Category: International

  • ईरान जंग के बीच शियाओं पर आसिम मुनीर का बयान, पाकिस्तान में बढ़ा विवाद

    ईरान जंग के बीच शियाओं पर आसिम मुनीर का बयान, पाकिस्तान में बढ़ा विवाद

    तेहरान। पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर Asim Munir के एक बयान को लेकर पाकिस्तान में नया विवाद खड़ा हो गया है। पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने कथित तौर पर कहा कि जिन शिया धर्मगुरुओं को Iran से “ज्यादा लगाव” है, वे वहां चले जाएं। उनका यह बयान रावलपिंडी में आयोजित एक इफ्तार कार्यक्रम के दौरान सामने आया, जिसके बाद शिया समुदाय के नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी।

    शिया धर्मगुरुओं ने इसे अपमानजनक और भड़काऊ बताते हुए आरोप लगाया कि सैन्य नेतृत्व देश के भीतर सांप्रदायिक तनाव बढ़ा रहा है। कुछ नेताओं ने यहां तक कहा कि सेना प्रमुख बाहरी शक्तियों के प्रभाव में काम कर रहे हैं, जो पाकिस्तान के हितों के खिलाफ है।

    सरकारों को गिराने तक के आरोप
    शिया उलेमा काउंसिल पाकिस्तान के केंद्रीय उपाध्यक्ष आलम सैयद सिब्तैन हाइडर सब्ज़वारी ने पलटवार करते हुए कहा कि यदि सेना प्रमुख को अमेरिका और इजरायल से इतना लगाव है तो उन्हें खुद पाकिस्तान छोड़ देना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बार-बार सरकारों को गिराकर देश को नुकसान पहुंचाया गया है।

    विरोध प्रदर्शनों के बाद बढ़ा तनाव
    इससे पहले, कराची, स्कार्डू और इस्लामाबादसमेत कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। ये प्रदर्शन शिया अयातुल्लाह खामेनेई से जुड़े घटनाक्रमों के विरोध में बताए गए। इन प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कई लोगों की मौत होने की खबरें सामने आई थीं, जिससे स्थिति और संवेदनशील हो गई।

    मुनीर की चेतावनी
    विरोध प्रदर्शनों के बाद मुनीर ने कहा था कि किसी दूसरे देश की घटनाओं को लेकर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी। बाद में “ईरान चले जाएं” वाली टिप्पणी सामने आने के बाद शिया समुदाय के एक हिस्से में नाराजगी और बढ़ गई।
    Inter-Services Public Relations ने अपने बयान में कहा कि सेना प्रमुख ने उलेमाओं से मुलाकात कर राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने में उनकी भूमिका पर चर्चा की। हालांकि विवादित टिप्पणी पर आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।

  • लंदन में यहूदी प्रार्थना स्थल के बाहर एम्बुलेंस में आग, पुलिस ने माना घृणा अपराध

    लंदन में यहूदी प्रार्थना स्थल के बाहर एम्बुलेंस में आग, पुलिस ने माना घृणा अपराध

    लंदन। लंदन में यहूदी समुदाय को निशाना बनाकर कथित तौर पर बड़ा हमला हुआ है। उत्तरी लंदन के इलाके गोल्डर्स ग्रीन में एक यहूदी प्रार्थना स्थल के बाहर खड़ी कई एम्बुलेंस में आग लगा दी गई। घटना के बाद रात के आसमान में लपटें और काला धुआं दिखाई दिया, जिससे इलाके में दहशत फैल गई।

    लंदन की मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने बताया कि अधिकारी मौके पर मौजूद हैं और मामले को यहूदी-विरोधी घृणा अपराध के तौर पर जांचा जा रहा है। एहतियातन आसपास के कुछ निवासियों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।

    चार एम्बुलेंस जलकर खाक
    जानकारी के मुताबिक यह एम्बुलेंस यहूदी स्वयंसेवी बचाव समूह Hatzola North West से जुड़ी थीं। संगठन के अध्यक्ष Shloimy Richman ने बताया कि छह में से चार एम्बुलेंस पूरी तरह नष्ट हो गईं। उन्होंने इसे जानबूझकर की गई आगजनी बताते हुए कहा कि यह यहूदी समुदाय पर सीधा हमला है।

    सीसीटीवी में दिखे नकाबपोश संदिग्ध
    सुरक्षा फुटेज में तीन नकाबपोश व्यक्ति एक एम्बुलेंस के पास जाते और उसमें आग लगाते दिखाई दिए।

    वीडियो में तड़के करीब 1:36 बजे का समय दर्ज है और स्थान Machzikei Hadath के पास बताया गया है, जो पास के आराधनालय से मेल खाता है। पुलिस ने कहा है कि तीन संदिग्धों की तलाश जारी है, हालांकि अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है।

    धमाकों से जागे लोग
    स्थानीय निवासी Charlie Richards ने बताया कि उन्होंने देर रात कई धमाकों की आवाज सुनी। उनके द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो में एक बड़ा नारंगी विस्फोट और आसमान में उठता घना धुआं दिखाई दे रहा है।

    घटना के बाद पूरे इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और पुलिस संभावित घृणा अपराध के एंगल से जांच कर रही है। समुदाय के लोग इस हमले से सदमे में हैं और जल्द कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

  • PAK: PM शहबाज शरीफ ने की ईरानी राष्ट्रपति से फोन पर बात… पश्चिम एशिया तनाव पर जताई चिंता

    PAK: PM शहबाज शरीफ ने की ईरानी राष्ट्रपति से फोन पर बात… पश्चिम एशिया तनाव पर जताई चिंता


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान (Pakistan) के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Prime Minister Shahbaz Sharif) ने सोमवार को ईरान के राष्ट्रपति डॉ मसूद पेजेशकियान (Iran’s President Dr. Masoud Pezeshkian) से टेलीफोन पर बातचीत की। इस दौरान उन्होंने पश्चिम एशिया (West Asia) में बढ़ते तनाव को कम करने के लिए तत्काल सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, शहबाज शरीफ ने खाड़ी क्षेत्र में जारी खतरनाक शत्रुता को लेकर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इस गंभीर स्थिति के मद्देनजर सभी पड़ोसी देशों को मतभेद सुलझाने, तनाव कम करने और संवाद व कूटनीति की राह अपनाने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।

    बयान में आगे कहा गया है कि प्रधानमंत्री ने उम्माह (मुस्लिम समुदाय) में एकता के अत्यधिक महत्व पर बल दिया, जो इस समय पहले से कहीं अधिक जरूरी है। शरीफ ने ईरानी नेतृत्व को आश्वस्त किया कि पाकिस्तान क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा। एक पड़ोसी और मित्र राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान ने बहादुर ईरानी जनता के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त की। बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री ने ईरानी राष्ट्रपति और ईरान की जनता को ईद-उल-फितर तथा नवरोज की हार्दिक शुभकामनाएं भी दीं। वहीं सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में शहबाज शरीफ ने दोहराया कि पाकिस्तान क्षेत्रीय शांति को बढ़ावा देने में सक्रिय और रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है।

    इस बीच, ईरानी आधिकारिक समाचार एजेंसी आईआरएनए के हवाले से तेहरान में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाकाई ने कहा कि कुछ मित्र देशों से संदेश मिले हैं, जो अमेरिका से युद्ध समाप्त करने के लिए बातचीत शुरू करने के अनुरोध का संकेत देते हैं। पाकिस्तान को मिस्र और कतर के साथ-साथ संभावित मध्यस्थ के रूप में देखा जा रहा है। शरीफ की पोस्ट के तुरंत बाद पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इशाक डार ने ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरगची से अलग बातचीत की और हाल के क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर चर्चा की।

    विदेश मंत्रालय ने एक्स पर पोस्ट किया कि दोनों पक्षों ने क्षेत्र तथा उसके बाहर शांति, सुरक्षा और स्थिरता को मजबूत करने के लिए संवाद व कूटनीति के महत्व पर जोर दिया। दोनों ने बदलती स्थिति पर निरंतर संपर्क बनाए रखने पर सहमति जताई।

    इससे पहले अमेरिका ने ईरान के ऊर्जा संयंत्रों पर सैन्य हमले की योजना को पांच दिनों के लिए टाल दिया है और कहा है कि वह इस शत्रुता को सुलझाने के लिए ईरान के एक शीर्ष व्यक्ति से बात कर रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका पश्चिम एशिया में शत्रुता को सुलझाने की कोशिश करने के लिए ईरान की सरकार के एक शीर्ष व्यक्ति के साथ बातचीत कर रहा है। अमेरिका और ईरान हाल की बातचीत में समझौते के प्रमुख बिंदुओं पर पहुंच गए हैं। अगर हमलों में मौजूदा पांच-दिन का विराम ठीक से चलता है, तो इससे पश्चिम एशिया चल रहे संघर्ष का समाधान निकल सकता है।

  • भारत के LPG और कच्चे तेल के टैंकरों ने पार किया होर्मुज… जल्द पहुंचेंगे बंदरगाह

    भारत के LPG और कच्चे तेल के टैंकरों ने पार किया होर्मुज… जल्द पहुंचेंगे बंदरगाह


    नई दिल्ली।
    अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध (US-Israel and Iran War) की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) बंद होने से भारत सहित कई देशों में ईंधन आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। इस बीच अब भारत (India) के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। जानकारी के मुताबिक UAE से दो LPG कैरियर और सऊदी अरब से एक कच्चे तेल का कैरियर भारत के बंदरगाहों की ओर बढ़ रहे हैं ताकि देश में ऊर्जा आपूर्ति की कमी को पूरा किया जा सके। वहीं नौसेना प्रमुख दिनेश त्रिपाठी ने बढ़ते हुए शिपिंग संकट के चलते ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के अपने आधिकारिक दौरे को रद्द कर दिया है।

    जानकारी के मुताबिक भारतीय झंडे वाले जहाज पाइन गैस और जग वसंत लगभग एक साथ ही चल रहे थे। दोनों जहाज सोमवार सुबह 6 बजे UAE के बंदरगाहों से भारत के लिए रवाना हुए। ईरान ने इन दोनों LPG जहाजों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने की मंजूरी भी दे दी है। वहीं ओमान की खाड़ी में भारतीय नौसेना के युद्धपोत इन LPG जहाजों को 24 घंटे तक सुरक्षा दे रहे हैं।

    जहाज में कितना LPG?
    बंदरगाह, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश कुमार सिन्हा ने सोमवार को एक प्रेस कांफ्रेस में बताया कि दोनों जहाज पर लगभग 92,000 टन एलपीजी है। उन्होंने कहा, ”यात्रा शुरू हो चुकी है।’’ शिपिंग मंत्रालय के अनुसार जग वसंत के 26 मार्च को कांडला बंदरगाह पहुंचने की संभावना है, जबकि पाइन गैस 28 मार्च को न्यू मैंगलोर पहुंच सकता है। इन जहाजों पर क्रमशः 33 और 27 भारतीय नाविक भी सवार हैं।

    सऊदी से आ रहा तेल टैंकर
    इसके अलावा, MT Kallista नाम का एक कच्चे तेल का कैरियर सऊदी अरब के यान्बू बंदरगाह पर तेल भर रहा है और मंगलवार को जेद्दा बंदरगाह होते हुए भारत के पारादीप बंदरगाह के लिए रवाना होगा। पेट्रोलियम मंत्रालय के समन्वय से, पनामा के झंडे वाले यह जहाज भी अदन की खाड़ी से गुजरेगा और भारतीय नौसेना इसकी हिफाजत करेगी।

    भारतीय टैंकरों ने ईरान को दी फीस?
    भले ही रिपोर्ट्स में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान द्वारा मोटी फीस लिए जाने की खबरें थीं, लेकिन भारत ने अपने LPG टैंकरों को गुजरने की अनुमति देने के लिए ईरान को कोई पैसा नहीं दिया है। भारत में ईरानी दूतावास ने सोमवार को ऐसी रिपोर्टों का खंडन किया है।

    इस बीच केंद्र सरकार ने भारतीय नौसेना से कहा है कि वह भारतीय झंडे वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ओमान की खाड़ी और अदन की खाड़ी के आसपास अपने कोलकाता-श्रेणी के विध्वंसक जहाजों को तैनात करे। वहीं भारतीय झंडे वाले सभी जहाज़ों के कप्तानों से लगातार संपर्क किया जा रहा है, ताकि उन्हें बताया जा सके कि भारत संकट के समय उनके साथ खड़ा है।

    कितने टैंकर फंसे?
    बता दें कि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध कुल मिलाकर लगभग 500 टैंकर जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं। इनमें 108 कच्चे तेल के टैंकर, 166 तेल उत्पाद टैंकर, 104 रासायनिक/उत्पाद टैंकर, 52 रासायनिक टैंकर और 53 अन्य प्रकार के टैंकर शामिल हैं। विश्लेषकों का कहना है कि ईरान संभवत: सत्यापन के बाद चुनिंदा जहाजों को जलडमरूमध्य से जाने की अनुमति दे सकता है।

  • परमाणु हथियारों पर उत्तर कोरिया का अमेरिका को कड़ा संदेश, जाने क्‍या बोले किम जोंग उन ?

    परमाणु हथियारों पर उत्तर कोरिया का अमेरिका को कड़ा संदेश, जाने क्‍या बोले किम जोंग उन ?


    प्योंगयांग। उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन ने संसद सुप्रीम पीपुल्स असेंबली में अपने संबोधन के दौरान देश की सुरक्षा और आर्थिक नीतियों को लेकर बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने साफ कर दिया कि उत्तर कोरिया अब परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र के रूप में स्थायी और अपरिवर्तनीय स्थिति में है और इस दिशा में उसकी नीति और सख्त की जाएगी।

    किम ने अमेरिका और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को सीधी चुनौती देते हुए कहा कि उनका देश अपने परमाणु बल को लगातार मजबूत करता रहेगा। उन्होंने दक्षिण कोरिया को उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा दुश्मन बताते हुए रक्षा खर्च को वर्ष 2026 के बजट में बढ़ाकर कुल व्यय का 15.8% कर दिया है। राज्य मीडिया केसीएनए के मुताबिक, सोमवार को संसद को संबोधित करते हुए किम ने कहा कि परमाणु शक्ति बनाए रखते हुए विकास करना ही देश की सबसे सही रणनीति है।

    परमाणु हथियारों पर कोई समझौता नहीं

    किम जोंग उन ने परमाणु निरस्त्रीकरण के बदले आर्थिक सहायता या सुरक्षा गारंटी के प्रस्तावों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि परमाणु हथियारों की मौजूदगी ने युद्ध को रोका है और इससे देश को आर्थिक विकास, निर्माण कार्य और लोगों के जीवन स्तर को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिला है। उन्होंने अमेरिका और उसके सहयोगियों पर कोरियाई प्रायद्वीप के आसपास सामरिक परमाणु संसाधन तैनात कर क्षेत्र में तनाव बढ़ाने का आरोप लगाया। हालांकि किम ने दावा किया कि अब उत्तर कोरिया खुद को सुरक्षित महसूस करता है और जरूरत पड़ने पर जवाब देने में सक्षम है।

    दक्षिण कोरिया को बताया मुख्य दुश्मन

    किम ने दशकों पुरानी शांतिपूर्ण पुनर्मिलन की नीति से हटते हुए दक्षिण कोरिया को अपना सबसे बड़ा शत्रु घोषित किया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि देश की संप्रभुता से छेड़छाड़ की गई तो बिना किसी हिचकिचाहट के कड़ा जवाब दिया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह रुख अब उत्तर कोरिया के कानून का हिस्सा बन चुका है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ सकता है।

    आर्थिक विकास के लिए नई योजना

    सुरक्षा के साथ-साथ किम ने नई पंचवर्षीय विकास योजना भी पेश की, जिसमें उद्योगों के आधुनिकीकरण, बिजली और कोयला उत्पादन बढ़ाने तथा देशभर में आवास निर्माण पर जोर दिया गया है। बजट में परमाणु युद्ध क्षमता को और मजबूत करने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। इसी दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का संदेश भी पढ़ा गया, जिसमें दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग को और मजबूत करने की बात कही गई। केसीएनए के अनुसार, इस सत्र में संविधान संशोधन को मंजूरी दी गई और नई आर्थिक योजना को लागू करने के लिए कानून पारित किया गया।

    आर्थिक चुनौतियां बरकरार

    अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर कोरिया अभी भी दुनिया के सबसे गरीब देशों में शामिल है। भारी प्रतिबंधों और संसाधनों की कमी के कारण वहां की बड़ी आबादी सरकारी राशन और अनौपचारिक बाजारों पर निर्भर है।

  • ट्रंप के अल्टीमेटम से बढ़ा तनाव: रूस ने दी सख्त चेतावनी, परमाणु ठिकानों पर हमले को बताया बेहद खतरनाक

    ट्रंप के अल्टीमेटम से बढ़ा तनाव: रूस ने दी सख्त चेतावनी, परमाणु ठिकानों पर हमले को बताया बेहद खतरनाक


    नई दिल्ली:मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को दिए गए 48 घंटे के अल्टीमेटम ने वैश्विक चिंता को और गहरा कर दिया है। इस अल्टीमेटम के बाद जहां ईरान ने भी कड़ी प्रतिक्रिया की चेतावनी दी, वहीं अब रूस ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपना स्पष्ट रुख सामने रखा है। रूस का कहना है कि मौजूदा हालात को युद्ध के बजाय राजनीतिक और रणनीतिक तरीकों से सुलझाया जाना चाहिए।

    क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने साफ शब्दों में कहा कि क्षेत्र में बढ़ते तनाव को कम करने का एकमात्र प्रभावी तरीका संवाद और कूटनीति है। उनका मानना है कि सैन्य कार्रवाई से हालात और बिगड़ सकते हैं, जिसका असर केवल क्षेत्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

    रूस ने खास तौर पर ईरान के बुशहर परमाणु पावर प्लांट पर संभावित हमले की आशंका को बेहद गंभीर बताया है। पेसकोव ने चेतावनी दी कि किसी भी परमाणु सुविधा पर हमला न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा बल्कि इससे मानवीय आपदा भी पैदा हो सकती है, जिसकी भरपाई संभव नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा कि रूस इस मुद्दे पर अमेरिका तक अपनी चिंताएं स्पष्ट रूप से पहुंचा चुका है।

    इसी बीच, ईरान के नतांज परमाणु परिसर पर हाल ही में हुए हमलों ने भी स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। यह परिसर ईरान के परमाणु कार्यक्रम का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां यूरेनियम संवर्धन का कार्य होता है। इस पर हुए हमले को रूस ने अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ बताते हुए कड़ी निंदा की थी।

    इस मामले में इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी ने भी चिंता व्यक्त की है। हालांकि एजेंसी ने स्पष्ट किया कि किसी प्रकार का रेडियोएक्टिव रिसाव नहीं हुआ, लेकिन उसने एहतियात बरतने और स्थिति पर करीबी नजर रखने की जरूरत पर जोर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया तो इसके परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं।

    मौजूदा हालात ऐसे समय में सामने आए हैं जब पहले से ही अमेरिका और ईरान के बीच संबंध बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं, और इजरायल भी इस समीकरण का अहम हिस्सा है। ऐसे में किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई पूरे क्षेत्र को बड़े संघर्ष की ओर धकेल सकती है।

    रूस का यह बयान वैश्विक स्तर पर शांति की अपील के रूप में देखा जा रहा है। यह साफ संकेत देता है कि बड़ी शक्तियां अब इस संकट को युद्ध के बजाय बातचीत के जरिए सुलझाने के पक्ष में हैं। हालांकि, आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या संबंधित देश इस सलाह को मानते हैं या फिर यह तनाव एक बड़े संघर्ष का रूप लेता है।

  • ईरान का दावा या सच्चाई? अमेरिका ने F-15 को मार गिराने की खबर को बताया फर.

    ईरान का दावा या सच्चाई? अमेरिका ने F-15 को मार गिराने की खबर को बताया फर.

    नई दिल्ली:ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच एक नया विवाद सामने आया जब ईरानी मीडिया ने दावा किया कि उसकी वायु रक्षा ने एक अमेरिकी F-15 लड़ाकू विमान को मार गिराया है, यह रिपोर्ट सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई, लेकिन अमेरिका ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे झूठ और अफवाह करार दिया

    अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्पष्ट किया कि ईरान की ओर से फैलाए जा रहे दावे पूरी तरह निराधार हैं, उन्होंने कहा कि ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के दौरान अमेरिकी सेना ने हजारों उड़ानें भरी हैं और इस दौरान किसी भी अमेरिकी F-15 विमान को नुकसान नहीं पहुंचा है, यह बयान ईरान के दावे के सीधे जवाब के रूप में आया

    ईरानी मीडिया में छपी रिपोर्ट में कहा गया था कि दक्षिणी तट के पास एक संदिग्ध या अनधिकृत विमान को ईरानी एयर डिफेंस ने निशाना बनाया, और दावा किया गया कि यह विमान अमेरिकी F-15 था, हालांकि इस दावे को किसी स्वतंत्र स्रोत या अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है

    अमेरिका ने अपने बयान में न केवल इस दावे को खारिज किया बल्कि यह भी संकेत दिया कि ईरान की ओर से इस तरह की जानकारी फैलाना एक प्रोपेगेंडा का हिस्सा हो सकता है, सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे दावे अक्सर रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने के लिए किए जाते हैं, खासकर तब जब क्षेत्र में तनाव चरम पर हो

    वहीं, F-15 जैसे फाइटर जेट दुनिया के सबसे उन्नत और शक्तिशाली लड़ाकू विमानों में से एक माने जाते हैं, जिन्हें अमेरिका की वायु शक्ति का अहम हिस्सा माना जाता है, ऐसे में किसी भी विमान को गिराने का दावा बहुत गंभीर माना जाता है और इसकी पुष्टि बिना ठोस सबूत के नहीं की जा सकती

    इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित किया कि पश्चिम एशिया में स्थिति कितनी संवेदनशील बनी हुई है और छोटी सी खबर भी बड़े अंतरराष्ट्रीय विवाद का रूप ले सकती है, फिलहाल अमेरिका ने अपने आधिकारिक बयान के जरिए स्थिति को स्पष्ट कर दिया है और ईरान के दावे को पूरी तरह गलत बताया है

     यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि सूचना युद्ध और वास्तविक सैन्य कार्रवाई के बीच अंतर समझना कितना जरूरी है, और जब तक आधिकारिक और स्वतंत्र पुष्टि न हो, तब तक ऐसे दावों को सावधानी से ही देखा जाना चाहिए

  • अमेरिका–इज़रायल की अटूट दोस्ती: रणनीति, राजनीति और वैश्विक शक्ति का अद्भुत गठजोड़

    अमेरिका–इज़रायल की अटूट दोस्ती: रणनीति, राजनीति और वैश्विक शक्ति का अद्भुत गठजोड़


    नई दिल्ली:अमेरिका और इज़रायल का रिश्ता आज के समय में केवल दोस्ती नहीं बल्कि एक गहरा रणनीतिक गठबंधन बन चुका है, जिसे वैश्विक राजनीति का सबसे मजबूत समीकरण माना जाता है, यह रिश्ता केवल भावनाओं पर नहीं बल्कि सुरक्षा, तकनीक, खुफिया जानकारी और आर्थिक हितों पर आधारित है, अमेरिका इज़रायल को मध्य पूर्व में अपना एक ऐसा मजबूत ठिकाना मानता है जो पूरे क्षेत्र में उसके हितों की रक्षा करता है, इज़रायल अमेरिका के लिए एक ऐसा सहयोगी है जो उसके रणनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है

    मध्य पूर्व जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जहां तेल और गैस के विशाल भंडार हैं, वहां इज़रायल अमेरिका के लिए एक सुरक्षा ढाल की तरह काम करता है, ईरान जैसे देशों के साथ तनाव के दौरान इज़रायल न केवल अपने हितों की रक्षा करता है बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका के हितों की भी सुरक्षा करता है, यही कारण है कि अमेरिका इज़रायल को हर साल अरबों डॉलर की सैन्य सहायता देता है, हालांकि यह सहायता अंततः अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ही वापस मिल जाती है क्योंकि इज़रायल इन पैसों से अमेरिकी हथियार खरीदता है

    युद्ध के मैदान में इन हथियारों के उपयोग से अमेरिका को वास्तविक समय का डेटा मिलता है जिससे वह अपने हथियारों को और उन्नत बना सकता है, मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसे आयरन डोम में भी अमेरिका की अहम भागीदारी है, यह सहयोग दोनों देशों को तकनीकी रूप से और मजबूत बनाता है

    खुफिया जानकारी के क्षेत्र में भी इज़रायल अमेरिका का बेहद भरोसेमंद साझेदार है, इज़रायल की खुफिया एजेंसी मोसाद का नेटवर्क दुनिया के कई हिस्सों में फैला हुआ है, खासकर इस्लामिक देशों और ईरान के अंदर इसकी पकड़ मजबूत मानी जाती है, इस एजेंसी से मिलने वाली जानकारियां अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं, जिससे वह अपने देश पर संभावित खतरों को समय रहते रोक पाता है

    तकनीकी और आर्थिक साझेदारी भी इस रिश्ते का अहम हिस्सा है, इज़रायल को स्टार्टअप नेशन कहा जाता है, जहां दुनिया की बड़ी कंपनियां जैसे इंटेल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट अपने रिसर्च सेंटर स्थापित कर चुकी हैं, इज़रायल और अमेरिका के बीच टेक्नोलॉजी और इनोवेशन का गहरा संबंध है, जिसने दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है

    अमेरिका की घरेलू राजनीति में भी इज़रायल का प्रभाव साफ देखा जा सकता है, अमेरिकी इज़रायल पब्लिक अफेयर्स कमेटी जैसी शक्तिशाली लॉबी वहां की विदेश नीति को प्रभावित करती है, कोई भी अमेरिकी नेता इज़रायल के खिलाफ खुलकर नहीं जा सकता क्योंकि इससे उसका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ सकता है

    इसके अलावा अमेरिका में एक बड़ा ईसाई वर्ग इज़रायल को धार्मिक दृष्टिकोण से समर्थन देता है, वे इसे अपनी आस्था का हिस्सा मानते हैं और इज़रायल की सुरक्षा को अपना कर्तव्य समझते हैं, यह धार्मिक और सांस्कृतिक समर्थन भी इस रिश्ते को मजबूत बनाता है

    इतिहास की बात करें तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने यूरोप से आए कई यहूदी वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों को शरण दी, जिनमें अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक शामिल थे, जिन्होंने परमाणु अनुसंधान और मैनहट्टन प्रोजेक्ट की नींव रखने में भूमिका निभाई, एडवर्ड टेलर और जॉन वॉन न्यूमैन जैसे वैज्ञानिकों ने अमेरिका को वैज्ञानिक महाशक्ति बनाने में योगदान दिया

    ऑपरेशन पेपरक्लिप के जरिए भी अमेरिका ने जर्मन वैज्ञानिकों को अपने साथ जोड़ा, जिससे अंतरिक्ष और रक्षा तकनीक में बड़ी प्रगति हुई, इस तरह यह रिश्ता केवल आज का नहीं बल्कि दशकों पुरानी रणनीतिक सोच का परिणाम है

  • पश्चिम एशिया तनाव पर IEA प्रमुख की चेतावनी, बोले-‘वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा खतरा’

    पश्चिम एशिया तनाव पर IEA प्रमुख की चेतावनी, बोले-‘वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा खतरा’


    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने अब पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। International Energy Agency (आईईए) के प्रमुख Fatih Birol ने साफ कहा है कि यह संकट केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। Iran, United States और Israel के बीच जारी टकराव का असर अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों में साफ दिखने लगा है। ऑस्ट्रेलिया में एक कार्यक्रम के दौरान बिरोल ने कहा कि दुनिया इस समय एक बड़े आर्थिक संकट की ओर बढ़ रही है और अगर हालात जल्द नहीं सुधरे तो कोई भी देश इसके प्रभाव से बच नहीं पाएगा।

    होर्मुज स्ट्रेट बना संकट की जड़, तेल सप्लाई पर असर

    इस पूरे संकट का सबसे बड़ा केंद्र Strait of Hormuz है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का अहम मार्ग है। दुनिया भर में खपत होने वाले करीब 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई इसी रास्ते से होती है और रोजाना लगभग 20 मिलियन बैरल कच्चा तेल यहां से गुजरता है। मौजूदा तनाव के कारण इस मार्ग से शिपिंग प्रभावित हुई है, जिससे ग्लोबल ऑयल मार्केट में अस्थिरता बढ़ गई है। हालांकि ईरान ने दावा किया है कि स्ट्रेट पूरी तरह बंद नहीं है और नेविगेशन जारी है, लेकिन जमीनी हालात निवेशकों और देशों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं।

    महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ने के संकेत

    तेल सप्लाई में रुकावट का सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने से ट्रांसपोर्ट, उत्पादन और रोजमर्रा की चीजों की लागत बढ़ जाती है। बिरोल ने इसे ग्लोबल ऑयल मार्केट के इतिहास की सबसे बड़ी सप्लाई बाधाओं में से एक बताया है। उन्होंने कहा कि अगर यह स्थिति बनी रहती है, तो ऊर्जा संकट गहरा सकता है और दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं दबाव में आ सकती हैं।

    कोई देश नहीं बचेगा असर से

    आईईए प्रमुख ने स्पष्ट कहा कि यह संकट किसी एक या दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर विकसित और विकासशील-दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा। भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों के लिए यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है, जहां महंगाई और चालू खाते के घाटे पर असर पड़ सकता है।

    IEA की सलाह: ऊर्जा बचत ही समाधान

    स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आईईए ने सरकारों, कंपनियों और आम लोगों के लिए कुछ सुझाव भी दिए हैं। इसमें जहां तक संभव हो वर्क फ्रॉम होम अपनाना, अनावश्यक हवाई यात्रा से बचना और ईंधन की खपत कम करना शामिल है। इसके अलावा इलेक्ट्रिक कुकिंग और अन्य आधुनिक विकल्पों को अपनाने पर भी जोर दिया गया है, ताकि एलपीजी और तेल पर निर्भरता कम की जा सके।

  • ईरान-इजरायल तनाव के बीच राष्ट्रपति हर्जोग का कड़ा संदेश न्यूक्लियर ठिकानों पर हमले के बाद बढ़ा संघर्ष

    ईरान-इजरायल तनाव के बीच राष्ट्रपति हर्जोग का कड़ा संदेश न्यूक्लियर ठिकानों पर हमले के बाद बढ़ा संघर्ष


    नई दिल्ली:ईरान और इजरायल के बीच जारी तनाव ने एक बार फिर गंभीर मोड़ ले लिया है हाल ही में 28 फरवरी 2026 से शुरू हुए सैन्य संघर्ष के दौरान ईरान ने इजरायल के न्यूक्लियर शहर अराद और डिमोना को निशाना बनाते हुए मिसाइल हमले किए इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय चिंता को और बढ़ा दिया है क्योंकि पहली बार इस संघर्ष में न्यूक्लियर ठिकानों पर सीधा हमला हुआ

    हमले के बाद इजरायली राष्ट्रपति Isaac Herzog ने तुरंत प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और हालात का जायजा लिया अराद में स्थित एक बेकरी को भी इस हमले में नुकसान पहुंचा जहां उन्होंने बेकरी मालिक से मुलाकात कर उनकी स्थिति को जाना हालांकि इस हमले में किसी भी नागरिक की मौत नहीं हुई लेकिन इमारतों को क्षति पहुंची

    राष्ट्रपति हर्जोग ने अपने दौरे के दौरान स्थानीय लोगों से बातचीत करते हुए बताया कि संकट के बावजूद नागरिकों ने सतर्कता और अनुशासन का परिचय दिया उन्होंने कहा कि सायरन बजते ही लोग सुरक्षित स्थानों और बंकरों में चले गए जिससे बड़ी जनहानि टल गई यह दर्शाता है कि नागरिक सुरक्षा और प्रशासनिक तैयारी ने संभावित बड़े नुकसान को रोका

    हर्जोग ने सोशल मीडिया पर भी अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए एक परिवार की कहानी का उल्लेख किया जिनका बेकरी व्यवसाय हमले की चपेट में आया उन्होंने बताया कि इस परिवार के बेटे को 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के दौरान अगवा कर लिया गया था और बाद में उसे एक बंधक समझौते के तहत वापस लाया गया यह परिवार कई कठिनाइयों का सामना कर चुका है लेकिन इसके बावजूद उनकी हिम्मत और सकारात्मकता इजरायली समाज की मजबूती को दर्शाती है

    उन्होंने आगे कहा कि छोटे व्यवसायों का समर्थन करना केवल आर्थिक सहायता नहीं बल्कि राष्ट्र की भावना को मजबूत करना है उन्होंने नागरिकों के धैर्य और साहस की सराहना करते हुए कहा कि इजरायली आत्मा इन कठिन परिस्थितियों में भी मजबूत बनी हुई है

    ईरान को सीधी चेतावनी देते हुए राष्ट्रपति हर्जोग ने कहा कि मिसाइलों और हिंसा के जरिए इंसानियत को नुकसान पहुंचाने का प्रयास गलत है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इजरायल अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा और किसी भी खतरे का जवाब देने में सक्षम है

    अपने बयान में उन्होंने यह भी दोहराया कि इजरायल की रणनीति स्पष्ट है और वह अपने उद्देश्यों को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है उन्होंने जोर देकर कहा कि संघर्ष का अंत तभी संभव है जब ईरान के पास न्यूक्लियर हथियार और बैलिस्टिक क्षमताएं नहीं रहेंगी

    यह पूरा घटनाक्रम पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को दर्शाता है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता को और गहरा करता है इस संघर्ष का भविष्य क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है