Category: International

  • सिंधु जल संधि सस्पेंड के बाद बड़ा कदम, चिनाब नदी पर 5129 करोड़ का सावलकोट पावर प्रोजेक्ट शुरू

    सिंधु जल संधि सस्पेंड के बाद बड़ा कदम, चिनाब नदी पर 5129 करोड़ का सावलकोट पावर प्रोजेक्ट शुरू


    नई दिल्ली। पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को निलंबित किए जाने के बाद केंद्र सरकार ने अब बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में सरकारी कंपनी एनएचपीसी (NHPC) ने जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में चिनाब नदी पर बनने वाले सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए टेंडर जारी कर दिया है। इस परियोजना को देश की ऊर्जा जरूरतों और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में एक बड़ा और रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

    जानकारी के मुताबिक, इस महत्वाकांक्षी परियोजना को करीब 5129 करोड़ रुपए की लागत से तैयार किया जाएगा। एनएचपीसी द्वारा जारी टेंडर के तहत पूरे निर्माण कार्य को एक ही पैकेज में शामिल किया गया है, ताकि काम को तेज गति से पूरा किया जा सके। टेंडर दस्तावेजों के अनुसार, इस पैकेज में डाइवर्जन टनल का निर्माण, एडिट, डीटी और कोफर डैम बनाने जैसे प्रमुख कार्य शामिल हैं।

    इसके अलावा मांडिया नाला डीटी का निर्माण, उससे संबंधित सड़क, राइट बैंक स्पाइरल टनल, एक्सेस टनल और डैम से जुड़े सभी सहायक कार्य भी इसी प्रोजेक्ट के अंतर्गत किए जाएंगे। चिनाब नदी पर बनने वाला यह प्रोजेक्ट बिजली उत्पादन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इससे जम्मू-कश्मीर सहित देश के कई हिस्सों को लाभ मिलने की उम्मीद है।

    एनएचपीसी की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, इस परियोजना के लिए बोली प्रक्रिया 12 मार्च से शुरू होगी और 20 मार्च तक चलेगी। बोली की वैधता 180 दिनों के लिए तय की गई है। वहीं, इस पूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए लगभग 3285 दिनों की समयसीमा निर्धारित की गई है, यानी इसे चरणबद्ध तरीके से दीर्घकालिक योजना के तहत तैयार किया जाएगा।

    सावलकोट हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के जरिए कुल 1856 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इतना बड़ा उत्पादन देश के पावर ग्रिड को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। खासकर जम्मू-कश्मीर जैसे पहाड़ी इलाकों में बिजली की उपलब्धता बेहतर होगी और औद्योगिक व घरेलू जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रोजेक्ट के शुरू होने से न केवल बिजली उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। साथ ही, यह परियोजना जल संसाधनों के बेहतर उपयोग और क्षेत्रीय विकास को भी गति देगी।

    भारत सरकार ने यह कदम ऐसे समय पर उठाया है जब पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में चिनाब नदी पर इस तरह की बड़ी परियोजना को रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भारत अपने जल संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकेगा और ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और मजबूत कदम बढ़ाएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रोजेक्ट केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की दीर्घकालिक ऊर्जा नीति और जल प्रबंधन योजना का भी अहम हिस्सा है। आने वाले वर्षों में इसके पूरा होने पर देश की ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है।

  • बांग्लादेश की जेल में अवामी लीग के वरिष्ठ नेता रमेश चंद्र सेन का निधन, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

    बांग्लादेश की जेल में अवामी लीग के वरिष्ठ नेता रमेश चंद्र सेन का निधन, सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल


    ढाका। बांग्लादेश की दिनाजपुर जेल से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री रमेश चंद्र सेन के निधन की खबर सामने आई है। अधिकारियों और स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उनका शनिवार सुबह जेल में तबीयत बिगड़ने के बाद अस्पताल में निधन हो गया। वे अवामी लीग के प्रमुख अल्पसंख्यक नेताओं में गिने जाते थे और शेख हसीना की सरकार में जल संसाधन मंत्री रह चुके थे।

    बताया जा रहा है कि 86 वर्षीय रमेश चंद्र सेन पांच बार सांसद चुने गए थे और उन्होंने अपना आखिरी चुनाव साल 2024 में लड़ा था। बांग्लादेश के प्रमुख समाचार पत्र प्रथम आलो की रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार सुबह करीब 9 बजकर 10 मिनट पर उनकी अचानक तबीयत बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें तत्काल इलाज के लिए दिनाजपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

    जेल में एक पूर्व मंत्री की मौत की खबर सामने आने के बाद अवामी लीग के वरिष्ठ नेताओं और पूर्व मंत्रियों की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। पार्टी से जुड़े लोगों और स्थानीय स्तर पर इस घटना को लेकर चिंता जताई जा रही है।

    जेल प्रशासन की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, रमेश चंद्र सेन की तबीयत अचानक बिगड़ी और वे बेहोश होकर गिर पड़े। उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन इलाज के दौरान सुबह करीब 9:30 बजे डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अधिकारियों का कहना है कि वे लंबे समय से कई बीमारियों से जूझ रहे थे, जिसके कारण उनकी हालत पहले से ही कमजोर थी।

    हालांकि, मामले से जुड़े कुछ लोगों का आरोप है कि जेल में उनकी देखभाल ठीक से नहीं हो रही थी। उनकी मौत के बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे हिरासत में हुई मौत बता रहे हैं, जबकि प्रशासन इसे प्राकृतिक कारणों से हुई मृत्यु बता रहा है।

    रमेश चंद्र सेन की गिरफ्तारी अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद हुई थी। उन पर हत्या सहित तीन गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिसके बाद उन्हें हिरासत में लिया गया था। उस समय उनकी एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, जिसमें उनके हाथों में रस्सी बंधी हुई नजर आई थी।

    सरकार बदलने के बाद अवामी लीग के कई नेता हमलों के डर से देश छोड़कर चले गए थे, लेकिन रमेश चंद्र सेन ने अपना घर नहीं छोड़ा। उन्हें भरोसा था कि उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया है और वे कानून का सामना करेंगे।

    उनकी मौत के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं। कुछ यूजर्स ने इसे संदिग्ध बताते हुए जांच की मांग की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, हिरासत के दौरान अब तक पार्टी के कम से कम पांच वरिष्ठ नेताओं की मौत हो चुकी है, जिससे राजनीतिक माहौल और ज्यादा संवेदनशील हो गया है।

  • जेएनयू में फिर टकराव की स्‍थ‍िति बनी, अभाविप का उग्र विरोध सामने आया

    जेएनयू में फिर टकराव की स्‍थ‍िति बनी, अभाविप का उग्र विरोध सामने आया


    नई दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक बार फिर छात्र राजनीति और प्रशासनिक फैसलों को लेकर विवाद के केंद्र में आ गया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) की जेएनयू इकाई ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए निष्कासन और भारी जुर्माने की कार्रवाई को तानाशाही करार दिया है। संगठन का कहना है कि छात्र आंदोलनों को दबाने के लिए प्रशासन दमनकारी नीतियों का सहारा ले रहा है, जिसे किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

    अभाविप के अनुसार, हाल के दिनों में कई छात्र कार्यकर्ताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है, जिसमें निष्कासन और आर्थिक दंड शामिल हैं। संगठन ने आरोप लगाया कि प्रशासन इन कदमों के जरिए सक्रिय छात्रों की आवाज दबाने की कोशिश कर रहा है। उनका कहना है कि इस तरह की कार्रवाई छात्रों के अधिकारों का उल्लंघन है, उनके शैक्षणिक भविष्य के साथ भी सीधा खिलवाड़ है।

    संगठन ने इन फैसलों को अलोकतांत्रिक बताते हुए कहा कि जुर्माने की राशि इतनी अधिक रखी गई है कि आम छात्र के लिए उसे भर पाना बेहद मुश्किल है। अभाविप जेएनयू अध्यक्ष मयंक पंचाल ने कहा कि कुछ मामलों में जुर्माना करीब 4,83,000 रुपये तक लगाया गया है, जो प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाता है। उनका कहना है कि यह कदम छात्रों को डराने और आंदोलन को कमजोर करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

    विरोध जताने के लिए अभाविप कार्यकर्ताओं ने परिसर में दमनकारी आदेशों की प्रतियां जलाकर अपना आक्रोश व्यक्त किया। संगठन ने इसे प्रतीकात्मक विरोध बताते हुए कहा कि यह उस व्यवस्था के खिलाफ चेतावनी है जो छात्रों के अधिकारों को कुचलने की कोशिश कर रही है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि उनका आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण है, लेकिन अन्याय के खिलाफ उनकी लड़ाई मजबूती से जारी रहेगी।

    इस पूरे विवाद के केंद्र में CPO (चीफ प्रॉक्टर ऑफिस) मैनुअल भी है, जिसे लेकर अभाविप शुरू से ही विरोध जता रही है। संगठन का कहना है कि यह मैनुअल जेएनयू जैसे खुले और लोकतांत्रिक माहौल वाले विश्वविद्यालय के लिए खतरा है। अभाविप के मुताबिक, इसके प्रावधान छात्रों की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं और प्रशासन को अत्यधिक अधिकार देते हैं। संगठन ने मांग की है कि इस मैनुअल को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए।

    अभाविप नेताओं का आरोप है कि प्रशासन अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए कठोर नियमों का सहारा ले रहा है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय को संवाद और सहयोग के जरिए चलाया जाना चाहिए, न कि दंड और निष्कासन के जरिए। संगठन ने साफ शब्दों में कहा कि राष्ट्रवादी छात्र किसी भी तरह की कायराना कार्रवाई से डरने वाले नहीं हैं। हालांकि, अभाविप ने यह भी स्पष्ट किया कि वह विरोध के नाम पर अराजकता और तोड़-फोड़ का समर्थन नहीं करती। संगठन ने कहा कि विश्वविद्यालय की सार्वजनिक संपत्ति उसकी धरोहर है और उसे नुकसान पहुंचाना किसी भी तरह से उचित नहीं है। इस दौरान अभाविप ने वामपंथी छात्र संगठनों पर परिसर में तोड़-फोड़ की राजनीति करने का आरोप लगाया और उसकी कड़ी निंदा की।

    अभाविप जेएनयू मंत्री प्रवीण कुमार पीयूष ने प्रशासन की कार्रवाई को गुंडागर्दी करार देते हुए कहा कि छात्रों को डराने की रणनीति अब काम नहीं आने वाली है। उन्होंने कहा कि निष्कासन और भारी जुर्मानों के आदेशों को जलाकर संगठन ने यह साफ संदेश दे दिया है कि वह इन फैसलों को स्वीकार नहीं करता। उनका कहना है कि यदि प्रशासन ने अपने फैसलों पर पुनर्विचार नहीं किया, तो विरोध और तेज हो सकता है। मयंक पंचाल ने कहा कि उनका मुख्य विरोध उस ढांचे के खिलाफ है, जिसमें छात्रों को निष्कासित कर उनके मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। उन्होंने निष्कासित छात्रों की तत्काल बहाली और लगाए गए जुर्मानों को वापस लेने की मांग दोहराई। उनके अनुसार, यह पूरे परिसर के लोकतांत्रिक माहौल का सवाल है।

    इस घटनाक्रम ने जेएनयू में एक बार फिर प्रशासन और छात्र संगठनों के बीच तनाव को उजागर कर दिया है। जहां एक ओर छात्र संगठन इसे अधिकारों की लड़ाई बता रहे हैं, वहीं प्रशासन की ओर से अभी तक इस विवाद पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह टकराव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। इस दौरान अभाविप ने अंत में दोहराया कि वह सामान्य छात्रों के हितों और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष करती रहेगी। संगठन का कहना है कि प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ उसकी लड़ाई अंतिम निर्णय तक जारी रहेगी और वह किसी भी स्तर पर छात्रों की आवाज को दबने नहीं देगा।

  • बांग्‍लादेश में चुनाव से पहले बिजली गुल होने का खड़ा हो गया संकट, अडानी ग्रुप का बकाया भुगतान पत्र

    बांग्‍लादेश में चुनाव से पहले बिजली गुल होने का खड़ा हो गया संकट, अडानी ग्रुप का बकाया भुगतान पत्र


    नई दिल्ली। बांग्लादेश में आगामी संसदीय चुनावों से ठीक पहले बिजली आपूर्ति और वित्तीय स्थिति को लेकर एक नया विवाद सामने आ गया है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के कार्यकाल के अंतिम दौर में अडानी ग्रुप ने बकाया भुगतान को लेकर बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (PDB) को एक औपचारिक पत्र भेजा है। इस पत्र के बाद दोनों पक्षों के बीच चल रहा वित्तीय विवाद फिर से चर्चा में आ गया है और देश की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार, अडानी पावर लिमिटेड ने 29 जनवरी को पीडीबी के चेयरमैन को पत्र लिखकर तत्काल भुगतान की मांग की। कंपनी ने स्पष्ट किया कि पावर प्लांट का नियमित संचालन जारी रखने के लिए 112.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर, यानी भारतीय मुद्रा में 1000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का तुरंत भुगतान आवश्यक है। यदि यह भुगतान नहीं किया गया, तो बिना बाधा बिजली आपूर्ति बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।

    इस कुल बकाया में 53.2 मिलियन डॉलर की राशि पिछले वर्ष जून तक की देनदारी के रूप में शामिल है, जबकि 59.6 मिलियन डॉलर अक्टूबर तक दी गई बिजली सेवा का भुगतान है। कंपनी का कहना है कि कई बार आग्रह करने के बावजूद बांग्लादेश पावर बोर्ड इस रकम का पूरा भुगतान नहीं कर पाया है। ऐसे में बढ़ते बकाए का दबाव कंपनी के संचालन, मेंटेनेंस और इससे जुड़े साझेदारों पर पड़ने लगा है।

    पत्र में अडानी ग्रुप ने संकेत दिया है कि अगर भुगतान में और देरी होती है, तो बिजली उत्पादन और आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। हालांकि इसे औपचारिक चेतावनी नहीं कहा गया, लेकिन इस तरह की भाषा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्थिति गंभीर होती जा रही है और दोनों पक्षों को जल्द समाधान निकालने की जरूरत है।

    यह पहला मौका नहीं है जब इस मुद्दे पर तनाव पैदा हुआ हो। पिछले साल भी अडानी ग्रुप ने बकाया भुगतान को लेकर बांग्लादेश को पत्र भेजा था और 10 नवंबर तक की समय सीमा तय की थी। उस समय कंपनी ने साफ कहा था कि अगर तय समय तक पैसे नहीं मिले, तो 11 नवंबर से बिजली आपूर्ति बंद करनी पड़ सकती है। इसके बाद बांग्लादेश सरकार ने उसी महीने करीब 100 मिलियन डॉलर का भुगतान किया था, जिससे तत्काल संकट टल गया था। लेकिन उसके बाद भी पुराने बकाए का पूरा भुगतान नहीं हो पाया और दिसंबर से फिर देनदारी बढ़ने लगी। अब एक बार फिर वही स्थिति बनती नजर आ रही है, जिससे बिजली आपूर्ति बाधित होने की आशंका जताई जा रही है। बांग्लादेश जैसे देश के लिए, जहां ऊर्जा आपूर्ति आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ मानी जाती है, यह स्थिति काफी गंभीर मानी जा रही है।

    इस पूरे घटनाक्रम का समय भी बेहद महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं और इसके साथ जनमत संग्रह भी प्रस्तावित है। चुनावी माहौल पहले से ही गरमाया हुआ है और राजनीतिक दल पूरी ताकत से प्रचार में जुटे हैं। बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी जैसे दल मैदान में सक्रिय हैं, जबकि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। ऐसे माहौल में अडानी ग्रुप का यह पत्र बांग्लादेश की आर्थिक और प्रशासनिक स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा क्षेत्र में वित्तीय अस्थिरता का असर सीधे आम जनता और उद्योगों पर पड़ सकता है। अगर बिजली आपूर्ति में बाधा आती है, तो इसका असर उद्योग, व्यापार और रोजमर्रा की जिंदगी पर दिखाई देगा। ऐसे में सरकार के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह ऊर्जा कंपनियों के साथ अपने वित्तीय दायित्वों को समय पर पूरा करे।

    अडानी ग्रुप का बांग्लादेश में बिजली उत्पादन से जुड़ा प्रोजेक्ट वहां की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस वजह से बकाया भुगतान का मुद्दा केवल एक कारोबारी विवाद नहीं, बल्कि एक बड़े ऊर्जा और आर्थिक सवाल के रूप में देखा जा रहा है। यदि इस पर समय रहते समाधान नहीं निकला, तो यह चुनावी माहौल में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। इस मामले ने बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति पर भी अप्रत्यक्ष रूप से सवाल खड़े किए हैं। लगातार बढ़ते बकाए और भुगतान में देरी यह संकेत देते हैं कि सरकार वित्तीय दबाव का सामना कर रही है। चुनाव से पहले इस तरह की खबरें राजनीतिक बहस को और तेज कर सकती हैं।

    फिलहाल सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड इस बकाया भुगतान को लेकर क्या कदम उठाता है और क्या दोनों पक्षों के बीच कोई समाधान निकल पाता है। अगर भुगतान समय पर हो जाता है, तो बिजली आपूर्ति सामान्य बनी रह सकती है। लेकिन अगर विवाद लंबा खिंचता है, तो इसका असर बांग्लादेश की ऊर्जा व्यवस्था और राजनीतिक माहौल दोनों पर पड़ सकता है।

  • भारत-अमेरिका ट्रेड डील: दवाइयां, डायमंड्स, मसाले पर 0% टैरिफ, किसानों और डेयरी को पूरी सुरक्षा

    भारत-अमेरिका ट्रेड डील: दवाइयां, डायमंड्स, मसाले पर 0% टैरिफ, किसानों और डेयरी को पूरी सुरक्षा


    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते का फ्रेमवर्क जारी होने के बाद वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने विस्तार से जानकारी दी कि किन उत्पादों पर अमेरिका ने 0% टैरिफ लागू किया है। वहीं, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत ने किसी भी कृषि और डेयरी उत्पादों पर कोई छूट नहीं दी है, ताकि किसानों और घरेलू उत्पादन की सुरक्षा बनी रहे।

    गोयल ने बताया कि अमेरिका ने भारत के लिए जिन वस्तुओं पर 0% टैरिफ लागू किया है, उनमें शामिल हैं:
    जेम्स और डायमंड्स, सोने-चांदी की आभूषण सामग्री
    दवाइयां, फार्मा प्रोडक्ट्स, स्मार्टफोन
    मसाले, चाय, कॉफी, नारियल, नारियल तेल, केस्यू नट्स
    केला, आम, चीनी, पाइनएपल, मशरूम, सब्जियों के रूट्स
    एयरक्राफ्ट और मशीनरी पार्ट्स, एल्यूमिनियम और जिंक ऑक्साइड, मिनरल्स, नेचुरल रबर
    प्रोसेस्ड फल जैसे अमरूद का जेम्स

    उद्योग मंत्री ने कहा कि भारत ने मीट, पोल्ट्री, डेयरी, सोयाबीन, मक्‍का, चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा, रागी, अमरनाथ फल, ग्रीन टी, कोका, चना, एनीमल सीड्स, नॉन-एल्कोहलिक उत्पाद, इथेनॉल और तंबाकू जैसी कृषि और डेयरी वस्तुओं पर किसी भी तरह की रियायत नहीं दी।

    पीयूष गोयल ने बताया कि इस समझौते से अमेरिका का 30 ट्रिलियन डॉलर का मार्केट कम टैरिफ पर खुल गया है। अमेरिकी टैरिफ अब भारत के लिए पड़ोसी देशों की तुलना में बहुत कम है—जैसे चीन पर 35%, वियतनाम 20%, और इंडोनेशिया 19% टैरिफ है, जबकि अमेरिका ने इसे भारत के लिए 18% कर दिया है।

    गोयल ने कहा कि आज का दिन भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। फरवरी 2025 से द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य भारत और अमेरिका के बीच सालाना 500 बिलियन डॉलर का व्यापार हासिल करना था। इस समझौते से देश के निर्यातकों के लिए नए अवसर खुलेंगे और अमेरिका भारत के लिए सबसे पसंदीदा निर्यात राष्ट्र बन जाएगा।

  • भारत-अमेरिका ट्रेड डील में रूस का तेल नहीं बनेगा बाधा, सरकार ने दिया ये स्‍पष्‍ट जवाब

    भारत-अमेरिका ट्रेड डील में रूस का तेल नहीं बनेगा बाधा, सरकार ने दिया ये स्‍पष्‍ट जवाब


    नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच हुए अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर रूस से तेल खरीद का मुद्दा चर्चा में है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या रूस से तेल की खरीद भारत-अमेरिका ट्रेड डील में कोई पेच खड़ा कर सकती है। इस पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि देशवासियों की ऊर्जा सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

    विदेश मंत्रालय ने कहा कि बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात और बाजार परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना भारत की रणनीति का अहम हिस्सा है। मंत्रालय ने किसी भी तरह का सीधे-सीधे “हां” या “ना” वाला जवाब देने से परहेज़ किया। वाणिज्य मंत्रालय भी इस मामले में सवालों को विदेश मंत्रालय के पाले में डाल देता है।

    वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शनिवार को कहा कि इस विषय में जवाब विदेश मंत्रालय देगा। उन्होंने भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते का ब्योरा देते हुए बताया कि इसमें घरेलू उत्पादकों और कृषि क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपजों को पूरी तरह बाहर रखा गया है। इसमें मीट, पोल्ट्री, सोयामील, मक्का, चावल, गेहूं, चीनी और मिलेट्स जैसी वस्तुएं शामिल हैं, ताकि किसानों और घरेलू उत्पादन पर कोई असर न पड़े।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, अमेरिका ने भारत पर 25 प्रतिशत दंडात्मक आयात शुल्क हटा दिया है, जो रूस से कच्चे तेल की खरीद पर लगाया गया था। अमेरिका ने यह कदम भारत के प्रयासों और अगले 10 वर्षों में रक्षा सहयोग विस्तार के फैसले के बाद उठाया। अमेरिका का कहना है कि भारत ने रूस से तेल के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात को बंद करने की प्रतिबद्धता जताई है और वह अमेरिका से ऊर्जा उत्पादों की खरीद करेगा।विदेश मंत्रालय ने बार-बार दोहराया कि भारत के सभी कदम ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर उठाए गए हैं और आगे भी इसी उद्देश्य के तहत रणनीति बनाई जाएगी।

  • पाकिस्तान के गृह मंत्री ने भारत पर लगाया बेतुका फंडिंग का आरोप, दिया ये विवादित बयान..

    पाकिस्तान के गृह मंत्री ने भारत पर लगाया बेतुका फंडिंग का आरोप, दिया ये विवादित बयान..


    नई दिल्ली। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद शुक्रवार को उस समय दहल गई जब एक शिया मस्जिद में भीषण आत्मघाती धमाका हुआ। शनिवार तक इस हमले में मृतकों की संख्या बढ़कर 36 हो गई है क्योंकि कई गंभीर रूप से घायल लोग अस्पताल में दम तोड़ चुके हैं। वैश्विक आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (IS) ने हमले की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए इसे एक फिदायीन ऑपरेशन बताया है।

    इस बीच, पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने शनिवार को आरोप लगाया कि भारत उनके देश में उग्रवादी संगठनों का वित्तपोषण कर रहा है। हालांकि, उन्होंने इस दावे का समर्थन करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं किया। भारत ने पहले ही इस्लामाबाद मस्जिद हमले में किसी भी संलिप्तता के आरोप को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

    नकवी ने कहा, “दाएश और तालिबान जैसे समूहों को कहीं से धन और लक्ष्य मिल रहे हैं,” और बिना किसी प्रमाण के भारत की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा, “मैं फिर से स्पष्ट रूप से कहता हूं कि उनका वित्तपोषण भारत से हो रहा है।”

    इस्लामिक स्टेट के आधिकारिक मुखपत्र ‘अमाक’ के माध्यम से जारी बयान में हमलावर की पहचान सैफुल्लाह अंसारी के रूप में की गई है। संगठन ने अंसारी की तस्वीर भी जारी की है जिसमें वह संगठन के प्रति अपनी वफादारी की शपथ लेता दिख रहा है। IS ने दावा किया है कि यह हमला ‘IS इन पाकिस्तान प्रोविंस’ (ISPP) के एक सक्रिय सदस्य द्वारा किया गया है, जो 2019 से क्षेत्र में सक्रिय है।

    भारतीय विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को हमले की निंदा करते हुए कहा कि पाकिस्तान को अपनी घरेलू समस्याओं का समाधान करने की बजाय दूसरों को दोष देना बंद करना चाहिए। बयान में कहा गया भारत इस तरह के हर आरोप को खारिज करता है, जो निराधार और निरर्थक है।

    मस्जिद हमले के तुरंत बाद तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) ने आधिकारिक बयान जारी कर अपनी किसी भी संलिप्तता से इनकार किया। IS के दावे से यह स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा को भड़काने के पीछे अंतरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क का हाथ है। बयान में सीरिया में सक्रिय ‘ज़ैनाबियून ब्रिगेड’ (प्रो-इरान मिलिशिया) में शामिल पाकिस्तानी शियाओं का भी जिक्र किया गया, जो इस हमले के पीछे सांप्रदायिक प्रतिशोध की ओर इशारा करता है।

  • मलेशिया में UPI, नए कॉन्सुलेट और निवेश… भारतीय समुदाय से क्या-क्या बोले पीएम मोदी

    मलेशिया में UPI, नए कॉन्सुलेट और निवेश… भारतीय समुदाय से क्या-क्या बोले पीएम मोदी


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ आज कुआलालंपुर में भारतीय समुदाय के सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत का यूपीआई शीघ्र ही मलेशिया में आएगा. इसके साथ ही पीएम मोदी ने नए कॉन्सुलेट खोलने के बाद करते हुए भारत और मलेशिया के बीच संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया
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    पीएम मोदी ने कहा कि मलेशिया में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इंडियन ओरिजिन कम्युनिटी है. ऐसी बहुत सी चीजें हैं जो इंडियन और मलेशियाई दिलों को जोड़ती हैं.उन्होंने कहा किआप वो जीता-जागता पुल हैं जो हमें जोड़ता है. आपने रोटी कैनाई को मालाबार परोट्टा से जोड़ा है. नारियल, मसाले… स्वाद बहुत जाने-पहचाने लगते हैं, चाहे वो कुआलालंपुर हो या कोच्चि. हम एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह समझते हैं.
    उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि आपकी भाषाओं और मलय के बीच बहुत सारे कॉमन शब्द हैं. मैंने सुना है कि मलेशिया में इंडियन म्यूजिक और फिल्में पॉपुलर हैं. आप सब जानते हैं कि PM अनवर इब्राहिम बहुत अच्छा गाते हैं, लेकिन घर पर कई इंडियन यह नहीं जानते थे. उनके पिछले दौरे पर, वे बहुत खुश हुए थे. इंडिया में उनके एक पुराने हिंदी गाने के वीडियो वायरल हुए थे. यह भी बहुत अच्छी बात है कि उन्हें लेजेंडरी MGR के तमिल गाने बहुत पसंद हैं.

    भारत के लिए आपके दिलों में एक खास जगह
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, मुझे पता है कि भारत के लिए आपके दिलों में एक खास जगह है. मुझे 2001 की एक घटना बहुत अच्छे से याद है जब मेरे होम स्टेट गुजरात में भूकंप आया था. आप में से कई लोग मदद के लिए एक साथ आए थे. मैं आप सभी का शुक्रिया अदा करता हूं.उन्होंने कहा कि उससे भी बहुत पहले, भारत को एक आजाद देश बनाने के लिए आपके हजारों पूर्वजों ने बड़ी कुर्बानियां दी थीं. उनमें से कई के पड़ोसी भारत में थे, लेकिन वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी में शामिल होने वाले पहले लोगों में से थे. मैं इस मौके पर मलेशिया में नेताजी सर्विस सेंटर और नेताजी वेलफेयर फाउंडेशन की कोशिशों को भी सलाम करता हूं.

    भारत अब इन्वेस्टमेंट और ट्रेड हब
    पीएम मोदी ने कहा कि पहले, भारत को सिर्फ एक बहुत बड़े मार्केट के तौर पर देखा जाता था. अब हम इन्वेस्टमेंट और ट्रेड का हब हैं. भारत को ग्रोथ के लिए एक भरोसेमंद पार्टनर के तौर पर देखा जाता है. चाहे वह UK हो, UAE हो, ऑस्ट्रेलिया हो, न्यूजीलैंड हो, ओमान हो, EU हो, या USA हो. देशों के भारत के साथ ट्रेड डील हैं.

    पीएम मोदी ने कहा कि हमने अभी एक रिकॉर्ड बनाने वाला कल्चरल परफॉर्मेंस देखा है. 800 डांसर एकदम सही तालमेल में. यह परफॉर्मेंस हमारे लोगों को आने वाले कई सालों तक याद रहेगी. मैं सभी परफॉर्मर्स को बधाई देता हूं.पीएम मोदी ने कहा कि पिछले साल, मैं ASEAN समिट के लिए मलेशिया नहीं जा पाया था, लेकिन मैंने अपने दोस्त से वादा किया था कि मैं जल्द ही मलेशिया आऊंगा. जैसा वादा किया था, मैं यहां हूं. 2026 में यह मेरा पहला विदेश दौरा है.

  • ओमान में बातचीत खत्म होते ही अमेरिका का ईरान पर नए तेल प्रतिबंधों का ऐलान, तेहरान सकते में

    ओमान में बातचीत खत्म होते ही अमेरिका का ईरान पर नए तेल प्रतिबंधों का ऐलान, तेहरान सकते में


    वॉशिंगटन। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच ओमान की राजधानी मस्कट में हुई अप्रत्यक्ष बातचीत खत्म होने के तुरंत बाद अमेरिका ने ईरान के खिलाफ नए तेल प्रतिबंधों की घोषणा कर दी। इन प्रतिबंधों का मकसद ईरान के तेल निर्यात को और सीमित करना बताया गया है, और इसके बाद तेहरान सकते में है।

    अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के अवैध तेल और पेट्रोकेमिकल निर्यात को रोकने के लिए अधिकतम दबाव की नीति पर कायम हैं। अमेरिका ने 14 जहाजों को निशाना बनाया है, जिन पर ईरानी तेल ढोने का आरोप है। इनमें तुर्की, भारत और यूएई के झंडे वाले जहाज भी शामिल हैं। इसके अलावा 15 कंपनियों और 2 व्यक्तियों पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। अब इन जहाजों और संस्थाओं से जुड़े कोई भी लेन-देन अमेरिका में अवैध माना जाएगा।

    ट्रंप नीति जारी
    अमेरिका पहले भी ईरान पर इसी तरह के प्रतिबंध लगाता रहा है। इनका उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाकर उसे अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों में बदलाव के लिए मजबूर करना है। दिलचस्प बात यह है कि यह घोषणा ऐसे समय हुई जब ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि ओमान में बातचीत का माहौल सकारात्मक था। बावजूद इसके अमेरिका ने दबाव की नीति में कोई ढील नहीं दी।

    तनाव की पृष्ठभूमि
    ओमान में बातचीत के समय ईरान में हाल के वर्षों की सबसे बड़ी जन-आंदोलन जैसी घटनाओं को सरकार ने बलपूर्वक दबाया है। अमेरिका ने ईरान के तटों के पास अपनी सैन्य मौजूदगी भी बढ़ाई है और राष्ट्रपति ट्रंप ने बल प्रयोग की चेतावनी दी है। विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका की रणनीति साफ संकेत देती है कि वह कूटनीतिक बातचीत जारी रखते हुए आर्थिक और सैन्य दबाव के जरिए ईरान को झुकाने की कोशिश कर रहा है।

  • बांग्लादेश चुनाव में भारत और अल्पसंख्यक सबसे बड़े मुद्दे, मैनिफेस्टो में क्या कह रहीं प्रमुख पार्टियां?

    बांग्लादेश चुनाव में भारत और अल्पसंख्यक सबसे बड़े मुद्दे, मैनिफेस्टो में क्या कह रहीं प्रमुख पार्टियां?

    NP) और जमात-ए-इस्लामी के मैनिफेस्टो में भारत और हिंदू समुदाय को लेकर अपनाए गए रुख पर सबकी निगाहें टिकी हैं।

    भारत को लेकर पार्टियों की सोच

    17 साल बाद देश लौटे तारिक रहमान ने BNP की कमान संभालते ही “बांग्लादेश फर्स्ट” को अपना मूल मंत्र बताया है। पार्टी का घोषणापत्र भी इसी नीति के इर्द-गिर्द घूमता है। तारिक रहमान का कहना है कि बांग्लादेश न तो किसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करेगा और न ही अपने मामलों में दखल स्वीकार करेगा। उनका चर्चित नारा— “न दिल्ली, न पिंडी, पहले बांग्लादेश”—भारत के लिए खास मायने रखता है।

    यह रुख ऐसे समय सामने आया है जब यूनुस सरकार के दौरान बांग्लादेश की पाकिस्तान से बढ़ती नजदीकियों को लेकर सवाल उठे थे। माना जा रहा है कि तारिक रहमान इस दिशा में अलग संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं।

    दूसरी ओर, जमात-ए-इस्लामी ने अपने घोषणापत्र में भारत के साथ शांतिपूर्ण, मित्रवत और सहयोगी संबंधों की वकालत की है। चौंकाने वाली बात यह है कि पार्टी के दस्तावेज़ में पाकिस्तान का कोई उल्लेख नहीं है। हालांकि जमात ने मुस्लिम देशों को प्राथमिकता देने की बात कही है और अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान व कनाडा जैसे पश्चिमी देशों से भी रिश्ते मजबूत करने का संकेत दिया है।

    हिंदुओं और अल्पसंख्यकों पर क्या वादे?

    हिंदुओं की सुरक्षा इस चुनाव का एक अहम मुद्दा बन चुकी है। BNP ने अपने घोषणापत्र में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की जान, संपत्ति और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के लिए सख्त कानूनी प्रावधान लागू करने का वादा किया है। इसके अलावा सभी धर्मों के धार्मिक नेताओं के लिए भत्ते और कल्याणकारी योजनाओं की भी बात कही गई है।

    वहीं जमात-ए-इस्लामी ने हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर कोई स्पष्ट और ठोस वादा नहीं किया है। पार्टी ने केवल धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने की बात अपने मैनिफेस्टो में शामिल की है।

    कुल मिलाकर, इस चुनाव में भारत से रिश्ते और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा ऐसे मुद्दे हैं, जो बांग्लादेश की आने वाली राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।
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