Category: International

  • ट्रंप की आर्थिक नीतियों पर भारी पड़ा अविश्वास: मंदी की दहलीज पर अमेरिका, कोविड काल से भी नीचे गिरा उपभोक्ता भरोसा

    ट्रंप की आर्थिक नीतियों पर भारी पड़ा अविश्वास: मंदी की दहलीज पर अमेरिका, कोविड काल से भी नीचे गिरा उपभोक्ता भरोसा


    नई दिल्ली। अमेरिका में सत्ता परिवर्तन और डोनाल्ड ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट नीति की वापसी के बावजूद दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था गहरे संकट के संकेतों से घिरी नजर आ रही है। सख्त इमिग्रेशन नियमों और भारी-भरकम टैरिफ के जरिए देश को ट्रिलियन डॉलर का फायदा पहुंचाने के ट्रंप सरकार के दावों पर अब खुद अमेरिकी जनता ने ही सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। ताजा आर्थिक आंकड़ों ने व्हाइट हाउस की चिंताएं बढ़ा दी हैं क्योंकि अमेरिका का कंज्यूमर कॉन्फिडेंस इंडेक्स उपभोक्ता विश्वास सूचकांक फिसलकर उस स्तर पर जा पहुंचा है जो 2020-21 की विनाशकारी कोविड महामारी के दौर में भी नहीं देखा गया था।

    आंकड़ों में मंदी की आहट यूएस कॉन्फ्रेंस बोर्ड द्वारा जनवरी 2026 के लिए जारी किए गए आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। उपभोक्ता विश्वास का ग्राफ एक ही महीने में 94.2 फीसदी से गिरकर 84.5 फीसदी पर आ गया है। साल 2014 के बाद यह सबसे निचला स्तर है जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि जनता का अपनी अर्थव्यवस्था पर से भरोसा डगमगा रहा है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी नागरिकों में भविष्य की आर्थिक स्थिरता को लेकर चिंताएं लगातार गहरा रही हैं। विशेष रूप से एक्सपेक्टेशन इंडेक्स जो भविष्य की आय और व्यावसायिक स्थितियों का आकलन करता है वह 65.1 पॉइंट पर आ गया है। अर्थशास्त्र के जानकारों का मानना है कि यदि यह सूचकांक 80 से नीचे रहता है तो यह आने वाली भीषण मंदी का स्पष्ट पूर्व-संकेत होता है। ऐसे में ट्रंप के मेक अमेरिका ग्रेट अगेन जैसे नारे अब धरातल पर हवा-हवाई साबित होते दिख रहे हैं।

    महंगाई और बेरोजगारी का दोहरा वार अमेरिकी जनता के इस असमंजस के पीछे सबसे बड़ा कारण बेतहाशा बढ़ती महंगाई है। किराने का सामान और रोजमर्रा की जरूरतें इतनी महंगी हो गई हैं कि मध्यम वर्ग की कमर टूट चुकी है। कॉन्फ्रेंस बोर्ड की चीफ इकॉनमिस्ट दाना पीटरसन का कहना है कि सूचकांक के पांचों प्रमुख घटक अपने निचले स्तर पर हैं। वहीं दूसरी ओर लेबर मार्केट की स्थिति भी उत्साहजनक नहीं है। ट्रंप सरकार ने स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देने के नाम पर वीजा और इमिग्रेशन नियमों को कड़ा तो किया लेकिन इसका सकारात्मक असर नौकरियों पर नहीं दिखा। दिसंबर 2025 में केवल 50 हजार नई नौकरियां सृजित हुईं जबकि तुलनात्मक रूप से साल 2024 में जहां 20 लाख नौकरियां मिली थीं वहीं 2025 में यह आंकड़ा सिमटकर महज 6 लाख रह गया।

    टैरिफ और ट्रेड पॉलिटिक्स का दुष्प्रभाव डोनाल्ड ट्रंप की ट्रेड वॉर और टैरिफ नीतियों ने सप्लाई चेन को प्रभावित किया है जिससे लेबर मार्केट में लो हायर-लो फायर (कम भर्ती कम छंटनी) की स्थिति बन गई है। कंपनियां अनिश्चितता के माहौल में नई नियुक्तियों से बच रही हैं। वर्तमान में अमेरिका की बेरोजगारी दर 4.4 प्रतिशत है लेकिन रोजगार सृजन की सुस्त रफ्तार ने भविष्य को अंधकारमय बना दिया है। निष्कर्षतः ट्रंप की आर्थिक नीतियां फिलहाल उनके ही प्रशासन के लिए गले की हड्डी बनती दिख रही हैं जहां दावे तो ट्रिलियन डॉलर के मुनाफे के हैं लेकिन हकीकत में जनता मंदी के साये में जीने को मजबूर है।

  • सरहद पार से आई सुखद खबर: लाहौर किले में 'लौह मंदिर' का जीर्णोद्धार संपन्न, अब लव की नगरी में गूंजेगी आस्था

    सरहद पार से आई सुखद खबर: लाहौर किले में 'लौह मंदिर' का जीर्णोद्धार संपन्न, अब लव की नगरी में गूंजेगी आस्था


    नई दिल्ली । भगवान श्री राम के भक्तों और भारतीय संस्कृति में गहरी आस्था रखने वालों के लिए पड़ोसी देश पाकिस्तान से एक बेहद उत्साहजनक और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत स्थित लाहौर किले के भीतर स्थित प्राचीन लौह मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। सदियों पुराने इस मंदिर की चमक अब फिर से लौट आई है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासन ने इसे अब आम जनता और श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिया है।

    यह मंदिर केवल एक ढांचा नहीं है बल्कि यह सीधे तौर पर रामायण काल और भगवान श्री राम के कुल से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यताओं और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार यह मंदिर भगवान राम के पुत्र लव को समर्पित है। जनश्रुतियों में यह गहरा विश्वास है कि वर्तमान लाहौर शहर की स्थापना माता सीता के ज्येष्ठ पुत्र लव ने ही की थी और उन्हीं के नाम पर इस शहर का नाम कालांतर में लाहौर पड़ा। यही कारण है कि इस मंदिर का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व सरहद के दोनों ओर रहने वाले लोगों के लिए बेहद खास है।

    सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की कवायद वाल्ड सिटी लाहौर अथॉरिटी ने मंगलवार को आधिकारिक रूप से इस पुनरुद्धार की घोषणा की। अथॉरिटी की प्रवक्ता तानिया कुरैशी ने मीडिया को बताया कि लौह मंदिर के साथ-साथ सिख साम्राज्य की स्मृतियों को संजोए हम्माम और महाराजा रणजीत सिंह के प्रसिद्ध अठदारा पैविलियन का भी संरक्षण कार्य पूरा कर लिया गया है। इस पूरे अभियान का मूल उद्देश्य लाहौर किले की उस बहुआयामी विरासत को प्रदर्शित करना है, जहाँ मुगलकालीन मस्जिदें, ब्रिटिश काल के भवन और हिंदू-सिख मंदिर एक साथ खड़े होकर इतिहास की गवाही देते हैं। जीर्णोद्धार की प्रक्रिया में ऐतिहासिक मौलिकता को बनाए रखने के लिए आधुनिक और व्यापक वैज्ञानिक तकनीकों का सहारा लिया गया है।

    सिख साम्राज्य का वैभव और शोध इस जीर्णोद्धार के पीछे एक लंबा शोध और ऐतिहासिक दस्तावेजों का गहरा अध्ययन शामिल है। साल 2025 में एक सिख शोधकर्ता ने लाहौर किले में सिख युग 1799-1849 के दौरान मौजूद लगभग 100 स्मारकों की पहचान की थी। हालांकि समय की मार के कारण इनमें से 30 स्मारक अब विलुप्त हो चुके हैं, लेकिन शेष बचे हिस्सों को बचाने के लिए अब बड़े स्तर पर प्रयास हो रहे हैं। इसी कड़ी में अमेरिका स्थित प्रतिष्ठित सिख शोधकर्ता डॉ. तरुणजीत सिंह बुटालिया को एक विशेष टूर गाइडबुक ‘सिख साम्राज्य के दौरान लाहौर किला’ लिखने का दायित्व सौंपा गया है।

    डॉ. बुटालिया ने इस प्रोजेक्ट पर अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि लाहौर किला सिख मानस और हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए भावनात्मक रूप से बहुत करीब है। यह किला आधी शताब्दी तक सिख सत्ता का केंद्र रहा और उनके पूर्वजों ने भी इसी दरबार में अपनी सेवाएं दी थीं। इस मंदिर का खुलना न केवल पर्यटन को बढ़ावा देगा, बल्कि दक्षिण एशिया की साझा विरासत और अंतर-सांस्कृतिक सौहार्द को भी एक नई दिशा प्रदान करेगा। अब दुनिया भर से आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु लाहौर किले में लव की विरासत और सिख काल के वैभव को करीब से देख सकेंगे।

  • महाजंग के अंत की उम्मीद: 100% तैयार हुआ अमेरिकी सुरक्षा गारंटी दस्तावेज, जेलेंस्की बोले- अब बस हस्ताक्षर का इंतजार

    महाजंग के अंत की उम्मीद: 100% तैयार हुआ अमेरिकी सुरक्षा गारंटी दस्तावेज, जेलेंस्की बोले- अब बस हस्ताक्षर का इंतजार


    नई दिल्ली । चार साल से जारी भीषण रक्तपात के बीच रूस और यूक्रेन के बीच समझौते की सुगबुगाहट तेज हो गई है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने रविवार को लिथुआनिया की राजधानी विलनियस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बड़ी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में दो दिनों तक चली सघन त्रिपक्षीय वार्ता के बाद अमेरिकी सुरक्षा गारंटी से जुड़ा ऐतिहासिक दस्तावेज अब 100 प्रतिशत तैयार’ है।

    जेलेंस्की ने इस वार्ता को ऐतिहासिक बताया क्योंकि इसमें पहली बार यूक्रेन, रूस और अमेरिका के न केवल राजनयिक, बल्कि सैन्य अधिकारी भी आमने-सामने बैठे थे। उन्होंने कहा यह दस्तावेज हमारे देश के सुरक्षित भविष्य की नींव है। अब हमें बस अपने साझेदारों अमेरिका द्वारा हस्ताक्षर की तारीख और स्थान तय किए जाने का इंतजार है। हस्ताक्षर के बाद इस प्रस्ताव को कानूनी अमलीजामा पहनाने के लिए अमेरिकी कांग्रेस और यूक्रेनी संसद वेरखोव्ना राडा की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

    20-सूत्रीय शांति योजना और चुनौतियां रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने इस शांति प्रक्रिया के लिए 20-सूत्रीय एक विस्तृत योजना पेश की है। जेलेंस्की ने माना कि पहले कई विवादित मुद्दे थे, लेकिन हालिया बातचीत के बाद उनकी संख्या कम हुई है। हालांकि, सबसे बड़ा पेंच अब भी क्षेत्रीय अखंडता को लेकर फंसा हुआ है। जहाँ रूस पूर्वी डोनबास क्षेत्र से यूक्रेनी सेना की पूरी वापसी की मांग कर रहा है, वहीं जेलेंस्की ने स्पष्ट किया कि यूक्रेन अपनी क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता नहीं करेगा।

    आर्थिक सुरक्षा और भविष्य का विजन सुरक्षा गारंटी के साथ-साथ जेलेंस्की ने यूक्रेन की आर्थिक स्थिरता पर भी जोर दिया। उन्होंने दोहराया कि उनका लक्ष्य 2027 तक यूरोपीय संघ की पूर्ण सदस्यता हासिल करना है। उन्होंने इसे ‘आर्थिक सुरक्षा की गारंटी’ करार दिया। अबू धाबी में अगली दौर की बातचीत आगामी रविवार 1 फरवरी को होने की संभावना है, जिसमें अमेरिकी मध्यस्थ और दोनों देशों के सैन्य प्रतिनिधि शेष तकनीकी और राजनीतिक मतभेदों को सुलझाने का प्रयास करेंगे।
  • चीन की सेना में 'परमाणु' भूचाल: राष्ट्रपति जिनपिंग के सबसे खास जनरल पर जासूसी का आरोप, अमेरिका को डेटा लीक करने की आशंका

    चीन की सेना में 'परमाणु' भूचाल: राष्ट्रपति जिनपिंग के सबसे खास जनरल पर जासूसी का आरोप, अमेरिका को डेटा लीक करने की आशंका


    नई दिल्ली । चीन की कम्युनिस्ट पार्टी CPC और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के भीतर उस समय हड़कंप मच गया, जब राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सबसे वफादार माने जाने वाले जनरल झांग यूक्सिया के खिलाफ जांच की आधिकारिक पुष्टि हुई। सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के उपाध्यक्ष और चीन के रक्षा उद्योग के कद्दावर नेता झांग यूक्सिया पर ‘अनुशासन और कानून के गंभीर उल्लंघन’ का आरोप लगा है। इस हाई-प्रोफाइल जांच के दायरे में जनरल लियू जेनली भी शामिल हैं, जो ज्वाइंट स्टाफ डिपार्टमेंट के चीफ हैं।

    परमाणु जासूसी की सनसनीखेज रिपोर्ट अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट ने इस मामले में आग में घी डालने का काम किया है। रिपोर्ट के मुताबिक जनरल झांग पर आरोप है कि उन्होंने चीन के परमाणु हथियार कार्यक्रम की ‘अति-गोपनीय और तकनीकी जानकारियां’ अमेरिका को मुहैया कराई हैं। हालांकि, चीन के रक्षा मंत्रालय ने जासूसी के आरोपों पर चुप्पी साध रखी है लेकिन बंद कमरों में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को इस डेटा लीक के बारे में ब्रीफिंग दी गई है। परमाणु जासूसी के अलावा, झांग पर सैन्य खरीद में भारी रिश्वत लेने, पदोन्नति के बदले पैसे वसूलने और सेना के भीतर अपना एक समानांतर ‘राजनीतिक गुट बनाने के भी गंभीर आरोप हैं।

    जिनपिंग का क्लीनअप ऑपरेशन या सुरक्षा में सेंध विशेषज्ञ इस कार्रवाई को शी जिनपिंग द्वारा सेना पर अपनी पकड़ और अधिक मजबूत करने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं। इससे पहले पूर्व रक्षा मंत्री ली शांगफू को भी इसी तरह अचानक बर्खास्त किया गया था। जांच की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि झांग के कार्यकाल में नियुक्त हुए दर्जनों अधिकारियों के मोबाइल फोन जब्त कर लिए गए हैं और उनसे गहन पूछताछ की जा रही है। 2023 से अब तक चीन की सेना के करीब 50 से अधिक शीर्ष अधिकारी पद से हटाए जा चुके हैं या लापता हैं।

    अंतरराष्ट्रीय अटकलें और संदेह वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास ने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस’ नीति का हिस्सा बताया है। वहीं, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का परमाणु कार्यक्रम इतना सख्त होता है कि वहां से डेटा लीक करना लगभग असंभव है, इसलिए यह मामला महज भ्रष्टाचार या सत्ता संघर्ष का भी हो सकता है। सोशल मीडिया पर सैनिकों की झड़प और गिरफ्तारी के अपुष्ट दावे तैर रहे हैं। यदि परमाणु जासूसी के आरोप सच साबित होते हैं, तो यह न केवल चीन की आंतरिक सुरक्षा बल्कि पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के शक्ति संतुलन को बदल कर रख देगा।

  • ट्रंप के खिलाफ मुस्लिम देशों के साथ आया चीन, 57 देशों से बोला- नहीं लौटने देंगे जंगल का कानून

    ट्रंप के खिलाफ मुस्लिम देशों के साथ आया चीन, 57 देशों से बोला- नहीं लौटने देंगे जंगल का कानून


    नई दिल्ली । मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और अमेरिका–ईरान के बीच तीखी बयानबाज़ी के बीच चीन ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता तेज कर दी है। चीन के उपराष्ट्रपति और विदेश मंत्री वांग यी ने सोमवार 26 जनवरी को 57 देशों वाले इस्लामिक सहयोग संगठन के महासचिव के साथ बीजिंग में अहम बातचीत की है। चीनी विदेश मंत्रालय और सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक यह वार्ता ऐसे समय हुई है जब मिडिलईस्ट में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और सैन्य टकराव की आशंकाएं बढ़ रही हैं।
    यह बैठक उस पृष्ठभूमि में हुई है जब एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने चेतावनी दी कि ईरान पर किसी भी हमले को पूर्ण युद्ध के रूप में देखा जाएगा। दरअसल एक दिन पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका ने ईरान की ओर एक “आर्माडा यानी बड़ा नौसैनिक बेड़ा भेजा है जो “एहतियात के तौर पर तैनात किया जा रहा है। ट्रंप ने ईरान को प्रदर्शनकारियों की हत्या या परमाणु कार्यक्रम दोबारा शुरू करने के खिलाफ चेतावनी भी दी थी।

    ईरान में विरोध प्रदर्शन और मौतों का दावा

    इसी बीच क्षेत्र में मौजूद एक ईरानी अधिकारी ने रविवार को दावा किया कि आर्थिक कठिनाइयों के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान अब तक कम से कम 5 000 लोगों की मौत हो चुकी है। इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है लेकिन इससे हालात की गंभीरता और बढ़ गई है।

    चीन का संदेश सुरक्षा साझेदारी और राजनीतिक समाधान
    इस तनातनी के बीच सोमवार को चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने इस्लामिक सहयोग संगठन के महासचिव से बातचीत में मध्य पूर्व के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा साझेदारी के निर्माण और संवेदनशील मुद्दों के राजनीतिक समाधान पर जोर दिया। विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार चीन का मानना है कि टकराव और सैन्य कार्रवाई के बजाय संवाद और सहयोग से ही क्षेत्र में स्थिरता लाई जा सकती है।

    दुनिया एक ‘जंगल के कानून’ की ओर बढ़ रही

    रिपोर्ट के मुताबिक वांग ने कहा चीन इस्लामी देशों के साथ मिलकर विकासशील देशों के वैध अधिकारों और हितों की रक्षा करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा चीन दुनिया को जंगल के कानून की ओर लौटने से रोकने के लिए तैयार है।” चीनी विदेश मंत्री ने ये भी कहा है कि क्षेत्र के हॉटस्पॉट मुद्दों का राजनीतिक समाधान किया जाना चाहिए न कि सैन्य अभियान से। चीनी विदेश मंत्री के मुताबिक ट्रंप की नीतियों की वजह से दुनिया एक ‘जंगल के कानून’ की ओर बढ़ रही है जिसमें ट्रंप जब चाहे जिसपर चाहे टैरिफ लगा देते हैं।

    अमेरिकी सैन्य तैनाती जारी

    उधर अमेरिकी अधिकारियों ने बताया है कि आने वाले दिनों में एक एयरक्राफ्ट कैरियर और कई गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर युद्धपोत मध्य पूर्व क्षेत्र में पहुंचने वाले हैं। विश्लेषकों के मुताबिक इस सैन्य तैनाती और कूटनीतिक गतिविधियों के बीच चीन की OIC से बातचीत यह संकेत देती है कि बीजिंग खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति और संभावित मध्यस्थ के रूप में स्थापित करना चाहता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है। ऐसे में चीन की यह पहल आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
  • अमेरिका में बर्फीले तूफान में फंसकर दुर्घटनाग्रस्त हुआ विमान, 7 लोगों की मौत

    अमेरिका में बर्फीले तूफान में फंसकर दुर्घटनाग्रस्त हुआ विमान, 7 लोगों की मौत


    नई दिल्ली । अमेरिका में बर्फीले तूफान में एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस विमान में 7 लोगों की मौत हो गई है। फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक मेन के बांगोर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर बर्फीले तूफान में एक निजी व्यावसायिक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें सात लोगों की मौत हो गई और चालक दल का एक सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गया।

    रिपोर्ट के मुताबिक न्यू इंग्लैंड समेत अमेरिका का अधिकतर इलाका इस समय बर्फीले तूफान से जूझ रहा है। इसमें आठ लोगों को ले जा रहा बॉम्बार्डियर चैलेंजर 600 विमान रविवार रात को उड़ान भरते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया। बोस्टन से लगभग 200 मील उत्तर में स्थित हवाई अड्डे को दुर्घटना के बाद बंद कर दिया गया। अधिकारियों के मुताबिक विमान उड़ान भरने की कोशिश करते समय पलट गया और उसमें आग लग गई। यह रविवार शाम लगभग 7:45 बजे हवाई अड्डे पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। एनटीएसबी ने कहा कि प्रारंभिक जानकारी से पता चलता है कि विमान उड़ान भरने के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हुआ और दुर्घटना के बाद उसमें आग लग गई, लेकिन जांचकर्ताओं के एक-दो दिन में पहुंचने के बाद ही वे कोई और बयान जारी करेंगे।

    बैंगोर इंटरनेशनल एयरपोर्ट से ऑरलैंडो फ्लोरिडा वॉशिंगटन डी.सी. और शार्लट नॉर्थ कैरोलाइना जैसे शहरों के लिए सीधी उडानें उपलब्ध हैं। यह हवाई अड्डा बोस्टन से लगभग 200 मील 320 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। हादसे के कुछ ही देर बाद एयरपोर्ट को बंद कर दिया गया और इसे कम से कम बुधवार दोपहर तक बंद रखा जाएगा। यह हादसा ऐसे समय हुआ जब न्यू इंग्लैंड और देश के बड़े हिस्से भीषण शीतकालीन तूफान से जूझ रहे थे। सावेद्रा ने बताया कि रविवार को बैंगोर में लगातार बर्फबारी हो रही थी, हालांकि हादसे के समय के आसपास विमान उतर और उड़ान भर रहे थे।

  • ट्रंप की प्रेशर पॉलिटिक्स से तंग आया ईयू, अमेरिका से तकनीकी निर्भरता घटाने पर कर रहा विचार

    ट्रंप की प्रेशर पॉलिटिक्स से तंग आया ईयू, अमेरिका से तकनीकी निर्भरता घटाने पर कर रहा विचार

    नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी शर्तों पर व्यापार करने के लिए टैरिफ के जरिए दबाव बना रहे हैं। ट्रंप अपने हिसाब से लगातार तमाम देशों को टैरिफ की धमकियां दे रहे हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि यूरोपीय यूनियन के साथ-साथ दुनिया के कई देश अपनी निर्भरता अमेरिका से कम करने की योजना पर विचार कर रहे हैं।

    दरअसल, आज के वक्त में हमारे जीवन में डिजिटल फ्रेमवर्क एक अहम हिस्सा बन चुके हैं। डिजिटल जगत की ज्यादातर कंपनियां अमेरिका की देन हैं। ऐसे में अगर यह फ्रेमवर्क टूटता है, तो कई जरूरी सेवाएं भी बाधित हो सकती हैं।

    ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के साथ ही वैश्विक राजनीति में एक तनाव पैदा कर दिया है। दुनिया के कई देश राजनीति और व्यापार से लेकर तकनीक के क्षेत्र में डायनेमिक्स चेंज करने पर विचार कर रहे हैं। ग्रीनलैंड के लिए ट्रंप की बार-बार की मांगों और टैरिफ की धमकियों ने ईयू को अपने पुराने साथी के साथ संबंधों पर फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है।

    यूरोप का ज्यादातर डेटा अमेरिकी क्लाउड सर्विसेज पर स्टोर होता है। अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी कंपनियों के पास यूरोप के दो-तिहाई से ज्यादा मार्केट का मालिकाना हक है, जबकि ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी अमेरिका-बेस्ड एआई कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में आगे हैं।

    यूरोपियन पार्लियामेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईयू 80 फीसदी से ज्यादा डिजिटल प्रोडक्ट्स, सर्विसेज, इंफ्रास्ट्रक्चर और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी के लिए नॉन-ईयू देशों पर निर्भर करता है।

    ईयू के लॉ-मेकर्स अमेरिका से इतर अलग तकनीकी निर्भरता पर जोर दे रहे हैं। ईयू के कानून बनाने वाले गूगल, ओपन एआई, माइक्रोसॉफ्ट जैसी तमाम कंपनियों के बदले अन्य सोर्स या देसी जुगाड़ पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

    स्वीडन के राइज रिसर्च इंस्टीट्यूट की सीनियर रिसर्चर और लुंड यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर जोहान लिनाकर के अनुसार यूरोप की लापरवाही ने इस समूह को एक ऐसे स्तर पर पहुंचा दिया है, जहां यूरोप का ज्यादातर हिस्सा अमेरिका के बिग टेक के दिए गए क्लाउड पर चल रहा है।

    उन्होंने कहा, “पब्लिक सेक्टर और सरकारें दशकों से एक कम्फर्ट सिंड्रोम से जूझ रही हैं। यहां कंजर्वेटिव प्रोक्योरमेंट कल्चर, रिस्क से बचने की आदत और जैसा है, वैसा ही रहने को तरजीह देने का रिवाज रहा है। अब फर्क यह है कि भूराजनीतिक माहौल जोखिम का एक नया पहलू जोड़ता है, इनोवेशन की कमी और बढ़ती लाइसेंस कॉस्ट से भी आगे है।”

    थिंक-टैंक बर्टेल्समैन स्टिफ्टंग का अनुमान है कि यूरोस्टैक को अपना लक्ष्य हासिल करने में लगभग एक दशक और 300 बिलियन यूरो लगेंगे। अमेरिकी ट्रेड ग्रुप चैंबर ऑफ प्रोग्रेस (जिसमें अमेरिका की कई दिग्गज टेक कंपनियां शामिल हैं) के एक कम कंजर्वेटिव अनुमान के अनुसार, पूरी लागत 5 ट्रिलियन यूरो से कहीं ज्यादा होगी।

  • पाकिस्तान ही नहीं, इस देश में भी घुसी थी इंडियन आर्मी: 9 उग्रवादियों का ‘खातमा’, अब आधिकारिक हुआ खुलासा

    पाकिस्तान ही नहीं, इस देश में भी घुसी थी इंडियन आर्मी: 9 उग्रवादियों का ‘खातमा’, अब आधिकारिक हुआ खुलासा



    नई दिल्ली। भारत की सीमापार आतंकवाद विरोधी रणनीति ने एक बार फिर सबको चौंका दिया है। पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद अब म्यांमार में भारतीय सेना द्वारा किए गए covert operation का औपचारिक खुलासा हुआ है। इस ऑपरेशन में 9 उग्रवादी मार गिराए गए और एक बड़े आतंकवादी ठिकाने को ध्वस्त कर दिया गया था।
    77वें गणतंत्र दिवस पर मिला शौर्य चक्र, हुआ खुलासा
    77वें गणतंत्र दिवस के मौके पर भारतीय सेना ने लेफ्टिनेंट कर्नल घाटगे आदित्य श्रीकुमार को शौर्य चक्र से सम्मानित किया।
    शौर्य चक्र से जुड़े आधिकारिक प्रशस्ति पत्र (Citation) में पहली बार जुलाई 2025 में म्यांमार के अंदर की गई एक गोपनीय सैन्य कार्रवाई का औपचारिक उल्लेख किया गया।

    इस ऑपरेशन को 11 से 13 जुलाई 2025 के बीच भारत-म्यांमार सीमा क्षेत्र में अंजाम दिया गया बताया गया है।
    Citation के अनुसार, लेफ्टिनेंट कर्नल घाटगे के नेतृत्व में सटीक और तेज कार्रवाई में एक मजबूत आतंकवादी ठिकाना नष्ट किया गया और 9 हथियारबंद कैडर को मार गिराया गया। इनमें एक वरिष्ठ नेता भी शामिल था।

    किस संगठन को निशाना बनाया गया?
    सेना ने ऑपरेशन का स्थान और लक्ष्य संगठन का नाम सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन यह घटनाक्रम जुलाई 2025 में सामने आए दावों से मेल खाता है।
    उस समय प्रतिबंधित ULFA-I (United Liberation Front of Asom – Independent) ने दावा किया था कि म्यांमार के सागाइंग क्षेत्र में उसके तीन शीर्ष नेताओं को ड्रोन और मिसाइल हमलों में मारा गया था।

    संगठन ने आरोप लगाया था कि भारतीय सेना ने उसके मोबाइल शिविरों को निशाना बनाया था।

    इसी दौरान भारत की ओर से इस तरह की किसी कार्रवाई से इनकार किया गया था, जबकि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी स्पष्ट किया था कि राज्य पुलिस इस कार्रवाई में शामिल नहीं थी।

    ऑपरेशन की खासियत: सटीक, सीमित और गोपनीय
    शौर्य चक्र साइटेशन में ऑपरेशन की गोपनीयता बनाए रखते हुए कहा गया कि लक्ष्य एक राष्ट्रविरोधी संगठन के शिविर थे।

    Citation में लेफ्टिनेंट कर्नल घाटगे की रणनीतिक सूझबूझ, नेतृत्व क्षमता और कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता की सराहना की गई है।
    सेना का कहना है कि मिशन बिना किसी नुकसान के सफलतापूर्वक पूरा किया गया।

    क्या यह भारत की नई सीमा-पार नीति का संकेत है?
    रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस खुलासे से भारत की सीमापार आतंकवाद विरोधी रणनीति को लेकर एक महत्वपूर्ण संकेत मिलता है।
    पूर्वोत्तर में सक्रिय उग्रवादी संगठनों पर शिकंजा कसने की कोशिशें तेज हुई हैं और यह ऑपरेशन इसी नीति का हिस्सा माना जा रहा है।

    हालांकि सरकार और सेना ऐसे अभियानों पर आम तौर पर सीमित जानकारी साझा करती हैं, लेकिन इस सम्मान के जरिए पहली बार इस ऑपरेशन की पुष्टि हो सकी है।यह मामला भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में सटीक, सीमित और गोपनीय ऑपरेशन की भूमिका को रेखांकित करता है।सीमा पार सक्रिय आतंकवादी ढांचों को कमजोर करना, बिना किसी बड़े कूटनीतिक तनाव केऔर इस मिशन की सफलता ने भारतीय सेना की तैयारी, रणनीति और साहस को फिर से साबित कर दिया है।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के गणतंत्र दिवस की गरिमा, अमेरिका और अन्य देशों ने जताई शुभकामनाएं

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के गणतंत्र दिवस की गरिमा, अमेरिका और अन्य देशों ने जताई शुभकामनाएं

    नई दिल्ली। भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर अमेरिका ने भारत को बधाई दी और दोनों देशों के बीच गहरे और मजबूत रिश्तों का जिक्र किया। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका और भारत के बीच एक ऐतिहासिक और मजबूत बंधन है, जो समय के साथ और अधिक व्यापक और प्रभावशाली हुआ है।

    रुबियो ने अपने संदेश में कहा, “संयुक्त राज्य अमेरिका के लोगों की ओर से, मैं भारत के लोगों को आपके गणतंत्र दिवस पर दिल से बधाई देता हूं।” उन्होंने बताया कि अमेरिका और भारत की साझेदारी न केवल द्विपक्षीय स्तर पर, बल्कि पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की शांति और वैश्विक चुनौतियों से निपटने में भी अहम भूमिका निभा रही है।

    अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि दोनों देश रक्षा, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और उभरती हुई तकनीकों जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं। इसके साथ ही क्वाड मंच के तहत भी भारत और अमेरिका की सक्रिय भागीदारी क्षेत्रीय सहयोग को और मजबूत बना रही है।

    रुबियो ने यह भी कहा कि अमेरिका-भारत संबंध दोनों देशों और पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए ठोस और सकारात्मक परिणाम ला रहे हैं। उन्होंने भविष्य की ओर देखते हुए कहा, “मैं आने वाले वर्ष में अपने साझा उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए मिलकर काम करने को लेकर उत्साहित हूं।”

    पिछले दो दशकों में अमेरिका और भारत के रिश्ते रक्षा, व्यापार, तकनीक और लोगों के बीच आपसी संपर्क जैसे कई क्षेत्रों में तेजी से बढ़े हैं। आज यह साझेदारी इंडो-पैसिफिक ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है, जहां दोनों देश अपने क्षेत्रीय साझेदारों के साथ मिलकर स्थिरता, आर्थिक विकास और नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं।

    इस बीच, भूटान के पीएम त्शेरिंग तोबगे ने संदेश जारी कर भारत को 77वें गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं दी। और लिखा, “मैं इस खुशी के गणतंत्र दिवस पर भारत सरकार और लोगों को गर्मजोशी भरी और दिल से शुभकामनाएं देने में भूटान के लोगों के साथ शामिल हूं। यह अवसर देश की समृद्ध यात्रा और उस भावना का सम्मान करता है जो पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती है, साथ ही यह हमारे दोनों देशों के बीच साझा मूल्यों और गहरे संबंधों को भी दर्शाता है। जैसे ही हम इस सार्थक रास्ते पर पीछे मुड़कर देखते हैं, हमें भूटान और भारत के बीच स्थायी दोस्ती की याद आती है, और मुझे उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में हमारी साझेदारी और साझा आकांक्षाएं और मजबूत होती रहेंगी। भारत में हमारे प्यारे दोस्तों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।”

    रूस के दूतावास ने भी भारत के 77वें गणतंत्र दिवस पर शुभकामनाएं दीं, जिससे भारत के प्रति अंतरराष्ट्रीय सद्भाव और मित्रता का संदेश मजबूत बताया।

    रूस के दूतावास ने अलग-अलग भाषाओं में 77वें गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं दी। रूस के दूतावास ने कहा, “भारत एक ऐसी जगह है जहां पुरानी समझ और भविष्य के सपने साथ-साथ चलते हैं। भारत ने दुनिया को दिखाया है कि विविधता कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है। भारत का गणतंत्र हर इंसान की गरिमा में विश्वास पर आधारित है।” रूसी दूतावास की ओर भारत की विभिन्न भाषाओं में ये शुभकामनाएं दी गई।

    बांग्लादेश के दूतावास ने भी भारत को 77 वें गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं दी।

    वहीं, ऑस्ट्रेलिया के हाई कमिश्नर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “26 जनवरी ऑस्ट्रेलिया और भारतीयों द्वारा मनाया जाने वाला एक खास दिन है। गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं और ऑस्ट्रेलिया-भारत की मजबूत दोस्ती के एक और साल के लिए भी शुभकामनाएं।”

  • चीन बॉर्डर के पास गरजीं तोपें, ‘अग्नि परीक्षा’ में इंडियन आर्मी और ITBP ने मिलकर दिखाया दम

    चीन बॉर्डर के पास गरजीं तोपें, ‘अग्नि परीक्षा’ में इंडियन आर्मी और ITBP ने मिलकर दिखाया दम


    नई दिल्ली। चीन सीमा के नजदीक अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) ने 6 दिवसीय संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास ‘अग्नि परीक्षा’ का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा किया है। यह अभ्यास 19 से 24 जनवरी तक पूर्वी सियांग जिले के सिगार में आयोजित किया गया, जिसका मकसद इंटर-फोर्स कोऑर्डिनेशन और युद्ध की तैयारी को और मजबूत करना था।

    अग्नि परीक्षा: युद्धक्षेत्र की नई तैयारी
    रक्षा प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल महेंद्र रावत ने बताया कि यह अभ्यास दोनों बलों के बीच ऑपरेशनल इंटीग्रेशन और संयुक्त कौशल को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है।

    इस अभ्यास में स्पीयर कोर के स्पीयरहेड गनर्स ने पैदल सेना रेजिमेंट और ITBP कर्मियों के साथ मिलकर इसे संचालित किया। यह अपनी तरह की पहली सहयोगात्मक गोलाबारी (Artillery firing) प्रशिक्षण पहल है।

    तोपखाने की ताकत को समझना, लक्ष्य यही
    इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य था कि नॉन-आर्टिलरी (non-artillery) कर्मियों को तोपखाने के अभियानों और प्रक्रियाओं से परिचित कराकर युद्धक्षेत्र में तालमेल बढ़ाया जा सके।

    कर्नल रावत ने कहा कि इससे पारंपरिक भूमिकाओं के बीच के अलगाव को तोड़ने में मदद मिलती है और गतिशील युद्ध परिदृश्यों में गोलाबारी के एकीकरण की समझ बढ़ती है।

    आर्टिलरी फायरिंग का प्रशिक्षण
    प्रशिक्षण के दौरान पैदल सेना और ITBP कर्मियों को अनुभवी गनर्स की देखरेख में स्वतंत्र रूप से कई तोपखाना फायरिंग अभ्यास करने के लिए प्रशिक्षित किया गया।
    इस प्रक्रिया से आपसी विश्वास, समन्वय और तत्परता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।

    अग्नि परीक्षा का पहला चरण: भविष्य के युद्धक्षेत्र की तैयारी
    लेफ्टिनेंट कर्नल रावत ने कहा कि यह अभ्यास भविष्य के युद्धक्षेत्रों के लिए एकीकृत युद्ध क्षमताओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।

    इस अभ्यास ने भारतीय सेना की ज्वाइंट कार्यकुशलता, मिशन-उन्मुख प्रशिक्षण और अंतर-एजेंसी सहयोग को मजबूत करने की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया है।
    चीन सीमा के पास यह अभ्यास भारतीय सेना और ITBP की तैयारी, एकता और युद्ध कौशल का एक मजबूत संदेश है। ‘अग्नि परीक्षा’ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए हर स्तर पर तैयार है।