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  • Libya: चुनाव से पहले पूर्व शासक तानाशाह गद्दाफी के बेटे सैफ अल-इस्लाम की अपने ही घर में गोली मारकर हत्या

    Libya: चुनाव से पहले पूर्व शासक तानाशाह गद्दाफी के बेटे सैफ अल-इस्लाम की अपने ही घर में गोली मारकर हत्या


    त्रिपोली।
    लीबिया (Libya) के पूर्व शासक मुअम्मर गद्दाफी (Former ruler Muammar Gaddafi) के बेटे सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी (Saif al-Islam Gaddafi.) की गोली मारकर हत्या कर दी गई है। 53 वर्षीय सैफ की मौत की पुष्टि उनके राजनीतिक दल के प्रमुख ने मंगलवार को की, जिससे लीबिया में सियासी हलचल (Political Turmoil) तेज हो गई है। सैफ की हत्या को लेकर विभिन्न दावे सामने आ रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्हें लीबिया के जिंतान शहर में उनके घर पर गोली मारी गई, जबकि कुछ सूत्रों का कहना है कि यह घटना लीबिया-अल्जीरिया सीमा के पास हुई।


    हत्यारे कौन थे?

    सैफ के वकील ने AFP समाचार एजेंसी से कहा कि एक कमांडो दस्ते ने सैफ के घर पर हमला किया और उनकी हत्या की। हालांकि, वकील ने यह स्पष्ट नहीं किया कि हमलावर कौन थे और उन्होंने यह हत्या किसके आदेश पर की। उनके मुताबिक, यह एक सुनियोजित हत्या थी। सैफ की बहन ने भी एक टीवी चैनल को बताया कि उनकी मौत सीमा क्षेत्र में हुई थी, जो कि इस मामले की जांच को और पेचीदा बना रहा है।


    सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी: पिता के राजनीतिक उत्तराधिकारी

    सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी को लंबे समय तक अपने पिता मुअम्मर गद्दाफी का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता था। 1972 में जन्मे सैफ ने 2000 के दशक में लीबिया और पश्चिमी देशों के बीच रिश्तों को सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 2011 में हुए लीबिया विद्रोह के दौरान उन पर विद्रोहियों को कुचलने का आरोप लगा, जिसके कारण वह एक विवादास्पद व्यक्ति बन गए थे।

    गद्दाफी शासन के खिलाफ विद्रोह के बाद सैफ को छह साल तक जिंतान शहर में एक प्रतिद्वंद्वी मिलिशिया द्वारा कैद रखा गया था। उन पर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय द्वारा मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप लगाए गए थे और उनका मुकदमा चलाने की मांग की गई थी।


    चुनाव लड़ने की योजना थी

    सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी 2021 में राष्ट्रपति चुनाव लड़ने का इरादा रखते थे, लेकिन इससे पहले ही उनकी हत्या कर दी गई। गद्दाफी शासन के पतन के बाद लीबिया में अलग-अलग मिलिशिया गुटों के बीच सत्ता की लड़ाई जारी रही है और देश की राजनीति अस्थिर बनी हुई है। सैफ की हत्या ने लीबिया की राजनीति को और अधिक अनिश्चित बना दिया है, क्योंकि वह चुनावों में अपनी किस्मत आजमाने की तैयारी कर रहे थे।

  • ईरान की राजधानी तेहरान के एक बाजार में लगी भीषण आग… मची अफरा-तफरी

    ईरान की राजधानी तेहरान के एक बाजार में लगी भीषण आग… मची अफरा-तफरी


    तेहरान।
    ईरान (Iran) की राजधानी तेहरान (Tehran) से एक बड़ी खबर सामने आई है। मंगलवार को तेहरान के पश्चिमी इलाके, जन्नत आबाद (Jannat Abaad) में स्थित एक बाजार में अचानक भीषण आग (Market Massive Fire) लग गई। आग के कारणों का अभी तक पता नहीं चल सका है, लेकिन जैसे ही आग की सूचना मिली, बचाव कार्य तुरंत शुरू कर दिए गए। दमकल की कई टीमों को मौके पर भेजा गया है और आग बुझाने के प्रयास जारी हैं।


    आग की लपटें और काले धुएं ने मचाई दहशत

    तेहरान की आपातकालीन सेवाओं के अधिकारी मोहम्मद बेहनिया ने बताया कि अब तक इस घटना में किसी की मौत या घायल होने की कोई सूचना नहीं मिली है। हालांकि, आग इतनी भयंकर थी कि उसकी लपटें और काले धुएं के घने बादल शहर के कई हिस्सों से स्पष्ट रूप से देखे जा रहे थे। यह आग जन्नत आबाद इलाके के एक शॉपिंग सेंटर में लगी, जो सैकड़ों दुकानों और छोटे-छोटे स्टॉल से भरा हुआ था।


    सुबह के समय लगी आग, विक्रेताओं और ग्राहकों में अफरातफरी

    आग सुबह करीब 10 बजे जन्नत आबाद शोमाली इलाके के एक बड़े बाजार में लगी। इस दौरान बाजार में विक्रेता और ग्राहक दोनों मौजूद थे। जैसे ही आग फैलने लगी, वहां मौजूद लोग घबराकर इधर-उधर भागने लगे। दमकल विभाग को तुरंत सूचित किया गया और वे घटनास्थल पर पहुंचकर आग बुझाने का प्रयास कर रहे हैं।


    दमकलकर्मियों ने त्वरित प्रतिक्रिया दी

    घटना के बाद, दमकलकर्मियों ने बताया कि आग बहुत तेज़ी से फैल रही थी और मौके पर पहुँचने के बाद वे तुरंत कई दिशाओं से आग को काबू करने का प्रयास करने लगे। सरकारी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दमकल टीमें घटनास्थल पर पहुंची और कई मोर्चों से अग्निशमन कार्य शुरू किया।


    सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो

    इस बीच, सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों और वीडियो में बाजार से उठता हुआ घना काला धुंआ और लपटों की ऊंची लहरें साफ देखी जा सकती हैं। आसपास के आवासीय और वाणिज्यिक क्षेत्रों में अफरातफरी का माहौल है। तेहरान के नागरिकों को यह दृश्य बेहद डरावना प्रतीत हो रहा है।


    राहत कार्य जारी, स्थिति नियंत्रण में

    हालांकि अब तक किसी बड़े हादसे की सूचना नहीं है, राहत कार्य जारी है और दमकलकर्मी आग पर काबू पाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही स्थिति को नियंत्रण में लाने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि अभी तक इस घटना में घायलों या संभावित मौतों की संख्या के बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है और अतिरिक्त जानकारी बाद में जारी की जाएगी। अधिकारियों ने कहा कि आग को आसपास की इमारतों और आवासीय क्षेत्रों में फैलने से रोकने पर मुख्य ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।

  • IRGC को आतंकी संगठन घोषित करने पर ईरान का तीखा जवाब, EU के सभी राजदूत तलब

    IRGC को आतंकी संगठन घोषित करने पर ईरान का तीखा जवाब, EU के सभी राजदूत तलब



    तेहरान। ईरान और यूरोपीय संघ के बीच कूटनीतिक तनाव और गहरा गया है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) को आतंकवादी संगठन घोषित करने के यूरोपीय संघ के फैसले के विरोध में ईरान ने सभी EU देशों के राजदूतों को तलब किया है। तेहरान ने इस कदम को अवैध, अनुचित और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताया है।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब ईरान पहले से ही देशभर में हुए प्रदर्शनों पर कथित हिंसक कार्रवाई और सामूहिक फांसी के मामलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव झेल रहा है। इसी बीच अमेरिका ने पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हुए यूएसएस अब्राहम लिंकन विमानवाहक पोत और कई मिसाइल विध्वंसक जहाज तैनात कर दिए हैं। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सैन्य कार्रवाई का आदेश देंगे या नहीं, क्योंकि क्षेत्रीय देश किसी नए युद्ध को रोकने के लिए कूटनीतिक कोशिशें कर रहे हैं।

    EU के फैसले से बढ़ा विवाद

    यूरोपीय संघ ने पिछले सप्ताह ईरान में हुए देशव्यापी प्रदर्शनों के दौरान कथित हिंसक कार्रवाई में IRGC की भूमिका का हवाला देते हुए उसे आतंकवादी संगठन घोषित करने पर सहमति जताई थी। इन प्रदर्शनों में हजारों लोगों की मौत और बड़ी संख्या में गिरफ्तारी के दावे किए गए हैं।
    अमेरिका और कनाडा पहले ही IRGC को आतंकवादी संगठन की सूची में शामिल कर चुके हैं। भले ही EU का यह कदम काफी हद तक प्रतीकात्मक माना जा रहा हो, लेकिन इससे ईरान पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बढ़ गया है, क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था में IRGC की अहम भूमिका है।

    ईरान की चेतावनी और जवाबी कदम की तैयारी

    ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघाई ने बताया कि रविवार से EU राजदूतों को तलब करने की प्रक्रिया शुरू हुई और सोमवार तक जारी रही। उन्होंने कहा कि कई विकल्पों पर विचार किया जा रहा है और उन्हें निर्णय लेने वाले संस्थानों के पास भेज दिया गया है।
    बाघाई ने स्पष्ट किया कि यूरोपीय संघ के इस “अवैध और गलत” कदम के जवाब में ईरान आने वाले दिनों में ठोस फैसला ले सकता है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य में सैन्य अभ्यास जारी

    इस बीच ईरान ने स्पष्ट किया है कि फारस की खाड़ी के प्रवेश द्वार होर्मुज जलडमरूमध्य में IRGC का सैन्य अभ्यास तय कार्यक्रम के अनुसार जारी है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से बेहद अहम है, जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल व्यापार का आवागमन होता है।

    जब संभावित युद्ध को लेकर सवाल किया गया तो बाघाई ने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है, हालांकि उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि अमेरिका की ओर से ईरान को कोई समयसीमा दी गई है या नहीं।

    EU की सेनाओं को आतंकी मानने का एलान

    इससे पहले ईरानी संसद के अध्यक्ष ने 2019 के एक कानून का हवाला देते हुए कहा था कि अब ईरान यूरोपीय संघ की सभी सैन्य इकाइयों को आतंकवादी संगठन मानता है।

    IRGC का प्रभाव और इतिहास

    गौरतलब है कि IRGC की स्थापना 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद शिया नेतृत्व वाली सरकार की सुरक्षा के लिए की गई थी और बाद में इसे संविधान का हिस्सा बना दिया गया। यह नियमित सेना के समानांतर काम करता है।
    1980 के दशक में इराक के साथ युद्ध के दौरान इसकी ताकत और प्रभाव तेजी से बढ़ा। युद्ध के बाद इसके विघटन की चर्चा जरूर हुई, लेकिन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने इसे निजी क्षेत्र में विस्तार की अनुमति दी, जिससे यह ईरान की राजनीति, सुरक्षा और अर्थव्यवस्था में एक शक्तिशाली संस्था बन गया।

  • मुकदमे से ठीक पहले गिरफ्तारी: नॉर्वे की क्राउन प्रिंसेस के बेटे पर लगे नए गंभीर आरोप

    मुकदमे से ठीक पहले गिरफ्तारी: नॉर्वे की क्राउन प्रिंसेस के बेटे पर लगे नए गंभीर आरोप

    नॉर्वे। नॉर्वे की क्राउन प्रिंसेस मेटे-मारिट के बेटे मारियस बोर्ग होइबी की कानूनी मुश्किलें और बढ़ गई हैं। बलात्कार समेत कई गंभीर आरोपों के मुकदमे से ठीक पहले उन्हें नए आपराधिक मामलों में गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस ने उन्हें रविवार शाम हिरासत में लिया, जिससे उनके खिलाफ चल रही जांच और मुकदमे की गंभीरता और बढ़ गई है।

    यह गिरफ्तारी ऐसे समय हुई है जब होइबी के खिलाफ मुख्य मुकदमा मंगलवार से ओस्लो जिला अदालत में शुरू होने वाला है। इस मुकदमे में उन पर कुल 38 आरोप लगाए गए हैं, जिनमें चार बलात्कार के मामले, पूर्व साथियों के खिलाफ हिंसा, धमकी, नशीली दवाओं के कब्जे और अन्य अपराध शामिल हैं।

    क्या हैं नए आरोप
    ओस्लो पुलिस के मुताबिक, मारियस बोर्ग होइबी पर शारीरिक नुकसान पहुंचाने, चाकू दिखाकर धमकाने और अदालत द्वारा जारी निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने का संदेह है। पुलिस ने अदालत से उन्हें चार सप्ताह तक न्यायिक हिरासत में रखने की मांग की है, यह कहते हुए कि उनके दोबारा अपराध करने का खतरा बना हुआ है।
    इन नए आरोपों के चलते होइबी को पहले से दर्ज मामलों के अलावा अतिरिक्त आपराधिक प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।

    पहले से दर्ज हैं कई गंभीर मामले
    होइबी के खिलाफ जांच की शुरुआत 2024 में हुई थी, जब उन पर अपनी तत्कालीन साथी के साथ शारीरिक हिंसा करने का आरोप लगा।

    बाद में उन्होंने स्वीकार किया था कि कोकीन और शराब के नशे में उन्होंने महिला को चोट पहुंचाई और उसके अपार्टमेंट में तोड़फोड़ की। उन्होंने अपने व्यवहार पर पछतावा भी जताया था।

    हालांकि, उनके वकील के अनुसार होइबी ने बलात्कार और घरेलू हिंसा जैसे गंभीर आरोपों से इनकार किया है। यदि अदालत में आरोप साबित हो जाते हैं, तो उन्हें अधिकतम 10 साल तक की सजा हो सकती है।

    19 मार्च तक चल सकता है मुकदमा
    मुख्य मुकदमे की सुनवाई 19 मार्च तक चलने की संभावना है। नए मामलों में गिरफ्तारी ने न केवल इस हाई-प्रोफाइल केस को और संवेदनशील बना दिया है, बल्कि नॉर्वे के शाही परिवार से जुड़े इस मामले पर देश-विदेश में निगाहें भी टिका दी हैं।

  • डॉलर के प्रभुत्व का समय समाप्त …. चीनी राष्ट्रपति ने किया युआन को वैश्विक करेंसी बनाने का आह्वान! भड़के ट्रंप

    डॉलर के प्रभुत्व का समय समाप्त …. चीनी राष्ट्रपति ने किया युआन को वैश्विक करेंसी बनाने का आह्वान! भड़के ट्रंप


    बीजिंग।
    चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) ने हाल ही में अमेरिका (America) को एक स्पष्ट और बड़ा संदेश दिया है, जब उन्होंने अपने एक भाषण में कहा कि डॉलर के प्रभुत्व का समय अब समाप्त हो चुका है। जिनपिंग के अनुसार, दुनिया को एक ऐसी करेंसी की आवश्यकता है, जिसपर वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी विश्वास किया जा सके। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चीन अपने युआन (Yuan.) को वैश्विक रिजर्व करेंसी बनाने (Creating Global Reserve Currency) की दिशा में तेजी से काम कर रहा है।

    अपने संबोधन में शी ने यह भी कहा कि एक सशक्त आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए एक मजबूत आर्थिक आधार, विश्वस्तरीय तकनीकी और आर्थिक क्षमता, और एक ऐसी करेंसी की आवश्यकता है, जिस पर पूरे विश्व का भरोसा हो और जिसका वैश्विक उपयोग हो। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि इसके लिए एक प्रभावी केंद्रीय बैंक की आवश्यकता होगी, जो सही ढंग से मौद्रिक नीति और मैक्रो प्रूडेंशियल प्रबंधन को लागू कर सके। इसके अलावा, चीन को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी वित्तीय संस्थान और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्रों की जरूरत होगी, जो दुनियाभर से पूंजी आकर्षित कर सकें और वैश्विक कीमतों पर प्रभाव डाल सकें।


    संगीन है वक्त की बात

    यह भाषण चीनी मैगजीन ‘चिउशी’ में शनिवार को प्रकाशित हुआ था। खास बात यह है कि शी जिनपिंग ने यह भाषण 2024 में ही दिया था, और इस समय इसे प्रकाशित करने की टाइमिंग पर बहुत ध्यान दिया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसका मकसद स्पष्ट रूप से अमेरिका, खासकर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को चुनौती देना हो सकता है, जो डॉलर के वर्चस्व को लेकर पहले भी कई बार आलोचना कर चुके हैं।


    ब्रिक्स पर ट्रंप का गुस्सा

    पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले कई बार डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने वाले देशों को चेतावनी दी थी। उन्होंने भारत, चीन और रूस के नेतृत्व वाले ब्रिक्स समूह के उन प्रयासों का विरोध किया था, जिनमें डॉलर के विकल्प के रूप में एक नई वैश्विक करेंसी या भुगतान प्रणाली की खोज की जा रही थी। उन्होंने तो यह भी धमकी दी थी कि यदि ब्रिक्स देशों ने ऐसा प्रयास किया तो वे 100 फीसदी टैरिफ लगा देंगे।

    लेकिन वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और बढ़ते अनिश्चितताओं के बीच, भारत और अन्य ब्रिक्स सदस्य देशों ने डॉलर का विकल्प तलाशने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। सूत्रों के अनुसार, ब्रिक्स देशों ने एक साझा डिजिटल पेमेंट सिस्टम बनाने की योजना बनाई है, जिससे वे डॉलर पर निर्भरता कम कर सकें और अपने-अपने देशों में वित्तीय लेन-देन को सुविधाजनक बना सकें।

    शी जिनपिंग का यह आह्वान और उनके द्वारा किया गया प्रस्ताव, अमेरिकी वित्तीय प्रभुत्व को चुनौती देने के तौर पर देखा जा सकता है। यदि युआन को वैश्विक रिजर्व करेंसी के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो यह वैश्विक वित्तीय संरचना को बदलने के संकेत हो सकते हैं। चीन का यह कदम निश्चित रूप से अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकता है, जो डॉलर के माध्यम से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर लंबे समय से अपना नियंत्रण बनाए हुए है।

    इन घटनाक्रमों के बाद ट्रंप और उनके समर्थक इससे और अधिक बौखलाएंगे, और अमेरिका द्वारा इसके जवाब में कुछ कड़े कदम उठाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि चीन और ब्रिक्स देशों की यह नई रणनीति अमेरिकी डॉलर के प्रभाव को किस हद तक चुनौती देती है।

  • एक पेड़ मां के नाम’ बना वैश्विक अभियान: इजराइल के नेवातिम में रोपे गए 300 पेड़, भारत–इजराइल दोस्ती हुई मजबूत

    एक पेड़ मां के नाम’ बना वैश्विक अभियान: इजराइल के नेवातिम में रोपे गए 300 पेड़, भारत–इजराइल दोस्ती हुई मजबूत

    नई दिल्‍ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी महत्वाकांक्षी पहल ‘एक पेड़ मां के नाम’ अब भारत की सीमाओं को पार कर वैश्विक स्वरूप लेती नजर आ रही है। इसी कड़ी में इजराइल के नेगेव क्षेत्र स्थित मोशव नेवातिम में 300 पेड़ लगाए गए, जिसने न केवल हरियाली का संदेश दिया बल्कि भारत और इजराइल के गहरे और ऐतिहासिक संबंधों को भी नई मजबूती प्रदान की। यह विशेष वृक्षारोपण कार्यक्रम यहूदी पर्व ‘तु बिश्वत’ के अवसर पर आयोजित किया गया, जिसे इजराइल में पेड़ों का नया साल और पर्यावरण जागरूकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस तरह भारतीय पहल और यहूदी परंपरा का संगम प्रकृति, संस्कृति और साझा मूल्यों का प्रतीक बनकर सामने आया।

    नेवातिम में हरियाली के साथ दोस्ती का उत्सव

    मोशव नेवातिम में आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों, बच्चों और समुदाय के सदस्यों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। भारत के दूतावास, केरेन कायेमेट ले इजराइल KKL-JNF और मोशव नेवातिम के संयुक्त सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम के तहत कुल 300 पौधे लगाए गए।

    यह पहल केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे भारत और इजराइल के बीच लोगों से लोगों के रिश्तों को मजबूत करने के एक सशक्त माध्यम के रूप में देखा गया। बच्चों की भागीदारी ने इस संदेश को और भी भावनात्मक बना दिया कि प्रकृति की रक्षा की जिम्मेदारी अगली पीढ़ियों के साथ साझा है।

    भारत–इजराइल की साझा सोच और प्रतिबद्धता

    कार्यक्रम में इजराइल के पर्यावरण संरक्षण मंत्रालय के महानिदेशक रामी रोजेन, भारत के इजराइल में राजदूत जेपी सिंह और ब्नेई शिमोन क्षेत्रीय परिषद के प्रमुख निर जामिर की उपस्थिति ने आयोजन को और भी खास बना दिया। सभी वक्ताओं ने सतत विकास, जलवायु परिवर्तन से निपटने और पर्यावरण सुरक्षा को लेकर भारत और इजराइल की साझा प्रतिबद्धता पर जोर दिया।

    उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण आज केवल किसी एक देश का मुद्दा नहीं, बल्कि यह एक वैश्विक जिम्मेदारी है। ऐसे में ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसी पहलें दुनिया को यह संदेश देती हैं कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना संभव है।

    राजदूत जेपी सिंह का भावनात्मक संबोधन

    भारतीय राजदूत जेपी सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि ‘तु बिश्वत’ और ‘एक पेड़ मां के नाम’ दोनों ही परंपराएं प्रकृति, समुदाय और भावनात्मक जुड़ाव को केंद्र में रखती हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह मां जीवन का आधार होती है, उसी तरह पेड़ धरती पर जीवन को संजोए रखते हैं।राजदूत ने विश्वास जताया कि नेवातिम में लगाए गए ये पेड़ आने वाले वर्षों में भारत–इजराइल मित्रता के स्थायी प्रतीक बनेंगे और जब ये पेड़ बड़े होंगे, तो वे आने वाली पीढ़ियों को दोनों देशों के बीच गहरे रिश्तों की कहानी सुनाएंगे।

    भारतीय विरासत से गहराई से जुड़ा नेवातिम

    नेवातिम का भारत से ऐतिहासिक रिश्ता भी इस आयोजन को विशेष बनाता है। इस मोशव की स्थापना भारत के कोचीन क्षेत्र से आए यहूदियों ने की थी। आज भी नेवातिम में भारतीय यहूदी विरासत जीवंत रूप में मौजूद है। यहां स्थित भारतीय यहूदी विरासत केंद्र और कोचिनी शैली का सिनेगॉग इस ऐतिहासिक संबंध की गवाही देते हैं।हाल ही में यहां भारतीय महाराजा जाम साहिब की प्रतिमा का अनावरण भी किया गया, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदी शरणार्थियों की मदद के लिए जाने जाते हैं। यह प्रतिमा भारत और यहूदी समुदाय के बीच मानवीय रिश्तों की एक और मजबूत कड़ी है।

    एक पहल, कई संदेश

    कुल मिलाकर, इजराइल के नेवातिम में आयोजित यह वृक्षारोपण कार्यक्रम केवल पेड़ लगाने का आयोजन नहीं था, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, सांस्कृतिक जुड़ाव और भारत–इजराइल मित्रता का एक जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘एक पेड़ मां के नाम’ पहल अब एक वैश्विक संदेश बनती दिख रही है ऐसा संदेश, जिसमें प्रकृति के प्रति सम्मान, मां के प्रति भावनात्मक जुड़ाव और भविष्य की पीढ़ियों के लिए जिम्मेदारी एक साथ जुड़ी हुई है।

  • ‘हिंदू कार्ड’ या सियासी पाखंड? बांग्लादेश में चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी की कथित समावेशिता पर सवाल

    ‘हिंदू कार्ड’ या सियासी पाखंड? बांग्लादेश में चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी की कथित समावेशिता पर सवाल


    नई दिल्‍ली । बांग्लादेश की राजनीति इन दिनों एक गंभीर विरोधाभास से गुजर रही है। एक तरफ देश में हिंदू समुदाय पर हमलों, हिंसा और कथित नरसंहार की खबरें सामने आ रही हैं, तो दूसरी ओर कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी खुद को “समावेशी” और “धर्मनिरपेक्ष” दिखाने की कोशिश कर रही है। इस कोशिश का ताजा उदाहरण खुलना-1 संसदीय सीट से हिंदू प्रकोष्ठ के नेता कृष्ण नंदी को उम्मीदवार बनाए जाने के रूप में सामने आया है। हालांकि, कई रिपोर्ट्स और खुद पार्टी के संविधान की धाराएं इस कदम को महज एक सियासी दिखावा और ‘हिंदू कार्ड’ करार दे रही हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी का यह कदम वास्तविक समावेशिता से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अल्पसंख्यकों को गुमराह करने की रणनीति है। पार्टी के संविधान में निहित प्रावधान यह साफ करते हैं कि कोई भी हिंदू या गैर-मुस्लिम कभी भी जमात-ए-इस्लामी का पूर्ण सदस्य नहीं बन सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि जब किसी समुदाय को संगठन के भीतर बराबरी का अधिकार ही नहीं दिया जा सकता, तो उसे चुनावी उम्मीदवार बनाना कितना ईमानदार कदम कहा जा सकता है।

    संविधान की सख्त शर्तें, गैर-मुस्लिमों को बराबरी नहीं

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी के संविधान की धारा 11 स्पष्ट रूप से कहती है कि कोई भी गैर-मुस्लिम केवल “एसोसिएट सदस्य” ही बन सकता है। इसका मतलब यह है कि हिंदू या अन्य गैर-मुस्लिम नेताओं को पार्टी की कोर कमिटी, नीति-निर्माण या अहम फैसलों में कोई भूमिका नहीं मिलेगी। पूर्ण सदस्यता केवल मुसलमानों के लिए आरक्षित है। ऐसे में कृष्ण नंदी जैसे नेताओं को उम्मीदवार बनाना प्रतीकात्मक कदम से ज्यादा कुछ नहीं लगता।

    यही नहीं, पार्टी के संविधान की धारा 7 और 9 में पूर्ण सदस्य बनने के लिए जिन शर्तों का उल्लेख है, वे किसी भी स्वाभिमानी हिंदू या गैर-मुस्लिम के लिए स्वीकार्य नहीं मानी जा सकतीं। इन धाराओं के तहत पार्टी सदस्य को अल्लाह, पैगंबर मोहम्मद और कुरान को एकमात्र आदर्श मानना अनिवार्य है। साथ ही, सदस्य को शरिया कानून के अनुसार जीवन जीने और इस्लामी कर्तव्यों का पालन करने की शपथ लेनी होती है। इसके अलावा, “इस्लाम से भटके हुए लोगों” से दूरी बनाए रखने की शर्त भी संविधान में दर्ज है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, जमात-ए-इस्लामी ने वर्ष 2008 में अपने संविधान में कुछ सीमित बदलाव किए थे, लेकिन ये बदलाव भी कथित तौर पर चुनाव आयोग और जनप्रतिनिधित्व आदेश के नियमों से बचने के लिए किए गए थे, ताकि पार्टी का पंजीकरण रद्द न हो। मूल विचारधारा और कट्टर इस्लामी सोच में कोई ठोस बदलाव नहीं किया गया। इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि बिना बुनियादी सुधार के समावेशिता की बात करना महज राजनीतिक अवसरवाद है।

    चुनाव का माहौल और बदली हुई सियासी तस्वीर

    बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने हैं। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद यह देश का पहला आम चुनाव है। अब तक बांग्लादेश की राजनीति मुख्य रूप से अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन इस बार हालात बिल्कुल अलग हैं। मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे वह चुनाव नहीं लड़ पा रही है।

    इस राजनीतिक खालीपन का फायदा उठाकर जमात-ए-इस्लामी खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। विश्लेषकों का मानना है कि हिंदू उम्मीदवार उतारना इसी रणनीति का हिस्सा है, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पार्टी पर लगने वाले कट्टरपंथी और अल्पसंख्यक विरोधी छवि के आरोपों को कमजोर किया जा सके।

    महिलाओं को लेकर भी कट्टर रुख

    जमात-ए-इस्लामी की कथित समावेशिता की पोल महिलाओं के मुद्दे पर भी खुलती है। पार्टी ने इस चुनाव में एक भी महिला उम्मीदवार नहीं उतारा है। पार्टी प्रमुख शफीकुर रहमान का साफ कहना है कि जमात-ए-इस्लामी की कभी कोई महिला प्रमुख नहीं बन सकती। उनके अनुसार, “अल्लाह ने पुरुष और महिलाओं को अलग-अलग बनाया है” और महिलाएं पार्टी का नेतृत्व नहीं कर सकतीं।

    शफीकुर रहमान का एक और बयान काफी विवादित रहा, जिसमें उन्होंने कामकाजी महिलाओं की तुलना वेश्यावृत्ति से कर दी। इस बयान के बाद ढाका समेत कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए और जमात-ए-इस्लामी की सोच पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। उल्‍लेखनीय है कि बांग्लादेश में जहां एक ओर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं हैं, वहीं जमात-ए-इस्लामी का ‘हिंदू उम्मीदवार’ उतारना वास्तविक बदलाव से ज्यादा राजनीतिक दिखावा प्रतीत होता है। पार्टी का संविधान, उसकी विचारधारा और नेताओं के बयान यह संकेत देते हैं कि बिना ठोस वैचारिक और संरचनात्मक सुधार के यह समावेशिता केवल एक चुनावी रणनीति है, जिसका उद्देश्य सत्ता की दौड़ में अपनी छवि को चमकाना भर है।

  • अमेरिकी फैसले से निर्यात प्रतिस्पर्धा में नई ताकत, एशियाई देशों से आगे निकला भारत

    अमेरिकी फैसले से निर्यात प्रतिस्पर्धा में नई ताकत, एशियाई देशों से आगे निकला भारत


    नई दिल्‍ली । अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत किए जाने के बाद भारत की वैश्विक निर्यात प्रतिस्पर्धा में स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत होती नजर आ रही है। इस फैसले को भारत के लिए एक बड़ी आर्थिक और रणनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि नए टैरिफ ढांचे में भारत अब कई प्रमुख निर्यातक देशों की तुलना में कम शुल्क वाली श्रेणी में आ गया है। इससे न केवल भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में बढ़त मिलेगी, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका भी और सशक्त होगी।

    वर्तमान अमेरिकी टैरिफ व्यवस्था पर नजर डालें तो भारत पर अब 18 प्रतिशत शुल्क लागू रहेगा, जबकि इंडोनेशिया पर 19 प्रतिशत, वियतनाम और बांग्लादेश पर 20 प्रतिशत तथा चीन पर सबसे अधिक 34 प्रतिशत टैरिफ लगाया गया है। इस तुलना से साफ है कि भारत अब अपने प्रमुख एशियाई प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले बेहतर स्थिति में पहुंच गया है। खासतौर पर चीन जैसे बड़े निर्यातक देश पर अधिक टैरिफ होने से भारत के लिए अमेरिका जैसे बड़े बाजार में अवसरों के नए द्वार खुल सकते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस टैरिफ कटौती का सीधा लाभ भारत के टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मिलेगा। ‘मेड इन इंडिया’ उत्पाद अब अमेरिकी बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध हो सकेंगे, जिससे निर्यात बढ़ने और रोजगार के नए अवसर पैदा होने की संभावना है। यह फैसला भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों को भी नई गति दे सकता है।

    व्हाइट हाउस ने इस फैसले के पीछे की अहम वजह भी स्पष्ट की। उसके अनुसार, भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद बंद करने पर सहमति जताने के बाद रूसी तेल से जुड़ा 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ पूरी तरह हटा लिया गया है। यह निर्णय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई फोन बातचीत के बाद लिया गया। इससे पहले अमेरिका ने रूस से जुड़े ऊर्जा व्यापार को लेकर भारत पर अतिरिक्त दबाव बनाया था, जिसे अब नई समझ के तहत समाप्त कर दिया गया है।

    व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने जानकारी देते हुए कहा कि भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद समाप्त करने के समझौते के तहत 25 प्रतिशत का अतिरिक्त रूसी तेल-संबंधित टैरिफ हटाया जा रहा है। इस फैसले के बाद कुल अमेरिकी पारस्परिक टैरिफ 25 प्रतिशत से घटकर सीधे 18 प्रतिशत पर आ गया है। इसे भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस समझौते की पुष्टि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ के जरिए की। उन्होंने लिखा कि नए समझौते के तहत भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। ट्रंप ने इसे ऊर्जा सहयोग और भू-राजनीतिक लक्ष्यों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कदम बताया और कहा कि यह फैसला दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों को नई दिशा देगा।

    ट्रंप के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी के साथ हुई बातचीत में व्यापार, रूस-यूक्रेन युद्ध, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और रणनीतिक सहयोग जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने रूसी तेल की खरीद बंद करने और अमेरिका से, साथ ही संभवतः वेनेजुएला से तेल आयात बढ़ाने पर सहमति जताई है। यह कदम अमेरिका की उस रणनीति को दर्शाता है, जिसके तहत वह अपनी व्यापार नीति को ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक उद्देश्यों से जोड़ रहा है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस फैसले पर संतोष जताया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा कि यह जानकर खुशी हुई कि ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों पर अब 18 प्रतिशत का कम टैरिफ लगेगा। उन्होंने कहा कि जब दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और सबसे बड़े लोकतंत्र साथ मिलकर काम करते हैं, तो इसका सीधा लाभ आम लोगों को मिलता है और सहयोग के नए अवसर सामने आते हैं।वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, भारत पर लगाया गया अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ सीधे तौर पर उसकी रूसी तेल खरीद से जुड़ा था। अब नई दिल्ली की ओर से दी गई प्रतिबद्धता के बाद इसे पूरी तरह हटा लिया गया है। यह फैसला इस बात का संकेत है कि अमेरिका व्यापारिक फैसलों को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक नजरिए से भी देख रहा है।

    गौरतलब है कि अमेरिकी टैरिफ में यह कटौती भारत के लिए कई मायनों में फायदेमंद साबित हो सकती है। इससे न केवल भारत की निर्यात क्षमता बढ़ेगी, बल्कि वैश्विक बाजार में उसकी विश्वसनीयता और रणनीतिक अहमियत भी मजबूत होगी। आने वाले समय में इसका असर निवेश, रोजगार और भारत-अमेरिका संबंधों की गहराई पर भी साफ तौर पर दिखाई देने की उम्मीद है।

  • अमेरिका-भारत व्यापार संबंध: ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों पर टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत

    अमेरिका-भारत व्यापार संबंध: ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों पर टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत


    नई दिल्‍ली । अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक अहम और सकारात्मक मोड़ देखने को मिला है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले उत्पादों पर लगाए गए टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने का बड़ा फैसला लिया है। इस निर्णय को भारत में न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि इसे दोनों देशों के बीच रणनीतिक और कूटनीतिक रिश्तों की मजबूती के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

    इस फैसले का भारत सरकार ने खुले दिल से स्वागत किया है। केंद्रीय रेल, संचार और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसे भारत-अमेरिका संबंधों के लिए एक सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत और अमेरिका दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र हैं और स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के सहयोगी हैं। उनके अनुसार, दोनों देशों की ताकतें एक-दूसरे की पूरक हैं और यही कारण है कि मिलकर काम करने से शांति, विकास और नवाचार के नए रास्ते खुल सकते हैं।

    अश्विनी वैष्णव ने यह भी कहा कि भारत और अमेरिका के पास मिलकर ऐसी अत्याधुनिक तकनीकों को विकसित करने की अपार क्षमता है, जिनसे न केवल दोनों देशों को बल्कि पूरे विश्व को लाभ मिल सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि व्यापार केवल आर्थिक लेन-देन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्वास, साझेदारी और साझा भविष्य की नींव भी रखता है। भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित और विकसित हो रहा व्यापार समझौता इसी दिशा में एक मजबूत कदम है, जो दोनों देशों के उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाएगा।

    केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह व्यापार समझौता दोनों देशों के लिए समान रूप से लाभकारी होगा। इससे भारत और अमेरिका के नागरिकों, उद्योगों, स्टार्टअप्स और तकनीकी क्षेत्र को व्यापक लाभ मिलने की संभावना है। टैरिफ में कटौती से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस फैसले पर प्रसन्नता व्यक्त की है। उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हुई टेलीफोन बातचीत के बाद सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया साझा की। प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा कि अपने प्रिय मित्र राष्ट्रपति ट्रंप से बात करके उन्हें अत्यंत खुशी हुई और यह जानकर विशेष संतोष मिला कि ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों पर टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। उन्होंने इस निर्णय के लिए भारत की 140 करोड़ जनता की ओर से राष्ट्रपति ट्रंप का आभार व्यक्त किया।

    प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में यह भी कहा कि जब दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और सबसे बड़े लोकतंत्र मिलकर काम करते हैं, तो उसका सीधा लाभ आम लोगों तक पहुंचता है। इससे न केवल व्यापार और निवेश के अवसर बढ़ते हैं, बल्कि पारस्परिक सहयोग के नए आयाम भी खुलते हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि यह कदम भारत-अमेरिका साझेदारी को और अधिक मजबूत बनाएगा।

    प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक शांति, स्थिरता और समृद्धि के संदर्भ में भी राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व की सराहना की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप की भूमिका इन क्षेत्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण है और भारत शांति के लिए किए जा रहे उनके प्रयासों का पूरा समर्थन करता है। प्रधानमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि वे भविष्य में राष्ट्रपति ट्रंप के साथ मिलकर काम करने और भारत-अमेरिका संबंधों को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

    गौरतलब है कि इस महत्वपूर्ण फैसले से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच फोन पर विस्तृत बातचीत हुई थी। इस बातचीत में दोनों नेताओं ने व्यापार, निवेश और द्विपक्षीय सहयोग से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा की। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने इस बातचीत की जानकारी साझा करते हुए बताया कि दोनों देशों के नेता आपसी संबंधों को और मजबूत करने के लिए निरंतर संपर्क में हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि टैरिफ में कटौती का यह फैसला भारत-अमेरिका आर्थिक साझेदारी को नई गति देगा। इससे न केवल व्यापारिक रिश्ते बेहतर होंगे, बल्कि दोनों देशों के बीच भरोसे और सहयोग की भावना भी और गहरी होगी। कुल मिलाकर, यह कदम भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक सहयोग का एक मजबूत संकेत है, जो आने वाले वर्षों में वैश्विक स्तर पर भी सकारात्मक प्रभाव डालेगा।

  • भारत की आबादी ही उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है: अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो कॉसिनो

    भारत की आबादी ही उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है: अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो कॉसिनो


    नई दिल्ली ।अमेरिका में अर्जेंटीना के राजदूत मारियानो अगस्टिन कॉसिनो ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को लेकर बड़ा बयान दिया है। न्यूज एजेंसी आईएएनएस के साथ खास बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत उसकी विशाल आबादी है। उनके अनुसार भारत न केवल दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है बल्कि यहां के लोगों में टैलेंट और क्रिएटिव सोच की भी अपार संभावनाएं मौजूद हैं।

    राजदूत कॉसिनो ने कहा कि जब भारत सरकार ने पाबंदियां, सीमाएं और अनावश्यक रेगुलेशन हटाए तो भारतीय लोगों की क्षमताएं खुलकर सामने आईं। यही वजह है कि पिछले दस से पंद्रह वर्षों में भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति की है। उन्होंने कहा कि भारत की असली ताकत उसके लोग हैं और यही उसे आगे बढ़ा रही है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण पर बात करते हुए अर्जेंटीना के राजदूत ने कहा कि पीएम मोदी को बड़ी सफलता मिली है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था पिछले एक दशक में छह से आठ प्रतिशत की दर से बढ़ी है। उन्होंने इसे आर्थिक नीति और विनियमन में ढील का सफल उदाहरण बताया।

    कॉसिनो ने यह भी साझा किया कि जब प्रधानमंत्री मोदी अर्जेंटीना गए थे तब उन्हें राष्ट्रपति जेवियर माइली के साथ हुई बैठक में शामिल होने का अवसर मिला था। इस दौरान विनियमन में ढील अनावश्यक नियमों को हटाने और लोगों को कम से कम सरकारी हस्तक्षेप के साथ आगे बढ़ने का मौका देने जैसे विषयों पर चर्चा हुई थी।भारत में विदेशी निवेश को लेकर पूछे गए सवाल पर राजदूत ने कहा कि वह भारत को यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि उसे क्या करना चाहिए क्योंकि यह एक घरेलू नीति का विषय है। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि जब देश अपनी अर्थव्यवस्था खोलते हैं और ज्यादा उत्पादों को आने की अनुमति देते हैं तो इसका फायदा उपभोक्ताओं और घरेलू खपत दोनों को मिलता है।

    उन्होंने आगे कहा कि भारत इस दिशा में अच्छा काम कर रहा है और अर्जेंटीना भारत की खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा में और अधिक योगदान देने के लिए तैयार है। उनके अनुसार भारत और अर्जेंटीना की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के लिए पूरक हैं और यह रणनीतिक साझेदारी आने वाले वर्षों में और मजबूत हो सकती है।