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  • ट्रंप का दावा, ईरान में मैंने रूकवा दी 800 प्रदर्शनकारियों को फांसी की सजा

    ट्रंप का दावा, ईरान में मैंने रूकवा दी 800 प्रदर्शनकारियों को फांसी की सजा

    वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर जंग शुरू होने की आशंका के बीच गुरुवार को स्थिति थोड़ी बेहतर होती दिखी। जहां अमेरिका ने खाड़ी देशों में अपने अड्डों पर अलर्ट लेवल कम कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों में भी नरमी देखने को मिली। इस बीच अमेरिका ने शुक्रवार को ईरान में खामेनेई शासन को लेकर बड़ा दावा किया है। वाइट हाउस के मुताबिक ईरान गुरुवार को 800 प्रदर्शनकारियों को फांसी पर लटकाने वाला था। वाइट हाउस ने कहा है कि ट्रंप के दबाव के बाद ईरान ने इन फांसी की सजाओं पर रोक लगा दी है। इससे पहले ट्रंप ने भी बुधवार को कहा था कि उन्हें बेहद महत्वपूर्ण सूत्रों से आश्वासन मिला है कि ईरान अब प्रदर्शनकारियों की फांसी की सजा को आगे नहीं बढ़ाएगा।
    वाइट हाउस ने क्या कहा?
    हालांकि अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई का इशारा देते हुए यह भी कहा है कि उसके पास अब भी सभी विकल्प खुले हैं। वाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने एक बयान में कहा, “राष्ट्रपति को आज पता चला कि 800 फांसी की सजा जो कल होने वाली थी, उसे रोक दिया गया है।” उन्होंने कहा कि ट्रंप ने तेहरान को चेतावनी दी थी कि अगर प्रदर्शनकारियों की हत्या जारी रही तो गंभीर परिणाम होंगे और इसलिए ईरान ने फांसी रोक दी है।
    ईरान पर नए अमेरिकी प्रतिबंध

    वहीं अमेरिका ने ईरान में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित हिंसक कार्रवाई करने और विदेशी बाजारों में तेल की बिक्री से होने वाली कमाई की हेराफेरी करने के आरोप में कई ईरानी व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ नए प्रतिबंधों की घोषणा की है। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने एक संदेश में इन प्रतिबंधों की घोषणा करते हुए कहा कि अमेरिका ईरान के लोगों के साथ खड़ा है। उन्होंने कहा, “राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के लोगों के साथ खड़े हैं। उन्होंने नए प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया है।

    ईरान के नेताओं ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का जवाब सड़कों पर सामूहिक गोलीबारी से लेकर अस्पतालों और घायल पीड़ितों पर हमलों जैसी क्रूर हिंसा से दिया है।”

    बेसेंट ने बताया कि वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय की ओर से 18 व्यक्तियों और संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरानी शासन इन संस्थाओं का उपयोग तेल पर लगे प्रतिबंधों से बचने और इससे होने वाली आय को ईरानी जनता की हित के बजाय कहीं और करता है। प्रतिबंधों की सूची में ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी का नाम भी शामिल है।

    इससे पहले ईरान की इस्लामिक सत्ता को चुनौती देने वाले देशव्यापी विरोध प्रदर्शन गुरुवार को धीरे-धीरे शांत होते नजर आए। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस दौरान ईरान की कार्रवाई में कम से कम 3,428 लोग मारे जा चुके हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक असली आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है।

  • ईरान का हवाई क्षेत्र दुनिया की एयरलाइंस के लिए इतना जरूरी क्यों?

    ईरान का हवाई क्षेत्र दुनिया की एयरलाइंस के लिए इतना जरूरी क्यों?

    तेहरान। ईरान में जारी अशांति के बीच गुरुवार को ईरानी हवाई क्षेत्र को पांच घंटे तक बंद रहने के बाद फिर से खोल दिया गया है। एयरस्पेस अचानक बंद करने का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया, लेकिन इसे अमेरिकी हमले से पहले सतर्कता के तौर पर देखा जा रहा है। हवाई क्षेत्र बंद होते ही दुनिया भर की एयरलाइंस को अपनी उड़ानों के रास्ते बदलने पड़े। हालांकि यह रोक सिर्फ कमर्शियल फ्लाइट्स पर लागू थी।

    गौरतलब है कि देशव्यापी प्रदर्शनों पर सख्त कार्रवाई और अमेरिका की ओर से सैन्य हस्तक्षेप की चेतावनियों के बाद ईरान में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। कुछ रिपोर्ट्स में अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि अमेरिका जल्द ही सैन्य कार्रवाई कर सकता है। पिछले साल जून में भी ईरान ने इजरायल के साथ 12 दिन तक चले संघर्ष के दौरान अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया था।
    भारतीय एयरलाइंस पर भी असर

    ईरान के हवाई क्षेत्र बंद होने से भारतीय एयरलाइंस भी प्रभावित हुईं। इंडिगो ने एक बयान जारी कर बताया कि कुछ अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर असर पड़ा है। वहीं एयर इंडिया ने बताया कि उसकी फ्लाइट्स वैकल्पिक रूट से उड़ान भर रही हैं, जिससे देरी या कुछ मामलों में रद्द होने की आशंका है। दोनों एयरलाइंस यूरोप और एशिया को जोड़ने वाले इसी अहम ईस्ट-वेस्ट रूट पर बड़ी संख्या में उड़ानें संचालित करती हैं। ऐसे में अगर ईरान ने दोबारा हवाई क्षेत्र बंद किया, तो उनके अंतरराष्ट्रीय ऑपरेशंस पर बड़ा असर पड़ सकता है।
    अन्य देशों और एयरलाइंस की चेतावनी

    बुधवार को जर्मनी ने अपनी एयरलाइंस को ईरानी हवाई क्षेत्र से बचने की नई एडवाइजरी जारी की। इससे पहले लुफ्थांसा ने भी मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव को देखते हुए अपनी उड़ानों में बदलाव किया था। अमेरिका पहले से ही अपनी सभी कमर्शियल उड़ानों को ईरान के ऊपर से उड़ने की इजाजत नहीं देता और दोनों देशों के बीच कोई सीधी उड़ान नहीं है। फ्लाईदुबई और तुर्कीश एयरलाइंस जैसी कंपनियों ने भी पिछले एक हफ्ते में ईरान के लिए कई उड़ानें रद्द की हैं।
    ईरान का हवाई क्षेत्र क्यों है इतना जरूरी

    ईरान का हवाई क्षेत्र अंतरमहाद्वीपीय उड़ानों के लिए बेहद अहम माना जाता है। यह यूरोप और एशिया को जोड़ने वाले प्रमुख ईस्ट-वेस्ट रूट पर स्थित है। यूरोप से दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया जाने वाली उड़ानों के लिए यह सबसे सीधा और कम दूरी वाला रास्ता है। इस रूट का इस्तेमाल करने से एयरलाइंस को समय और ईंधन दोनों की बचत होती है। अगर ईरान के ऊपर से उड़ान की इजाजत नहीं मिलती है, तो विमानों को उत्तर या दक्षिण की ओर लंबा चक्कर लगाना पड़ता है, जिससे उड़ान का समय कई घंटे बढ़ जाता है और लागत भी काफी ज्यादा हो जाती है।
    एक पुरानी गलती

    ईरान के हवाई क्षेत्र को लेकर चिंता की एक बड़ी वजह उसकी एक पुरानी गलती भी है। 2020 में ईरानी एयर डिफेंस ने यूक्रेन इंटरनेशनल एयरलाइंस की फ्लाइट PS752 को दुश्मन का विमान समझकर दो मिसाइलें दाग दी थीं। इस हादसे में विमान में सवार सभी 176 लोगों की मौत हो गई थी। ईरान ने कई दिनों तक विमान को गिराने के आरोपों को सिरे से खारिज किया, लेकिन अंत में इसे स्वीकार कर लिया।

  • ईरान पर हुआ हमला तो मुस्लिम देशों के टारगेट पर होंगे US मिलिट्री बेस?

    ईरान पर हुआ हमला तो मुस्लिम देशों के टारगेट पर होंगे US मिलिट्री बेस?


    तेहरान। ईरान और अमेरिका में तनातनी चरम पर पहुंच गई है। आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका ईरान पर कभी भी सैन्य हमला कर सकता है। यही वजह है कि भारत समेत दुनिया भर के देशों ने अपने-अपने नागरिकों से तुरंत ईरान छोड़ने को कहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस तनातनी को तब और बढ़ा दिया, जब उन्होंने ईरान में प्रदर्शनकारियों से अपना आंदोलन तेज करने का आह्वान किया और कहा कि मदद पहुंच रही है। इस बीच, ईरान ने धमकी दी है कि अगर अमेरिका ने हमला किया वह चुप नहीं बैठेगा और मध्य-पूर्व में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर जवाही हमला करेगा।
    शायद यही वजह है कि अमेरिका ने मध्य-पूर्व में स्थित अपने मिलिट्री बेस से सैनिकों और कर्मियों को वापस बुलाने का फैसला किया है। ईरान ने अमेरिकी हमलों की आशंकाओं के मद्देनजर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर और तुर्की समेत मिडिल ईस्ट के कई देशों को चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो वह उनके देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाएगा।
    दुनिया भर में अमेरिका के सैन्य अड्डे: कहां, क्यों और कितने अहम?
    दुनिया भर में अमेरिका के सैन्य ठिकाने दो तरह हैं। पहला एयर बेस, जहां लड़ाकू विमान रखे जाते हैं और वहां से संचालित किए जाते हैं, और दूसरा नेवल बेस होते हैं, जहां युद्धपोत और नौसैनिक जहाज़ तैनात रहते हैं। जुलाई 2024 तक, अमेरिका के पास दूसरे देशों में कम से कम 128 सैन्य अड्डे हैं। इनमें सबसे बड़ा विदेशी अड्डा दक्षिण कोरिया का कैंप हम्फ्रीज़ है, जो क्षेत्रफल के लिहाज़ से अमेरिका का सबसे बड़ा ओवरसीज़ बेस माना जाता है। ब्राउन यूनिवर्सिटी के वॉटसन इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, 2001 के बाद 19 से 30 लाख अमेरिकी सैनिकों ने अफगानिस्तान और इराक युद्धों में सेवा दी इनमें से आधे से ज़्यादा सैनिक एक से अधिक बार इन युद्ध क्षेत्रों में भेजे गए।
    मिडिल-ईस्ट में कहां-कहां अमेरिकी सैन्य अड्डे?
    मध्य-पूर्व के करीब आधा दर्जन मुस्लिम देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। इनमें सउदी अरब, कतर, UAE, बहरीन, तुर्की, इराक और जॉर्डन शामिल हैं। ये अमेरिकी सैन्य अड्डे मध्य-पूर्व और पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखते हैं। आतंकवाद विरोधी अभियानों में अहम भूमिका निभाते हैं और ईरान, रूस और चीन जैसे देशों पर रणनीतिक दबाव बनाए रखते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक मिडिल ईस्ट में अमेरिका के कुल 19 मिलिट्री बेस हैं। इनमें से हरेक सैन्य अड्डों पर करीब 40 से 50 हजार सैनिक तैनात हैं।

    बहरीन: बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े (Fifth Fleet) का मुख्यालय है। यह बेड़ा खाड़ी क्षेत्रों खासकर लाल सागर, अरब सागर और हिंद महासागर के कुछ हिस्सों में नौसैनिक सुरक्षा और सैन्य अभियानों की निगरानी करता है। समुद्री रक्षा में यह बेड़ा काफी अहम माना जाता है।

    कतर: कतर की राजधानी दोहा के पास अल उदैद एयर बेस है, जो रेगिस्तान में 24 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह ईरान से करीब 190 KM की दूरी पर फारस की खाड़ी के किनारे स्थित है। यहां करीब 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड का मुख्यालय है। यह कमांड मिस्र से कजाकिस्तान तक के बड़े क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अभियानों को संभालता है। पिछले साल जब अमेरिका ने ईरान के परमाणु सुविधा ठिकानों पर हमले किए थे तब ईरान ने कतर में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था। इस वजह से कतर पहले से ही सचेत है और अमेरिका पर हमले नहीं करने का दबाव बना रहा है।

    कुवैत: कुवैत में कई अमेरिकी सैन्य बेस हैं। कैंप आरिफजान यूएस आर्मी सेंट्रल कमांड का मुख्यालय है। वहां अली अल सलेम एयर बेस भी है, जो इराक सीमा से 40 किमी दूर, अलग-थलग और कठिन इलाके में स्थित है। कुवैत में ही कैंप ब्यूहरिंग सैन्य अड्डा भी है। 2003 के इराक युद्ध के दौरान ये अड्डा बना था। यह इराक और सीरिया भेजे जाने वाले सैनिकों का ट्रांज़िट बेस है।

    संयुक्त अरब अमीरात: UAE की राजधानी अबू धाबी के पास अल धफरा एयर बेस है, जो यूएई वायुसेना के साथ साझेदारी में है यहां से ISR और ड्रोन ऑपरेशंस किए जाते हैं। ISIS के खिलाफ अभियानों और क्षेत्रीय निगरानी में यह अड्डा अहम भूमिका निभाता रहा है। दुबई के जिबेल अली पोर्ट औपचारिक बेस नहीं है लेकिन पश्चिम एशिया में अमेरिकी नौसेना का सबसे बड़ा पोर्ट ऑफ कॉल है। यहां अक्सर अमेरिकी विमानवाहक पोत और युद्धपोत आते हैं

    इराक: पश्चिमी इराक के अनबार प्रांत में ऐन अल असद एयर बेस है। यह इराकी सुरक्षा बलों और नाटो मिशन को समर्थन देता है। 2020 में जनरल कासेम सुलेमानी की मौत का बदला लेने के लिए ईरान ने इस पर मिसाइल हमला किया था। इसके अलावा उत्तरी इराक के कुर्द क्षेत्र में एरबिल एयर बेस इराक में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है। यह अमेरिकी और सहयोगी देशों के प्रशिक्षण का केंद्र है। यह खुफिया जानकारी, लॉजिस्टिक्स और सैन्य योजना का अहम ठिकाना है।
    सऊदी अरब: सऊदी अरब के रियाद के दक्षिण में 60 किलोमीटर की दूरी पर प्रिंस सुल्तान एयर बेस है। यह क्षेत्र में हवाई और मिसाइल रक्षा अभियानों का समर्थन करता है। यहां पैट्रियट और THAAD जैसे उन्नत रक्षा सिस्टम तैनात हैं। सऊदी अरब में 2024 तक 2,321 अमेरिकी सैनिक मौजूद थे। क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए सऊदी सेना के साथ अमेरिकी सेना समन्वय कर ऑपरेशन करती है।

    जॉर्डन: जॉर्डन की राजधानी अम्मान से लगभग 100 किमी दूर अज़्राक में मुवाफ़क़ अल सल्टी एयर बेस है। यहां अमेरिकी वायुसेना की 332वीं एयर एक्सपेडिशनरी विंग तैनात है। यह सीरिया, लेबनान, इज़राइल, जॉर्डन और इराक क्षेत्र में निगरानी, हवाई अभियान और सैन्य समन्वय करती है।

    तुर्की: तुर्की और अमेरिका मिलकर दक्षिणी अदाना प्रांत में इंसिरलिक एयर बेस चलाते हैं। यहां अमेरिकी परमाणु हथियार रखे हैं। यहां से ISIS के खिलाफ गठबंधन को सहयोग दिया जाता है। तुर्की में 1465 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। इनके अलावा पाकिस्तान, अफगानिस्तान, कजाकिस्तान, किरगिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान में भी अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं। कुल मिलाकर देखें तो ईरान को चारों तरफ से अमेरिकी सैन्य अड्डों ने घेर रखा है।

  • भारत के सेना प्रमुख ने दिया जवाब, पाकिस्तान के साथ मिलकर थर्ड फ्रंट बना रहा है बांग्लादेश?

    भारत के सेना प्रमुख ने दिया जवाब, पाकिस्तान के साथ मिलकर थर्ड फ्रंट बना रहा है बांग्लादेश?


    नई दिल्‍ली। सेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने पाकिस्तान और चीन के बाद बांग्लादेश की ओर से तीसरे मोर्चे की आशंकाओं को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के शीर्ष सैन्य नेतृत्व के साथ भारत के सैन्य नेतृत्व की बातचीत होती रहती है और अभी वहां से इस तरह के कोई संकेत नहीं है। जनरल द्विवेदी ने मंगलवार को यहां वार्षिक संवाददाता सम्मेलन में सवालों के जवाब में यह बात कही। उनसे पूछा गया था कि क्या पाकिस्तान और चीन के बाद अब बांग्लादेश की ओर से भारत के लिए तीसरा मोर्चा खुल गया है।
    उन्होंने स्पष्ट किया कि वैसे सेना वहां स्थिति पर निरंतर नजर रखे हुए है। उन्होंने कहा कि सबसे पहले लिए यह समझना जरूरी है कि बांग्लादेश में कैसी सरकार है। उन्होंने कहा, ‘यदि वह एक अंतरिम सरकार है तो हमें यह देखना होगा कि वह जो कदम उठा रही है वह चार से पांच वर्षों के लिए हैं या केवल चार से पांच महीनों के लिए हैं। यह सोचना होगा कि क्या हमें तुरंत किसी प्रतिक्रिया की आवश्यकता है या नहीं।’

    उन्होंने कहा कि दूसरी बात यह है कि अभी तीनों सेनाओं के चैनल पूरी तरह खुले हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं वहां के सेना प्रमुख के साथ नियमित संपर्क में हूं। इसी तरह अन्य माध्यमों से भी हमारा संपर्क बना हुआ है। हमने वहां एक प्रतिनिधिमंडल भेजा था, जिसने सभी संबंधित लोगों से मुलाकात की। इसी प्रकार नौसेना प्रमुख और वायुसेना प्रमुख ने भी बातचीत की है।

    सेना प्रमुख ने कहा कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी प्रकार की गलतफहमी या संपर्क की कमी न हो। उन्होंने कहा, ‘मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि आज की स्थिति में तीनों सेनाओं द्वारा जो भी कदम उठाए जा रहे हैं, वे किसी भी रूप में भारत के खिलाफ नहीं हैं।’

    पाकिस्तान और चीन की सेनाओं के साथ बांग्लादेश की सेनाओं की बढ़ती नजदीकियों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि क्षमता बढ़ाना एक एक सतत प्रक्रिया है। भारत भी ऐसा कर रहा है और अन्य देश भी। उन्होंने कहा कि वैसे भारतीय सेना वहां की स्थिति पर निरंतर नजर रखे हुए है और स्थिति की निगरानी कर रही है।

  • इस्लामिक नाटो की तैयारी, सऊदी और तुर्की के बीच पक रही खिचड़ी

    इस्लामिक नाटो की तैयारी, सऊदी और तुर्की के बीच पक रही खिचड़ी


    अंकारा। बीते साल सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुई डिफेंस डील वैश्विक स्तर पर चर्चा का केंद्र बनी। दोनों देशों ने एक ऐसा सुरक्षा समझौता कर लिया है जिसके तहत एक देश पर हमले को दूसरे के विरुद्ध भी हमला माना जाएगा। यह समझौता काफी हद तक नाटो के उस अनुच्छेद की तरह है, जिसमें पश्चिमी देशों के इस समूह में किसी भी सदस्य पर हमले को पूरे समूह के खिलाफ हमला माना जाता है। अब पाक और सऊदी की इस डील से एक और मुस्लिम देश जुड़ना चाहता है और यह तीनों देश मिलकर इस्लामिक नाटो नाम की एक खिचड़ी पका रहे हैं।

    ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक तुर्की ने सऊदी-पाकिस्तान डिफेंस डील का हिस्सा बनने में बेहद दिलचस्पी दिखाई है और इसके लिए बैठकों का दौर भी जारी है। मामले से परिचित लोगों के मुताबिक यह गठबंधन स्वाभाविक रूप से आकार ले रहा है क्योंकि दक्षिण एशिया, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के रणनीतिक हित आपस में मिलते हैं। वहीं तीनों देशों के बीच पहले से ही साठ गांठ बनी हुई है।

    इस समूह का संभावित विस्तार इसीलिए भी अहम है क्योंकि तुर्की सिर्फ एक और क्षेत्रीय खिलाड़ी नहीं है। यह अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो गठबंधन का भी हिस्सा है और अमेरिका के बाद नाटो में दूसरी सबसे बड़ी सेना तुर्की की ही है।
    रक्षा संबंध पहले से ही मजबूत

    पाकिस्तान के साथ तुर्की के रक्षा संबंधों की बात की जाए तो वह बेहद अच्छे रहे हैं। तुर्की पाकिस्तानी नौसेना के लिए कार्वेट युद्धपोत बना रहा है, पाकिस्तान के दर्जनों F-16 लड़ाकू विमानों का आधुनिकीकरण किया है और सऊदी और पाक दोनों के साथ ड्रोन तकनीक साझा कर रहा है। वहीं सऊदी अरब और तुर्की शिया-बहुल ईरान को लेकर एकमत हैं और दोनों सैन्य टकराव के बजाय ईरानी शासन का समर्थन करते हैं। इसके अलावा दोनों देश एक स्थिर, सुन्नी-नेतृत्व वाले सीरिया का समर्थन करने और फिलिस्तीन को लेकर भी एकजुट हैं।
    क्या कह रहे विशेषज्ञ?

    अंकारा स्थित थिंक टैंक TEPAV के रणनीतिकार निहत अली ओजकान के मुताबिक इस समूह में तीनों देशों की भूमिका भी तय हो गई है।

    इस्लामिक नाटो को खड़ा करने में जहां सऊदी अरब वित्तीय सहायता देगा, वहीं पाकिस्तान अपने परमाणु हथियार, बैलिस्टिक मिसाइल और मैनपावर देगा। तुर्की अपनी सैन्य विशेषज्ञता और घरेलू रक्षा उद्योग का योगदान दे सकता है। ओजकान के मुताबिक, “जैसे-जैसे अमेरिका इस क्षेत्र में अपने और इजरायल के हितों को प्राथमिकता दे रहा है, बदलते समय में ये देश अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान करने के लिए नए तरीके विकसित कर रहे हैं।”
    मिस्र ने भी दिखाई थी दिलचस्पी

    बीते साल कतर पर इजरायल के हमले के बाद दोहा में बुलाई गई आपात बैठक में भी मुस्लिम देशों ने अरब-नाटो पर भी चर्चा की थी। इस बैठक में पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब और यूएई सहित 60 मुस्लिम देशों ने हिस्सा लिया था।

    बैठक के दौरान अरब देशों में सबसे बड़ी सेना रखने वाले मिस्र ने अरब-नाटो के प्रस्ताव को पुनर्जीवित करने पर अन्य देशों का समर्थन मांगा था। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक मिस्र ने इस समूह के लिए शुरुआत में 20,000 सैनिकों का योगदान देने की पेशकश भी की थी। वहीं मिस्र की राजधानी काहिरा को अरब-नाटो का मुख्यालय बनाने और एक मिस्र के एक हाई रैंक जनरल को कमांडर बनाने की भी पेशकश की गई थी।
    भारत के लिए चिंता?

    पाकिस्तान और तुर्की जैसे भारत के दुश्मनों का इस तरह के सैन्य संगठन से जुड़ना भारत के लिए एक खतरे की घंटी हो सकती है। खासकर ऐसे समय में जब बीते मई महीने में भारत और पाक के बीच बनी युद्ध जैसी स्थिति के दौरान तुर्की ने पाक को अपने कई अहम हथियार और ड्रोन दिए थे। हालांकि भारत के एयर डिफेंस सिस्टम्स ने भारत की हिफाजत की औक पाक के कायराना हमलों का माकूल जवाब दिया था। वहीं विश्लेषकों का मानना ​​है कि इस तरह के समझौते को सक्रिय करने का संकल्प महज बातचीत है और खाड़ी देशों के लिए इसे जमीनी हकीकत बनाना बेहद मुश्किल है।.

  • पाकिस्तान में शुरू हुआ स्टेबलकॉइन का नया दौर… ट्रंप फैमिली की क्रिप्टो कंपनी ने की है बड़ी डील

    पाकिस्तान में शुरू हुआ स्टेबलकॉइन का नया दौर… ट्रंप फैमिली की क्रिप्टो कंपनी ने की है बड़ी डील


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) और पाकिस्तान (Pakistan) के बीच संबंध कैसा है, यह बताने की जरूरत नहीं। खासकर ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) के बाद। अब तक अमेरिकी प्रशासन और पाकिस्तानी सरकार के बीच बात होती थी, लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) का परिवार भी पाकिस्तान से जुड़ रहा है। असल में ट्रंप परिवार से जुड़ी क्रिप्टोकरेंसी कंपनी वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल ने पाकिस्तान के साथ एक समझौता किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह वर्ल्ड लिबर्टी का किसी राष्ट्रीय सरकार के साथ सार्वजनिक रूप से घोषित पहला बड़ा समझौता है। बता दें कि कंपनी की शुरुआत सितंबर 2024 में हुई थी।

    इस समझौते के तहत वर्ल्ड लिबर्टी की सहयोगी कंपनी एससी फाइनेंशियल टेक्नोलॉजीज पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के साथ मिलकर काम करेगी। यह MoU (समझौता) पिछले साल पाकिस्तानी अधिकारियों और अमेरिकी पक्ष के बीच हुई कई बैठकों के बाद हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य वर्ल्ड लिबर्टी के USD1 स्टेबलकॉइन को एक नियंत्रित डिजिटल भुगतान व्यवस्था में शामिल करना है। इससे यह स्टेबलकॉइन पाकिस्तान के मौजूदा डिजिटल करेंसी सिस्टम के साथ काम कर सकेगा और अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में इस्तेमाल हो सकेगा। पाकिस्तान वर्चुअल एसेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (PVARA) ने बुधवार को इस MoU पर हस्ताक्षर किए।


    पाकिस्तान के लिए काफी अहम

    माना जा रहा है कि यह समझौता पाकिस्तान के लिए काफी अहम है। पाकिस्तान सरकार नकदी के इस्तेमाल को कम करना चाहती है और विदेशों से रेमिटेंस (पैसे भेजना) को आसान व सस्ता बनाना चाहती है। क्रिप्टोकरेंसी, खासकर स्टेबलकॉइन, इसमें बड़ी मदद कर सकते हैं। पाकिस्तान में लाखों लोग पहले से क्रिप्टो का इस्तेमाल करते हैं और हर साल बड़ी रकम रेमिटेंस के रूप में आती है। माना जा रहा है कि इस डील से पाकिस्तान नई डिजिटल तकनीक को समझ सकेगा, उसे नियमों के दायरे में लाएगा और राष्ट्रीय हित सुनिश्चित करेगा।

    बता दें कि स्टेबलकॉइन ऐसी डिजिटल मुद्रा होती है जिसकी कीमत अमेरिकी डॉलर जैसी स्थिर चीज से जुड़ी रहती है, इसलिए इसमें मूल्य में उतार-चढ़ाव का जोखिम बहुत कम होता है। वर्ल्ड लिबर्टी एक क्रिप्टो-आधारित फाइनेंशियल प्लेटफॉर्म है, जो डिजिटल वॉलेट की तरह काम करता है और दुनिया भर में पैसे भेजने-पाने को आसान बनाता है। दुनिया की कई सरकारें अब स्टेबलकॉइन को भुगतान प्रणाली और बड़े वित्तीय सिस्टम में शामिल करने के तरीके तलाश रही हैं।


    समझौते के बाद उठ रहे सवाल

    ट्रंप की पाकिस्तान से निकटता पर अमेरिका में कुछ सवाल भी उठे हैं। कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि ट्रंप परिवार अपने व्यापारिक हितों को प्राथमिकता दे रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा कि पाकिस्तान में परिवार के व्यापारिक सौदों के चलते भारत से संबंध प्रभावित हुए। ट्रंप परिवार के पाकिस्तान में क्रिप्टो कारोबार से जुड़े सवाल पर सुलिवन ने कहा कि यह ट्रंप की विदेश नीति की उन कहानियों में से एक है, जिन पर कम ध्यान दिया गया है।

  • अमेरिका-ईरान के बीच तनाव से पाकिस्तान टेंशन में, आसिम मुनीर ने बुलाई आपात बैठक

    अमेरिका-ईरान के बीच तनाव से पाकिस्तान टेंशन में, आसिम मुनीर ने बुलाई आपात बैठक


    इस्लामाबाद।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने ईरान (Iran) में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों को यह कहकर और हवा दे दी है कि प्रदर्शनकारी संस्थाओं पर कब्जा करें, मदद पहुंच रही है। अब इस बात को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं कि अमेरिका प्रदर्शनकारियों को किस तरह की मदद पहुंचाने जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका ईरान पर सैन्य कार्रवाई का भी प्लान बना रहा है। दूसरी तरफ, ईरान ने भी अमेरिका को दो टूक कहा है कि वह चुप बैठने वाला नहीं है और किसी भी सैन्य कार्रवाई का मुंहतोड़ जवाब देगा।

    इन सबके बीच, पाकिस्तान (Pakistan) टेंशन में आ गया है। वह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव से परेशान है। पाकिस्तान की सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को अब चिंता सता रही है कि अगर ईरान और अमेरिका के बीच जंग छिड़ी तो उसकी मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। पहले से ही कई मोर्चों पर बदहाली झेल रहे पाकिस्तान में अब नए मोर्चों पर हालात बिगड़ने की आशंका के बीच पाकिस्तान के फील्ड मार्शल और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने आपात बैठक की है।


    दो सीमाई मोर्चों पर दबाव

    सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि इस हाई लेवेल मीटिंग में ISI प्रमुख और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जनरल असीम मलिक, साउदर्न कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राहत नसीम, मिलिट्री इंटेलिजेंस प्रमुख, चीफ ऑफ जनरल स्टाफ और अन्य वरिष्ठ जनरल शामिल हुए। इस बैठक में सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान–ईरान सीमा को लेकर जताई गई है। अधिकारियों ने चेताया कि पाकिस्तान पहले ही अफगानिस्तान के साथ डूरंड लाइन पर तनाव झेल रहा है और ऐसे में ईरान सीमा पर नया संकट देश के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।


    अमेरिका मांग सकता है पाकिस्तानी ठिकाने?

    सूत्रों के मुताबिक, बैठक में इस आशंका पर भी गंभीर चर्चा हुई कि अगर अमेरिका ईरान पर सैन्य कार्रवाई करता है, तो वह पाकिस्तान से हवाई क्षेत्र या सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की मांग कर सकता है। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के लिए फैसला लेना बेहद मुश्किल होगा, क्योंकि इससे देश के भीतर राजनीतिक विरोध और क्षेत्रीय तनाव, दोनों बढ़ सकते हैं।


    पाक के अंदर अशांति और विद्रोह का डर

    पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि ईरान-अमेरिका जंग में अगर पाकिस्तान ने अमेरिका का साथ दिया तो उसे आंतरिक समस्या का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि देश की लगभग 30 फीसदी आबादी शिया है, जो ईरान के प्रति सहानुभूति रखती है। ऐसे में अगर ईरान पर अमेरिकी हमला होता है या वहां सत्ता परिवर्तन की कोशिश होगी। इससे पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर शियाओं का विरोध प्रदर्शन शुरू हो सकता है। इसके अलावा, ईरान से शरणार्थियों के आने से सीमा पर दबाव और बढ़ सकता है।


    हाई अलर्ट पर पाक सेना

    सूत्रों के अनुसार, जनरल आसिम मुनीर ने सभी वरिष्ठ कमांडरों को हाई अलर्ट पर रहने और हालात पर करीबी नजर रखने के निर्देश दिए हैं। वहीं ISI प्रमुख को ईरान, तुर्की, कतर, यूएई, सऊदी अरब और अमेरिका के साथ राजनयिक और सुरक्षा स्तर की बातचीत तेज करने को कहा गया है, ताकि हालात को बिगड़ने से रोका जा सके।


    क्षेत्रीय अस्थिरता की चेतावनी

    खुफिया आकलन में कहा गया है कि पाकिस्तान, सऊदी अरब, कतर और तुर्की पहले ही अमेरिका को यह संदेश दे चुके हैं कि ईरान पर हमला पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर सकता है। हालांकि, अधिकारियों ने मानना कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की सरकार आगे बढ़ती है और पाकिस्तान पर सहयोग का दबाव डालती है, तो इस्लामाबाद को गंभीर रणनीतिक और राजनीतिक नुकसान उठाने पड़ सकते हैं।

    देश के भीतर एकजुटता की कोशिश
    ऐसे में बाहरी दबावों के बीच पाकिस्तान की सेना ने घरेलू मोर्चे पर भी तैयारी शुरू कर दी है। सूत्रों के मुताबिक, सेना मुख्यालय में नेशनल पैग़ाम-ए-अमन कमेटी के तहत धार्मिक विद्वानों का एक प्रतिनिधिमंडल बुलाया गया है। उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर एकजुट संदेश देने पर ज़ोर दिया गया है। बैठक में यह भी कहा गया कि भारत और सीमा पार सक्रिय आतंकी संगठनों द्वारा चलाए जा रहे कथित मनोवैज्ञानिक युद्ध का जवाब एक साझा राष्ट्रीय नैरेटिव से दिया जाना चाहिए।

  • युगांडा में राष्ट्रपति चुनाव के लिए आज मतदान… दो दिन पहले से इंटरनेट पूरी तरह बंद

    युगांडा में राष्ट्रपति चुनाव के लिए आज मतदान… दो दिन पहले से इंटरनेट पूरी तरह बंद


    कंपाला।
    अफ्रीकी देश युगांडा (African country Uganda) में 15 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति चुनाव (Presidential Election.) होने जा रहे हैं, लेकिन निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान की उम्मीदें गंभीर चुनौती का सामना कर रही हैं। मतदान से महज दो दिन पहले (13 जनवरी को शाम 6 बजे से) पूरे देश में सार्वजनिक इंटरनेट सेवा पूरी तरह बंद कर दी गई है। साथ ही सड़कों पर सैनिकों और सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी है, जिससे आम नागरिकों में डर और असुरक्षा का माहौल है। विपक्षी नेता बॉबी वाइन (रॉबर्ट क्यागुलानी) ने इसे चुनावी धांधली और दमन की साजिश बताया है।

    दरअसल, यह चुनाव 81 वर्षीय राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी के लिए सातवां कार्यकाल हासिल करने का मौका है, जो 1986 से लगातार सत्ता में हैं। उनका मुख्य मुकाबला 43 वर्षीय बॉबी वाइन से है, जो पूर्व पॉप स्टार से राजनेता बने हैं और युवा वर्ग में बदलाव की लहर पैदा कर रहे हैं। एक्सपर्ट का कहना है कि मुसेवेनी की सत्ता में वापसी लगभग तय है, लेकिन वे अब सुरक्षा बलों और अपने बेटे जनरल मुहूज़ी कैनेरुगाबा (सेना के शीर्ष कमांडर) पर अधिक निर्भर हैं।

    गौरतलब है कि मुसेवेनी ने संविधान में दो बार बदलाव कर आयु और कार्यकाल की सीमा हटा दी है। विरोधियों को जेल, गायब किया जाना या दबाया जाना आम हो गया है। सत्तारूढ़ नेशनल रेजिस्टेंस मूवमेंट (एनआरएम) में कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं दिखता, जिससे वंशानुगत शासन की आशंका बढ़ गई है।


    इंटरनेट बंदी… लोकतंत्र पर बड़ा हमला

    युगांडा कम्युनिकेशंस कमीशन (यूसीसी) ने इंटरनेट बंद करने का फैसला ‘ऑनलाइन गलत सूचना, भ्रामक जानकारी, चुनावी धोखाधड़ी और हिंसा भड़काने के जोखिम’ रोकने के नाम पर लिया है। यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की सिफारिश पर हुआ। लेकिन आलोचक इसे विरोध प्रदर्शनों को रोकने और चुनावी अनियमितताओं (जैसे मतपत्र भरना, वोटों में हेराफेरी) की जानकारी साझा करने से रोकने का हथकंडा बताते हैं। 2021 के चुनाव में भी ऐसा ही ब्लैकआउट हुआ था, जो कई दिनों तक चला।


    विपक्ष की रणनीति: वोट की रक्षा

    बॉबी वाइन की नेशनल यूनिटी प्लेटफॉर्म (NUP) ने समर्थकों से मतदान केंद्रों के पास कानूनी 20 मीटर की दूरी पर रहने, सतर्क रहने और धांधली रोकने का आह्वान किया है। चुनाव आयोग ने लोगों से वोट डालकर घर लौटने और जरूरत पर मतगणना देखने की अपील की है। वाइन ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा कि पहला कदम यह है कि हम सभी मतदान केंद्रों पर (20 मीटर की दूरी का पालन करते हुए) रहें और सुनिश्चित करें कि कोई आपराधिक घटना न हो। हम सभी से आग्रह करते हैं कि वे अपने कैमरों का उपयोग करें और किसी भी अनियमितता को रिकॉर्ड करें।

  • आजादी भीख से नहीं, हिंदुओं की गर्दन काटने से मिलेगी…आतंकी अबू मूसा ने PoK में उगला जहर…

    आजादी भीख से नहीं, हिंदुओं की गर्दन काटने से मिलेगी…आतंकी अबू मूसा ने PoK में उगला जहर…


    इस्लामाबाद।
    पड़ोसी देश पाकिस्तान (Pakistan) सुधरने का नाम नहीं ले रहा। वह आतंक का पर्याय बना हुआ है। भारत (India) की तमाम हिदायतों के बावजूद वह आतंकियों (Terrorists) को ना सिर्फ पाल पोश रहा है बल्कि उसे सुरक्षित ठिकाना दे रहा है। उसी का नतीजा है कि वहां के आतंकियों ने फिर से भारत के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया है। ताजा घटनाक्रम में आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (Terrorist organization Lashkar-e-Taiba) के आतंकी अबू मूसा कश्मीरी (Abu Musa Kashmiri) ने हिन्दुओं की गर्दन काटने की धमकी दी है। उसका एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह खुले तौर पर हिंदुओं को मौत के घाट उतारने की बात कर रहा है।

    उसने यह बयान पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में दिया है। इसका वीडियो भी सामने आया है। हालांकि ये वीडियो कब का है? इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। इस वीडियो में मूसा को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि “कश्मीर मुद्दे का हल सिर्फ आतंकवाद और जिहाद से ही हो सकता है। आजादी भीख मांगने से नहीं, हिंदुओं की गर्दन काटने से मिलेगी। हमें जिहाद का झंडा उठाना होगा।” इस वायरल वीडियो में मूसा अपने भड़काऊ भाषण में यहां तक कह रहा है कि वो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सामने भी कत्लेआम की बात करता है।


    आतंकी की पहुंच PM शहबाज तक

    हालांकि, हम इस वीडियो की पुष्टि नहीं करते, लेकिन सोशल मीडिया पर इस वीडियो के पोस्ट में दावा किया गया है कि मूसा ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सीनियर मंत्रियों को व्यक्तिगत रूप से बताया है कि उसके विचार में कश्मीर मुद्दे को “जिहाद की आड़ में किए गए आतंकवाद के ज़रिए ही” सुलझाया जा सकता है। उसका यह दावा, इस बात की तस्दीक है कि इन आतंकवादियों की पहुंच पाकिस्तान सरकार और सेना के आलाकमान तक है।


    कौन है आतंकी अबू मूसा कश्मीरी?

    अबू मूसा कश्मीरी लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी है। वह LeT से जुड़े संगठन जम्मू कश्मीर यूनाइटेड मूवमेंट (JKUM) का सीनियर कमांडर है। उसका नाम पिछले साल अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले से भी जुड़ा था। वह तब पहलगाम में हमलावर आतंकियों को आदेश दे रहा था। उसके साथ दूसरा आतंकी रिजवान हनीफ भी इसमें सामिल था। सूत्रों का दावा है कि पहलगाम अटैक का मास्टरमाइंड अबू मूसा ही है। ये सैफुल्लाह कसूरी का करीबी भी है।


    पाकिस्तानी नेताओं पर भी गंभीर आरोप

    अपने भाषण में अबू मूसा ने पाकिस्तानी नेताओं पर भी गंभीर आरोप लगाए। उसने कहा कि पाकिस्तान के नेता इस्लामी सिद्धांतों से भटक चुके हैं और जिहाद के रास्ते पर नहीं चल रहे हैं। उसने कहा जो नेता जिहाद के लिए प्रतिबद्ध नहीं है, उसे पाकिस्तान पर हुकूमत करने का कोई अधिकार नहीं है। मूसा ने दावा किया कि वह पहले भी ऐसे ही बयान मुजफ्फराबाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ हुई एक बैठक में दे चुका है।


    भारत की सुरक्षा एजेंसियां सतर्क

    पाक अधिकृत कश्मीर में दिए गए इस भड़काऊ भाषण का वीडियो सामने आने के बाद भारत की सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं। अबू मूसा ने यह बयान तब दिया है, जब हाल ही में LeT के टॉप कमांडर अबू कताल की मौत हुई है। कताल को शनिवार रात पाकिस्तान के सिंध के झेलम इलाके में अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दी थी। LeT ​​के संस्थापक हाफिज सईद के करीबी सहयोगी, कताल इस ग्रुप का चीफ ऑपरेशनल कमांडर था। जम्मू-कश्मीर में कई आतंकी हमलों की योजना बनाने के लिए उसे जाना जाता था। नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने राजौरी आतंकी हमले से जुड़ी अपनी चार्जशीट में कताल के साथ-साथ लश्कर-ए-तैयबा के चार अन्य लोगों का नाम भी शामिल किया है। यह मामला 1 जनवरी, 2023 को राजौरी के ढांगरी गांव पर हुए हमले से जुड़ा है, जिसमें आतंकवादियों ने एक जानलेवा हमला किया था जिसमें सात लोग मारे गए थे।

  • एलन मस्क पर हो रही धन वर्षा… एक ही दिन में 42.2 अरब डॉलर बढ़ी दौलत

    एलन मस्क पर हो रही धन वर्षा… एक ही दिन में 42.2 अरब डॉलर बढ़ी दौलत


    वाशिंगटन।
    दुनिया सबसे अमीर व्यक्ति टेस्ला के एलन मस्क ( World’s Richest Person Elon Musk) की दौलत में भारी इजाफा (Huge Increase Wealth) हुआ है। बुधवार को उनके ऊपर डॉलर की ऐसी बारिश हुई कि एक ही दिन में 42.2 अरब डॉलर पीट दिए। ब्लूमबर्ग बिलेनियर इंडेक्स (Bloomberg Billionaire List) के मुताबिक मस्क की दौलत इस उछाल के बाद 683 अरब डॉलर पर पहुंच गई है। महज 14 दिनों में मस्क की संपत्ति 63.1 अरब डॉलर बढ़ी है।

    दूसरी ओर ब्लूमबर्ग बिलेनियर इंडेक्स के टॉप-10 अरबपतियों को बुधवार को बड़े झटके लगे। जेफ बेजोस को 5.22 अरब डॉलर, लैरी एलिसन को 8.85 अरब डॉलर, मार्क जुकरबर्ग को 5.32 अरब डॉलर और बर्नार्ड अर्नाल्ट को 2.48 अरब डॉलर का झटका लगा है। स्टीव बाल्मर को भी 3.55 अबर डॉलर और जेनसेन हुआंग को 2.16 अरब डॉलर की चोट पहुंची है। लैरी पेज को 70.5 मिलियन डॉलर, सर्गेई ब्रिन को 90 मिलियन डॉलर और वॉरेन बफेट को 118 मिलियन डॉलर की चोट पहुंची है।

    मस्क दुनिया की सबसे वैल्यूएबल कार बनाने वाली कंपनी टेस्ला और प्राइवेट रॉकेट बिजनेस स्पेसएक्स के CEO हैं। कंपनी के 2025 प्रॉक्सी स्टेटमेंट के अनुसार, मस्क के पास टेस्ला का लगभग 12% हिस्सा है। उनके पास 2018 के कंपनसेशन पैकेज से लगभग 304 मिलियन एक्सरसाइजेबल स्टॉक ऑप्शन भी हैं।

    ब्लूमबर्ग के मुताबिक स्पेसएक्स का वैल्यूएशन दिसंबर 2025 के टेंडर ऑफर का इस्तेमाल करके किया गया है, जिसमें कंपनी की वैल्यू लगभग $800 बिलियन आंकी गई है। फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन के साथ सितंबर 2025 की फाइलिंग के आधार पर एक ट्रस्ट के जरिए मस्क के पास इस प्राइवेट कंपनी का लगभग 42% हिस्सा है। 5% प्राइवेट कंपनी डिस्काउंट लागू किया गया है। दिसंबर 2025 में नए वैल्यूएशन को ध्यान में रखते हुए एक एडजस्टमेंट किया गया, जिससे उनकी नेटवर्थ में $168 बिलियन की बढ़ोतरी हुई।

    क्यों उछली दौलत
    xAI का वैल्यूएशन जनवरी 2026 के फंडिंग राउंड का इस्तेमाल करके किया गया है, जिसमें 20 अरब डॉलर जुटाए गए और पोस्ट-मनी वैल्यूएशन 230 अरब डॉलर था। कंपनी के कैपिटल स्ट्रक्चर से परिचित एक व्यक्ति के अनुसार, जो अपनी पहचान नहीं बताना चाहता था क्योंकि यह जानकारी प्राइवेट है, इस राउंड के बाद मस्क के पास कंपनी का 51% हिस्सा था। 15% लिक्विडिटी डिस्काउंट लागू किया गया है। नया वैल्यूएशन जनवरी 2026 में लागू किया गया, जिससे उनकी नेटवर्थ में 48 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई।