Category: International

  • पहाड़ों में गरजी सैन्य ट्रेनिंग मंगोलियाई जवानों ने सीखी भारतीय तकनीक नोमैडिक एलीफेंट 2026 में दिखी मार्शल विरासत

    पहाड़ों में गरजी सैन्य ट्रेनिंग मंगोलियाई जवानों ने सीखी भारतीय तकनीक नोमैडिक एलीफेंट 2026 में दिखी मार्शल विरासत


    नई दिल्ली। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में भारत और मंगोलिया की सेनाओं के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास नोमैडिक एलीफेंट 2026 तेजी से आगे बढ़ रहा है। फॉरेन ट्रेनिंग नोड पर चल रहे इस अभ्यास में दोनों देशों के जवान कठिन और व्यावहारिक प्रशिक्षण के जरिए अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत कर रहे हैं। अभ्यास का मुख्य उद्देश्य भारतीय सेना और मंगोलियाई सशस्त्र बलों के बीच आपसी तालमेल सामरिक समझ और ऑपरेशनल क्षमताओं को बढ़ाना है। नोमैडिक एलीफेंट का यह 18वां संस्करण 21 सितंबर से शुरू हुआ है और 3 अक्टूबर 2026 तक चलेगा। इसमें दोनों देशों की सेनाओं के 45-45 जवान हिस्सा ले रहे हैं।

    अभ्यास के दौरान मंगोलियाई सैनिकों को छोटे हथियारों से जुड़े प्रशिक्षण का व्यावहारिक अनुभव दिया गया। जवानों ने हथियारों की पहचान और उनकी कार्यप्रणाली के साथ सुरक्षा ड्रिल लोडिंग और अनलोडिंग निशाना लगाने तथा फायरिंग जैसी गतिविधियों में हिस्सा लिया। प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के दौरान हथियारों को सुरक्षित और अनुशासित तरीके से इस्तेमाल करने पर विशेष ध्यान दिया गया। इससे मंगोलियाई सैनिकों को भारतीय सेना की प्रशिक्षण पद्धति और ऑपरेशनल प्रक्रियाओं को करीब से समझने का अवसर मिला।

    भारतीय सेना की टुकड़ी ने इस दौरान रूम इंटरवेंशन ड्रिल का भी प्रदर्शन किया। इस ड्रिल में कमरे में व्यवस्थित तरीके से प्रवेश तलाशी समन्वित मूवमेंट संचार फायर अनुशासन और घायल व्यक्ति को सुरक्षित बाहर निकालने जैसी तकनीकों को प्रदर्शित किया गया। आबादी वाले इलाकों में अभियान के दौरान टीमवर्क और स्थितिजन्य जागरूकता बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों के सैनिकों ने एक दूसरे के साथ हैंड्स ऑन ट्रेनिंग भी की। इससे जवानों को अपनी तकनीकों और प्रक्रियाओं को साझा करने का मौका मिला।

    अभ्यास के दौरान मंगोलियाई सैनिकों ने अपनी पारंपरिक मार्शल कला की झलक भी पेश की। उन्होंने मंगोलियाई क्लासिकल कुश्ती बोख और बिना हथियार के युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया। पारंपरिक कुश्ती तकनीकों नियंत्रित ग्रैपलिंग और क्लोज कॉम्बैट मूवमेंट के जरिए मंगोलियाई जवानों ने अपनी ताकत फुर्ती अनुशासन और शारीरिक दक्षता का प्रदर्शन किया। इस गतिविधि ने सैन्य प्रशिक्षण के साथ दोनों देशों के सैनिकों के बीच पेशेवर संवाद और आपसी समझ को भी बढ़ाया।

    नोमैडिक एलीफेंट 2026 का व्यापक उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के जनादेश के तहत अर्ध शहरी और पहाड़ी इलाकों में आतंकवाद रोधी अभियानों के लिए दोनों देशों की संयुक्त सैन्य क्षमता को मजबूत करना है। अभ्यास के दौरान सैनिकों को अलग अलग परिस्थितियों में मिलकर काम करने और सामरिक स्तर पर बेहतर तालमेल विकसित करने का अवसर मिल रहा है। भारत और मंगोलिया के बीच लंबे समय से रक्षा सहयोग जारी है और नोमैडिक एलीफेंट जैसे अभ्यास इसी सहयोग को व्यावहारिक प्रशिक्षण के जरिए आगे बढ़ाते हैं। पिथौरागढ़ में चल रहा यह सैन्य अभ्यास दोनों देशों के जवानों को एक दूसरे की कार्यप्रणाली समझने के साथ संयुक्त अभियानों के लिए बेहतर समन्वय विकसित करने का मंच दे रहा है।

  • Swift टेलिस्कोप को बचाने निकला Link अंतरिक्षयान हुआ नष्ट, 250 करोड़ रुपये का मिशन तकनीकी दिक्कतों से हुआ विफल

    Swift टेलिस्कोप को बचाने निकला Link अंतरिक्षयान हुआ नष्ट, 250 करोड़ रुपये का मिशन तकनीकी दिक्कतों से हुआ विफल


    नई दिल्ली ।
    अंतरिक्ष में 22 वर्षों से काम कर रहे Swift Observatory को बचाने की कोशिश को बड़ा झटका लगा है। इसे ऊंची और अधिक स्थिर कक्षा में पहुंचाने के लिए भेजा गया Link अंतरिक्षयान अपना मुख्य मिशन पूरा नहीं कर सका और शुक्रवार को धरती के वायुमंडल में प्रवेश करने के बाद नष्ट हो गया। इस मिशन पर करीब 3 करोड़ डॉलर यानी लगभग 250 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। अब Swift की कक्षा लगातार नीचे आ रही है और उसके नवंबर की शुरुआत में वायुमंडल में प्रवेश करने की संभावना जताई जा रही है।

    Swift Observatory को वर्ष 2004 में अंतरिक्ष में भेजा गया था। इसे ब्रह्मांड में होने वाली बेहद तेज और शक्तिशाली घटनाओं का पता लगाने के लिए तैयार किया गया था। यह गामा-रे विस्फोट, तारों के विस्फोट और अचानक होने वाली अन्य अंतरिक्षीय घटनाओं का तेजी से पता लगाकर अपनी दिशा बदल सकता है। इसकी यही क्षमता इसे खगोलीय घटनाओं की निगरानी में महत्वपूर्ण बनाती रही है।

    हाल के महीनों में सूर्य से निकलने वाली शक्तिशाली गतिविधियों के कारण Swift की कक्षा अनुमान से अधिक तेजी से नीचे आने लगी थी। इससे उसके धरती के वायुमंडल में प्रवेश करने का खतरा बढ़ गया। स्थिति को देखते हुए उसकी वैज्ञानिक गतिविधियां रोककर कक्षा को कुछ समय तक स्थिर रखने की कोशिश की गई थी, ताकि बचाव अभियान के लिए पर्याप्त समय मिल सके।

    Swift को बचाने के लिए Link को 3 जुलाई को अंतरिक्ष में भेजा गया था। योजना के अनुसार Link को Swift के पास पहुंचकर अपनी तीन रोबोटिक भुजाओं की मदद से उसे पकड़ना था। इसके बाद दोनों अंतरिक्षयानों की स्थिति को नियंत्रित करते हुए Swift को ज्यादा ऊंची कक्षा में पहुंचाने का प्रयास किया जाना था। Link को तैयार करने में एक साल से भी कम समय लगा था।

    हालांकि, प्रक्षेपण के तुरंत बाद Link में तकनीकी समस्याएं सामने आने लगीं। Swift को सही दिशा में नियंत्रित करने के लिए जरूरी तीन रिएक्शन व्हील में से दो खराब हो गए। इसके बाद एक वाल्व में आई खराबी के कारण अंतरिक्षयान तेजी से घूमने लगा। इस स्थिति ने नियंत्रण और संचार दोनों को प्रभावित किया। इंजीनियरों ने बाद में Link पर नियंत्रण हासिल कर लिया, लेकिन तब तक काफी ईंधन खर्च हो चुका था।

    ईंधन की कमी के कारण Link के पास Swift को पकड़कर उसकी कक्षा बदलने के लिए पर्याप्त क्षमता नहीं बची। इसी वजह से अगस्त में Swift को बचाने की कोशिश को आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया गया। इसके बाद Link के बचे हुए समय का इस्तेमाल तकनीकी परीक्षणों और भविष्य के बचाव अभियानों के लिए जरूरी अभ्यास में किया गया।

    मिशन की असफलता के बावजूद Link Swift के करीब पहुंचने में सफल रहा। दोनों अंतरिक्षयानों के बीच दूरी घटकर लगभग 12 से 15 किलोमीटर तक रह गई थी। इस दौरान Link ने Swift की तस्वीरें भी लीं। उसकी तीनों रोबोटिक भुजाओं का संचालन भी किया गया। प्रत्येक भुजा करीब तीन फीट लंबी थी और उसके सिरे पर पकड़ बनाने के लिए ग्रिपर लगा था।

    अब Swift की कक्षा लगातार नीचे जा रही है और उसके पास अंतरिक्ष में काम करने के लिए सीमित समय बचा है। माना जा रहा है कि नवंबर की शुरुआत में वह धरती के वायुमंडल में प्रवेश कर सकता है। इसके बाद अंतरिक्ष में अचानक होने वाली शक्तिशाली घटनाओं की निगरानी की उसकी लंबे समय से चली आ रही भूमिका समाप्त हो जाएगी। हालांकि Link अपने मुख्य लक्ष्य तक नहीं पहुंच सका, लेकिन इस अभियान से भविष्य में अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रहों को पकड़ने, उनकी स्थिति बदलने और उन्हें बचाने से जुड़ी तकनीक के लिए महत्वपूर्ण अनुभव मिला है।

  • ईरान ने अमेरिका के सामने रखी तीन शर्तें, मानने पर सात दिन में होर्मुज खोलने का प्रस्ताव

    ईरान ने अमेरिका के सामने रखी तीन शर्तें, मानने पर सात दिन में होर्मुज खोलने का प्रस्ताव

    नई दिल्ली । ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने के लिए अमेरिका के सामने सात दिन का प्रस्ताव रखा है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के मुताबिक, अगर अमेरिका तेहरान की तीन प्रमुख शर्तें स्वीकार करता है, तो सात दिन के भीतर इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर सामान्य आवाजाही बहाल की जा सकती है। उन्होंने कहा कि प्रस्ताव स्वीकार करने का फैसला अब अमेरिका के हाथ में है।

    ईरान ने अपने प्रस्ताव को मध्यस्थता के जरिए अमेरिका तक पहुंचाया है। इसके तहत अमेरिका को ईरानी बंदरगाहों पर लगी नौसैनिक नाकाबंदी हटानी होगी, ईरान के तेल की बिक्री पर लगे प्रतिबंधों में छूट देनी होगी और ऐसा युद्धविराम लागू करना होगा, जिसमें लेबनान भी शामिल हो। ईरान का कहना है कि इन मांगों को स्वीकार किए जाने के बाद होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

    अब्बास अराघची के मुताबिक, अमेरिका की ओर से जरूरी शुरुआती कदम पूरे करने में चार से पांच दिन लग सकते हैं। इसके बाद छठे दिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोला जा सकता है। सातवें दिन अमेरिका के साथ आगे की बातचीत शुरू करने का प्रस्ताव है। इस बातचीत में दोनों पक्ष आपसी सहमति वाले मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं, जिसमें ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी शामिल हो सकता है।

    ईरान ने इस योजना को जून में हुए एक समझौते से भी जोड़ा है। ईरानी पक्ष का कहना है कि अमेरिका से अपेक्षित कुछ कदम पहले से उस समझौते में शामिल थे। तेहरान के मुताबिक, प्रस्ताव का उद्देश्य समुद्री आवाजाही बहाल करने के साथ-साथ दोनों देशों के बीच रुकी हुई कूटनीतिक प्रक्रिया को फिर से शुरू करना है।

    होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है। युद्ध से पहले दुनिया के समुद्री तेल और गैस कारोबार का करीब पांचवां हिस्सा इसी जलमार्ग से होकर गुजरता था। क्षेत्र में जारी संघर्ष और समुद्री आवाजाही में रुकावट का असर ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी पड़ सकता है।

    ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने भी अमेरिका के साथ बातचीत फिर शुरू करने की इच्छा जताई है। हालांकि, परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद अभी बने हुए हैं। ईरानी पक्ष ने संकेत दिया है कि होर्मुज स्ट्रेट खोलने के प्रस्ताव और परमाणु मुद्दे पर रियायतों को अलग-अलग विषयों के रूप में देखा जा रहा है।

    अमेरिका की ओर से इस प्रस्ताव को लेकर अलग-अलग संकेत सामने आए हैं। कुछ दावों में प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किए जाने की बात कही गई है, जबकि दूसरी ओर मध्यस्थों के जरिए बातचीत जारी रहने की जानकारी भी सामने आई है। ऐसे में प्रस्ताव पर अंतिम सहमति और उसके बाद होने वाली कार्रवाई को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

    ईरान के सात दिन के प्रस्ताव के तहत पहले अमेरिका से तीन शर्तों पर कदम उठाने की अपेक्षा है। इसके बाद होर्मुज स्ट्रेट खोलने और बातचीत दोबारा शुरू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। अब इस योजना पर अमेरिका की प्रतिक्रिया और दोनों देशों के बीच होने वाली कूटनीतिक बातचीत को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • अमेरिका में वोटर लिस्ट की होगी नागरिकता जांच, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के SAVE सिस्टम को दी मंजूरी

    अमेरिका में वोटर लिस्ट की होगी नागरिकता जांच, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के SAVE सिस्टम को दी मंजूरी


    नई दिल्ली। अमेरिका में मतदाता सूची में नागरिकता सत्यापन को लेकर बड़ा कानूनी फैसला सामने आया है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ट्रंप प्रशासन के संशोधित SAVE सिस्टम के इस्तेमाल का रास्ता फिलहाल साफ कर दिया। इस आदेश के बाद राज्य मतदाता सूची में दर्ज लोगों की नागरिकता की पुष्टि के लिए Department of Homeland Security यानी DHS के SAVE सिस्टम का इस्तेमाल कर सकेंगे। हालांकि यह व्यवस्था राज्यों के लिए अनिवार्य नहीं है और सुप्रीम कोर्ट का आदेश फिलहाल निचली अदालत के फैसले पर रोक लगाने तक सीमित है।

    SAVE यानी Systematic Alien Verification for Entitlements सिस्टम का इस्तेमाल लंबे समय से नागरिकता और इमिग्रेशन से जुड़ी जानकारी की पुष्टि के लिए किया जाता रहा है। ट्रंप प्रशासन ने 2025 में इसके दायरे को बढ़ाने की दिशा में कदम उठाया था। इसके तहत सिस्टम में प्राकृतिक रूप से जन्मे अमेरिकी नागरिकों से जुड़े रिकॉर्ड और Social Security Administration की जानकारी को भी जोड़ने की व्यवस्था की गई। साथ ही राज्य और स्थानीय चुनाव अधिकारियों को मतदाता पंजीकरण तथा मौजूदा वोटर लिस्ट में नागरिकता की पुष्टि के लिए इसका इस्तेमाल करने की अनुमति देने की कोशिश की गई।

    इस बदलाव को लेकर कानूनी विवाद भी शुरू हुआ। निचली अदालत ने संशोधित SAVE सिस्टम के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। अदालत में यह तर्क दिया गया था कि नई व्यवस्था से निजी जानकारी की सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े होते हैं और गलत डेटा के कारण पात्र अमेरिकी नागरिकों को भी गैर नागरिक के तौर पर चिन्हित किए जाने का जोखिम हो सकता है। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने 25 सितंबर 2026 को आपातकालीन आदेश के जरिए निचली अदालत की रोक को फिलहाल स्थगित कर दिया।

    सुप्रीम कोर्ट के बहुमत ने कहा कि संघीय सरकार के पास राज्यों और स्थानीय चुनाव अधिकारियों की नागरिकता सत्यापन संबंधी मांगों का जवाब देने का दायित्व है। अदालत ने यह भी कहा कि निचली अदालत का आदेश सरकार को उस कार्यक्रम के इस्तेमाल से रोक रहा है जिसे वह इस काम के लिए उपयुक्त मानती है। इस फैसले से राज्यों को आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची की जांच के लिए SAVE सिस्टम का इस्तेमाल करने की अनुमति मिल गई है।

    हालांकि फैसले के साथ कुछ महत्वपूर्ण सीमाएं भी जुड़ी हैं। रिपोर्टों के मुताबिक चुनाव के बेहद करीब मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाने पर संघीय कानून की पाबंदियां लागू रहती हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में भी इस बात का उल्लेख किया गया है कि ऐसी सीमाएं आगामी चुनाव पर व्यवस्था के तत्काल प्रभाव को सीमित करती हैं। राज्यों की ओर से व्यक्तिगत स्तर पर नागरिकता की जांच की जा सकती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर राज्य को बड़े पैमाने पर नाम हटाने की स्वतः अनुमति मिल गई है।

    इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों सोनिया सोतोमयोर एलेना कगन और केतनजी ब्राउन जैक्सन ने असहमति जताई। विरोध करने वाले पक्ष ने SAVE में Social Security रिकॉर्ड जोड़ने और गलत पहचान की आशंका को लेकर सवाल उठाए हैं। अदालत के सामने यह भी बताया गया कि संशोधित सिस्टम की जानकारी के आधार पर कुछ पात्र नागरिकों को गलत तरीके से गैर नागरिक के तौर पर चिन्हित किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं।

    फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश अंतिम रूप से पूरे विवाद का निपटारा नहीं करता बल्कि निचली अदालत की रोक को आगे की कानूनी प्रक्रिया के दौरान स्थगित करता है। ऐसे में अमेरिका में मतदाता सूची की नागरिकता जांच और SAVE सिस्टम की वैधता को लेकर कानूनी बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।

  • अनियंत्रित हुआ ओपनएआई…. बगैर जानकारीअमेरिकी सरकारी वेबसाइटों में दिया दखल

    अनियंत्रित हुआ ओपनएआई…. बगैर जानकारीअमेरिकी सरकारी वेबसाइटों में दिया दखल


    कैलिफोर्निया।
    ओपनएआई (OpenAI’) का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artifical Intelligence) अनियंत्रित हो गया और लैब की जानकारी के बिना अमेरिकी सरकार (US Government) की वेबसाइट (Website) में दखल दे दिया। यह जानकारी न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार है।


    किन विभाग के वेबसाइट को बनाया निशाना?

    सुरक्षा शोधकर्ताओं और इस मामले की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति का हवाला देते हुए, न्यूयॉर्क टाइम्स ने कहा कि इस गर्मी में एआई लैब की जानकारी के बिना शिक्षा विभाग, वाणिज्य विभाग और प्रतिभूति और विनिमय आयोग की वेबसाइटों को निशाना बनाया गया था। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि वाणिज्य विभाग और एसईसी से जुड़ी घटना की पुष्टि ओपनएआई ने की है, जिसने कहा कि वह स्थिति की जांच जारी रखे हुए है।


    ओपनएआई के सीईओ ने क्या कहा?

    इस बीच, ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने शुक्रवार (स्थानीय समय) को कहा कि कंपनी उन एजेंट्स के इस्तेमाल के तरीकों की समीक्षा कर रही है, जिन्हें इंटनेट का एक्सेस मिलता है, लेकिन यह काम उतनी तेजी से नहीं हो रहा है जितनी तेजी से वे चाहते थे।


    पारदर्शिता पर क्या बोले ऑल्टमैन?

    ऑल्टमैन ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा,’हमारे एजेंट्स के ट्रेनिंग और इवैल्यूएशन के दौरान इंटरनेट इस्तेमाल को लेकर एक बड़ी और लगातार चलने वाली समीक्षा हो रही है। हम नीचे दिए गए लिंक पर इसकी समरी पब्लिश करते रहे हैं। आगे भी करते रहेंगे। हम उतनी तेजी से काम नहीं कर पाए हैं जितनी हमारी इच्छा थी, लेकिन हम पारदर्शिता बनाए रखने और एजेंट्स की एक्टिविटी के पेटाबाइट्स डेटा से साफ समझ बनाने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

    उन्होंने आगे कहा कि इसके साथ ही प्रभावित संगठनों के साथ भी काम कर रहे हैं। हम गंभीरता के आधार पर प्राथमिकता तय कर रहे हैं और रिसोर्स भी बढ़ा रहे हैं। अब तक हमने जो घटनाएं देखी हैं, उनमें ‘हगिंग फेस’ (Hugging Face) वाली घटना सबसे गंभीर है। हम जितनी हो सके उतनी पारदर्शिता बरतेंगे, लेकिन इसमें कुछ सीमाएं भी होंगी, जैसे कि दूसरी कंपनियों में हमारे एजेंट्स को मिली कमजोरियां इनके बारे में जानकारी सार्वजनिक करनी है या नहीं। यह उन कंपनियों का फैसला होगा।’


    जांच किन मामलों पर केंद्रित है?

    ओपनएआई ने कहा, ‘हमारी जांच उन मामलों पर केंद्रित है जहां एजेंट ने थर्ड-पार्टी वेबसाइटों के साथ ऐसे तरीके से इंटरैक्ट किया जो उनके सौंपे गए कामों या तय तरीकों से अलग थे। अब तक पहचाने गए ज्यादातर मामले कम गंभीरता वाले रहे हैं, जिनमें थर्ड-पार्टी सर्विस पर किसी खास असर का बहुत कम या कोई सबूत नहीं मिला है।’

    कंपनी ने आगे कहा कि वह उन मामलों में थर्ड-पार्टी को सूचित कर रही है जहां एआई मॉडल ने शायद किसी थर्ड-पार्टी के सिक्योरिटी कंट्रोल को बायपास किया हो या किसी ऑनलाइन सर्विस की उपलब्धता को प्रभावित किया हो, या ऐसे मामले जिनमें थर्ड-पार्टी वेबसाइटों पर बुरा असर पड़ा हो।

    ओपनएआई ने कहा, ‘अब तक की हमारी समीक्षा के आधार पर, हमने ऊपर बताए गए मानदंडों का इस्तेमाल करके दर्जनों थर्ड-पार्टी को सूचित किया है। पिछली गतिविधियों की हमारी समीक्षा जारी है और इसमें काफी समय और संसाधन लगेंगे। जैसे-जैसे यह काम आगे बढ़ेगा, हम और भी थर्ड-पार्टी को सूचित करेंगे।’

    ओपनएआई ने कहा कि लैब से मिलने वाले नोटिफिकेशन को अपने-आप किसी बड़ी सिक्योरिटी घटना का नोटिस नहीं माना जाना चाहिए। उसने कहा कि वह प्रभावित संस्थाओं के साथ संबंधित फाइंडिंग्स शेयर करना जारी रखेगी और उनकी समीक्षा में मदद के लिए तकनीकी जानकारी भी देगी।

  • संबंध सुधारने में जुटे अमेरिका-चीन….. इस साल दो बार होगी ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात

    संबंध सुधारने में जुटे अमेरिका-चीन….. इस साल दो बार होगी ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका और चीन (America and China) के बीच संबंध सुधरने लगे हैं। अमेरिका (America) के अपने राजकीय दौरे के समापन से पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (President Xi Jinping) ने शुक्रवार को कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इस साल उनकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) से दो बार और मुलाकात होगी। शी ने ट्रंप और उनकी पत्नी मेलानिया को नवंबर में चीन के शेनझेन में होने वाले एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (एपेक) शिखर सम्मेलन में आने का निमंत्रण दिया। चीन के राष्ट्रपति ने कहा कि इसके एक महीने बाद फ्लोरिडा में ‘ट्रंप नेशनल डोरल मियामी गोल्फ क्लब’ में होने वाले जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान उनकी फिर से मुलाकात हो सकती है।

    शी ने कहा, ”मैं राष्ट्रपति और प्रथम महिला को चीन आने के लिए आमंत्रित करता हूं।” इस पर ट्रंप ने कहा, ”हम आएंगे और हम काफी बातचीत करेंगे।” चीनी राष्ट्रपति के दौरे के समापन से पहले ट्रंप उन्हें राष्ट्रीय अभिलेखागार भी ले जाएंगे। ट्रंप दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्यवादी देश के नेता को अमेरिकी लोकतंत्र के महत्वपूर्ण मूल दस्तावेज दिखाएंगे।

    शी के अमेरिका के राष्ट्रीय अभिलेखागार का दौरा करने के बाद वाशिंगटन से रवाना होने की संभावना है। यहां स्वतंत्रता की घोषणा, संविधान और अधिकार विधेयक जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज सुरक्षित रखे गए हैं। शी की यह यात्रा ऐसे समय हुई है जब अमेरिका अपनी स्थापना की 250वीं वर्षगांठ मना रहा है। ट्रंप ने बृहस्पतिवार को कहा था कि वह शी को ”उस गौरवशाली इतिहास के कुछ सबसे महत्वपूर्ण खजाने” दिखाना चाहते हैं।

    ट्रंप दंपति ने गुरुवार रात प्रौद्योगिकी उद्योग के दिग्गजों की मौजूदगी में अपने मेहमानों के सम्मान में रात्रिभोज का आयोजन किया था। दोनों नेताओं ने बृहस्पतिवार को बंद कमरे में 90 मिनट तक बैठक भी की। बैठक के बाद चीन सरकार की ओर से जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, दोनों नेताओं ने मध्य पूर्व, यूक्रेन और कोरियाई प्रायद्वीप जैसे मुद्दों पर चर्चा की। अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय व्हाइट हाउस ने इस चर्चा के बारे में कोई जानकारी साझा नहीं की है।

    वहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से साफ शब्दों में कहा है कि ईरान को किसी भी प्रकार की सीधे-सीधे या छिपकर की जाने वाले मदद उन्हें बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है, चाहे यह मदद खुफिया जानकारी से लेकर, सैन्य उपकरण और तकनीकी पुर्जे मुहैया कराने जैसी हो। चीन में अमेरिका के राजदूत डेविड पेड्यू ने अमेरिका में हुई दोनों शीर्ष नेताओं की बैठक के संदर्भ में यह जानकारी दी।

    पेड्यू ने बताया कि गुरुवार को व्हाइट हाउस में हुई द्विपक्षीय वार्ता के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने इस मुद्दे पर अमेरिका का रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया। उन्होंने कहा कि वाशिंगटन पिछले कुछ हफ्तों से लगातार इस विषय को उठाता रहा है और इसे ताइवान से जुड़ी अमेरिकी प्रतिबद्धताओं से अलग रखकर देखा जा रहा है।

  • UN में पाकिस्तानी पत्रकार ने आतंकवाद पर पूछा सवाल, जयशंकर बोले- ‘एक आतंकी देश मुझसे ये पूछ रहा’

    UN में पाकिस्तानी पत्रकार ने आतंकवाद पर पूछा सवाल, जयशंकर बोले- ‘एक आतंकी देश मुझसे ये पूछ रहा’


    नई दिल्ली। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान एक पाकिस्तानी पत्रकार ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से भारत पर पाकिस्तान में आतंकवाद को प्रायोजित करने का आरोप लगाते हुए सवाल किया। जयशंकर ने जवाब देते हुए कहा, “एक आतंकी देश मुझसे ये सवाल पूछ रहा है। कम ऑन।” इसके बाद उन्होंने मुस्कुराते हुए वहां से चले गए। घटना के दौरान भारत के संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि हरीश पर्वतनेनी ने भी पत्रकार से कहा कि उसे उसका जवाब साफ तौर पर मिल चुका है।

    पत्रकार ने बीच में टोककर पूछा- आतंकवाद कब बंद करेंगे?

    जयशंकर न्यूयॉर्क में भारत और लाइबेरिया की ओर से शुरू किए गए ‘ग्रुप ऑफ फ्रेंड्स ऑन सेफ्टी एंड सिक्योरिटी ऑफ शिपिंग एंड सीफेयरर्स’ से जुड़े प्रेस इंटरैक्शन में बोल रहे थे। उनके साथ लाइबेरिया की विदेश मंत्री सारा बेइसोलो न्यांती भी मौजूद थीं।

    प्रेस बातचीत के बाद एक पाकिस्तानी पत्रकार ने जयशंकर को बीच में टोकते हुए पूछा कि भारत सरकार पाकिस्तान में आतंकवाद को प्रायोजित करना कब बंद करेगी। उसने भारत पर ‘प्रॉक्सी टेररिज्म’ को समर्थन देने का आरोप लगाते हुए सवाल किया।

    जयशंकर ने बिना लंबी प्रतिक्रिया दिए कहा, “एक आतंकी देश मुझसे ये सवाल पूछ रहा है। कम ऑन।” इसके बाद वह मुस्कुराए और वहां से चले गए।

    भारत के संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि हरीश पर्वतनेनी ने इसके बाद पत्रकार से कहा, “आपने अपना जवाब सुन लिया है। आपने अपना जवाब साफ तौर पर सुन लिया है।” इस घटना का वीडियो भी सामने आया है।

    25 देशों के साथ समुद्री सुरक्षा पर पहल

    यह सवाल-जवाब उस प्रेस इंटरैक्शन के दौरान हुआ, जिसमें जयशंकर और लाइबेरिया की विदेश मंत्री समुद्री कर्मचारियों और कमर्शियल शिपिंग की सुरक्षा को लेकर नई पहल की जानकारी दे रहे थे। भारत और लाइबेरिया ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर ‘ग्रुप ऑफ फ्रेंड्स ऑन सेफ्टी एंड सिक्योरिटी ऑफ शिपिंग एंड सीफेयरर्स’ की शुरुआत की है।

    जयशंकर ने कहा कि समुद्र में कमर्शियल जहाजों और नाविकों पर होने वाले हमलों को किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि ऐसे हमलों को रुकना ही चाहिए।

    विदेश मंत्री के मुताबिक, भारत समुद्री कर्मचारियों का एक प्रमुख सोर्स देश है, जबकि लाइबेरिया के पास टनेज के हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग रजिस्ट्रियों में से एक है। दोनों देशों ने समान हितों वाले अन्य देशों और प्रमुख जहाज मालिकों को भी इस पहल से जोड़ने की कोशिश की है।

    ‘हमलों को रुकना ही चाहिए’

    जयशंकर ने कहा कि हाल के महीनों में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, रेड सी और ब्लैक सी समेत अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों में कमर्शियल शिपिंग और मर्चेंट मैरिनर्स पर हमले हुए हैं। उनके मुताबिक, इन घटनाओं से समुद्री व्यापार प्रभावित होता है और लोगों की जान जाती है।

    उन्होंने कहा कि इस तरह की हिंसा और जान-माल के नुकसान का कोई औचित्य नहीं हो सकता। भारत और लाइबेरिया की पहल का उद्देश्य समुद्री कर्मचारियों और कमर्शियल शिपिंग इंडस्ट्री से जुड़े सुरक्षा मुद्दों पर दुनिया का ध्यान बढ़ाना है।

    जयशंकर के मुताबिक, दुनिया के मर्चेंट फ्लीट को करीब 20 लाख समुद्री कर्मचारी चलाते हैं। उन्हें मुश्किल परिस्थितियों में काम करना पड़ता है और हाल के घटनाक्रम ने उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है।

    पीएम मोदी भी उठा चुके हैं नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा

    नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा भारत की ओर से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उठाया जाता रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ब्रिक्स बैठक के दौरान समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को उठाया है।

    जयशंकर की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच आतंकवाद को लेकर बयानबाजी भी चर्चा में है।

  • UN में पाकिस्तान की हार को जीत बता रहे थे शहबाज, भारतीय दूत की छूट गई हंसी, वीडियो वायरल

    UN में पाकिस्तान की हार को जीत बता रहे थे शहबाज, भारतीय दूत की छूट गई हंसी, वीडियो वायरल


    नई दिल्ली। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य संघर्ष का जिक्र करते हुए पाकिस्तान की ओर से इसे अपनी सफलता के तौर पर पेश किया। उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को संघर्ष रोकने में कथित ‘समय पर हस्तक्षेप’ के लिए धन्यवाद भी दिया। शहबाज के भाषण के दौरान वहां मौजूद भारतीय राजनयिक आर. श्रीनिवास का रिएक्शन कैमरे में कैद हो गया और उनका वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है।

    शहबाज ने ट्रंप को दिया ‘क्रेडिट’

    शुक्रवार को UNGA में अपने करीब 23 मिनट के संबोधन में शहबाज शरीफ ने मई 2025 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘समय पर हस्तक्षेप’ से दक्षिण एशिया में करोड़ों लोगों की जान बची।

    शरीफ ने ट्रंप के ‘दृढ़तापूर्ण और दूरदर्शी नेतृत्व’ के लिए उन्हें धन्यवाद दिया। उन्होंने दावा किया कि अगर ट्रंप उस समय हस्तक्षेप नहीं करते तो हालात और गंभीर हो सकते थे।

    हालांकि, भारत लगातार इस बात से इनकार करता रहा है कि मई 2025 में दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई रोकने के लिए किसी तीसरे पक्ष ने मध्यस्थता की थी। भारत का कहना है कि संघर्ष विराम को लेकर सहमति दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच सीधे संपर्क के बाद बनी थी।

    भारतीय राजनयिक का रिएक्शन कैमरे में कैद

    शहबाज शरीफ जब 2025 के संघर्ष को लेकर पाकिस्तान का पक्ष रख रहे थे, उसी दौरान सभा में मौजूद भारतीय राजनयिक आर. श्रीनिवास की प्रतिक्रिया कैमरे में रिकॉर्ड हो गई। वीडियो में उनका हंसना नजर आया।

    शहबाज ने अपने भाषण में कश्मीर का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया को दोबारा 2025 जैसी स्थिति में जाने से रोकने के लिए कश्मीर मुद्दे का ‘न्यायसंगत और निष्पक्ष समाधान’ जरूरी है।

    भारत संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न मंचों पर पाकिस्तान के कश्मीर संबंधी दावों को खारिज करता रहा है। भारत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है।

    सिंधु जल संधि का भी उठाया मुद्दा

    शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में सिंधु जल संधि का भी जिक्र किया। उन्होंने भारत के इस फैसले पर आपत्ति जताई कि 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को ‘अबेयांस’ में रखने का फैसला किया था।

    भारत का रुख है कि सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान की कार्रवाई से जुड़े सवालों के समाधान तक संधि स्थगित रहेगी। वहीं पाकिस्तान इस फैसले को चुनौती देता रहा है।

    शहबाज ने UNGA में भारत की ओर से सिंधु नदी के पानी को लेकर किसी भी कदम को गंभीर परिणामों से जोड़ते हुए चेतावनी भी दी।

    कश्मीर पर फिर अंतरराष्ट्रीय मंच से बात

    पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कश्मीर मुद्दे को भी अपने भाषण का हिस्सा बनाया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र से कश्मीर पर अपनी स्थिति के अनुरूप कार्रवाई की मांग दोहराई और कहा कि पाकिस्तान कश्मीरियों को राजनीतिक, कूटनीतिक और नैतिक समर्थन देता रहेगा।

    भारत का रुख इसके उलट है। नई दिल्ली कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की पाकिस्तान की कोशिशों को खारिज करता रहा है और इसे भारत-पाकिस्तान के बीच का विषय मानता है।

    आसिम मुनीर की भी कई बार तारीफ

    शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का भी कई बार उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में कूटनीति के लिए रास्ता बनाने में मुनीर के लगातार प्रयासों की भूमिका रही।

    2025 के संघर्ष का जिक्र करते हुए शरीफ ने पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई की भी प्रशंसा की और इसे अपनी ओर से प्रभावी जवाब के तौर पर पेश किया।

    भारत देगा ‘राइट टू रिप्लाई’

    UNGA में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के भाषण के बाद भारत की ओर से ‘राइट टू रिप्लाई’ के तहत जवाब दिए जाने की प्रक्रिया भी तय है। भारत आमतौर पर पाकिस्तान के नेता के संबोधन के बाद अपने स्थायी मिशन के अपेक्षाकृत युवा राजनयिक को जवाब देने के लिए भेजता है।

    इस बार भी पाकिस्तान के कश्मीर, आतंकवाद और सिंधु जल संधि से जुड़े बयानों पर भारत की प्रतिक्रिया पर नजर रहेगी।

  • ईरान का 7 दिन का प्लान ट्रंप ने ठुकराया, नवंबर के बाद फिर हमले की आशंका

    ईरान का 7 दिन का प्लान ट्रंप ने ठुकराया, नवंबर के बाद फिर हमले की आशंका


    नई दिल्ली। ईरान ने अमेरिका के सामने तनाव कम करने के लिए 7 दिन का प्रस्ताव रखा था, जिसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने और परमाणु मुद्दे पर बातचीत फिर शुरू करने की पेशकश की गई थी। इसके बदले ईरान ने अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाने, तेल बिक्री प्रतिबंधों में राहत और लेबनान को शामिल करते हुए युद्धविराम की मांग की थी। अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर के मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर दोबारा अमेरिकी हमले की संभावना जताई गई है।

    ईरान ने रखा था सात दिन का फॉर्मूला

    ईरान का प्रस्ताव कतर के जरिए अमेरिका तक पहुंचाया गया था। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा था कि अमेरिका यदि प्रस्ताव स्वीकार करता है तो सात दिन की समयसीमा उसी दिन से शुरू हो जाएगी। उनका कहना था कि इसके लिए जरूरी तैयारियां पहले ही पूरी की जा चुकी हैं।

    प्रस्ताव के तहत ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को खोलने के लिए तैयार था। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे पर बातचीत दोबारा शुरू करने की बात कही गई थी।

    इसके बदले ईरान ने अमेरिका के सामने तीन शर्तें रखी थीं—

    ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाई जाए।
    ईरान के तेल की बिक्री पर लगे प्रतिबंधों में छूट दी जाए।
    ऐसा युद्धविराम लागू किया जाए, जिसमें लेबनान भी शामिल हो।

    अराघची के मुताबिक, अमेरिका इन कदमों को चार से पांच दिन में पूरा कर सकता था। इसके बाद छठे दिन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने और सातवें दिन अमेरिका के साथ बातचीत दोबारा शुरू करने का प्रस्ताव था।

    ट्रंप ने क्यों ठुकराया प्रस्ताव?

    वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि ट्रंप ने ईरान के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है। ट्रंप को भरोसा नहीं है कि ईरान उनकी मांगों को पूरा करेगा। इसी वजह से उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा है कि नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान के खिलाफ दोबारा बमबारी शुरू हो सकती है।

    हालांकि, रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि अगर अमेरिका दोबारा हमला करता है तो उसका स्तर कितना बड़ा होगा।

    रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप फिलहाल बड़े सैन्य अभियान को लेकर पूरी तरह तैयार नजर नहीं आ रहे हैं। इसकी एक वजह अमेरिका के हथियारों का घटता भंडार बताया गया है। अमेरिका अपने हथियारों को दूसरी संभावित सैन्य जरूरतों के लिए भी बचाकर रखना चाहता है।

    अराघची बोले- अब फैसला अमेरिका के हाथ में

    ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा था कि अब फैसला अमेरिका को करना है। उनका कहना था कि ईरान दबाव, धमकी या डराने की कोशिश के आगे अपने संप्रभु अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा।

    इस बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजश्कियान ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के रुख का स्वागत किया है। उन्होंने बातचीत के जरिए मतभेदों को सुलझाने के समर्थन के लिए शी का शुक्रिया अदा किया।

    बातचीत और सैन्य कार्रवाई के बीच अटका मामला

    फिलहाल ईरान ने तनाव कम करने के लिए सात दिन का रास्ता सामने रखा है, लेकिन ट्रंप ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है। अमेरिका को ईरान की ओर से अपनी मांगें पूरी किए जाने पर संदेह है। दूसरी ओर, नवंबर के मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर दोबारा अमेरिकी हमले की संभावना सामने आई है।

    ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत का रास्ता खुलता है या तनाव फिर सैन्य कार्रवाई की ओर बढ़ता है, यह ट्रंप के अगले रुख पर निर्भर करेगा।

  • पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर फिर बढ़ा तनाव, गुलिस्तान सेक्टर में झड़प के बाद कई तालिबान सदस्यों के मारे जाने का दावा

    पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर फिर बढ़ा तनाव, गुलिस्तान सेक्टर में झड़प के बाद कई तालिबान सदस्यों के मारे जाने का दावा


    नई दिल्ली ।पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच करीब तीन महीने तक बनी शांति के बाद एक बार फिर सीमा क्षेत्र में तनाव बढ़ गया है। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान से कथित हमले का जवाब देने और उसे नाकाम करने का दावा किया है। सीमा से सटे गुलिस्तान सेक्टर में हुई झड़प के दौरान कई तालिबान सदस्यों के मारे जाने की जानकारी सामने आई है।

    पाकिस्तान की ओर से दावा किया गया है कि अफगान तालिबान की तरफ से की गई कार्रवाई का जवाब दिया गया। इसके तहत गुरुवार को पाकिस्तानी वायुसेना ने तालिबान के करीब 10 ठिकानों पर हमला किया। पाकिस्तान का कहना है कि इन ठिकानों का इस्तेमाल ड्रोन लॉन्च करने और उन्हें रखने के लिए किया जा रहा था।

    सीमा क्षेत्र में हुई इस कार्रवाई के बाद दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव फिर बढ़ गया है। दोनों पड़ोसी देशों के बीच इससे पहले भी सीमा और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर टकराव हो चुका है। लंबे समय तक चले तनाव के बाद करीब तीन महीने तक स्थिति अपेक्षाकृत शांत रहने की बात सामने आई थी।

    पिछले सप्ताह पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी इलाके में एक पुलिस प्रतिष्ठान को निशाना बनाकर हमला किया गया था। इस घटना में कम से कम 24 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद सीमा पार से होने वाली गतिविधियों और सुरक्षा स्थिति को लेकर पाकिस्तान की ओर से चिंता बढ़ी थी।

    दोनों देशों के बीच इस साल फरवरी में भी संघर्ष हुआ था। इसके बाद मार्च में पाकिस्तान की ओर से काबुल में हवाई हमला किए जाने की जानकारी सामने आई थी। इस कार्रवाई में 400 से अधिक लोगों के मारे जाने की बात कही गई थी। अफगान तालिबान ने उस समय दावा किया था कि मार्च में किया गया हवाई हमला एक मादक पदार्थ पुनर्वास केंद्र को निशाना बनाकर किया गया था।

    इसी दौरान बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी की गतिविधियों का भी उल्लेख सामने आया है। संगठन ने बलूचिस्तान में 25 अभियानों की जिम्मेदारी लेने का दावा किया था। 20 सितंबर को नुश्की में बाईपास रोड पर शहीद बालाच खान स्टेडियम के पास पाकिस्तानी सेना को निशाना बनाए जाने की जानकारी दी गई थी।

    इस हमले में दो पाकिस्तानी सैनिकों की मौत और चार अन्य के घायल होने की बात सामने आई थी। इसके बाद 21 सितंबर को लड़ाकों द्वारा मांड में रादिग पर कब्जा किए जाने की जानकारी भी दी गई।

    पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच मौजूदा तनाव में सीमा पर हुई ताजा झड़प को महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर देखा जा रहा है। पाकिस्तान ने जहां तालिबान के हमले को नाकाम करने और उसके कई सदस्यों के मारे जाने का दावा किया है, वहीं सीमा क्षेत्र में दोनों पक्षों के बीच तनाव की स्थिति फिर सामने आई है।

    तीन महीने की शांति के बाद हुई इस ताजा कार्रवाई से दोनों पड़ोसी देशों के बीच सुरक्षा संबंधी विवाद दोबारा उभरता दिखाई दे रहा है। गुलिस्तान सेक्टर में झड़प और तालिबान के ठिकानों पर कार्रवाई के दावे के बीच सीमा क्षेत्र की स्थिति पर नजर बनी हुई है।