Category: International

  • मिडिल ईस्ट से यूक्रेन तक बढ़ते तनाव के बीच ट्रंप का बड़ा दांव नेतन्याहू और जेलेंस्की संग बंद कमरे में हुई अहम वार्ता

    मिडिल ईस्ट से यूक्रेन तक बढ़ते तनाव के बीच ट्रंप का बड़ा दांव नेतन्याहू और जेलेंस्की संग बंद कमरे में हुई अहम वार्ता


    नई दिल्ली । दुनिया इस समय एक साथ कई बड़े भू राजनीतिक संकटों का सामना कर रही है। एक ओर मध्य पूर्व में इजरायल और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है तो दूसरी ओर रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने वैश्विक सुरक्षा को नई चुनौती दी है। ऐसे माहौल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की से अलग अलग बंद कमरे में मुलाकात कर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। इन बैठकों को अमेरिका की भविष्य की रणनीति तय करने की दिशा में बेहद अहम माना जा रहा है।

    जानकारी के अनुसार दोनों बैठकें पूरी तरह बंद कमरे में हुईं और उनकी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। हालांकि व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने इन्हें सकारात्मक और रचनात्मक बताया। माना जा रहा है कि इन चर्चाओं में अमेरिका की सुरक्षा नीति सहयोगी देशों के साथ रणनीतिक तालमेल और युद्ध प्रभावित क्षेत्रों की मौजूदा स्थिति पर विस्तार से विचार किया गया।

    इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ हुई बैठक में ईरान सबसे प्रमुख मुद्दा रहा। हाल के महीनों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर अमेरिका और इजरायल लगातार चिंतित रहे हैं। बैठक से पहले ट्रंप ने फॉक्स न्यूज को दिए एक बयान में कहा था कि उन्हें इजरायल की ओर से किसी विशेष ब्रीफिंग की आवश्यकता नहीं है और उन्होंने संकेत दिया था कि नेतन्याहू चाहते हैं कि अमेरिका इस पूरे मामले में सक्रिय भूमिका निभाता रहे। हालांकि बाद में ओवल ऑफिस से जारी तस्वीरों में दोनों नेता बेहद सकारात्मक माहौल में नजर आए। बैठक में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ भी मौजूद रहे।

    सूत्रों के अनुसार इस दौरान लेबनान सीमा पर बढ़ते तनाव हिज्बुल्लाह की गतिविधियों और अब्राहम समझौते के भविष्य जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई। इन मुद्दों को मध्य पूर्व की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    वहीं यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की के साथ हुई बैठक का मुख्य फोकस रूस के खिलाफ जारी युद्ध और यूक्रेन की रक्षा जरूरतें रहीं। जेलेंस्की ने ट्रंप के साथ हुई बातचीत को रचनात्मक बताते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने यूक्रेन की वायु रक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाने पर चर्चा की। खास तौर पर पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों के लाइसेंस और एयर डिफेंस सहयोग को लेकर विचार विमर्श हुआ। रूस की ओर से लगातार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच यूक्रेन इन रक्षा प्रणालियों को अपनी सुरक्षा के लिए बेहद अहम मानता है।

    बैठक में ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने और रूस के साथ संभावित शांति प्रक्रिया पर भी चर्चा हुई। इसके बाद जेलेंस्की अमेरिकी सांसदों से मुलाकात के लिए कैपिटल हिल पहुंचे जहां यूक्रेन को भविष्य में सैन्य सहायता जारी रखने पर भी विचार किया गया।

    इन बैठकों से पहले ट्रंप नेतन्याहू और जेलेंस्की ने दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के अंतिम संस्कार में भी हिस्सा लिया। ग्राहम अमेरिका में इजरायल और यूक्रेन दोनों के प्रबल समर्थक माने जाते थे और उनकी विदेश नीति पर गहरी पकड़ थी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में जब दुनिया कई मोर्चों पर अस्थिरता का सामना कर रही है तब ट्रंप की ये कूटनीतिक बैठकें आने वाले दिनों में अमेरिका की विदेश नीति और वैश्विक शक्ति संतुलन को नई दिशा दे सकती हैं। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि इन अहम बैठकों के बाद अमेरिका कौन से रणनीतिक फैसले लेता है।

  • PoK हिंसा पर पाक रक्षा मंत्री का विवादित बयान, बोले- 'प्रदर्शनकारी भी भारत की तरह हमारे दुश्मन'

    PoK हिंसा पर पाक रक्षा मंत्री का विवादित बयान, बोले- 'प्रदर्शनकारी भी भारत की तरह हमारे दुश्मन'


    नई दिल्ली। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का विवादित बयान सामने आया है। उन्होंने इस्लामाबाद के खिलाफ आंदोलन कर रहे प्रदर्शनकारियों की तुलना भारत से करते हुए उन्हें भी पाकिस्तान का “दुश्मन” बताया। साथ ही उन्होंने प्रदर्शनकारियों के साथ किसी भी तरह की बातचीत की संभावना से भी इनकार कर दिया।

    एक स्थानीय टीवी चैनल से बातचीत में ख्वाजा आसिफ ने कहा कि जो लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं, उन्हें वह भारत की तरह ही पाकिस्तान का विरोधी मानते हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब पीओके में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव को लेकर तनाव बना हुआ है।

    गोलीबारी में 14 लोगों की मौत का दावा
    हाल ही में प्रतिबंधित ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में निकाले गए विरोध मार्च के दौरान सुरक्षा बलों पर गोलीबारी करने का आरोप लगाया गया है। संगठन का दावा है कि इस कार्रवाई में कम से कम 14 कार्यकर्ताओं की मौत हुई, जबकि दो दर्जन से अधिक लोग घायल हो गए।

    मंगलवार को रावलकोट से मुजफ्फराबाद की ओर निकाले गए मार्च में हजारों लोग शामिल हुए थे। प्रदर्शनकारी पीओके विधानसभा में कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को समाप्त करने की मांग कर रहे थे। JAAC का कहना है कि यह व्यवस्था स्थानीय लोगों के राजनीतिक अधिकारों को कमजोर करती है और इस्लामाबाद समर्थित दलों को अनुचित लाभ पहुंचाती है।

    सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के अलग-अलग दावे
    JAAC के मुताबिक, लगभग 5,000 लोग शांतिपूर्ण मार्च में शामिल थे, लेकिन सुरक्षा बलों ने बिना किसी उकसावे के गोलीबारी कर दी। संगठन का दावा है कि मृतकों में उसके संस्थापक सदस्य उमर नजीर के छोटे भाई उस्मान नजीर भी शामिल हैं।

    वहीं, पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि प्रदर्शनकारियों के पास आधुनिक हथियार थे और उन्होंने पहले सुरक्षा बलों पर हमला किया, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई की गई। दोनों पक्षों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

    कई सप्ताह से जारी है विरोध प्रदर्शन
    पीओके में कई सप्ताह से विरोध प्रदर्शन जारी हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, 5 जून से शुरू हुए आंदोलन और उसके बाद हुई हिंसा तथा सुरक्षा कार्रवाई में अब तक 80 से अधिक लोगों की मौत होने का दावा किया जा चुका है। इससे पहले 40 लोगों के मारे जाने की खबरें सामने आई थीं, जिनमें 34 प्रदर्शनकारी और छह सुरक्षाकर्मी शामिल बताए गए थे।

    भारत ने चुनावी प्रक्रिया पर उठाए सवाल
    इस घटनाक्रम के बीच पाकिस्तान ने पीओके में तथाकथित विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई है। कई क्षेत्रों में झड़पों और मतपेटियां लूटे जाने जैसी घटनाओं की खबरें सामने आई हैं। विपक्षी दलों ने चुनाव में धांधली और भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मतदान कराने पर सवाल उठाए हैं।

    भारत ने इन चुनावों को पाकिस्तान के अवैध कब्जे को वैध ठहराने की कोशिश बताया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि यह पूरी चुनावी प्रक्रिया केवल दिखावटी कवायद है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में मानवाधिकार उल्लंघनों और अवैध कब्जे को छिपाना है।

    उन्होंने दोहराया कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा केंद्र शासित प्रदेश, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र भी शामिल हैं, भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। साथ ही उन्होंने कहा कि पीओके में जारी विरोध प्रदर्शन वहां के लोगों के आर्थिक शोषण, अधिकारों से वंचित किए जाने और प्रशासनिक दमन का परिणाम हैं।

  • भारत-चीन रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने शीर्ष चीनी अधिकारियों से की कई महत्वपूर्ण बैठकें

    भारत-चीन रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने शीर्ष चीनी अधिकारियों से की कई महत्वपूर्ण बैठकें

    नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देने के उद्देश्य से विदेश सचिव विक्रम मिस्री इन दिनों चीन की आधिकारिक यात्रा पर हैं। यात्रा के दौरान उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सेंट्रल पार्टी स्कूल (नेशनल एकेडमी ऑफ गवर्नेंस) के उपाध्यक्ष ली वेनतांग सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों से महत्वपूर्ण मुलाकातें कीं। इन बैठकों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने, शैक्षणिक आदान-प्रदान, राजनीतिक संवाद, आर्थिक संबंधों और सीमा क्षेत्रों में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।

    भारतीय दूतावास की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने मंगलवार को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सेंट्रल पार्टी स्कूल के उपाध्यक्ष ली वेनतांग से मुलाकात की। इस दौरान उन्हें संस्थान के ऐतिहासिक महत्व, बौद्धिक योगदान और विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों की जानकारी दी गई। दोनों पक्षों ने भविष्य में अकादमिक सहयोग, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और संस्थागत आदान-प्रदान की संभावनाओं पर भी विचार-विमर्श किया। इस बैठक को दोनों देशों के बीच ज्ञान, प्रशासनिक अनुभव और संस्थागत सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इससे पहले विदेश सचिव ने चीन की विदेश उप मंत्री हुआ चुनयिंग के साथ भी विस्तृत वार्ता की। दोनों पक्षों ने भारत-चीन संबंधों के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करते हुए इस बात पर सहमति जताई कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखना द्विपक्षीय संबंधों के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। बैठक में दोनों देशों के नेताओं की उस साझा सोच को आगे बढ़ाने पर भी चर्चा हुई, जिसके तहत भारत और चीन को एक-दूसरे के विकास में सहयोगी और साझेदार के रूप में देखा गया है।

    वार्ता के दौरान व्यापार और आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाने, सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने तथा लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के उपायों पर भी विचार किया गया। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि पारस्परिक हितों के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत किया जा सकता है। साथ ही संवाद और आपसी विश्वास को बढ़ाने के लिए नियमित संपर्क बनाए रखने की आवश्यकता पर भी सहमति व्यक्त की गई।

    सोमवार को विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने चीन की 14वीं राष्ट्रीय जन राजनीतिक सलाहकार सम्मेलन (सीपीपीसीसी) की समिति के उप महासचिव होंग लियांग से भी मुलाकात की। इस बैठक में राजनीतिक स्तर पर संवाद को मजबूत करने और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के विभिन्न उपायों पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने माना कि जनसंपर्क, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और शैक्षणिक सहयोग के माध्यम से आपसी समझ और विश्वास को और बेहतर बनाया जा सकता है।

    चीन यात्रा के पहले दिन विदेश सचिव ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के अंतरराष्ट्रीय विभाग की उप मंत्री सन हैयान से भी मुलाकात की। इस बैठक में द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने, राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसरों पर विचार-विमर्श किया गया। अधिकारियों के बीच हुई इन लगातार बैठकों को भारत और चीन के बीच संवाद प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के समय में दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने की कोशिशें क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक सहयोग और आपसी विश्वास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। विदेश सचिव विक्रम मिस्री की यह यात्रा दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय संपर्क बनाए रखने, मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने और सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल मानी जा रही है।

  • यूएन मानवाधिकार प्रमुख के पुनर्नियुक्ति विवाद पर अमेरिका का कड़ा विरोध, फ्रांस के भाषण के दौरान छोड़ी बैठक

    यूएन मानवाधिकार प्रमुख के पुनर्नियुक्ति विवाद पर अमेरिका का कड़ा विरोध, फ्रांस के भाषण के दौरान छोड़ी बैठक

    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क के दूसरे कार्यकाल को लेकर अमेरिका और फ्रांस के बीच गंभीर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। यह विवाद उस समय और गहरा गया जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक के दौरान फ्रांस के प्रतिनिधि के संबोधन की शुरुआत होते ही अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल विरोध दर्ज कराते हुए बैठक से बाहर निकल गया। कूटनीतिक हलकों में इस घटनाक्रम को दोनों पारंपरिक सहयोगी देशों के रिश्तों में बढ़ते तनाव का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

    यह पूरा विवाद संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए उस मतदान के बाद शुरू हुआ, जिसमें वोल्कर टर्क को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में दूसरा कार्यकाल दिया गया। मतदान में उन्हें 144 देशों का समर्थन मिला, जबकि 10 देशों ने विरोध किया और 13 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। अमेरिका और रूस ने उनके पुनर्नियुक्ति का विरोध किया, लेकिन पर्याप्त समर्थन मिलने के कारण उनका दूसरा कार्यकाल सुनिश्चित हो गया। भारत ने भी उनके पक्ष में मतदान किया, जबकि मतदान प्रक्रिया से जुड़े कुछ अन्य प्रस्तावों पर उसने हिस्सा नहीं लिया।

    मानवाधिकार प्रमुख के चयन को लेकर पैदा हुए मतभेद सुरक्षा परिषद की बैठक तक पहुंच गए। यूक्रेन से जुड़े मुद्दे पर आयोजित बैठक में जैसे ही फ्रांस के स्थायी प्रतिनिधि ने अपना वक्तव्य शुरू किया, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल बैठक छोड़कर बाहर चला गया। अमेरिकी अधिकारियों ने इस कदम को फ्रांस की राजनीतिक टिप्पणी और उसके रवैये के विरोध के रूप में प्रस्तुत किया।

    अमेरिकी पक्ष का कहना है कि फ्रांस लगातार मानवाधिकार के मुद्दों पर नैतिक श्रेष्ठता दिखाने की कोशिश करता है और अन्य देशों को उपदेश देने की नीति अपनाता है। अमेरिका ने यह भी आरोप लगाया कि संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने लोकतांत्रिक देशों की अपेक्षा अधिक आलोचना की है, जबकि कई दमनकारी शासन के मामलों में अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया गया। इसी कारण वोल्कर टर्क के दूसरे कार्यकाल का अमेरिका ने खुलकर विरोध किया।

    विवाद उस समय और बढ़ गया जब फ्रांस के संयुक्त राष्ट्र मिशन की ओर से सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी साझा की गई, जिसमें अमेरिका के मतदान रुख पर सवाल उठाए गए। इसके बाद अमेरिकी अधिकारियों ने भी सार्वजनिक रूप से फ्रांस की आलोचना की और कहा कि वह अपने मतदान को सही ठहराने के लिए राजनीतिक बयानबाजी कर रहा है। अमेरिका ने फ्रांस पर सुरक्षा परिषद की गरिमा के अनुरूप व्यवहार नहीं करने का भी आरोप लगाया।

    दूसरी ओर, वोल्कर टर्क के समर्थकों का तर्क है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में विभिन्न देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर समान रूप से टिप्पणी की है। हालांकि अमेरिका और रूस दोनों का आरोप है कि उनके कार्यालय ने कई मामलों में राजनीतिक पक्षपात दिखाया है। रूस ने भी उनके पुनर्नियुक्ति का विरोध करते हुए कहा कि मानवाधिकार के नाम पर भू-राजनीतिक हितों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

    महासभा की प्रक्रिया के दौरान अमेरिका ने मतदान टालने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन उसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। इसके बाद रूस ने सुझाव दिया कि नए महासचिव के कार्यभार संभालने के बाद मानवाधिकार प्रमुख का चुनाव कराया जाए, लेकिन यह प्रस्ताव भी बहुमत हासिल नहीं कर सका। दोनों प्रस्ताव असफल रहने के बाद वोल्कर टर्क का दूसरा कार्यकाल तय हो गया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली, मानवाधिकार एजेंडे और प्रमुख वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ते वैचारिक मतभेदों को भी उजागर करता है। सुरक्षा परिषद में अमेरिका का वॉकआउट इसी व्यापक कूटनीतिक तनाव का प्रतीक माना जा रहा है, जिसका प्रभाव भविष्य में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहयोग और संवाद की दिशा पर भी पड़ सकता है।

  • रावलकोट में प्रदर्शन के दौरान गोलीबारी से बढ़ा तनाव, PoK में सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

    रावलकोट में प्रदर्शन के दौरान गोलीबारी से बढ़ा तनाव, PoK में सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

    नई दिल्ली । पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के रावलकोट क्षेत्र में मंगलवार को प्रदर्शनकारियों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच हुई कथित झड़प के बाद स्थिति अत्यधिक तनावपूर्ण बनी हुई है। स्थानीय संगठनों का दावा है कि प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी रेंजर्स द्वारा की गई गोलीबारी में कई लोगों की जान गई, जबकि बड़ी संख्या में नागरिक अब भी प्रदर्शन स्थल पर डटे हुए हैं। घटनाक्रम के बाद पूरे क्षेत्र में असंतोष और विरोध का माहौल गहरा गया है।

    स्थानीय दावों के अनुसार, मंगलवार तड़के बड़ी संख्या में नागरिक अपने विभिन्न मुद्दों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। इसी दौरान सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ गया। आरोप है कि हालात बिगड़ने पर सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की। हालांकि, इस संबंध में स्वतंत्र रूप से सभी दावों की पुष्टि नहीं हो सकी है। घटना के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था और अधिक कड़ी कर दी गई है।

    जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने आरोप लगाया है कि प्रदर्शन को दबाने के लिए सुरक्षा बल लगातार बल प्रयोग कर रहे हैं। संगठन का दावा है कि 5 जून से शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान अब तक लगभग 70 लोगों की मौत हो चुकी है। इन दावों की आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है, लेकिन संगठन का कहना है कि हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं और नागरिकों में व्यापक असंतोष व्याप्त है।

    गोलीबारी की खबरों के बावजूद प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं दिखे। बड़ी संख्या में लोग चिनार चौक और आसपास के क्षेत्रों में एकत्र रहे तथा आंदोलन जारी रखने की बात कही। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई होने तक विरोध जारी रहेगा। क्षेत्र में लगातार लोगों की आवाजाही और जुटान के कारण स्थिति संवेदनशील बनी हुई है।

    इस घटनाक्रम पर पाकिस्तान के राजनीतिक हलकों से भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के नेता डॉ. शहबाज गिल ने सैन्य कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा कि इस प्रकार की घटनाएं क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा सकती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बल प्रयोग से हालात सामान्य होने के बजाय और जटिल हो सकते हैं। साथ ही उन्होंने मृतकों की संख्या और घटनाओं की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

    शहबाज गिल ने यह भी दावा किया कि गोलीबारी में जान गंवाने वाले अधिकांश लोग युवा थे। उन्होंने घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। उनके अनुसार, ऐसे घटनाक्रमों से स्थानीय लोगों में असुरक्षा और असंतोष की भावना बढ़ रही है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और आधिकारिक पक्ष की विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार है।

    इस बीच, कश्मीर एक्शन कमेटी के नेताओं ने आंदोलन को आगे बढ़ाने की घोषणा की है। संगठन का कहना है कि वह आने वाले दिनों में अपनी अगली रणनीति सार्वजनिक करेगा। प्रदर्शन से जुड़े प्रतिनिधियों ने यह भी संकेत दिया है कि विभिन्न स्थानों पर विरोध कार्यक्रम जारी रखे जाएंगे। इससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

    रावलकोट की मौजूदा स्थिति पर स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर बनी हुई है। घटनाओं के संबंध में अलग-अलग पक्षों की ओर से विभिन्न दावे किए जा रहे हैं, जबकि वास्तविक स्थिति को लेकर स्पष्ट तस्वीर आधिकारिक जानकारी और आगे आने वाली जांच के बाद ही सामने आ सकेगी। फिलहाल, क्षेत्र में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है और हालात पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

  • जेफ्री एपस्टीन की वसीयत से बड़ा खुलासा, आखिरी कॉल पाने वाली कारिना शुलियाक को मिल सकती है बड़ी संपत्ति

    जेफ्री एपस्टीन की वसीयत से बड़ा खुलासा, आखिरी कॉल पाने वाली कारिना शुलियाक को मिल सकती है बड़ी संपत्ति

    नई दिल्ली । दुनिया के चर्चित और विवादित यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन की मौत के लगभग सात वर्ष बाद उनकी संपत्ति को लेकर नया विवाद सामने आया है। हाल ही में सार्वजनिक हुए न्यायिक दस्तावेजों के अनुसार बेलारूस में जन्मीं डेंटिस्ट डॉ. कारिना शुलियाक उनकी संपत्ति की सबसे बड़ी दावेदार के रूप में सामने आई हैं। दस्तावेज बताते हैं कि एपस्टीन ने अपनी वसीयत में उनके लिए करीब 959 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्ति और 33 कैरेट की हीरे की अंगूठी का उल्लेख किया था। इस खुलासे के बाद एक बार फिर एपस्टीन का निजी जीवन और उसकी संपत्ति चर्चा का विषय बन गए हैं।

    सामने आए रिकॉर्ड के अनुसार डॉ. कारिना शुलियाक और जेफ्री एपस्टीन के बीच कई वर्षों तक घनिष्ठ संबंध रहे। बताया गया है कि जेल में अपनी मृत्यु से एक दिन पहले एपस्टीन ने अंतिम फोन कॉल भी कारिना को ही किया था। दोनों के बीच हुई बातचीत और उनके रिश्ते से जुड़े कई दस्तावेज अब सार्वजनिक हो चुके हैं, जिससे इस मामले को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।

    जांच से जुड़े दस्तावेजों में दोनों के हजारों निजी ईमेल, तस्वीरें और अन्य रिकॉर्ड शामिल हैं। इनसे पता चलता है कि दोनों की पहचान वर्ष 2011 में हुई थी, जब कारिना उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका पहुंची थीं। उस समय वह डेंटिस्ट बनने की पढ़ाई कर रही थीं और बाद के वर्षों में दोनों के बीच करीबी संबंध विकसित हुए। रिकॉर्ड में यह भी उल्लेख है कि एपस्टीन ने उनकी शिक्षा और अन्य जरूरतों के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई थी।

    दस्तावेजों के मुताबिक एपस्टीन ने कारिना की पढ़ाई का खर्च उठाने के साथ-साथ उन्हें आर्थिक सहयोग भी दिया। दोनों ने कई देशों की यात्राएं भी साथ कीं। समय बीतने के साथ कारिना एपस्टीन के निजी और व्यावसायिक मामलों में भी सहयोग करने लगीं। बताया जाता है कि वह उनकी कुछ संपत्तियों और कर्मचारियों के प्रबंधन से जुड़े कार्यों में भी शामिल थीं।

    रिकॉर्ड में यह भी दावा किया गया है कि अमेरिका में स्थायी निवास दिलाने के उद्देश्य से कारिना का एक महिला नागरिक से विवाह कराया गया था। जांच दस्तावेजों के अनुसार यह विवाह ग्रीन कार्ड प्राप्त करने की प्रक्रिया का हिस्सा माना गया। बाद में कारिना को अमेरिकी नागरिकता मिल गई और कुछ समय बाद यह विवाह समाप्त हो गया। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर भी उस समय कई सवाल उठे थे।

    जुलाई 2019 में गिरफ्तारी के बाद एपस्टीन ने अपनी वसीयत में कुछ बदलाव किए थे। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार उन्होंने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा कारिना के नाम करने की इच्छा जताई थी। इसमें एक महंगी हीरे की अंगूठी का भी उल्लेख किया गया, जिसे कथित तौर पर विवाह के उद्देश्य से देने की योजना थी। हालांकि उनकी मृत्यु के बाद संपत्ति के वितरण को लेकर कानूनी प्रक्रिया लगातार जारी है।

    गौरतलब है कि जेफ्री एपस्टीन पर कई नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण और सेक्स ट्रैफिकिंग से जुड़े गंभीर आरोप लगे थे। वर्ष 2019 में गिरफ्तारी के बाद न्यूयॉर्क की जेल में उनकी मृत्यु हो गई थी, जिसे अधिकारियों ने आत्महत्या बताया था। उनकी मौत के बाद भी उनसे जुड़े कानूनी विवाद, जांच और संपत्ति से संबंधित मामले लगातार सामने आते रहे हैं। अब सार्वजनिक हुए नए दस्तावेजों ने इस बहुचर्चित मामले को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

  • जापान में 7.1 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंप से हिली धरती, कई प्रांतों के लिए सुनामी अलर्ट जारी..

    जापान में 7.1 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंप से हिली धरती, कई प्रांतों के लिए सुनामी अलर्ट जारी..

    नई दिल्ली । जापान के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में मंगलवार को आए 7.1 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंप ने व्यापक क्षेत्र में लोगों को दहशत में डाल दिया। भूकंप का केंद्र कुमामोटो प्रांत के आसपास दर्ज किया गया। तेज झटकों के तुरंत बाद जापान मौसम विज्ञान एजेंसी ने सुनामी की चेतावनी जारी करते हुए तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों को सतर्क रहने और सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी। प्रशासन ने संभावित खतरे को देखते हुए कई क्षेत्रों में आपातकालीन अलर्ट भी जारी कर दिया है।

    जापान मौसम विज्ञान एजेंसी के अनुसार, भूकंप रिक्टर पैमाने पर 7.1 तीव्रता का था। झटके इतने तेज थे कि कुमामोटो सहित आसपास के कई क्षेत्रों में इमारतें हिलने लगीं और लोग घरों तथा कार्यालयों से बाहर निकल आए। प्रारंभिक आकलन के अनुसार समुद्र में लगभग एक मीटर ऊंची लहरें उठने की आशंका जताई गई है, जिसके चलते तटीय क्षेत्रों में अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है।

    भूकंप के तुरंत बाद जापान सरकार ने इमरजेंसी भूकंप चेतावनी प्रणाली सक्रिय कर दी। इसके तहत दक्षिणी क्यूशू द्वीप के कई प्रांतों के लिए विशेष अलर्ट जारी किया गया। कुमामोटो के अलावा नागासाकी, कागोशिमा, फुकुओका, सागा, ओइता और मियाज़ाकी प्रांतों में प्रशासन ने लोगों से आधिकारिक निर्देशों का पालन करने और समुद्र तटों से दूर रहने की अपील की है।

    सुरक्षा एजेंसियां और स्थानीय प्रशासन प्रभावित क्षेत्रों की लगातार निगरानी कर रहे हैं। राहत और बचाव दलों को भी तैयार रहने के निर्देश दिए गए हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके। अधिकारियों ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और केवल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करने की अपील की है।

    जापान दुनिया के सबसे अधिक भूकंप प्रभावित देशों में शामिल है। देश प्रशांत महासागर के ‘रिंग ऑफ फायर’ क्षेत्र में स्थित है, जहां कई टेक्टोनिक प्लेटें आपस में मिलती हैं। इसी कारण यहां समय-समय पर मध्यम और तेज तीव्रता के भूकंप आते रहते हैं। जापान ने वर्षों के अनुभव के आधार पर उन्नत भूकंप चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन तंत्र विकसित किया है, जिससे लोगों को समय रहते सतर्क किया जा सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े भूकंप के बाद कुछ समय तक आफ्टरशॉक आने की संभावना बनी रहती है। इसी कारण प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। प्रशासन ने तटीय इलाकों में रहने वाले नागरिकों से समुद्र के किनारे जाने से बचने और जरूरत पड़ने पर ऊंचे एवं सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने का आग्रह किया है।

    फिलहाल प्रशासन हालात पर लगातार नजर बनाए हुए है। भूकंप के बाद विभिन्न सरकारी एजेंसियां नुकसान का आकलन करने में जुटी हैं। साथ ही परिवहन, संचार और अन्य आवश्यक सेवाओं की स्थिति की भी समीक्षा की जा रही है। यदि स्थिति में कोई नया बदलाव होता है तो संबंधित अधिकारियों द्वारा समय-समय पर नई जानकारी जारी की जाएगी। अभी तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता देते हुए सभी संबंधित विभाग अलर्ट मोड पर काम कर रहे हैं।

  • बांग्लादेश की विशेष अदालत का बड़ा फैसला, शेख हसीना समेत 40 लोगों पर मानवता के खिलाफ अपराध का मुकदमा

    बांग्लादेश की विशेष अदालत का बड़ा फैसला, शेख हसीना समेत 40 लोगों पर मानवता के खिलाफ अपराध का मुकदमा

    नई दिल्ली । बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना समेत 40 अन्य लोगों के खिलाफ मानवता के विरुद्ध अपराध के आरोपों में मामला दर्ज किया है। यह मामला वर्ष 2013 में राजधानी ढाका के मोतीझील स्थित शपला चत्तर में आयोजित एक विरोध रैली के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई से जुड़ा है। ट्रिब्यूनल ने मामले में संज्ञान लेते हुए फरार आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी करने के आदेश दिए हैं। इस घटनाक्रम को बांग्लादेश की न्यायिक और राजनीतिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    यह मामला 5 मई 2013 को आयोजित उस विरोध प्रदर्शन से संबंधित है, जिसमें हिफाजत-ए-इस्लाम संगठन ने अपनी 13 सूत्री मांगों के समर्थन में ढाका में विशाल रैली आयोजित की थी। संगठन की प्रमुख मांगों में ईशनिंदा कानून लागू करने और इस्लाम के अपमान के मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान शामिल था। प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कई लोगों की मौत होने के आरोप लगाए गए थे, जिसके आधार पर अब मानवता के विरुद्ध अपराध का मामला दर्ज किया गया है।

    ट्रिब्यूनल में मुख्य अभियोजक अमीनुल इस्लाम की ओर से आरोपपत्र प्रस्तुत किया गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मामले में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के अलावा तत्कालीन सेना प्रमुख, कई वरिष्ठ राजनेता, सुरक्षा अधिकारियों और अन्य संबंधित व्यक्तियों को भी आरोपी बनाया गया है। अदालत ने आरोपों पर प्रारंभिक संज्ञान लेते हुए उन आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं, जो फिलहाल फरार बताए जा रहे हैं।

    अभियोजन पक्ष का कहना है कि इस मामले में कई हाई-प्रोफाइल आरोपी पहले से ही विभिन्न मामलों में जेल में बंद हैं। इनमें पूर्व मंत्री, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और अन्य प्रमुख अधिकारी शामिल बताए गए हैं। अदालत अब मामले की आगे की सुनवाई के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों और अभियोजन पक्ष की दलीलों के आधार पर अगली कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब बांग्लादेश में पिछले कुछ समय से राजनीतिक और कानूनी स्तर पर कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई जारी है। इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल पहले भी पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना से जुड़े मामलों की सुनवाई कर चुका है। अदालत ने पिछले वर्ष एक अन्य मामले में उन्हें छात्र आंदोलन से जुड़े घटनाक्रम के संदर्भ में दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। वर्तमान मामला उससे अलग है और वर्ष 2013 की रैली के दौरान हुई घटनाओं पर आधारित है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले की सुनवाई पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर बनी रहेगी, क्योंकि इसमें देश के पूर्व शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व और कई वरिष्ठ अधिकारियों के नाम शामिल हैं। अदालत द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट के बाद अब संबंधित एजेंसियों की कार्रवाई और आगे की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

    बांग्लादेश की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच यह मामला एक बार फिर वर्ष 2013 की घटनाओं को चर्चा के केंद्र में ले आया है। आने वाले दिनों में ट्रिब्यूनल में सुनवाई के दौरान अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलों के आधार पर मामले की दिशा तय होगी। फिलहाल अदालत ने आरोपों पर संज्ञान लेते हुए कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है और संबंधित पक्षों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

  • ट्रंप ने ईरान को लेकर दिया सकारात्मक संकेत, लेकिन समझौता नहीं हुआ तो सैन्य कार्रवाई की भी दी चेतावनी

    ट्रंप ने ईरान को लेकर दिया सकारात्मक संकेत, लेकिन समझौता नहीं हुआ तो सैन्य कार्रवाई की भी दी चेतावनी


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी कूटनीतिक बातचीत को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं, लेकिन साथ ही साफ किया है कि यदि कोई समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका फिर से सैन्य कार्रवाई का रास्ता अपना सकता है। ट्रंप के इस बयान के बीच पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है।

    पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच “बेहद दोस्ताना बातचीत” चल रही है और उन्हें समझौते की उम्मीद है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यदि बातचीत सफल नहीं हुई तो अमेरिका फिर वही कदम उठाएगा, जो कुछ दिन पहले सैन्य मोर्चे पर उठा रहा था।

    चुनावी रैली में दिखाया सख्त रुख

    मिशिगन में आयोजित एक चुनावी रैली के दौरान ट्रंप ने ईरान के प्रति और कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि ईरान को “रिश्वत देकर नहीं, बल्कि हराकर” ही रोका जा सकता है। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी कार्रवाई से ईरान की नौसेना, वायुसेना, सैन्य नेतृत्व, एयर डिफेंस सिस्टम और ड्रोन-मिसाइल निर्माण क्षमता को भारी नुकसान पहुंचा है।

    उन्होंने यह भी कहा कि अगर अमेरिका ने सख्त रुख नहीं अपनाया होता तो ईरान बातचीत की मेज पर नहीं आता। ट्रंप ने अमेरिकी नौसेना की सराहना करते हुए दावा किया कि ईरान की समुद्री गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण बनाया गया है।

    क्षेत्रीय तनाव फिर बढ़ा

    ट्रंप के बयान ऐसे समय आए हैं जब सऊदी अरब, जॉर्डन और इराक ने ड्रोन हमलों की घटनाओं की जानकारी दी है। इन घटनाओं ने क्षेत्र में तनाव कम होने की उम्मीदों को झटका दिया है। हालांकि अमेरिका ने हाल ही में करीब दो सप्ताह से जारी ईरान के खिलाफ हवाई अभियान को फिलहाल रोक दिया था।

    क्यों रोका गया हवाई अभियान?

    अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सैन्य कमांडरों ने राष्ट्रपति को बताया था कि लगातार हवाई हमलों के बाद संभावित सैन्य लक्ष्य सीमित रह गए हैं। साथ ही हमलों में इस्तेमाल होने वाले हथियारों और गोला-बारूद के भंडार को लेकर भी चिंता जताई गई थी। हालांकि ट्रंप ने हथियारों की कमी की बात को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिकी सेना तेजी से अपने भंडार को फिर से मजबूत कर रही है और आधुनिक हथियार प्रणालियों पर काम जारी है।

    ईरान ने बातचीत की मांग से किया इनकार

    ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि मध्यस्थों के जरिए दोनों देशों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान जारी है, लेकिन तेहरान ने अमेरिका से बातचीत की कोई औपचारिक पहल नहीं की है। उन्होंने ऐसी खबरों को निराधार बताया। हालांकि ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि यदि घोषित युद्धविराम प्रभावी रहता है तो ईरान भी अपने हमले रोक सकता है।

    सऊदी और हूती फिर आमने-सामने

    सऊदी अरब ने दावा किया कि उसने तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने वाले कई ड्रोन हमलों को विफल कर दिया। रियाद ने इन हमलों के लिए इराक में सक्रिय ईरान समर्थित समूहों को जिम्मेदार ठहराया। वहीं यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन पर हमले की जिम्मेदारी लेते हुए इसे सऊदी सैन्य गतिविधियों का जवाब बताया।

    होर्मुज जलडमरूमध्य बना केंद्र

    इस बीच ईरान ने अमेरिका पर अपने समुद्री क्षेत्र में जहाजों और तेल टैंकरों को डराने-धमकाने का आरोप लगाया है। तेहरान ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण बरकरार है और यह वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार, बिना अनुमति गुजरने की कोशिश करने वाले छह जहाजों को सोमवार को वापस लौटा दिया गया।

  • अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय मूल के नासा अंतरिक्ष यात्री अनिल मेनन अगले सप्ताह अपनी पहली स्पेसवॉक करेंगे

    अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय मूल के नासा अंतरिक्ष यात्री अनिल मेनन अगले सप्ताह अपनी पहली स्पेसवॉक करेंगे

    नई दिल्ली । वैश्विक अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भारतीय मूल के वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष यात्रियों की बढ़ती साख के बीच नासा के अंतरिक्ष यात्री अनिल मेनन अगले सप्ताह अपने करियर की पहली स्पेसवॉक करने के लिए तैयार हैं। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन परिसर के बाहर संचालित होने वाले इस महत्वपूर्ण अभियान के दौरान वे ऊर्जा प्रणालियों के संवर्धन और संचार नेटवर्क को अत्याधुनिक बनाने से जुड़े कई जटिल तकनीकी कार्यों को पूरा करेंगे। इस मिशन को अंतरिक्ष स्टेशन की कार्यप्रणाली को दीर्घकालिक और सुरक्षित बनाए रखने के दृष्टिकोण से बेहद अहम माना जा रहा है।

    निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार छह अगस्त से शुरू हो रहे इस अभियान में अनिल मेनन अपनी सहयोगी अंतरिक्ष यात्री के साथ कक्षीय प्रयोगशाला के बाहर जाकर विशेष रोल-आउट सोलर एरे स्थापित करने की पूर्व-तैयारियां करेंगे। यह नई सौर ऊर्जा प्रणाली अंतरिक्ष स्टेशन को अतिरिक्त बिजली की आपूर्ति प्रदान करेगी, जो भविष्य में प्रयोगशाला के नियंत्रित संचालन और शोध गतिविधियों के लिए आवश्यक है। इसके बाद अगस्त के मध्य में प्रस्तावित दूसरी स्पेसवॉक के दौरान पृथ्वी स्थित मिशन कंट्रोल सेंटर और अंतरिक्ष स्टेशन के बीच उच्च-गति डेटा ट्रांसमिशन सुनिश्चित करने वाले मुख्य संचार एंटीना को बदला जाएगा।

    अगस्त के अंतिम सप्ताह में आयोजित होने वाली तीसरी और अंतिम स्पेसवॉक में पावर केबल, डेटा रिले प्रणालियों को जोड़ने तथा अंतरिक्ष यान की सुरक्षित डॉकिंग के लिए उपयोग किए जाने वाले नेविगेशन उपकरणों को अद्यतन करने का कार्य किया जाएगा। अंतरिक्ष स्टेशन से जुड़ा यह बहुस्तरीय तकनीकी अभियान आने वाले वर्षों में वैज्ञानिक प्रयोगों और विभिन्न अभियानों के सुचारू संचालन में अहम भूमिका निभाएगा। पिछले माह अंतरिक्ष स्टेशन पर पहुंचे मेनन वहां लगभग आठ महीने का समय बिताएंगे और इस दौरान विभिन्न वैश्विक शोध परियोजनाओं में भाग लेंगे।

    अनिल मेनन द्वारा की जाने वाली यह चहलकदमी न केवल नासा के भावी अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए आधार तैयार करेगी, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान में भारतवंशी विशेषज्ञों की बढ़ती भागीदारी को भी रेखांकित करती है। इस संपूर्ण मिशन के सफलतापूर्वक पूरे होने से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की परिचालन दक्षता में अभूतपूर्व वृद्धि होगी और वैज्ञानिक डेटा के त्वरित आदान-प्रदान में मदद मिलेगी। इस ऐतिहासिक मिशन की ओर पूरी दुनिया के अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थानों की निगाहें टिकी हुई हैं।