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  • बिना शादी सेक्स पर 140 कोड़े, प्रेमी जोड़े को 'तालिबानी सजा'

    जाकार्ता। शादी के बिना सेक्स और शराब पीने की सजा क्या हो सकती है, यह सवाल चौंकाने वाला लग सकता है। लेकिन इंडोनेशिया में एक ऐसी सजा दी गई है, जिसे जानकर लोग सन्न रह गए। यहां बिना शादी के शारीरिक संबंध बनाने और शराब पीने के मामले में एक प्रेमी जोड़े को सार्वजनिक रूप से कठोर दंड दिया गया।
    न्यूज एजेंसी एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार, इंडोनेशिया के आचे प्रांत में शरिया पुलिस ने इस जोड़े को 140-140 बार बांस की पतली छड़ी से कोड़े मारे। यह सजा इस्लामी कानून लागू होने के बाद दी गई सबसे कठोर सजाओं में से एक मानी जा रही है। आचे इंडोनेशिया का एकमात्र प्रांत है, जहां शरिया कानून का एक रूप लागू है और अविवाहित जोड़ों के बीच सारीरीक संबंध पूरी तरह गैरकानूनी हैं।

    घटनास्थल पर मौजूद एएफपी के संवाददाता के अनुसार, एक सार्वजनिक पार्क में दर्जनों लोगों की मौजूदगी में पुरुष और महिला की पीठ पर बेंत से वार किए गए।

    सजा के दौरान महिला बेहोश हो गई, जिसके बाद उसे एंबुलेंस से अस्पताल ले जाया गया। बांदा आचे की शरिया पुलिस के प्रमुख मुहम्मद रिजाल ने बताया कि दोनों को कुल 140 कोड़े मारे गए। इनमें से 100 कोड़े शादी से बाहर यौन संबंध रखने के लिए और 40 कोड़े शराब पीने के आरोप में दिए गए।

    बताया जा रहा है कि 2001 में आचे को विशेष स्वायत्तता मिलने और शरिया कानून लागू होने के बाद से यह बेंत से दी गई सबसे अधिक सजाओं में शामिल है। इस मामले में कुल छह लोगों को इस्लामी कानून तोड़ने का दोषी पाया गया, जिनमें एक शरिया पुलिस अधिकारी और उसकी महिला साथी भी शामिल थे। उन्हें एक निजी स्थान पर आपत्तिजनक स्थिति में पकड़े जाने पर 23-23 कोड़े मारे गए। रिजाल ने कहा कि शरिया कानून के तहत कोई अपवाद नहीं किया जाता, यहां तक कि अपने ही कर्मियों के लिए भी नहीं।

    उन्होंने कहा कि कानून के उल्लंघन से संस्थान की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है।

    गौरतलब है कि आचे प्रांत में जुआ खेलने, शराब पीने, समलैंगिक संबंध बनाने और शादी के बाहर यौन संबंध रखने जैसे मामलों में अब भी बेंत से कोड़े मारने की सजा को व्यापक समर्थन प्राप्त है। पिछले वर्ष भी शरिया अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद दो पुरुषों को सार्वजनिक रूप से 76-76 कोड़े मारे गए थे।

  • अल-कायदा और हमास जैसे आतंकी संगठनों की सूची में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स …

    अल-कायदा और हमास जैसे आतंकी संगठनों की सूची में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स …


    वाशिंगटन। यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष काजा कल्लास ने कहा कि प्रदर्शनकारियों पर क्रूर दमन के दौरान 6,373 लोगों की हत्या करने वाले ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर को यूरोपीय संघ आतंकवादी संगठन के रूप में सूचीबद्ध करने जा रहा है. इस कदम के लिए यूरोपीय संघ के 27 सदस्य देशों के सर्वसम्मत समर्थन की आवश्यकता होगी और उम्मीद है कि इससे ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर को अल-कायदा, इस्लामिक स्टेट, दाएश और हमास जैसे आतंकी समूहों के साथ जोड़ा जाएगा.

    कल्लास ने गुरुवार को पत्रकारों से कहा, “यदि आप आतंकवादी के रूप में कार्य करते हैं, तो आपके साथ आतंकवादी जैसा व्यवहार भी किया जाना चाहिए.”

    एस्टोनिया की पूर्व प्रधानमंत्री रह चुकीं कल्लास ने कहा कि इससे एक स्पष्ट संदेश जाएगा कि यदि आप लोगों का दमन कर रहे हैं, तो इसकी कीमत चुकानी होगी और इसके लिए आपको दंडित किया जाएगा.

    फ्रांस पहले विरोध में था, अब किया समर्थन

    पहले फ्रांस ने रिवोल्यूशनरी गार्ड को आतंकवादी संगठन के रूप में सूचीबद्ध करने पर आपत्ति जताई थी, क्योंकि उसे आशंका थी कि इससे ईरान में हिरासत में लिए गए फ्रांसीसी नागरिकों के साथ-साथ राजनयिक मिशनों को भी खतरा हो सकता है. हालांकि, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन के कार्यालय ने बुधवार को संकेत दिया कि पेरिस इस निर्णय का समर्थन करता है.

    फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरोट ने गुरुवार को ब्रुसेल्स में विदेश मामलों की परिषद के समक्ष कहा कि फ्रांस ईरान पर और प्रतिबंध लगाने और उसे सूचीबद्ध करने का समर्थन करता है, “क्योंकि किए गए अपराधों के लिए किसी को भी छूट नहीं दी जा सकती.” उन्होंने कहा, “ईरान में, ईरानी जनता के शांतिपूर्ण विद्रोह के दमन को अनदेखा नहीं किया जा सकता.”

    इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर, या ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, ईरान की सेना की सबसे शक्तिशाली शाखा और उसकी राजनीतिक और आर्थिक संरचना का एक प्रमुख स्तंभ है. 1979 में अयातुल्ला खुमैनी द्वारा इस्लामी क्रांति की रक्षा के लिए स्थापित, यह नियमित सेना से स्वतंत्र रूप से कार्य करता है और केवल सर्वोच्च नेता के प्रति जवाबदेह है.

  • ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने की हामी भरकर संकट में फंसा पाकिस्तान…. फीस के लिए भी लेना पड़ेगा कर्ज

    ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने की हामी भरकर संकट में फंसा पाकिस्तान…. फीस के लिए भी लेना पड़ेगा कर्ज


    इस्लामाबाद।
    अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने अपनी नई वैश्विक नीतियों (New Global Policies) से पिछले एक साल में हालात को काफी बदल दिया है। यूरोपीय देशों समेत दुनिया के तमाम मुल्क अब अमेरिका का विकल्प खोज रहे हैं। इसमें सबसे बड़ी परेशानी पाकिस्तान के लिए खड़ी हो गई है। एक तरफ वह ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Trump’s ‘Board of Peace’) में शामिल होने के लिए हामी भर चुका है, लेकिन इसकी फीस चुकाने के लिए शायद उसे एक बार फिर से कर्ज का सहारा लेना पड़े। दावोस में ट्रंप द्वारा घोषित किए गए इस बोर्ड में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Pakistan’s Prime Minister Shahbaz Sharif) भी शामिल हुए। इस बोर्ड का मुख्य उद्देश्य मध्य-पूर्व में शांति को स्थापित करके गाजा के पुननिर्माण का है। लेकिन पाकिस्तान के लिए एक परेशानी का सबब बन गया है। एक तरफ तो पैसे वाली बात है, दूसरी तरफ घरेलू स्तर पर भी शहबाज सरकार को विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

    पाकिस्तान में इसका विरोध होने का सबसे बड़ा कारण इस बोर्ड की संरचना पर है। इस बोर्ड के अध्यक्ष ट्रंप होंगे और सदस्यता और इसकी दिशा तय करने का पूरा हक उनके पास ही होगा। इस बोर्ड को संयुक्त राष्ट्र संघ के एक विकल्प के तौर पर भी देखा जा रहा है। हालांकि, पाकिस्तानी विपक्ष का कहना है कि आखिर ट्रंप के कार्यकाल के बाद इस बोर्ड का क्या होगा इस पर बहुत बड़ा संशय है। क्योंकि यह बोर्ड मुख्य तौर पर ट्रंप के भरोसेमंद देशों का एक समूह नजर आता है।


    ट्रंप के भरोसेमंद पिछलग्गू देश बोर्ड ऑफ पीस में शामिल

    इस बोर्ड में अब तक दो दर्जन से ज्यादा देशों ने शामिल होने की पेशकश की है। हालांकि ट्रंप ने लगभग 100 से ज्यादा देशों को इसके लिए बुलाया था, लेकिन भारत समेत ज्यादातर देशों ने इससे दूरी ही बनाए रखी। वर्तमान में इसमें हंगरी, बुल्गारिया, इजराइल, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, तुर्की, बेलारूस, बहरीन, जॉर्डन, कतर, आर्मेनिया, अजरबैजान, मोरक्को, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, कोसोवो, उज्बेकिस्तान, कजाखस्तान, पैराग्वे और वियतनाम शामिल हैं।


    नाटो ने किया किनारा

    सबसे बड़ी और दिलचस्प बात है कि इसमें अमेरिका के अलावा संयुक्त राष्ट्र स्थायी सुरक्षा समिति का कोई और देश शामिल नहीं है और न ही नाटो सदस्य देशों ने इसमें शामिल होने का उत्साह दिखाया है। यहां तक की यूरोप में ट्रंप समर्थक मानी जाने वाली इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भी इससे दूरी बनाकर रखी है। इसके अलावा अमेरिका से सीमा साझा करने वाले कनाडा ने भी इसको नकार दिया है और तो और पीएम कार्नी की बातों से ट्रंप इतने नाराज हुए कि उन्होंने उनको दिया हुआ निमंत्रण भी कैंसिल कर दिया।

    दरअसल, इस बोर्ड में शामिल होने को लेकर देशों के बीच असमंजस की स्थिति है। इसमें ट्रंप अमेरिका का भी नहीं, बल्कि स्वयं का एकाधिकार चाहते हैं। विदेशी मामलों के जानकारों की मानें तो ट्रंप इसके जरिए सीधे-सीधे संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्चस्व को चुनौती देना चाहते हैं। एक बार यह प्रयास गाजा में सफल हुआ तो उसके बाद इसे दुनिया के दूसरे युद्धों और मसलों की तरफ भी आगे बढ़ाने की कोशिश है।


    एक अरब डॉलर है फीस

    इस बोर्ड के लिए ट्रंप का सीधा प्रयास है कि 1 अरब डॉलर दीजिए और अपने लिए एक सीट ले लीजिए। उनके मुताबिक इस पैसे का इस्तेमाल गाजा के पुनर्निर्माण के लिए होगा। बोर्ड के चार्टर के मसौदे के मुताबिक प्रत्येक सदस्य देश अधिकतम तीन वर्षों के लिए कार्यकाल निभाएगा, जिसे अध्यक्ष द्वारा नवीनीकृत किया जा सकता है। हालांकि, जो देश पहले वर्ष के भीतर 1 अरब डॉलर से अधिक नकद योगदान देते हैं, उन पर यह तीन साल की सीमा लागू नहीं होगी।”

    पाकिस्तान इस बोर्ड में शामिल होने की पुष्टि कर चुका है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा है कि संघीय कैबिनेट ने इस फैसले को मंजूरी दे दी है। उन्होंने लंदन में पाकिस्तान हाई कमीशन के बाहर बताया कि दावोस में उन्हें ट्रंप के निमंत्रण पर चर्चा में बुलाया गया था और वहीं उनसे बोर्ड में शामिल होने को कहा गया। लेकिन पाकिस्तान के लिए पैसा भी एक परेशानी है। बाकी जो इस्लामिक देश इसमें शामिल हुए हैं, वह पैसा चुकाने की स्थिति में हैं, लेकिन पाकिस्तान के साथ ऐसा नहीं है।


    विदेशी कर्ज से बेहाल है पाकिस्तान

    पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है, छोटी-छोटी चीजों के लिए भी वह विदेशी कर्ज पर निर्भर है। हाल ही में आईएमएफ ने पाकिस्तान के लिए 1.2 अरब डॉलर के फंड की मंजूरी दी है। आईएमएफ की इस कार्यक्रम के तहत कुल मिलाकर पाकिस्तान को 3.3 अरब डॉलर दिए जाने हैं। अभी तक पाकिस्तान के ऊपर आईएमएफ का 7.35 अरब डॉलर से अधिक का कर्ज है।

    पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालात इस कदर पतली है कि अभी उसके ऊपर जीडीपी का 70 फीसदी से अधिक सार्वजनिक कर्ज है। यूएई और चीन से मिले कई कर्जों को पाकिस्तान चुकाने की स्थिति में नहीं होने की वजह से उन्हें रोल ओवर करने की मांग कर रहा है। 1958 से लेकर अब तक आईएमएफ करीब 12 बार पाकिस्तान की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को संभालने की मदद कर चुका है। 2023 में जब पाकिस्तान पूरी तरह से डिफॉल्ट होने की स्थिति में आ गया था, तब भी आईएमएफ ने ही उसे अरबों डॉलर की मदद दी थी। इसके बाद पिछले साल भी कुछ शर्तों पर पाकिस्तान को 7 अरब डॉलर मिले थे।

    पाकिस्तान अपनी वैश्विक राजनीति को चमकाने के लिए भले ही बड़े-बड़े दांव खेलने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इतना साफ है कि उसकी अर्थव्यवस्था इसके लिए तैयार नहीं है। हालांकि, भारत के साथ ईयू और रूस के रिश्तों को देखते हुए और इन सभी देशों की बोर्ड ऑफ पीस से दूरी अमेरिका को पाकिस्तान के करीब रखने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर भी लगातार अपने चाटुकारिता से ट्रंप को खुश करने में लगे रहते हैं। अब पाकिस्तान इसके पैसे चुकाएगा या ट्रंप से उधार की बात करेगा यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि अगर वह पाकिस्तानी जनता के पैसे को इसमें खर्च करता है, तो इस्लामाबाद में इससे विरोध की लहर तो जरूर उठेगी।

  • Turkiye: इकलौता मुस्लिम देश जहां घटती जनसंख्या का संकट.. रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंची जन्म दर

    Turkiye: इकलौता मुस्लिम देश जहां घटती जनसंख्या का संकट.. रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंची जन्म दर


    अंकारा।
    पड़ोसी पाकिस्तान (Neighboring Pakistan) का मददगार देश तुर्किये (Turkey) तेजी से एक गंभीर जनसांख्यिकीय संकट (Demographic crisis) की ओर बढ़ रहा है। यह संभवत: दुनिया का इकलौता ऐसा मुस्लिम मुल्क (Muslim country) है, जहां आबादी तेजी से गिर रही है और यही बात वहां के हुक्मरानों को परेशान कर रही है। तुर्की सांख्यिकीय संस्थान के अनुसार, 2024 में तुर्की की कुल प्रजनन दर गिरकर 1.48 प्रति महिला रह गई है। यह जनसंख्या प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से काफी नीचे है। संस्थान के मुताबिक, 25 साल पहले यानी 2001 में यह दर 2.38 थी, जो पिछले 11 वर्षों से लगातार गिर रही है और अब गिरकर 1.48 पर पहुंच गई है।

    देश में जन्म दर में आई ऐतिहासिक गिरावट ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इसे देश के अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा और तबाही करार दिया है। उपराष्ट्रपति सेवडेट यिलमाज़ ने चेतावनी दी है कि तुर्किये का तथाकथित “जनसांख्यिकीय अवसर काल” (Demographic Dividend) 2035 से पहले ही खत्म हो सकता है। बुधवार को जनसंख्या नीति बोर्ड की बैठक से पहले यिलमाज़ ने कहा कि देश अब एक “डेमोग्राफिक टर्निंग पॉइंट” पर खड़ा है और सरकार इस मुद्दे को अस्तित्व से जुड़ा सवाल मानती है। यह वही शब्दावली है जिसका इस्तेमाल राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन लंबे समय से करते आ रहे हैं।


    जन्म दर रिकॉर्ड निचले स्तर पर

    तुर्किये की कुल प्रजनन दर (Fertility Rate) 2017 में 2.08 था जो 2024 में गिरकर 1.48 पर पहुंच गया है। यह दर न सिर्फ आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी 2.1 से काफी कम है, बल्कि वैश्विक औसत 2.25 से भी नीचे है। यिलमाज़ के मुताबिक, “पिछले 10 वर्षों में जन्म दर में सबसे तेज गिरावट वाले देशों में तुर्किये दुनिया में पांचवें स्थान पर है।” जनसांख्यिकीय अवसर काल वह समय होता है जब कामकाजी आबादी, आश्रित आबादी (बच्चे और बुज़ुर्ग) से कहीं अधिक होती है। इससे आर्थिक विकास को रफ्तार मिलती है। लेकिन यिलमाज़ ने चेताया कि, “अगर मौजूदा रुझान जारी रहे, तो यह अवसर 2035 से काफी पहले खत्म हो सकता है।”


    बुज़ुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही

    हालांकि तुर्किये की आबादी अब 8.6 करोड़ से ज्यादा है और यह यूरोप में सबसे अधिक है, लेकिन देश तेजी से बूढ़ा हो रहा है। 2024 में 65 वर्ष से ऊपर की आबादी 10.6% थी। हालांकि कुछ प्रांतों में यह आंकड़ा 20% से ज्यादा है। संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुसार, तुर्किये अब “अत्यधिक वृद्ध आबादी” वाले देशों की श्रेणी में आ चुका है।

    अनुमान है कि 2050 तक हर चौथा व्यक्ति 65+ होगा और 2075 तक हर तीसरा शख्स 65+ होगा। अनुमान के मुताबिक, 2100 तक हर 10 में से 4 लोग बुज़ुर्ग होंगे। इसका सीधा असर पेंशन, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं के पलायन के कारण बुज़ुर्गों का अनुपात राष्ट्रीय औसत से भी अधिक हो चुका है। सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए तीन बच्चों की पॉलिसी लागू की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि तीन या उससे अधिक बच्चों वाली जन्म दर वाले प्रांतों की संख्या 2017 में 10 थी जो 2024 में सिर्फ़ 1 रह गई है।


    सरकार की पहल

    इस बीच, राष्ट्रपति एर्दोगन ने पिछले साल 2025 को “परिवार वर्ष” घोषित किया था। इसके अलावा 2026–2035 को “परिवार और जनसंख्या दशक” घोषित किया गया है। आबादी बढ़ाने के लिए सरकार ने इसके अलावा कई प्रोत्साहन योजनाओं की भी घोषणा की है। इसके तहत पहले बच्चे के जन्म पर 5,000 लीरा का एकमुश्त भुगतान और दूसरे बच्चे के लिए मासिक भत्ता भुगतान की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा नवविवाहित जोड़ों को 150,000 लीरा तक का ब्याज मुक्त ऋण दिया जा रहा है, जिसमें पहले दो साल कोई भुगतान नहीं करना होगा। राष्ट्रपति एर्दोगन लंबे समय से तुर्की के परिवारों से कम से कम 3 बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं ताकि देश की जनसांख्यिकीय शक्ति बनी रहे। इसके अलावा सरकार ने युवाओं के लिए सामाजिक आवास, मातृत्व और बाल भत्ते में बढ़ोतरी की भी व्यवस्था की है।


    क्यों घट रही है जन्म दर?

    विशेषज्ञों और रिपोर्टों के अनुसार, जन्म दर घटने के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। इनमें सबसे अहम आर्थिक कारण हैं। तुर्किये में उच्च मुद्रास्फीति (Inflation), आवास की बढ़ती लागत और नौकरी की असुरक्षा के कारण युवा परिवार शुरू करने से डर रहे हैं। इसके अलावा महिलाओं के बीच उच्च शिक्षा का स्तर बढ़ा है, जिससे वे शादी और बच्चों के बजाय करियर को प्राथमिकता दे रही हैं। शहरों में रहने वाले परिवारों की संख्या बढ़ रही है, जहां ग्रामीण इलाकों की तुलना में बच्चों की संख्या कम होती है। इसके अलावा आर्थिक दबाव और जीवन-यापन की बढ़ती लागत भी इसकी एक अहम वजह है। बता दें कि चीन-जापान भी इसी तरह की समस्या का सामना कर रहा है।

  • RCEP पर भारत का क्लियर कट मैसेज, चीन समर्थित व्यापार समझौते शामिल नहीं होगा

    RCEP पर भारत का क्लियर कट मैसेज, चीन समर्थित व्यापार समझौते शामिल नहीं होगा

    नई दिल्ली । भारत ने साफ किया है कि वह चीन समर्थित क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) में शामिल होने पर फिलहाल कोई विचार नहीं कर रहा है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस संबंध में अभी कोई प्रस्ताव मौजूद नहीं है और आरसीईपी भारत की सक्रिय व्यापार नीति का हिस्सा नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत इस समय आरसीईपी में शामिल होने को लेकर न तो औपचारिक और न ही अनौपचारिक स्तर पर कोई पहल कर रहा है। सूत्रों ने उन अटकलों को खारिज किया है, जिनमें कहा जा रहा था कि पश्चिमी देशों के साथ व्यापार समझौतों को गति देने और एशिया में चुनिंदा द्विपक्षीय करार मजबूत करने के चलते भारत इस मुद्दे पर दोबारा विचार कर सकता है।

    एक सरकारी सूत्र ने स्पष्ट कहा कि इस पर फिलहाल कोई विचार नहीं है। हमने इस विषय को एजेंडे में नहीं रखा है। वहीं, एक अन्य सूत्र ने राजनीतिक दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि आरसीईपी को देखने का एक नजरिया यह भी है कि यह मूल रूप से चीन के हितों को आगे बढ़ाने का माध्यम है। ये टिप्पणियां भारत की व्यापक व्यापार रणनीति के संदर्भ में सामने आई हैं, जिसमें बड़े बहुपक्षीय समझौतों के बजाय प्रमुख साझेदार देशों के साथ द्विपक्षीय समझौतों को प्राथमिकता दी जा रही है। सरकार का मानना है कि व्यापक क्षेत्रीय समझौते आयात से जुड़ी संवेदनशीलताओं को संभालने की भारत की क्षमता को कमजोर कर सकते हैं।

    सूत्रों के अनुसार, चीन को छोड़कर आरसीईपी के अधिकांश सदस्य देशों के साथ भारत के पहले से ही द्विपक्षीय व्यापार समझौते मौजूद हैं, या तो वे पूरे हो चुके हैं या बातचीत के चरण में हैं। इसका अर्थ यह है कि भारत किसी बड़े क्षेत्रीय गुट में शामिल हुए बिना भी अपने बाजार पहुंच के लक्ष्यों को हासिल कर सकता है। अधिकारियों ने संकेत दिया कि भारत अन्य क्षेत्रीय और द्विपक्षीय ढांचों पर भी विचार कर रहा है। उनका कहना है कि जब भारत पर्याप्त संख्या में द्विपक्षीय समझौते कर लेगा, तब बड़े ढांचों में शामिल होने का सवाल भविष्य में उठ सकता है, लेकिन फिलहाल आरसीईपी भारत की नीतिगत प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है।

    सरकार का यह रुख उन चिंताओं से भी जुड़ा है, जो उसने यूरोपीय संघ के साथ व्यापार वार्ताओं के दौरान ऑटोमोबाइल और कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर जताई थीं। भारत ने यूरोपीय संघ के साथ समझौते में समय के साथ लगभग 92 प्रतिशत टैरिफ लाइनों को खोलने पर सहमति जताई है, लेकिन संवेदनशील क्षेत्रों के लिए चरणबद्ध कटौती, कोटा और टैरिफ-रेट कोटा जैसे उपाय अपनाए गए हैं। सूत्रों का कहना है कि आरसीईपी से दूरी बनाए रखने का एक प्रमुख कारण यह आशंका है कि चीन के साथ व्यापक टैरिफ कटौती का ढांचा भारत की संवेदनशील क्षेत्रों में जोखिम प्रबंधन की क्षमता को सीमित कर सकता है।

    उन्होंने यह भी बताया कि कोविड महामारी के बाद आपूर्ति श्रृंखला में आए झटकों और व्यापार दुरुपयोग के अनुभवों के चलते वैश्विक व्यापार व्यवस्था एक समान, WTO-केंद्रित मॉडल से हटकर द्विपक्षीय समझौतों के जटिल नेटवर्क की ओर बढ़ रही है। ऐसे माहौल में भारत लचीलापन चाहता है, कुछ चुनिंदा साझेदारों के साथ गहरे संबंध, लेकिन किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचाव।

    सूत्रों ने भारत–यूरोपीय संघ समझौते को ‘जोखिम कम करने और विविधीकरण’ की वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा बताया और कहा कि किसी एक बाजार या आपूर्ति स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता खतरनाक हो सकती है। यही सोच अप्रत्यक्ष रूप से आरसीईपी के पक्ष में दिए जाने वाले तर्कों के विपरीत जाती है, जिसके चलते भारत ने 2019 में बाजार पहुंच, मूल नियमों और आयात में अचानक बढ़ोतरी की आशंकाओं का हवाला देते हुए इससे बाहर रहने का फैसला किया था।

    फिलहाल नई दिल्ली का संदेश साफ है कि गुटीय व्यवस्था के बजाय द्विपक्षीय समझौते, व्यापक उदारीकरण के बजाय संतुलित खुलापन और चीन से जुड़े जोखिम बढ़ाने वाली किसी भी व्यवस्था से दूरी। सरकार का ‘अभी कोई प्रस्ताव नहीं’ पर जोर घरेलू उद्योग के लिए भी एक स्पष्ट संकेत है, जो आरसीईपी को लेकर पहले से ही सतर्क रुख अपनाए हुए है।

  • कनाड़ा के साथ राजनयिक-व्यापारिक तनाव के बीच US की चेतावनी… जानें क्या बोले अमेरिकी राजदूत?

    कनाड़ा के साथ राजनयिक-व्यापारिक तनाव के बीच US की चेतावनी… जानें क्या बोले अमेरिकी राजदूत?


    ओटावा।
    अमेरिका और कनाडा (America and Canada) के बीच चल रहे राजनयिक और व्यापारिक तनाव (Diplomatic and trade tensions) ने अब रक्षा संबंधों को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। कनाडा (Canada) में अमेरिकी राजदूत पीट होकस्ट्रा (US Ambassador Pete Hoekstra) ने चेतावनी दी है कि अगर कनाडा 88 F-35 लड़ाकू विमान खरीदने के अपने वादे से पीछे हटता है, तो नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड (NORAD) की संरचना में बड़ा बदलाव करना पड़ सकता है।


    मुख्य विवाद क्या है?

    होकस्ट्रा का यह बयान तब आया है जब पिछले महीने कनाडा ने अमेरिका से 19 बिलियन डॉलर की F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स की डील की ‘समीक्षा’ करने का फैसला किया। कनाडा सरकार ने यह निर्णय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कनाडा पर टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने की धमकी के बाद लिया है। 2023 में, कनाडा ने लॉकहीड मार्टिन से 88 F-35 जेट खरीदने का सौदा किया था। इसमें से 16 विमानों का भुगतान किया जा चुका है और उनकी डिलीवरी 2026 में होनी है।


    NORAD पर क्या असर पड़ेगा?

    1957 में स्थापित NORAD अमेरिका और कनाडा का एक संयुक्त सैन्य संगठन है। इसका मुख्य काम उत्तरी अमेरिका की हवाई और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करना है, जिसमें मिसाइलों और दुश्मन के विमानों का पता लगाना शामिल है। यह समझौता दोनों देशों को यह अनुमति देता है कि खतरा दिखने पर किसी भी देश का निकटतम विमान कार्रवाई कर सकता है, चाहे वह किसी भी हवाई क्षेत्र में हो।

    अमेरिकी राजदूत ने CBC News को बताया- अगर कनाडा यह क्षमता (F-35) प्रदान नहीं करने जा रहा है, तो हमें उन कमियों को खुद भरना होगा। उनका कहना है कि अगर कनाडा इन आधुनिक विमानों की खरीद से पीछे हटता है, तो उत्तरी अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था को नए सिरे से डिजाइन करना पड़ेगा।


    कनाडा का ‘प्लान बी’ और अमेरिका की आपत्ति

    अपनी F-35 डील की समीक्षा के साथ-साथ, कनाडा अब स्वीडन की डिफेंस कंपनी Saab से बात कर रहा है। कनाडा कई विकल्पों पर विचार कर रहा है। जैसे-72 ग्रिपेन ई जेट्स और 6 ग्लोबलआई सर्विलांस एयरक्राफ्ट। अमेरिकी राजदूत होकस्ट्रा ने स्पष्ट किया कि यदि कनाडा सरकार ‘ग्रिपेन’ जेट्स का विकल्प चुनती है, तो भी NORAD व्यवस्था पर पुनर्विचार करना होगा। उन्होंने स्वीडिश विमानों को अमेरिकी F-35 की तुलना में कमजोर बताया।

    होकस्ट्रा ने कहा- अगर वे फैसला करते हैं कि वे एक ऐसे ‘कमतर उत्पाद’ के साथ जा रहे हैं जो F-35 की तरह ‘इंटरऑपरेबल’ (एक-दूसरे के सिस्टम के साथ काम करने योग्य) नहीं है, तो इससे हमारी रक्षा क्षमता बदल जाती है। और ऐसे में, हमें यह पता लगाना होगा कि हम उस कमी को कैसे पूरा करेंगे।

    इस बयान से स्पष्ट है कि अमेरिका चाहता है कि कनाडा अपनी रक्षा जरूरतों के लिए अमेरिकी तकनीक पर ही निर्भर रहे, ताकि दोनों देशों की सेनाएं आसानी से मिलकर काम कर सकें। वहीं, कनाडा व्यापारिक दबावों (टैरिफ) के जवाब में अपनी संप्रभुता और अन्य विकल्पों को तलाशने का संकेत दे रहा है।

  • उल्टे निकल रहे ट्रंप की विदेश नीति के नतीजे… EU-India ने कर ली डील, चीन से हाथ मिला रहे कनाडा-बिट्रेन

    उल्टे निकल रहे ट्रंप की विदेश नीति के नतीजे… EU-India ने कर ली डील, चीन से हाथ मिला रहे कनाडा-बिट्रेन


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) अपनी विदेश नीति से जो भी हासिल करने निकले हों, नतीजा उल्टा निकलता दिख रहा है। ईयू-भारत ने डील (EU-India deal) कर ली। हाल तक एक-दूसरे के लिए आक्रामक रहे कनाडा और चीन हाथ मिला रहे हैं और करीब आठ साल बाद कोई ब्रिटिश पीएम (British PM) चीन पहुंच रहे हैं। कभी अमेरिकी खेमे का अनिवार्य अंग रहे पश्चिमी देश अपने हितों की तलाश में एशिया का रुख कर रहे हैं। इस शृंखला में ताजा नाम है, ब्रिटिश प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर। चीन के साथ राजनीतिक और आर्थिक रिश्ते मजबूत करने का मकसद लिए स्टार्मर 28 जनवरी को बीजिंग पहुंचे हैं।


    ट्रंप चाहते कुछ हैं, हो कुछ और रहा है?

    इसके पीछे सबसे बड़ी वजह माने जा रहे हैं ट्रंप। अमेरिकी राष्ट्रपति का मनमाना और एकतरफा रवैया इतना नियमित हो गया है कि पश्चिमी सहयोगियों के लिए हैरान होने की भी सहूलियत नहीं बची है। विश्लेषकों के मुताबिक, पश्चिमी गठबंधन की हालत डांवाडोल है और अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी वक्त गंवाए बिना अपने लिए बैकअप खोज रहे हैं। मसलन, करीब दो दशक से भारत और ईयू में व्यापारिक समझौते पर सहमति नहीं बन पाई थी। अब ट्रंप फैक्टर ने बातचीत को इतनी रफ्तार दे दी कि डील हो गई।

    ब्रिटेन और अमेरिका सबसे करीबी दोस्त रहे हैं। ब्रिटेन अब भी अमेरिका को अपना सबसे प्राथमिक सहयोगी मानता है। पहले यह भावना साझा थी, लेकिन ट्रंप के आने के बाद खासतौर पर ट्रंप 2.0 में ब्रिटेन अब इस दोस्ती पर आश्वस्त रहने की हालत में नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में किएर स्टार्मर बतौर प्रधानमंत्री पहली बार चीन पहुंचे हैं। बल्कि, आठ साल बाद यह पहली बार है जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चीन गए हैं। पिछली बार मई 2018 में थिरेसा मे चीन गई थीं।

    अपनी यात्रा का आशय स्पष्ट करते हुए स्टार्मर ने कहा कि चीन जिस तरह के आर्थिक मौके दे रहा है, उसकी अनदेखी कर पाना ब्रिटेन के लिए मुमकिन नहीं होगा। बीजिंग जाते हुए अपने विमान में पत्रकारों से बात करते हुए स्टार्मर ने शुतुरमुर्ग के रेत में सिर घुसाने वाली कहावत दोहराते हुए कहा कि चीन से “बातचीत करना हमारे हित में है। यह ट्रिप हमारे लिए वाकई अहम होने वाली है और हम असल में आगे बढ़ेंगे।” चीन में स्टार्मर की मुलाकात राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कियांग से होनी है। इसके बाद 30 जनवरी को वह स्थानीय कारोबारियों से बातचीत के लिए शंघाई जाएंगे। स्टार्मर अपने साथ 50 से ज्यादा कारोबारियों का प्रतिनिधिमंडल ले गए हैं।


    स्वाभाविक सहयोगी नहीं रहे हैं चीन और ब्रिटेन?

    औपनिवेशिक अतीत और सम-सामयिक रिश्तों का भार चीन और ब्रिटेन के रिश्तों का स्वभाव तय करता आया है। इसमें हांगकांग भी एक कारक है, जो कभी ब्रिटेन के नियंत्रण में था। यहां राजनीतिक आजादी का दमन और मानवाधिकार-लोकतांत्रिक अधिकारों की स्थिति, दोनों देशों के बीच रुखेपन की वजह रही। उसपर यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस के लिए चीन के समर्थन ने दोनों के हितों को विरोधाभासी बनाया।

    5जी नेटवर्क देने वाली चीनी कंपनियों पर गहरा अविश्वास, ब्रिटेन की सुरक्षा चिंताओं का एक हिस्सा है। वह चीन को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम मानता है। ब्रिटिश खुफिया सेवाओं का आरोप है कि चीन उनके अधिकारियों और नेताओं की जासूसी करवाता है, ब्रिटेन के सार्वजनिक जीवन में दखल देने और आलोचकों-विरोधियों को डराने की कोशिश करता है। इस तरह के मुद्दे और आरोप-प्रत्योरोप सालों से दोनों देशों के संबंध को दिशा देते आए हैं।

    ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एमआई5 के प्रमुख केन मैककैलम ने चेताया था कि ब्रिटेन की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए “चीन के स्टेट ऐक्टर्स” जोखिम हैं। ऐसे में स्टार्मर की यात्रा चीन और ब्रिटेन के आपसी रिश्तों में गर्माहट लाने का एक अहम बिंदु बन सकती है। हालांकि, स्टार्मर कह चुके हैं कि चीन की तरफ से मिलने वाले आर्थिक मौकों को लेने के लिए वह “राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता” नहीं करेंगे।


    स्टार्मर की चीन यात्रा पर हावी है ट्रंप फैक्टर?

    ट्रंप का रुख और यूरोपीय देशों के प्रति बहुत हद तक उनका अपमानजनक रवैया, स्टार्मर की चीन यात्रा का प्रमुख बैकड्रॉप मानी जा रही है। स्टार्मर की छवि ऐसे नेता की रही है जो गहरे तनाव के बीच भी अमेरिका के साथ सहयोग जारी रखने को अपना कंपास बनाकर चलते हैं। कई झटकों और सार्वजनिक फब्तियों के बावजूद वह ट्रंप पर बहुत नापतौल कर बोलते आए हैं। मगर बीते दिनों तीन ऐसे प्रकरण हुए, जहां स्टार्मर का रवैया और बयान अपेक्षाकृत सख्त रहा।

    पहला प्रकरण ग्रीनलैंड से जुड़ा है, जब ट्रंप ने वहां सैन्य अभ्यास के लिए अपने सैनिक भेजने वाले यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की चेतावनी दी। फिर, ट्रंप ने चागोस द्वीपसमूह मॉरीशस की संप्रभुता मॉरीशस को लौटाने के लिए ब्रिटेन की सार्वजनिक तौर पर आलोचना की। इसके अलावा, अफगानिस्तान में नाटो सैनिकों के योगदान पर ट्रंप की टिप्पणी ने भी काफी असहज स्थिति पैदा की।

    कई लीडर मुखरता से कह रहे हैं कि अमेरिका की बदली प्राथमिकताओं के मद्देनजर अब यूरोपीय ब्लॉक के लिए दूसरी जगहों पर अपने हित तलाशना अनिवार्य सा हो गया है। हाल ही में दावोस में वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम में भी यह बात कई बार सुनाई दी। यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेय लाएन ने पत्रकारों से कहा, “हम जानते हैं हमें एक आजाद यूरोप की तरह काम करना होगा।”

    पॉलिटिको के लिए एक लेख में17 विशेषज्ञों ने बताया कि किस तरह दुनिया अमेरिका से दूर होते हुए नए अवसर खोज रही है। इसी आर्टिकल में ‘कार्निगी एनडाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस’ के सीनियर फेलो स्टीवर्ट पैट्रिक लिखते हैं, “हम कभी जिस वैश्विक व्यवस्था को जानते थे, वो मर चुकी है। ट्रंप प्रशासन इसका हत्यारा भी है और वह भी, जिसपर इसके अंतिम संस्कार का दायित्व है। पुराने सहयोगी भी अब इस सच्चाई के साथ तारतम्य बिठाने लगे कि संयुक्त राज्य अमेरिका एक शिकारी सुप्रीम लीडर बन गया है।”

    पैट्रिक ने लिखा कि किस तरह ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों ने अपने कूटनीतिक पोर्टफोलियो में विवधता लाना शुरू कर दिया था। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का दूसरा साल शुरू होते-होते ये कोशिशें सबसे ऊपर के गीयर में पहुंच गई हैं। इस एहसास के साथ ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देश आर्थिक और सुरक्षा समीकरणों में विविधता लाने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल वे ट्रंप को सीधे से नाराज नहीं करने का प्रयास भी कर रहे हैं। हालांकि, ट्रंप की राजनीतिक शैली के हिसाब से यह आसान नहीं होगा।

    जैसा कि पूर्व विदेश सचिव जेरमी हंट ने बीबीसी से बातचीत में ध्यान दिलाया कि प्रधानमंत्री के आगे वाकई एक कूटनीतिक मुश्किल है, “चीन के साथ ज्यादा व्यापार से बेशक कुछ फायदे होंगे, लेकिन इसमें बहुत बड़ा जोखिम भी है।” स्टार्मर भी लगातार कहते रहे हैं कि अमेरिका और ब्रिटेन के बीच सहयोग का इतिहास कितना समृद्ध और पुराना है। ग्रीनलैंड के मुद्दे पर जब ट्रंप ने टैरिफ का एलान किया, तो अपना विरोध जताते हुए भी स्टार्मर ने ब्रिटेन और अमेरिका के गहरे रिश्तों की याद दिलाई। चीन जाते हुए भी उन्होंने यह दोहराया, “संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ हमारा जो रिश्ता है, वह हमारे सबसे करीबी संबंधों में से एक है। रक्षा में, सुरक्षा में, खुफिया सेवाओं और व्यापार समेत बहुत से क्षेत्रों में है।”


    चीन को लेकर स्टार्मर पर घरेलू दबाव भी है

    चीन जाने की अहमियत को रेखांकित करते हुए पीएम ने कहा कि ब्रिटेन में आर्थिक विकास को गति देने और जीवनस्तर सुधारने की उनकी योजनाओं को पूरा करने में यह मददगार होगा। हालांकि, स्टार्मर की इस रणनीति की घर और बाहर, खासकर अमेरिका में आलोचना भी हो रही है। चीन और ब्रिटेन की राजनीतिक व्यवस्था का आधारभूत अंतर भी संदेह की एक बड़ी वजह है। बीजिंग के प्रति कायम अविश्वास के मद्देनजर आशंका जताई जा रही है कि स्टार्मर चीन की ओर से मिल रहे सुरक्षा जोखिमों को कम करके आंक रहे हैं।

    विपक्षी कंजरवेटिव पार्टी की नेता केमी बाडेनॉख ने कहा, “बात जब चीन की हो, तो किएर स्टार्मर बहुत ज्यादा कमजोर हैं।” हां, हमें चीन के साथ रिश्ता चाहिए। लेकिन, चीन लोकतंत्र में यकीन नहीं करना। उसने हमारे सांसदों पर प्रतिबंध लगाया, वह वैश्विक व्यापारिक व्यवस्था में व्यवधान डालता है और ताइवान पर उसकी योजनाएं हैं।

    स्टार्मर पर जिनपिंग के साथ वार्ता में कुछ खास मुद्दों को उठाने का दबाव है। इनमें तीन मुद्दे अहम हैं। एक, लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ता जिमी लाई की कैद। जिमी ब्रिटिश नागरिक हैं और जिस तरह उनपर मुकदमा चलाया गया और सजा सुनाई गई, उसपर गंभीर सवाल हैं। ब्रिटेन में एक वर्ग स्टार्मर से अपेक्षा करता है कि वह मजबूती से जिमी लाई को रिहा करने की मांग करें। इसके अलावा, वह चीनी नेतृत्व से यूक्रेन युद्ध पर दो-टूक बात करें और बेलाग कहें कि वे रूस पर लड़ाई खत्म करने का दबाव बनाएं। तीसरा विषय, उइगर अल्पसंख्यकों का भी मुद्दा उठाएं।

    स्टार्मर ये मसले उठाएंगे या नहीं, इसका उन्होंने कोई संकेत नहीं दिया है। बल्कि चीन रवाना होने से पहले जब उनसे इस बारे में सवाल पूछा गया तो उन्होंने जवाब नहीं दिया। चीनी लीडरों के साथ वह किन मुद्दों पर बात करेंगे, इस विषय में भी बात करने से वह हिचकते दिखे। उन्होंने कहा, “अतीत में, मैंने जितनी भी यात्राएं की हैं, उनमें मैंने हमेशा उन मुद्दों को उठाया है जिन्हें उठाए जाने की जरूरत है। लेकिन मैं समय से पहले ही इन ब्योरों पर बात नहीं करना चाहता।”

  • अमेरिका–दक्षिण कोरिया टैरिफ विवाद पर नरम पड़े ट्रंप, बोले-कुछ समाधान जरूर निकालेंगे’

    अमेरिका–दक्षिण कोरिया टैरिफ विवाद पर नरम पड़े ट्रंप, बोले-कुछ समाधान जरूर निकालेंगे’



    नई दिल्ली | अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ चल रहे टैरिफ विवाद को लेकर बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने कहा है कि उनका प्रशासन सियोल के साथ इस मसले पर ‘कुछ समाधान’ जरूर निकालेगा। उनके इस बयान से दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापार तनाव को लेकर बातचीत की उम्मीदें एक बार फिर मजबूत हुई हैं।

    टैरिफ बढ़ाने की धमकी के बाद बदला सुर

    गौरतलब है कि इसी हफ्ते डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के अहम एशियाई सहयोगी दक्षिण कोरिया पर ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ और अन्य शुल्क बढ़ाने की धमकी दी थी। उन्होंने संकेत दिया था कि कार, लकड़ी और दवाइयों पर लगने वाला टैरिफ 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत किया जा सकता है।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या वे दक्षिण कोरिया पर टैरिफ बढ़ाएंगे, तो ट्रंप ने जवाब दिया,

    “हम दक्षिण कोरिया के साथ कुछ समाधान निकाल लेंगे।”

    अमेरिका का आरोप—समझौते पर अमल में देरी

    ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि दक्षिण कोरिया द्विपक्षीय व्यापार समझौते से जुड़े कानूनों को लागू करने में देरी कर रहा है।

    व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने योनहाप न्यूज एजेंसी को बताया कि

    दक्षिण कोरिया ने अब तक अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में “कोई खास प्रगति नहीं” की है

    जबकि अमेरिका ने समझौते के तहत अपने टैरिफ कम किए थे

    350 अरब डॉलर के निवेश का वादा बना अहम मुद्दा

    इस व्यापार समझौते के तहत—

    दक्षिण कोरिया ने अमेरिका में 350 अरब डॉलर निवेश करने का वादा किया था

    बदले में अमेरिका ने ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ को 25 प्रतिशत से घटाकर 15 प्रतिशत कर दिया था

    हालांकि अब वॉशिंगटन को आशंका है कि सियोल इस बड़े निवेश वादे को पूरा करने में कठिनाई झेल सकता है।

    दक्षिण कोरियाई मंत्री के अमेरिका दौरे की तैयारी

    इन तनावों के बीच दक्षिण कोरिया के उद्योग मंत्री किम जंग-क्वान के अमेरिका दौरे की संभावना जताई जा रही है।

    वे अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लटनिक से मुलाकात कर सकते हैं

    इस बातचीत में टैरिफ और निवेश से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहेंगे

    अन्य कारणों से भी बढ़ी अमेरिका की चिंता

    ट्रंप प्रशासन की चिंता सिर्फ टैरिफ तक सीमित नहीं है। अमेरिका को दक्षिण कोरिया में—

    अमेरिकी कंपनी में सूचीबद्ध कूपांग इंक के खिलाफ ग्राहक डेटा लीक जांच

    ऑनलाइन प्लेटफॉर्म कंपनियों पर सख्त नियम

    और डॉलर के मुकाबले दक्षिण कोरियाई मुद्रा वॉन की कमजोरी

    जैसे मुद्दों को लेकर भी आपत्ति है।

    टैरिफ बढ़ाने की धमकी के बाद ट्रंप का नरम रुख अमेरिका-दक्षिण कोरिया रिश्तों में राहत का संकेत देता है।
    आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच बातचीत से व्यापार तनाव कम होने की उम्मीद बढ़ गई है।

  • मोहम्मद यूसुफ के 'व्यूअरशिप' दावों पर छिड़ा विवाद: बांग्लादेश के समर्थन में ट्वीट कर बुरी तरह फंसे पाक दिग्गज

    मोहम्मद यूसुफ के 'व्यूअरशिप' दावों पर छिड़ा विवाद: बांग्लादेश के समर्थन में ट्वीट कर बुरी तरह फंसे पाक दिग्गज

    नई दिल्‍ली । टी20 वर्ल्ड कप 2026 की तैयारियों के बीच क्रिकेट जगत में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। पाकिस्तान के पूर्व दिग्गज बल्लेबाज मोहम्मद यूसुफ को बांग्लादेश के पक्ष में खड़ा होना उस वक्त भारी पड़ गया, जब उन्होंने सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे आंकड़े पेश किए जिन्हें फैंस ने भ्रामक और फर्जी करार दे दिया। इस ट्वीट के बाद यूसुफ को न केवल आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि वे सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल भी हो रहे हैं।

    क्या था यूसुफ का वो विवादित ट्वीट
    मोहम्मद यूसुफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बांग्लादेश के वर्ल्ड कप से बाहर होने पर दुख जताते हुए एक पोस्ट साझा की। उन्होंने बांग्लादेश की क्रिकेट व्यूअरशिप दर्शक संख्या को लेकर एक बड़ा दावा किया दावा यूसुफ के मुताबिक, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, अफगानिस्तान और जिम्बाब्वे समेत 10 देशों की कुल व्यूअरशिप 178 मिलियन अकेले बांग्लादेश 176 मिलियन के बराबर है। तर्क उन्होंने आईसीसी पर सवाल उठाते हुए लिखा कि इतने बड़े बाजार वाले देश की सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करना गलत है और क्रिकेट सिद्धांतों के आधार पर चलना चाहिए, न कि किसी के दबाव में।

    क्यों हो रहे हैं ट्रोल

    यूसुफ के इन आंकड़ों को क्रिकेट फैंस और डेटा विशेषज्ञों ने पूरी तरह खारिज कर दिया। यूजर्स का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े क्रिकेटिंग नेशन और नेपाल-नीदरलैंड्स जैसे उभरते बाजारों की व्यूअरशिप की तुलना इस तरह करना तथ्यों के साथ खिलवाड़ है। बिना किसी आधिकारिक स्रोत के आईसीसी पर निशाना साधने के कारण उन्हें ‘प्रोपेगेंडा फैलाने’ वाला बताकर ट्रोल किया जा रहा है।

    बांग्लादेश क्यों हुआ वर्ल्ड कप 2026 से बाहर

    आईसीसी ने एक कड़ा फैसला लेते हुए बांग्लादेश को टूर्नामेंट से बाहर कर स्कॉटलैंड को जगह दी है। इस विवाद की जड़ें सुरक्षा चिंताओं से जुड़ी हैं भारत आने से इनकार: बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए भारत में खेलने से मना कर दिया था। मुस्तफिजुर रहमान मामला: आईपीएल के दौरान मुस्तफिजुर रहमान से जुड़ी एक घटना को आधार बनाकर बांग्लादेश ने पूरी टीम की सुरक्षा पर सवाल उठाए।ICC का कड़ा रुख: आईसीसी ने स्पष्ट किया कि आईपीएल एक घरेलू लीग है और उसकी किसी घटना का असर वर्ल्ड कप की सुरक्षा व्यवस्था पर नहीं पड़ना चाहिए। नियमों के उल्लंघन के कारण बांग्लादेश पर यह गाज गिरी।

    पाकिस्तान का ‘बहिष्कार’ वाला दांव

    इस पूरे मामले में पाकिस्तान अब बांग्लादेश के बचाव में आ गया है। पीसीबी चेयरमैन मोहसिन नकवी ने इसे गलत फैसला बताया है। चर्चा तो यहां तक है कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ मैचों के बहिष्कार या टूर्नामेंट में अपनी भागीदारी को लेकर सरकार से सलाह ले सकता है।

  • बांग्लादेश और चीन के बीच बड़ा रक्षा समझौता: अब ढाका में बनेगी ड्रोन फैक्ट्री चीन देगा अपनी तकनीक

    बांग्लादेश और चीन के बीच बड़ा रक्षा समझौता: अब ढाका में बनेगी ड्रोन फैक्ट्री चीन देगा अपनी तकनीक


    नई दिल्ली । दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने मंगलवार को चीन के साथ एक रणनीतिक रक्षा समझौते पर मुहर लगा दी है। इस ऐतिहासिक डील के तहत अब बांग्लादेश की धरती पर मानवरहित हवाई वाहनों यानी ड्रोन्स का निर्माण किया जाएगा। यह समझौता बांग्लादेश वायु सेना और चीन की दिग्गज सरकारी डिफेंस कंपनी चाइना इलेक्ट्रॉनिक्स टेक्नोलॉजी ग्रुप कॉरपोरेशन इंटरनेशनल के बीच हुआ है।

    यह समझौता न केवल बांग्लादेश की सैन्य शक्ति को बढ़ाएगा बल्कि उसे रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर भी ले जाएगा। समझौते के मुख्य स्तंभ: तकनीक का हस्तांतरण इस डील की सबसे बड़ी खासियत यह है कि चीन केवल ड्रोन बेचेगा नहीं बल्कि बांग्लादेश को इन्हें बनाने की तकनीकभी देगा। अत्याधुनिक सुविधा: ढाका में एक हाई-टेक फैक्ट्री स्थापित की जाएगी जहाँ ड्रोन्स का उत्पादन और असेंबलिंग होगी।

    आत्मनिर्भरता: तकनीक मिलने के बाद भविष्य में बांग्लादेश वायु सेना स्वतंत्र रूप से अपने ड्रोन्स विकसित कर सकेगी जिससे उसकी विदेशी निर्भरता कम होगी। किस तरह के आसमानी शिकारी तैयार करेगा बांग्लादे शुरुआत में फैक्ट्री में दो मुख्य श्रेणियों के ड्रोन्स पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा ये ड्रोन मध्यम ऊंचाई पर लंबी दूरी तक उड़ान भरने में सक्षम होते हैं। इनका उपयोग मुख्य रूप से निगरानी और टोही अभियानों के लिए किया जाता है।

    ये ड्रोन किसी हेलीकॉप्टर की तरह सीधे उड़ान भर सकते हैं और उतर सकते हैं। इन्हें रनवे की जरूरत नहीं होती जो इन्हें दुर्गम क्षेत्रों और आपदा प्रबंधन के लिए बेहद उपयोगी बनाता है।बहुउद्देशीय उपयो इन ड्रोन्स का इस्तेमाल केवल युद्ध के लिए ही नहीं बल्कि मानवीय सहायता आपदा प्रबंधन खोज एवं बचाव अभियान और सीमा सुरक्षा जैसे कई महत्वपूर्ण कार्यों के लिए किया जाएगा। चीनी कंपनी और बढ़ता रक्षा सहयोग
    दुनिया की उन चुनिंदा कंपनियों में शामिल है जो न केवल ड्रोन बल्कि अत्याधुनिक राडार दूरसंचार उपकरण और सैन्य सॉफ्टवेयर भी बनाती है।

    रक्षा आपूर्तिकर्ता: चीन दशकों से बांग्लादेश का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता रहा है। अगला बड़ा कदम: ड्रोन्स के अलावा बांग्लादेश अपने पुराने हो चुके F-7 और MiG-29 विमानों को बदलने के लिए चीन से 20 चेंगदू J-10C विगोरस ड्रैगन लड़ाकू विमान खरीदने की तैयारी में है। यह डील लगभग 2.2 अरब डॉलर 18 हजार करोड़ रुपये की हो सकती है। हस्ताक्षर समारोह: ढाका छावनी स्थित BAF मुख्यालय में हुए इस समारोह में बांग्लादेश के वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल हसन महमूद खान और चीन के राजदूत याओ वेन सहित कई शीर्ष सैन्य अधिकारी मौजूद थे।