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  • US में विदेशी छात्रों को बड़ा झटका देने की तैयारी…. पढ़ाई के बाद नौकरी के लिए देनी पड़ेगी 83 लाख की फीस!

    US में विदेशी छात्रों को बड़ा झटका देने की तैयारी…. पढ़ाई के बाद नौकरी के लिए देनी पड़ेगी 83 लाख की फीस!


    वाशिंगटन।
    ट्रंप सरकार (Trump Government) अमेरिका (America) में उच्च शिक्षा लेने वाले विदेशी छात्रों को बड़ा झटका देने की तैयारी में है. इसके तहत अमेरिकी यूनिवर्सिटी (American University) से पढ़ाई पूरी करने के बाद विदेशी छात्रों को काम करने के लिए 1 लाख डॉलर (लगभग 83 लाख रुपये) की फीस देनी पड़ सकती है।

    अमेरिकी सरकार ये फीस ‘ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग’ (OPT) प्रोग्राम पर लागू करेगी. ये व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अपने स्टूडेंट वीजा पर ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद एक से तीन साल तक अमेरिका में काम करने की परमिशन देती है।

    साल 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 4,19,000 विदेशी छात्र इस प्रोग्राम के तहत अमेरिका में काम कर रहे थे. सूत्रों की मानें तो अगर ये नियम लागू होता है, तो अमेरिका जाकर पढ़ाई करने का विदेशी छात्रों का रुझान काफी कम हो सकता है।

    इस कदम को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लीगल इमिग्रेशन को सीमित करने के फैसले के तहत भी देखा जा रहा है. इस फैसले से अमेरिकी विश्वविद्यालयों की वित्तीय स्थिति पर बुरा असर पड़ सकता है, जो विदेशी छात्रों की फीस पर काफी हद तक निर्भर हैं. इसके अलावा सिलिकॉन वैली और वॉल स्ट्रीट की दिग्गज तकनीकी और वित्तीय कंपनियों को भी तकनीकी पदों पर टैलेंट्स हायर करने में भारी मशक्कत करनी पड़ेगी।

    इससे पहले ट्रंप सरकार ने H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर की लेवी लगाने की कोशिश की थी. हालांकि, बोस्टन की एक अदालत ने पिछले सप्ताह ही सरकार को H-1B फीस वसूलने से रोक दिया था. अब माना जा रहा है कि OPT पर ये भारी फीस लगाकर सरकार अपने उसी मकसद को हासिल करना चाहती है।

    हालांकि, होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (DHS) में अभी इस पर चर्चा जारी है. व्हाइट हाउस इसे अंतिम मंजूरी देगा या नहीं, ये फैसला होना अभी बाकी है. साथ ही ये भी तय नहीं हुआ है कि ये फीस छात्र खुद भरेंगे या उन्हें नौकरी देने वाली कंपनियां।

  • US: चीनी रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर्स से देश की सुरक्षा पर खतरा…! ट्रंप सरकार ने किए बैन

    US: चीनी रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर्स से देश की सुरक्षा पर खतरा…! ट्रंप सरकार ने किए बैन


    वाशिंगटन।
    रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर्स (Robotic Vacuum Cleaners) इनोवेशन और इंजीनियरिंग (Innovation and Engineering) का शानदार नमूने की तरह हैं. लेकिन रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर्स सुरक्षा के लिहाज से कई बार खतरनाक साबित हो सकते हैं. अमेरिका (America) में अब रोबोट वैक्यूम क्लीनर को लेकर बड़ा फैसला लिया गया है. अमेरिकी सरकार ने नए नियम लागू किए हैं, जिनकी वजह से चीन समेत दूसरे देशों में बने कई नए रोबोट वैक्यूम क्लीनर अमेरिकी बाजार में नहीं आ पाएंगे. इस फैसले के पीछे वजह नैशनल सिक्योरिटी बताई गई है।

    यह फैसला अमेरिकी फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) ने लिया है. पहले माना जा रहा था कि यह नियम सिर्फ ह्यूमनॉइड रोबोट और रोबोट डॉग पर लागू होगा, लेकिन बाद में साफ किया गया कि इसमें ऐसे रोबोट वैक्यूम क्लीनर भी शामिल हैं जो सेंसर, कैमरा, वायरलेस कनेक्टिविटी और सॉफ्टवेयर की मदद से अपने आसपास का नक्शा बनाकर काम करते हैं।


    रोबोट वैक्यूम से डर क्यों?

    आज के रोबोट वैक्यूम सिर्फ फर्श साफ नहीं करते. इनमें कैमरा, LiDAR सेंसर, Wi-Fi और कई स्मार्ट फीचर होते हैं. ये घर का नक्शा तैयार करते हैं और मोबाइल ऐप से कंट्रोल किए जाते हैं. यही नहीं, रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर्स आपके घर का पूरा खाका तैयार करते हैं ताकि बेहतर तरीके से सफाई की जा सके. लेकिन इससे ये भी सवाल उठता है कि अगर लोगों के घरों के मैप्स गलती से किसी साइबर क्रिमिनल्स या स्टेट स्पॉन्सर्ड स्पाई एजेंसी को मिल जाए तो किसी मुल्क के लिए काफी खतरनाक हो सकता है.

    रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर में सेंसर्स के साथ कैमरे भी लगे होते हैं. यानी घर का कोना कोना इनकी जद में होता है और बाकायदा रिकॉर्डिंग भी की जाती है. पूरे घर का वीडियो बनता है. घर में कौन रह रहा है कितने लोग हैं और क्या कर रहे हैं सबकुछ रिकॉर्ड हो सकता है. हालांकि बड़ी रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर्स कंपनियां प्राइवेसी को लेकर बड़े दावे करती हैं. जैसे – यूजर डेटा एन्क्रिप्टेड होता है और इसका मिसयूज किसी भी हालत में नहीं किया जा सकता है।

    बहरहाल, अमेरिकी सरकार का कहना है कि ऐसे डिवाइस बड़ी मात्रा में डेटा इकट्ठा करते हैं. अगर यह डेटा गलत हाथों में चला जाए तो सुरक्षा से जुड़ी चिंता पैदा हो सकती है. इसी वजह से यह कदम उठाया गया है।


    किन कंपनियों पर पड़ सकता है असर?

    रोबोट वैक्यूम बाजार में चीन की कंपनियों का दबदबा है. Roborock, Ecovacs, Xiaomi, Narwal और Dreame जैसे ब्रांड दुनिया के कई देशों में अपने प्रोडक्ट बेचते हैं. नए नियमों का सबसे ज्यादा असर इन्हीं कंपनियों पर पड़ सकता है।


    क्या पुराने रोबोट वैक्यूम बंद हो जाएंगे?

    नहीं. अगर आपने पहले से कोई रोबोट वैक्यूम खरीदा हुआ है तो उसे इस्तेमाल करने पर कोई रोक नहीं है. यह नियम सिर्फ नए मॉडल और फ्यूचर में होने वाले नए आयात पर लागू होगा. यानी पहले से बिक चुके या मंजूरी पा चुके डिवाइस फिलहाल प्रभावित नहीं होंगे।


    क्या सिर्फ रोबोट वैक्यूम पर ही असर होगा?

    नहीं. यह फैसला सिर्फ रोबोट वैक्यूम तक लिमिटेड नहीं है. कुछ दूसरे एडवांस मोबाइल रोबोट भी इस दायरे में आते हैं. हालांकि ड्रोन, मेडिकल रोबोट, कनेक्टेड वाहन और कई दूसरे रोबोट इस नियम से बाहर रखे गए हैं.


    चीन ने क्या कहा?

    अमेरिका के इस फैसले के बाद चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. चीन का कहना है कि नैशनल सिक्योरिटी का हवाला देकर चीनी कंपनियों को निशाना बनाया जा रहा है. उसने चेतावनी दी है कि अगर यह नीति जारी रही तो जवाबी कदम उठाए जा सकते हैं.


    भारत के यूजर्स पर क्या असर पड़ेगा?

    फिलहाल इस फैसले का भारत में सीधे तौर पर कोई असर नहीं पड़ेगा. भारत में Roborock, Dreame, Ecovacs, Xiaomi और दूसरे ब्रांड अपने प्रोडक्ट बेचते रहेंगे. हालांकि अगर अमेरिका में इन कंपनियों की बिक्री प्रभावित होती है, तो फ्यूचर में में उनकी ग्लोबल स्ट्रैटिजी, कीमतों या नए प्रोडक्ट लॉन्च पर कुछ असर देखने को मिल सकता है।

  • हूती नाकेबंदी के बीच भारत के लिए राहत, सऊदी तेल लेकर लाल सागर से सुरक्षित निकले दो टैंकर

    हूती नाकेबंदी के बीच भारत के लिए राहत, सऊदी तेल लेकर लाल सागर से सुरक्षित निकले दो टैंकर


    नई दिल्ली । यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब की तेल आपूर्ति पर नाकेबंदी की घोषणा के बीच भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। सऊदी अरब से कच्चा तेल लेकर भारत आ रहे दो बड़े तेल टैंकर लाल सागर के संवेदनशील क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकल गए हैं। इससे फिलहाल भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर तत्काल किसी बड़े असर की आशंका कम हो गई है, हालांकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल बाजार और समुद्री व्यापार को लेकर चिंता जरूर बढ़ा दी है।

    सूत्रों के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) द्वारा किराए पर लिया गया सुएजमैक्स श्रेणी का टैंकर अमेजन सऊदी अरब के यनबू बंदरगाह से करीब 10 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर रवाना हुआ था। वहीं मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) के लिए अफ्रामैक्स श्रेणी का टैंकर रोडोस लगभग 7 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर भारत की ओर बढ़ रहा है। दोनों जहाज 20 जुलाई के आसपास यनबू बंदरगाह से निकले थे और शुरुआत में स्वेज नहर की दिशा में आगे बढ़े।

    हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी तेल आपूर्ति को निशाना बनाने की चेतावनी के बाद दोनों टैंकरों ने सुरक्षा कारणों से अपनी लोकेशन बताने वाला ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर दिया और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के रास्ते लाल सागर से बाहर निकल गए। यह कदम समुद्री सुरक्षा के लिहाज से एहतियात के तौर पर उठाया गया, क्योंकि हाल के महीनों में इस क्षेत्र में कई व्यापारिक जहाजों पर हमलों की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

    लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माने जाते हैं। एशिया और यूरोप के बीच बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और अन्य सामान इसी रास्ते से भेजा जाता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य तनाव या नाकेबंदी अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर सीधा असर डाल सकती है।

    भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है और सऊदी अरब उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। इसलिए इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा भारतीय अर्थव्यवस्था, ईंधन कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन सकती है। फिलहाल दोनों टैंकरों के सुरक्षित आगे बढ़ने से तत्काल आपूर्ति बाधित होने का खतरा टल गया है।

    हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है या लाल सागर के समुद्री मार्ग पर लंबे समय तक खतरा बना रहता है, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है। इससे भारत जैसे आयातक देशों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ सकता है। ऐसे में सरकार और तेल कंपनियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं ताकि जरूरत पड़ने पर वैकल्पिक आपूर्ति और समुद्री मार्गों का उपयोग किया जा सके।

  • ट्रंप का दावा: गाजा से चरणबद्ध तरीके से हटेगी इजरायली सेना, हमास के निरस्त्रीकरण पर हुआ समझौता

    ट्रंप का दावा: गाजा से चरणबद्ध तरीके से हटेगी इजरायली सेना, हमास के निरस्त्रीकरण पर हुआ समझौता


    नई दिल्ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा संघर्ष को लेकर बड़ा दावा करते हुए कहा है कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की मध्यस्थता में हमास और गाजा में सक्रिय अन्य सशस्त्र संगठनों के पूर्ण निरस्त्रीकरण पर एक “ऐतिहासिक समझौता” हुआ है। ट्रंप के अनुसार, इस प्रक्रिया के पूरा होने के साथ ही इजरायल अपनी सेना को गाजा से चरणबद्ध तरीके से वापस बुलाएगा।

    निरस्त्रीकरण के साथ होगी सेना की वापसी
    ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर कहा कि जैसे-जैसे हमास और अन्य हथियारबंद संगठनों का निरस्त्रीकरण पूरा होगा, इजरायली सेना गाजा से पीछे हटेगी। इसके बाद गाजा की सुरक्षा की जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय स्टेबलाइजेशन फोर्स और नई फिलिस्तीनी पुलिस संभालेगी। उनका कहना है कि इससे इजरायल की सुरक्षा मजबूत होगी और गाजा का इस्तेमाल भविष्य में किसी आतंकी हमले के लिए नहीं हो सकेगा।

    नई फिलिस्तीनी सरकार बनाने की योजना
    ट्रंप के मुताबिक, समझौते के तहत गाजा में नई फिलिस्तीनी सरकार का गठन किया जाएगा, जो ‘बोर्ड ऑफ पीस’ के साथ मिलकर प्रशासन, पुनर्निर्माण और सामान्य जनजीवन बहाल करने का काम करेगी। उन्होंने इसे अपने 20-सूत्रीय शांति योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया और कहा कि इसका उद्देश्य क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित करना है।

    मध्यस्थ देशों की सराहना
    अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस समझौते में मिस्र, कतर और तुर्किये की मध्यस्थता की सराहना की। हालांकि, ट्रंप के दावों पर हमास की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

    हिंसा अब भी जारी
    समझौते के दावे के बीच गाजा में हिंसा थमने के संकेत नहीं मिले हैं। फिलिस्तीनी स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, गुरुवार को इजरायली हवाई हमलों में कम से कम छह लोगों की मौत हुई, जिनमें दो बच्चे भी शामिल हैं।

    व्हाइट हाउस ने भी किया समर्थन
    व्हाइट हाउस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी बयान में कहा कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ने गाजा में हमास और अन्य सशस्त्र समूहों के पूर्ण निरस्त्रीकरण पर ऐतिहासिक समझौता कराया है। इसे क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया।

    क्या है ‘बोर्ड ऑफ पीस’?
    ट्रंप के अनुसार, ‘बोर्ड ऑफ पीस’ वर्ष 2026 में गठित एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जिसे गाजा में युद्ध के बाद पुनर्निर्माण, प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था की निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ट्रंप इस संस्था के संस्थापक अध्यक्ष हैं। उनका दावा है कि यह पहल गाजा में नई शासन व्यवस्था स्थापित करने और भविष्य में 7 अक्टूबर जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की दिशा में अहम साबित होगी।

  • ट्रंप-जेलेंस्की मुलाकात के बाद रूस ने यूक्रेन पर कर दी मिसाइल और ड्रोन की बारिश

    ट्रंप-जेलेंस्की मुलाकात के बाद रूस ने यूक्रेन पर कर दी मिसाइल और ड्रोन की बारिश


    मॉस्को/कीव।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की वॉशिंगटन में हुई बैठक के कुछ ही समय बाद रूस ने यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। यूक्रेनी अधिकारियों के अनुसार, हमलों में देश के कई प्रमुख शहरों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। इन हमलों की टाइमिंग को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।

    रिपोर्टों के अनुसार, रूस ने बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के साथ बड़ी संख्या में ड्रोन का इस्तेमाल किया। हमलों का असर कीव, ल्विव और नीप्रोपेत्रोव्स्क सहित कई क्षेत्रों में देखा गया। यूक्रेन ने दावा किया कि कई सैन्य और नागरिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया, जबकि रूस का कहना है कि उसके हमले केवल सैन्य लक्ष्यों पर केंद्रित थे।

    पैट्रियट एयर डिफेंस पर चर्चा के बीच हमला

    ट्रंप और जेलेंस्की की बैठक के दौरान यूक्रेन की वायु सुरक्षा क्षमता बढ़ाने और पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम की उपलब्धता पर चर्चा हुई थी। माना जा रहा है कि रूस ने ऐसे समय में हमला कर यूक्रेन की मौजूदा वायु सुरक्षा चुनौतियों का लाभ उठाने की कोशिश की। हालांकि, इस संबंध में रूस की ओर से आधिकारिक तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है।

    पोलैंड सीमा के निकट भी बढ़ी सतर्कता

    हमलों के दौरान एक रूसी मिसाइल के पोलैंड की सीमा के निकट पहुंचने की खबरों के बाद पड़ोसी देश पोलैंड ने अपनी वायु सुरक्षा व्यवस्था को अलर्ट पर रखा। पोलिश अधिकारियों ने स्थिति पर नजर रखने और सुरक्षा उपाय बढ़ाने की पुष्टि की है। हालांकि, घटना के कारणों और परिस्थितियों की जांच जारी है।

    रूस ने सैन्य ठिकानों को बनाया निशाना

    रूस के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि हमलों का उद्देश्य यूक्रेन के सैन्य एयरबेस, हथियार निर्माण इकाइयों, ड्रोन भंडारण केंद्रों और अन्य सैन्य अवसंरचना को निशाना बनाना था। मंत्रालय ने इसे यूक्रेन की ओर से हाल के दिनों में रूस के भीतर किए गए ड्रोन हमलों के जवाब में की गई कार्रवाई बताया।

    कूटनीतिक प्रयासों पर असर की आशंका

    विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप-जेलेंस्की बैठक के तुरंत बाद हुए इन हमलों से रूस-यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के कूटनीतिक प्रयासों को झटका लग सकता है। हालांकि, हमलों की टाइमिंग के पीछे रूस का क्या संदेश था, इस बारे में आधिकारिक स्तर पर कोई पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इससे जुड़े विभिन्न दावों को अभी विश्लेषकों के आकलन के रूप में ही देखा जा रहा है।

    रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के बीच ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर क्षेत्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

  • भारत और न्यूजीलैंड के रिश्तों में ऐतिहासिक बदलाव पीएम मोदी के दौरे ने रक्षा व्यापार और समुद्री सहयोग को दी नई दिशा

    भारत और न्यूजीलैंड के रिश्तों में ऐतिहासिक बदलाव पीएम मोदी के दौरे ने रक्षा व्यापार और समुद्री सहयोग को दी नई दिशा


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया न्यूजीलैंड यात्रा ने भारत और न्यूजीलैंड के द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। लगभग दो दशक बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की इस ऐतिहासिक यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों में निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। न्यूजीलैंड इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स द्वारा प्रकाशित एक विश्लेषण में कहा गया है कि इस यात्रा के बाद दोनों देशों के संबंध पारंपरिक सहयोग से आगे बढ़कर व्यापक रणनीतिक साझेदारी के नए चरण में प्रवेश कर चुके हैं।

    दो दिवसीय दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने वर्ष 2030 तक के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार किया। इस रणनीतिक साझेदारी के अंतर्गत रक्षा व्यापार समुद्री सुरक्षा कृषि पर्यटन खेल संस्कृति विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहित अनेक क्षेत्रों में सहयोग को नई दिशा देने पर सहमति बनी। दोनों नेताओं ने स्पष्ट किया कि आने वाले वर्षों में दोनों देश साझा हितों और वैश्विक चुनौतियों का मिलकर सामना करेंगे।

    यात्रा के दौरान सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर लगभग 7 बिलियन न्यूजीलैंड डॉलर तक पहुंचाने का रखा गया। इसके लिए निवेश व्यापारिक सहयोग आपूर्ति श्रृंखला और नई आर्थिक संभावनाओं को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया जाएगा। तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था और विशाल उपभोक्ता बाजार को देखते हुए न्यूजीलैंड भारत को अपनी दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति का महत्वपूर्ण साझेदार मान रहा है।

    विश्लेषण में उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2030 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत का बढ़ता मध्यम वर्ग वैश्विक बाजार के लिए नई संभावनाएं प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि न्यूजीलैंड भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को और मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान दे रहा है।

    दौरे के दौरान कुल 18 महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए जिनमें 10 समझौते और सहमति पत्र शामिल हैं। इन समझौतों का उद्देश्य केवल व्यापार बढ़ाना नहीं बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग को मजबूत करना भी है। रोडमैप टू 2030 के माध्यम से दोनों देशों ने रक्षा सहयोग समुद्री सुरक्षा वैज्ञानिक अनुसंधान शिक्षा सांस्कृतिक आदान प्रदान और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा देने का संकल्प लिया है।

    रक्षा और समुद्री सुरक्षा इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष रहे। दोनों देशों ने म्यूचुअल लॉजिस्टिक्स सपोर्ट अरेंजमेंट पर सहमति जताई जिससे भारतीय नौसेना और न्यूजीलैंड रक्षा बल जरूरत पड़ने पर एक दूसरे की सुविधाओं का उपयोग ईंधन भरने रखरखाव और रसद सहायता के लिए कर सकेंगे। इसके अलावा हिंद प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और समन्वय को मजबूत करने के लिए एक नए समुद्री सहयोग समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए।

    आतंकवाद के खिलाफ सहयोग को भी नई मजबूती दी गई है। दोनों देशों ने संयुक्त कार्य समूह गठित करने पर सहमति जताई है जो खुफिया सूचनाओं के आदान प्रदान और सुरक्षा समन्वय को और प्रभावी बनाएगा। साथ ही अवैध मछली पकड़ने जैसी समुद्री चुनौतियों से निपटने के लिए भी साझा प्रयास किए जाएंगे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह यात्रा केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं बल्कि भारत और न्यूजीलैंड के संबंधों को नई रणनीतिक दिशा देने वाला महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले वर्षों में यह साझेदारी आर्थिक विकास क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक सहयोग के नए अवसर पैदा करेगी तथा हिंद प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों की भूमिका को और अधिक मजबूत बनाएगी।

  • वॉशिंगटन में हाई लेवल बैठक इजरायल और अमेरिका ने रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देने की दिशा में बढ़ाए कदम

    वॉशिंगटन में हाई लेवल बैठक इजरायल और अमेरिका ने रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई देने की दिशा में बढ़ाए कदम


    नई दिल्ली। अमेरिका और इजरायल के बीच रणनीतिक और रक्षा सहयोग को नई मजबूती देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल तेज होती दिखाई दे रही है। वॉशिंगटन दौरे पर पहुंचे इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के साथ उच्चस्तरीय बैठक कर दोनों देशों के साझा सुरक्षा हितों और भविष्य की रक्षा रणनीति पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान लगभग 16 अरब डॉलर के संभावित संयुक्त रक्षा फंड के गठन का प्रस्ताव भी प्रमुख विषय रहा। माना जा रहा है कि इस फंड का उपयोग अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों के अनुसंधान विकास और नई रक्षा तकनीकों को तैयार करने के लिए किया जाएगा जिससे दोनों देशों की सैन्य क्षमता और अधिक मजबूत हो सके।

    बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के साथ भी अलग अलग मुलाकात की। इन बैठकों में पश्चिम एशिया की मौजूदा सुरक्षा स्थिति ईरान की गतिविधियों लेबनान से जुड़े हालात और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर विचार विमर्श किया गया। दोनों देशों ने रक्षा सहयोग को और अधिक प्रभावी बनाने तथा साझा सुरक्षा चुनौतियों का मिलकर सामना करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने बैठक के बाद सोशल मीडिया पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि इजरायल के साथ अमेरिका की रक्षा साझेदारी बेहद मजबूत है और दोनों देश साझा सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए लगातार साथ काम करते रहेंगे। उन्होंने कहा कि उनकी टीम के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी बैठक में भाग लिया और भविष्य की रणनीतिक योजनाओं पर सकारात्मक चर्चा हुई।

    सूत्रों के अनुसार प्रस्तावित 16 अरब डॉलर का संयुक्त रक्षा फंड नई पीढ़ी की रक्षा प्रणालियों मिसाइल तकनीक और उन्नत सैन्य अनुसंधान को गति देने के उद्देश्य से तैयार किया जा सकता है। यदि इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी मिलती है तो यह अमेरिका और इजरायल के रक्षा सहयोग के इतिहास में सबसे बड़े संयुक्त निवेशों में शामिल होगा।

    बैठक के दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उससे जुड़े सुरक्षा जोखिमों पर भी गंभीर चर्चा हुई। बताया गया कि नेतन्याहू ने अमेरिकी पक्ष को कुछ खुफिया जानकारियों से अवगत कराया जिनका संबंध कथित तौर पर ईरान की भूमिगत परमाणु गतिविधियों से है। हालांकि इस विषय पर दोनों देशों के बीच रणनीतिक समन्वय बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

    व्हाइट हाउस के सूत्रों के अनुसार दोनों देशों के नेताओं के बीच अब्राहम समझौते को आगे बढ़ाने और पश्चिम एशिया में स्थायी शांति स्थापित करने के प्रयासों पर भी बातचीत हुई। अमेरिका क्षेत्र में कूटनीतिक समाधान को बढ़ावा देना चाहता है जबकि इजरायल सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर सख्त रुख बनाए हुए है। इसके बावजूद दोनों देशों ने अपने संबंधों को और मजबूत करने तथा साझा चुनौतियों का मिलकर समाधान निकालने की इच्छा व्यक्त की।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह बैठक केवल रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं है बल्कि पश्चिम एशिया की बदलती भू राजनीतिक परिस्थितियों में अमेरिका और इजरायल की संयुक्त रणनीति को भी नई दिशा दे सकती है। आने वाले समय में इस प्रस्तावित रक्षा फंड और सुरक्षा सहयोग से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले सामने आ सकते हैं जो वैश्विक रणनीतिक संतुलन पर भी असर डाल सकते हैं।

  • सलमान रुश्दी पर हमले के मामले में बड़ा फैसला, हमलावर आतंकवाद से जुड़े आरोपों में भी दोषी करार

    सलमान रुश्दी पर हमले के मामले में बड़ा फैसला, हमलावर आतंकवाद से जुड़े आरोपों में भी दोषी करार

    नई दिल्ली । बुकर पुरस्कार विजेता लेखक सलमान रुश्दी पर वर्ष 2022 में हुए जानलेवा हमले के मामले में अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत की जूरी ने आरोपी हादी मतर को आतंकवाद से जुड़े आरोपों में दोषी ठहराया है। इससे पहले वह न्यूयॉर्क राज्य की अदालत में हत्या के प्रयास के मामले में भी दोषी करार दिया जा चुका है और वर्तमान में सजा काट रहा है। ताजा फैसले के बाद उस पर अतिरिक्त संघीय सजा का रास्ता भी खुल गया है।

    अभियोजन पक्ष ने अदालत में दलील दी कि हादी मतर ने सलमान रुश्दी पर हमला अकेले नहीं किया, बल्कि वह ईरान से जुड़े एक संगठन के समर्थन और विचारधारा से प्रभावित होकर काम कर रहा था। अभियोजकों ने अदालत के समक्ष ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत किए, जिनमें आरोपी की तस्वीरें और वीडियो शामिल थे। इन साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने माना कि आरोपी पर लगाए गए आतंकवाद से संबंधित आरोप साबित होते हैं।

    मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि हमला वर्ष 1989 में जारी उस विवादित फतवे की पृष्ठभूमि से जुड़ा था, जिसमें सलमान रुश्दी के खिलाफ कार्रवाई की अपील की गई थी। यह फतवा उनके उपन्यास ‘सैटेनिक वर्सेज’ को लेकर उत्पन्न विवाद के बाद जारी हुआ था। इसी संदर्भ को अभियोजन ने हमले के संभावित उद्देश्य के रूप में अदालत के सामने रखा।

    दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने यह स्वीकार किया कि हादी मतर ने लेखक पर हमला किया था, लेकिन उसने यह दलील दी कि आरोपी ने यह कृत्य किसी संगठन के निर्देश पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत रूप से किया। बचाव पक्ष का कहना था कि मतर अपनी धार्मिक भावनाओं के कारण आक्रोशित था और उसने किसी विदेशी सरकार या संगठन के साथ मिलकर साजिश नहीं रची।

    79 वर्षीय सलमान रुश्दी पर अगस्त 2022 में न्यूयॉर्क राज्य के चौटाक्वा इंस्टीट्यूशन में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान हमला हुआ था। विडंबना यह थी कि उस समय वह लेखकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा से जुड़े विषय पर बोलने वाले थे। कार्यक्रम शुरू होने से पहले मंच पर पहुंचे आरोपी ने उन पर कई बार चाकू से हमला किया, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गए।

    हमले के कारण सलमान रुश्दी की एक आंख की रोशनी चली गई और उनके हाथ तथा शरीर के अन्य हिस्सों में भी गंभीर चोटें आईं। अदालत में गवाही के दौरान उन्होंने बताया कि हमले के कारण उन्हें स्थायी शारीरिक नुकसान हुआ है और अब वह पहले की तरह सामान्य जीवन नहीं जी सकते। उन्होंने अपने अनुभवों और हमले के बाद के संघर्ष को लेकर एक पुस्तक भी लिखी है, जिसमें उन्होंने पूरे घटनाक्रम का विस्तार से उल्लेख किया है।

    अमेरिकी न्याय व्यवस्था के तहत किसी एक घटना में राज्य और संघीय स्तर पर अलग-अलग कानूनों के आधार पर मुकदमा चलाया जा सकता है। इसी प्रक्रिया के तहत हादी मतर को पहले राज्य अदालत में हत्या के प्रयास के मामले में दोषी ठहराया गया था, जबकि अब संघीय अदालत ने उसे आतंकवाद से जुड़े आरोपों में भी दोषी माना है। इस मामले में नवंबर में सजा सुनाई जानी है और उसे बिना पैरोल के आजीवन कारावास तक की सजा मिल सकती है।

    यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लेखकों की सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मामलों में अमेरिकी न्याय प्रणाली की कार्रवाई के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मामले पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लंबे समय से नजर बनी हुई थी और अब संघीय अदालत के फैसले के बाद इसकी कानूनी प्रक्रिया एक नए चरण में पहुंच गई है।

  • PoK में प्रदर्शन, बलूचिस्तान पर भी उठे सवाल; बढ़ते असंतोष के बीच पाकिस्तान की आंतरिक चुनौतियां गहराईं

    PoK में प्रदर्शन, बलूचिस्तान पर भी उठे सवाल; बढ़ते असंतोष के बीच पाकिस्तान की आंतरिक चुनौतियां गहराईं

    नई दिल्ली । पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में जारी विरोध प्रदर्शनों और हिंसा की घटनाओं ने पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। क्षेत्र में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच बढ़ते तनाव के बीच कई लोगों की मौत और बड़ी संख्या में घायल होने के दावे सामने आए हैं। इन घटनाओं के बाद स्थानीय संगठनों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई का विरोध तेज कर दिया है, जबकि राजनीतिक स्तर पर भी सरकार और सेना की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

    क्षेत्र में सक्रिय जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) का कहना है कि बुनियादी सुविधाओं, महंगाई, बिजली संकट और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब व्यापक जन असंतोष का रूप ले चुका है। संगठन का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया, जिससे कई लोगों की जान गई। संगठन ने इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है।

    स्थानीय स्तर पर यह भी दावा किया जा रहा है कि कई स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और अतिरिक्त बल तैनात किए गए हैं। इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध और आवाजाही पर नियंत्रण जैसे कदमों की भी चर्चा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान सरकार की ओर से इन दावों पर अलग रुख सामने आया है और प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दे रहा है।

    राजनीतिक स्तर पर भी इन घटनाओं ने बहस को तेज कर दिया है। पाकिस्तान के कुछ नेताओं ने देश की मौजूदा परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी है कि यदि विभिन्न क्षेत्रों की शिकायतों का समाधान नहीं किया गया तो आंतरिक असंतोष और बढ़ सकता है। इन बयानों में बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों का भी उल्लेख किया गया, जहां पहले से सुरक्षा और राजनीतिक चुनौतियां बनी हुई हैं। हालांकि, यह राजनीतिक टिप्पणियां हैं और इन्हें आधिकारिक सरकारी आकलन नहीं माना जा सकता।

    इसी बीच, पाकिस्तान के रक्षा प्रतिष्ठान की नीतियों को लेकर भी विपक्षी नेताओं और कुछ विश्लेषकों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि केवल सुरक्षा उपायों से स्थिति सामान्य नहीं होगी और लोगों की सामाजिक तथा आर्थिक मांगों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। वहीं सरकार समर्थक पक्ष का तर्क है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है और किसी भी प्रकार की हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे भी इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू बनकर सामने आए हैं। प्रदर्शनकारियों से जुड़े संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र जांच की मांग की है। वहीं मानवाधिकार संगठनों ने भी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और बल प्रयोग के आरोपों की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर दिया है। इन संगठनों का कहना है कि किसी भी विवादित स्थिति में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

    विश्लेषकों का मानना है कि PoK में जारी घटनाक्रम केवल स्थानीय प्रशासनिक चुनौती नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान के सामने मौजूद व्यापक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों को भी उजागर करता है। आने वाले दिनों में सरकार की रणनीति, राजनीतिक संवाद और सुरक्षा व्यवस्था की दिशा पर सभी की नजर रहेगी। फिलहाल विभिन्न पक्षों के दावों और आरोपों के बीच स्थिति संवेदनशील बनी हुई है और घटनाक्रम पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

  • चीन पर ईरान को पाकिस्तान के रास्ते हथियार भेजने के आरोप, ट्रंप बोले- ऐसा हुआ तो होगी निराशा

    चीन पर ईरान को पाकिस्तान के रास्ते हथियार भेजने के आरोप, ट्रंप बोले- ऐसा हुआ तो होगी निराशा

    नई दिल्ली । अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच हाल के महीनों में बढ़े तनाव के बीच एक नई रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा छेड़ दी है। दावा किया गया है कि चीन, पाकिस्तान के रास्ते ईरान को 400 मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम (MANPADS) या रॉकेट लॉन्चर उपलब्ध कराने की तैयारी में है। इन दावों के सामने आने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हैरानी जताते हुए कहा कि यदि चीन वास्तव में ईरान को हथियार उपलब्ध करा रहा है तो यह बेहद निराशाजनक होगा। दूसरी ओर चीन ने ऐसे सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।

    हालिया संघर्ष के बाद ईरान अपनी हवाई सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है। इसी संदर्भ में यह दावा सामने आया कि ईरान ने चीन से 400 मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने का समझौता किया है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि इन हथियारों की आपूर्ति पाकिस्तान के माध्यम से गुप्त तरीके से की जा रही है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और चीन ने आधिकारिक तौर पर किसी भी प्रकार की सैन्य आपूर्ति से इनकार किया है।

    बताया जा रहा है कि इस कथित रक्षा सौदे का मूल्य लगभग 6 से 7 करोड़ डॉलर के बीच हो सकता है। यदि ऐसी कोई डील होती है तो इससे ईरान की कम दूरी की हवाई सुरक्षा क्षमता को मजबूती मिल सकती है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि MANPADS जैसे सिस्टम कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोन के खिलाफ प्रभावी माने जाते हैं। हालांकि इस पूरे मामले को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक दस्तावेज या सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उन्हें पहले भरोसा दिलाया था कि चीन ईरान को हथियार उपलब्ध नहीं कराएगा। ट्रंप ने कहा कि यदि इन रिपोर्टों में सच्चाई है तो यह उनके लिए निराशाजनक होगा। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई अप्रत्याशित घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन देशों के बीच किए गए भरोसे का सम्मान किया जाना चाहिए।

    चीन ने इन आरोपों का स्पष्ट रूप से खंडन करते हुए कहा है कि वह किसी भी अवैध हथियार आपूर्ति में शामिल नहीं है। चीन का कहना है कि उसकी विदेश नीति जिम्मेदार और संतुलित सिद्धांतों पर आधारित है तथा वह क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का पक्षधर है। ऐसे में सामने आए दावों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

    इस घटनाक्रम के बीच अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी चर्चा में बनी हुई है। ट्रंप ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि अमेरिका इस तकनीकी दौड़ में चीन से आगे है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच तकनीकी, आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।

    फिलहाल ईरान को कथित हथियार आपूर्ति से जुड़े दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। चीन इन आरोपों को नकार चुका है, जबकि अमेरिका ने इस मामले पर चिंता व्यक्त की है। आने वाले दिनों में यदि इस संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी या अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया सामने आती है तो उसका प्रभाव क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक कूटनीतिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।