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  • दिवाली से पहले सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, जानिए किन वजहों से टूटा भाव और कब लौट सकती है तेजी

    दिवाली से पहले सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, जानिए किन वजहों से टूटा भाव और कब लौट सकती है तेजी


    नई दिल्ली ।
    दिवाली और त्योहारी सीजन से पहले सोने की कीमतों में आई बड़ी गिरावट ने खरीदारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार से लेकर भारत के वायदा और खुदरा बाजार तक सोने के भाव में कमजोरी दर्ज की गई है। महंगे कच्चे तेल, मजबूत अमेरिकी डॉलर और ब्याज दरों को लेकर बनी अनिश्चितता ने कीमती धातुओं पर दबाव बढ़ाया है। हालांकि, कीमतों में आई इस नरमी को त्योहारों और शादी के सीजन के लिए खरीदारी के संभावित अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर इस सप्ताह सोने का वायदा भाव करीब 3.50 प्रतिशत गिर गया। खुदरा बाजार में भी कीमतों में उल्लेखनीय कमी आई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 24 कैरेट सोने का भाव पहले 1,46,426 रुपये प्रति 10 ग्राम था, जो 23 अक्टूबर तक घटकर 1,41,630 रुपये रह गया। इस तरह एक सप्ताह में इसकी कीमत 4,796 रुपये प्रति 10 ग्राम कम हो गई।

    इसी अवधि में 22 कैरेट सोने के दाम भी नीचे आए। इसका भाव 1,34,207 रुपये प्रति 10 ग्राम से गिरकर 1,29,566 रुपये रह गया। यानी 22 कैरेट सोना 4,641 रुपये प्रति 10 ग्राम सस्ता हुआ। कीमतों में इस गिरावट से उन ग्राहकों को राहत मिल सकती है, जो दिवाली या आगामी शादी समारोहों के लिए आभूषण खरीदने की योजना बना रहे हैं।

    वैश्विक बाजार में भी सोने की स्थिति कमजोर बनी हुई है। शुक्रवार को इसकी कीमत करीब तीन महीने के निचले स्तर तक पहुंच गई। पूरे सप्ताह अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने में लगभग चार प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो जून के बाद इसका सबसे कमजोर साप्ताहिक प्रदर्शन बताया गया है। इस गिरावट के बाद निवेशकों की नजर 4,000 डॉलर प्रति औंस के महत्वपूर्ण स्तर पर टिकी है। यह स्थिति अमेरिकी फेडरल रिजर्व की 27 और 28 अक्टूबर को होने वाली नीतिगत बैठक से ठीक पहले बनी है।

    सोने की कीमतों में गिरावट की एक प्रमुख वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। सऊदी अरब में हूती हमलों के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बढ़ी, जिससे ब्रेंट क्रूड पांच महीने से अधिक के उच्च स्तर पर पहुंच गया। महंगा तेल महंगाई को बढ़ा सकता है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रख सकते हैं, जिससे सोने जैसी बिना ब्याज वाली संपत्तियों की मांग प्रभावित होती है।

    अमेरिका में उपभोक्ता और उत्पादक महंगाई के आंकड़े भी बाजार की चिंता बढ़ाने वाले रहे हैं। कारोबारियों को आगामी बैठक में फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में बदलाव नहीं होने की उम्मीद है, लेकिन साल के अंत में मौद्रिक नीति सख्त रहने की आशंका बनी हुई है। डॉलर इंडेक्स में कुछ नरमी के बावजूद इसका स्तर करीब 101.5 बना हुआ है। फरवरी के अंत में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के समय से सोने में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट का भी उल्लेख किया गया है।

    तकनीकी संकेतों के मुताबिक, निकट अवधि में सोने पर दबाव बना रह सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत 4,000 डॉलर प्रति औंस के नीचे टिकती है, तो 3,950 डॉलर तक गिरावट की आशंका जताई गई है। दूसरी ओर, 3,950 से 4,000 डॉलर का दायरा संभावित खरीदारी और समर्थन का क्षेत्र माना जा रहा है। चांदी के लिए 50 से 55 डॉलर के स्तर को अहम समर्थन बताया गया है। कुछ विशेषज्ञों ने आने वाले हफ्तों में 10 से 15 प्रतिशत तक सुधार की संभावना जताई है, जबकि सोने में तेजी का रुझान मजबूत होने के लिए 4,200 डॉलर के ऊपर टिकना महत्वपूर्ण माना गया है।

    दिवाली के दौरान सोने और आभूषणों की मांग मजबूत रहने की उम्मीद है। भारतीय खरीदार सोने को निवेश और पारंपरिक खरीदारी, दोनों के लिहाज से महत्व देते हैं। बाजार में हल्के वजन के आभूषणों और पुराने सोने के बदले नए आभूषण खरीदने की योजनाओं की मांग भी बढ़ रही है। ग्राहक अब डिजाइन के साथ शुद्धता, प्रामाणिकता और पारदर्शिता पर भी ध्यान दे रहे हैं। हालांकि, दिवाली से पहले कीमतों में दोबारा उछाल आएगा या गिरावट जारी रहेगी, यह वैश्विक बाजार, डॉलर की चाल और अमेरिकी मौद्रिक नीति के संकेतों पर निर्भर करेगा।

  • लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत के बावजूद भारत का चावल निर्यात मजबूत, वैश्विक खाद्य सुरक्षा में बढ़ रही अहमियत

    लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत के बावजूद भारत का चावल निर्यात मजबूत, वैश्विक खाद्य सुरक्षा में बढ़ रही अहमियत

    नई दिल्ली ।वैश्विक बाजार में भारत की चावल निर्यात संबंधी स्थिति मजबूत बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय चावल व्यापार में लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ भारत दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है। हालांकि, समुद्री मार्गों पर बढ़ते तनाव, शिपिंग समय में वृद्धि, बीमा खर्च और परिवहन शुल्क में बढ़ोतरी जैसी चुनौतियां निर्यात उद्योग को प्रभावित कर रही हैं। इसके बावजूद सरकार और उद्योग जगत निर्यात को सुचारू बनाए रखने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं।

    नई दिल्ली में आयोजित भारत अंतरराष्ट्रीय चावल सम्मेलन 2026 में कृषि क्षेत्र, निर्यात कारोबार, व्यापार नीति और खाद्य गुणवत्ता से जुड़े विशेषज्ञों ने उद्योग की स्थिति पर चर्चा की। सम्मेलन में किसानों से लेकर निर्यातकों, खरीदारों, परीक्षण प्रयोगशालाओं और अन्य सेवा प्रदाताओं तक पूरी आपूर्ति शृंखला से जुड़े प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। चर्चा का मुख्य केंद्र वैश्विक बाजार में भारत की भूमिका, निर्यात लागत और भविष्य में कारोबार की संभावनाएं रहीं।

    वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के महाप्रबंधक तरुण बजाज के अनुसार, भारत का चावल निर्यात वैश्विक बाजार में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उन्होंने कहा कि देश की लगभग 40 प्रतिशत हिस्सेदारी को देखते हुए ऐसा मंच जरूरी है, जहां किसान, व्यापारी, निर्यातक और उपभोक्ता से जुड़ी पूरी मूल्य शृंखला के प्रतिनिधि एक साथ आकर समस्याओं और उनके समाधान पर विचार कर सकें।

    उन्होंने समुद्री परिवहन को मौजूदा समय की प्रमुख चुनौती बताया। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और रेड सी जैसे क्षेत्रों में तनाव के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इससे माल पहुंचने में अधिक समय लग रहा है और बीमा तथा शिपिंग की लागत भी बढ़ रही है। इन परिस्थितियों में केंद्र और राज्य सरकारों तथा उद्योग जगत के समन्वय से निर्यात व्यवस्था को बनाए रखने के प्रयास किए जा रहे हैं।

    राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक डॉ. राजीव कुमार ने भी भारतीय निर्यातकों की मजबूत स्थिति का उल्लेख किया। उनके मुताबिक, भारत की वैश्विक बाजार हिस्सेदारी लंबे समय से लगभग 35 से 40 प्रतिशत के बीच बनी हुई है। उन्होंने कहा कि थाईलैंड और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भारत में सड़क परिवहन पर अधिक निर्भरता होने से लागत बढ़ती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक मांग वाले चावल के उत्पादन को प्रोत्साहित करना जरूरी है, ताकि निर्यातकों को बेहतर मूल्य मिल सके।

    सम्मेलन में चावल उद्योग से जुड़ी कंपनियों और संस्थाओं ने भी अपने अनुभव साझा किए। ईवाई के पार्टनर प्रशांत रायजादा ने इसे क्षेत्र के विशेषज्ञों, निर्यातकों और नीति निर्माताओं के बीच विचार-विमर्श का उपयोगी अवसर बताया। कृभको एग्री के मुख्य प्रबंधक राजेश पहारिया जैन के अनुसार, इस बार सम्मेलन में भागीदारी और गतिविधियों का दायरा बढ़ा है। इसमें पैकेजिंग सामग्री बनाने वाली कंपनियों से लेकर सर्वेयर, कस्टम हाउस एजेंट, किसान और निर्यातक शामिल हुए।

    राजेश पहारिया जैन ने बताया कि मौसम संबंधी चुनौतियों और उत्पादन में संभावित कमी की आशंकाओं के बावजूद भारतीय खाद्य निगम के पास लगभग 5.5 से 6 करोड़ टन का बफर स्टॉक मौजूद है। उन्होंने निर्यात उद्योग को सहायता देने के लिए ब्याज संबंधी समर्थन और अतिरिक्त प्रोत्साहन उपलब्ध कराने की मांग भी रखी।

    तकनीक और बाजार संबंधी जानकारी की भूमिका पर भी चर्चा हुई। एग्रीगुरु ऑनलाइन की संस्थापक हंसा सिंह राक्या ने बताया कि उनकी कंपनी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित बाजार सूचना मंच विकसित किया है। इसके माध्यम से खरीदारों और विक्रेताओं को कीमतों, माल ढुलाई खर्च, व्यापार नियमों और वैश्विक घटनाक्रमों की जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।

    यूरोफिन्स एनालिटिकल सर्विसेज इंडिया और एसजीएस फूड टेस्टिंग सर्विसेज के प्रतिनिधियों ने भी गुणवत्ता परीक्षण, शोध संस्थानों के सहयोग और खरीदार-विक्रेता संवाद के महत्व पर जोर दिया। उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय मानकों और नई व्यापारिक आवश्यकताओं की जानकारी साझा करने से गुणवत्ता संबंधी अस्वीकृतियों और सीमा शुल्क से जुड़ी परेशानियों को कम करने में मदद मिल सकती है।

    विशेषज्ञों की चर्चाओं से स्पष्ट हुआ कि भारत के सामने वैश्विक चावल बाजार में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखने के साथ निर्यात लागत घटाने, परिवहन व्यवस्था सुधारने और गुणवत्ता मानकों के अनुरूप कारोबार बढ़ाने की चुनौती है। इन क्षेत्रों में बेहतर समन्वय से भारत की वैश्विक खाद्य सुरक्षा में भूमिका को और मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

  • दुबई में भारतीय ज्वेलरी कंपनी ने बनाया इतिहास, 16.514 किलो के सोने के झुमकों से दो विश्व रिकॉर्ड कायम

    दुबई में भारतीय ज्वेलरी कंपनी ने बनाया इतिहास, 16.514 किलो के सोने के झुमकों से दो विश्व रिकॉर्ड कायम

    नई दिल्ली ।दुबई में भारतीय ज्वेलरी कंपनी जॉयअलुक्कास ने सोने के विशाल झुमकों की एक जोड़ी तैयार करके दो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं। 22 कैरेट सोने से बने इन झुमकों का कुल वजन 16.514 किलोग्राम है। इन्हें दुनिया की सबसे भारी और सबसे बड़ी सोने की बालियों की जोड़ी के रूप में मान्यता मिली है। इस विशेष रचना को तैयार करने में दर्जनों कारीगरों ने कई महीनों तक मेहनत की और पारंपरिक आभूषण कला को बड़े आकार में पेश किया।

    इन झुमकों को ‘मयूर सहस्र’ नाम दिया गया है। इस नाम का अर्थ ‘एक हजार मोर’ बताया गया है। इनका डिजाइन मोर से प्रेरित है, जिसे भारतीय संस्कृति में सुंदरता और शालीनता का प्रतीक माना जाता है। आभूषणों की बनावट में दक्षिण एशिया की शादियों में पहने जाने वाले पारंपरिक घंटीनुमा झुमकों की झलक भी दिखाई देती है। इस तरह डिजाइन में सांस्कृतिक परंपरा और आधुनिक आभूषण निर्माण का मेल देखने को मिलता है।

    इन विशाल झुमकों को बनाने में 55 कुशल कारीगरों ने कुल 5,840 घंटे काम किया। इनकी लंबाई 1.215 मीटर और व्यास 0.682 मीटर है। वजन, आकार और निर्माण में लगे समय के कारण यह परियोजना कंपनी के लिए एक बड़ी उपलब्धि बन गई है। इतने बड़े आभूषण को तैयार करने के लिए डिजाइन से लेकर अंतिम रूप देने तक कारीगरों को लंबे समय तक काम करना पड़ा।

    24 अक्टूबर को इन झुमकों को दुबई के गोल्ड डिस्ट्रिक्ट स्थित ज्वेल ऑफ जॉय शोरूम में प्रदर्शित किया गया। इस अवसर पर संयुक्त अरब अमीरात के अर्थव्यवस्था और पर्यटन मंत्री अब्दुल्ला बिन तौक अल मर्री भी मौजूद थे। अब इन रिकॉर्डधारी झुमकों को इसी क्षेत्र में स्थित ज्वेल ऑफ जॉय बाय जॉयअलुक्कास शोरूम में स्थायी रूप से प्रदर्शित किया गया है। यहां आने वाले लोग इस विशाल स्वर्ण आभूषण को देख सकते हैं।

    जॉयअलुक्कास ज्वेलरी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जॉन पॉल अलुक्कास के अनुसार, इस रचना के पीछे दुबई के साथ कंपनी का लंबा जुड़ाव और शहर के विकास से जुड़ी प्रेरणा रही है। दुबई को लंबे समय से सोने के कारोबार के प्रमुख केंद्र के रूप में जाना जाता है। कंपनी का मानना है कि यह रचना शहर की इसी पहचान को दर्शाती है और उसके साथ उसके व्यावसायिक संबंधों का प्रतीक है।

    समूह के चेयरमैन जॉय अलुक्कास ने इस उपलब्धि को दुबई और इसे बनाने वाले कारीगरों के प्रति सम्मान बताया। उनके मुताबिक, कंपनी करीब चार दशकों से दुबई के साथ आगे बढ़ रही है। उन्होंने इस परियोजना को कारीगरों की मेहनत का परिणाम बताते हुए कहा कि एक ही रचना के लिए दो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड मिलना कंपनी, कर्मचारियों और उसके ग्राहकों के लिए गर्व का विषय है।

    जॉय अलुक्कास केरल के कारोबारी हैं और जॉयअलुक्कास समूह के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक हैं। कंपनी की शुरुआत 1987 में हुई थी। इसका कारोबार भारत सहित ब्रिटेन, अमेरिका, सिंगापुर, मलेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया, बहरीन और ओमान जैसे देशों तक फैला है। परिवार ने केरल के त्रिशूर से आभूषण कारोबार शुरू किया था। बाद में जॉय अलुक्कास ने 2001 में अपने नाम से ज्वेलरी कारोबार को आगे बढ़ाया। दुबई में तैयार किए गए ये विशाल झुमके अब कंपनी की अंतरराष्ट्रीय पहचान और पारंपरिक आभूषण निर्माण कौशल की एक खास मिसाल बन गए हैं।

  • गर्मियों में बीयर और कोल्ड ड्रिंक्स की सप्लाई सुधारने की तैयारी, सरकार ने एल्युमिनियम कैन के सर्टिफिकेशन की समयसीमा बढ़ाई

    गर्मियों में बीयर और कोल्ड ड्रिंक्स की सप्लाई सुधारने की तैयारी, सरकार ने एल्युमिनियम कैन के सर्टिफिकेशन की समयसीमा बढ़ाई

    नई दिल्ली । गर्मियों में बीयर और कोल्ड ड्रिंक्स की बढ़ती मांग के बीच एल्युमिनियम कैन की संभावित कमी दूर करने के लिए सरकार ने महत्वपूर्ण फैसला लिया है। पेय पदार्थों के लिए इस्तेमाल होने वाले एल्युमिनियम कैन पर अनिवार्य भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) सर्टिफिकेशन लागू करने की समयसीमा छह महीने तक बढ़ाई गई है। इस कदम से पेय पदार्थ बनाने वाली कंपनियों और कैन निर्माताओं को उत्पादन, आयात तथा पैकेजिंग की व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा।

    पहले कंपनियों को 31 अक्टूबर 2026 तक निर्धारित प्रमाणन हासिल करना था। अब अलग-अलग श्रेणियों की कंपनियों के लिए नियमों के अनुपालन की समयसीमा अलग-अलग रखी गई है। बड़ी कंपनियों को 1 अप्रैल 2027, छोटी कंपनियों को 1 जुलाई 2027 और सूक्ष्म कंपनियों को 1 अक्टूबर 2027 से संबंधित नियमों का पालन करना होगा। इस बदलाव से कंपनियों को प्रमाणन प्रक्रिया पूरी करने और बाजार की जरूरतों के अनुसार कैन की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    भारत में बीयर और सॉफ्ट ड्रिंक्स की बिक्री में एल्युमिनियम कैन का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। इन पेय पदार्थों की कुल सालाना बिक्री में अब कैन की हिस्सेदारी एक चौथाई से अधिक हो गई है। बीते दो वर्षों के दौरान मांग में तेजी आई है, लेकिन घरेलू निर्माताओं का उत्पादन उसी गति से नहीं बढ़ पाया। इसके चलते कंपनियों को पैकेजिंग सामग्री की कमी का सामना करना पड़ रहा है।

    उद्योग से जुड़े अनुमान के मुताबिक, भारतीय बाजार की जरूरतों को पूरा करने के लिए हर साल लगभग 60 करोड़ अतिरिक्त कैन के उत्पादन की उम्मीद थी। हालांकि, अब तक इस अतिरिक्त क्षमता का करीब आधा हिस्सा ही हासिल हो सका है। ऐसे में सरकार की ओर से समयसीमा बढ़ाने से कंपनियों को आगामी गर्मियों के सीजन के लिए पहले से स्टॉक तैयार करने और सप्लाई की बेहतर योजना बनाने का अवसर मिलेगा।

    कैन की कमी के पीछे अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी एक कारण हैं। मध्य पूर्व में जारी युद्ध के चलते वैश्विक आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। विदेशों में स्थित जिन निर्माताओं को भारतीय मानक ब्यूरो से प्रमाणन मिला हुआ है, वे भी भारत की बढ़ती मांग पूरी करने में पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं। इस वजह से पेय पदार्थ कंपनियों को वैकल्पिक स्रोतों से पैकेजिंग सामग्री जुटानी पड़ रही है।

    कमी को पूरा करने के लिए कंपनियां संयुक्त अरब अमीरात, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया के दूसरे बाजारों से एल्युमिनियम कैन आयात कर रही हैं। हालांकि, आयातित कैन घरेलू स्तर पर उपलब्ध कैन की तुलना में लगभग 25 से 30 प्रतिशत महंगे पड़ते हैं। इससे कंपनियों की लागत बढ़ रही है और पैकेजिंग की व्यवस्था करना चुनौतीपूर्ण हो रहा है।

    घरेलू उत्पादन बढ़ाने में भी समय लग रहा है। कैन निर्माता अपनी मौजूदा उत्पादन क्षमता का इस्तेमाल कर रहे हैं, इसलिए अतिरिक्त मांग पूरी करने के लिए नई उत्पादन लाइनें स्थापित करना जरूरी है। लेकिन नई लाइन लगाने और उसे चालू करने में एक साल तक का समय लग सकता है। इस कारण तत्काल उत्पादन बढ़ाकर मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर खत्म करना आसान नहीं है।

    सरकार ने अप्रैल 2025 में एल्युमिनियम पेय कैन को अनिवार्य बीआईएस प्रमाणन के दायरे में लाने के लिए गुणवत्ता नियंत्रण आदेश जारी किया था। इसका उद्देश्य कैन की सुरक्षा, उत्पादों की ताजगी और रीसाइक्लिंग की गुणवत्ता सुनिश्चित करना है। इन मानकों में कैन की सामग्री, आकार, ढक्कन की सील, दबाव सहने की क्षमता, रिसाव रोकने की व्यवस्था और सुरक्षा परत शामिल हैं। विदेशी कारखानों के निरीक्षण की जरूरत पड़ने पर प्रमाणन प्रक्रिया में अतिरिक्त समय भी लग सकता है। ऐसे में समयसीमा बढ़ने से कंपनियों को नियमों का पालन करने के साथ आगामी गर्मियों के लिए सप्लाई तैयार करने में राहत मिल सकती है।

  • पाकिस्तान में LPG संकट गहराया, 12 किलो सिलेंडर की कीमत 8200 रुपये तक पहुंची..

    पाकिस्तान में LPG संकट गहराया, 12 किलो सिलेंडर की कीमत 8200 रुपये तक पहुंची..


    नई दिल्ली ।
    पाकिस्तान में महंगाई के बीच रसोई गैस की कमी ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। देश के कई हिस्सों में घरेलू इस्तेमाल वाले LPG सिलेंडरों की कीमतों में तेजी से उछाल आया है। करीब 12 किलो गैस वाला सिलेंडर, जो कुछ दिन पहले लगभग 4,500 पाकिस्तानी रुपये में मिल रहा था, अब 7,000 रुपये से अधिक कीमत पर बिक रहा है। कुछ क्षेत्रों में उपभोक्ताओं को इसके लिए 8,200 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। गैस की बढ़ती कीमतों और सीमित उपलब्धता ने घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है।

    इस संकट की प्रमुख वजह ईरान से होने वाली LPG आपूर्ति का बाधित होना है। पाकिस्तान और ईरान के बीच स्थित दो प्रमुख सीमा चौकियां 17 अक्टूबर से बंद हैं। सीमा बंद होने के कारणों को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग दावे हैं। पाकिस्तान सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और अवैध तस्करी रोकने को इसकी वजह बताया है, जबकि ईरान ने इसे तकनीकी समस्या से जुड़ा मामला कहा है।

    पाकिस्तान अपनी LPG जरूरत का लगभग आधा हिस्सा ईरान से प्राप्त करता है। ऐसे में सीमा पर आवाजाही बंद होने से गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई है। घरेलू उत्पादन सीमित होने के कारण बाजार में मांग और उपलब्धता के बीच अंतर बढ़ गया है। इसका असर सीधे सिलेंडरों की कीमतों पर दिखाई दे रहा है।

    पाकिस्तान की LPG जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश अपनी कुल आवश्यकता का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ईरान के अलावा ओमान और इराक भी गैस आपूर्ति के प्रमुख स्रोत हैं। इन देशों से आने वाली खेप प्रभावित होने से संकट और गंभीर हो गया है।

    पाकिस्तान में प्रतिदिन लगभग 6,500 से 7,000 टन LPG की खपत होती है। इसके मुकाबले घरेलू उत्पादन करीब 2,000 से 2,500 टन प्रतिदिन है। शेष जरूरत पूरी करने के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक के अनुसार, खपत और उत्पादन के बीच का यह अंतर देश को बाहरी आपूर्ति में आने वाली बाधाओं के प्रति संवेदनशील बनाता है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों ने समुद्री परिवहन को भी प्रभावित किया है। इसके कारण इराक और ओमान से आने वाली गैस की आपूर्ति बाधित होने की जानकारी सामने आई है। इस तरह पाकिस्तान को एक साथ सीमा पार आपूर्ति और समुद्री मार्गों से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

    गैस की कमी के बीच कालाबाजारी की समस्या भी सामने आई है। पाकिस्तान के तेल एवं गैस नियामक प्राधिकरण ने 11.8 किलो के घरेलू LPG सिलेंडर की आधिकारिक कीमत 3,296 पाकिस्तानी रुपये निर्धारित की है। इसके बावजूद कई बाजारों में सिलेंडर इससे दोगुने से भी अधिक दाम पर बेचे जा रहे हैं। आधिकारिक दर और बाजार में वसूली जा रही कीमत के बीच बड़ा अंतर उपभोक्ताओं की परेशानी बढ़ा रहा है।

    कीमतों की स्थिति अलग-अलग क्षेत्रों में और गंभीर है। बलूचिस्तान में 12 किलो का सिलेंडर लगभग 7,000 रुपये में मिल रहा है, जबकि लाहौर में इसकी कीमत 7,500 रुपये तक बताई गई है। दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्र स्कर्दू में उपभोक्ताओं को एक सिलेंडर के लिए 8,200 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं।

    आपूर्ति सामान्य होने में देरी से घरेलू उपभोक्ताओं के सामने परेशानी बनी रह सकती है। फिलहाल सीमा चौकियों के बंद रहने, समुद्री मार्गों पर तनाव और आयात पर निर्भरता के कारण पाकिस्तान के LPG बाजार पर दबाव है। गैस की उपलब्धता में सुधार और कीमतों में स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि बाधित आपूर्ति कितनी जल्दी बहाल होती है।

  • पारे से सोना बनाने का दावा कर स्टार्टअप ने दुनिया को चौंकाया, फ्यूजन रिएक्टर से होगा कीमती धातु का उत्पादन

    पारे से सोना बनाने का दावा कर स्टार्टअप ने दुनिया को चौंकाया, फ्यूजन रिएक्टर से होगा कीमती धातु का उत्पादन


    नई दिल्ली । सैन फ्रांसिस्को की एक स्टार्टअप कंपनी ने पारे को सोने में बदलने का दावा कर विज्ञान की दुनिया में नई चर्चा छेड़ दी है। मैराथन फ्यूजन नाम की इस कंपनी का कहना है कि उसने परमाणु प्रक्रिया की मदद से पारे को असली और स्थिर सोने में बदलने की तकनीक पर कामयाबी हासिल की है। कंपनी ने 21 अक्टूबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा कर अपनी उपलब्धि की जानकारी दी। उसके मुताबिक इस प्रक्रिया से सोना बनाने की दर यूरोपीय परमाणु शोध संगठन CERN के 2025 में दर्ज किए गए मानक से दस गुना अधिक रही। हालांकि कंपनी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि प्रयोग के दौरान वास्तव में कितनी मात्रा में सोना तैयार किया गया।

    मैराथन फ्यूजन ने बताया कि उसने पिछले साल फ्यूजन रिएक्टर की मदद से सोना बनाने का प्रस्ताव पेश किया था। अब कंपनी का दावा है कि उसने फ्यूजन से पैदा होने वाले न्यूट्रॉनों का इस्तेमाल करके पारे को स्थायी सोने में बदलने की प्रक्रिया प्रदर्शित की है। यह दावा इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सोना बनाने की कोशिश लंबे समय से वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की दिलचस्पी का विषय रही है। हालांकि कंपनी के दावे और औद्योगिक स्तर पर बड़े पैमाने पर सोना उत्पादन की व्यावहारिक क्षमता के बीच अभी कई सवालों के जवाब मिलना बाकी है।

    इससे पहले CERN के वैज्ञानिकों ने लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर की मदद से सीसे के परमाणुओं को सोने के परमाणुओं में बदलने की प्रक्रिया दर्ज की थी। यह उपलब्धि परमाणु विज्ञान के लिहाज से अहम थी लेकिन उससे तैयार सोने की मात्रा बेहद कम थी। मैराथन फ्यूजन अब अपनी तकनीक को इसी क्षेत्र में अगला कदम बता रही है। कंपनी ने अपने प्रयोग से जुड़े गामा किरणों के मापन का भी उल्लेख किया है। उसके अनुसार इन मापों से विकिरण प्रक्रिया के बाद पारा-197 और सोना-197 की मौजूदगी का संकेत मिला।

    कंपनी की तकनीक न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन यानी परमाणु रूपांतरण के सिद्धांत पर आधारित है। सामान्य रासायनिक प्रतिक्रियाओं में परमाणु का नाभिक नहीं बदलता बल्कि परमाणुओं के बीच रासायनिक बंधों में बदलाव होता है। इसके उलट परमाणु रूपांतरण में नाभिक की संरचना बदलकर एक तत्व को दूसरे तत्व में बदला जा सकता है। मैराथन फ्यूजन की प्रस्तावित प्रक्रिया में ड्यूटेरियम और ट्रिटियम के फ्यूजन से पैदा होने वाले उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रॉनों का इस्तेमाल किया जाता है। ये न्यूट्रॉन पारा-198 के नाभिक के साथ प्रतिक्रिया करके पारा-197 बना सकते हैं। इसके बाद पारा-197 रेडियोधर्मी क्षय के जरिए सोने के स्थिर समस्थानिक गोल्ड-197 में बदल सकता है।

    मैराथन फ्यूजन ने अपनी तकनीक के संभावित आर्थिक फायदे भी बताए हैं। कंपनी ने 2025 में प्रकाशित एक शोधपत्र में प्रस्ताव दिया था कि फ्यूजन रिएक्टर के कोर के आसपास मौजूद ब्लैंकेट में पारा रखा जा सकता है। कंपनी के अनुमान के मुताबिक एक गीगावाट तापीय ऊर्जा पैदा करने वाला संयंत्र सालाना करीब दो टन सोना तैयार कर सकता है। उसका तर्क है कि इससे बिजली बेचने के अलावा सोने की बिक्री के जरिए भी आमदनी हो सकती है। कंपनी का दावा है कि ऐसा करने से बिजली उत्पादन और फ्यूजन ईंधन ट्रिटियम तैयार करने की क्षमता प्रभावित नहीं होगी।

    हालांकि सालाना दो टन सोना उत्पादन का आंकड़ा फिलहाल कंपनी का अनुमान है न कि किसी व्यावसायिक संयंत्र में हासिल किया गया प्रमाणित परिणाम। तकनीक की लागत ऊर्जा दक्षता सुरक्षा और बड़े स्तर पर उत्पादन की व्यवहार्यता जैसे पहलुओं की जांच भी जरूरी होगी। इसलिए पारे से सोना बनाने का दावा वैज्ञानिक दृष्टि से दिलचस्प जरूर है लेकिन इसे बड़े पैमाने पर सस्ता सोना बनाने की स्थापित तकनीक मानने से पहले स्वतंत्र पुष्टि और आगे के परीक्षण महत्वपूर्ण होंगे।

  • एलआरएस के तहत विदेशी शेयर-बॉन्ड में भारतीयों का निवेश 111% बढ़ा, अगस्त में 321.53 मिलियन डॉलर पहुंचा

    एलआरएस के तहत विदेशी शेयर-बॉन्ड में भारतीयों का निवेश 111% बढ़ा, अगस्त में 321.53 मिलियन डॉलर पहुंचा


    नई दिल्ली । विदेशी शेयर और बॉन्ड बाजारों में भारतीयों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। भारतीय रिजर्व बैंक के अक्टूबर 2026 बुलेटिन के अनुसार, उदारीकृत प्रेषण योजना (एलआरएस) के तहत अगस्त 2026 में विदेशी इक्विटी और डेट बाजारों में भारतीयों का निवेश सालाना आधार पर 111 प्रतिशत बढ़कर 321.53 मिलियन डॉलर पहुंच गया। अगस्त 2025 में यह आंकड़ा 152.18 मिलियन डॉलर था। एक साल के भीतर निवेश में दोगुने से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो वैश्विक वित्तीय बाजारों में भारतीय निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी को दर्शाती है।

    हालांकि, मासिक आधार पर विदेशी इक्विटी और डेट में निवेश में लगभग सात प्रतिशत की गिरावट आई। इससे पहले जून 2026 में इस श्रेणी में निवेश 460 मिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। इस लिहाज से अगस्त में दर्ज आंकड़ा जून के उच्चतम स्तर से कम रहा, लेकिन पिछले वर्ष के मुकाबले इसमें उल्लेखनीय वृद्धि बनी रही।

    आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान उदारीकृत प्रेषण योजना के तहत कुल बाहरी प्रेषण 28.98 अरब डॉलर रहा। अगस्त 2026 में विदेशी इक्विटी और डेट बाजारों में निवेश का हिस्सा कुल एलआरएस प्रेषण का लगभग 11.7 प्रतिशत था। अगस्त 2025 में यह अनुपात केवल 5.8 प्रतिशत रहा था। यानी कुल प्रेषण में विदेशी वित्तीय परिसंपत्तियों में निवेश की हिस्सेदारी एक साल में दोगुने से अधिक हो गई।

    एलआरएस के तहत सभी श्रेणियों में किए गए कुल बाहरी प्रेषण में भी वृद्धि दर्ज की गई। अगस्त 2026 में यह राशि बढ़कर 2.74 अरब डॉलर हो गई, जबकि अगस्त 2025 में 2.64 अरब डॉलर थी। इस तरह सालाना आधार पर कुल प्रेषण में 3.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। जुलाई 2026 के 2.58 अरब डॉलर के मुकाबले अगस्त में यह लगभग छह प्रतिशत अधिक रहा।

    विदेश यात्रा एलआरएस के तहत खर्च की सबसे बड़ी श्रेणी बनी हुई है। अगस्त 2026 में भारतीयों ने विदेश यात्रा पर 1.63 अरब डॉलर खर्च किए, जो कुल बाहरी प्रेषण का करीब 59 प्रतिशत था। यह खर्च पिछले वर्ष की तुलना में लगभग एक प्रतिशत और जुलाई 2026 के मुकाबले 11.4 प्रतिशत अधिक रहा। आंकड़े बताते हैं कि विदेश यात्रा से जुड़े भुगतान कुल प्रेषण में सबसे बड़ा हिस्सा बनाए हुए हैं।

    कारोबारी यात्रा पर खर्च में सबसे तेज मासिक बढ़ोतरी देखने को मिली। जुलाई 2026 में इस मद में 10.9 मिलियन डॉलर भेजे गए थे, जबकि अगस्त में यह राशि बढ़कर 51 मिलियन डॉलर हो गई। इस प्रकार एक महीने के भीतर कारोबारी यात्रा से संबंधित प्रेषण लगभग पांच गुना बढ़ गया।

    अन्य श्रेणियों में उपहार के रूप में विदेश भेजी गई राशि अगस्त में 215.72 मिलियन डॉलर रही। निकट संबंधियों के भरण-पोषण के लिए 275.43 मिलियन डॉलर भेजे गए। वहीं, विदेश में अचल संपत्ति खरीदने के लिए 39.59 मिलियन डॉलर और विदेशी बैंकों में जमा करने के लिए 50.78 मिलियन डॉलर का प्रेषण दर्ज किया गया।

    विदेश में चिकित्सा उपचार के लिए भेजी गई राशि में भी वृद्धि हुई। अगस्त 2026 में इस उद्देश्य से किया गया प्रेषण सालाना आधार पर 21.3 प्रतिशत बढ़कर 4.84 मिलियन डॉलर पहुंच गया। कुल आंकड़ों से स्पष्ट है कि एलआरएस के तहत भारतीयों का पैसा विदेश यात्रा, परिवार के भरण-पोषण, संपत्ति खरीद और विदेशी वित्तीय बाजारों में निवेश जैसे विभिन्न उद्देश्यों के लिए भेजा जा रहा है। इनमें विदेशी इक्विटी और डेट में निवेश की बढ़ती हिस्सेदारी अगस्त के आंकड़ों का एक प्रमुख पहलू रही।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, आईएमएफ ने 2026 और 2027 के लिए विकास दर अनुमान 7% किया

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, आईएमएफ ने 2026 और 2027 के लिए विकास दर अनुमान 7% किया

    नई दिल्ली । दुनिया की अर्थव्यवस्था में सुस्ती की आशंकाओं, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा बाजारों में उतार-चढ़ाव और व्यापारिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी हुई है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के सख्त होने के बावजूद भारत प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में सबसे आगे बना हुआ है। घरेलू मांग, सार्वजनिक निवेश, डिजिटल बदलाव और नीतिगत प्रबंधन को इस मजबूती के प्रमुख आधारों में गिना गया है।

    रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रमुख वैश्विक संस्थानों की ओर से भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि के अनुमानों में संशोधन किया जाना देश की आर्थिक संभावनाओं को दर्शाता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने 2026 और 2027, दोनों वर्षों के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर सात प्रतिशत कर दिया है। इस अनुमान के आधार पर भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी स्थिति बनाए रख सकता है।

    भारत की आर्थिक मजबूती का एक बड़ा कारण उसका विशाल और विविध घरेलू बाजार है। घरेलू उपभोग, निजी निवेश और बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च मिलकर आर्थिक गतिविधियों को गति देते हैं। वैश्विक बाजारों में मांग कमजोर होने या अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में अस्थिरता बढ़ने पर घरेलू मांग अर्थव्यवस्था को सहारा प्रदान करती है। इससे बाहरी झटकों का प्रभाव सीमित करने में मदद मिलती है।

    निजी उपभोग का प्रभाव कई प्रमुख क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है। ऑटोमोबाइल, आवास, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों को घरेलू मांग से समर्थन मिल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती आय, शहरीकरण, डिजिटल सेवाओं तक पहुंच और बेहतर कनेक्टिविटी लोगों की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं। इन बदलावों से निवेश और नवाचार के लिए भी नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

    डिजिटल परिवर्तन भी भारत की आर्थिक वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और प्रौद्योगिकी आधारित सरकारी सेवाओं ने लेन-देन को आसान बनाया है तथा लागत कम करने में मदद की है। डिजिटल माध्यमों के विस्तार से छोटे व्यवसायों को भी अपने स्थानीय बाजार से आगे बढ़कर व्यापक ग्राहक वर्ग तक पहुंचने का अवसर मिला है। इससे व्यापारिक गतिविधियों में तकनीक की भूमिका मजबूत हुई है।

    बुनियादी ढांचे में निवेश को भी आर्थिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक बताया गया है। परिवहन, लॉजिस्टिक्स, बिजली और डिजिटल कनेक्टिविटी से जुड़ी परियोजनाओं से वस्तुओं तथा सेवाओं की आवाजाही बेहतर हो रही है। बेहतर संपर्क व्यवस्था से बाजारों तक पहुंच का विस्तार होता है और कारोबार की लागत घटाने में मदद मिलती है। इसके साथ ही निर्यात में विविधता लाने, राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है।

    रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का निर्यात एक ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। वर्ष 2030 तक निर्यात को दो ट्रिलियन डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। विनिर्माण क्षेत्र ने भी वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है। ये आंकड़े उत्पादन और बाहरी व्यापार के क्षेत्र में विस्तार की संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं।

    कुल मिलाकर, भारत की आर्थिक स्थिति को घरेलू मांग, बुनियादी ढांचे के विकास, डिजिटल सेवाओं के विस्तार और नीतिगत प्रबंधन से समर्थन मिल रहा है। हालांकि, वैश्विक आर्थिक सुस्ती, ऊर्जा बाजारों की अस्थिरता और व्यापारिक तनाव जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे माहौल में भारत की घरेलू आर्थिक बुनियाद और बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता आने वाले वर्षों में उसकी विकास गति बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकती है।

  • दो महीने में 250 रुपये प्रति क्विंटल महंगा हुआ गेहूं, त्योहारों से पहले आटा, मैदा और सूजी के दाम बढ़ने की आशंका

    दो महीने में 250 रुपये प्रति क्विंटल महंगा हुआ गेहूं, त्योहारों से पहले आटा, मैदा और सूजी के दाम बढ़ने की आशंका

    नई दिल्ली । त्योहारों के मौसम में आम लोगों के घरेलू बजट पर गेहूं की बढ़ती कीमतों का असर पड़ सकता है। पिछले दो महीनों में गेहूं के भाव में करीब 250 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी दर्ज की गई है। बाजार में कीमतें बढ़कर 3,110 से 3,135 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं। ऐसे में आगामी त्योहारों के दौरान आटा, मैदा और सूजी की कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। बाजार में गेहूं की उपलब्धता, मिलों की खरीद और विभिन्न क्षेत्रों से आ रही मांग को इस तेजी की प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है।

    गेहूं की सरकारी खरीद निर्धारित लक्ष्य से अधिक होने के बावजूद बाजार में कीमतों में मजबूती बनी हुई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस बार सरकार ने 356 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा था, जिसे पार कर लिया गया। इसके बावजूद पिछले सप्ताह मंडियों में गेहूं की आवक कम होने से कीमतों को सहारा मिला। नमी और रंग के आधार पर गेहूं के भाव 3,110 से 3,135 रुपये प्रति क्विंटल के बीच पहुंच गए। हाल के दिनों में कीमतों में 30 से 35 रुपये प्रति क्विंटल की अतिरिक्त बढ़ोतरी भी दर्ज की गई।

    बाजार से जुड़े कारोबारियों के अनुसार, पिछले दो महीनों से गेहूं की मांग में तेजी बनी हुई है। इसके चलते कीमतों में लगभग 250 रुपये प्रति क्विंटल का इजाफा हुआ है। वहीं, निचले स्तरों की तुलना में भाव में कुल तेजी का अंतर 500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचने की बात कही जा रही है। पिछले एक महीने से किसानों की ओर से मंडियों में गेहूं की आवक का दबाव भी कम रहा है। इससे कारोबारियों को पर्याप्त मात्रा में माल जुटाने के लिए खरीद जारी रखनी पड़ रही है।

    गेहूं की कीमतों को मजबूती देने में रोलर फ्लोर मिलों की मांग की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। ये मिलें गेहूं से आटा, मैदा और सूजी तैयार करती हैं। त्योहारों के दौरान इन उत्पादों की खपत बढ़ने की संभावना को देखते हुए मिलों की खरीद प्रभावित हो रही है। इसके साथ ही मैदा और सूजी के व्यापार में बढ़ती गतिविधियों से भी गेहूं की मांग को समर्थन मिल रहा है। यदि कच्चे माल की लागत ऊंची बनी रहती है, तो इसका असर प्रसंस्करण से जुड़े कारोबार पर पड़ सकता है।

    दक्षिण भारत की ओर गेहूं की खेप भेजे जाने से भी बाजार में मांग बनी हुई है। माल की ढुलाई के लिए रेल रैक उपलब्ध होने से दूसरे क्षेत्रों तक आपूर्ति करने में मदद मिल रही है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की मंडियों में भी गेहूं के भाव में दोबारा तेजी आने की जानकारी सामने आई है। इसके अलावा निर्यात मांग को भी कीमतों को सहारा देने वाले कारकों में शामिल किया जा रहा है। हालांकि, अलग-अलग मंडियों में गेहूं की गुणवत्ता, उपलब्धता और परिवहन लागत के आधार पर भाव में अंतर हो सकता है।

    अब बाजार की नजर सरकारी गेहूं की बिक्री पर टिकी हुई है। कारोबारियों का मानना है कि यदि सरकार बाजार में पर्याप्त मात्रा में गेहूं उपलब्ध कराती है, तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। दूसरी ओर, सरकारी आपूर्ति सीमित रहने और मंडियों में आवक कम बनी रहने की स्थिति में भाव मजबूत रह सकते हैं। आगे कीमतों की दिशा काफी हद तक इन दोनों कारकों पर निर्भर करेगी।

    आम उपभोक्ताओं के लिए गेहूं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी चिंता का विषय बन सकती है। आटा, मैदा और सूजी रोजमर्रा के भोजन के साथ त्योहारों पर तैयार होने वाले कई पकवानों में इस्तेमाल होते हैं। मांग बढ़ने पर इन उत्पादों की खुदरा कीमतों में बदलाव की आशंका रहती है, हालांकि गेहूं के थोक भाव में हुई तेजी का असर उपभोक्ताओं तक कितना पहुंचेगा, यह भी प्रसंस्करण लागत, व्यापारियों के मार्जिन और स्थानीय बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।

  • सोने-चांदी में गिरावट के बीच तांबे की कीमतों में तेजी, सप्लाई संकट से बढ़ी बाजार की चिंता..

    सोने-चांदी में गिरावट के बीच तांबे की कीमतों में तेजी, सप्लाई संकट से बढ़ी बाजार की चिंता..

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार में 23 अक्टूबर 2026 को सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट के बीच तांबे में तेजी दर्ज की गई। घरेलू वायदा बाजार मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार कॉमेक्स तक तांबे की कीमतों में बढ़त देखने को मिली। वैश्विक स्तर पर औद्योगिक जरूरतों के लिए तांबे की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है, जबकि इसकी आपूर्ति को लेकर चुनौतियां बढ़ रही हैं। मांग और उपलब्धता के बीच इसी अंतर का असर कीमतों पर दिखाई दे रहा है।

    घरेलू बाजार में एमसीएक्स पर तांबे का भाव 0.53 प्रतिशत की बढ़त के साथ 1,369.90 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार कॉमेक्स में इसकी कीमत 0.95 प्रतिशत बढ़कर 6.4590 डॉलर प्रति औंस दर्ज की गई। दोनों बाजारों में तेजी के बीच तांबा निवेशकों और औद्योगिक क्षेत्र की नजर में बना हुआ है। दूसरी ओर, इसी दिन सोने का भाव एमसीएक्स पर 1,42,871 रुपये प्रति 10 ग्राम और चांदी का भाव 1,95,999 रुपये प्रति किलोग्राम रहा।

    तांबे की कीमतों में तेजी के पीछे सबसे प्रमुख कारण वैश्विक मांग में बढ़ोतरी और आपूर्ति का सीमित होना है। आधुनिक उद्योगों में इस धातु का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माण, बिजली के पावर ग्रिड, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे के विकास में तांबे की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके अलावा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े डाटा सेंटरों के विस्तार के कारण भी तांबे की जरूरत बढ़ रही है। इन क्षेत्रों में बिजली के तारों, विद्युत प्रणालियों और अन्य उपकरणों के लिए तांबे की आवश्यकता होती है।

    मांग में इस बढ़ोतरी के बावजूद उत्पादन में कई बाधाएं सामने आ रही हैं। दुनिया की विभिन्न तांबा खदानों में उत्पादन प्रभावित होने से बाजार में उपलब्धता पर दबाव बना हुआ है। चिली जैसे प्रमुख तांबा उत्पादक क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर असर पड़ने की जानकारी है। कुछ खदानों में हड़तालों के कारण कामकाज बाधित हुआ है, जबकि दूसरी जगहों पर अयस्क की गुणवत्ता घटने से उत्पादन संबंधी चुनौतियां बढ़ रही हैं। इससे मौजूदा खदानों से तांबे की आपूर्ति बनाए रखना कठिन हो रहा है।

    नई खदानें विकसित करना भी आसान नहीं है। इसके लिए लंबा समय और बड़ी पूंजी की जरूरत होती है। दूरदराज के क्षेत्रों में खनन परियोजनाएं शुरू करने पर लागत बढ़ जाती है। नई परियोजनाओं से उत्पादन शुरू होने में देरी होने के कारण बढ़ती वैश्विक मांग के अनुरूप आपूर्ति बढ़ाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में तांबे के बाजार में उपलब्धता को लेकर चिंता बनी हुई है।

    अमेरिका की टैरिफ नीतियों को लेकर बनी आशंकाएं भी बाजार की परिस्थितियों को प्रभावित कर रही हैं। संभावित शुल्क संबंधी बदलावों के मद्देनजर अमेरिका में तांबे का भंडार बढ़ाए जाने से वैश्विक आपूर्ति के प्रवाह पर असर पड़ सकता है। इससे विभिन्न बाजारों में उपलब्ध धातु की मात्रा और कीमतों पर दबाव की स्थिति बन सकती है।

    बाजार में तांबे की भविष्य की कीमतों को लेकर भी चर्चा तेज है। मजबूत औद्योगिक मांग, सीमित उत्पादन और नई खदानों के विकास में लगने वाला समय इसकी कीमतों के लिए महत्वपूर्ण कारक बने हुए हैं। हालांकि, भविष्य में कीमतें किस दिशा में जाएंगी, यह मांग, आपूर्ति, उत्पादन और व्यापार नीतियों में होने वाले बदलावों पर निर्भर करेगा। फिलहाल, सोने-चांदी में गिरावट के विपरीत तांबे में दर्ज तेजी ने कमोडिटी बाजार में इस धातु की अलग स्थिति को रेखांकित किया है।