Category: Economy

  • किसान सारथी बना किसानों का डिजिटल साथी, 13 भाषाओं में विशेषज्ञ सलाह और 610 सरकारी योजनाओं की जानकारी

    किसान सारथी बना किसानों का डिजिटल साथी, 13 भाषाओं में विशेषज्ञ सलाह और 610 सरकारी योजनाओं की जानकारी

    नई दिल्ली। देश में कृषि क्षेत्र को डिजिटल तकनीक से जोड़ने की दिशा में किसान सारथी प्लेटफॉर्म तेजी से किसानों का भरोसेमंद माध्यम बनकर उभरा है। केंद्र सरकार के अनुसार इस मंच से अब तक करीब 2.95 करोड़ किसान जुड़ चुके हैं, जिनमें 56 लाख से अधिक महिला किसान भी शामिल हैं। कृषि विशेषज्ञों से सीधे संवाद, स्थानीय भाषा में सलाह और सरकारी योजनाओं की जानकारी जैसी सुविधाओं के कारण यह प्लेटफॉर्म किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

    सरकार ने बताया कि इस डिजिटल कृषि परामर्श मंच की शुरुआत वर्ष 2021 में किसानों को एकीकृत और वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। वर्तमान में इस प्लेटफॉर्म से 4,767 कृषि वैज्ञानिक और 113 कृषि अनुसंधान संस्थान जुड़े हुए हैं। इन विशेषज्ञों के माध्यम से किसानों की समस्याओं का समाधान किया जा रहा है और खेती से जुड़ी नई तकनीकों की जानकारी सीधे खेत तक पहुंचाई जा रही है।

    अब तक इस मंच पर 19 लाख से अधिक कृषि संबंधी सवालों का समाधान किया जा चुका है। इसके अलावा विभिन्न फसलों और कृषि गतिविधियों से जुड़ी 21 हजार से अधिक वैज्ञानिक सलाह भी किसानों तक पहुंचाई गई हैं। इन सलाहों का उद्देश्य किसानों को मौसम, फसल प्रबंधन, कीट नियंत्रण, उर्वरक उपयोग और आधुनिक कृषि तकनीकों के बारे में समय पर जानकारी देना है।

    अधिकांश किसानों ने अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से इस प्लेटफॉर्म पर पंजीकरण कराया है। इसके अलावा कॉल सेंटर, मोबाइल एप, वेब पोर्टल और कॉमन सर्विस सेंटर के जरिए भी बड़ी संख्या में किसान इससे जुड़े हैं। सरकार का कहना है कि इस बहु-स्तरीय व्यवस्था से दूर-दराज के क्षेत्रों के किसानों को भी डिजिटल सेवाओं का लाभ मिल रहा है।

    किसान सारथी की पहुंच देश के 37 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, 768 जिलों तथा 6.63 लाख से अधिक गांवों तक हो चुकी है। यह प्लेटफॉर्म आधुनिक इंटरैक्टिव सूचना प्रणाली के माध्यम से किसानों और कृषि विशेषज्ञों के बीच दो-तरफा संवाद स्थापित करता है। इससे किसानों को अपनी समस्याओं का समाधान सीधे विशेषज्ञों से प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

    इस मंच के जरिए किसानों को केवल कृषि सलाह ही नहीं बल्कि मौसम पूर्वानुमान, सरकारी योजनाओं की जानकारी, कृषि अनुसंधान से जुड़े नवीनतम अपडेट और विशेषज्ञों से लाइव परामर्श जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। प्लेटफॉर्म 13 क्षेत्रीय भाषाओं में संवाद की सुविधा देता है, जिससे अलग-अलग राज्यों के किसान अपनी भाषा में सवाल पूछकर समाधान प्राप्त कर सकते हैं।

    सरकार के अनुसार किसान सारथी को कई राष्ट्रीय सेवाओं के साथ एकीकृत किया गया है। इसके माध्यम से किसानों को 610 सरकारी योजनाओं की जानकारी उपलब्ध होती है, जिनमें केंद्र सरकार की 102 प्रमुख योजनाएं भी शामिल हैं। इसके अलावा यह मंच अनाज, दलहन, तिलहन, बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन, पोल्ट्री और अन्य कृषि आधारित गतिविधियों से जुड़ी उपयोगी जानकारी भी प्रदान करता है।

    सरकार का मानना है कि किसान सारथी प्लेटफॉर्म कृषि अनुसंधान और किसानों के बीच की दूरी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। डिजिटल तकनीक के माध्यम से वैज्ञानिक सलाह को सीधे किसानों तक पहुंचाने से खेती अधिक वैज्ञानिक, उत्पादक और लाभकारी बनने की दिशा में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।

  • होर्मुज संकट के दौरान भारत की रणनीति रही असरदार, तेल आपूर्ति और कीमतों को सामान्य रखने में मिली सफलता

    होर्मुज संकट के दौरान भारत की रणनीति रही असरदार, तेल आपूर्ति और कीमतों को सामान्य रखने में मिली सफलता

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े संकट के दौरान भारत ने ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तेजी से रणनीतिक कदम उठाए। विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर लिए गए फैसलों, सक्रिय ऊर्जा कूटनीति और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की उपलब्धता के कारण देश में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की आपूर्ति सामान्य बनी रही। इससे वैश्विक संकट के बावजूद घरेलू बाजार पर सीमित प्रभाव पड़ा।

    ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि संकट की शुरुआत के साथ ही भारत ने पारंपरिक सहयोगी देशों के साथ समन्वय और मजबूत किया। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और कतर जैसे प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता देशों के साथ पहले से स्थापित रणनीतिक संबंध इस दौरान काफी उपयोगी साबित हुए। उच्च स्तर पर लगातार संपर्क बनाए रखने से कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति बाधित नहीं हुई और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिली।

    भारत ने केवल खाड़ी देशों पर निर्भर रहने के बजाय ऊर्जा आयात के स्रोतों का भी विस्तार किया। रूस, अमेरिका, वेनेजुएला, नाइजीरिया, गैबॉन और गुयाना जैसे देशों से भी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई गई। इस रणनीति का उद्देश्य किसी एक क्षेत्र में संकट की स्थिति पैदा होने पर वैकल्पिक स्रोतों के माध्यम से आपूर्ति बनाए रखना था। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा आयात का विविधीकरण भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

    वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बावजूद भारत में ईंधन की कीमतों को अपेक्षाकृत नियंत्रित रखा गया। इसके लिए सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने समन्वित रणनीति अपनाई। बढ़ी हुई लागत का एक बड़ा हिस्सा स्वयं वहन किया गया, जिससे आम उपभोक्ताओं पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ा। साथ ही करों में राहत और मूल्य प्रबंधन के उपायों ने भी बाजार को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    सरकार ने घरेलू स्तर पर भी ऊर्जा प्रबंधन को प्राथमिकता दी। एलपीजी के घरेलू उत्पादन में वृद्धि, ईंधन वितरण प्रणाली की लगातार निगरानी और आवश्यक क्षेत्रों को प्राथमिकता के आधार पर आपूर्ति सुनिश्चित करने जैसे कदम उठाए गए। इससे देशभर में किसी बड़े ईंधन संकट की स्थिति नहीं बनी और आवश्यक सेवाओं पर भी इसका प्रभाव सीमित रहा।

    विशेषज्ञों का कहना है कि कई देशों में ऊर्जा संकट के कारण ईंधन की कमी, लंबी कतारें और आवश्यक सेवाओं पर असर देखने को मिला, लेकिन भारत अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रहा। इसका प्रमुख कारण समय पर लिए गए नीतिगत फैसले, मजबूत अंतरराष्ट्रीय साझेदारी और संकट प्रबंधन की प्रभावी रणनीति रही। इससे न केवल ऊर्जा आपूर्ति सुचारु बनी रही बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी निरंतर गति मिलती रही।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि भविष्य में भी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर दीर्घकालिक रणनीति अपनाना आवश्यक होगा। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का विकास, आयात के विविध विकल्प और मजबूत अंतरराष्ट्रीय सहयोग भारत को संभावित वैश्विक संकटों से सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। पश्चिम एशिया संकट के दौरान अपनाई गई रणनीति को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

  • बीपीसीएल का बड़ा रणनीतिक निवेश, 85 करोड़ रुपये में खरीदी 40% हिस्सेदारी, इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबार को मिलेगी नई रफ्तार

    बीपीसीएल का बड़ा रणनीतिक निवेश, 85 करोड़ रुपये में खरीदी 40% हिस्सेदारी, इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबार को मिलेगी नई रफ्तार

    नई दिल्ली। सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख तेल एवं ऊर्जा कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) ने अपने कारोबार के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए टिकी टार एंड शेल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (टीटीएसआईपीएल) में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने का फैसला किया है। इस रणनीतिक निवेश के तहत कंपनी करीब 85 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। इस अधिग्रहण का उद्देश्य वैल्यू-एडेड बिटुमिन कारोबार में बीपीसीएल की हिस्सेदारी बढ़ाना और देश में तेजी से बढ़ रहे इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की संभावनाओं का लाभ उठाना है।

    कंपनी के अनुसार यह निवेश सामान्य नियामकीय और व्यावसायिक शर्तों के पूरा होने के बाद निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरा होने की उम्मीद है। इस सौदे के जरिए बीपीसीएल को टीटीएसआईपीएल के उत्पाद पोर्टफोलियो, तकनीकी विशेषज्ञता और बाजार नेटवर्क का लाभ मिलेगा। इससे कंपनी विशेष प्रकार के बिटुमिन उत्पादों की बढ़ती मांग को बेहतर तरीके से पूरा कर सकेगी।

    देशभर में सड़क, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और अन्य आधारभूत ढांचा परियोजनाओं में लगातार निवेश बढ़ रहा है। ऐसे में वैल्यू-एडेड बिटुमिन की मांग भी तेजी से बढ़ने की संभावना है। बीपीसीएल का मानना है कि यह निवेश उसे इस क्षेत्र में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत करने के साथ भविष्य के विकास अवसरों का लाभ उठाने में मदद करेगा।

    टीटीएसआईपीएल विशेष बिटुमिन उत्पादों के निर्माण और आपूर्ति से जुड़ी कंपनी है। कंपनी की अधिकृत शेयर पूंजी 37 करोड़ रुपये है, जबकि इसकी चुकता पूंजी लगभग 36 करोड़ रुपये बताई गई है। बीपीसीएल का मानना है कि इस साझेदारी से दोनों कंपनियों की विशेषज्ञता का बेहतर उपयोग होगा और नए उत्पादों तथा बाजार विस्तार के अवसर भी बढ़ेंगे।

    वित्तीय प्रदर्शन के मोर्चे पर भी बीपीसीएल ने हालिया तिमाही में मजबूत परिणाम दर्ज किए हैं। कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में 3,191 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया। इस अवधि में कंपनी की कुल आय लगभग 1.18 लाख करोड़ रुपये रही, जबकि ईबीआईटीडीए 10,061 करोड़ रुपये दर्ज किया गया। यह प्रदर्शन कंपनी की मजबूत परिचालन क्षमता और स्थिर व्यावसायिक गतिविधियों को दर्शाता है।

    ईंधन बिक्री के आंकड़ों में भी सकारात्मक रुझान देखने को मिला है। मई 2026 के दौरान दिल्ली में पेट्रोल की बिक्री में पिछले वर्ष की तुलना में वृद्धि दर्ज की गई। इसी अवधि में डीजल की मांग भी बढ़ी, जिससे स्पष्ट होता है कि परिवहन और औद्योगिक गतिविधियों में निरंतर सुधार हो रहा है। यह वृद्धि कंपनी के खुदरा कारोबार के लिए भी सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।

    शेयर बाजार में हालांकि कारोबारी सत्र के दौरान बीपीसीएल के शेयरों में हल्की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन लंबे समय की बात करें तो कंपनी का प्रदर्शन निवेशकों के लिए सकारात्मक रहा है। पिछले पांच वर्षों में कंपनी के शेयरों ने उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की है। विशेषज्ञों का मानना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में बढ़ते निवेश और वैल्यू-एडेड उत्पादों पर फोकस से बीपीसीएल को भविष्य में नए कारोबारी अवसर मिल सकते हैं, जिससे कंपनी की दीर्घकालिक विकास रणनीति को मजबूती मिलेगी।

  • PM मोदी की अपील का असर…. लगातार गिरता जा रहा सोने-चांदी के दाम… जानें आज के रेट

    PM मोदी की अपील का असर…. लगातार गिरता जा रहा सोने-चांदी के दाम… जानें आज के रेट


    नई दिल्ली।
    सोने की कीमत (Gold Rate) बीते लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है. जो सोना कभी महंगाई के नए रिकॉर्ड (New records inflation) बना रहा था, आज वो गिरता ही जा रहा है. 29 जून को फिर से सोने में बड़ी गिरावट देखने को मिली है. सोमवार को ग्लोबल मार्केट (Global Market) में कॉमेक्स गोल्ड (COMEX Gold) की कीमत में 27 डॉलर से अधिक की गिरावट लौटी है. इंटरनेशनल मार्केट में कॉमेक्स (COMEX) गोल्ड सोमवार, 29 जून को 27.75 डॉलर की गिरावट के साथ 4,059.26 डॉलर प्रति औंस पर ट्रेड कर रहा है।

    सिर्फ अंतरर्राष्ट्रीय बाजार ही नहीं, घरेलू बाजार में भी सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली है. 29 जनवरी 2026 को 1.79 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के अपने ऑल टाइम हाई पर बिकने वाला सोना आज 1.36 लाख रुपये पर गिर चुका है. अगर चांदी की बात करें, तो इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार 29 जनवरी को 1 किलो चांदी 3.86 लाख रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच चुकी थी. आज वो गिरते-गिरते 2.15 लाख पर आ चुकी है. यानी चांदी की कीमत अपने ऑल टाइम हाई से 1.69 लाख रुपये तक सस्ती हो चुकी है. मई से जून के बीच सोने की कीमत में 13 हजार से अधिक की गिरावट आई है. वहीं चांदी 46000 रुपये तक गिर गई।


    24 कैरेट से लेकर 18 कैरेट तक सोने की कीमत

    24 कैरेट शुद्धता वाले सोने की कीमत 1,39,461 रुपये प्रति 10 ग्राम
    22 कैरेट शुद्धता वाले सोने की कीमत 1,28,260 रुपये प्रति 10 ग्राम.
    18 कैरेट शुद्धता वाले सोने की कीमत 1,05,017 रुपये प्रति 10 ग्राम.

    PM ने सोना-चांदी नहीं खरीदने की अपील की.
    10 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने देशवासियों से अपील की कि वो अगले 1 साल तक सोना ना खरीदें. दरअसर भारत भारी मात्रा में सोने का आयात करता है. सोने के आयात पर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च होती है. जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव आता है. कच्चे तेल की खरीद की वजह से पहले से ही भारतीय का फॉरैक्स रिजर्व प्रेशर में है. ऐसे में बढ़ते पश्चिम एशिया के तनाव, तेल की कच्ची कीमत, विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए प्रधानमंत्री ने सोना ना खरीदने की अपील की. विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सोना ना खरीदने की पीएम मोदी की अपील काम आ गई. जिसके बाद से सोने की कीमतों में रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई है।


    क्यों लगातार गिर रहा है सोना?

    पीएम मोदी की अपील के साथ-साथ सरकार ने सोने के आयात पर शुल्क को 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया. सोने का आयात कम करने के लिए कई जरूरी कदम उठाए गए. जिसका असर सोने की मांग पर दिखा. मांग में कमी के अलावा सोने में मुनाफावसूली , पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच बातचीत की उम्मीद, फेरडल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका, डॉलर इंडेक्स में तेजी से सोने पर दबाव बना रखा है।

  • कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर, जानें क्यों नहीं मिल रही राहत

    कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर, जानें क्यों नहीं मिल रही राहत


    नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम फिलहाल स्थिर बने हुए हैं। ब्रेंट क्रूड की कीमत जहां युद्ध के दौरान करीब 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, वहीं अब यह घटकर लगभग 73 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई है। इसके बावजूद भारत में ईंधन की कीमतों में कोई बड़ी कटौती देखने को नहीं मिल रही है, जबकि पाकिस्तान, भूटान, म्यांमार और नेपाल जैसे देशों में हाल ही में पेट्रोल-डीजल सस्ता हुआ है।

    पड़ोसी देशों में घटे दाम, भारत में स्थिरता

    रिपोर्ट्स के अनुसार, भूटान में पेट्रोल की कीमत लगभग 109.73 रुपये से घटकर 99.94 रुपये प्रति लीटर हो गई है। पाकिस्तान में पेट्रोल 130.82 रुपये से घटकर 101.91 रुपये प्रति लीटर तक आ गया है। वहीं म्यांमार, चीन, नेपाल और श्रीलंका में भी पेट्रोल की कीमतों में कमी दर्ज की गई है।

    डीजल के मामले में भी यही रुझान देखा गया है। पाकिस्तान और चीन में डीजल के दामों में बड़ी गिरावट आई है, जबकि भारत में औसत डीजल कीमत लगभग 98 रुपये प्रति लीटर के आसपास बनी हुई है।

    भारत में क्यों नहीं घट रहे दाम?

    विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुसार नहीं बदलते। इसका एक बड़ा कारण यह है कि जब वैश्विक बाजार में कच्चा तेल महंगा हुआ था, तब सरकारी तेल कंपनियों ने लंबे समय तक कीमतों में वृद्धि नहीं की थी। इस दौरान कंपनियों को भारी नुकसान हुआ, जिसका अनुमान लगभग एक लाख करोड़ रुपये तक लगाया जा रहा है।

    अब जब कच्चे तेल की कीमतें नीचे आई हैं, तो तेल कंपनियां पहले अपने पुराने घाटे की भरपाई कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रक्रिया में दो से तीन महीने का समय लग सकता है, जिसके बाद ही कीमतों में कटौती की संभावना बन सकती है।

    सरकारी नीति और टैक्स का असर

    जानकारों के मुताबिक, कीमतें स्थिर रहने की एक वजह सरकार की कर नीति भी है। चुनावी अवधि के दौरान केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में प्रति लीटर 10 रुपये की कटौती की थी, जिससे आम उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिली थी।

    हालांकि, इससे सरकार के राजस्व पर भी असर पड़ा और अनुमान के मुताबिक करीब एक लाख करोड़ रुपये तक की आय में कमी आई। इसी कारण फिलहाल कीमतों में बड़ी कटौती की संभावना सीमित मानी जा रही है।

    तुरंत राहत की उम्मीद कम

    विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक तेल कंपनियों का पिछला नुकसान पूरी तरह से कवर नहीं हो जाता और वैश्विक बाजार में कीमतें स्थिर नहीं रहतीं, तब तक पेट्रोल-डीजल के दामों में बड़ी गिरावट की संभावना कम है। ऐसे में आम उपभोक्ताओं को फिलहाल कीमतों में राहत के लिए इंतजार करना पड़ सकता है।

  • देश की शीर्ष कंपनियों के मार्केट वैल्यू में भारी उतार-चढ़ाव, ICICI बैंक सबसे आगे, रिलायंस-एचडीएफसी समेत कई दिग्गजों ने बढ़ाया बाजार पूंजीकरण

    देश की शीर्ष कंपनियों के मार्केट वैल्यू में भारी उतार-चढ़ाव, ICICI बैंक सबसे आगे, रिलायंस-एचडीएफसी समेत कई दिग्गजों ने बढ़ाया बाजार पूंजीकरण


    नई दिल्ली ।
    देश के शेयर बाजार में बीते सप्ताह उतार-चढ़ाव के बीच बड़ी कंपनियों के बाजार पूंजीकरण में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला। इस दौरान शीर्ष 10 कंपनियों में से छह कंपनियों ने संयुक्त रूप से 88,678.1 करोड़ रुपए से अधिक की बढ़त दर्ज की, जबकि चार कंपनियों के मार्केटकैप में गिरावट भी सामने आई। बाजार के इस मिश्रित रुझान में आईसीआईसीआई बैंक सबसे बड़ा लाभ हासिल करने वाली कंपनी रही।

    मध्य प्रदेश सहित देशभर के निवेशकों के लिए यह सप्ताह महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि बैंकिंग और फाइनेंशियल सेक्टर की कंपनियों ने मजबूत प्रदर्शन किया, जबकि कुछ टेलीकॉम और आईटी सेक्टर की दिग्गज कंपनियों में दबाव देखने को मिला। आईसीआईसीआई बैंक का मार्केट कैप 29,588.75 करोड़ रुपए बढ़कर 9,95,610.74 करोड़ रुपए तक पहुंच गया, जिससे यह सप्ताह का सबसे बड़ा गेनर बनकर उभरा।

    एचडीएफसी बैंक ने भी मजबूत प्रदर्शन किया और इसका बाजार पूंजीकरण 24,718.3 करोड़ रुपए बढ़कर 12,25,981.44 करोड़ रुपए हो गया। रिलायंस इंडस्ट्रीज के मार्केटकैप में 12,043.96 करोड़ रुपए की वृद्धि दर्ज हुई और इसका कुल मूल्यांकन 17,83,926.92 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। बजाज फाइनेंस ने भी 11,580.28 करोड़ रुपए की बढ़त के साथ 6,10,081.53 करोड़ रुपए का स्तर हासिल किया।

    स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के बाजार पूंजीकरण में 9,322.93 करोड़ रुपए की वृद्धि दर्ज हुई और यह 9,64,738 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। वहीं एलएंडटी ने भी 1,423.88 करोड़ रुपए की हल्की बढ़त के साथ अपना बाजार मूल्यांकन मजबूत किया।

    इसके विपरीत, कुछ बड़ी कंपनियों के मार्केटकैप में गिरावट देखने को मिली। भारती एयरटेल का बाजार पूंजीकरण 35,615.21 करोड़ रुपए घटकर 11,27,348.09 करोड़ रुपए पर आ गया। लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (एलआईसी) में 21,188.74 करोड़ रुपए की गिरावट दर्ज हुई। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) का मार्केटकैप 11,143.71 करोड़ रुपए कम होकर 7,58,206.42 करोड़ रुपए रह गया, जबकि हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (एचयूएल) का मूल्यांकन 5,321.83 करोड़ रुपए घटकर 5,10,624.92 करोड़ रुपए पर पहुंच गया।

    बीते सप्ताह सेंसेक्स में 0.39 प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई और यह 77,100.47 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 0.18 प्रतिशत की मामूली तेजी के साथ 24,056 पर बंद हुआ। बाजार में यह हल्की बढ़त वैश्विक संकेतों और घरेलू निवेशकों की सक्रियता के कारण देखने को मिली।

    आगामी सप्ताह को लेकर बाजार की नजरें कई अहम कारकों पर टिकी रहेंगी। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर चल रही बातचीत निवेशकों के लिए प्रमुख संकेतक होगी। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने संकेत दिए हैं कि दोनों देश एक व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के करीब हैं, जिससे बाजार की दिशा प्रभावित हो सकती है।

    इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की गतिविधियां और घरेलू आर्थिक आंकड़े भी बाजार की चाल तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। कुल मिलाकर आने वाला सप्ताह भारतीय शेयर बाजार के लिए अत्यंत निर्णायक साबित हो सकता है, जिसमें वैश्विक और घरेलू दोनों कारक मिलकर निवेशकों की रणनीति को प्रभावित करेंगे।

  • स्कूली शिक्षा में डिजिटल क्रांति का केंद्र बना ‘दीक्षा’ प्लेटफॉर्म, बहुभाषी और समावेशी लर्निंग सिस्टम को मिला राष्ट्रीय विस्तार

    स्कूली शिक्षा में डिजिटल क्रांति का केंद्र बना ‘दीक्षा’ प्लेटफॉर्म, बहुभाषी और समावेशी लर्निंग सिस्टम को मिला राष्ट्रीय विस्तार

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने कहा है कि स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल परिवर्तन को गति देने वाला ‘दीक्षा’ प्लेटफॉर्म अब देश में ‘वन नेशन, वन डिजिटल प्लेटफॉर्म’ के रूप में एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरा है। यह प्लेटफॉर्म शिक्षा को अधिक सुलभ, समावेशी और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में लगातार विस्तार कर रहा है।

    दीक्षा की शुरुआत वर्ष 2017 में की गई थी और इसे नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) के तहत सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशनल टेक्नोलॉजी (CIET) के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य देशभर के छात्रों और शिक्षकों को एकीकृत डिजिटल लर्निंग इकोसिस्टम उपलब्ध कराना है।

    सरकारी जानकारी के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म कक्षा 1 से 12 तक के लिए व्यापक डिजिटल लर्निंग सपोर्ट प्रदान करता है। इसमें प्रारंभिक साक्षरता और अंक ज्ञान से लेकर वरिष्ठ माध्यमिक स्तर तक की पढ़ाई शामिल है, जिससे विद्यार्थियों को एक समान और संरचित शैक्षिक अनुभव मिल सके।

    दीक्षा को लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा बोर्डों ने अपनाया है। यह प्लेटफॉर्म क्षेत्रीय भाषाओं, पाठ्यक्रम और शिक्षण आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलित किया जा सकता है, जिससे स्थानीय स्तर पर शिक्षा की पहुंच और प्रभावशीलता बढ़ती है।

    इस डिजिटल प्लेटफॉर्म में 2D और 3D एनिमेशन, ऑगमेंटेड रियलिटी अनुभव, सिमुलेशन, वर्चुअल लैब और साइन लैंग्वेज वीडियो जैसी आधुनिक सुविधाएं शामिल हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य छात्रों के लिए सीखने की प्रक्रिया को अधिक रोचक और समझने योग्य बनाना है।

    सरकार ने बताया कि QR-कोड आधारित पाठ्यपुस्तकें NCERT की किताबों को वीडियो, इंटरैक्टिव सामग्री और शिक्षक गाइड से जोड़ती हैं। इससे कक्षा शिक्षण में डिजिटल सामग्री का सहज उपयोग संभव होता है और विषयों की बेहतर समझ विकसित होती है।

    दिव्यांग शिक्षार्थियों के लिए भी इस प्लेटफॉर्म पर विशेष सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसमें DAISY प्रारूप, टेक्स्ट-टू-स्पीच फीचर और भारतीय सांकेतिक भाषा वीडियो शामिल हैं, जिससे समावेशी शिक्षा को बढ़ावा मिलता है और हर वर्ग के विद्यार्थियों तक समान अवसर पहुंचते हैं।

    दीक्षा प्लेटफॉर्म व्यक्तिगत शिक्षण को भी समर्थन देता है। अभ्यास प्रश्नों, अनुकूली मूल्यांकन और योग्यता आधारित प्रश्न बैंक के माध्यम से विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता का आकलन किया जाता है और कमजोर क्षेत्रों की पहचान कर समय पर सुधार किया जाता है।

    इसके साथ ही यह प्लेटफॉर्म शिक्षक प्रशिक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। एनआईएसएचटीएचए जैसे कार्यक्रमों के जरिए शिक्षकों को स्व-गति आधारित प्रमाणित पाठ्यक्रम उपलब्ध कराए जाते हैं, जिससे उनकी व्यावसायिक क्षमता में निरंतर सुधार हो सके।

    सरकार के अनुसार, दीक्षा एक संघबद्ध और विकेंद्रीकृत मॉडल पर काम करता है, जिसमें राज्यों और संस्थानों को स्थानीय भाषाओं में सामग्री अपलोड करने की स्वतंत्रता मिलती है। हालांकि गुणवत्ता नियंत्रण सीआईईटी-एनसीईआरटी द्वारा समय-समय पर किया जाता है।

    यह प्लेटफॉर्म ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध है, जिससे इंटरनेट की सीमित पहुंच वाले क्षेत्रों में भी शिक्षा बाधित नहीं होती। स्मार्ट क्लासरूम और डाउनलोड सुविधा के माध्यम से छात्रों को निरंतर अध्ययन का अवसर मिलता है, जिससे डिजिटल शिक्षा का दायरा और अधिक व्यापक हो रहा है।

  • तिरुपति बालाजी मंदिर में अनंत अंबानी ने कराया मुंडन, भगवान वेंकटेश्वर के चरणों में अर्पित की आस्था

    तिरुपति बालाजी मंदिर में अनंत अंबानी ने कराया मुंडन, भगवान वेंकटेश्वर के चरणों में अर्पित की आस्था

    नई दिल्ली । Anant Ambani एक बार फिर अपनी धार्मिक आस्था को लेकर चर्चा में हैं। उन्होंने आंध्र प्रदेश स्थित प्रसिद्ध Tirupati Balaji Temple में भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के दर्शन किए और पारंपरिक मान्यताओं के अनुरूप मुंडन संस्कार कराया। उनके इस धार्मिक अनुष्ठान की तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

    सूत्रों के अनुसार, अनंत अंबानी ने मंदिर परिसर में विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की और इसके बाद केश दान की परंपरा का पालन किया। तिरुपति बालाजी मंदिर में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसमें श्रद्धालु अपनी आस्था, कृतज्ञता और समर्पण के प्रतीक के रूप में अपने बाल अर्पित करते हैं। माना जाता है कि यह कार्य अहंकार के त्याग और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।

    तिरुपति बालाजी मंदिर देश के सबसे अधिक श्रद्धालुओं वाले धार्मिक स्थलों में शामिल है। हर वर्ष लाखों की संख्या में भक्त यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं और बड़ी संख्या में लोग मुंडन की परंपरा निभाते हैं। मंदिर प्रशासन द्वारा इस परंपरा को व्यवस्थित तरीके से संचालित किया जाता है, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

    अनंत अंबानी के इस कदम को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई लोगों ने इसे उनकी व्यक्तिगत आस्था और धार्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान से जोड़कर देखा है। वहीं, कुछ यूजर्स ने इसे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं की निरंतरता का उदाहरण बताया है। उनकी तस्वीरें इंटरनेट पर तेजी से साझा की जा रही हैं।

    अंबानी परिवार देश के विभिन्न प्रमुख धार्मिक स्थलों पर अपनी उपस्थिति के लिए पहले से ही जाना जाता है। परिवार के सदस्य समय-समय पर अयोध्या, बद्रीनाथ, केदारनाथ और द्वारकाधीश जैसे तीर्थ स्थलों पर दर्शन करने पहुंचते रहे हैं। यह प्रवृत्ति उनके धार्मिक विश्वास और सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाती है।

    तिरुपति मंदिर में मुंडन की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश भी देती है। यह परंपरा भक्तों को यह स्मरण कराती है कि ईश्वर के समक्ष सभी समान हैं और भक्ति में विनम्रता सर्वोपरि है। इसी भावना के साथ लाखों श्रद्धालु यहां प्रतिवर्ष अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।

    अनंत अंबानी के इस धार्मिक दौरे ने एक बार फिर सार्वजनिक जीवन में आस्था और परंपराओं की भूमिका पर चर्चा को आगे बढ़ा दिया है। उनकी यह यात्रा न केवल व्यक्तिगत श्रद्धा का प्रतीक मानी जा रही है, बल्कि देश की जीवंत धार्मिक संस्कृति की एक झलक भी प्रस्तुत करती है।

  • मानसिक स्वास्थ्य बीमारियों पर हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज की नई तस्वीर: अस्पताल में भर्ती से लेकर थेरेपी तक बदलते नियम, पॉलिसी चुनने से पहले समझें हर शर्त

    मानसिक स्वास्थ्य बीमारियों पर हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज की नई तस्वीर: अस्पताल में भर्ती से लेकर थेरेपी तक बदलते नियम, पॉलिसी चुनने से पहले समझें हर शर्त

    नई दिल्ली । भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती जागरूकता के बीच हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहे हैं। अब कई बीमा कंपनियां मानसिक बीमारियों के इलाज को अपनी पॉलिसी के दायरे में शामिल कर रही हैं, जिससे मरीजों और उनके परिवारों को आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी है। हालांकि इसके बावजूद कवरेज की वास्तविक स्थिति और शर्तें हर पॉलिसी में अलग-अलग हैं, जिसके कारण उपभोक्ताओं के लिए सही योजना का चयन करना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

    पिछले कुछ वर्षों में नियामक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान मानने पर जोर दिया गया है। इसी बदलाव के चलते बीमा कंपनियों को मानसिक बीमारियों के इलाज को भी हेल्थ इंश्योरेंस में शामिल करने की दिशा में कदम बढ़ाने पड़े हैं। इसके बावजूद अधिकांश पॉलिसियों में यह सुविधा मुख्य रूप से तभी उपलब्ध होती है जब मरीज को अस्पताल में भर्ती कर इलाज कराया जाए।

    विशेषज्ञों के अनुसार कई बीमा योजनाओं में इन-पेशेंट ट्रीटमेंट यानी अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में ही खर्च का कवरेज दिया जाता है। इसमें डॉक्टर की फीस, दवाइयां, कमरे का किराया और अन्य चिकित्सा खर्च शामिल हो सकते हैं। हालांकि डे-केयर या सीमित अवधि के उपचार के लिए कवरेज कुछ चुनिंदा पॉलिसियों में ही मिलता है, जो पूरी तरह कंपनी की शर्तों पर निर्भर करता है।

    मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कई सामान्य उपचार जैसे काउंसलिंग, नियमित थेरेपी सेशन या मनोवैज्ञानिक से फॉलो-अप विजिट अक्सर अधिकांश पॉलिसियों में कवर नहीं होते। इससे उन लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है जिन्हें लंबे समय तक थेरेपी या मेंटल हेल्थ सपोर्ट की आवश्यकता होती है। इसके अलावा कई योजनाओं में क्लेम की अधिकतम सीमा और कमरे के किराए पर भी कैपिंग लागू होती है, जिससे कुल प्रतिपूर्ति राशि सीमित हो जाती है।

    बीमा पॉलिसियों में कुछ विशेष परिस्थितियों को अपवाद के रूप में भी शामिल किया जाता है। नशे की लत से जुड़े इलाज या स्वयं को नुकसान पहुंचाने जैसी स्थितियों में कई कंपनियां कवरेज नहीं देतीं। इसके साथ ही मानसिक बीमारियों से जुड़े मामलों में वेटिंग पीरियड भी लागू किया जा सकता है, जिसके दौरान पॉलिसीधारक क्लेम नहीं कर सकता।

    बाजार में उपलब्ध विभिन्न पॉलिसियों के बीच अंतर को देखते हुए उपभोक्ताओं के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वे बीमा खरीदने से पहले सभी नियमों और शर्तों को ध्यान से पढ़ें। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि केवल कम प्रीमियम के आधार पर निर्णय लेना आगे चलकर आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की कठिनाइयों का कारण बन सकता है।

    बदलते समय के साथ कई कंपनियां अब मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक व्यापक रूप से शामिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं, जिसमें थेरेपी और रिकवरी सपोर्ट भी शामिल हो सकता है। ऐसे में पॉलिसीधारकों के लिए यह जरूरी है कि वे समय-समय पर अपनी पॉलिसी की समीक्षा करें और जरूरत के अनुसार बेहतर विकल्प चुनें, ताकि भविष्य में इलाज के दौरान आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

  • नौकरी बदलने से पहले पीएफ ट्रांसफर को लेकर रखें विशेष सावधानी, EPFO 3.0 के बावजूद रिकॉर्ड त्रुटि बनी रहेगी बड़ी चुनौती

    नौकरी बदलने से पहले पीएफ ट्रांसफर को लेकर रखें विशेष सावधानी, EPFO 3.0 के बावजूद रिकॉर्ड त्रुटि बनी रहेगी बड़ी चुनौती

    नई दिल्ली । कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ द्वारा प्रस्तावित EPFO 3.0 सिस्टम के तहत प्रोविडेंट फंड ट्रांसफर प्रक्रिया को पहले से अधिक सरल और डिजिटल बनाने की दिशा में बड़ा बदलाव किया जा रहा है। नई तकनीक के माध्यम से कर्मचारियों को नौकरी बदलने के बाद पीएफ ट्रांसफर में कम कागजी कार्रवाई और तेज प्रोसेसिंग का लाभ मिलने की उम्मीद है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सिस्टम कितना भी आधुनिक क्यों न हो, यदि कर्मचारी अपने रिकॉर्ड को समय पर अपडेट नहीं करते हैं तो ट्रांसफर प्रक्रिया में देरी की संभावना बनी रहेगी।

    नौकरी बदलने के दौरान पीएफ ट्रांसफर को लेकर सबसे बड़ी चुनौती डेटा में असमानता की होती है। नाम, जन्मतिथि, आधार, पैन और बैंक डिटेल्स में छोटे-छोटे अंतर भी सिस्टम को ऑटोमैटिक वेरिफिकेशन से रोक सकते हैं। इसी वजह से कई मामलों में आवेदन लंबे समय तक लंबित रह जाते हैं और कर्मचारियों को अतिरिक्त दस्तावेजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि EPFO 3.0 में भले ही ऑटोमेशन बढ़ेगा, लेकिन आधारभूत डेटा की शुद्धता सबसे महत्वपूर्ण बनी रहेगी।

    एक अन्य प्रमुख समस्या कई यूनिवर्सल अकाउंट नंबर यानी यूएएन का बन जाना है। अक्सर नई नौकरी के दौरान गलत तरीके से नया UAN जारी हो जाता है, जिससे पुराने और नए खाते को जोड़ने में समय लगता है। यह स्थिति पीएफ ट्रांसफर को जटिल बना देती है और कर्मचारियों को ईपीएफओ कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं। इसलिए सलाह दी जाती है कि नई नौकरी में हमेशा पुराना UAN ही साझा किया जाए और नया UAN बनाने से बचा जाए।

    पीएफ ट्रांसफर प्रक्रिया में समय पर कार्रवाई न करना भी देरी का कारण बनता है। कई कर्मचारी यह मान लेते हैं कि नई कंपनी द्वारा ट्रांसफर अपने आप पूरा हो जाएगा, जबकि वास्तविकता में आवेदन की प्रक्रिया को सक्रिय रूप से शुरू करना आवश्यक होता है। शुरुआती चरण में आवेदन करने से किसी भी त्रुटि को समय रहते सुधारा जा सकता है और प्रक्रिया सुचारू रहती है।

    KYC दस्तावेजों की अद्यतन स्थिति भी ट्रांसफर प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आधार, पैन और बैंक खाते का UAN से लिंक और सत्यापित होना आवश्यक है। यदि इनमें से कोई भी दस्तावेज असत्यापित रहता है तो आवेदन आगे नहीं बढ़ पाता और प्रक्रिया लंबित हो जाती है। इसलिए नौकरी बदलने से पहले सभी दस्तावेजों की स्थिति की जांच करना आवश्यक माना जा रहा है।

    इसके अलावा पुराने नियोक्ता की ओर से रोजगार संबंधी रिकॉर्ड का अपडेट न होना भी एक बड़ी बाधा बन सकता है। नौकरी छोड़ने की तारीख, वेतन विवरण और अन्य सेवा रिकॉर्ड यदि सही तरीके से अपडेट नहीं किए गए हैं तो ट्रांसफर प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। ऐसे मामलों में नियोक्ता और ईपीएफओ के बीच अतिरिक्त सत्यापन की आवश्यकता पड़ती है।

    विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि EPFO 3.0 के आने के बाद सिस्टम भले ही तेज और डिजिटल हो जाएगा, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह सही डेटा और समय पर की गई कार्रवाई पर निर्भर करेगी। कर्मचारियों को सलाह दी जा रही है कि नौकरी बदलने से पहले सभी विवरणों की जांच कर लें ताकि भविष्य में किसी प्रकार की वित्तीय या प्रशासनिक परेशानी का सामना न करना पड़े।