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  • अब टाइम आ गया है': ट्रंप ने डेनमार्क को दी अंतिम चेतावनी, ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए रूस और नाटो का दिया हवाला

    अब टाइम आ गया है': ट्रंप ने डेनमार्क को दी अंतिम चेतावनी, ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए रूस और नाटो का दिया हवाला


    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाने की अपनी महात्वाकांक्षा को अब एक बेहद आक्रामक और रणनीतिक मोड़ दे दिया है। सोमवार को ट्रंप ने सीधे तौर पर डेनमार्क को आखिरी चेतावनी देते हुए कहा कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे का समय आ गया है। ट्रंप ने इस बार न केवल क्षेत्रीय संप्रभुता को चुनौती दी, बल्कि रूस और चीन के खतरे का हवाला देते हुए नाटो NATO की प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रंप की इस आक्रामकता के बाद ट्रांसअटलांटिक संबंधों में शीत युद्ध के बाद की सबसे बड़ी दरार नजर आ रही है।

    रूस का डर और नाटो की ‘नाकामी’ का तर्क ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक के बाद एक कई पोस्ट साझा करते हुए डेनमार्क पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने लिखा कि “नाटो पिछले 20 वर्षों से डेनमार्क को चेतावनी दे रहा है कि उसे ग्रीनलैंड से रूसी खतरे को दूर करना होगा, लेकिन डेनमार्क इसमें विफल रहा है।” ट्रंप का तर्क है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है। उन्होंने दोटूक शब्दों में कहा,अब समय आ गया है, और यह होकर रहेगा

    टैरिफ के जरिए आर्थिक ब्लैकमेलिंग ट्रंप ने डेनमार्क और उसका समर्थन करने वाले सात अन्य नाटो सहयोगियोंब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड और नीदरलैंडपर कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का जाल बुनना शुरू कर दिया है।1 फरवरी 2026 से: इन देशों से आने वाले सभी सामानों पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का आदेश। जून 2026 से: यदि ग्रीनलैंड पर अमेरिका की शर्तें नहीं मानी गईं, तो यह शुल्क बढ़ाकर 25% कर दिया जाएगा। यूरोपीय नेताओं ने इसे ‘खुली ब्लैकमेलिंग’ करार दिया है।

    ‘गोल्डन डोम’ के लिए ग्रीनलैंड क्यों है जरूरी ट्रंप ने ग्रीनलैंड के प्रति अपनी जिद के पीछे एक बड़ा सैन्य कारण बताया हैगोल्डन डोम मल्टी-लेयर मिसाइल डिफेंस सिस्टम। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि अमेरिका को एक अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान करने के लिए ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति अनिवार्य है। यहाँ स्थित पिटुफ़िक स्पेस बेस पूर्व में थूले एयर बेस को अपग्रेड कर पूरे अमेरिका को रूसी हाइपरसोनिक मिसाइलों से सुरक्षित करने की योजना है। ट्रंप ने कहा कि लीज पर ली गई जमीन सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है, अमेरिका को “स्थायी स्वामित्व” चाहिए।

    यूरोप का जवाब: ‘बाजुका’ तैयार है डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन और ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री म्यूटे बोरुप एगेडे ने एक बार फिर दोहराया है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है। वहीं, यूरोपीय संघ EU ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए अपने ‘ट्रेड बाजुका एंटी-कोर्शन इंस्ट्रूमेंट को सक्रिय करने की धमकी दी है। यूरोपीय संघ के नेताओं का कहना है कि वे किसी भी देश के आगे घुटने नहीं टेकेंगे और अंतरराष्ट्रीय कानून की रक्षा करेंगे।इस घटनाक्रम ने नाटो के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ट्रंप ने हार्ड वे बल प्रयोग या कड़े प्रतिबंध का रास्ता अपनाया, तो यह दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था का अंत हो सकता है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाने की अपनी महात्वाकांक्षा को अब एक बेहद आक्रामक और रणनीतिक मोड़ दे दिया है। सोमवार को ट्रंप ने सीधे तौर पर डेनमार्क को आखिरी चेतावनी देते हुए कहा कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जे का समय आ गया है। ट्रंप ने इस बार न केवल क्षेत्रीय संप्रभुता को चुनौती दी, बल्कि रूस और चीन के खतरे का हवाला देते हुए नाटो NATO की प्रासंगिकता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रंप की इस आक्रामकता के बाद ट्रांसअटलांटिक संबंधों में शीत युद्ध के बाद की सबसे बड़ी दरार नजर आ रही है।

  • ट्रंप की 'ग्रीनलैंड' जिद और यूरोप का पलटवार: क्या चलने वाला है दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक हथियार?

    ट्रंप की 'ग्रीनलैंड' जिद और यूरोप का पलटवार: क्या चलने वाला है दुनिया का सबसे बड़ा व्यापारिक हथियार?


    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उस समय भूचाल आ गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर डेनमार्क और उसके सहयोगी यूरोपीय देशों को सीधी चेतावनी दे डाली। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि यदि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की शर्तों पर समझौता नहीं हुआ, तो यूरोप को भारी आर्थिक कीमत चुकानी होगी। इसके जवाब में यूरोपीय संघ EUने भी अपने इतिहास के सबसे घातक आर्थिक हथियार ‘एंटी-कोर्शन इंस्ट्रूमेंट’ ACI जिसे ‘ट्रेड बाजुका’ कहा जा रहा है, को चलाने के संकेत दे दिए हैं।

    विवाद की जड़: क्या है ट्रंप का ग्रीनलैंड प्लान

    राष्ट्रपति ट्रंप का मानना है कि रूस और चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए ग्रीनलैंड का अमेरिकी नियंत्रण में होना उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। शनिवार को ट्रंप ने घोषणा की कि:1 फरवरी 2026 से: डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, फिनलैंड, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और यूके से आने वाले सामानों पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाएगा।1 जून 2026 से: यदि तब तक ‘डील’ नहीं होती, तो इस टैरिफ को बढ़ाकर 25% कर दिया जाएगा।उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि सुरक्षा के लिए वे ‘बल प्रयोग’ की संभावना से भी पीछे नहीं हटेंगे।

    क्या है यूरोपीय संघ का ट्रेड बाजुका ACI

    यूरोपीय संघ ने 2023 में एक विशेष कानून बनाया था जिसे एंटी-कोर्शन इंस्ट्रूमेंट कहा जाता है। इसे ‘ट्रेड बाजुका’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह EU को किसी भी देश के खिलाफ सामूहिक और कड़ी आर्थिक कार्रवाई करने की शक्ति देता है।

    इसके तहत EU क्या कर सकता है

    प्रतिशोधी टैरिफ: अमेरिकी उत्पादों पर भारी आयात शुल्क लगाना। बाजार पर प्रतिबंध: अमेरिकी कंपनियों को यूरोपीय सिंगल मार्केट से बाहर करना या उन पर सीमाएं लगाना। सरकारी टेंडर पर रोक: अमेरिकी फर्मों को EU के किसी भी सरकारी प्रोजेक्ट या टेंडर में हिस्सा लेने से रोकना बौद्धिक संपदा IPअधिकार: अमेरिकी कंपनियों के आईपी अधिकारों या सेवाओं पर प्रतिबंध लगाना।

    अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया: ‘खतरनाक मोड़ पर दुनिया

    इस टकराव ने नाटो NATO सहयोगियों के बीच दरार पैदा कर दी है: यूरोपीय आयोग उर्सुला वॉन डेर लेयेन उन्होंने चेतावनी दी है कि ट्रंप के ये कदम ट्रांसअटलांटिक संबंधों को “खतरनाक और कभी न सुधरने वाले विनाशकारी मोड़” पर ले जाएंगे। ब्रिटेन प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर उन्होंने ट्रंप से फोन पर बात कर इसे ‘पूरी तरह गलत’ बताया और कहा कि नाटो सहयोगियों के खिलाफ टैरिफ का इस्तेमाल अस्थिरता पैदा करेगा।फ्रांस इमैनुएल मैक्रों:फ्रांस इस ‘ट्रेड बाजुका’ को चलाने के पक्ष में सबसे मुखर है, उनका तर्क है कि संप्रभुता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

    आगे क्या होगा
    फिलहाल ब्रसेल्स में यूरोपीय देशों के राजदूतों की आपातकालीन बैठकें चल रही हैं। यदि 1 फरवरी से ट्रंप अपने टैरिफ लागू करते हैं, तो दुनिया एक ऐसी ‘ट्रेड वॉर’ देखेगी जिसकी मिसाल आधुनिक इतिहास में नहीं मिलती। ग्रीनलैंड की बर्फ पर शुरू हुई यह जंग अब वैश्विक अर्थव्यवस्था को पिघलाने की कगार पर है।
  • ट्रंप से पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपति कर चुके हैं ग्रीनलैंड को खरीदने की कोशिश…

    ट्रंप से पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपति कर चुके हैं ग्रीनलैंड को खरीदने की कोशिश…

    वाशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान दुनिया भर में सुर्खियां बटोर रहे हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो (Venezuelan President Maduro) को उनके किले से उठाकर न्यूयॉर्क की अदालत में पेश करवाने वाले ट्रंप का अगला सपना ग्रीनलैंड को अमेरिकी आधिपत्य में लाने का है। यूरोप समेत पूरी दुनिया इसका विरोध कर रही है, लेकिन ट्रंप अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। उनका तर्क है कि आर्कटिक क्षेत्र और अमेरिकी धरती की रक्षा के लिए ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जा होना बहुत जरूरी है। इस कब्जे के लिए वह साम, दाम, दंड भेद सभी प्रकार की नीति अपनाने के लिए भी तैयार हैं। लेकिन इतिहास उठाने पर पता चलता है कि ग्रीनलैंड का ख्वाब सजाने वाले ट्रंप पहले अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं हैं। इसके पहले भी कई राष्ट्रपतियों का मन इसको लेकर ललचा चुका है। हालांकि, किसी को भी यह हासिल नहीं हुआ।

    ग्रीन लैंड की जमीन का आधुनिक अमेरिका द्वारा दिखाया गया लालच का पहला उदाहरण वर्ष 1867 में सामने आता है। यह वह समय था, जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने रूस से अलास्का को खरीदा था। ऐसे में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम एच. सिवार्ड ने डेनमार्क को भी लगे हाथ आइसलैंड और ग्रीनलैंड खरीदने का ऑफर दे डाला। अलास्का डील में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तत्कालीन अमेरिकी ट्रेजरी सचिव रॉबर्ट जे वॉकर ने कहा था कि ग्रीनलैंड अगर अमेरिका के हिस्से में आ जाता है, तो यह बहुत ही ज्यादा फायदेमंद होगा। इससे अमेरिका व्यापारिक दुनिया पर नियंत्रण हासिल कर पाएगा। हालांकि, इस समय पर भी डेनमार्क और ग्रीनलैंड को लोगों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और यह आगे नहीं बढ़ पाया।


    1946 में 100 मिलियन डॉलर का दिया था ऑफर

    लगभग 9 दशक तक अमेरिका ग्रीनलैंड को हासिल करने का सपना मन में दबाए रखा। इस बीच पहला विश्व युद्ध भी समाप्त हो गया। अब बारी आई दूसरे विश्वयुद्ध की। इसमें नाजी जर्मनी ने डेनमार्क पर हमला बोल दिया। ग्रीनलैंड की रक्षा करने की जिम्मेदारी अमेरिका के कंधों पर आ गई। इसी दौर में अमेरिका ने ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य उपस्थिति को बढ़ाया और इस आर्कटिक द्वीप की रक्षा की। इसके बाद युद्ध समाप्त हुआ, लेकिन अमेरिका का ग्रीनलैंड प्यार एक बार फिर से जाग गया। वर्ष1946 में जब इस द्वीप को खाली करने की बारी आई, तो अमेरिका ने अपने पैसे की ताकत को दिखाना चाहा। दूसरे विश्वयुद्ध में बर्बाद हो चुके डेनमार्क के लिए 100 मिलियन डॉलर की राशि एक बड़ी बात थी, हालांकि इसके बाद भी डेनमार्क ने इस पेशकश को ठुकरा दिया और अमेरिका को मायूस होकर यहां से हटना पड़ा।


    सैन्य बेस बनाने में कामयाब रहा अमेरिका

    इसके बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड अमेरिका की छत्र छाया में नाटो के तहत शामिल हो गए। अमेरिका को अपनी मनचाही मुराद भी मिल गई। कोल्ड वॉर के समय से ही अमेरिका ने रूस को काउंटर करने के लिए ग्रीनलैंड का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। डेनमार्क ने भले ही ग्रीनलैंड अमेरिका को देने से इनकार कर दिया हो, लेकिन नाटो में शामिल होने के नाते वह अमेरिकी सेना को इसके इस्तेमाल से नहीं रोक सकती थी। ऐसे में अमेरिका ने यहां पर 1943 से संचालित पिटफिक स्पेस बेस को और भी ज्यादा मजबूत कर लिया और यहां पर अपनी सैन्य उपस्तिथि को बढ़ा दिया।

    तमाम कोशिशों के बाद भी अमेरिका ग्रीनलैंड को खरीदने में नाकामयाब रहा। हाालंकि, सैन्य बेस स्थापित करने से उसके मनसूबे कुछ हद तक कामयाब होते हुए भी नजर आए। इसके बाद आई 21वीं सदी। अमेरिका के राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रंप, अपने पहले कार्यकाल के आखिर में ट्रंप ने खुले तौर पर ग्रीनलैंड को खरीदने की पेशकश की। उनकी यह पेशकश, अमेरिकी सुरक्षा से ज्यादा ग्रीनलैंड की जमीन के नीचे दबी अपार खनिज संपदा को लेकर थी। हालांकि, उस समय पर भी डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने ही इस प्रस्ताव को यह कहकर खारिज कर दिया कि उनका यह क्षेत्र बिकाऊ नहीं है।

    इसके बाद ट्रंप को सत्ता से जाना पड़ा और बात आई-गई हो गई। लेकिन 2025 में ट्रंप एक बार फिर से सत्ता में लौटे। इस बार ज्यादा आक्रामक होकर। आते ही उन्होंने ऐलान कर दिया कि अब ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनना ही होगा। 2025 में अमेरिकी कांग्रेस के एक संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा, “मुझे लगता है कि हम इसे (ग्रीनलैंड) को किसी तरह हासिल कर ही लेंगे। किसी न किसी तरह हम इसे जरूर हासिल करेंगे।”

    अमेरिका पैसे की दम पर पिछली दो सदी से ग्रीनलैंड को अपना हिस्सा बनाने की बात कर रहा है। लेकिन हर बार डेनमार्क और ग्रीनलैंड इससे इनकार कर देते हैं। इसबार भी ट्रंप के लिए ग्रीनलैंड को खरीदना आसान नहीं होगा। हालांकि, ट्रंप इस मामले में थोड़ा अलग रुख भी अपना रहे हैं, अभी तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने ग्रीनलैंड हासिल करने के लिए सैन्य अभियान चलाने की बात नहीं कही है, लेकिन ट्रंप ने यह विकल्प भी खुला रखा है।

    आपको बता दें, ग्रीनलैंड की सरकार और डेनमार्क को दरकिनार करते हुएस अमेरिका ने सीधे ग्रीनलैंड की जनता को ही पैसा देने की पेशकश की थी,हालांकि उन्होंने भी इससे इनकार कर दिया। रॉयटर्स के मुताबिक ग्रीनलैंड के लोगों ने इस बात को अपमानजनक माना और पूरी तरह से खारिज कर दिया।

    राष्ट्रपति ट्रंप भले ही ग्रीनलैंड को जीतने के लिए कुछ भी कर जाने के तैयार दिख रहे हों, लेकिन ग्रीनलैंड की जनता और यूरोपीय देश इस पर राजी नहीं दिखते। ट्रंप के ग्रीनलैंड प्रस्ताव के विरोध में यूरोपीय देश खड़े हुए हैं। प्रतीकात्मक रूप से ही सही लेकिन जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देशों ने अपनी सेना को ग्रीनलैंड में भेजा है। इससे नाराज ट्रंप ने इन देशों के ऊपर 10 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ का ऐलान किया है। इतना ही नहीं, यह भी कहा कि अगर यह देश नहीं मानते तो जून से यह टैरिफ 25 फीसदी हो जाएगा।

  • स्पेन में भीषण रेल हादसा… दो ट्रेनों की जोरदार भिड़ंत में 21 लोगों की मौत, 75 घायल

    स्पेन में भीषण रेल हादसा… दो ट्रेनों की जोरदार भिड़ंत में 21 लोगों की मौत, 75 घायल


    मैड्रिड।
    स्पेन (Spain) में भीषण रेल हादसे (Terrible ऊrain Accident) में 21 लोगों की मौत हो गई और 75 घायल हैं। कोर्डोबा (Cordoba) के पास एडमुज गांव के नजदीक यह दुर्घटना हुई। मलागा से मैड्रिड जा रही निजी कंपनी इर्यो की हाई-स्पीड ट्रेन का पिछला हिस्सा अचानक पटरी से उतर गया। इसके बाद यह दूसरी दिशा से आ रही ट्रेन से टकरा गई। हादसा रविवार शाम 7:45 बजे हुआ, जिसमें पहली ट्रेन में लगभग 300 और दूसरी में 200 यात्री सवार थे। स्पेन के परिवहन मंत्री ऑस्कर पुएंटे (Transport Minister Oscar Puente) ने मौतों की संख्या 21 बताई। उन्होंने कहा कि सभी जीवित बचे लोगों को निकाल लिया गया है, हालांकि कुछ और शव बाकी हो सकते हैं।

    आंदालूसिया के क्षेत्रीय अध्यक्ष जुआनमा मोरेनो ने बताया कि 75 यात्रियों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जिनमें 15 की हालत गंभीर है। बचावकर्मी पूरी रात मलबे से शव निकालने में जुटे रहे। यह हादसा बेहद असामान्य बताया जा रहा है क्योंकि यह सपाट और हाल ही में मई में नवीनीकृत ट्रैक पर हुआ। पटरी से उतरने वाली ट्रेन चार साल से कम पुरानी थी। टक्कर इतनी जोरदार थी कि रेनफे ट्रेन के पहले दो डिब्बे पटरी से उतरकर 4 मीटर नीचे ढलान पर जा गिरे, जिससे उसके आगे के हिस्से को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा।

    ‘ऐसा लगा जैसे भूकंप आया हो’
    एक यात्री और पत्रकार साल्वाडोर जिमेनेज ने बताया कि क्षण भर में ऐसा लगा जैसे भूकंप आ गया हो। यात्रियों ने इमरजेंसी हैमर से खिड़कियां तोड़कर बाहर निकलने की कोशिश की। घटनास्थल दूरदराज होने के कारण पहुंचना मुश्किल था, फिर भी स्थानीय लोग कंबल और पानी लेकर मदद के लिए पहुंचे। स्पेनिश सेना, रेड क्रॉस और अन्य एजेंसियों ने बचाव अभियान में हिस्सा लिया।

    सदी का स्पेन का सबसे बड़ा ट्रेन हादसा
    स्पेन में यूरोप का सबसे बड़ा हाई-स्पीड रेल नेटवर्क है, जिसमें 3100 किलोमीटर से अधिक ट्रैक हैं। यह काफी सुरक्षित माना जाता है। 2024 में रेनफे की हाई-स्पीड ट्रेनों में 2.5 करोड़ से अधिक यात्रियों ने सफर किया। प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज, राजा फेलिप VI और रानी लेटिजिया ने शोक व्यक्त किया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भी संवेदना जताई। जांच में एक महीने तक लग सकता है। सोमवार को मैड्रिड और आंदालूसिया के बीच ट्रेन सेवाएं रद्द कर दी गई हैं। यह इस सदी का स्पेन का सबसे बड़ा ट्रेन हादसा है।

  • कनाडाई प्रधानमंत्री कार्नी ने ड्रैगन की धरती से ट्रंप को दिखाई आंखें

    कनाडाई प्रधानमंत्री कार्नी ने ड्रैगन की धरती से ट्रंप को दिखाई आंखें

    वाशिंगटन। डोनाल्ड ट्रंप की लगातार धमकियों के बीच यूरोपीय देशों के अलावा अब अमेरिका के पड़ोसी देश कनाडा ने भी आंखें दिखानी शुरू कर दी है। चीन की यात्रा पर पहुंचे कनाडाई प्रधानमंत्री कार्नी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान साफ किया कि ओटावा किसी भी सूरत में ट्रंप के ग्रीनलैंड प्लान का समर्थन नहीं करता है। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि ग्रीनलैंड के भविष्य को लेकर कनाडा और चीन के बीच चर्चा हुई है। इस पर दोनों देशों के विचार एक जैसे हैं।

    बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के संबोधित करते हुए कार्नी ने अपने नाटो सहयोगी देश डेनमार्क को अपने पूर्ण समर्थन का ऐलान किया। इसके साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि नाटो का सामूहिक रक्षा सिद्धांत किसी अपरिवर्तनीय है। उन्होंने कहा, “हम डेनमार्क के साथ नाटो के साझेदार हैं।

    हमारी पूर्ण साझेदारी कायम है। अनुच्छेद 5 और अनुच्छेद 2 के तहत हमारे दायित्व कायम हैं और हम उनका पूरी तरह से समर्थन करते हैं।”

    कार्नी ने यह भी खुलासा किया कि उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ ग्रीनलैंड के भविष्य पर चर्चा की थी और कहा कि संप्रभुता के मुद्दे पर उनके विचार काफी हद तक एक जैसे हैं। उन्होंने कहा, “मैंने ग्रीनलैंड की स्थिति और डेनमार्क के लोगों की संप्रभुता के बारे में राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बात की है। कनाडा और चीन के विचार इस मामले पर काफी हद तक एक समान हैं।” कनाडा के रुख को दोहराते हुए, कार्नी ने कहा कि डेनमार्क के अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को बाहरी दबाव के बिना अपने भविष्य का फैसला करने का अधिकार होना चाहिए।

    आपको बता दें, कनाडा के प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने खुले आम अन्य देशों को धमकाते हुए कहा था कि अगर कोई देश उनके ग्रीनलैंड समझौते के खिलाफ जाता है, या उसका समर्थन नहीं करता है, तो उसके ऊपर वह टैरिफ लगा सकते हैं।

    दरअसल, ट्रंप बार-बार अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क देते हुए ग्रीन लैंड को अमेरिकी प्रभुत्व में लाने की वकालत कर रहे हैं। इस मामले में उन्होंने सैन्य शक्ति के प्रयोग का विकल्प भी खुला रखा है। यूक्रेन पर रूस के आक्रमण और अब डेनमार्क की जमीन पर अमेरिका की नजर से यूरोपीय देश पिसते नजर आ रहे हैं।
    ग्रीनलैंड को खरीदना चाहता है अमेरिका: रुबियो

    ट्रंप के अलावा अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी खुले तौर पर ग्रीनलैंड को लेकर कहा कि अमेरिका इस क्षेत्र को खरीदना चाहता है। हालांकि उनके इस प्रस्ताव को ग्रीनलैंड और डेनमार्क दोनों प्रशासनों ने सिरे से खारिज कर दिया था। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने चेतावनी दी है कि किसी भी अमेरिकी अधिग्रहण से नाटो का अंत हो जाएगा।

    ट्रम्प ने यह भी दावा किया है कि अमेरिकी नियंत्रण के बिना ग्रीनलैंड रूस या चीन के प्रभाव में आ सकता है, जिसे आर्कटिक विशेषज्ञों ने निराधार बताया है। हालांकि चीन खुद को “निकट-आर्कटिक राज्य” कहता है, विश्लेषकों का कहना है कि इस क्षेत्र में बीजिंग की बढ़ती उपस्थिति में कनाडा के पास और अलास्का के आसपास रूस के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास शामिल हैं।

    रूस और अमेरिका के बीच पिसते यूरोपीय देश

    दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका की गोदी में बैठे यूरोपीय देशों ने अब रूस के साथ सीधी बातचीत का विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है। कनाडा के पहले इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और जर्मनी के चांसलर फैड्रिक मर्त्ज ने भी रूस के साथ बातचीत करने के प्रस्ताव पर विचार करने की बात कही है।
    कनाडा और ट्रंप का विवाद

    अमेरिका और कनाडा दोनों ही देश एक-दूसरे के साथ घनिष्ठ संबंध साझा करते हैं। हालांकि, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान कई बार उन्होंने ऐसी बात कही है, जो कनाडाई लीडरशिप के लिए असहज करने वाली स्थिति की वजह बनी है। पूर्व कनाडाई प्रधानमंत्री को ट्रंप बार-बार गवर्नर कहकर संबोधित करते रहे हैं। उनका तात्पर्य कनाडा को भी अमेरिका में 51वें राज्य को रूप में समाहित करने से था।

  • बांग्लादेश में चुनाव से पहले मौलाना का भड़काऊ भाषण, बोला-हिंदुओं को वोट देना हराम, मंदिरों को तोड़ दो

    बांग्लादेश में चुनाव से पहले मौलाना का भड़काऊ भाषण, बोला-हिंदुओं को वोट देना हराम, मंदिरों को तोड़ दो


    ढाका। बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ दुर्व्यवहार और हिंसा जारी है। फरवरी में होने वाले इलेक्शन से पहले एक से बढ़कर एक खतरनाक भड़काऊ बयान दिए जा रहे हैं। मौलानाओं ने मानो हिंदुओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया हुआ है। सोशल मीडिया पर कई वीडियो सामने आए हैं। एक वीडियो में एक मौलाना ‘हिंदुओं को वोट देना हराम’ बता रहा है तो एक वीडियो में एक नेता को “बांग्लादेश से मंदिरों को खत्म करने” की बात कहते सुना जा रहा है। बांग्लादेश में मौलाना अपनी सभाओं में हिंदुओं के खिलाफ लगातार भड़काऊ बयानबाजी कर रहे हैं।

    जिस मौलाना का वीडियो वायरल हुआ है, उसमें उससे एक सवाल पूछा जाता है कि “क्या चुनाव में किसी हिंदू उम्मीदवार को वोट दिया जा सकता है, क्या हिंदू पार्टी को वोट देना चाहिए?” इस सवाल पर मौलाना बिल्कुल है कि “नहीं ये बिल्कुल जायज नहीं है।” इस सवाल पर पहले मौलाना को व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ हंसते देखा जा रहा है और फिर वो कहता है कि ‘हिंदू को वोट देना जायज नहीं है।’ इसके बाद वो अपनी बात को फिर से दोहराता है कि ‘हिंदू को वोट देना जायज नहीं है।’ आगे वो कहता है कि ‘हिंदुओं, काफिरों को वोट देना किसी भी तरीके से जायज नहीं है।’ प्रोग्राम के दौरान वह घोषणा करता है कि किसी भी हिंदू उम्मीदवार या “काफिर” को वोट देना हराम है, यानी इस्लाम में मना है।

    बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ मुहिम
    ये वीडियो कब का है, नवभारत टाइम्स इसकी पुष्टि नहीं कर पाया है। लेकिन एक और क्लिप में, मौलवियों को हिंदू धार्मिक स्थलों और संस्थानों के खिलाफ खुलेआम धमकियां देते हुए सुना जा सकता है। दूसरे वीडियो में एक शख्स को बांग्लादेश से हिंदुओं को मिटाने, सारे मंदिरों को नष्ट करने का आह्नान करते सुना जा सकता है। वो कहता है कि “बांग्लादेश में, मंदिर नष्ट करने के लिए हैं, उनकी मूर्तियां तोड़ देने के लिए है। कोई भी हिंदू बांग्लादेश में नहीं रह सकता, कोई भी इस्कॉन नहीं रह सकता। दिल्ली के दलालों को दिल्ली वापस चले जाना चाहिए।” ये वीडियो उस वक्त सामने आए हैं, जब 2024 के अगस्त में शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसक घटनाएं शुरू हो गई। हाल के हफ्तों में दर्जनों हिंदुओं के घरों को तोड़ दिया गया है और कई घरों को बाहर से बंद कर आग लगा दिया गया है।

    बांग्लादेश में पिछले एक सवा महीने में कई हिंदुओं की भीड़ ने हत्या कर दी है। कई देशों ने बांग्लादेश में हिंदुओं से होने वाली हिंसा की आलोचना की है, लेकिन मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार लगातार ऐसे तत्वों का समर्थन कर रही है। बांग्लादेश में कट्टरपंथी बेलगाम हो चुके हैं। पिछले कुछ हफ्तों में कम से कम पांच हिंदू पुरुषों की हत्या कर दी गई है। जिसके बाद भारत ने बांग्लादेश से देश में सांप्रदायिक घटनाओं से सख्ती से निपटने को कहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि “हम चरमपंथियों द्वारा अल्पसंख्यकों के साथ-साथ उनके घरों और व्यवसायों पर बार-बार होने वाले हमलों का एक परेशान करने वाला पैटर्न देख रहे हैं।” उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों से “तेजी और सख्ती से” निपटा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सांप्रदायिक हमलों को निजी दुश्मनी या राजनीतिक मतभेदों से जोड़ने की एक परेशान करने वाली प्रवृत्ति रही है। जायसवाल ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि “ऐसी अनदेखी अपराधियों को और बढ़ावा देती है और अल्पसंख्यकों के बीच डर और असुरक्षा की भावना को गहरा करती है।”

  • बांग्लादेश में हिंदू युवक की जघन्य हत्या, BNP नेता ने कार से कुचलकर कर उतारा मौत के घाट

    बांग्लादेश में हिंदू युवक की जघन्य हत्या, BNP नेता ने कार से कुचलकर कर उतारा मौत के घाट


    नई दिल्ली। बांग्लादेश के राजबाड़ी जिले में BNP नेता अबुल हाशेम सुजन ने पेट्रोल पंप कर्मचारी रिपन साहा को 5,000 टका का पेट्रोल बिना भुगतान करने पर अपनी जीप से कुचलकर मौत के घाट उतार दिया। घटना का सीसीटीवी फुटेज सामने आने के बाद पुलिस ने आरोपी और ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया है।

    बांग्लादेश में एक और हिंदू युवक की दर्दनाक हत्या ने देश में सनसनी फैला दी है। राजबाड़ी जिले के पेट्रोल पंप पर काम करने वाले 30 वर्षीय रिपन साहा को कथित तौर पर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेता अबुल हाशेम सुजन ने अपनी ब्लैक लैंड क्रूजर जीप से कुचल दिया।

    घटना शुक्रवार की सुबह लगभग 4:30 बजे हुई।

    पुलिस और स्थानीय लोगों के अनुसार, सुजन ने अपने वाहन में करीब 5,000 टका का ऑक्टेन भरवाया, लेकिन भुगतान किए बिना भागने की कोशिश की। रिपन ने वाहन रोककर भुगतान की मांग की तो आरोपी और उनके ड्राइवर कमल हुसैन ने गुस्से में आकर अपशब्द कहे और गाड़ी तेज कर दी।

    सीसीटीवी में साफ दिखा क्रूर हमला
    पेट्रोल पंप के सीसीटीवी फुटेज में दिख रहा है कि रिपन पेट्रोल पंप के पास खड़ा था, वहीं सुजन की गाड़ी आती है, रिपन भुगतान मांगता है और फिर अचानक गाड़ी तेज कर दी जाती है।रिपन को गाड़ी के नीचे कुचलते हुए देखा गया। सिर और चेहरे को बुरी तरह कुचला गया। घटनास्थल से शव ढाका-खुलना हाईवे पर पड़ा मिला।

     रिपन की सिर और चेहरे को बुरी तरह कुचला गया और वह मौके पर ही मृत हो गया। शव बाद में ढाका-खुलना हाईवे पर पड़ा मिला।

    BNP नेता समेत दो गिरफ्तार
    पुलिस ने वाहन जब्त कर लिया और अबुल हाशेम सुजन को उनके गांव बारो मुरारीपुर से गिरफ्तार किया। उनके ड्राइवर कमल हुसैन को भी हिरासत में लिया गया।

    राजबाड़ी सदर पुलिस स्टेशन के ओसी खोंडकर जियाउर रहमान ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयान के आधार पर दोनों को हिरासत में लिया गया है।

    हिंदू समुदाय में भय का माहौल
    स्थानीय हिंदू समुदाय में इस घटना के बाद दहशत का माहौल है। यह घटना बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा के पैटर्न से जुड़ी मानी जा रही है। कई रिपोर्टों में इसे सांप्रदायिक हिंसा के रूप में देखा जा रहा है, जबकि पुलिस इसे मुख्य रूप से भुगतान विवाद बता रही है।
    इस घटना ने स्थानीय हिंदू समुदाय में भय और आक्रोश बढ़ा दिया है। बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक के खिलाफ बढ़ती हिंसा के बीच यह घटना एक बार फिर सांप्रदायिक तनाव को बढ़ा सकती है। जबकि पुलिस इसे भुगतान विवाद बता रही है, कई लोगों का मानना है कि यह हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा की एक कड़ी है। 

  • भारत का टैरिफ अपडेट: अमेरिकी दालों पर बढ़ी इंपोर्ट ड्यूटी, सीनेटर ने ट्रंप को लिखा लेटर

    भारत का टैरिफ अपडेट: अमेरिकी दालों पर बढ़ी इंपोर्ट ड्यूटी, सीनेटर ने ट्रंप को लिखा लेटर

    नई दिल्ली।  भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील लंबे समय से अटकी हुई है, और अब इसमें नया विवाद जुड़ सकता है। इसका कारण है अमेरिकी दालों पर भारत द्वारा लगाई गई इंपोर्ट ड्यूटी। अमेरिकी सीनेटरों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पत्र लिखकर भारत द्वारा लगाई गई 30% ड्यूटी को अनुचित बताया और इसे हटाने के लिए दबाव डालने का अनुरोध किया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की तरफ से यह ड्यूटी ट्रंप द्वारा अमेरिकी सामान पर लगाए गए 50% टैरिफ का जवाब माना जा रहा है। ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील की बातचीत और जटिल हो सकती है।

    भारत ने अक्टूबर 2025 में लगाया दाल पर टैरिफ

    नॉर्थ डकोटा के सीनेटर केविन क्रेमर और मोंटाना के स्टीव डेन्स ने बताया कि भारत ने 30 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी पीली मटर पर 30% टैरिफ लगाने की घोषणा की थी, जो 1 नवंबर से लागू हो गया। इस फैसले पर तब ज्यादा ध्यान नहीं गया और भारत सरकार ने इसे बड़े पैमाने पर प्रचारित भी नहीं किया। विशेषज्ञ इसे चुपके से किया गया पलटवार मान रहे हैं।

    16 जनवरी को लिखे गए पत्र में कहा गया कि इस अनुचित टैरिफ की वजह से अमेरिकी दाल उत्पादकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह मामला विशेष रूप से डकोटा और मोंटाना जैसे कृषि-प्रधान राज्यों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन राज्यों में मटर और दाल का उत्पादन अधिक होता है।

    भारत दुनिया में सबसे बड़ा दाल कंज्यूमर

    पत्र में आगे कहा गया कि भारत में सबसे अधिक खाई जाने वाली दालें मसूर, चना, सूखी फलियां और मटर हैं, और अमेरिका की ये प्रोडक्शन वाली दालें भारत के बाजार में बड़ी मांग रखती हैं। भारत द्वारा लगाई गई टैरिफ से अमेरिकी उत्पादकों को बाजार हिस्सेदारी और आय में नुकसान हो रहा है।

    ट्रेड डील में कृषि और डेयरी ‘रेड लाइन’

    भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील का पेंच मुख्य रूप से कृषि और डेयरी प्रोडक्ट्स को लेकर फंसा हुआ है। भारत के लिए यह क्षेत्र रेड लाइन है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर कोई ट्रेड डील भारत से अपने घरेलू उत्पादकों की कीमत पर दाल बाजार खोलने की मांग करता है, तो यह डील संभव नहीं होगी।

    इस विवाद से यह साफ है कि भारत अपनी घरेलू फसलों और किसानों के हितों की सुरक्षा करना चाहता है, जबकि अमेरिका के कृषि-प्रधान राज्य अपने उत्पादकों की रक्षा के लिए दबाव बना रहे हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में ट्रेड डील की दिशा और बातचीत की जटिलता दोनों बढ़ने की संभावना है।

  • ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया बैन को महीनेभर से ज्यादा समय बीता, कितना प्रभावी रहा ये फैसला?

    ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया बैन को महीनेभर से ज्यादा समय बीता, कितना प्रभावी रहा ये फैसला?

    नई दिल्ली।  ऑस्ट्रेलिया अब दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है, जहां 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया गया है। यह कानून 10 दिसंबर से लागू हुआ और अब लगभग एक महीने के बाद इसके शुरुआती असर सामने आए हैं।

    यूरो न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, इस महीने के भीतर सोशल मीडिया कंपनियों ने लगभग 50 लाख नाबालिग अकाउंट हटा दिए हैं। ऑस्ट्रेलिया के इंटरनेट रेगुलेटर ने बताया कि कानून के पालन के लिए 4.7 मिलियन अकाउंट्स हटाए गए हैं।

    ई-सेफ्टी कमिश्नर जूली इनमैन ग्रांट ने कहा कि यह शुरुआती संकेत हैं कि बड़े प्लेटफॉर्म 16 साल से कम उम्र के लोगों को अकाउंट रखने से रोकने के लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं। उन्होंने आगे कहा, “मैं इन शुरुआती नतीजों से बहुत खुश हूं। डिजिटल सुरक्षा की रेगुलेटरी गाइडेंस और प्लेटफॉर्म के साथ जुड़ाव पहले से ही अच्छे नतीजे दे रहा है।”

    इस कानून का उल्लंघन करने पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को 4.95 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना लग सकता है। इनमैन ग्रांट ने माना कि कुछ बच्चे सोशल मीडिया पर बने रहने के लिए क्रिएटिव तरीके निकाल सकते हैं, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि डिजिटल सुरक्षा नियमों का पालन समाज में सुरक्षा और सांस्कृतिक मानदंडों को दोबारा स्थापित करने के लिए जरूरी है।

    डेनमार्क जैसे नॉर्डिक देश भी ऐसे ही कानूनों पर नजर रख रहे हैं। नवंबर में उन्होंने घोषणा की कि 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया एक्सेस ब्लॉक किया जाएगा, जिसे 2026 के मध्य तक कानून का रूप दिया जा सकता है। नॉर्डिक देश उत्तरी यूरोप के पांच संप्रभु राष्ट्रों—डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, आइसलैंड—और उनके स्वायत्त क्षेत्रों का समूह है।

    इस तरह ऑस्ट्रेलिया और नॉर्डिक देशों के कदम यह दिखाते हैं कि डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा को लेकर सरकारें अब कड़े नियम लागू कर रही हैं और तकनीकी प्लेटफॉर्म को जवाबदेह बना रही हैं।

  • ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया बैन: एक महीने में हटे 50 लाख अकाउंट, कितना कारगर रहा फैसला?

    ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया बैन: एक महीने में हटे 50 लाख अकाउंट, कितना कारगर रहा फैसला?


    नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है जहां 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस ऐतिहासिक फैसले को लागू हुए अब एक महीने से अधिक समय बीत चुका है और इसके शुरुआती नतीजे सामने आने लगे हैं। सवाल यह है कि क्या यह सख्त कदम वास्तव में असरदार साबित हो रहा है?

    यूरो न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक कानून लागू होने के पहले ही महीने में सोशल मीडिया कंपनियों ने करीब 50 लाख नाबालिग अकाउंट हटा दिए हैं। ऑस्ट्रेलिया के इंटरनेट रेगुलेटर ने बताया कि 10 दिसंबर से लागू हुए इस कानून के तहत 16 साल से कम उम्र के करीब 4.7 मिलियन अकाउंट विभिन्न प्लेटफॉर्म्स से डिलीट किए गए हैं। इसे डिजिटल सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

    ऑस्ट्रेलिया की ई-सेफ्टी कमिश्नर ने इस संबंध में गुरुवार को आधिकारिक डेटा जारी किया। उन्होंने बताया कि यह आंकड़े इस बात का शुरुआती संकेत हैं कि बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अब नियमों को गंभीरता से लागू कर रहे हैं और नाबालिगों को प्लेटफॉर्म से दूर रखने के लिए ठोस कदम उठा रहे हैं।ई-सेफ्टी कमिश्नर जूली इनमैन ग्रांट ने इन शुरुआती नतीजों पर संतोष जताते हुए कहा “मैं इन आंकड़ों से बहुत खुश हूं। यह साफ है कि डिजिटल सुरक्षा को लेकर दी गई रेगुलेटरी गाइडेंस और प्लेटफॉर्म्स के साथ बेहतर समन्वय अब सकारात्मक नतीजे देने लगा है।” उन्होंने इसे कम्प्लायंस पर पहला सरकारी डेटा बताया।

    हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुछ 16 साल से कम उम्र के अकाउंट अभी भी सक्रिय हैं। उनका कहना था कि जैसे समाज में अन्य सुरक्षा कानूनों के साथ होता है वैसे ही इस कानून की सफलता केवल पूर्ण रोक से नहीं बल्कि नुकसान को कम करने और सामाजिक व्यवहार को बदलने से आंकी जाएगी। उन्होंने माना कि कुछ बच्चे सोशल मीडिया पर बने रहने के लिए “क्रिएटिव तरीके” अपना सकते हैं लेकिन कानून का उद्देश्य एक सुरक्षित डिजिटल संस्कृति तैयार करना है।इन नियमों का उल्लंघन करने पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 4.95 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यही कारण है कि टेक कंपनियां अब उम्र सत्यापन और अकाउंट मॉनिटरिंग को लेकर ज्यादा सख्त रवैया अपना रही हैं।

    ऑस्ट्रेलिया के इस कदम पर अब दुनिया के कई देश नजर बनाए हुए हैं। डेनमार्क समेत अन्य नॉर्डिक देशों ने भी इसी तरह के कानून पर काम शुरू कर दिया है। नॉर्डिक देशों के समूह ने नवंबर में घोषणा की थी कि वे 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया एक्सेस ब्लॉक करने को लेकर एक समझौते पर पहुंचे हैं जिसे 2026 के मध्य तक कानून का रूप दिया जा सकता है।डिजिटल सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया का यह प्रयोग भविष्य में अन्य देशों के लिए एक मॉडल बन सकता है। हालांकि इसकी वास्तविक सफलता का मूल्यांकन लंबे समय में ही संभव होगा जब यह देखा जाएगा कि इससे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल व्यवहार में कितना सकारात्मक बदलाव आता है।