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  • US टैरिफ से तमिलनाडु के उद्योग बेहाल: कोयंबटूर–तिरुपुर में रोजगार और निर्यात को बड़ा झटका

    US टैरिफ से तमिलनाडु के उद्योग बेहाल: कोयंबटूर–तिरुपुर में रोजगार और निर्यात को बड़ा झटका

    नई दिल्ली। कभी भारत के प्रमुख औद्योगिक और निर्यात केंद्रों में गिने जाने वाले तमिलनाडु के कोयंबटूर और तिरुपुर इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए जाने के बाद यहां के कपड़ा और इंजीनियरिंग उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं, काम के घंटे घटाए जा रहे हैं और लाखों कामगारों की रोजी-रोटी संकट में पड़ गई है।

    50% टैरिफ ने बदले हालात

    उद्योग जगत के अनुसार, अगस्त 2025 में अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया था। इसके बाद से ही कोयंबटूर और तिरुपुर के उद्योगों में गिरावट का सिलसिला शुरू हो गया। ये दोनों शहर मिलकर तमिलनाडु समेत कई राज्यों के लाखों लोगों को रोजगार देते थे, लेकिन अब हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।

    दो से तीन लाख नौकरियां जा चुकीं

    उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अब तक कपड़ा और इंजीनियरिंग सेक्टर में दो लाख से ज्यादा नौकरियां जा चुकी हैं। यदि कास्टिंग, पंप, औद्योगिक वाल्व और अन्य सहायक उद्योगों को भी शामिल किया जाए, तो यह आंकड़ा तीन लाख से अधिक हो सकता है। कई छोटी और मझोली इकाइयां पूरी तरह बंद हो चुकी हैं, जबकि कई फैक्ट्रियां सीमित क्षमता पर काम कर रही हैं।

    अमेरिका को निर्यात में भारी गिरावट

    एक निजी मिल में परिधान निर्यात और व्यापार विकास के उपाध्यक्ष धनबालन के अनुसार, पहले कोयंबटूर और तिरुपुर से अमेरिका को हर साल करीब 1.7 अरब डॉलर का कपड़ा निर्यात होता था। लेकिन अब यह आंकड़ा लगभग एक अरब डॉलर घट चुका है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर 50 प्रतिशत टैरिफ जारी रहा, तो अगले एक साल में अमेरिका को कपड़ा निर्यात लगभग पूरी तरह बंद हो सकता है।

    डीडीपी कीमत ने बढ़ाई मुश्किल

    उद्योग जगत का कहना है कि समस्या सिर्फ 50 प्रतिशत टैरिफ तक सीमित नहीं है। इसके साथ अन्य शुल्क भी जोड़े जाते हैं, जिससे डिलीवर ड्यूटी पेड (DDP) कीमत काफी बढ़ जाती है। नतीजतन, अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद बेहद महंगे हो जाते हैं। वहीं चीन और बांग्लादेश जैसे देश करीब 30 प्रतिशत कम लागत में अपने उत्पाद बेच रहे हैं, जिससे भारतीय सामान प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहा है।

    500% टैरिफ की आशंका से बढ़ी चिंता

    स्थिति तब और गंभीर हो गई जब खबरें सामने आईं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने पर विचार कर सकते हैं। इस पर धनबालन ने कहा कि जब 50 प्रतिशत टैरिफ ही उद्योगों को तोड़ रहा है, तो 500 प्रतिशत टैरिफ की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अगर ऐसा हुआ, तो निर्यात और रोजगार दोनों पर विनाशकारी असर पड़ेगा।

    नए बाजारों की तलाश की मांग

    अमेरिकी बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच निर्यातक अब भारत सरकार और उद्योग संगठनों से नए बाजारों पर फोकस करने की मांग कर रहे हैं। उद्योग जगत का सुझाव है कि यूरोपीय संघ और ब्रिटेन को प्राथमिक बाजार बनाया जाए। उनका कहना है कि उद्योगों के अस्तित्व के लिए अब बाजारों में विविधता लाना बेहद जरूरी हो गया है।

    कामगारों का भविष्य अधर में

    वैश्विक व्यापार में बढ़ते तनाव और अमेरिकी टैरिफ नीति के चलते कोयंबटूर और तिरुपुर के लाखों कामगारों का भविष्य इस समय गंभीर संकट में नजर आ रहा है। अगर जल्द कोई ठोस समाधान नहीं निकला, तो यह संकट और गहराने की आशंका है।

  • ईरान से लौटे भारतीयों की कहानी: दिल्ली में परिजनों और यात्रियों ने बताई अनुभव की हकीकत

    ईरान से लौटे भारतीयों की कहानी: दिल्ली में परिजनों और यात्रियों ने बताई अनुभव की हकीकत

    नई दिल्ली। दिल्ली एयरपोर्ट पर ईरान से लौट रहे भारतीय नागरिकों का परिजनों ने उत्साह और राहत के साथ स्वागत किया। बीते कुछ दिनों से ईरान में इंटरनेट बंद होने की खबरों ने परिवारों की चिंता बढ़ा दी थी। हालाँकि, नागरिकों की सुरक्षित वापसी ने सभी के चेहरे पर खुशी और मुस्कान लौटा दी।

    एक परिवार के सदस्य ने आईएएनएस को बताया, “हमारी मां और मौसी तीर्थयात्रा के लिए ईरान गई थीं। पिछले एक हफ्ते से इंटरनेट बंद था, इसलिए उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा था। यह हमारे लिए बहुत चिंता का समय था। अब हम बहुत उत्साहित हैं और उनका इंतजार कर रहे हैं।

    एक अन्य परिजन ने कहा कि उनकी मां 7 जनवरी को ईरान पहुंची थीं। पहले दो दिनों तक उनसे नियमित बातचीत होती रही, लेकिन 8 जनवरी के बाद इंटरनेट बंद हो गया और संपर्क पूरी तरह टूट गया। उन्होंने बताया, “मां ने पहले ही बताया था कि वहां सब सामान्य है। इसके बाद बात नहीं हो सकी, लेकिन अब उनके लौटने की खबर से बहुत राहत मिली है।

    परिवार और सरकार ने मिलकर सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की

    दिल्ली एयरपोर्ट पर एक परिवार अपने पिता और बहन को लेने आया था। उन्होंने कहा, “सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है। हम इसके लिए धन्यवाद देते हैं। हमें खुशी है कि हमारे अपने सुरक्षित वापस आ रहे हैं।

    कुछ परिजन दिल्ली के रहने वाले हैं, जबकि उनके रिश्तेदार उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले से थे, जो तीर्थयात्रा के लिए ईरान गए थे। उन्होंने बताया कि वहां का माहौल थोड़ा तनावपूर्ण जरूर था, लेकिन किसी बड़ी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा।

    एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि उनकी भाभी और उनके गांव के आठ लोग भी सुरक्षित लौट रहे हैं। एयरपोर्ट पर आए एक व्यक्ति ने कहा, “ईरान में व्यवस्थाएं अच्छी थीं। कुछ लोग दंगे और अशांति की बातें फैला रहे थे, लेकिन हमारी मां से बात हुई, उनके मुताबिक वहां सब ठीक था। ईरानी सरकार हालात संभाल रही थी और भारतीय सरकार, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, हमारी बहुत मदद कर रही थी।”

    लौटे नागरिकों का अनुभव और राहत

    ईरान से लौटे एक नागरिक ने बताया, “अब स्थिति सामान्य हो रही है। पहले जैसी नहीं है।
    दूसरे यात्री ने कहा, “फिलहाल हालात स्थिर हैं। इंटरनेट बंद था और अंतरराष्ट्रीय कॉल भी काम नहीं कर रहे थे, जिससे हम डर गए थे। बाद में कॉल की सुविधा बहाल हुई। भारतीय दूतावास और सरकार ने हमारी बहुत मदद की, इसके लिए हम आभारी हैं।

    एक अन्य लौटे नागरिक ने कहा, “हम पूरी तरह सुरक्षित थे। कुछ भी गलत नहीं हुआ। हमने अपनी तरफ से ही वापसी की।

    एक और यात्री ने बताया, “इंटरनेट नियंत्रण के उद्देश्य से बंद किया गया था। कोई असामान्य स्थिति नहीं थी। ऐसी बातें हर देश में होती रहती हैं। पर्यटकों को कोई परेशानी नहीं हुई और सब कुछ सामान्य था।
  • अफगानिस्तान के बाजार से बाहर हुईं पाकिस्तानी दवाएं… भारतीय दवाओं की मांग बढ़ी

    अफगानिस्तान के बाजार से बाहर हुईं पाकिस्तानी दवाएं… भारतीय दवाओं की मांग बढ़ी


    काबूल।
    अफगानिस्तान (Afghanistan) में इन दिनों एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (Social media platform X) पर फजल अफगान नाम के एक अफगान ब्लॉगर (Afghan blogger) की कहानी इस बदलाव की गवाह है। फजल को सिरदर्द के लिए ‘पारोल’ (तुर्की का ब्रांड) खरीदना था जिसकी कीमत 40 अफगानी थी। लेकिन फार्मासिस्ट ने उन्हें भारत में बनी वही दवा महज 10 अफगानी में दे दी। फजल का कहना है कि भारतीय दवा न केवल चार गुना सस्ती थी, बल्कि उसका असर भी बहुत तेज रहा। यह केवल एक व्यक्ति का अनुभव नहीं है, बल्कि पूरे अफगानिस्तान में भारतीय दवाएं अब पाकिस्तानी दवाओं की जगह ले रही हैं।


    क्यों टूटा पाकिस्तान का वर्चस्व?

    दशकों से अफगानिस्तान अपनी बुनियादी चिकित्सा जरूरतों के लिए पाकिस्तान पर निर्भर था। वहां की लगभग 70-80% दवाएं पाकिस्तान से आती थीं। लेकिन अक्टूबर-नवंबर 2025 में दोनों देशों के बीच हुई हिंसक सीमा झड़पों के बाद स्थितियां बदल गईं। अफगानिस्तान के उप प्रधानमंत्री अब्दुल गनी बरादर ने घटिया गुणवत्ता का हवाला देते हुए पाकिस्तानी दवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। अफगान व्यापारियों को भारत, ईरान और मध्य एशिया से विकल्प तलाशने को कहा गया। तोरखम और चमन जैसे प्रमुख सीमा व्यापारिक रास्तों के बंद होने से पाकिस्तान से होने वाली सप्लाई पूरी तरह ठप हो गई।


    संकट के समय का सच्चा साथी भारत

    जब अफगानिस्तान दवाओं की कमी से जूझ रहा था, तब भारत ने मानवीय आधार पर मदद का हाथ बढ़ाया। नवंबर 2025 में भारत ने 73 टन जीवन रक्षक दवाओं की खेप काबुल भेजी। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 108 मिलियन डॉलर की दवाएं भेजी थीं, जबकि 2025 के अंतिम महीनों में ही यह आंकड़ा 100 मिलियन को पार कर गया। भारत केवल दवाएं ही नहीं भेज रहा, बल्कि वहां अस्पतालों का निर्माण भी कर रहा है। काबुल में इंदिरा गांधी चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल (400 बेड) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।


    जाइडस लाइफसाइंसेज का मेगा डील

    भारतीय फार्मा दिग्गज जाइडस लाइफसाइंसेज ने नवंबर 2025 में अफगानिस्तान के ‘रोफी इंटरनेशनल ग्रुप’ के साथ 100 मिलियन डॉलर का समझौता (MoU) किया है। इस समझौते के तहत भारत न केवल दवाएं निर्यात करेगा, बल्कि भविष्य में अफगानिस्तान में ही मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने के लिए तकनीक हस्तांतरण भी करेगा। इससे अफगानिस्तान की आयात पर निर्भरता कम होगी और वहां के लोगों को सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली दवाएं मिल सकेंगी।

  • युद्ध के बाद गाजा के पुनर्निर्माण के लिए US ने की 'बोर्ड ऑफ पीस' की घोषणा, इन्हें मिली बड़ी जिम्मेदारी

    युद्ध के बाद गाजा के पुनर्निर्माण के लिए US ने की 'बोर्ड ऑफ पीस' की घोषणा, इन्हें मिली बड़ी जिम्मेदारी


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने गाजा पट्टी (Gaza Strip) में युद्ध के बाद पुनर्निर्माण, शासन और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक नया अंतरराष्ट्रीय निकाय ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (शांति बोर्ड) (New International Body, ‘Board of Peace’) की स्थापना की घोषणा की है। ट्रंप खुद इस बोर्ड के अध्यक्ष होंगे। वाइट हाउस ने शुक्रवार को इस बोर्ड के संस्थापक कार्यकारी सदस्यों की सूची जारी की, जिसमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनेर और अन्य प्रमुख हस्तियां शामिल हैं।

    यह बोर्ड ट्रंप की 20-सूत्रीय व्यापक योजना का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य इजरायल-हमास संघर्ष को समाप्त करना, गाजा में स्थायी शांति स्थापित करना, पुनर्निर्माण करना और समृद्धि लाना है। योजना के दूसरे चरण में प्रवेश हो चुका है, जिसमें हमास द्वारा शासन छोड़ने, पूर्ण हथियार डालने और एक तकनीकी फिलिस्तीनी प्रशासन की स्थापना शामिल है।

    यह घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब अमेरिकी निगरानी में गाजा को शासित करने वाली फिलिस्तीनी तकनीकी समिति की पहली बैठक शुक्रवार को मिस्र की राजधानी काहिरा में आयोजित की गई। इस समिति के प्रमुख अली शाथ हैं जो गाजा से ताल्लुक रखने वाले इंजीनियर और पूर्व फिलिस्तीनी अथॉरिटी अधिकारी हैं। उन्होंने कहा कि समिति जल्द से जल्द काम शुरू करेगी। उन्होंने माना कि गाजा के पुनर्निर्माण और पुनर्बहाली में लगभग तीन साल का समय लग सकता है। फिलहाल उनकी प्राथमिकता तत्काल जरूरतों पर रहेगी, जिनमें लोगों के लिए अस्थायी और स्थायी आश्रय की व्यवस्था शामिल है। मिस्र के सरकारी चैनल Al-Qahera News को दिए इंटरव्यू में अली शाथ ने कहा- फिलिस्तीनी लोग इस समिति के गठन और कामकाज की लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे थे, ताकि उन्हें इस तबाही से उबारा जा सके।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप गाजा में शासन व्यवस्था संभालने के लिए इस तकनीकी समिति के प्रयासों का समर्थन कर रहे हैं। 10 अक्टूबर को संघर्षविराम लागू होने के बाद इजरायली सेना गाजा के कुछ हिस्सों से पीछे हटी, जिसके चलते हजारों विस्थापित फिलिस्तीनी अपने तबाह हो चुके घरों की ओर लौटे। हालांकि आगे की राह आसान नहीं मानी जा रही है। सबसे बड़ी चुनौतियों में संघर्षविराम की निगरानी के लिए अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल की तैनाती और हमास को निरस्त्र करने जैसी संवेदनशील प्रक्रिया शामिल है।

    ट्रंप की योजना के तहत, गाजा में रोजमर्रा के प्रशासन का काम अली शाथ की तकनीकी समिति करेगी, जबकि उसकी निगरानी ट्रंप के नेतृत्व में बनने वाला एक उच्चस्तरीय ‘बोर्ड ऑफ पीस’ करेगा। फिलहाल इस बोर्ड के सभी सदस्यों की घोषणा नहीं की गई है।


    वाइट हाउस ने घोषित किए बोर्ड के सदस्य

    व्हाइट हाउस के बयान के अनुसार, बोर्ड ऑफ पीस के संस्थापक कार्यकारी बोर्ड में सात सदस्य शामिल हैं:
    अध्यक्ष: डोनाल्ड ट्रंप (अमेरिकी राष्ट्रपति)
    मार्को रुबियो (अमेरिकी विदेश मंत्री)
    जेरेड कुशनेर (ट्रंप के दामाद और पूर्व सलाहकार)
    स्टीव विटकॉफ (मध्य पूर्व के लिए अमेरिकी विशेष दूत)
    सर टोनी ब्लेयर (पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री)
    अजय बंगा (विश्व बैंक के अध्यक्ष)
    मार्क रोवन (अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के सीईओ)
    रॉबर्ट गेब्रियल (अमेरिकी उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार)

    ट्रंप ने इसे कभी भी, कहीं भी गठित सबसे प्रतिष्ठित बोर्ड करार दिया है। बोर्ड के प्रत्येक सदस्य को गाजा की स्थिरता और दीर्घकालिक सफलता के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र सौंपे जाएंगे, जैसे शासन क्षमता निर्माण, क्षेत्रीय संबंध, पुनर्निर्माण, निवेश आकर्षण, बड़े पैमाने पर फंडिंग और पूंजी जुटाना।


    अन्य महत्वपूर्ण नियुक्तियां

    निकोलाय म्लादेनोव (बुल्गारियाई राजनेता और पूर्व यूएन मध्य पूर्व दूत) को गाजा के लिए हाई रिप्रेजेंटेटिव नियुक्त किया गया है, जो बोर्ड की ओर से जमीन पर काम करेंगे। अमेरिकी मेजर जनरल जास्पर जेफर्स को इंटरनेशनल स्टेबलाइजेशन फोर्स (ISF) का कमांडर बनाया गया है, जो सुरक्षा स्थापित करने, शांति बनाए रखने और आतंक-मुक्त वातावरण सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होगा। गाजा में दैनिक प्रशासन के लिए नेशनल कमिटी फॉर द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ गाजा (NCAG) गठित की गई है, जिसके प्रमुख फिलिस्तीनी इंजीनियर और पूर्व मंत्री अली शाथ हैं। यह तकनीकी और गैर-राजनीतिक समिति हमास के स्थान पर सार्वजनिक सेवाएं संचालित करेगी।

    ट्रंप की यह योजना पिछले साल अक्टूबर में शुरू हुई थी, जिसके तहत बचे हुए बंधकों की रिहाई और युद्धविराम हुआ। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने नवंबर 2025 में प्रस्ताव 2803 पारित कर इस योजना और बोर्ड को समर्थन दिया। हालांकि, टोनी ब्लेयर की नियुक्ति विवादास्पद है, क्योंकि इराक युद्ध (2003) में उनकी भूमिका के कारण मध्य पूर्व में वे विभाजनकारी व्यक्तित्व माने जाते हैं। ट्रंप ने पिछले साल अक्टूबर में कहा था कि वे ब्लेयर को पसंद करते हैं, लेकिन उनकी स्वीकार्यता जांचेंगे।

    कई विशेषज्ञों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस बोर्ड को औपनिवेशिक संरचना जैसा बताया है, क्योंकि एक विदेशी नेता (ट्रंप) किसी अन्य क्षेत्र के शासन की निगरानी कर रहा है। फिलिस्तीनी गुटों और हमास की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन योजना के तहत हमास ने शासन छोड़ने पर सहमति जताई है, हालांकि निरस्त्रीकरण पर असहमति बनी हुई है।

  • ट्रंप; बोले- जिसने ग्रीनलैंड डील पर साथ नहीं दिया, उसे भी नहीं छोड़ेंगे

    ट्रंप; बोले- जिसने ग्रीनलैंड डील पर साथ नहीं दिया, उसे भी नहीं छोड़ेंगे

     अमेरिकी राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक स्वास्थ्य कार्यक्रम में ट्रंप ने ग्रीन लैंड के मुद्दे पर मीडिया से बात की। उन्होंने कहा, “अगर वे (यूरोपीय देश) ग्रीनलैंड समझौते का समर्थन नहीं करते हैं, तो मैं उन देशों पर टैरिफ लगा सकता हूं। हमें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड की जरूरत है, उन्हें यह समझना होगा।”

    आपको बता दें, डोनाल्ड ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब यूरोपीय देश लगातार ग्रीनलैंड में अभ्यास के लिए सेना भेजकर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर नाटो देशों के बीच बढ़ते इस तनाव को कम करने के लिए अमेरिकी सांसदोंका एक दल इस समय डेनमार्क में है। यहां पर वह डेनमार्क और ग्रीनलैंड के सांसदों से बातचीत कर रहे हैं।

    ट्रंप की ग्रीन लैंड प्रस्ताव को लेकर यूरोप में विरोध इस तरह बढ़ गया है कि जर्मनी और इटली जैसे देशों ने खुले आम रूस के साथ खुद से बात करने की शुरुआत करने पर सहमति जताई है। फ्रांस सीधे तौर पर ग्रीनलैंड में अपनी सेना को पहले से तैनात किए हुए है। इसके बाद भी राष्ट्रपति मैक्रों ने वहां और सैनिक भेजने की बात कही है।

    गौरतलब है कि ट्रंप लगातार ग्रीनलैंड को कब्जे में लेने की बात कह रहे हैं। ग्रीनलैंड, नाटो (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) का एक अर्ध स्वायत्त क्षेत्र है और ट्रंप ने इस सप्ताह की शुरुआत में कहा था कि आर्कटिक द्वीप पर अमेरिका के नियंत्रण से कम कुछ भी स्वीकार नहीं है।

    उन्होंने शुक्रवार को बिना कोई विस्तृत जानकारी दिए कहा, ‘‘अगर कोई देश ग्रीनलैंड के मुद्दे पर सहमत नहीं होता है, तो मैं उस पर शुल्क लगा सकता हूं। हमें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड की आवश्यकता है।’’

  • डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों के बीच लाइव टीवी पर रोने लगीं ग्रीनलैंड की वित्त मंत्री

    डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों के बीच लाइव टीवी पर रोने लगीं ग्रीनलैंड की वित्त मंत्री

    वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे को धमकियों के बीच हाल ही में ग्रीनलैंड की वित्त मंत्री बेहद भावुक हो गईं। बीते कुछ दिनों में तीव्र दबाव का जिक्र करते हुए लाइव टेलीकास्ट के दौरान एक कार्यक्रम में उनकी आंखों में आंसू आ गए। इस दौरान उन्होंने कहा कि बीते कुछ दिन उनके देश के लिए बेहद मुश्किल रहे हैं। वहीं ट्रंप लगातार अपनी बात पर अड़े हुए हैं और वाइट हाउस ने गुरुवार को भी एक बयान में कहा है कि ग्रीनलैंड को हासिल करना अमेरिका के लिए बेहद जरूरी है।
    ग्रीनलैंड की वित्त मंत्री विवियन मोट्जफेल्ड्ट एक चैनल के साथ इंटरव्यू में इस पर बात कर रही थी।मोट्जफेल्ड्ट ने बातचीत के बाद KNR को बताया, “हम अपने स्तर पर बहुत कड़ी मेहनत कर रहे हैं। मैं आमतौर पर ये शब्द कहना पसंद नहीं करती, लेकिन मैं कहूंगी कि हम बहुत मजबूत हैं। हम अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ दिन, स्वाभाविक रूप से…”
    क्या बोलीं मोट्जफेल्ड्ट?

    इसके बाद मोट्जफेल्ड्ट भावुक हो गईं। उन्होंने किसी तरह अपने आंसू रोके और कहा, “ओह, मैं बहुत भावुक हो रही हूं। मैं दुखी हूं। पिछले कुछ दिन कठिन रहे हैं। हम पर बहुत दबाव है।”

    उन्होंने आगे कहा कि ग्रीनलैंड की सरकार मजबूत है और देश खुद को को सुरक्षित रखने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रहा है।
    ट्रंप अड़े

    इससे पहले वाइट ने गुरुवार को कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के लिए अतिआवश्यक मानते हैं और इसे हासिल करने के लिए बेहद उत्सुक हैं। वाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलीन लेविट ने एक बयान में कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी प्राथमिकता बिल्कुल स्पष्ट कर दी है। वह चाहते हैं कि अमेरिका ग्रीनलैंड को हासिल करे। उनका मानना है कि ऐसा करना हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के सर्वोत्तम हित में है।”
    बैठक रही बेनतीजा

    उनकी इस टिप्पणी से पहले ही अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के अधिकारियों के बीच हुई सीधी बातचीत हुई थी।

    डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोके रासमुसेन ने कहा कि बुधवार को वॉशिंगटन में ग्रीनलैंड के उनके समकक्ष, अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ हुई चर्चा मुख्य मतभेदों को सुलझाए बिना समाप्त हो गई। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच ‘एक मौलिक असहमति’ बनी हुई है। रासमुसेन ने कहा कि हम अमेरिका की स्थिति को बदलने में कामयाब नहीं हुए।
  • पाकिस्तान समर्थक सेना अधिकारी से मिले तारिक रहमान, भारत की सुरक्षा के लिए नुकसान

    पाकिस्तान समर्थक सेना अधिकारी से मिले तारिक रहमान, भारत की सुरक्षा के लिए नुकसान

    पाकिस्तान समर्थक सेना अधिकारी से मिले तारिक रहमान, भारत की सुरक्षा के लिए नुकसान
    ढाका। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के अंतरिम अध्यक्ष तारिक रहमान ने पूर्व बांग्लादेश आर्मी अधिकारी और भारत-विरोधी ब्रिगेडियर जनरल अमन आजमी से मुलाकात की। अमन आजमी विवादास्पद जमात नेता गुलाम आजम के बेटे हैं, जिससे बीएनपी के चुनाव के बाद के लक्ष्यों पर सवाल उठ रहे हैं। बुधवार शाम ढाका में यह मुलाकात हुई। इससे बीएनपी के पाकिस्तान और उसकी जासूसी एजेंसी ISI के साथ भविष्य के संबंधों पर संदेह पैदा होता है। सूत्रों के अनुसार, ऐसे कदम भारत की सुरक्षा चिंताओं के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं।

    तारिक रहमान ने हाल ही में अपनी नई छवि में भारत के प्रति स्वागत योग्य दिखाई है, जो यह संकेत देता है कि अगर उन्हें प्रधानमंत्री चुना जाता है तो वे सामान्य साझेदारी स्थापित करने के लिए इच्छुक हैं। हालांकि, जानकार कहते हैं कि उनके पुराने आईएसआई और जमात-ए-इस्लामी से संबंध फिर से उभर सकते हैं। रहमान के भविष्य के कदमों पर नजर रखने की जरूरत है क्योंकि जमात किसी भविष्य की सरकार में शामिल होने के लिए उतावली दिख रही है।
    अमन आजमी के पिता कौन थे

    गुलाम आजम 1971 के मुक्ति युद्ध के दौरान बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी पार्टी के प्रमुख नेता थे। उन्होंने बांग्लादेश की स्वतंत्रता का सक्रिय रूप से विरोध किया और पाकिस्तानी सेना के साथ सहयोग किया। उन्होंने प्रो-पाकिस्तान पीस कमेटियों का गठन और नेतृत्व किया, जो रजाकारों, अल-बद्र और अल-शम्स जैसे क्रूर अर्धसैनिक समूहों के लिए भर्ती करते थे। ये समूह युद्ध अपराधों, नरसंहार और बुद्धिजीवियों की हत्या के लिए जिम्मेदार थे।

    बाद में गुलाम आजम के खिलाफ बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत में मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए मुकदमा चलाया गया और दोषी ठहराया गया। आजम को 90 साल की सजा सुनाई गई, लेकिन 2013 में 91 साल की उम्र के कारण उन्हें मृत्युदंड से छूट दी गई। 2014 में उनकी मृत्यु हो गई। अमन आजमी शेख हसीना के शासन के अंतिम चरण में गुमनाम रहे, लेकिन उनके हटाए जाने के तुरंत बाद वे फिर से सक्रिय हो गए। रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2024 से उन्होंने कई सीनियर आर्मी अधिकारियों के खिलाफ अपहरण और हत्याओं में शामिल होने के आरोप लगाने में अहम भूमिका निभाई।
    ………..
    सऊदी अरब ने अमेरिकी ऐक्शन का किया स्वागत, मुस्लिम ब्रदरहुड की शाखाएं आतंकवादी संगठन घोषित
    रियाद । सऊदी अरब ने अमेरिका के उस फैसले का स्वागत किया है, जिसमें मुस्लिम ब्रदरहुड की मिस्र, जॉर्डन और लेबनान की शाखाओं को आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है। सऊदी विदेश मंत्रालय ने बुधवार को जारी बयान में कहा कि यह कदम उग्रवाद और आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को मजबूत करता है तथा क्षेत्रीय सुरक्षा, स्थिरता और अरब देशों की समृद्धि को बढ़ावा देता है।

    अमेरिकी ट्रेजरी और स्टेट डिपार्टमेंट ने 13 जनवरी 2026 को यह घोषणा की थी। अमेरिका ने मिस्र और जॉर्डन की मुस्लिम ब्रदरहुड शाखाओं को ‘स्पेशली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट’ और लेबनान की शाखा (अल-जमाआ अल-इस्लामिया) को ‘फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन’ घोषित किया। अमेरिका का आरोप है कि ये शाखाएं हमास को समर्थन देती हैं, आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हैं, हथियार बनाती हैं (जैसे रॉकेट और ड्रोन), लड़ाकों की भर्ती करती हैं और क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डालती हैं। यह फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नवंबर 2025 में जारी कार्यकारी आदेश पर आधारित है, जिसके तहत मुस्लिम ब्रदरहुड की कुछ शाखाओं को निशाना बनाया गया।

    सऊदी विदेश मंत्रालय ने बयान में कहा- सऊदी अरब का विदेश मंत्रालय अमेरिका द्वारा मिस्र, जॉर्डन और लेबनान में मुस्लिम ब्रदरहुड की शाखाओं को आतंकवादी समूह घोषित करने का स्वागत करता है। मंत्रालय ने जोर दिया कि सऊदी अरब उग्रवाद और आतंकवाद की सभी रूपों की निंदा करता है तथा अरब देशों, क्षेत्र और विश्व की सुरक्षा, स्थिरता एवं समृद्धि के लिए हर संभव सहयोग का समर्थन करता है।

    यह कदम मध्य पूर्व में मुस्लिम ब्रदरहुड के प्रति विभाजित रुख को दर्शाता है। मिस्र ने 2013 से, सऊदी अरब, यूएई और बहरीन ने इसे आतंकवादी संगठन घोषित किया हुआ है, जबकि कतर और तुर्की जैसे देशों में इसका प्रभाव अधिक है। मिस्र ने भी इस अमेरिकी फैसले का स्वागत किया और इसे उग्र विचारधारा पर मजबूत प्रहार बताया। मुस्लिम ब्रदरहुड की मिस्र शाखा ने इस फैसले को खारिज किया और कहा कि यह बिना किसी ठोस सबूत के लिया गया है।

  • ईरान छोड़ ट्रंप का नया टारगेट, अब इस देश पर अमेरिका का निशाना

    ईरान छोड़ ट्रंप का नया टारगेट, अब इस देश पर अमेरिका का निशाना


    वाशिंगटन । इस समय पूरी दुनिया की नजरें मिडिल ईस्ट पर टिकी हुई हैं। ईरान में जारी विरोध-प्रदर्शनों और तेहरान पर संभावित हमले की अटकलों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना फोकस बदल दिया है। अब उनकी नजरें सात समंदर पार नहीं, बल्कि पड़ोसी देश मैक्सिको पर हैं, जहां ड्रग कार्टेलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात हो रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन मैक्सिको पर दबाव डाल रहा है कि वह अमेरिकी सेना को अपनी सीमा में प्रवेश की अनुमति दे।

    दरअसल, अमेरिका मैक्सिको में मादक पदार्थों (खासकर फेंटानिल) के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों में अपनी सेना को शामिल करने की मांग कर रहा है। दूसरी तरफ मैक्सिको की सरकार विदेशी सैन्य हस्तक्षेप को सिरे से नकार रही है। अमेरिकी अधिकारी विशेष अभियान दलों के सैनिकों या सीआईए अधिकारियों को मैक्सिकन सैनिकों के साथ मिलकर ऑपरेशन चलाने की मंजूरी मांग रहे हैं।

    न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका मैक्सिको की धरती पर फेंटानिल की प्रयोगशालाओं को नष्ट करने के मकसद से चलाए जा रहे अभियानों में अमेरिकी सैन्य बलों की भागीदारी के लिए मैक्सिको से मंजूरी हासिल करने के प्रयास तेज कर रहा है। अमेरिकी अधिकारी चाहते हैं कि संदिग्ध फेंटानिल उत्पादन स्थलों पर छापेमारी के दौरान मैक्सिकन सैनिकों के साथ विशेष अभियान दल के सैनिक या सीआईए अधिकारी शामिल हों। यह अनुरोध दोनों देशों के बीच फेंटानिल संकट को लेकर हुई उच्च-स्तरीय सुरक्षा वार्ताओं के बाद आया है।

    बता दें कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी के तुरंत बाद ट्रंप ने मैक्सिको को चेतावनी दी थी कि वह अगला निशाना बन सकता है। उन्होंने कहा था कि अब हम ड्रग तस्करों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने जा रहे हैं। मैक्सिको पर ड्रग तस्करों का कब्जा है। उस देश की हालत देखना बेहद दुखद है, लेकिन ड्रग तस्करों का ही राज है और वे हर साल हमारे देश में 2.5 लाख से 3 लाख लोगों की जान ले रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया था कि अमेरिका इन ड्रग कार्टेलों से निपटने के लिए मैक्सिको में जमीनी ठिकानों पर हमला कर सकता है।

    इन धमकियों के बावजूद मैक्सिकन राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम ने अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के विचार को पूरी तरह खारिज कर दिया है। उन्होंने ट्रंप के साथ सुरक्षा और मादक पदार्थों की तस्करी को लेकर हुई ‘अच्छी बातचीत’ के बाद अपना विरोध दोहराया है। शीनबाम ने पहले भी ट्रंप की ओर से सैन्य कार्रवाई के प्रस्तावों को ठुकरा दिया था और मैक्सिकन ड्रग कार्टेलों के खिलाफ प्रयासों में विदेशी सैन्य भागीदारी से लगातार इनकार किया है।

  • अमेरिका ने 75 देशों के लिए सस्पेंड किया वीजा, पाकिस्तान ने तोड़ी चुप्‍पी – हम US के साथ…

    अमेरिका ने 75 देशों के लिए सस्पेंड किया वीजा, पाकिस्तान ने तोड़ी चुप्‍पी – हम US के साथ…

    वाशिंगटन। अमेरिका ने पाकिस्तान समेत 75 देशों को बड़ा झटका दिया है। उसने 21 जनवरी से इन देशों के लिए इमिग्रेशन वीजा को सस्पेंड करने का फैसला लिया है। ट्रंप सरकार का यह फैसला पाकिस्तानियों के लिए किसी बेइज्जती से कम नहीं है, क्योंकि पिछले कुछ समय में पाकिस्तान और अमेरिका की करीबी बढ़ी है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी पीएम शहबाज शरीफ, सेना प्रमुख आसिम मुनीर व्हाइट हाउस का दौरा कर चुके हैं, जहां ट्रंप ने उनकी जमकर तारीफ भी की थी। ऐसे में अब उसे वीजा बैन वाले 75 देशों की लिस्ट में डालना पाकिस्तान को उसकी हैसियत दिखाने जैसा है।

    इस मामले पर पाकिस्तान ने गुरुवार को चुप्पी तोड़ी है। उसने नपे-तुले अंदाज में कहा है कि हम अमेरिका के साथ संपर्क में है।

    पाकिस्तान ने कहा कि वह अमेरिकी अधिकारियों के संपर्क में है और उम्मीद है कि वॉशिंगटन द्वारा अपने इमिग्रेशन सिस्टम की अंदरूनी समीक्षा पूरी करने के बाद रूटीन वीजा प्रोसेसिंग फिर से शुरू हो जाएगी। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का कहना है कि उसने इस घोषणा पर ध्यान दिया है और इस कदम के दायरे और अवधि के बारे में स्पष्टीकरण के लिए अमेरिकी अधिकारियों से संपर्क में है।

    पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा, “हम और जानकारी हासिल करने के लिए अमेरिकी अधिकारियों के संपर्क में हैं। यह एक बदलती हुई खबर है जिस पर हम नजर रख रहे हैं। हम समझते हैं कि यह अमेरिकी इमिग्रेशन नीतियों और सिस्टम की समीक्षा की एक आंतरिक प्रक्रिया है।” प्रवक्ता ने आगे कहा कि पाकिस्तान इस घटनाक्रम को अमेरिका की आंतरिक नीति समीक्षा का हिस्सा मानता है और उम्मीद जताई कि समीक्षा पूरी होने के बाद सामान्य वीजा प्रोसेसिंग फिर से शुरू हो जाएगी।

    पाकिस्तान के साथ-साथ बांग्लादेश को भी झटका

    75 देशों के नागरिकों के लिए वीजा जारी करने की प्रक्रिया रोकने वाले अमेरिकी फैसले से सिर्फ पाकिस्तान को ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश को भी झटका लगा है। दरअसल, इस लिस्ट में बांग्लादेश भी शामिल है। यह कदम ऐसे प्रवासियों पर नकेल कसने के प्रयासों का हिस्सा है जो सरकार पर बोझ बन सकते हैं। अमेरिका के विदेश विभाग ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘अमेरिकी विदेश विभाग उन 75 देशों के लिए आप्रवासी वीजा जारी नहीं करेगा जिनके प्रवासी अमेरिकी जनता की कल्याणकारी योजनाओं का दुरुपयोग करते हैं। यह प्रतिबंध तब तक लागू रहेगा जब तक अमेरिका यह सुनिश्चित नहीं कर लेता कि नए आप्रवासी अमेरिकी जनता से धन संसाधन का दोहन नहीं करेंगे।”

  • अब पुरुष भी हो सकते हैं प्रेग्नेंट! अमेरिका में भारतीय मूल की डॉक्टर का बड़ा बयान

    अब पुरुष भी हो सकते हैं प्रेग्नेंट! अमेरिका में भारतीय मूल की डॉक्टर का बड़ा बयान

    वाशिंगटन। अमेरिका में सीनेटर के सामने गर्भपात संबंधी दवाओं को लेकर चल रही बहस में पुरुषों के गर्भवती होने की संभावना पर चर्चा की गई। रिपब्लिकन सीनेटर हॉली ने भारतीय मूल की डॉक्टर से सवाल पूछा कि क्या जैविक पुरुष गर्भधारण कर सकते हैं?

    क्या एक पुरुष गर्भवती हो सकता है? इस सवाल को लेकर एक अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर और भारतीय मूल की डॉक्टर के बीच में जमकर बहस हो गई। यह पूरा मामला डर्कसेन सीनेट कार्यालय में सामने आया,जहां पर गर्भपात संबंधी परेशानियों और सरकार द्वारा गर्भपात की दवाओं पर लगाए जा रहे प्रतिबंध के विरोध कर रही समिति की सुनवाई चल रही थी। इसमें सीनेटर्स के सामने भारतीय मूल की अमेरिकी डॉक्टर निशा वर्मा थी, जबकि मुख्य सवाल रिपब्लिकन सीनेटर जोश हॉली पूछ रहे थे।

    प्रजनन स्वास्थ्य को लेकर चल रही इस बहस की शुरुआत हुई। डॉक्टर वर्मा ने कहा कि गर्भपात से संबंधी दवाओं का पर लगाया गया प्रतिबंध गलत है। 100 से अधिक डीप रिसर्च ऐसी हुई हैं, जिनमें इन्हें सुरक्षित माना गया है। इस पर रिपब्लिकन सीनेटर एशले मूडी ने डॉक्टर वर्मा से सवाल पूछा कि क्या पुरुष गर्भवती हो सकते हैं? डॉक्टर ने इसके जवाब से बचती नजर आई।

    इसके बाद रिपब्लिकन सीनेटर हॉली ने माइक अपनी ओर लेते हुए कहा, “एशले ने यह मुद्दा उठाया है, तो चलिए यहीं से शुरू करते हैं। डॉक्टर वर्मा, क्या आपको लगता है, कि पुरुष गर्भवती हो सकते हैं?”

    डॉक्टर वर्मा ने कहा, “मैं विभिन्न पहचान वाले मरीजों का इलाज करती हूं, मैं कई महिलाओं का इलाज करती हूं, मैं विभिन्न पहचान वाले लोगों का इलाज करती हूं।”

    इस पर उन्हें बीच में टोकते हुए हॉली ने कहा, “अच्छा, लक्ष्य तो सच्चाई जानना है, तो क्या पुरुष गर्भवती हो सकते हैं?” हॉली ने फिर पूछा। डॉ वर्मा ने कहा, “मुझे ठीक से नहीं पता कि प्रश्न का उद्देश्य क्या है।” इससे पहले कि हॉली ने उन्हें बीच में ही रोक दिया और कहा कि उद्देश्य जैविक वास्तविकता स्थापित करना है।

    हॉली बार-बार उन्हें इस सवाल का जवाब हां या ना में देने के लिए कहते रहे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। बाद में डॉक्टर वर्मा ने कहा कि वह उस सवाल के जवाब में इसलिए हिचकिचाई क्योंकि उन्हें नहीं पता था, कि इस सवाल का क्या उद्देश्य क्या है।

    हालांकि, डॉक्टर वर्मा के इस टालमटोल वाले जवाब के बाद सीनेटर ने और सख्त होते हुए कहा, “कई लोग, बेवसाइट्स आपको विशेषज्ञ कहती हैं। आप एक डॉक्टर हैं और आप विज्ञान और प्रमाणों का पालन करती हैं। मैं केवल प्रमाणों के आधार पर जानना चाहता हूं। क्या पुरुष गर्भवती हो सकते हैं? यह हां या ना का प्रश्न है।”

    वर्मा ने फिर भी सीधा जवाब देने से इनकार कर दिया और कहा, “मुझे आपसे ध्रुवीकरण की भावना से रहित बातचीत करने में खुशी होगी।” इसके बाद, हॉली ने फिर से दोहराया कि केवल एक जैविक पुरुष और एक जैविक महिला होती है, और केवल महिला ही गर्भवती हो सकती है।

    हॉली ने डॉक्टर पर तीखा हमला करते हुए कहा, “मुझे लगता है कि यह असाधारण है कि हम विज्ञान और महिलाओं के बारे में सुनवाई में हैं। रिकॉर्ड के लिए, महिलाएं गर्भवती होती हैं, पुरुष नहीं। आप इस बुनियादी सच्चाई को भी नहीं मानती कि जैविक रूप से पुरुष गर्भवती नहीं होते। जैविक रूप से पुरुष और महिला में अंतर होता है। मुझे नहीं पता कि हम आपको और विज्ञान के जानकार होने के आपके दावों को कैसे गंभीरता से ले सकते हैं।”

    वर्मा ने अपने दृष्टिकोण का बचाव करते हुए कहा, “मैं विज्ञान की जानकार हूं, मैं यहां मरीजों के जटिल अनुभवों का प्रतिनिधित्व करने के लिए भी हूं। मुझे नहीं लगता कि बात घुमाने वाली भाषा या प्रश्न इस उद्देश्य को पूरा करते हैं।”

    जवाब में हॉली ने कहा, “यह कहना बात घुमाना नहीं है कि पुरुषों और महिलाओं के बीच वैज्ञानिक अंतर है। यह कहना ध्रुवीकरण नहीं है कि महिलाएं एक जैविक वास्तविकता हैं और उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए और उन्हें उसी रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए। महिलाओं को महिला और पुरुषों को पुरुष के रूप में मान्यता देने से आपका इनकार विज्ञान, जनविश्वास और महिलाओं के लिए संवैधानिक सुरक्षा के लिए गहरा हानिकारक है।”

    दरअसल, यह पूरा मामला रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक राजनीति से प्रेरित था। रिपब्लिकन पार्टी शुरुआत से ही गर्भपात और समलैंगिकता के खिलाफ आवाज उठाती रही है। वर्तमान में अमेरिका में उन्हीं की सरकार है, ऐसे में गर्भपात संबंधी नियम भी कड़े हो गए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप समेत उनके कई साथी खुले आम समलैंगिकों और गर्भपात को लेकर अपने विचार साझा कर चुके हैं।