Category: International

  • अमेरिका ने भारत पर टैरिफ घटाने का संकेत, वित्त मंत्री बेसेंट ने कहा-रूसी तेल खरीद घटने से बड़ी जीत

    अमेरिका ने भारत पर टैरिफ घटाने का संकेत, वित्त मंत्री बेसेंट ने कहा-रूसी तेल खरीद घटने से बड़ी जीत


    नई दिल्ली। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि ट्रम्प सरकार भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ में से आधा हटाने पर विचार कर सकती है, क्योंकि भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद काफी कम कर दी है। बेसेंट ने यह दावा किया कि 25% टैरिफ ने भारत की रूसी तेल खरीद घटाने में असर दिखाया है और अब राहत देने का रास्ता खुल सकता है। उन्होंने इसे अमेरिका की बड़ी जीत बताया और कहा कि टैरिफ अभी भी लागू हैं,
    लेकिन धीरे-धीरे इन्हें हटाने की संभावना है।

    अमेरिका ने अगस्त 2025 में भारत पर दो बार 25-25% टैरिफ लगाए थेपहला व्यापार घाटे के आधार पर और दूसरा रूस से तेल खरीदने के कारण। बेसेंट ने यह भी आरोप लगाया कि यूरोपीय देश भारत पर टैरिफ इसलिए नहीं लगा रहे क्योंकि वे भारत के साथ बड़े व्यापार समझौते के लिए इच्छुक हैं, जबकि यूरोप खुद रिफाइंड तेल खरीदकर रूस की मदद कर रहा है।

    बेसेंट 500% टैरिफ के प्रस्ताव पर भी बोले
    बेसेंट ने कहा कि रूसी तेल खरीदने पर 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव सीनेटर ग्राहम ने रखा है, लेकिन ट्रम्प को इसकी जरूरत नहीं है।

    राष्ट्रपति के पास पहले से ही IEEPA कानून के तहत राष्ट्रीय आपात स्थिति का हवाला देकर अन्य देशों पर भारी आर्थिक प्रतिबंध लगाने का अधिकार है।

    भारत ने रूस से तेल खरीद घटाई, पर पूरी तरह नहीं रोकी
    अमेरिकी दावों के बावजूद भारत सरकार का कहना है कि रूस से तेल खरीद अभी भी जारी है और भारत अपनी ऊर्जा नीति अपने हितों के आधार पर तय करता है। हालिया आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2025 में भारत की रूस से तेल खरीद में गिरावट आई और वह तीसरे नंबर पर खिसक गया। वहीं तुर्की दूसरे सबसे बड़े खरीदार बन गया।

    चीन अभी भी रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार है।

    भारत की खरीद में गिरावट का कारण
    रूस ने अब तेल की छूट घटा दी है और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत भी कम हो गई है, जिससे भारत के लिए रूस से तेल खरीदना पहले जैसा लाभकारी नहीं रहा। इसके अलावा शिपिंग, बीमा और भुगतान में दिक्कतें भी बढ़ीं। इसी वजह से भारत सऊदी, UAE और अमेरिका जैसे स्थिर सप्लायर्स से भी तेल खरीद बढ़ा रहा है।

    अमेरिका-भारत व्यापार वार्ता और टैरिफ में नरमी
    अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते की बातचीत चल रही है, ऐसे में टैरिफ घटाने के संकेत दोनों देशों के रिश्तों में नरमी की तरफ माना जा रहा है।
    अमेरिका के टैरिफ में राहत के संकेत से भारत-यूएस संबंधों में सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं, लेकिन रूस से तेल खरीद पर भारत की नीति अभी भी अपने हितों पर आधारित है।

  • अमेरिका ग्रीनलैंड विवाद से निवेशकों में चिंता बाजार में उतार चढ़ाव जारी रहने के संकेत

    अमेरिका ग्रीनलैंड विवाद से निवेशकों में चिंता बाजार में उतार चढ़ाव जारी रहने के संकेत


    नई दिल्ली।ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की प्रस्तावित योजना के कारण वैश्विक बाजारों में निवेशकों की चिंता बनी हुई है एक रिपोर्ट के अनुसार इस मुद्दे से जुड़े कई अनिश्चित पहलुओं के चलते निकट भविष्य में बाजार में उतार चढ़ाव जारी रह सकता है निवेशक फिलहाल अमेरिका और अन्य देशों के बीच होने वाली बातचीत के नतीजों का इंतजार कर रहे हैंबैंक ऑफ बड़ौदा की रिपोर्ट में कहा गया है कि निवेशक इस प्रस्ताव से जुड़ी और जानकारी मिलने तक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं रिपोर्ट के अनुसार बातचीत की दिशा और उसमें आने वाली संभावित बाधाएं यह तय करेंगी कि बाजार में स्थिरता आएगी या अस्थिरता बनी रहेगी

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस सौदे से जुड़े कुछ अहम मुद्दे ऐसे हैं जिनके कारण आगे चलकर बातचीत पटरी से उतर सकती है इसी वजह से निवेशकों के बीच अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है और बाजार में लगातार उतार चढ़ाव देखने को मिल सकता हैविशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीनलैंड को लेकर प्रस्तावित व्यवस्था अमेरिका और डेनमार्क के बीच वर्ष 1951 में हुए सुरक्षा समझौते का एक विस्तारित रूप हो सकती है हालांकि इसके स्वरूप और शर्तों को लेकर अभी तक पूरी तस्वीर साफ नहीं है

    बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री अदिति गुप्ता के अनुसार आगामी बातचीत में ग्रीनलैंड में अमेरिकी सेना की मौजूदगी वहां के खनिज संसाधनों के उपयोग और ग्रीनलैंड की संप्रभुता जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है ये सभी पहलू भू राजनीतिक जोखिम को और बढ़ा सकते हैंरिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड में अमेरिका की रुचि को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा है वहीं ग्रीनलैंड में मौजूद तेल गैस और दुर्लभ खनिज तत्व भी अमेरिका के लिए आकर्षण का बड़ा कारण हैं

    हालांकि अमेरिका और नाटो के बीच एक फ्रेमवर्क समझौते की घोषणा से निवेशकों को कुछ राहत जरूर मिली है लेकिन इस समझौते की शर्तें और दायरा अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है जिससे अनिश्चितता बनी हुई हैग्रीनलैंड को लेकर बयानबाजी तेज होने के बाद भू राजनीतिक तनाव और बढ़ गया और इसका असर सीधे बाजारों पर पड़ा अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ग्रीनलैंड को अपने में शामिल करने की बात कहने और विरोध करने वाले यूरोपीय देशों पर आर्थिक कदम उठाने की धमकी से हालात और बिगड़ गए

    इसके जवाब में फ्रांस जर्मनी और स्वीडन समेत कई यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड में सैन्य तैनाती बढ़ा दी जिससे तनाव और गहरा गयाडोनाल्ड ट्रंप ने पहले घोषणा की थी कि फरवरी 2026 से कई यूरोपीय देशों से आने वाले सामान पर अतिरिक्त टैक्स लगाया जाएगा जो जून 2026 से और बढ़ सकता था हालांकि बाद में दावोस में हुए विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान उन्होंने टैरिफ लगाने की धमकी से पीछे हटने के संकेत दिए जिससे बाजारों को कुछ राहत मिली

  • भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में ऐतिहासिक उछाल..

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में ऐतिहासिक उछाल..


    नई दिल्ली।भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में एक बार फिर जबरदस्त मजबूती देखने को मिली है। 16 जनवरी को समाप्त हुए सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 14.167 बिलियन डॉलर की तेज बढ़त के साथ 701.360 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। यह उछाल न केवल हाल के महीनों में सबसे बड़ी साप्ताहिक वृद्धि में से एक माना जा रहा है, बल्कि यह भारत की आर्थिक स्थिरता और वैश्विक भरोसे को भी दर्शाता है।इससे पहले 9 जनवरी को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार में केवल 392 मिलियन डॉलर की मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। ऐसे में एक ही सप्ताह में 14 अरब डॉलर से अधिक की छलांग को अर्थशास्त्री और बाजार विशेषज्ञ बेहद सकारात्मक संकेत मान रहे हैं।

    भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा घटक फॉरेन करेंसी एसेट्स यानी एफसीए इस वृद्धि में प्रमुख कारण रहा। 16 जनवरी को समाप्त सप्ताह में एफसीए में 9.652 बिलियन डॉलर का इजाफा हुआ, जिससे इसकी कुल वैल्यू बढ़कर 560.518 बिलियन डॉलर हो गई। एफसीए में अमेरिकी डॉलर के साथ-साथ यूरो, पाउंड और जापानी येन जैसी प्रमुख वैश्विक मुद्राएं शामिल होती हैं, जिनका मूल्यांकन डॉलर के संदर्भ में किया जाता है।सोने के भंडार में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में गोल्ड रिजर्व की वैल्यू 4.623 बिलियन डॉलर बढ़कर 117.454 बिलियन डॉलर हो गई। वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में सोने को सुरक्षित निवेश माना जाता है और इसमें बढ़ोतरी भारत की दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति को मजबूत बनाती है।

    हालांकि, स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स यानी एसडीआर और आईएमएफ में भारत की रिजर्व पोजिशन में हल्की गिरावट दर्ज की गई। एसडीआर की वैल्यू 35 मिलियन डॉलर घटकर 18.704 बिलियन डॉलर रह गई, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में रिजर्व पोजिशन 73 मिलियन डॉलर घटकर 4.684 बिलियन डॉलर पर आ गई।आंकड़ों पर नजर डालें तो इससे पहले 17 अक्टूबर 2025 को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 702.25 बिलियन डॉलर के स्तर तक पहुंचा था। वहीं, देश का अब तक का ऑल-टाइम हाई विदेशी मुद्रा भंडार 704.89 बिलियन डॉलर रहा है, जो सितंबर 2024 में दर्ज किया गया था। मौजूदा आंकड़े उस रिकॉर्ड स्तर के बेहद करीब हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी देश के लिए मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार उसकी आर्थिक सेहत का अहम संकेतक होता है। यह न केवल आयात भुगतान और बाहरी झटकों से निपटने में मदद करता है, बल्कि मुद्रा विनिमय दर को स्थिर रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। जब डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव बढ़ता है, तब केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर रुपये को सहारा देता है।

    बढ़ता हुआ विदेशी मुद्रा भंडार इस बात का संकेत भी है कि देश में विदेशी निवेश और डॉलर की आवक मजबूत बनी हुई है। इससे भारत की वैश्विक व्यापार क्षमता बढ़ती है और अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक मजबूती मिलती है। कुल मिलाकर, विदेशी मुद्रा भंडार में यह उछाल भारत की आर्थिक स्थिति के लिए बेहद सकारात्मक और भरोसेमंद संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

  • Peace या Piece? एलन मस्क ने ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' का उड़ाया मजाक

    Peace या Piece? एलन मस्क ने ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' का उड़ाया मजाक


    नई दिल्ली: दावोस में विश्व आर्थिक मंच के मंच पर एलन मस्क ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए बोर्ड ऑफ पीस पर मजेदार तंज कसा। ब्लैक रॉक के सीईओ लैरी फिंक के साथ पैनल में शामिल मस्क ने कहा कि बोर्ड का नाम Peace शांति के बजाय Piece टुकड़ा होना चाहिए। मस्क ने हंसी मजाक में कहा कि जब उन्होंने पीस समिट के गठन के बारे में सुना तो सोचा क्या यह P-I-E-C-E है? ग्रीनलैंड एक छोटा टुकड़ा या वेनेजुएला का एक छोटा टुकड़ा? आखिर हम सब तो बस एक पीस ही चाहते हैं।

    मस्क का यह तंज ट्रंप के उन पुराने बयानों पर आधारित था जिनमें उन्होंने ग्रीनलैंड खरीदने या वेनेजुएला पर दावा करने जैसी बातें की थीं। यह बयान ट्रंप द्वारा दावोस में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का चार्टर साइन करने के कुछ घंटे बाद आया जिसे गाजा युद्धविराम और पुनर्निर्माण की निगरानी के लिए शुरू किया गया है। अब तक इसमें 21 से ज्यादा देश शामिल हो चुके हैं और इसे वैश्विक शांति मध्यस्थ के रूप में पेश किया जा रहा है।

    दरअसल ट्रंप की अध्यक्षता में गठित बोर्ड की शुरुआती अवधारणा केवल गाजा में युद्धविराम योजना की निगरानी करने वाले विश्व नेताओं के छोटे समूह के रूप में थी। लेकिन ट्रंप प्रशासन की महत्वाकांक्षाएं बढ़ गई हैं। उन्होंने दर्जनों देशों को बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण भेजा है और इसे भविष्य में संघर्ष मध्यस्थता की भूमिका निभाने वाला बनाया है।

    मस्क की टिप्पणियां ऐसे वक्त में आई हैं जब उनके और ट्रंप के संबंध पिछले साल सार्वजनिक विवाद के बाद धीरे-धीरे सुधार की ओर हैं। मस्क की उपस्थिति WEF में खासतौर पर ध्यान खींच रही थी क्योंकि उन्होंने इस वार्षिक सम्मेलन की सार्वजनिक आलोचना की है और इसे अभिजात वर्ग का गैर-जिम्मेदार और आम लोगों से कटा हुआ बताया है। मस्क ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बार-बार दावोस का मजाक उड़ाया और इसे उबाऊ बताया।पैनल चर्चा में मस्क ने भविष्यवाणी की कि रोबोट समाज को पूरी तरह बदल देंगे। उन्होंने कहा कि मानव श्रम की जरूरत कम हो जाएगी और मानवता को मदद मिलेगी। मस्क ने बताया कि एक दिन रोबोट खुद और अधिक रोबोट बनाएंगे जिससे वस्तुओं और सेवाओं की इतनी अधिकता होगी कि इंसानों से ज्यादा रोबोट होंगे।

    उन्होंने यह भी कहा कि हर कोई धरती पर अपने बुजुर्ग माता-पिता और बच्चों की देखभाल के लिए रोबोट चाहेगा। मस्क ने बताया कि टेस्ला अगले साल के अंत तक आम लोगों को रोबोट बेचना शुरू करेगी। यह बयान ऐसे समय में आया है जब उनकी कंपनी xAI द्वारा विकसित AI ‘ग्रोक’ को यौन रूप से स्पष्ट सामग्री बनाने को लेकर विवादों का सामना करना पड़ रहा है।एलन मस्क का यह मजाकिया और भविष्यसूचक अंदाज एक बार फिर दर्शाता है कि वह वैश्विक मंचों पर अपनी अलग और चुनौतीपूर्ण सोच रखने में पीछे नहीं हटते।

  • अमेरिकी विश्लेषक का दावा: ट्रंप सबसे ताकतवर नहीं, मोदी और जिनपिंग हैं दुनिया के असली प्रभावशाली नेता

    अमेरिकी विश्लेषक का दावा: ट्रंप सबसे ताकतवर नहीं, मोदी और जिनपिंग हैं दुनिया के असली प्रभावशाली नेता

    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तुलना में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को अधिक ताकतवर माना जा रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञ इयन ब्रेमर का कहना है कि कई मामलों में ये दोनों नेता ट्रंप की तुलना में बेहतर स्थिति में हैं।

    ब्रेमर ने मीडिया से बातचीत में कहा, “अमेरिका भले ही दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था है, लेकिन इसका नेतृत्व करने वाला ट्रंप सबसे ताकतवर नेता नहीं माना जा सकता। शी जिनपिंग इस मामले में आगे हैं। उनका कारण सरल है: उन्हें मिडटर्म चुनाव की चिंता नहीं, और उनके पास स्वतंत्र न्यायपालिका पर नियंत्रण है। वहीं, ट्रंप तीन सालों में अपने पद से बाहर होंगे, लेकिन जिनपिंग लंबे समय तक सत्ता में बने रहेंगे।”

    ब्रेमर ने यह भी कहा कि पीएम मोदी की लंबी कार्यकाल अवधि उन्हें नीति निर्माण में स्थिरता और लंबे समय तक प्रभाव दिखाने की क्षमता देती है। “मोदी की निरंतरता और लंबे समय तक सत्ता में बने रहने की स्थिति उन्हें कई यूरोपीय नेताओं की तुलना में ज्यादा प्रभावशाली बनाती है,” उन्होंने कहा।

    ट्रंप के शांति प्रयासों में सहयोगियों की कमी
    इसी बीच ट्रंप ने हमास और इजराइल के बीच युद्धविराम सुनिश्चित करने के लिए अपना ‘शांति बोर्ड’ लॉन्च किया। हालांकि, अमेरिका के कई प्रमुख सहयोगियों ने इसमें भाग लेने से इनकार कर दिया। रूस ने अभी निर्णय नहीं लिया है, ब्रिटेन ने हस्ताक्षर करने से साफ मना कर दिया है। फ्रांस, नॉर्वे और स्वीडन ने भी बोर्ड में शामिल न होने का संकेत दिया। फ्रांसीसी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि उनका देश गाजा में शांति की दिशा में प्रयासों का समर्थन करता है, लेकिन यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के मुख्य मंच की जगह नहीं ले सकता।

  • ग्रीनलैंड तनाव में नरमी से बाजार को राहत, रुपये में स्थिरता की उम्मीद: डीबीएस बैंक रिपोर्ट

    ग्रीनलैंड तनाव में नरमी से बाजार को राहत, रुपये में स्थिरता की उम्मीद: डीबीएस बैंक रिपोर्ट


    नई दिल्ली।
    ग्रीनलैंड से जुड़े वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव में कमी आने के संकेतों ने वित्तीय बाजारों को राहत दी है। गुरुवार को जारी डीबीएस बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटनाक्रम से निवेशकों की धारणा में सुधार हुआ है और इसका सीधा असर मुद्रा बाजार पर भी देखने को मिल सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले समय में रुपये में उतार-चढ़ाव बना रहेगा, लेकिन उसकी गिरावट की रफ्तार अब पहले जैसी तेज नहीं रहने की संभावना है।इसका शुरुआती असर गुरुवार के कारोबार में ही दिखा, जब रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर से संभलता नजर आया। शुरुआती सत्र में रुपया करीब 15 पैसे मजबूत होकर 91.50 के स्तर पर पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुधार निवेशकों के बढ़ते भरोसे का संकेत है, हालांकि वैश्विक कारकों पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा।

    डीबीएस बैंक की कार्यकारी निदेशक और वरिष्ठ अर्थशास्त्री राधिका राव ने रिपोर्ट में बताया कि पिछले एक साल से रुपये पर दबाव बना हुआ था। इसके पीछे वैश्विक और घरेलू दोनों तरह के कारण जिम्मेदार रहे हैं। उन्होंने कहा कि वैश्विक वीआईएक्स इंडेक्स में आई तेज बढ़ोतरी यह दिखाती है कि बाजार के लगभग सभी संकेतक कमजोरी के दौर से गुजर रहे थे। प्रतिकूल भू-राजनीतिक घटनाक्रम और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में उछाल ने इस दबाव को और बढ़ाया। ऐसे माहौल में ग्रीनलैंड से जुड़े तनाव में नरमी के संकेत बाजार के लिए बड़ी राहत के रूप में सामने आए हैं।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि यूरोपीय संघ के साथ एक बड़े व्यापार समझौते को लेकर सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं और इसकी औपचारिक घोषणा अगले सप्ताह हो सकती है। इसके साथ ही विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता को लेकर भी उत्साहजनक माहौल बना है। इन घटनाओं से बाजार में दोबारा उम्मीद जगी है और निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ है।घरेलू मोर्चे पर देखा जाए तो रुपये पर दबाव ऐसे समय में बना, जब देश की आर्थिक स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है। चालू वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों में औसत आर्थिक वृद्धि दर करीब 8 प्रतिशत रही है। आने वाले वित्त वर्ष में भी इसके 7.5 प्रतिशत से अधिक रहने का अनुमान है। यह संकेत देता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद मजबूती से आगे बढ़ रही है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि कमजोर रुपया निर्यातकों को कुछ हद तक राहत देता है खासकर तब जब वैश्विक स्तर पर मांग में उतार-चढ़ाव हो। हालांकि इससे आयात महंगा होने और अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में असंतुलन की स्थिति भी पैदा हुई है।डीबीएस बैंक के अनुसार, देश का चालू खाता घाटा फिलहाल नियंत्रण में है और यह जीडीपी के 1.0 से 1.2 प्रतिशत के बीच रह सकता है। असली चिंता विदेशी पूंजी प्रवाह को लेकर है। वर्ष 2025 में शुद्ध पूंजी निकासी के बाद चालू वर्ष में इक्विटी बाजार से लगभग 3 अरब डॉलर की निकासी हो चुकी है। बॉन्ड बाजार में भी विदेशी निवेशकों की रुचि कमजोर बनी हुई है।

    प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की स्थिति पिछले साल के मुकाबले बेहतर जरूर हुई है, लेकिन विदेशी कंपनियों द्वारा मुनाफा वापस ले जाने के कारण शुद्ध निवेश में अभी भी अंतर बना हुआ है। इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि आने वाले केंद्रीय बजट में सरकारी खर्च का असर साफ दिखाई देगा, क्योंकि वित्त वर्ष 2027 तक केंद्र और राज्यों का कुल उधार बढ़ने की संभावना है।कुल मिलाकर ग्रीनलैंड से जुड़े तनाव में कमी ने बाजार को तात्कालिक राहत दी है और रुपये में स्थिरता की उम्मीद जगी है, लेकिन लंबी अवधि में वैश्विक घटनाक्रम और पूंजी प्रवाह की दिशा पर ही बाजार की चाल निर्भर करेगी।

  • वैश्विक आर्थिक खतरा: चीन की जनसंख्या में गिरावट, भारत से पिछड़ने के बाद दोहरी चुनौती

    वैश्विक आर्थिक खतरा: चीन की जनसंख्या में गिरावट, भारत से पिछड़ने के बाद दोहरी चुनौती

    बीजिंग। चीन, जो दशकों तक दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश था, अब ऐतिहासिक जनसांख्यिकीय बदलाव का सामना कर रहा है। 2023 में भारत ने चीन को पीछे छोड़कर सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने का ताज हासिल कर लिया। 2025 के आंकड़े और भी चिंताजनक हैं।

    नेशनल स्टैटिस्टिक्स ब्यूरो के अनुसार, चीन की जन्म दर रिकॉर्ड निचले स्तर 7.93 मिलियन (79.3 लाख) पर आ गई है और कुल जनसंख्या में 33.9 लाख की गिरावट देखी गई है। प्रजनन दर केवल 1.3 रह गई है, जबकि स्थिर आबादी के लिए इसे 2.1 होना चाहिए।

    जनसंख्या गिरावट के कारण और प्रभाव:
    घटता वर्कफोर्स: काम करने वाले लोगों की संख्या अब कुल आबादी का 60.6% है, जो एक दशक पहले 70% थी।
    बुजुर्गों की बढ़ती संख्या: 2034 तक 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोग चीन की कुल आबादी का 30% बन सकते हैं।
    आर्थिक दबाव: श्रमिकों की कमी से मजदूरी बढ़ेगी और सामान महंगा होगा। पेंशन और हाउसिंग जैसे सेक्टर भी दबाव में आएंगे।

    सरकार की कोशिशें:
    2016 में दो बच्चों की अनुमति, 2021 में इसे बढ़ाकर तीन कर दिया गया।
    बच्चों की देखभाल के लिए सब्सिडी (करीब 500 डॉलर प्रति वर्ष)।
    रिटायरमेंट उम्र धीरे-धीरे बढ़ाने की योजना।
    शिक्षा की लागत कम करने और गर्भपात रोकने के लिए कदम।

    समस्या की जड़:
    ‘वन-चाइल्ड पॉलिसी’ (1979–2016) के चलते चीन में लंबे समय तक जन्म दर पर सख्त नियंत्रण रहा। यह नीति अब भी देश को लंबे समय तक प्रभावित कर रही है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के लिए यह चुनौती आसान नहीं है। जापान और दक्षिण कोरिया के अनुभव बताते हैं कि समाज की सोच और जीवनयापन की लागत में बदलाव के बाद जन्म दर बढ़ाना कठिन हो जाता है। चीन अब “बूढ़े होने से पहले अमीर बनने” की दौड़ में भी पिछड़ता दिखाई दे रहा है।

  • ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का न्योता इन देशों ने ठुकराया, भारत कर रहा विचार

    ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में शामिल होने का न्योता इन देशों ने ठुकराया, भारत कर रहा विचार


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बोर्ड ऑफ पीस Board of Peace में शामिल होने के लिए कई देशों को आमंत्रित किया गया, लेकिन कुछ प्रमुख देशों ने इसे ठुकरा दिया है। वहीं, कई देशों ने अभी तक इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है जिसमें भारत भी शामिल है। खबर है कि भारत इस पहल के संवेदनशील पहलुओं पर विचार कर रहा है और अंतिम फैसला अभी नहीं लिया गया है।अमेरिका ने गाजा पट्टी में इजरायल और हमास के बीच हुए युद्धविराम समझौते के दूसरे चरण के तहत यह बोर्ड गठित किया है। इसमें विश्व के कई नेताओं को शामिल होने का न्योता दिया गया है।

    बोर्ड में शामिल नहीं हो रहे प्रमुख देश:
    फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन ने ट्रंप के न्योते को ठुकराया। वहीं, ब्रिटेन, चीन, क्रोएशिया, इटली, यूरोपीय यूनियन की कार्यकारी शाखा, पराग्वे, रूस, सिंगापुर, स्लोवेनिया, तुर्किये और यूक्रेन ने अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया है।

    न्योता स्वीकार करने वाले देश:
    अर्जेंटीना, आर्मीनिया, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, कजाखस्तान, कोसोवो, मोरक्को, संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम और पाकिस्तान ने न्योता स्वीकार कर लिया है। वाइट हाउस के अनुसार, बोर्ड में कुल 30 देशों को शामिल किया जा सकता है, जबकि 50 देशों को न्योता भेजा गया था।भारत के इस कदम पर ध्यान दुनिया भर की नजरें बनी हुई हैं। कहा जा रहा है कि भारत बोर्ड के कुछ बिंदुओं पर विचार कर रहा है और जल्द ही अपनी स्थिति साफ करेगा।

  • इमैनुएल बोले, अमेरिका ने कोई ऐसा कदम उठाया तो हम जवाबी कार्रवाई करेंगे

    इमैनुएल बोले, अमेरिका ने कोई ऐसा कदम उठाया तो हम जवाबी कार्रवाई करेंगे


    वॉशिगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी देकर उस यूरोप को अपने खिलाफ एकजुट कर लिया है, जिसे अमेरिका का सहयोगी माना जाता है। यूरोपीय देशों के नेताओं ने खुलकर डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना करना शुरू कर दिया है। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप ने 8 यूरोपीय देशों पर 10 फीसदी का अतिरिक्त इंपोर्ट टैक्स लगाने की धमकी दी है तो वहीं फ्रांस ने भी जवाबी ऐक्शन की धमकी दी है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का कहना है कि यदि अमेरिका ने ऐसा कोई कदम उठाया तो फिर हम भी ऐसी ही जवाबी कार्रवाई देंगे। इसके अलावा ट्रंप की आलोचना यूरोपीय नेता यह कहते हुए भी कर रहे हैं कि उन्होंने इंटरनेशनल कानूनों को प्रभावित किया है।
    इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि आज दुनिया में दबंग राजनीति की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि आज ऐसी स्थिति हो गई है कि विवाद सामान्य हो चुके हैं। उन्होंने कहा, ‘आज वैश्विक नीति इस स्थिति में चली गई है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों को पैरों तले रौंदा जा रहा है। ऐसा लगता है कि उसी की चल रही है, जो सबसे मजबूत है। बिना सामूहिक सहयोग के ऐसी स्थिति हो जाएगी, जिसमें अप्रत्याशित प्रतिस्पार्धा होगी।’ उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि यूरोप को कमजोर करने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि अंतहीन टैरिफ लादे जा रहे हैं, जिन्हें किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
    मैक्रों ने ट्रंप से लेकर व्लादिमीर पुतिन तक की लगाई क्लास

    यही नहीं मैक्रों ने ट्रंप के अलावा रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि वह भी साम्राज्यवादी विस्तार चाहते हैं। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि 2024 में ही लगभग 60 जंग दुनिया भर में हुईं। इनमें से कुछ ही जंगें खत्म हो सकी हैं।

    उन्होंने कहा कि यूरोप किसी के आगे झुकेगा नहीं। यदि कोई हमारे खिलाफ टैरिफ लगाता है तो फिर हम भी जवाबी कार्रवाई करेंगे। उन्होंने कहा कि यदि खेल के नियमों का पालन दूसरी तरफ से नहीं हो रहा है तो फिर हम ही ऐसा क्यों करें। हम भी सख्त कदम उठाने से हिचकेंगे नहीं।
    ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए ट्रंप ने क्या दी है दलील

    डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क के अर्धस्वायत्त इलाके ग्रीनलैंड को अमेरिकी कब्जे में लेने की बात कही है। उनका कहना है कि यदि अमेरिका इस इलाके पर कंट्रोल नहीं करता है तो फिर रूस और चीन ऐसा कर सकते हैं। उनका कहना है कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ऐसा करना जरूरी है। ग्रीनलैंड के पीएम जेन्स-फ्रेडरिक नील्सन ने इसका जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि इंटरनेशनल कानून कोई खेल नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप जैसा कर रहे हैं, वह दुनिया के सारे नियमों को तोड़ने वाला है। यदि ऐसा ही जारी रहा तो दुनिया में अलायंस टूट जाएंगे और यह बेहद खराब स्थिति होगी।