रूस की कथित गतिविधियों पर ब्रिटेन की नजर
समुद्री सुरक्षा को लेकर बड़ा अभियान
कठोर परिणाम की चेतावनी
रणनीतिक महत्व की केबल्स और पाइपलाइन
रूस-नाटो तनाव के बीच बढ़ती टकराहट

रूस की कथित गतिविधियों पर ब्रिटेन की नजर
समुद्री सुरक्षा को लेकर बड़ा अभियान
रूस-नाटो तनाव के बीच बढ़ती टकराहट

ईरान की कड़ी चेतावनी से बढ़ी चिंता
इस्लामाबाद में हाई-लेवल डिप्लोमैसी की तैयारी
सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी

इजरायल की तीखी प्रतिक्रिया
विदेश मंत्री ने बताया अनुचित बयान

इस सनसनीखेज मामले पर Netflix ने ‘Gone Girls: The Long Island Serial Killer’ नाम से डॉक्यूमेंट्री सीरीज भी बनाई है, जिसने इस केस को वैश्विक चर्चा में ला दिया।
कैसे खुला राज?
मामले की परतें 2010 में 23 वर्षीय शैनन गिल्बर्ट के लापता होने के बाद खुलनी शुरू हुईं। उसने 911 पर मदद मांगते हुए कॉल किया था। तलाश के दौरान ओशन पार्कवे के पास पुलिस को कई मानव अवशेष मिले, जिससे सीरियल किलर की आशंका पुख्ता हुई।
शुरुआत में चार पीड़ितों—मेलिसा बार्थेलेमी, मौरीन ब्रेनार्ड-बार्न्स, एम्बर लिन कॉस्टेलो और मेगन वाटरमैन—को “गिलगो फोर” नाम दिया गया।
रेक्स ह्युएरमैन मैनहट्टन में एक सफल आर्किटेक्ट था और ‘RH Consultants & Associates’ नाम की कंपनी चलाता था। पड़ोसियों के मुताबिक वह शांत स्वभाव का पारिवारिक व्यक्ति लगता था, लेकिन जांच में सामने आया कि वह दोहरी जिंदगी जी रहा था।
पुलिस ने उसके घर की 12 दिन तक तलाशी ली, जिसमें बेसमेंट की तिजोरी से 279 हथियार और कंप्यूटर से हत्या की योजना से जुड़े दस्तावेज बरामद हुए।
कैसे फंसा ‘पिज्जा’ से?
जांच के दौरान पुलिस को एक फेंके गए पिज्जा बॉक्स से डीएनए सैंपल मिला, जिसे ह्युएरमैन से मैच किया गया। यही अहम सबूत उसे गिरफ्तारी तक ले आया।
8 अप्रैल को आरोपी ने माना कि उसने बर्नर फोन से महिलाओं को पैसों का लालच देकर बुलाया, घर में हत्या की और शवों को बोरियों में लपेटकर गिलगो बीच इलाके में फेंक दिया।
अब क्या होगी सजा?
आगामी 17 जून को उसे फर्स्ट-डिग्री मर्डर के लिए बिना पैरोल उम्रकैद और सेकंड-डिग्री मर्डर के मामलों में 25 साल से उम्रकैद तक की सजा सुनाई जा सकती है।
सफोल्क काउंटी के डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी रे टियरनी ने कहा कि आरोपी आम पारिवारिक व्यक्ति होने का दिखावा करता रहा, जबकि वह महिलाओं को निशाना बनाकर उनकी हत्या करता था।

यात्रा के दौरान स्टॉकर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात करेंगे। उनके साथ ऑस्ट्रिया के कई मंत्री और कारोबारी प्रतिनिधि भी आएंगे।
विदेश मंत्रालय के अनुसार यह स्टॉकर की पहली एशिया यात्रा होगी। इस दौरान दोनों देश विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने, क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विचार-विमर्श करने तथा बहुपक्षीय मंचों पर साझेदारी मजबूत करने पर चर्चा करेंगे।
पहले भी हुई उच्चस्तरीय मुलाकात
साल 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑस्ट्रिया का दौरा किया था। उस दौरान दोनों देशों ने संबंधों को नई दिशा देने और आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई थी।
दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध 1949 में स्थापित हुए थे। 1970 के दशक में ऑस्ट्रिया के नेता ब्रूनो कैरिस्की की भारत यात्रा के बाद रिश्तों में नई गति आई। हाल के वर्षों में मशीनरी, इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल, स्टील, मेटल और केमिकल क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है।
इसके अलावा दोनों देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम टेक्नोलॉजी जैसे उभरते क्षेत्रों में भी साथ काम करने पर सहमत हो चुके हैं। यह यात्रा इन सहयोगों को और आगे बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

हालांकि चीन ने इस प्रतिबंध का कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया है, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सैन्य उपयोग के अलावा कोई अन्य उद्देश्य नहीं हो सकता। एएफपी को दिए गए बयान में सुरक्षा विशेषज्ञ बेंजामिन ब्लैंडिन ने कहा कि इस तरह के हवाई क्षेत्र प्रतिबंध का सैन्य उपयोग के अलावा कोई अन्य संभावित उपयोग नहीं है। यह मिसाइल परीक्षण, हवाई अभ्यास या अन्य सैन्य गतिविधियों के लिए हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यह पहली बार है जब चीन ने इतने बड़े भौगोलिक क्षेत्र को इतने लंबे समय तक अचानक प्रतिबंधित किया है।
विमानन और रक्षा सलाहकार एनएक्सटी के जेवियर टाइटेलमैन ने भी इस प्रतिबंध को ‘असामान्य’ बताया। उन्होंने कहा कि इसकी अवधि, आकार और ऊंचाई पर किसी भी प्रकार की सीमा न होने के कारण यह सामान्य NOTAM से अलग है। आमतौर पर NOTAM सैन्य अभ्यास, आग या ज्वालामुखी विस्फोट जैसी घटनाओं के लिए जारी किए जाते हैं।
नागरिक विमानों पर प्रतिबंध, सैन्य विमानों पर नहीं
टाइटेलमैन ने बताया कि इस क्षेत्र को केवल नागरिक उड्डयन के लिए बंद किया गया है। सैन्य विमान, हेलीकॉप्टर और ड्रोन इस प्रतिबंध से प्रभावित नहीं होंगे। इसका मतलब है कि चीन सरकार ने अपने सैन्य उपयोग के लिए यह क्षेत्र आरक्षित कर लिया है। प्रतिबंध दो क्षेत्रों पर पीले सागर में (चीन-दक्षिण कोरिया के बीच) और तीन क्षेत्रों पर पीले सागर व पूर्वी चीन सागर के बीच (चीन-जापान के बीच) लागू है। इन प्रतिबंधित क्षेत्रों के बीच लगभग 100 किलोमीटर चौड़े हवाई गलियारे छोड़े गए हैं, जिससे शंघाई तक नागरिक विमानों की आवाजाही संभव हो सके।
क्या है ताइवान का आरोप?
ताइवान के एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने आरोप लगाया है कि चीन मध्य पूर्व में अमेरिका के व्यस्त होने का फायदा उठाते हुए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियां तेज कर रहा है। अधिकारी ने कहा कि चीन का मकसद अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगियों को डराना और हिंद-प्रशांत में अमेरिकी सैन्य प्रभाव को कमजोर करना है। सुरक्षा विशेषज्ञ बेंजामिन ब्लैंडिन ने इसे चीन की ‘पहुंच से इनकार’ की रणनीति का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि यह चीन द्वारा अपने पड़ोसी देशों की भूमि और समुद्री सीमाओं पर दबाव बढ़ाने और कब्जा करने के निरंतर प्रयासों का एक हिस्सा है।

ट्रंप ने पाकिस्तान की मध्यस्थता का उल्लेख करते हुए संघर्षविराम की घोषणा की थी जिसे वैश्विक स्तर पर राहत के रूप में देखा गया। पाकिस्तान ने भी इसे अपनी कूटनीतिक सफलता के तौर पर प्रस्तुत किया लेकिन इसके तुरंत बाद इजरायल की सैन्य गतिविधियां और अमेरिका के शीर्ष नेताओं के बयान इस उम्मीद पर पानी फेरते नजर आए।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के बयानों में कई ऐसे संकेत मिले जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सीजफायर को लेकर पूरी तरह सहमति और स्पष्टता नहीं है। इजरायल द्वारा लेबनान पर किए गए हमले और हिज्बुल्लाह को लेकर अस्पष्ट स्थिति ने इस समझौते को और अधिक उलझा दिया है। खुद ट्रंप ने यह कहा कि हिज्बुल्लाह को लेकर इस समझौते में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है जबकि पाकिस्तान का दावा था कि यह भी समझौते का हिस्सा है।
इसी बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक अलग ही माहौल देखने को मिल रहा है। आम दिनों की चहल-पहल की जगह अब सन्नाटा और कड़ी सुरक्षा व्यवस्था ने ले ली है। शहर के कई हिस्सों में आवागमन सीमित कर दिया गया है और सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है। इसका मुख्य कारण ईरान के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल का आगमन है जो अमेरिका के साथ संवेदनशील कूटनीतिक वार्ता के लिए यहां पहुंच रहा है।
पाकिस्तान इस पूरी प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है और उसने दोनों पक्षों को बातचीत की मेज तक लाने में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि इस प्रयास को जितनी सराहना मिल रही है उतनी ही शंका भी इसके परिणामों को लेकर बनी हुई है।
इस वार्ता के सफल होने में सबसे बड़ी बाधा भरोसे की कमी है। ईरान के भीतर ही इस बात को लेकर संदेह है कि क्या यह बातचीत किसी ठोस नतीजे तक पहुंचेगी या केवल तनाव को अस्थायी रूप से टालने का एक प्रयास साबित होगी। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबफ ने पहले ही अमेरिका पर सीजफायर के 10 में से तीन बिंदुओं के उल्लंघन का आरोप लगा दिया है जिससे स्थिति और जटिल हो गई है।
वहीं पाकिस्तान में ईरान के राजदूत रेजा अमीरी मोगादम द्वारा सोशल मीडिया पर किया गया पोस्ट और उसका बाद में डिलीट होना भी इस पूरे घटनाक्रम की संवेदनशीलता को दर्शाता है। उनके पोस्ट में ईरानी प्रतिनिधिमंडल के इस्लामाबाद पहुंचने और 10 बिंदुओं पर गंभीर बातचीत की बात कही गई थी लेकिन पोस्ट हटाए जाने से कूटनीतिक गोपनीयता और अनिश्चितता दोनों उजागर हुई हैं।
यह वार्ता केवल अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों तक सीमित नहीं है बल्कि इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पड़ सकता है। ऐसे में दुनिया की नजरें इस्लामाबाद पर टिकी हैं जहां सन्नाटे और सख्त सुरक्षा के बीच शांति की एक कठिन कोशिश जारी है।

तेहरान। करीब 40 दिनों से जारी भीषण संघर्ष के बाद जब अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर का ऐलान हुआ, तो क्षेत्र में शांति की उम्मीद जगी थी। लेकिन महज 24 घंटे के भीतर ही हालात बदलते नजर आ रहे हैं। तीनों प्रमुख पक्ष—ईरान, इजरायल और अमेरिका—के बयान अलग-अलग दिशा में जाते दिख रहे हैं, जिससे सीजफायर पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
अमेरिका ने खारिज किया ईरान का प्रस्ताव
कूटनीतिक मोर्चे पर सबसे बड़ा विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिका ने ईरान के 10 सूत्रीय शांति प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। अमेरिकी प्रशासन ने तीखे शब्दों में कहा कि प्रस्ताव को “कूड़े के डिब्बे में डाल दिया गया।” इससे संकेत मिला कि वॉशिंगटन ईरान की शर्तों पर आगे बढ़ने को तैयार नहीं है और वह इजरायल के रुख का समर्थन कर रहा है।
अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया कि सीजफायर समझौते में लेबनान से जुड़े हमलों को शामिल नहीं किया गया है, इसलिए उस मोर्चे पर कार्रवाई जारी रह सकती है।
लेबनान पर इजरायल के हमले तेज
सीजफायर के तुरंत बाद इजरायल ने समझौते की तकनीकी खामी का हवाला देते हुए कहा कि लेबनान में उसके सैन्य अभियान जारी रहेंगे। इसके बाद इजरायली हमलों में तेजी देखी गई, जिनमें 100 से अधिक लोगों के मारे जाने की खबर है।
इजरायल का कहना है कि वह हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाता रहेगा और यह कार्रवाई सीजफायर का उल्लंघन नहीं मानी जाएगी।
ईरान की चेतावनी—हमले हुए तो खत्म समझौता
इजरायल के रुख पर ईरान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। तेहरान ने कहा कि अगर लेबनान पर हमले जारी रहे तो सीजफायर स्वतः समाप्त माना जाएगा। ईरान ने अमेरिका और इजरायल को चेतावनी देते हुए कहा कि “गेंद अब आपके पाले में है”, यानी जवाबी कार्रवाई की संभावना बनी हुई है।
क्या हो सकता है असर?
अगर सीजफायर पूरी तरह टूटता है तो इसका असर पूरे मिडिल ईस्ट पर पड़ सकता है। हिजबुल्लाह के सीधे युद्ध में उतरने से संघर्ष कई मोर्चों पर फैल सकता है और ईरान की प्रत्यक्ष भागीदारी का खतरा बढ़ जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि हालात बिगड़ने पर होर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे वैश्विक स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
महज 24 घंटे में समझौते का डगमगाना यह दिखाता है कि पक्षों के बीच अविश्वास कितना गहरा है और शांति की राह अभी भी बेहद कठिन बनी हुई है।

तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी जंग ट्रंप के सीजफायर के ऐलान के बाद थम गई है। लेकिन इसकी वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई करने में कई वर्ष लग जाएंगे। इस युद्ध के दौरान ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया था, जिसकी वजह से पूरी दुनिया में कच्चे तेल के दामों में उछाल आ गया था। सऊदी अरब ने तेल सप्लाई के अपने दूसरे रास्ते (ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन) का उपयोग करना शुरू कर दिया था। हालांकि, अब सामने आईं रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरानी हमले में इस पाइपलाइन को भी नुकसान पहुंचा है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही ट्रंप के सीजफायर ऐलान के बाद होर्मुज का रास्ता खुल गया हो, लेकिन इसके बाद भी लाखों बैरल तेल कच्चे बाजार से बाहर होने की आशंका है। सऊदी अरब में मौजूद एक स्त्रोत के मुताबिक ईरान ने अपने हमलों के दौरान सऊदी अरब के कई तेल प्रतिष्ठानों और तेल सप्लाई प्वाइंट्स को निशाना बनाया था। इसमें ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और उसके एक केंद्र (यानबू बंदरगाह) को भी निशाना बनाया गया है। इस पाइपलाइन के जरिए सऊदी अरब होर्मुज को बायपास करके तेल की सप्लाई को चालू रखता है।
बता दें, ईरान के साथ बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए ही सऊदी अरब ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का निर्माण किया था। इसके जरिए तेल सप्लाई को यानबू पर ले जाकर लाल सागर के जरिए आगे बढ़ाया जाता है। इस पाइपलाइन के जरिए प्रतिदिन लगभग 70 लाख बैरल तेल सप्लाई होता था। 28 फरवरी के बाद सामने आए शिपिंग डेटा के मुताबिक यानबू की क्षमता करीब 4.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन है। पिछले कुछ दिनों से यह लगातार अपनी पूरी क्षमता के साथ काम कर रही थी। लेकिन अब इस पर भी हमला करके ईरान ने सऊदी के इस कदम पर भी पानी फेर दिया है।
तेल प्रतष्ठानों पर हुए इन हमलों की जिम्मेदारी आईआरजीसी ने ली है। बुधवार को जारी एक बयान में आईआरजीसी की तरफ से कहा गया कि फारस की खाड़ी में कई लक्ष्यों के ऊपर मिसाइलों और ड्रोन्स के जरिए हमला किया गया है। इसमें यानबू में मौजूद अमेरिकी कंपनियों के ठिकानों को भी निशाना बनाया। यह पहली बार नहीं है कि जब इस संघर्ष के दौरान ईरान ने यानबू बंदरगाह को निशाना बनाने की कोशिश की है। इससे पहले भी ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के तमाम ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाया था। होर्मुज के ऊपर तेहरान ने पहले से ही पाबंदी लगा रखी थी। इसकी वजह से पूरी दुनिया में तेल के दाम आसमान छू रहे थे। हालांकि, अब सीजफायर के ऐलान के साथ ही होर्मुज को खोलने पर भी सहमति बनी है। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर कल से होर्मुज अपनी पूरी क्षमता के साथ शुरू भी हो जाता है, तब भी स्थिति को सामान्य होने में कई महीनों का वक्त लग जाएगा।