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  • श्रीलंका में स्वास्थ्य प्रणाली संकट में, ईंधन की कमी से अगले 48 घंटे अहम: डॉक्टरों की वार्निंग

    श्रीलंका में स्वास्थ्य प्रणाली संकट में, ईंधन की कमी से अगले 48 घंटे अहम: डॉक्टरों की वार्निंग


    नई दिल्ली मध्य पूर्व में जारी तनाव और वैश्विक वन्यजीव संकट का असर भी देखने को मिल रहा है। देश के चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मियों ने अगले 48 घंटों को बेहद महत्वपूर्ण बताया है और चेतावनी दी है कि अगर जेल और कारखानों की समस्याओं का समाधान तुरंत नहीं हुआ, तो अगले एक सप्ताह में हॉस्पिटल सिस्टम में हो सकते हैं।

    शिक्षाविदों और स्वास्थ्य कर्मचारियों की कठिनाइयाँ
    स्वास्थ्य कर्मियों को अपनी अजीबो-गरीब स्थिति का खुलासा करना पड़ता है, जबकि अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को सरकारी सुविधाएं मिलती हैं। स्थिर क्यूआर-बेस्ड फ़्यूल राशनिंग मशीनरी नहीं है; हॉस्पिटल आने-जाने के लिए भी ये पार्ट कम है।फुल की कमी और लॉन्ग वर्क में समय गंवाना की देखभाल पर असर पड़ रहा है।कुछ डॉक्टर और विशेषज्ञ पर कोई काम नहीं हो रहा है, जिससे विशेषज्ञ सेवा प्रभावित हो रही है।
    स्वास्थ्य सेवा को बनाए रखने के उपकरण

    चिकित्सक एवं स्वास्थ्य कर्मियों का कहना है कि हॉस्पिटल, कांस्टेबिल, मॉल में रहना, इसके लिए ईंधन की आपूर्ति एवं उपकरण में सुधार आवश्यक है। जी आइडियोए (इंटरनेटमेंट मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन) ने कहा कि वह घोड़ों पर नजर रख रही है और स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए आगे के कदम उठाने की घोषणा की है।

    सरकार के कदम और प्रतिक्रिया

    श्रीलंका सरकार ने जलेबी संकट को देखते हुए कुछ कदम उठाए हैं:

    रविवार को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया।
    पेट्रोल-डीज़ल की राशनिंग लागू।
    क्यूआर-आधारित प्लांट सप्लाई शुरू।

    हालांकि मेडिकल कम्यूनिटी इन पेशेवरों का विरोध जारी है, क्योंकि कई स्वास्थ्य कर्मी लंबी दूरी तय करके काम पर आ रहे हैं और राशनिंग के लिए अपनी समस्याएं बढ़ा रहे हैं।

    श्रीलंका में ईंधन संकट के कारण अगले 48 घंटों में बेहद अहम माने जा रहे हैं। यदि जल्द ही उपाय नहीं किया गया, तो देश के हॉस्पिटल सिस्टम पर भारी असर और मरीजों की देखभाल बाधित हो सकती है। विशेषज्ञ का कहना है कि स्वास्थ्य कर्मियों की सुविधा और सतत ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित करना इस संकट का मूल समाधान है।

  • मध्य पूर्व तनाव के बीच यूएन महासचिव का बड़ा बयान अकेले अमेरिका से नहीं सुलझेगा संकट

    मध्य पूर्व तनाव के बीच यूएन महासचिव का बड़ा बयान अकेले अमेरिका से नहीं सुलझेगा संकट


    नई दिल्ली: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने वैश्विक शांति और सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है उन्होंने खास तौर पर होर्मुज स्ट्रेट में जारी संकट और डोनाल्ड ट्रंप की बोर्ड ऑफ पीस पहल पर सवाल उठाते हुए इसे मौजूदा हालात के लिए पर्याप्त नहीं बताया

    ब्रुसेल्स में यूरोपीय काउंसिल की एक अहम बैठक के दौरान गुटेरेस ने कहा कि ईरान अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव ने क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता को गंभीर खतरे में डाल दिया है उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे जटिल संकटों का समाधान किसी एक देश या व्यक्ति के प्रयासों से नहीं बल्कि बहुपक्षीय सहयोग से ही संभव है

    गुटेरेस ने स्पष्ट किया कि उन्होंने हालिया तनाव के बाद ट्रंप से सीधे बातचीत नहीं की है हालांकि उनकी चर्चा अमेरिकी प्रशासन के अन्य अधिकारियों से जरूर हुई है उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र लगातार खाड़ी देशों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के संपर्क में है ताकि स्थिति को नियंत्रित किया जा सके

    होर्मुज स्ट्रेट के महत्व को रेखांकित करते हुए गुटेरेस ने कहा कि यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक अहम मार्ग है और यहां किसी भी तरह का व्यवधान पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र इस समुद्री मार्ग को फिर से सुरक्षित और सुचारु बनाने के लिए हर संभव प्रयास करने को तैयार है

    उन्होंने अतीत का उदाहरण देते हुए ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव का जिक्र किया जिसके तहत रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के दौरान खाद्यान्न और उर्वरकों के निर्यात को संभव बनाया गया था हालांकि बाद में यह समझौता ज्यादा समय तक टिक नहीं सका फिर भी यह बहुपक्षीय प्रयासों की प्रभावशीलता का एक उदाहरण माना जाता है

    ट्रंप की बोर्ड ऑफ पीस पहल पर टिप्पणी करते हुए गुटेरेस ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र इस पहल के साथ सहयोग कर रहा है लेकिन केवल एकतरफा दृष्टिकोण इतने बड़े और जटिल संकट का समाधान नहीं कर सकता उन्होंने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का पालन किसी भी शांति प्रक्रिया के लिए अनिवार्य है

    उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में यह पहल काफी हद तक एक व्यक्तिगत परियोजना के रूप में दिखाई दे रही है जिसमें व्यापक वैश्विक भागीदारी की कमी है ऐसे में स्थायी शांति के लिए जरूरी है कि सभी संबंधित पक्षों को साथ लाया जाए और संवाद के जरिए समाधान खोजा जाए

  • मिडिल ईस्ट तनाव के बीच Donald Trump का दावा, ईरान की मिलिट्री कमजोर

    मिडिल ईस्ट तनाव के बीच Donald Trump का दावा, ईरान की मिलिट्री कमजोर


    नई दिल्ली अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान की सैन्य क्षमता “पूरी तरह खत्म” हो गई है। हालाँकि, जमीनी स्तर पर संघर्ष अभी भी जारी है और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति, विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंता बनी हुई है।

    व्हाईट हाउस के साउथ लॉन में अविश्वास से बातचीत के दौरान अख्तर ने कहा कि अमेरिका अपने सैन्य अभियान के लक्ष्य को हासिल करने के बेहद करीब पहुंच चुका है। उन्होंने संकेत दिया कि मध्य पूर्व में ईरान के खिलाफ चल रहा बड़ा सैन्य अभियान जल्द ही समाप्त हो सकता है।

    अमेरिका के सैन्य लक्ष्य क्या हैं?

    स्केल ने स्पष्ट किया कि अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान की मिसाइल क्षमता, लॉन्च किए गए सिस्टम और डिफेंस सैटेलाइट को पूरी तरह से तैयार करना है। इसके अलावा ईरान के रक्षा उद्योग, नौसेना, परमाणु ऊर्जा संयंत्र और एंटी-एयरक्राफ्ट सिस्टम को भी खत्म करना इस अभियान का हिस्सा है।

    उन्होंने कहा कि अमेरिका यह सुनिश्चित करना चाहता है कि ईरान किसी भी हाल में परमाणु हथियार विकसित न कर सके और वह इस दिशा में आगे न बढ़ सके।

    “हम जीत गए हैं” – बायस्ट

    असलहे ने परमाणु हथियारबंद सामान में कहा कि सैन्य स्थिति पूरी तरह से अमेरिका के पक्ष में है। उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि हम जीत गए हैं। हमने अपनी सैन्य ताकत खत्म कर दी है।”

    हालाँकि, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई देशों द्वारा विराम की अपील की जा रही है, लेकिन किआल ने साफ कर दिया कि अमेरिका से युद्ध की दिशा इस दिशा में नहीं सोची जा रही है। उनके अनुसार, जब विरोध पूर्ण तरह से हो रहा हो, तब युद्धविराम करना नहीं होता।

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर जिम्मेदारी का प्रश्न

    रियल ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अहम स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि इस मार्ग पर अमेरिका को ज्यादा छूट नहीं है, लेकिन यूरोप, जापान, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों को इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है, इसलिए उन्हें अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी उठानी चाहिए।

    उन्होंने यह भी कहा कि इस मार्ग को फिर से खोलना “आसान सैन्य कदम” हो सकता है, लेकिन इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय सहायता आवश्यक होगी।

    सहयोगी सहयोगियों की भूमिका पर प्रश्न

    विद्रोहियों ने नाटो की भूमिका पर भी सवाल उठाया और कहा कि अब तक गठबंधन ने इस मुद्दे पर कोई ठंडा कदम नहीं उठाया है। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों से भी सक्रिय भूमिका की अपील की।

    इजराइल के साथ संस्तुति

    अछूत ने इजराइल के साथ अमेरिका के मजबूत संतुलन का ज़िक्र करते हुए कहा कि दोनों देश इस संघर्ष में अपने लक्ष्य को हासिल करने के करीब हैं।

    आर्थिक प्रभाव को खारिज कर दिया गया

    तेल के गोदामों में प्लांट और बाजार में प्लॉट को लेकर उठती रही कंपनी को दिवालिया घोषित करते हुए कहा कि यह सैन्य कार्रवाई जरूरी थी। उन्होंने कहा कि अमेरिका किसी भी कीमत पर “परमाणु हथियार” हासिल नहीं कर पाएगा।

  • Israel ने ईरान के प्रमुख इलाकों में एयर स्ट्राइक की, तेहरान, करज और इस्फहान प्रभावित

    Israel ने ईरान के प्रमुख इलाकों में एयर स्ट्राइक की, तेहरान, करज और इस्फहान प्रभावित

     

    नई दिल्ली। ईरान और इजरायल के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। फार्स न्यूज एजेंसी के अनुसार, शनिवार सुबह ईरान की राजधानी तेहरान में कम से कम दो धमाकों की आवाज सुनी गई। एयर स्ट्राइक का असर राजधानी के आसपास के इलाकों शहर-ए-रे और कर्ज पर भी पड़ा। साथ ही, दक्षिणी ईरान के ऐतिहासिक शहर इस्फहान में भी एयर स्ट्राइक की खबर है। जल्द ही, इन हमलों में किसी के हताहत होने या संपत्ति को नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है। इजरायली डिफेंस फोर्स (IDF) ने इन हमलों की पुष्टि की और कहा कि यह स्ट्राइक ईरान की इस्लामिक रिपब्लिक सरकार के ठिकानों को असर बनाने के लिए की गई है।
    IDF ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी दी कि उनका हमला बेरूत के दक्षिणी उपनगरों के सात इलाकों को खाली करने के नोटिस के साथ जारी है। इन इलाकों में हिजबुल्लाह के इंफ्रास्ट्रक्चर पर तेजी से हमले होंगे। अलजजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, 2 मार्च से इजरायल के हमलों में लेबनान में 1,000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। इस हफ़्ते की शुरुआत में, IDF ने दावा किया कि उसने ईरान के बासिज इंटेलिजेंस चीफ इस्माइल अहमदी और एक अन्य सीनियर अधिकारी को मार गिराया।
    इससे पहले केवल जांच चल रही थी, लेकिन अब इजरायल ने इस बात की पुष्टि कर दी है। IDF ने बताया कि तेहरान के बीचों-बीच बासिज यूनिट के सीनियर कमांडर गुलाम रेजा सुलेमानी सहित कई सीनियर अधिकारियों को भी हवाई हमले में फंसाया गया।

    इजरायली के अनुसार, अहमदी ने इस साल की शुरुआत में ईरान में हुए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों पर सरकार की कार्रवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इन प्रदर्शनकारियों में हजारों लोगों की मौत हुई, और इजरायल का दावा है कि अहमदी इसमें शामिल था।

    आंकड़ों के अनुसार, इजरायली इन हमलों के माध्यम से ईरानी सत्ता पर अधिकारियों की पकड़ को कमजोर करने का प्रयास कर रहा है। हाल के हमलों में कई बड़े ईरानी अधिकारी मारे गए हैं, जिनमें सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई, सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी और इंटेलिजेंस मंत्री इस्माइल खतीब शामिल हैं।

    ईरानी अधिकारियों के खिलाफ इस तरह के एयर स्ट्राइक यह संकेत देते हैं कि इजरायल अब केवल सीमांत या मध्य पूर्व तक ही सीमित नहीं रहना चाहता है, बल्कि वह ईरान के आंतरिक सुरक्षा आयाम और इंटेलिजेंस नेटवर्क को भी प्रभावित बना रहा है।

    विश्लेषकों का कहना है कि यह कार्रवाई मध्य पूर्व की स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा के आंकड़ों से गंभीर है। यदि तनाव इसी तरह बढ़ता है, तो यह सीधे तौर पर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक व्यापार और सैन्य रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है।

    इस बीच, ईरानी मीडिया ने केवल धमाकों की पुष्टि की है लेकिन हमले के प्रभाव और हताहतों की जानकारी साझा नहीं की है। इसका मतलब यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अभी भी स्थिति की पूरी संभावनाओं का आकलन कर रहा है।

    संक्षेप में, इजरायल के हमले यह दबाव हैं कि मध्य पूर्व में संघर्ष अब सिर्फ स्थानीय स्तर पर नहीं, बल्कि ईरान के मुख्य शहरों और वरिष्ठ अधिकारियों तक फैल चुका है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक राजनीतिक संतुलन पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।

  • ईरान ने ब्रिटेन को चेताया: अमेरिकी ठिकानों का इस्तेमाल उसके नागरिकों के लिए बन सकता है खतरा

    ईरान ने ब्रिटेन को चेताया: अमेरिकी ठिकानों का इस्तेमाल उसके नागरिकों के लिए बन सकता है खतरा


    तेहरान। ईरान ने ब्रिटेन द्वारा अपने सैन्य ठिकानों को अमेरिकी हमलों के लिए इस्तेमाल की अनुमति देने पर कड़ी नाराजगी जताई है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने शनिवार को कहा कि ब्रिटेन की जनता ज्यादातर इस्राइल-अमेरिका के युद्ध में शामिल नहीं होना चाहती। अराघची ने चेतावनी दी कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर द्वारा अपने नागरिकों की सुरक्षा की अनदेखी करते हुए यह अनुमति देना ब्रिटिश नागरिकों की जान को खतरे में डालता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान अपनी आत्मरक्षा के अधिकार का पूरी तरह इस्तेमाल करेगा।

    अमेरिका को ब्रिटेन ने दी ठिकानों का इस्तेमाल

    अराघची के बयान के बाद पश्चिम एशिया में संघर्ष के ब्रिटेन तक फैलने की आशंका बढ़ गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ब्रिटेन ने अमेरिकी फौज को होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरानी ठिकानों पर हमले के लिए अपने ठिकानों का इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन के मंत्रियों ने शुक्रवार को अमेरिकी अभियानों के दायरे को बढ़ाने पर सहमति जताई। इनमें ईरानी मिसाइल ठिकानों को निष्क्रिय करने के लिए रक्षात्मक अभियान शामिल हैं, जो होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमला रोकने के उद्देश्य से किए जाएंगे।

    अमेरिकी दबाव या रणनीतिक यू-टर्न?

    पहले ब्रिटेन ने यह अनुमति सिर्फ उन्हीं अभियानों तक सीमित रखी थी, जो ब्रिटिश नागरिकों या हितों को सीधे खतरे में डालने वाले हमलों को रोकने के लिए थीं। लेकिन इस कदम को लेकर विपक्षी दलों में विरोध भी देखा गया। ब्रिटेन की कंजर्वेटिव पार्टी की नेता केमी बैडेनोच ने सोशल मीडिया पर इसे “सबसे बड़ा यू-टर्न” करार दिया।

    ईरान का स्पष्ट संदेश

    अब्बास अराघची ने कहा कि ब्रिटेन द्वारा अपने ठिकानों तक अमेरिकी पहुंच की अनुमति को ईरान आक्रामकता में भागीदारी के रूप में देखेगा। उनका मानना है कि यह कदम क्षेत्रीय तनाव को बढ़ाएगा और पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति को जटिल बना सकता है।

  • ग्लोबल टेंशन बढ़ा, ईरान ने 4,000 किलोमीटर दूर डिएगो गार्सिया पर मिसाइल दागी

    ग्लोबल टेंशन बढ़ा, ईरान ने 4,000 किलोमीटर दूर डिएगो गार्सिया पर मिसाइल दागी


    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी तनाव अब वैश्विक स्तर पर प्रभाव डाल रहा है। शुरूआत में यह झड़पें मिडिल ईस्ट तक ही सीमित थीं, लेकिन हाल ही में ईरान ने हिंद महासागर में अमेरिका और ब्रिटेन के मिलिट्री बेस डिएगो गार्सिया को बनाया।

    अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार, ईरान ने डिएगो गार्सिया पर कम से कम दो मिड-रेंज बैलिस्टिक मिसाइलें दागी। इस बेस पर अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त मिलिट्री केंद्र मौजूद है। रिपोर्ट के अनुसार, एक मिसाइल उड़ान के दौरान फेल हो गई, जबकि दूसरी मिसाइल अमेरिकी इंटरसेप्टर वॉरशिप से टकरा गई।

    डिगो गार्सिया मध्य हिंद महासागर में इक्वेटर के दक्षिण में स्थित है और ईरान से लगभग 4,000 किलोमीटर दूर है। इस हमले से साफ हुआ कि ईरान की मिसाइल रेंज पहले बताई गई सीमा से कहीं ज्यादा है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पहले कहा था कि ईरानी मिसाइलों की रेंज 2,000 किलोमीटर तक सीमित है। लेकिन डिएगो गार्सिया पर हमले इस दावे को चुनौती देता है। अभी तक ईरानी अधिकारियों ने यह नहीं बताया कि यह हमला किस प्रकार की मिसाइल से किया गया।

    भारत से डिएगो गार्सिया की दूरी लगभग 1,800 किलोमीटर है। यह एयरबेस अमेरिका और ब्रिटेन के लिए एशिया और पश्चिम एशिया में इजरायल केंद्र का काम करता है। यहां से अमेरिका अपने बमवर्षक विमान, परमाणु पनडुब्बियां और गाइडेड मिसाइल जहाज तैनात करता है। इसके अलावा बेस में विशाल ईंधन भंडारण, रडार सिस्टम और कंट्रोल टावर मौजूद हैं, जो लंबी दूरी के सैन्य अभियानों को संभव बनाते हैं।

    इस हमले ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए चिंता बढ़ा दी है। डिएगो गार्सिया अमेरिका और ब्रिटेन के लिए हिंद महासागर में ऑपरेशन का मुख्य केंद्र है, और किसी भी हमले का प्रभाव सीधे तौर पर इजरायल संतुलन और तेल-गैस आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है।

    अगर, अमेरिका और ब्रिटेन की ओर से इस हमले पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि इस हमले ने ईरानी मिसाइल क्षमता और इजरायल पहुंच को दुनिया के सामने प्रदर्शित किया है। इससे साफ है कि ईरान अब सिर्फ अपने पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं रहा बल्कि दूर-दराज के इजरायली ताकत तक हमला करने में सक्षम हो गया है।

    विश्लेषकों का कहना है कि डिएगो गार्सिया पर हमला वैश्विक सुरक्षा और सैन्य संतुलन के एलएस से गंभीर संकेत है। अमेरिका और ब्रिटेन के लिए यह चुनौती है कि वे अपने मध्य और दक्षिण एशिया में स्थित ठिकानों की सुरक्षा को और मजबूत करें। वहीं, ईरान ने यह भी संकेत दिया कि उसकी मिसाइल ताकतें अब केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं हैं, बल्कि लंबी दूरी के निशानों तक पहुंच सकती हैं।

    इस घटना के बाद वैश्विक बाजार में तेल और ऊर्जा की पंक्तियों में उछाल देखा गया है, क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट और हिंद महासागर में तनाव से गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।

    ईरानी मिसाइल हमले ने स्पष्ट किया है कि अब संघर्ष सिर्फ स्थानीय स्तर पर नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी फैल सकता है। इसका असर न केवल सैन्य रणनीतियों पर होगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार पर भी दीर्घकालिक दबाव डाल सकता है।

  • ट्रंप सरकार ने कथित यहूदी-विरोधी भेदभाव के मामले में Harvard University के खिलाफ शिकायत दर्ज की

    ट्रंप सरकार ने कथित यहूदी-विरोधी भेदभाव के मामले में Harvard University के खिलाफ शिकायत दर्ज की


    नई दिल्ली अमेरिका में प्रशासन ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के खिलाफ कथित यहूदी-विरोधी भेदभाव के मामलों को लेकर शिकायत दर्ज की है। यह कदम महीनों से रुकी बातचीत के बाद उठाया गया है। मैसाचुसेट्स जिले के लिए संयुक्त राज्य जिला न्यायालय में याचिका दर्ज की गई है।

    सरकार ने आरोप लगाया कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने यहूदियों और इजरायली छात्रों के नागरिक अधिकारों का उल्लंघन किया और उन्हें उनकी जाति या राष्ट्रीय मूल के आधार पर गंभीर आलोचना का सामना करना पड़ा। शिकायत में कहा गया है कि इससे छात्रों को शिक्षा में भाग लेने और शिक्षा से मिलने वाले लाभ से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।

    सरकार का कहना है कि हार्वर्ड को यहूदी और इजरायली छात्रों के साथ संरक्षण की जानकारी दी गई थी, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि विश्वविद्यालय ने अपने नीतिगत विचारधारा और व्यवहार के माध्यम से यहूदियों और इजराइलियों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा दिया।

    जानकारी के अनुसार, जनवरी 2025 से अमेरिकी सरकार ने कई पत्रिकाओं को चेतावनी दी थी कि यदि वे अपनी कंपनियों में बदलाव नहीं करते हैं, तो उनकी फंडिंग में कटौती की जाएगी। मुख्य संप्रदाय में यहूदी-विरोधी कहानियों को शामिल किया गया और कुछ अल्पसंख्यक अल्पसंख्यकों के लिए विशेष विविधता इनिशिएटिव्स को समाप्त किया गया।

    हालाँकि, अप्रैल 2025 में हार्वर्ड ने इन अल्पाइन को खारिज कर दिया, जिसके बाद किआल प्रशासन ने घोषणा की कि विश्वविद्यालय के लिए 2.2 मिलियन डॉलर के बहुवर्षीय अनुदान और 60 मिलियन डॉलर के बहुवर्षीय फ़ैक्ट्रीज़ को रेफ़्रिजरेटर कर दिया जाएगा।

    साथ ही, फरवरी 2025 में विक्की ने कहा कि उनकी सरकार हार्वर्ड से 1 डॉलर का हर्जाना मांग रही है, तथाकथित यहूदी-विरोधी और भेदभावपूर्ण समुदायों के लिए वित्तीय जिम्मेदारी तय की जा सके।

    यह मामला अमेरिका में शिक्षा की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर विवाद का केंद्र बन गया है। विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इस कदम का प्रभाव न केवल हार्वर्ड बल्कि अन्य आईवी लीग और प्रमुख वैज्ञानिकों पर भी पड़ सकता है।

    अल्पसंख्यक प्रशासन का रुख यह बताता है कि वह अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव और अधिकारों को सुरक्षित करने के नाम पर व्यवसायों पर दबाव बना रही है। वहीं, विश्वविद्यालय की ओर से अनुपूरक को खारिज कर दिया गया है और उन्होंने कानूनी लड़ाई के संकेत दिए हैं।

    इस मामले से यह स्पष्ट होता है कि अकादमी के स्टूडियो, सरकारी फंडिंग और नागरिक अधिकार की सुरक्षा के एक कॉम्प्लेक्स और संवेदनशील तत्व बन गए हैं। अमेरिकी अदालतों में यह केस आने वाले महीनों में व्यापक बहस का कारण बन सकता है।

  • होर्मुज संकट से न्यूजीलैंड में तनाव, पीएम लक्सन बोले- ईरान ने स्ट्रेट बंद करने पर मजबूर किया

    होर्मुज संकट से न्यूजीलैंड में तनाव, पीएम लक्सन बोले- ईरान ने स्ट्रेट बंद करने पर मजबूर किया


    नई दिल्ली हाल ही में ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह से बंद कर दिया है, जिसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है। इस फैसले के बाद तेल की झील में उछाल देखा जा रहा है और खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है। अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों ने ईरान की इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। कुल 20 देशों ने संयुक्त बयान जारी कर इस कदम पर प्लायबोल्लाम को शामिल किया है, जिसमें न्यूजीलैंड भी शामिल है।

    न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने मध्य पूर्व में ढलानों और ईरान की कार्रवाई को लेकर चिंता जताई। उन्होंने सोशल मीडिया एक्स प्लेटफॉर्म पर लिखा कि ईरान ने फूल पेट्रोल और जरूरी सामान ले जाने वाले साथियों के स्ट्रेट को पूरी तरह से बंद करने पर मजबूर कर दिया है, जिससे न्यूजीलैंड और अन्य देशों में तेल और जरूरी सामान ले जाने लगे हैं।

    पीट लक्सन ने कहा, “न्यूजीलैंड का रिकॉर्ड हमेशा से खुला स्टॉक शेयरहोल्डिंग और बहुप्रतिक्षित साझेदारी के माध्यम से ग्लोबल ट्रेड को सुरक्षित बनाए रखने का है। होर्मुज स्ट्रेट से सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करने के लिए भविष्य में भी हमारी इंडस्ट्री इसी दिशा में काम करती है।”

    संयुक्त बयान में देशों की सूची में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, जापान, कनाडा, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, डेनिश, लातविया, स्लोवेनिया, एस्टोनिया, नॉर्वे, स्वीडन, फ़िनलैंड, चेकिया, रोमानिया, बहरीन और लिथुआनिया शामिल हैं। इन ईस्ट ने मिलकर कहा कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट को लाभ पहुंचाता है और आतंकवादियों पर हमले करना अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है।

    बयान में यह स्पष्ट किया गया कि इस तरह के कदम वैश्विक ऊर्जा परमाणु ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय शांति के लिए खतरा हैं। इसमें मांग की गई कि ईरान सागर, मिसाइल हमले और माइन प्लांट जैज़ को तुरंत बंद करें। साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का पालन किया जाये।

    होर्मुज स्ट्रीट दुनिया के लिए साम्राज्य के रूप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह तेल और गैस की अंतरराष्ट्रीय एस्ट्राडोल लाइन का मुख्य मार्ग है। किसी भी तरह की रोक या बाधा से वैश्विक बाजार और आर्थिक स्थिरता पर असर पड़ सकता है।

    न्यूजीलैंड और अन्य देशों ने यह भी कहा कि स्ट्रेट से सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करने के लिए बहुप्रतीक्षित प्रयास का समर्थन जारी रखें। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि सभी देशों को समुद्री कानून का सम्मान दिया जाए और अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा परमाणु ऊर्जा की आजादी बरकरार रखी जाए।

    यह घटना केवल मध्य पूर्व का नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा और व्यापार का महत्वपूर्ण मार्ग है। ईरान की कार्रवाई से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता बढ़ गई है और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।

  • होर्मुज स्ट्रेट पर अंतरराष्ट्रीय चिंता, 20 देशों ने ईरान से शांति बनाए रखने की अपील की

    होर्मुज स्ट्रेट पर अंतरराष्ट्रीय चिंता, 20 देशों ने ईरान से शांति बनाए रखने की अपील की


    नई दिल्ली होर्मुज स्ट्रीट के हालात काफी रंगीन बने हुए हैं। इस प्रतिष्ठित जलसंधि को बंद करने और वहां की संस्थाओं को प्रभावित करने से दुनिया के देशों में कई गहरी चिंताएं और संभावनाएं हैं। इस मामले में 20 देशों ने संयुक्त बयान जारी कर ईरान से अपील की है कि वह अपने हमलों और धमाकियों को तुरंत बंद करे।

    बयान में शामिल देशों में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, जापान, कनाडा, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, डेनमार्क, लातविया, स्लोवेनिया, एस्टोनिया, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, चेक यूनाइटेड रोमानिया, बहरीन और लिथुआनिया के नेता शामिल हैं। बयान में उन्होंने कहा कि ईरान की अनैतिकता पर हमले, तेल और गैस पर हमले, सिविलियन हमलों पर हमले और हथियारों पर हमले और हथियारों पर हमले – पर पूरी तरह से निंदा की जाती है।

    बयान में आगे कहा गया है कि नेविगेशन की स्वतंत्रता अंतर्राष्ट्रीय कानून का मूल सिद्धांत है, जिसमें यूएन कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ डी सी भी शामिल है। इस प्रकार की गतिविधि वैश्विक ऊर्जा शक्ति और अंतर्राष्ट्रीय शांति के लिए खतरा मानी जाती है। यूसी ईसाइओन प्रस्ताव 2817 के तहत, इस तरह की यात्राअंदाजी को तत्काल रोक की अपील की गई।

    साथ ही, संयुक्त बयान में कहा गया कि इस तनाव का असर दुनिया भर के लोगों पर, विशेष रूप से सौम्य वर्ग पर। उन्होंने ईरान से अपील की कि दिवास्वप्न और मिसमैथली, बारूदी सुरंग और विस्फोटकों को बाधित करने वाली को तत्काल रोक दिया जाए।

    इन देशों ने होर्मुज स्ट्रेट में सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करने के प्रयासों का समर्थन किया और कहा कि वे इस दिशा में सहायता के लिए तैयार हैं। साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के निर्णय का स्वागत किया गया, जिसके तहत रणनीतिक साझेदारी को जारी करने की घोषणा की गई। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार को स्थिर करना और ग्लोबल शॉर्ट चेन पर प्रभाव कम करना है।

    बयान में यह भी कहा गया कि संयुक्त राष्ट्र और पीएस के माध्यम से सबसे अधिक प्रभावित देश को मदद दी जाएगी। इसके साथ ही सभी देशों के लिए समुद्री सुरक्षा, नेविगेशन की स्वतंत्रता और अंतर्राष्ट्रीय कानून का पालन करना आवश्यक बताया गया है। 

    इस अपील में संयुक्त रूप से ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को लेकर अहम बात कही गई है। इसके साथ ही, ग्लोबल कम्यूनिटी ने यह भी कहा कि अंतर्राष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र का पालन सभी के लिए अनिवार्य है।
  • 'क्रूड ऑयल' ने बदली थी गल्फ देशों की किस्मत, फिर अमेरिका ने कैसे किया तेल साम्राज्य पर कब्जा?

    'क्रूड ऑयल' ने बदली थी गल्फ देशों की किस्मत, फिर अमेरिका ने कैसे किया तेल साम्राज्य पर कब्जा?

    नई दिल्ली। अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के बाद से पूरे मिडिल ईस्ट में खलबली मची हुई है. 28 फरवरी को हुए इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत हो गई. इसके बाद ईरान ने भी अमेरिका और इजरायल पर पलटवार शुरू कर दिया. इस युद्ध का असर पहले तो सिर्फ मिडिल ईस्ट पर था लेकिन अब धीरे-धीरे इसका असर पूरी दुनिया पर दिखाई दे रहा है. युद्ध की वजह से वैश्विक ऊर्जा सप्लाई, शिपिंग रूट्स और ईंधन बाजार पर भारी दबाव दिखाई दे रहा है. पूरी दुनिया की ऊर्जा के लिए तेल और गैस सबसे जरूरी है लेकिन युद्ध की वजह से ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में नाकेबंदी कर दी है. जिसकी वजह से दुनियाभर के देशों को तेल और गैस की किल्लतों का सामना करना पड़ रहा है. क्रूड ऑयल ही खाड़ी देशों की सबसे बड़ी संपदा है जिसे पूरी दुनिया ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल करती है. इस युद्ध के पीछे कहीं न कहीं अमेरिका की मंशा उनके तेल पर कब्जे की है!

    भौगोलिक तौर पर अगर देखा जाए तो गल्फ देशों में सिर्फ रेगिस्तान ही है. ऐसे में जब तेल के उपयोग के बारे में दुनिया को नहीं पता था तब यहां रहने वाले लोगों को अपना जीवन-यापन बहुत कठिनाइयों के साथ करना होता था. ऐसे में जब दुनिया को क्रूड ऑयल के बारे में जानकारी मिली तो यहां भी क्रूड ऑयल की तलाश शुरू हुई. धीरे-धीरे मिडिल ईस्ट के इलाकों में क्रूड ऑयल की एक के बाद एक करके बहुत से तेल के भंडार खोज निकाले गए. इन तेल के भंडारों के मिलने के बाद मिडिल ईस्ट की दशा बदल गई. यहां रहने वाले लोग अचानक से अमीर होते गए. अचानक इतनी तेजी से विकास कर रहे मिडिल ईस्ट देशों पर अमेरिका सहित पश्चिमी देशों की भी नजर पड़ी तो पता चला इनके विकास के पीछे इनके यहां के तेल भंडारण का पाया जाना है. ऐसे में पश्चिमी देशों ने इन तेल के भंडारों पर कब्जा करने की चाल चलनी शुरू कर दी.

    अमेरिका की नजर गल्फ देशों के तेल पर थीः ब्रिटेन
    बीबीसी न्यूज के मुताबिक ब्रिटेन के कुछ सरकारी दस्तावेजों से इस बात का पता चलता है कि अमेरिका ने 1973 में ही मिडिल ईस्ट देशों के तेल भंडारों पर कब्जा करने की योजना बनाई थी. साल 1973 में अरब देशों ने इजरायल के हमले के बाद तेल बिक्री पर रोक लगा दी थी. इसके बाद मिस्र और सीरिया के बीच मुकाबले में इजरायल एक बड़ी ताकत बनकर उभरा. इस युद्ध को ‘अक्तूबर युद्ध’ के नाम से जाना गया था. ब्रिटेन सरकार ने उस दौरान के कुछ सरकारी दस्तावेजों को हाल ही में सार्वजनिक किया है.

    अमेरिका ने तेल भंडारों पर कब्जे की योजना बनानी शुरू कर दी
    ब्रिटेन के जारी किए गए इन दस्तावेजों से पता चलता है कि ब्रिटेन सरकार ने उस संकट को इतनी गंभीरता से लिया कि इस बारे में एक आपातकालीन योजना बनाई गई कि अमेरिका तेल के भंडारों पर कब्जा करने के लिए क्या-क्या कदम उठा सकता है? ब्रिटेन ने यहां तक अनुमान लगा लिया था कि अमेरिका आने वाले दिनों में सऊदी अरब और कुवैत में तेल भंडार पर कब्जा करने के लिए वहां पर एयरफोर्स की मदद ले सकता है और अमेरिका ब्रिटेन को भी अबूधाबी में ऐसा ही करने के लिए कह सकता है. इन डॉक्यूमेंट्स से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि तेल की आपूर्ति की चिंता किस हद तक पश्चिमी देशों के लिए रही है.

    अमरिका ने ब्रिटिश राजदूत को दी थी चेतावनी
    गल्फ देशों में तेल पर कब्जा करने की योजना के बारे में ब्रिटेन को तब पता चलता है, जब तत्कालीन अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स शेल्सिंगर ने अमरीका में ब्रिटिश एंबेस्डर लॉर्ड क्रोमर को चेतावनी दी थी. ब्रिटिश एंबेस्डर ने अमेरिकी रक्षामंत्री जेम्स शेल्सिंगर के हवाले से कहा था कि तेल के लिए अमेरिका बलप्रयोग करने से भी नहीं झिझकेगा. गल्फ देशों ने पश्चिमी देशों को तेल बेचने पर पाबंदी लगा दी थी. गल्फ देशों ने पश्चिमी देशों पर इस बात का दबाव बढ़ाने के लिए कि वो उन्हें तेल नहीं बेचेंगे इसके लिए उन्होंने इजरायल पर दबाव बढ़ाया ताकि वो इस संदेश को पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका तक पहुंचा सके. गल्फ देशों ने ये पाबंदी खासतौर पर अमेरिका के लिए लगाई थी लेकिन इससे अन्य पश्चिमी देश भी प्रभावित हुए थे.

    ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों को लगी अमेरिकी रणनीति की खबर
    ब्रिटेन की संयुक्त जांच समिति ने अनुमान लगाया था कि जब अमरीका ने बलप्रयोग की बात की थी तो अमरीकी रणनीति में मध्य पूर्व में तेल संस्थानों पर कब्जा किए जाने की बहुत संभावना थी. दस्तावेजों के मुताबिक, ‘तेल के भंडारों पर कब्जे के लिए अमरीकी रणनीति से ऐसा ही आभास होता है’ ब्रिटेन का ऐसा मानना था. इससे साफ पता चलता है कि ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों को अमेरिकी रणनीतियों की कुछ भनक लग गई थी. बाद में अमेरिका ने बलप्रयोग की रणनीति में अरब देशों के शासक बदले जाने या ताकत के बल पर दबाव बनाने के विकल्पों को खारिज कर दिया था.

    अमेरिका 10 सालों तक तेल भंडार पर कब्जा चाहता था!
    संयुक्त जांच समिति ने भरोसा जताते हुए विश्वास व्यक्त किया था कि अमेरिका की बलप्रयोग की रणनीति में एयर फोर्स अभियान चलाता और जिसके लिए वो संभवतः ईरान, तुर्की, साइप्रस, ग्रीस या इजरायल के हवाई अड्डों का इस्तेमाल करता. समिति ने ये भी कहा था कि उनका अनुमान था कि ऐसे अभियान के लिए अमेरिका को कम से कम दो ब्रिगेड की जरूरत थी. एक सऊदी अरब के लिए और एक कुवैत के लिए तीसरी ब्रिगेड अबूधाबी के लिए भी लगाई जा सकती थी. समिति ने ये चेतावनी भी दी थी कि आने वाले 10 सालों तक वहां पर अमेरिका का कब्जा रह सकता है.

    क्या थी ब्रिटेन की भूमिका?
    ब्रिटेन के लिए भी इस अभियान में बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी थी. समिति की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि अमेरिका शायद यह चाहता था कि ब्रिटेन अबूधाबी के तेल संस्थानों पर कब्जे के लिए कार्रवाई करे और कुछ ब्रिटिश ऑर्मी के अफसरों के के नाम अबूधाबी डिफेंस फोर्स के लिए घोषित भी कर दिए गए थे. समिति ने इस अभियान में इराक की कार्रवाई के खतरे का भी अंदाजा लगाया था. उस समय इराक के उपराष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ही थे. रिपोर्ट में आगे बताया गया था, ‘गल्फ देशो में किसी बड़े टकराव का खतरा कुवैत में नजर आया जहां सोवियत संघ के समर्थन से इराक दखलअंदाजी कर सकता था.’

    तेल के भंडार पर गड़ी अमेरिका की नजर
    रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल संस्थानों पर कब्जा करने और टकराव बढ़ने की आशंका तब ज्यादा थी कि अगर खाड़ी देश ज्यादा लंबे समय तक तेल बेचने पर रोक लगाए रखते. ऐसा होने पर पश्चिमी देशों के हित दांव पर लग जाते और ऐसी स्थिति को पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका ने ‘काले हालात’ का नाम दिया था. लेकिन ऐसे हालात ज्यादा लंबे समय तक नहीं रहे और कुछ महीनों बाद ही मिस्र और इजरायल के बीच समझौता हो गया जिसके बाद खाड़ी देशों ने तेल पर से लगी पाबंदी हटा ली. लेकिन तब तक क्रूड ऑयल भंडार पर अमेरिका की नजर गड़ चुकी थी.

    प्रथम विश्व युद्ध में ही दिखाई दे गई थी तेल की अहमियत
    इन सबके अलावा पहले विश्वयुद्ध में भी दुनिया को तेल की ताकत का अंदाजा लग चुका था. प्रथम विश्व युद्ध 1914 से लेकर 1918 तक चला. इस युद्ध में पूरी दुनिया को तेल की अहमियत का अंदाजा लगा. इस विश्व युद्ध ने दुनिया को इस बात का अहसास करवा दिया कि दुनिया तेल पर कितनी निर्भर हो गई है. इस बात को लेकर अब पश्चिमी देशों की नियत तेल के भंडारणों पर जम गई थी. इस युद्ध में हिस्सा लेने वाले देशों को टैंक से लेकर ट्रक तक के इस्तेमाल में तेल की जरूरत पड़ती थी. इसके अलावा युद्ध में अहम भूमिका निभाने वाले लड़ाकू जहाजों को भी तेल से ही चलाया जाता था. नौसेना के युद्धक जहाज भी अब पारंपरिक कोयले की जगह तेल से चलने लगे थे. युद्ध में रफ्तार का बड़ा महत्व था और जिन देशों ने तेल का उपयोग किया वो इस युद्ध में विजेता बने. आगे चलकर अमेरिका ने अपनी रणनीतियों के तहत ताकत के दम पर गल्फ देशों में अपना हस्तक्षेप शुरू किया जिसका सिर्फ एक ही मकसद था तेल के भंडारों पर कब्जा किया |