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  • ट्रंप की धमकी के बीच अराघची बोले- हम जंग बेचने नहीं आए, शांति के लिए तैयार है ईरान

    ट्रंप की धमकी के बीच अराघची बोले- हम जंग बेचने नहीं आए, शांति के लिए तैयार है ईरान


    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ किया है कि उनका देश युद्ध नहीं चाहता। न्यूयॉर्क में उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और वह यहां युद्ध के लिए नहीं, बल्कि शांति और कूटनीति का रास्ता तलाशने आए हैं। यह बयान ऐसे समय आया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में ईरान को नेस्तनाबूद करने की बात कही और तेहरान के ताजा प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

    अराघची बोले- जंग नहीं चाहते, लेकिन जवाब देने को तैयार

    अराघची ने कहा, “राष्ट्रपति पेजेशकियान और मैं न्यूयॉर्क युद्ध बेचने नहीं आए हैं। हम शांति कायम करने आए हैं।” हालांकि, इसके साथ उन्होंने ईरान की सैन्य प्रतिक्रिया को लेकर भी रुख स्पष्ट किया।

    ईरानी विदेश मंत्री ने कहा कि उनका देश किसी भी तरह की आक्रामकता के सामने मजबूती से खड़ा रहेगा। हालात चाहे कितने भी गंभीर क्यों न हो जाएं, ईरान अपनी रक्षा करेगा। उन्होंने एक संभावित ‘एपोकैलिप्टिक वॉर’ तक का जिक्र किया और साथ ही कहा कि तेहरान वास्तविक कूटनीति के लिए तैयार है।

    अराघची का यह बयान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से ईरान के प्रस्ताव को खारिज किए जाने के बाद आया है।

    होर्मुज स्ट्रेट खोलने के लिए ईरान ने रखा प्रस्ताव

    ईरान ने अमेरिका के सामने होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने और क्षेत्र में जारी लड़ाई रोकने के लिए प्रस्ताव रखा था। इसके तहत सात दिन का काउंटडाउन शुरू करने की बात कही गई थी।

    अराघची के मुताबिक, यदि अमेरिका समझौते को लेकर गंभीर है तो ईरान इसके क्रियान्वयन की तैयारी पूरी कर चुका है। प्रस्ताव लागू होने के बाद दोनों पक्ष उन मुद्दों पर व्यापक बातचीत शुरू कर सकते हैं, जिन पर आपसी सहमति बन सकती है।

    होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। ऐसे में यहां तनाव बढ़ने का असर क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ तेल की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही पर भी पड़ सकता है।

    ट्रंप ने प्रस्ताव ठुकराया, कहा- दबाव में है ईरान

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि तेहरान तत्काल होर्मुज स्ट्रेट खोलने का समझौता इसलिए करना चाहता है, क्योंकि वह बुरी तरह दबाव में है।

    हालांकि, ट्रंप ने यह भी कहा कि इस सप्ताह अमेरिका और ईरान के बीच आगे बातचीत हो सकती है। ऐसे में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संपर्क की संभावना अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

    ईरान की शर्त- पहले मांगें पूरी हों, तभी खुलेगा होर्मुज

    अराघची ने होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान की शर्त भी स्पष्ट कर दी है। उन्होंने कहा कि स्ट्रेट तभी खोला जाएगा, जब ईरान की शर्तें पूरी होंगी।

    उनके मुताबिक, मध्यस्थों ने अभी तक अमेरिका की ओर से प्रस्ताव खारिज किए जाने की औपचारिक जानकारी ईरान को नहीं दी है। तेहरान अमेरिकी पक्ष के अंतिम जवाब का इंतजार कर रहा है। इसके बाद ही ईरान आगे की रणनीति तय करेगा।

    इससे संकेत मिलता है कि होर्मुज स्ट्रेट को लेकर गतिरोध दोनों देशों के बीच बातचीत में सबसे अहम मुद्दों में से एक बना हुआ है।

    पेजेशकियान बोले- बातचीत को तैयार, दबाव स्वीकार नहीं

    ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने भी कहा है कि उनका देश परमाणु कार्यक्रम समेत दूसरे मुद्दों पर बातचीत के लिए तैयार है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान दबाव या धमकी के तहत कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा।

    पेजेशकियान के मुताबिक ईरान युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अगर उस पर दबाव बनाया जाता है, धमकी दी जाती है या हमला होता है तो वह अपना बचाव करेगा।

    तेल की आवाजाही पर भी पड़ रहा तनाव का असर

    अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की कोशिश ऐसे समय हो रही है, जब होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण तेल की आवाजाही प्रभावित हुई है। दुनिया के लिए यह समुद्री मार्ग इसलिए भी अहम है, क्योंकि यहां किसी लंबे गतिरोध का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और बाजार पर पड़ सकता है।

    फिलहाल ईरान अपने प्रस्ताव पर अमेरिका के अंतिम जवाब का इंतजार कर रहा है। एक तरफ तेहरान कूटनीति के जरिए तनाव कम करने की बात कर रहा है, वहीं वह यह भी स्पष्ट कर रहा है कि दबाव या सैन्य कार्रवाई की स्थिति में वह जवाब देने से पीछे नहीं हटेगा। ऐसे में आगे की बातचीत और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर दोनों देशों का रुख क्षेत्रीय तनाव की दिशा तय करने में अहम होगा।

  • 1200 KM तक वार करने वाली ईरानी मिसाइल की चर्चा अमेरिकी युद्धपोतों ने ईरान के पास बढ़ाई दूरी

    1200 KM तक वार करने वाली ईरानी मिसाइल की चर्चा अमेरिकी युद्धपोतों ने ईरान के पास बढ़ाई दूरी


    नई दिल्ली । ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच समुद्री मोर्चे पर कासिम बसीर मिसाइल को लेकर चर्चा तेज हो गई है। ईरान ने इस मिसाइल को अपनी लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता के अहम हथियार के तौर पर पेश किया है। इसकी घोषित रेंज करीब 1200 किलोमीटर बताई जाती है। हाल की घटनाओं के बाद ओमान की खाड़ी और अरब सागर में अमेरिकी नौसैनिक तैनाती को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ सैटेलाइट तस्वीरों और ओपन सोर्स विश्लेषणों में अमेरिकी बड़े युद्धपोतों की पहले की तुलना में अलग स्थिति दिखाई देने का दावा किया गया है।

    कासिम बसीर को ईरान ने मई 2025 में सार्वजनिक रूप से पेश किया था। उपलब्ध सैन्य विश्लेषणों के अनुसार यह ठोस ईंधन वाली मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है। इसमें मैन्युवरेबल री-एंट्री व्हीकल यानी MaRV होने की बात कही गई है जो उड़ान के अंतिम चरण में दिशा बदलने की क्षमता से जुड़ा है। रिपोर्टों में इसके इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सीकर से लैस होने का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि इन क्षमताओं और वास्तविक युद्धक प्रदर्शन से जुड़े कई दावे ईरानी पक्ष के बयानों पर आधारित हैं।

    सितंबर की शुरुआत में अमेरिकी युद्धपोतों को निशाना बनाने की कोशिश से जुड़ी घटनाओं ने इस मिसाइल को फिर चर्चा में ला दिया। ईरानी अधिकारियों ने दावा किया कि अमेरिकी नौसैनिक जहाजों के खिलाफ नई मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया। कुछ ईरानी मीडिया रिपोर्टों ने इन हमलों को कासिम बसीर से जोड़ा। हालांकि अमेरिकी पक्ष के अनुसार उसके युद्धपोतों ने हमलों को सफलतापूर्वक टाल दिया और अमेरिकी जहाजों को नुकसान पहुंचने की पुष्टि नहीं की गई। विश्लेषणों में भी यह स्पष्ट नहीं माना गया है कि हालिया हमले में वास्तव में कासिम बसीर का इस्तेमाल हुआ था।

    इसके बावजूद सैटेलाइट तस्वीरों को लेकर चर्चा जारी है। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सितंबर के दौरान ओमान की खाड़ी और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में पहले दिखाई देने वाले अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर और विध्वंसक जहाज अब पहले की स्थिति में नजर नहीं आ रहे हैं। कुछ विश्लेषणों के मुताबिक अमेरिकी नौसेना ने ईरानी तट से दूरी बढ़ाकर मिसाइलों की संभावित मारक सीमा से बाहर रहने की रणनीति अपनाई है।

    इस घटनाक्रम का एक बड़ा पहलू आधुनिक समुद्री युद्ध की रणनीति से जुड़ा है। एयरक्राफ्ट कैरियर और बड़े युद्धपोत बेहद महंगे सैन्य प्लेटफॉर्म होते हैं और उनकी सुरक्षा के लिए लंबी दूरी की मिसाइलों से पैदा होने वाले खतरे को ध्यान में रखना पड़ता है। यदि किसी मिसाइल की वास्तविक मारक क्षमता और लक्ष्य साधने की क्षमता प्रभावी साबित होती है तो युद्धपोतों को तट से अधिक दूरी पर रखना पड़ सकता है। इससे समुद्री क्षेत्र में मौजूदगी और निगरानी की रणनीति प्रभावित हो सकती है।

    हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिकी नौसेना केवल कासिम बसीर के डर से पीछे हटी है। सैन्य तैनाती मौसम परिचालन जरूरतों मिशन की स्थिति और व्यापक रणनीतिक परिस्थितियों के आधार पर भी बदली जाती है। उपलब्ध विश्लेषणों में अमेरिकी जहाजों की स्थिति में बदलाव की बात तो सामने आई है लेकिन इसका एकमात्र कारण कासिम बसीर है यह स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं हुआ है।

    फिलहाल कासिम बसीर ने ईरान की मिसाइल क्षमता को लेकर बहस जरूर तेज कर दी है। 1200 किलोमीटर की घोषित रेंज और संभावित टर्मिनल गाइडेंस जैसी क्षमताओं के कारण यह मिसाइल अमेरिकी नौसेना के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक मानी जा रही है। आने वाले समय में इस हथियार का वास्तविक युद्धक प्रदर्शन और अमेरिका की समुद्री तैनाती में होने वाले बदलाव ही बताएंगे कि इसका रणनीतिक असर कितना बड़ा है।

  • नॉर ईस्टर तूफान ने अमेरिका में मचाई तबाही…. तेज हवा-बारिश से जनजीवन बेहाल, 425 उड़ानें रद्द

    नॉर ईस्टर तूफान ने अमेरिका में मचाई तबाही…. तेज हवा-बारिश से जनजीवन बेहाल, 425 उड़ानें रद्द


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) के पूर्वी तट पर इस वीकेंड शक्तिशाली नॉर ईस्टर तूफान (Powerful Nor’easter storm) का असर देखने को मिला. वॉशिंगटन डीसी (Washington D.C.) से लेकर अमेरिका के उत्तर-पूर्वी राज्य मेन तक तेज हवाओं, भारी बारिश के साथ तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा बना हुआ है. शनिवार को अमेरिका से जुड़ी करीब 425 फ्लाइट्स कैंसिल हुईं, जबकि 1,338 उड़ानों में देरी हुई।

    तूफान का असर सिर्फ उड़ानों पर नहीं पड़ा, बिजली सप्लाई भी प्रभावित हुई. न्यू जर्सी, कनेक्टिकट, न्यूयॉर्क और पेंसिल्वेनिया में हजारों घरों और कारोबारों की बिजली चली गई. शनिवार दोपहर 1:07 बजे तक इन चार राज्यों में 88 हजार से ज्यादा घरों, दुकानों और दफ्तरों की बिजली गुल थी. इससे पहले यह संख्या 1.19 लाख से ज्यादा थी।


    हजारों घरों में अब भी बिजली गुल

    कनेक्टिकट, न्यू जर्सी और न्यूयॉर्क में दोपहर करीब 1 बजे तक हर राज्य में 25 हजार से ज्यादा बिजली कनेक्शन प्रभावित थे. लॉन्ग आइलैंड में भी करीब 13,300 ग्राहक बिना बिजली के थे. तूफान में पेड़, शाखाएं और बिजली के तार गिरने से कई जगह सप्लाई बंद हो गई. बिजली कंपनी PSEG Long Island के मुताबिक, शुक्रवार सुबह से अब तक 34,600 से ज्यादा प्रभावित ग्राहकों की बिजली बहाल की जा चुकी है।


    425 फ्लाइट्स कैंसिल, 1,338 में देरी

    नॉर ईस्टर का असर अमेरिकी एयरपोर्ट्स पर भी साफ दिखा. फ्लाइटअवेयर के मुताबिक, शनिवार को अमेरिका से जुड़ी करीब 425 फ्लाइट्स रद्द हुईं. 1,338 उड़ानों में देरी दर्ज की गई. इससे वीकेंड पर सफर करने वाले यात्रियों की मुश्किल बढ़ गई. कई लोगों को अपनी उड़ान रद्द होने या लंबे इंतजार का सामना करना पड़ा।

    अमेरिका की नेशनल वेदर सर्विस ने सोमवार तक मिड-अटलांटिक तथा न्यू इंग्लैंड में मौसम खराब रहने की चेतावनी दी है. इस दौरान तटीय बाढ़, समुद्र में खतरनाक धाराएं, तेज हवाओं के झोंके और भारी बारिश का खतरा बताया गया है. हालात को देखते हुए न्यूयॉर्क तथा न्यू जर्सी के उन इलाकों में इमरजेंसी घोषित की गई, जहां तूफान का असर ज्यादा होने की आशंका थी. इसमें न्यूयॉर्क सिटी भी शामिल है. कनेक्टिकट ने भी राज्य का इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर सक्रिय कर दिया है।

  • Pakistan : पुलिस चेकपॉइंट पर आत्मघाती हमला…पीड़ितों को बचाने जा रही एंबुलेंस पर गोलीबारी

    Pakistan : पुलिस चेकपॉइंट पर आत्मघाती हमला…पीड़ितों को बचाने जा रही एंबुलेंस पर गोलीबारी


    इस्लामाबाद।
    उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान (North-western Pakistan) में शनिवार को सड़क किनारे बने पुलिस चेकपॉइंट (Police checkpoint) पर हुए आत्मघाती बम हमले की जगह पर पहुंची एक एम्बुलेंस पर बंदूकधारियों ने गोलीबारी की।

    प्रांतीय आपातकालीन सेवा के प्रवक्ता बिलाल फैजी ने बताया कि विस्फोटक से लदे वाहन से किया गया यह हमला खैबर पख्तूनख्वा प्रांत (Khyber Pakhtunkhwa province) के डेरा इस्माइल खान (Dera Ismail Khan) जिले में हुआ। स्थानीय पुलिस प्रमुख सफदर बलोच ने कहा कि मारे गए और घायल हुए लोगों में ज्यादातर सुरक्षाकर्मी और राहगीर थे।


    अस्पताल ले जाते वक्त हुई एंबुलेंस पर गोलीबारी

    धमाके से बड़ा चेकपॉइंट तबाह हो गया और चश्मदीदों ने बताया कि हमले के बाद गोलियां चलने की आवाज भी सुनाई दी। फैजी ने बताया कि जब इमरजेंसी टीमें पीड़ितों को पास के अस्पताल ले जा रही थीं तो बंदूकधारियों ने एम्बुलेंस पर गोलीबारी की, जिसमें एक बचावकर्मी की मौत हो गई और दो अन्य घायल हो गए। उन्होंने कहा कि आत्मघाती बम धमाके में मारे गए लोगों में दो महिलाएं और एक बच्चा भी शामिल था।

    टीटीपी ने ली हमले की जिम्मेदारी
    पाकिस्तानी तालिबान यानी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान में हथियारबंद समूहों की हिंसा में तेजी आई है। इनमें से ज्यादातर हमलों की जिम्मेदारी टीटीपी और प्रतिबंधित बलूच लिबरेशन आर्मी ने ली है। बलूच लिबरेशन आर्मी एक अलगाववादी समूह है जो मुख्य रूप से पड़ोसी बलूचिस्तान प्रांत में सक्रिय है।

    पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हमले की निंदा की और पीड़ितों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की। जरदारी ने आम नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों को निशाना बनाए जाने को बेहद निंदनीय बताया और पाकिस्तानी तालिबान के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि यह संगठन विदेशी मदद से घिनौनी और बर्बर हरकतें कर रहा है।

  • नेपाल में भारतीय विमानों की सुरक्षा पर सवाल…. काठमांडू एयरपोर्ट पर 26 साल से यात्रियों की खुद जांच करता है भारत

    नेपाल में भारतीय विमानों की सुरक्षा पर सवाल…. काठमांडू एयरपोर्ट पर 26 साल से यात्रियों की खुद जांच करता है भारत


    काठमांडू।
    नेपाल (Nepal) के काठमांडू (Kathmandu) स्थित त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट (Tribhuvan International Airport) से उड़ान भरने वाले भारतीय विमानों (Indian aircraft) की सुरक्षा व्यवस्था पिछले 26 सालों से भारत खुद संभाव रहा है। नेपाल में इसको लेकर सवाल उठ रहे हैं। दरअसल दिसंबर 1999 में कंधार हाईजैक (फ्लाइट IC814) के बाद शुरू हुई एक ‘अस्थायी’ व्यवस्था आज स्थायी रूप ले चुकी है जिसके तहत भारतीय सुरक्षाकर्मी नेपाल की धरती पर यात्रियों और उनके सामान की अतिरिक्त तलाशी लेते हैं।

    दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया से नेपाली एजेंसियों को दूर रखा जाता है और नेपाल के किसी भी मंत्रालय यानि गृह या नागरिक उड्डयन के पास इस विदेशी सुरक्षा तैनाती को वैध ठहराने वाला कोई भी दस्तावेज नहीं है। यह स्थिति अब नेपाल की संप्रभुता और दोनों देशों के कूटनीतिक रिश्तों को लेकर एक नई बहस छेड़ रही है। काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट से भारतीय रजिस्टर्ड विमान में उड़ान भरने वाले किसी भी यात्री को विमान में चढ़ने से ठीक पहले एक अतिरिक्त सुरक्षा जांच से गुज़रना पड़ता है।


    काठमांडू एयरपोर्ट पर 26 साल से क्यों खुद जांच करता है भारत?

    काठमांडू पोस्ट के मुताबिक एयरपोर्ट एप्रन पर एक ऊंचे प्लेटफॉर्म पर बने स्क्रीनिंग पॉइंट पर जहां भारतीय सुरक्षाकर्मी तैनात होते हैं वहां यात्रियों की तलाशी ली जाती है और उनके सामान की अच्छी तरह से हाथ से जांच की जाती है। यह कोई छिपी हुई बात नहीं है और न ही यह कोई नई बात है। लेकिन पच्चीस साल से ज्यादा समय बीतने के बाद यह अब विमान में चढ़ने की प्रक्रिया का ही एक हिस्सा बन गया है।

    पोस्ट को नेपाल के सिविल एविएशन अथॉरिटी के एक अधिकारी ने बताया है कि एयर इंडिया और इंडिगो दोनों ही त्रिभुवन में तीन शिफ्ट में भारतीय स्टाफ तैनात करते हैं। एक उड़ान के लिए काम करने वाले 12 से 15 लोगों में से छह से आठ भारतीय कर्मचारी एप्रन पर तैनात होते हैं। वे सुरक्षाकर्मियों वाले भारी जूते पहनते हैं। यात्रियों को एक-एक करके चारों तरफ से घिरी हुई ट्रॉली में भेजा जाता है जहां भारतीय स्टाफ उनके शरीर और उनके हैंड बैगेज की तलाशी लेते हैं।

    उन्होंने कहा कि नेपाली स्टाफ मदद तो करते हैं लेकिन उन्हें असल तलाशी प्रक्रिया से दूर रखा जाता है। अधिकारी ने कहा ‘भारत जाने वाली उड़ानों के लिए एप्रन एरिया में मुख्य ड्यूटी में नेपाली स्टाफ को कोई भूमिका नहीं दी जाती है।’ इस अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर स्टाफिंग और तलाशी के बारे में जानकारी दी।


    नेपाली अधिकारियों को सुरक्षा जांच से क्यों रखा जाता है दूर?

    उन्होंने कहा कि कोई भी नेपाली एजेंसी ऐसा कोई दस्तावेज नहीं दिखा सकती जिससे मूल रूप से इसकी मंजूरी मिली हो। पोस्ट ने बताया है कि नेपाली मीडिया ऑउटलेट ‘कांतिपुर’ ने संस्कृति, पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्रालय, नेपाल के नागरिक उड्डयन प्राधिकरण और गृह मंत्रालय के अधिकारियों से कई बार पूछा कि क्या वे संबंधित रिकॉर्ड ढूंढ सकते हैं। हर बार उन्होंने इस सवाल के लिए किसी दूसरी एजेंसी का जिक्र किया। कंधार विमान अपहरण मामले के बाद ये प्रक्रिया शुरू हुई थी लेकिन नेपाल ने इसको लेकर कभी लिखित सहमति नहीं दी।

    पोस्ट ने लिखा है कि नेपाल की संप्रभुता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं लेकिन किसी भी सरकार ने इस व्यवस्था की समीक्षा करने की कोशिश नहीं की। पोस्ट का कहना है कि भारत ने बार-बार और ज्यादा सुविधाओं की मांग की है जिसमें काठमांडू से जाने वाली अपनी उड़ानों में स्काई मार्शल तैनात करने की अनुमति भी शामिल है। नेपाली अधिकारियों ने हर बार इस मांग को ठुकरा दिया है या चुपचाप टाल दिया है।


    कंधार कांड के बाद नेपाल ने दी थी भारत को यह इजाजत

    पोस्ट के मुताबिक कई अधिकारियों, राजनयिकों और विदेश मंत्रियों ने ‘कांतिपुर’ को बताया कि नेपाल ने इस व्यवस्था को हटाने के लिए कभी कोई औपचारिक प्रयास या राजनयिक पत्राचार नहीं किया। पोस्ट से बात करते हुए भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत दीप कुमार उपाध्याय ने कहा कि उन्हें बताया गया था कि भारत ने नेपाल के विदेश मंत्री स्तर की यात्रा के दौरान यह प्रस्ताव रखा था लेकिन इसे ठुकरा दिया गया था। उनके अनुसार इसके बजाय नेपाल ने भारतीय अधिकारियों को अलग से सुरक्षा स्क्रीनिंग करने की इजाजत देने के लिए मौखिक सहमति दी थी। वे कहते हैं कि उस सहमति में असल में क्या शामिल था इस पर और बारीकी से विचार करने की ज़रूरत है।

  • भारत का बड़ा एनर्जी सप्लायर बनकर उभर रहा अमेरिका… LPG निर्यात करने वाला सबसे बड़ा देश बना

    भारत का बड़ा एनर्जी सप्लायर बनकर उभर रहा अमेरिका… LPG निर्यात करने वाला सबसे बड़ा देश बना


    नई दिल्ली।
    भारत और अमेरिका (India and America) के रिश्ते पिछले एक साल में और मजबूत हुए हैं. खास तौर पर ऊर्जा के क्षेत्र (Energy sectors) में दोनों देशों के बीच कारोबार बढ़ा है. अमेरिका (America) अब भारत को LPG सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा देश बन गया है. अमेरिकी विदेश विभाग की वरिष्ठ अधिकारी बेथनी मॉरिसन ने यह जानकारी दी है।

    न्यूयॉर्क फॉरेन प्रेस सेंटर में एक कार्यक्रम के दौरान मॉरिसन ने भारत-अमेरिका संबंधों पर बात की. उन्होंने कहा कि पिछले एक साल में दोनों देशों के बीच साझेदारी का दायरा काफी बढ़ा है. अब भारत और अमेरिका ऊर्जा, रक्षा, व्यापार और कूटनीति समेत कई क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं.

    मॉरिसन ने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अलग-अलग देशों और स्रोतों से सप्लाई बढ़ा रहा है. ऐसे में अमेरिका भी भारत का एक बड़ा एनर्जी सप्लायर बनकर उभरा है. उन्होंने कहा, ‘हमें गर्व है कि अमेरिका अब भारत को LPG निर्यात करने वाला सबसे बड़ा देश है. भारत जब अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला रहा है तो हमें खुशी है कि अमेरिका भी उसका सप्लायर बन रहा है।


    अमेरिका में नॉर ईस्टर तूफान का कहर, 400 से ज्यादा फ्लाइट्स कैंसिल

    मॉरिसन ने भारत और अमेरिका के बीच हुए 10 साल के डिफेंस फ्रेमवर्क एग्रीमेंट का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि रक्षा के साथ-साथ परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी दोनों देश आगे बढ़ रहे हैं. उन्होंने कहा कि भारत ने करीब 20 साल बाद अपने परमाणु क्षेत्र से जुड़े नियमों में बदलाव करते हुए SHANTI Act पारित किया है. इससे भारत और अमेरिका के बीच असैन्य परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ने की उम्मीद है।

    अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच सहयोग सिर्फ ऊर्जा और रक्षा तक सीमित नहीं है. दोनों देशों के बीच बड़े व्यापारिक समझौते भी हो रहे हैं. इसके अलावा क्वाड जैसे मंचों पर भी दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं. मॉरिसन ने कहा कि ट्रंप प्रशासन के लिए पूरा दक्षिण एशिया महत्वपूर्ण है. उनके मुताबिक, पहले दुनिया के दूसरे हिस्सों में होने वाली घटनाओं के कारण दक्षिण एशिया पर अक्सर तभी ज्यादा ध्यान दिया जाता था, जब यहां कोई संकट पैदा होता था।

    उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन दक्षिण एशिया को दुनिया का एक बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र मानता है और अब अमेरिका इस क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।

  • Russia-Ukraine के बीच भीषण हवाई हमलों में 10 लोगों की मौत… ट्रंप ने पुतिन से की समझौते की अपील

    Russia-Ukraine के बीच भीषण हवाई हमलों में 10 लोगों की मौत… ट्रंप ने पुतिन से की समझौते की अपील


    कीव।
    रूस और यूक्रेन (Russia-Ukraine War) के बीच हवाई हमले तेज हो गए हैं। शनिवार को यूक्रेन में रूसी हमलों में चार लोगों की मौत हुई, जबकि रूस के क्रास्नोडार क्षेत्र (Krasnodar Krai) में यूक्रेनी ड्रोन हमले (Ukrainian drone attacks) में तीन लोगों की जान गई। रूसी कब्जे वाले यूक्रेन के जापोरिज्जिया क्षेत्र में भी यूक्रेनी हमलों में तीन लोगों की मौत की सूचना है। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) के साथ समझौता करने की अपील की।


    यूक्रेन में रूसी हमलों से चार लोगों की मौत

    यूक्रेनी अधिकारियों के मुताबिक, रूस ने शनिवार को कीव, जापोरिज्जिया, सूमी और खारकीव समेत कई इलाकों को निशाना बनाया। जापोरिज्जिया में एक घर के मलबे में दबने से दो महिलाओं की मौत हो गई। सूमी शहर में भी रूसी हमले में दो लोगों की जान गई। कीव क्षेत्र के बोरीस्पिल जिले में रूसी ड्रोन हमले के बाद एक गोदाम में आग लग गई, जिसमें दो लोग घायल हुए। राजधानी कीव के कई इलाकों में भी ड्रोन हमलों की सूचना है। अधिकारियों के अनुसार, यहां चार लोग घायल हुए और आवासीय तथा कार्यालय इमारतों को नुकसान पहुंचा।


    रूस का दावा- डेटा सेंटर को हुआ नुकसान

    रूस के रक्षा मंत्रालय ने दावा किया कि कीव पर किए गए हमले में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं और स्टारलिंक सैटेलाइट कम्युनिकेशन से जुड़े एक डेटा सेंटर को नुकसान पहुंचा है। यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा कि रूस रोजाना हमलों को और तेज कर रहा है। उन्होंने कीव और जापोरिज्जिया के रिहायशी इलाकों समेत कई स्थानों पर हुए हमलों का उल्लेख करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से रूस के खिलाफ मजबूत प्रतिक्रिया की अपील की।


    ट्रंप ने जेलेंस्की से पुतिन के साथ समझौते की अपील की

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान जेलेंस्की के साथ हुई मुलाकात का जिक्र करते हुए कहा कि वह चाहते हैं कि यूक्रेनी राष्ट्रपति पुतिन के साथ समझौता करें। ट्रंप ने कहा, “मैं चाहता हूं कि वह समझौता करें। मैं चाहता हूं कि वह पुतिन के साथ समझौता करें और मैं चाहता हूं कि पुतिन भी उनके साथ समझौता करें।” उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों पक्ष निकट भविष्य में, संभवतः सर्दियों के भारी होने से पहले, किसी समझौते तक पहुंच सकते हैं।

  • UNGA में जयशंकर का PAK को कड़ा संदेश, बोले- दोस्ती और सद्भावना आतंकवाद के साथ नहीं चल सकते

    UNGA में जयशंकर का PAK को कड़ा संदेश, बोले- दोस्ती और सद्भावना आतंकवाद के साथ नहीं चल सकते


    नई दिल्ली। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में आतंकवाद को लेकर भारत का रुख दोहराते हुए कहा कि आतंकवाद के खिलाफ किसी तरह की ढील नहीं दी जा सकती। उन्होंने बिना पाकिस्तान का नाम लिए कहा कि एक देश लगातार आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है और हाल ही में उसने तथ्यों को भी गलत तरीके से पेश किया।

    जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद फैलाने वालों को अपना रवैया बदलना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आतंकवाद के साथ दोस्ती और सद्भावना की बात साथ-साथ नहीं चल सकती। भारत आतंकवाद के खिलाफ अपनी जीरो टॉलरेंस की नीति पर कायम है और इस मुद्दे पर लगातार अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अपना पक्ष रखता रहा है।

    शांति और सुरक्षा के लिए बना था संयुक्त राष्ट्र
    न्यूयॉर्क में UNGA को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना दुनिया में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से हुई थी। इसके बावजूद आज भी संघर्ष और टकराव दुनिया के सामने बड़ी चुनौतियों के रूप में मौजूद हैं।

    उन्होंने कहा कि शांति बनाए रखने में नाकामी का असर केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विकास और प्रगति भी प्रभावित होती है। वैश्वीकृत दुनिया में किसी एक हिस्से में होने वाले युद्ध और संघर्ष का असर दूसरे हिस्सों पर भी पड़ता है। ऐसे में तनाव कम करना और संवाद के जरिए समाधान तलाशना जरूरी है।

    समुद्री कर्मचारियों और कमर्शियल शिपिंग की सुरक्षा पर जोर
    जयशंकर ने कमर्शियल शिपिंग और समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों और समुद्री कर्मचारियों को निशाना बनाना स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    उन्होंने सभी पक्षों से संयम बरतने, तनाव कम करने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की। इससे पहले भारत और लाइबेरिया की ओर से समुद्री सुरक्षा और सीफेयरर्स की सुरक्षा को लेकर ‘ग्रुप ऑफ फ्रेंड्स’ पहल पर भी जोर दिया गया है। जयशंकर ने कहा था कि दुनिया में जारी संघर्षों का असर भोजन, ईंधन, उर्वरक और वित्त जैसी बुनियादी जरूरतों पर भी पड़ रहा है।

    यूक्रेन युद्ध पर बोले- अंतहीन युद्ध खत्म होना चाहिए
    यूक्रेन में जारी संघर्ष का जिक्र करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि यह युद्ध पांचवें साल में पहुंच गया है और यह गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों का उल्लेख करते हुए कहा कि अब अंतहीन युद्ध की समाप्ति होनी चाहिए।

    जयशंकर ने इस बात पर जोर दिया कि संघर्षों का समाधान केवल सैन्य रास्ते से नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति के जरिए तलाशा जाना चाहिए। उनका संबोधन ऐसे समय हुआ है, जब संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस भी यूक्रेन में तत्काल युद्धविराम और लंबे समय तक कायम रहने वाली शांति की जरूरत पर जोर दे चुके हैं।

    फिलिस्तीनियों के लिए भारत की मानवीय मदद जारी
    पश्चिम एशिया की स्थिति पर जयशंकर ने कहा कि भारत फिलिस्तीनी लोगों के लिए मानवीय सहायता और राहत कार्यों में मदद कर रहा है। भारत लंबे समय से फिलिस्तीन के मुद्दे पर मानवीय सहायता और दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन की बात करता रहा है। संयुक्त राष्ट्र में भी भारत ने स्वतंत्र, संप्रभु और व्यवहार्य फिलिस्तीनी राष्ट्र की स्थापना के साथ इजराइल के साथ शांति और सुरक्षा में रहने वाले दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन दोहराया है।

    जयशंकर ने कहा कि शांति का मतलब केवल युद्ध का खत्म होना नहीं है। यदि दुनिया लगातार खतरों और दबावों से घिरी रहेगी तो स्थिरता और सुरक्षा कमजोर होगी। स्थायी शांति के लिए स्थिरता, सुरक्षा और भरोसे का माहौल बनाना जरूरी है। इनमें से किसी भी आधार को कमजोर करने से शांति की स्थिति भी प्रभावित होगी।

    हथियार की तरह इस्तेमाल हो रही अर्थव्यवस्था और तकनीक
    विदेश मंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के दशकों बाद भी दुनिया में हर चीज को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। प्रतिस्पर्धा की सोच हावी हो रही है और संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है।

    उन्होंने वित्त और बाजारों तक पहुंच सीमित करने, सप्लाई चेन में रुकावट डालने और तकनीक को रोकने जैसे कदमों का जिक्र किया। उनका कहना था कि ऐसे उपायों का असर सिर्फ संबंधित देशों तक नहीं रहता, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और विकास पर भी पड़ता है।

    ग्लोबल साउथ के सामने 4F का संकट
    जयशंकर ने ग्लोबल साउथ की स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि विकासशील देशों के सामने चुनौतियां और गंभीर हैं। उन्होंने ‘4F’ संकट की बात कही। इसमें Food यानी भोजन, Fuel यानी ईंधन, Fertilizer यानी उर्वरक और Finance यानी वित्त शामिल हैं।

    उनके मुताबिक दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी संघर्षों और तनाव का सीधा असर इन चारों क्षेत्रों पर पड़ रहा है। ऐसे में वैश्विक संस्थाओं और देशों के सामने चुनौती यह है कि वे स्थिरता और भरोसे का ऐसा वातावरण तैयार करें, जिससे विकासशील देशों की बुनियादी जरूरतों और विकास पर संकट का असर कम हो।

    पश्चिम एशिया में टू-स्टेट सॉल्यूशन पर भारत का रुख
    पश्चिम एशिया में स्थायी शांति के सवाल पर जयशंकर ने कहा कि भारत का दृढ़ विश्वास है कि टू-स्टेट सॉल्यूशन यानी दो-राष्ट्र समाधान जरूरी है। इसके तहत इजराइल और फिलिस्तीन को शांति और सुरक्षा के साथ रहने का रास्ता तलाशने की बात कही जाती है।

    संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस भी 81वें महासभा सत्र के दौरान दो-राष्ट्र समाधान को पश्चिम एशिया में स्थायी शांति का महत्वपूर्ण आधार बता चुके हैं।

    जयशंकर के संबोधन में आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, फिलिस्तीन को मानवीय सहायता और ग्लोबल साउथ की आर्थिक चुनौतियों जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। भारत ने इस दौरान आतंकवाद के खिलाफ अपने रुख को दोहराने के साथ वैश्विक स्तर पर शांति, स्थिरता और संवाद की जरूरत पर जोर दिया।

  • UNSC में भारत की स्थायी सीट के समर्थन में रूस, जर्मनी-जापान की दावेदारी का विरोध

    UNSC में भारत की स्थायी सीट के समर्थन में रूस, जर्मनी-जापान की दावेदारी का विरोध


    नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग को रूस का खुला समर्थन मिला है। 81वें संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत के साथ ब्राजील की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का भी समर्थन किया। वहीं उन्होंने सुरक्षा परिषद में पश्चिमी देशों के लिए नई स्थायी सीटें बढ़ाने का विरोध किया और कहा कि सुधार का फोकस एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की भागीदारी बढ़ाने पर होना चाहिए।

    लावरोव ने जर्मनी-जापान की दावेदारी पर जताई आपत्ति

    UN महासभा में अपने संबोधन के दौरान लावरोव ने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के नाम पर पश्चिमी देशों को अतिरिक्त स्थायी सीटें नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने खास तौर पर जर्मनी और जापान की दावेदारी का विरोध किया।

    रूस का कहना है कि मौजूदा UNSC संरचना में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को उनकी मौजूदा वैश्विक भूमिका के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। इसी आधार पर मॉस्को भारत और ब्राजील को स्थायी सदस्य बनाने का समर्थन कर रहा है।

    लावरोव ने यह भी कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के दौरान अफ्रीकी महाद्वीप के हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। रूस पहले भी सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधिक बनाने की बात कहता रहा है। सितंबर 2026 में भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक के संयुक्त बयान में भी रूस ने सुधार के बाद विस्तारित UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए अपना समर्थन दोहराया था।

    भारत को कई देशों का समर्थन

    UN महासभा के मौजूदा सत्र के दौरान भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी के समर्थन में कई देशों ने अपनी बात रखी है।

    मॉरीशस के विदेश मंत्री धनंजय रामफुल ने G4 और L69 के रुख का समर्थन करते हुए भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी दोहराई। वहीं पुर्तगाल ने भी सुरक्षा परिषद में बदलाव की जरूरत बताई है। पुर्तगाल के प्रधानमंत्री लुइस मोंटेनेग्रो ने ज्यादा प्रतिनिधित्व वाली UNSC की पैरवी की, जिसमें अफ्रीका, ब्राजील और भारत को स्थायी प्रतिनिधित्व देने का समर्थन शामिल है।

    इसके अलावा 22 सितंबर को भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान यानी G4 के विदेश मंत्रियों ने भी UNSC सुधार पर बैठक की और सुरक्षा परिषद में सुधार को मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के मद्देनजर जरूरी बताया।

    जापान और अफ्रीकी देशों की भी अलग मांग

    मार्शल आइलैंड्स की राष्ट्रपति हिल्डा हाइने ने कहा कि उनका देश जापान और उसके G4 साझेदारों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता दिलाने के समर्थन पर लंबे समय से कायम है।

    वहीं जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने भी UNSC में बदलाव की मांग की। उनका कहना है कि सुरक्षा परिषद की संरचना मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करने वाली होनी चाहिए। इसके लिए उन्होंने स्थायी और गैर-स्थायी, दोनों तरह की सीटों की संख्या बढ़ाने की पैरवी की।

    अफ्रीकी देशों की ओर से भी सुरक्षा परिषद में ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग लगातार उठती रही है। सिएरा लियोन के राष्ट्रपति जूलियस माडा बायो ने कहा कि UNSC अभी भी 1945 की दुनिया की तस्वीर पेश करता है। उन्होंने अफ्रीका की 1.6 अरब से ज्यादा आबादी का हवाला देते हुए कहा कि महाद्वीप के पास परिषद में कोई स्थायी सीट नहीं है।

    G4 में भारत के साथ कौन-कौन?

    भारत UNSC में स्थायी सदस्यता के लिए ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ G4 समूह का हिस्सा है। चारों देश सुरक्षा परिषद में स्थायी और गैर-स्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार की मांग करते हैं। G4 देशों ने सितंबर 2026 में भी सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की जरूरत दोहराई है।

    भारत की ओर से भी सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना में बदलाव की मांग लगातार की जाती रही है। भारत का तर्क है कि 80 साल से ज्यादा पुरानी व्यवस्था आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं और वैश्विक शक्ति संतुलन को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती।

    कैसे काम करती है UNSC?

    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका पांच स्थायी सदस्य हैं। इन सभी के पास वीटो का अधिकार है।

    बाकी 10 सदस्य गैर-स्थायी होते हैं, जिन्हें दो साल के कार्यकाल के लिए चुना जाता है। स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए UN चार्टर में संशोधन करना होगा।

    इसके लिए महासभा में दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ सदस्य देशों की ओर से अनुसमर्थन जरूरी है। इसमें मौजूदा पांचों स्थायी सदस्यों की मंजूरी भी शामिल है।

    यही वजह है कि UNSC में स्थायी सदस्यता का विस्तार केवल किसी एक देश के समर्थन से संभव नहीं है। इसके लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति और UN चार्टर में औपचारिक बदलाव की जरूरत होगी।

  • कश्मीर और पानी पर भारत को घेरने पहुंचे शहबाज से आतंकवाद पर हुआ सीधा सवाल UN के बाहर चुपचाप आगे बढ़ गए पाक PM

    कश्मीर और पानी पर भारत को घेरने पहुंचे शहबाज से आतंकवाद पर हुआ सीधा सवाल UN के बाहर चुपचाप आगे बढ़ गए पाक PM


    नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भारत के खिलाफ कई आरोप लगाए और कश्मीर तथा सिंधु जल संधि का मुद्दा उठाया लेकिन संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर जब उनसे पाकिस्तान के आतंकवाद से जुड़े सवाल पूछे गए तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। 24 सितंबर को UN मुख्यालय में प्रवेश करते समय पत्रकार ने उनसे पूछा कि पाकिस्तान आतंकवादियों को पनाह देना कब बंद करेगा। शहबाज शरीफ सवाल को अनसुना करते हुए आगे बढ़ गए। बाद में मुख्यालय से निकलते समय उनसे लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद पर कार्रवाई को लेकर सवाल किया गया। इस बार भी उन्होंने प्रतिक्रिया नहीं दी और आगे निकल गए। इस घटनाक्रम की पुष्टि कई मीडिया रिपोर्टों में हुई है।

    इसके एक दिन बाद 25 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन के दौरान शहबाज शरीफ ने भारत पर सिंधु नदी के पानी को हथियार बनाने का आरोप लगाया और कश्मीर का मुद्दा उठाया। उन्होंने सिंधु नदी प्रणाली को पाकिस्तान और पूरे क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए भारत की नीतियों पर सवाल उठाए। साथ ही अपने भाषण में भारत के साथ संघर्ष का संदर्भ भी दिया। उनके संबोधन के बाद भारत ने जवाब देने के अधिकार का इस्तेमाल किया।

    संयुक्त राष्ट्र में भारत की फर्स्ट सेक्रेटरी पेटल गहलोत ने पाकिस्तान के दावों का जवाब देते हुए उसके आतंकवाद और राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े मुद्दे उठाए। उन्होंने पाकिस्तान के राजनीतिक ढांचे को लेकर फॉर्म-47 का संदर्भ दिया और कहा कि पाकिस्तान में सत्ता व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। गहलोत ने ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में पाए जाने का भी उल्लेख किया और आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान के रिकॉर्ड पर सवाल उठाया।

    भारत की ओर से जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी प्रतिक्रिया दी गई। गहलोत ने कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में लोगों के अधिकारों तथा वहां की स्थिति पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति और धार्मिक कट्टरता से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया।

    भारत और पाकिस्तान के बीच संयुक्त राष्ट्र में यह बयानबाजी ऐसे समय हुई जब दोनों देशों के प्रतिनिधि अपने अपने पक्ष को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखने की कोशिश कर रहे थे। शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में भारत की नीतियों पर सवाल उठाए तो भारत ने जवाब के अधिकार के तहत पाकिस्तान के आतंकवाद संबंधी रिकॉर्ड और उसकी आंतरिक राजनीतिक व्यवस्था को मुद्दा बनाया।

    इस पूरे घटनाक्रम में UN मुख्यालय के बाहर पूछे गए सवाल भी चर्चा में रहे। पत्रकारों ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से सीधे आतंकवादियों को कथित तौर पर पनाह देने और हाफिज सईद के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सवाल किया लेकिन शहबाज शरीफ ने दोनों मौकों पर कोई सार्वजनिक जवाब नहीं दिया।