती हैं तब एथेनॉल मिश्रण आर्थिक रूप से अधिक लाभदायक साबित हो सकता है। इसलिए फिलहाल उपभोक्ताओं को कीमत के रूप में सीधी राहत नहीं मिल पा रही है।

    हालांकि सरकार का कहना है कि E20 पेट्रोल का सबसे बड़ा फायदा कीमत नहीं बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा है। पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का मतलब है कि ईंधन का एक बड़ा हिस्सा अब देश में ही तैयार हो रहा है। इससे विदेशी कच्चे तेल पर निर्भरता कम होती है और वैश्विक संकट या युद्ध जैसी परिस्थितियों में ईंधन आपूर्ति पर असर कम पड़ता है। साथ ही किसानों को उनकी फसल का बेहतर बाजार मिलता है जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि पेट्रोल पंपों पर अलग से शुद्ध पेट्रोल E10 और E20 उपलब्ध कराना फिलहाल व्यावहारिक नहीं है। देश में एक लाख से अधिक पेट्रोल पंप हैं और हर स्थान पर तीन तरह का ईंधन रखने के लिए अलग भंडारण और वितरण व्यवस्था की जरूरत होगी। इससे लागत काफी बढ़ जाएगी और सप्लाई चेन को संभालना भी कठिन हो जाएगा। इसके अलावा एथेनॉल उत्पादन और वितरण नेटवर्क पर पहले ही बड़े पैमाने पर निवेश किया जा चुका है।

    माइलेज को लेकर भी सरकार ने स्थिति साफ की है। सरकार के अनुसार E20 ईंधन के उपयोग से कुछ वाहनों में लगभग तीन से पांच प्रतिशत तक माइलेज कम हो सकता है। हालांकि वास्तविक माइलेज केवल ईंधन पर निर्भर नहीं करता बल्कि वाहन की स्थिति ड्राइविंग शैली टायर का दबाव समय पर सर्विसिंग और एयर कंडीशनर के उपयोग जैसे कई अन्य कारकों से भी प्रभावित होता है।

    दुनिया के कई विकसित देशों में एथेनॉल मिश्रित ईंधन का सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है। भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है ताकि आयातित तेल पर खर्च कम हो और स्वदेशी जैव ईंधन के जरिए ऊर्जा क्षेत्र को अधिक आत्मनिर्भर बनाया जा सके। आने वाले समय में एथेनॉल उत्पादन बढ़ने और तकनीक बेहतर होने के साथ इसकी लागत में भी कमी आने की संभावना जताई जा रही है।

  • सप्ताह के दूसरे कारोबारी दिन बाजार में बन सकते हैं नए मौके निवेश से पहले जान लें एक्सपर्ट्स की अहम सलाह

    सप्ताह के दूसरे कारोबारी दिन बाजार में बन सकते हैं नए मौके निवेश से पहले जान लें एक्सपर्ट्स की अहम सलाह


    नई दिल्ली। सप्ताह के दूसरे कारोबारी दिन मंगलवार को शेयर बाजार की दिशा कई महत्वपूर्ण घरेलू और वैश्विक संकेतों से तय हो सकती है। निवेशकों की नजर विदेशी बाजारों की चाल कच्चे तेल की कीमतों विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीद बिक्री और कंपनियों के तिमाही नतीजों पर बनी रहेगी। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजारों से सकारात्मक संकेत मिलते हैं तो भारतीय शेयर बाजार में अच्छी शुरुआत देखने को मिल सकती है। वहीं वैश्विक स्तर पर किसी भी तरह की अनिश्चितता का असर घरेलू बाजार पर भी दिखाई दे सकता है।

    हाल के दिनों में भारतीय शेयर बाजार में उतार चढ़ाव का दौर बना हुआ है। ऐसे माहौल में निवेशकों को जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय सोच समझकर निवेश करना चाहिए। खासतौर पर छोटे और नए निवेशकों के लिए यह समय धैर्य बनाए रखने का है। मजबूत कंपनियों के शेयरों में लंबी अवधि के नजरिए से निवेश करना अपेक्षाकृत बेहतर रणनीति मानी जा रही है।

    मंगलवार के कारोबार में बैंकिंग आईटी ऑटो एफएमसीजी फार्मा और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के शेयरों पर निवेशकों की विशेष नजर रह सकती है। यदि इन क्षेत्रों की बड़ी कंपनियों के तिमाही नतीजे उम्मीद से बेहतर आते हैं तो बाजार को मजबूती मिल सकती है। दूसरी ओर कमजोर नतीजे या नकारात्मक वैश्विक संकेत बाजार में दबाव भी बढ़ा सकते हैं।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों और घरेलू संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाती हैं। यदि विदेशी निवेशकों की ओर से लगातार खरीदारी जारी रहती है तो बाजार में सकारात्मक माहौल बन सकता है। वहीं लगातार बिकवाली होने पर प्रमुख सूचकांकों पर दबाव देखने को मिल सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों को केवल अफवाहों या सोशल मीडिया पर चल रही अपुष्ट जानकारियों के आधार पर निवेश नहीं करना चाहिए। किसी भी शेयर में निवेश करने से पहले कंपनी की वित्तीय स्थिति कारोबार की संभावनाओं और बाजार की मौजूदा परिस्थितियों का आकलन करना जरूरी है। जोखिम को कम करने के लिए निवेश को अलग अलग सेक्टरों में बांटना भी एक बेहतर रणनीति मानी जाती है।

    वैश्विक स्तर पर अमेरिकी बाजारों की चाल एशियाई बाजारों का प्रदर्शन डॉलर की मजबूती या कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतें भी भारतीय बाजार को प्रभावित कर सकती हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में स्थिरता बनी रहती है तो घरेलू निवेशकों का भरोसा भी मजबूत हो सकता है। इसके अलावा रुपये की स्थिति भी विदेशी निवेश के प्रवाह को प्रभावित करती है।

    बाजार जानकारों का मानना है कि जिन निवेशकों का लक्ष्य लंबी अवधि का है उन्हें रोजाना होने वाले उतार चढ़ाव से घबराने की जरूरत नहीं है। अच्छी गुणवत्ता वाली कंपनियों में चरणबद्ध तरीके से निवेश करना लंबे समय में बेहतर परिणाम दे सकता है। वहीं अल्पकालिक कारोबार करने वाले निवेशकों को स्टॉप लॉस और जोखिम प्रबंधन के नियमों का पालन करना चाहिए।

    कुल मिलाकर मंगलवार का कारोबार कई महत्वपूर्ण संकेतों पर निर्भर रहेगा। बाजार में अवसर भी बन सकते हैं और उतार चढ़ाव भी देखने को मिल सकता है। ऐसे में निवेशकों को संयम धैर्य और सही रणनीति के साथ आगे बढ़ना चाहिए ताकि वे बदलते बाजार माहौल में बेहतर निवेश निर्णय ले सकें।