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  • भारत-पाक तनाव के बीच तुर्की का संदेश, कहा- कई देशों के पाकिस्तान से मजबूत रिश्ते

    भारत-पाक तनाव के बीच तुर्की का संदेश, कहा- कई देशों के पाकिस्तान से मजबूत रिश्ते


    नई दिल्ली । भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव के बाद तुर्की एक बार फिर अपने बयानों को लेकर चर्चा में है। पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध रखने वाले तुर्की ने साफ कहा है कि वह अकेला ऐसा देश नहीं है जिसके इस्लामाबाद के साथ अच्छे रिश्ते हैं। तुर्की का मानना है कि भारत को इस मुद्दे को अलग नजरिए से देखने की जरूरत है और दोनों देशों को आपसी सहयोग बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।

    तुर्की के विदेश मंत्री Hakan Fidan ने एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में भारत और पाकिस्तान को लेकर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि भारत और तुर्की के बीच कोई सीमा विवाद या ऐतिहासिक दुश्मनी नहीं है, इसलिए दोनों देशों के संबंध बेहतर होने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं।

    फिदान ने कहा कि तुर्की के पाकिस्तान के साथ ऐतिहासिक और मित्रतापूर्ण संबंध हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह भारत के खिलाफ है। उनके अनुसार दुनिया के कई अन्य देशों के भी पाकिस्तान से अच्छे रिश्ते हैं और किसी एक संबंध को लेकर पूरे द्विपक्षीय रिश्ते प्रभावित नहीं होने चाहिए।

    तुर्की के विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि कई देशों के बीच मतभेद होने के बावजूद वे सहयोग के रास्ते तलाशते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि तुर्की के रूस, अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के साथ विभिन्न मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन इसके बावजूद संवाद और सहयोग जारी रहता है। उनका मानना है कि भारत और तुर्की को भी इसी तरह सकारात्मक एजेंडे पर आगे बढ़ना चाहिए।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत में तुर्की की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। विशेष रूप से पाकिस्तान के साथ उसके रक्षा और रणनीतिक सहयोग को लेकर भारत में चिंता जताई जाती रही है। मीडिया रिपोर्टों में पहले यह दावा भी किया गया था कि भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान को तकनीकी और सैन्य सहायता उपलब्ध कराई थी। हालांकि इन दावों पर विभिन्न पक्षों की अलग-अलग राय रही है।

    भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू हुए सैन्य अभियान और उसके बाद दोनों देशों के बीच बढ़ी तनातनी को भी देखा जा रहा है। इसी संदर्भ में तुर्की के बयान को क्षेत्रीय कूटनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और तुर्की के बीच व्यापार, निवेश, पर्यटन और वैश्विक मंचों पर सहयोग की संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन पाकिस्तान को लेकर दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर समय-समय पर रिश्तों में तनाव का कारण बनता रहा है।

  • भारत सहित 54 देशों पर नया टैरिफ लगाने की तैयारी में अमेरिका…. USTR ने रखा प्रस्ताव

    भारत सहित 54 देशों पर नया टैरिफ लगाने की तैयारी में अमेरिका…. USTR ने रखा प्रस्ताव


    नई दिल्ली।
    भारत और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल (India and US Delegation) द्विपक्षीय व्यापार वार्ता (Bilateral Trade talks) को अंतिम रूप देने की कोशिशों में जुटा है। इसी बीच अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (US Trade Representative- USTR) ने बंधुआ मजदूरी से निर्मित वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लागू न करने के आरोप में भारत सहित 54 देशों पर 12.5% अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव उन जांच के बाद सामने आया है, जो अमेरिका ने 60 देशों के खिलाफ इस आधार पर शुरू की थीं कि वे बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने और उसे प्रभावी ढंग से लागू करने में असफल रहे हैं। इस प्रस्ताव की टाइमिंग काफी अहम है क्योंकि इस वक्त नई दिल्ली में दोनों देशों के बीच व्यापार सौदे को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस लिहाज से इसे एक झटका माना जा रहा है।

    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTS) जैमीसन ग्रीर ने एक बयान में कहा, ”हमारे सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों द्वारा बंधुआ मजदूरी से निर्मित वस्तुओं के आयात पर रोक लगाने में विफल रहना अस्वीकार्य है। इससे ऐसी स्थिति पैदा होती है, जिसमें अमेरिकी श्रमिकों को वैश्विक स्तर पर असमान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।” उन्होंने कहा, ”हम अब इस असमानता को बर्दाश्त नहीं करेंगे और इसका उल्लंघन करने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाएंगे” यह प्रस्ताव 1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत की गई 60 जांचों में से एक के बाद आया है।


    क्या है USTR की धारा 301?

    USTR (यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव) की धारा 301 अमेरिकी व्यापार अधिनियम 1974 का एक प्रमुख प्रावधान है। यह अमेरिका को व्यापारिक साझेदार देशों की अनुचित व्यापार नीतियों या वबां प्रचलित परंपराओं की जांच करने और अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए आयात शुल्क या व्यापार प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या वे उपाय अनुचित या भेदभावपूर्ण हैं, या क्या वे US के व्यापार और वाणिज्यिक हितों पर कोई बेवजह बोझ तो नहीं डालते हैं।


    सुधारात्मक कार्रवाई करने की अनुमति

    अगर जाँच में यह पाया जाता है कि किसी देश ने द्विपक्षीय व्यापार के लिए ऐसे तौर-तरीके अपनाए हैं, जिन्हें अमेरिकी व्यापार के लिए हानिकारक मानता है, तो धारा-301 के प्रावधान US प्रशासन को उस मामले में सुधारात्मक कार्रवाई करने की अनुमति देता है। इन उपायों में ऊँचे टैरिफ लगाना, व्यापार पर प्रतिबंध लगाना या अन्य ऐसे उपाय शामिल हो सकते हैं जिनका उद्देश्य जाँच के दौरान सामने आई चिंताओं को दूर करना होता है।

    बंधुआ मजदूरी वाले आरोप पर भारत का क्या जवाब?
    भारत ने बंधुआ मजदूरी संबंधी आरोपों को खारिज करते हुए अमेरिका से इन जांचों को समाप्त करने की मांग की है। भारत का कहना है कि ऐसे मुद्दों का समाधान दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं के ढांचे के भीतर किया जाना चाहिए। वाणिज्य मंत्रालय ने कहा, ”भारत धारा-301 कार्यवाही के मामले में अमेरिका के साथ संपर्क में है। साथ ही भारत दो फरवरी 2026 को घोषित समझौते के ढांचे और सात फरवरी 2026 को जारी संयुक्त बयान के अनुरूप अमेरिका के साथ समझौते को अंतिम रूप देने के लिए भी बातचीत कर रहा है।”


    सार्वजनिक सुनवाई सात जुलाई 2026 को

    इसमें कहा गया कि धारा-232 (क्षेत्रीय) शुल्क के तहत आने वाले उत्पादों और कुछ अन्य वस्तुओं को इन प्रस्तावित शुल्कों से बाहर रखा गया है। कपड़ा एवं परिधान उत्पादों के लिए एक विशेष प्रणाली प्रस्तावित की गई है, जिसके तहत चयनित देशों से एक निश्चित मात्रा में आयात को अमेरिका में कम शुल्क दरों पर प्रवेश की अनुमति मिल सकती है। वाणिज्य मंत्रालय ने कहा, ”रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित शुल्क अभी अंतिम नहीं हैं और हितधारक 22 जून 2026 तक सार्वजनिक सुनवाई में भाग लेने के लिए आवेदन कर सकते हैं। लिखित टिप्पणियां छह जुलाई 2026 तक प्रस्तुत की जा सकती हैं।” सार्वजनिक सुनवाई सात जुलाई 2026 को होगी।

    उधऱ, ग्रीर ने कहा कि कुछ व्यापारिक साझेदारों ने बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात को रोकने के लिए शुरुआती कदम उठाए हैं। इनमें अमेरिका, मेक्सिको-कनाडा के बीच समझौते (यूएसएमसीए) और पारस्परिक व्यापार समझौतों के तहत जतायी गयी प्रतिबद्धताएं शामिल हैं।हालांकि, उन्होंने कहा कि ”प्रत्येक व्यापारिक साझेदार को यह सुनिश्चित करने के लिए और अधिक प्रयास करने होंगे कि वैश्विक व्यापार बंधुआ मजदूरी को बढ़ावा न दे और उसे स्थायी न बनाए।” अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने एक बयान में कहा कि भारत, चीन, जापान, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और सऊदी अरब सहित 54 देशों ने बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाने और उसे प्रभावी ढंग से लागू करने में विफलता दिखाई है।

  • US: ट्रंप को बड़ा झटका…. संसद में ईरान युद्ध रोकने का प्रस्ताव मंजूर

    US: ट्रंप को बड़ा झटका…. संसद में ईरान युद्ध रोकने का प्रस्ताव मंजूर


    नई दिल्ली।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) को अपनी ही संसद (Parliament) में बड़े झटके का सामना करना पड़ा है. अमेरिकी संसद (American Parliament) के निचले सदन ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स’ ने ईरान के खिलाफ युद्ध रोकने के एक प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी है।

    डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व में लाए गए इस प्रस्ताव का मकसद बिना संसद (कांग्रेस) की अनुमति के ईरान के खिलाफ किसी भी तरह के युद्ध पर रोक लगाना था. इस दौरान वोटिंग से साफ हो गया है कि ईरान के साथ युद्ध की आशंका को लेकर अमेरिकी सांसदों में चिंता काफी बढ़ गई है. खास बात ये है कि राष्ट्रपति ट्रंप की अपनी पार्टी यानी रिपब्लिकन पार्टी के सांसदों ने भी ईरान जंग पर पाला बदल लिया।


    7 वोटों से पास हुआ प्रस्ताव

    सदन में ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन’ पर कड़ा मुकाबला देखने को मिला. प्रस्ताव के पक्ष में 215 वोट पड़े, जबकि इसके विरोध में 208 सांसदों ने मतदान किया. हालांकि दोनों सदनों में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के पास मामूली बहुमत है, लेकिन इसके बावजूद ट्रंप इस प्रस्ताव को रोकने में नाकाम रहे. इस वोटिंग के दौरान रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों ने अपनी ही पार्टी के रुख के खिलाफ जाकर डेमोक्रेट्स के पक्ष में वोट डाला. कांग्रेस में ट्रंप के लिए ये किसी बड़े झटके से कम नहीं है।


    अब ट्रंप के पास क्या विकल्प?

    संसद के जानकारों का कहना है कि ये वोटिंग फिलहाल काफी हद तक प्रतीकात्मक है. इस प्रस्ताव को कानूनी रूप से प्रभावी बनाने के लिए अभी इसे अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन ‘सीनेट’ से भी पास कराना होगा. इसके बाद, अगर ट्रंप इस प्रस्ताव पर वीटो लगा देते हैं, तो उस वीटो को बेअसर करने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी, जो कि बहुत मुश्किल है।

    हालांकि, ये फैसला काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि संसद में युद्ध के अधिकारों को सीमित करने वाले तीन प्रस्ताव पेश किए गए थे. लेकिन वो बेहद कम अंतर से नाकाम हो गए थे. इसके अलावा, पिछले महीने अमेरिकी सीनेट ने भी एक प्रक्रियात्मक वोटिंग के दौरान इसी तरह के एक प्रस्ताव को आगे बढ़ाया था. सीनेट में भी ये सात बार की नाकाम कोशिशों के बाद कामयाब हुई थी।

  • वैश्विक मंच पर भारतीय सहकारिता की बढ़ी पहचान, दिलीप संघाणी की अगुवाई में भारत-अमेरिका कृषि साझेदारी को नई दिशा

    वैश्विक मंच पर भारतीय सहकारिता की बढ़ी पहचान, दिलीप संघाणी की अगुवाई में भारत-अमेरिका कृषि साझेदारी को नई दिशा

    नई दिल्ली । भारत और अमेरिका के बीच कृषि क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। सहकारिता और कृषि विकास से जुड़े प्रमुख प्रतिनिधियों के बीच आयोजित उच्चस्तरीय संवाद में दोनों देशों के कृषि संबंधों को नई दिशा देने, आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने और किसानों की समृद्धि सुनिश्चित करने पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया। इस संवाद का नेतृत्व इफको के अध्यक्ष दिलीप संघाणी ने किया, जिसमें कृषि क्षेत्र से जुड़े विभिन्न मुद्दों और भविष्य की संभावनाओं पर गंभीर चर्चा हुई।

    बैठक के दौरान कृषि उत्पादकता बढ़ाने, उन्नत तकनीकों के उपयोग, टिकाऊ कृषि प्रणाली विकसित करने और किसानों को बेहतर संसाधन उपलब्ध कराने जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में कृषि क्षेत्र को अधिक आधुनिक, तकनीक-सक्षम और पर्यावरण अनुकूल बनाना समय की आवश्यकता है। दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने कृषि क्षेत्र में ज्ञान, अनुभव और नवाचारों के आदान-प्रदान को बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की।

    चर्चा में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को लेकर भी महत्वपूर्ण विचार सामने आए। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती जनसंख्या और बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच खाद्य उत्पादन को स्थिर और सुरक्षित बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में भारत और अमेरिका जैसे कृषि क्षेत्र के महत्वपूर्ण देशों के बीच सहयोग वैश्विक खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकता है। बैठक में कृषि अनुसंधान, स्मार्ट फार्मिंग, उन्नत बीज तकनीक और भूमि स्वास्थ्य सुधार जैसे विषयों को भी विस्तार से उठाया गया।

    दिलीप संघाणी ने किसानों की आय बढ़ाने, उत्पादन लागत कम करने और आधुनिक कृषि तकनीकों को गांवों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र में नवाचार और सहकारिता आधारित मॉडल किसानों के लिए नई संभावनाएं पैदा कर सकते हैं। साथ ही उन्होंने कृषि क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को किसानों के हित में उपयोगी बताते हुए साझेदारी के विस्तार पर बल दिया।

    बैठक में शामिल विशेषज्ञों और उद्योग प्रतिनिधियों ने माना कि भारत और अमेरिका के बीच कृषि क्षेत्र में बढ़ता सहयोग नई तकनीकों के विकास, अनुसंधान सहयोग और कृषि अवसंरचना को मजबूत करने में मदद करेगा। इससे किसानों को बेहतर प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और वैश्विक स्तर के समाधान उपलब्ध कराने का रास्ता भी खुलेगा। कृषि क्षेत्र में डिजिटल तकनीकों और डेटा आधारित समाधान को बढ़ावा देने पर भी सकारात्मक चर्चा हुई।

    विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान समय में कृषि केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह तकनीक, नवाचार, जल प्रबंधन और टिकाऊ विकास जैसे अनेक आयामों से जुड़ चुकी है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग और साझेदारी कृषि क्षेत्र के दीर्घकालिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत और अमेरिका के बीच इस तरह के संवाद भविष्य में कई संयुक्त परियोजनाओं और शोध पहलों का आधार बन सकते हैं।

    कृषि क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की यह पहल भारतीय सहकारिता आंदोलन की बढ़ती वैश्विक पहचान का भी संकेत मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार की साझेदारियां निरंतर आगे बढ़ती हैं तो इससे किसानों की आय, कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी। साथ ही कृषि क्षेत्र में नवाचार आधारित विकास को भी गति प्राप्त होगी, जिसका लाभ सीधे किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा।

  • मिसाइल, ड्रोन और जवाबी सैन्य कार्रवाई से दहला मध्य पूर्व, अमेरिका-ईरान तनाव नए खतरनाक मोड़ पर

    मिसाइल, ड्रोन और जवाबी सैन्य कार्रवाई से दहला मध्य पूर्व, अमेरिका-ईरान तनाव नए खतरनाक मोड़ पर

    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव ने एक बार फिर वैश्विक समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। खाड़ी क्षेत्र में हालिया सैन्य घटनाक्रमों ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव को और अधिक गंभीर बना दिया है। दोनों देशों के बीच बढ़ते आरोप-प्रत्यारोप और सैन्य गतिविधियों ने क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों को भी चिंता में डाल दिया है। हालात ऐसे संकेत दे रहे हैं कि यदि तनाव को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी महसूस किया जा सकता है।

    ताजा घटनाक्रम में ईरान की सैन्य इकाइयों ने दावा किया है कि उन्होंने खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए। ईरानी पक्ष का कहना है कि इन अभियानों का उद्देश्य उन ठिकानों को लक्ष्य बनाना था जो क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों के प्रमुख केंद्र माने जाते हैं। हालांकि अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि सभी संभावित खतरों को समय रहते निष्क्रिय कर दिया गया और किसी भी सैन्य अड्डे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।

    अमेरिकी सैन्य कमान के अनुसार क्षेत्र की वायु रक्षा प्रणालियों ने कई मिसाइलों और ड्रोन को रास्ते में ही रोक लिया। अधिकारियों का दावा है कि किसी भी अमेरिकी सैनिक या सैन्य सुविधा को क्षति नहीं हुई और सभी सुरक्षा व्यवस्थाएं पूरी तरह प्रभावी रहीं। वहीं दूसरी ओर ईरान अपने अभियानों को सफल बताते हुए इसे अपनी रणनीतिक क्षमता का प्रदर्शन मान रहा है। दोनों देशों के अलग-अलग दावों के बीच वास्तविक स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार निगरानी की जा रही है।

    घटनाओं ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई के तहत ईरान के रणनीतिक महत्व वाले क्षेत्रों को निशाना बनाया। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार यह कदम आत्मरक्षा और संभावित खतरों को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया। जवाबी अभियान के दौरान संचार और निगरानी से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण ढांचों पर कार्रवाई की गई। इस घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच प्रत्यक्ष सैन्य टकराव की आशंकाओं को और मजबूत कर दिया है।

    इसी बीच समुद्री मार्गों में भी तनाव बढ़ता दिखाई दिया। खाड़ी क्षेत्र और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास सैन्य गतिविधियों में तेजी दर्ज की गई है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन रास्तों में शामिल है और यहां किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार पहले से ही हालात पर नजर बनाए हुए हैं और निवेशकों के बीच संभावित जोखिमों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

    क्षेत्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ सप्ताहों में हुई घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन को लेकर संघर्ष लगातार गहरा रहा है। कई देशों ने संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान खोजने की अपील की है। उनका मानना है कि सैन्य टकराव की स्थिति बनने पर इसके दूरगामी परिणाम पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं।

    उधर लेबनान और आसपास के क्षेत्रों में भी सैन्य गतिविधियां तेज होने की खबरें सामने आ रही हैं। विभिन्न मोर्चों पर जारी तनाव ने क्षेत्रीय अस्थिरता को और बढ़ा दिया है। ऐसे माहौल में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता इस बात को लेकर है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तो इसका असर वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।

    फिलहाल अमेरिका और ईरान दोनों अपने-अपने रुख पर कायम दिखाई दे रहे हैं। एक ओर ईरान अपने अभियानों को प्रभावी बता रहा है तो दूसरी ओर अमेरिका अपनी रक्षा क्षमता और जवाबी कार्रवाई को सफल बता रहा है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं पर काफी कुछ निर्भर करेगा, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में बढ़ता तनाव पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुका है।

  • अमेरिका की शुल्क नीति पर उठे सवाल, विशेषज्ञों ने भारत-चीन-रूस समीकरण को बताया उभरती चुनौती

    अमेरिका की शुल्क नीति पर उठे सवाल, विशेषज्ञों ने भारत-चीन-रूस समीकरण को बताया उभरती चुनौती

    नई दिल्ली। वैश्विक राजनीति और व्यापारिक संबंधों में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका की टैरिफ नीति एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हाल के वर्षों में अमेरिकी प्रशासन द्वारा अपनाई गई संरक्षणवादी आर्थिक नीतियों को लेकर दुनिया भर में बहस जारी है। इसी क्रम में यह तर्क सामने आ रहा है कि अमेरिका द्वारा भारत और चीन जैसे बड़े एशियाई देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की रणनीति अनजाने में उन देशों को एक-दूसरे के करीब ला सकती है, जिन्हें अब तक कई मुद्दों पर प्रतिस्पर्धी या विरोधी माना जाता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक शक्ति संतुलन के इस दौर में आर्थिक दबाव की नीतियां कभी-कभी ऐसे परिणाम भी पैदा कर देती हैं, जिनकी पहले कल्पना नहीं की गई होती।

    अमेरिका की ओर से विभिन्न देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणाओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में नई चिंताएं पैदा की हैं। भारत और चीन दोनों दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में यदि दोनों देशों को समान प्रकार के आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है, तो उनके बीच व्यापारिक सहयोग और संवाद बढ़ने की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सहित कई जटिल मुद्दे मौजूद हैं, फिर भी आर्थिक हितों के आधार पर सहयोग की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।

    पिछले कुछ समय में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत, चीन और रूस की सक्रिय भागीदारी ने भी वैश्विक रणनीतिक समीकरणों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दिया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ती दुनिया में क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां अपने-अपने हितों के आधार पर नए साझेदारी मॉडल तलाश रही हैं। इसी संदर्भ में रूस-भारत-चीन (RIC) समूह को लेकर भी चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह मंच किसी बड़े रणनीतिक गठबंधन का रूप ले लेगा, लेकिन तीनों देशों के बीच संवाद और सहयोग के कुछ क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ी हैं।

    दूसरी ओर, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सक्रिय क्वाड (QUAD) समूह को लेकर भी विभिन्न प्रकार के आकलन सामने आते रहते हैं। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के इस समूह का उद्देश्य क्षेत्रीय सहयोग, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना बताया जाता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देता है और वह किसी भी मंच को किसी एक देश के खिलाफ गठबंधन के रूप में नहीं देखना चाहता। यही कारण है कि भारत एक तरफ क्वाड में सक्रिय रहता है, वहीं दूसरी ओर ब्रिक्स, एससीओ और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भी अपनी भूमिका निभाता है।

    सितंबर में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर भी वैश्विक स्तर पर नजरें टिकी हुई हैं। ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वित्तीय सहयोग और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों जैसे विषयों पर चर्चा लंबे समय से होती रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सदस्य देश आपसी आर्थिक सहयोग को और मजबूत करते हैं तो इससे डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में कुछ कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि डॉलर अभी भी वैश्विक वित्तीय प्रणाली की प्रमुख मुद्रा बना हुआ है और निकट भविष्य में उसकी स्थिति में किसी बड़े बदलाव की संभावना सीमित मानी जाती है।

    अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि वर्तमान दौर में किसी भी वैश्विक शक्ति के लिए केवल आर्थिक दबाव के जरिए अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को लागू करना आसान नहीं रह गया है। दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहां देश अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग मंचों पर सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों करते हैं। भारत भी इसी संतुलित दृष्टिकोण का पालन करता रहा है, जिसमें अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और अन्य देशों के साथ संबंधों को समान महत्व दिया जाता है।

    फिलहाल यह स्पष्ट है कि वैश्विक व्यापार युद्ध, टैरिफ नीतियां और बदलते भू-राजनीतिक समीकरण आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रभावित करते रहेंगे। भारत, चीन और रूस के बीच बढ़ता संवाद, ब्रिक्स की सक्रियता और क्वाड की भूमिका जैसे विषय भविष्य की वैश्विक राजनीति में महत्वपूर्ण बने रहेंगे। हालांकि इन सभी संभावनाओं का वास्तविक प्रभाव आने वाले समय में देशों के ठोस कदमों और नीतिगत निर्णयों पर निर्भर करेगा।

  • अमेरिकी बाजार में चीनी ऑटो टेक्नोलॉजी को लेकर विवाद गहराया, डेटा सुरक्षा और जासूसी के खतरे पर अलर्ट

    अमेरिकी बाजार में चीनी ऑटो टेक्नोलॉजी को लेकर विवाद गहराया, डेटा सुरक्षा और जासूसी के खतरे पर अलर्ट

    नई दिल्ली । अमेरिका में कनेक्टेड वाहनों और उनसे जुड़े डेटा सुरक्षा जोखिमों को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस शुरू हो गई है। मिशिगन की डेमोक्रेट सांसद डेबी डिंगेल ने अमेरिकी वाणिज्य विभाग के उस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है, जिसमें चीन से गहरे जुड़े संबंध रखने वाली एक विदेशी वाहन निर्माता कंपनी को अमेरिकी बाजार में कनेक्टेड वाहन बेचने और निर्माण की अनुमति दी गई है। इस फैसले को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा, डेटा सुरक्षा और विदेशी प्रभाव से जुड़े जोखिमों पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

    सांसद डिंगेल ने वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक को लिखे पत्र में कहा है कि आधुनिक कनेक्टेड वाहन केवल परिवहन का साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि ये बड़े पैमाने पर संवेदनशील डेटा एकत्र और प्रसारित करने में सक्षम तकनीकी प्लेटफॉर्म बन चुके हैं। इनमें जियोलोकेशन, ड्राइविंग पैटर्न, इंफ्रास्ट्रक्चर मैपिंग और उपभोक्ता की व्यक्तिगत जानकारी शामिल हो सकती है, जो गलत हाथों में जाने पर गंभीर सुरक्षा खतरा पैदा कर सकती है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ऐसी तकनीक का दुरुपयोग जासूसी और महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जा सकता है।

    यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका अपने ऑटोमोबाइल सेक्टर में विदेशी तकनीक के प्रभाव को सीमित करने के लिए सख्त नीतियां लागू कर रहा है। कनेक्टेड व्हीकल नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी विरोधियों से जुड़ी कंपनियां अमेरिकी बाजार में संवेदनशील तकनीक तक अनियंत्रित पहुंच न बना सकें। हालांकि, हालिया मंजूरी ने इस नीति की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    सांसद का कहना है कि चीन के ऑटोमोटिव उद्योग को सरकारी समर्थन, उत्पादन क्षमता और व्यापार नीतियों का लाभ मिलता है, जिससे अमेरिकी कंपनियों के सामने प्रतिस्पर्धा की चुनौती और बढ़ जाती है। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि यदि ऐसे मामलों में ढील दी जाती रही तो यह घरेलू विनिर्माण और तकनीकी सुरक्षा दोनों के लिए दीर्घकालिक खतरा बन सकता है।

    इस पूरे मामले में अब अमेरिकी वाणिज्य विभाग से यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि किन आधारों पर यह अनुमति दी गई और क्या इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की राय शामिल थी या नहीं। साथ ही यह भी पूछा गया है कि भविष्य में ऐसे मामलों में किस तरह की सख्त निगरानी और नियंत्रण व्यवस्था लागू की जाएगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि कनेक्टेड वाहनों का बढ़ता उपयोग वैश्विक ऑटो उद्योग को तेजी से बदल रहा है, लेकिन इसके साथ साइबर सुरक्षा, डेटा गोपनीयता और भू-राजनीतिक जोखिम भी बढ़ रहे हैं। यही कारण है कि यह मुद्दा अमेरिका और यूरोप जैसे बाजारों में नीति निर्धारण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

  • अमेरिका की चेतावनी: चीन पर निर्भर क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन बन सकती है राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती

    अमेरिका की चेतावनी: चीन पर निर्भर क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन बन सकती है राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर रणनीतिक महत्व रखने वाले क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर अमेरिका ने गंभीर चिंता जताई है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा है कि दुनिया भर में जरूरी खनिजों के उत्पादन और प्रोसेसिंग पर एक ही देश की अत्यधिक निर्भरता आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। उनके अनुसार लिथियम, कोबाल्ट, रेयर अर्थ एलिमेंट्स और ग्रेफाइट जैसे खनिज आधुनिक तकनीक, रक्षा प्रणालियों, इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर्स और रिन्यूएबल एनर्जी के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, और इन पर सीमित देशों का नियंत्रण वैश्विक असंतुलन पैदा कर सकता है।

    अमेरिकी विदेश मंत्री ने संसद में दिए बयान में कहा कि यदि किसी जरूरी संसाधन की सप्लाई का लगभग पूरा हिस्सा एक ही देश पर केंद्रित हो जाए, तो यह स्थिति केवल आर्थिक जोखिम नहीं बल्कि रणनीतिक कमजोरी भी बन जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी निर्भरता संकट के समय राजनीतिक और आर्थिक दबाव बनाने का माध्यम बन सकती है, जिससे वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ने की आशंका रहती है।

    उन्होंने बताया कि अमेरिका इस स्थिति से निपटने के लिए दुनिया के कई देशों के साथ साझेदारी बढ़ा रहा है ताकि सप्लाई चेन को अधिक विविध और संतुलित बनाया जा सके। इसके तहत केवल कच्चे माल की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि उनकी प्रोसेसिंग क्षमता को भी विभिन्न देशों में विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। उनका कहना था कि अब यह रणनीति अमेरिकी विदेश नीति का एक अहम हिस्सा बन चुकी है और लगभग सभी राजनयिक मिशनों में इस विषय पर काम किया जा रहा है।

    इस मुद्दे को लेकर अमेरिका की नीति चीन के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के संदर्भ में और अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अमेरिकी पक्ष का मानना है कि क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में रक्षा और तकनीकी क्षेत्र में गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकती है। इसी कारण अमेरिका कई देशों को साथ लेकर एक व्यापक सप्लाई नेटवर्क बनाने की दिशा में काम कर रहा है, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता को कम किया जा सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में रेयर अर्थ और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की भूमिका लगातार बढ़ रही है, जिससे इनके उत्पादन और आपूर्ति पर नियंत्रण रखने वाले देशों की रणनीतिक शक्ति भी बढ़ती जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा और अधिक तेज होती दिख रही है, जो आने वाले वर्षों में वैश्विक व्यापार और तकनीकी संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

    अमेरिकी विदेश मंत्री ने यह भी संकेत दिया कि केवल खनिज ही नहीं, बल्कि दवा निर्माण जैसे अन्य क्षेत्रों में भी उत्पादन का अत्यधिक केंद्रीकरण चिंता का विषय है। उनके अनुसार भविष्य की वैश्विक नीतियों में सप्लाई चेन की सुरक्षा और विविधीकरण को प्राथमिकता देना अनिवार्य हो गया है, ताकि किसी भी संकट की स्थिति में दुनिया को बड़े व्यवधान से बचाया जा सके।

  • अमेरिका की नई व्यापार नीति से बढ़ी चिंता: 60 देशों पर अतिरिक्त टैरिफ का प्रस्ताव, भारत भी शामिल

    अमेरिका की नई व्यापार नीति से बढ़ी चिंता: 60 देशों पर अतिरिक्त टैरिफ का प्रस्ताव, भारत भी शामिल

    नई दिल्ली। वैश्विक व्यापार पर एक बड़ा प्रभाव डालने वाला प्रस्ताव सामने आया है, जिसमें अमेरिका ने भारत सहित लगभग 60 देशों और अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त 12.5 प्रतिशत टैरिफ लगाने की योजना पेश की है। यह प्रस्ताव अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) द्वारा 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत रखा गया है, जिसका आधार इन देशों में जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) से जुड़े उत्पादों के आयात को रोकने में कथित विफलता बताया गया है।

    अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, कई देशों ने ऐसे उत्पादों की पहचान और उनके आयात पर रोक लगाने के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं, जो जबरन श्रम से तैयार किए गए हो सकते हैं। यूएसटीआर का कहना है कि यह स्थिति वैश्विक व्यापार में असंतुलन पैदा करती है और अमेरिकी श्रमिकों को अनुचित प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।

    यूएसटीआर के प्रस्ताव के अनुसार, जिन देशों ने पहले से जबरन श्रम से जुड़े उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने या आंशिक नियंत्रण लागू करने के प्रयास किए हैं, उन पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। वहीं, जिन देशों ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है, उन पर 12.5 प्रतिशत तक का अतिरिक्त टैरिफ लागू करने का प्रस्ताव है। इस सूची में भारत भी शामिल बताया गया है।

    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर ने इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि किसी भी तरह का जबरन श्रम वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रमुख व्यापारिक साझेदारों द्वारा इस दिशा में पर्याप्त कार्रवाई न करना चिंता का विषय है और इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था प्रभावित होती है।

    प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि कुछ देशों ने पहले से ही अमेरिकी व्यापार समझौतों जैसे यूएसएमसीए के तहत इस दिशा में कुछ प्रतिबद्धताएं जताई हैं, लेकिन यह पर्याप्त नहीं हैं। अमेरिका का मानना है कि सभी व्यापारिक साझेदारों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि वैश्विक व्यापार किसी भी रूप में जबरन श्रम को बढ़ावा न दे।

    इसके अलावा, यूएसटीआर ने एक विशेष टेक्सटाइल मैकेनिज्म का भी प्रस्ताव दिया है, जिसके तहत कुछ देशों से आने वाले कपड़ा और परिधान उत्पादों की सीमित मात्रा को कम टैरिफ दर पर अमेरिका में प्रवेश की अनुमति दी जा सकती है। यह व्यवस्था विशेष रूप से उन देशों के लिए होगी जो आंशिक रूप से अनुपालन कर रहे हैं।

    प्रस्तावित नियमों पर आगे की प्रक्रिया के तहत 7 जुलाई 2026 को सार्वजनिक सुनवाई की जाएगी, जिसमें विभिन्न देशों और हितधारकों से सुझाव लिए जाएंगे। इसके बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा कि इन टैरिफ को किस तरह लागू किया जाएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो इससे वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है और कई विकासशील देशों के निर्यात पर दबाव बढ़ सकता है। खासकर उन देशों के लिए चुनौती बढ़ सकती है जो अमेरिका को बड़े पैमाने पर वस्त्र, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य उत्पाद निर्यात करते हैं।

    इस प्रस्ताव ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में नई बहस छेड़ दी है, जहां एक ओर श्रम अधिकारों की सुरक्षा की बात हो रही है, वहीं दूसरी ओर व्यापारिक बाधाओं और आर्थिक प्रभावों को लेकर चिंता जताई जा रही है।

  • दक्षिण सूडान में तैनात 565 भारतीय सैनिक प्रतिष्ठित संयुक्त राष्ट्र पदक से हुए सम्मानित

    दक्षिण सूडान में तैनात 565 भारतीय सैनिक प्रतिष्ठित संयुक्त राष्ट्र पदक से हुए सम्मानित


    खार्तूम।
    दक्षिण सूडान (South Sudan) में संयुक्त राष्ट्र मिशन (United Nations Mission) के तहत तैनात कम से कम 565 भारतीय शांति सैनिकों (565 Indian Peacekeepers) को उनकी उत्कृष्ट सेवा, नागरिकों की सुरक्षा और शांति स्थापना के प्रयासों के लिए प्रतिष्ठित संयुक्त राष्ट्र पदक (Prestigious United Nations Medal) से सम्मानित किया गया है। सम्मानित होने वाले इन सैनिकों में 53 महिला सैन्यकर्मी भी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) निकाय द्वारा जारी बयान के अनुसार, भारतीय शांति सैनिकों को यह सम्मान गश्त के माध्यम से नागरिकों की रक्षा करने, स्थानीय समुदायों के साथ जुड़ाव बढ़ाने, पशु चिकित्सा शिविर आयोजित करने, महिलाओं के लिए आत्मरक्षा प्रशिक्षण देने, लैंगिक हिंसा के खिलाफ लड़ने और मानवीय सहायता की पहुंच को सुगम बनाने के लिए दिया गया है।

    इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने भारतीय दल को बधाई दी। मिशन ने कहा, “भारतीय ब्लू हेल्मेट्स ने अपने संचालन के सभी क्षेत्रों में लगातार व्यावसायिकता और कर्तव्यपरायणता के उच्चतम मानकों को बनाए रखा है। देश को उनकी सेवा पर गर्व है।” आपको बता दें कि ब्लू हेल्मेट्स उन सैन्य कर्मियों, पुलिस अधिकारियों और नागरिक विशेषज्ञों को कहा जाता है जो संयुक्त राष्ट्र शांति सेना की कमान के तहत दुनिया के अशांत क्षेत्रों में काम करते हैं।


    शांति स्थापना में भारत का योगदान

    भारत का संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में एक गौरवशाली और लंबा इतिहास रहा है। नेपाल के बाद भारत संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में वर्दीधारी सैन्य और पुलिसकर्मियों का योगदान देने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। भारत के वर्तमान में 4,200 से अधिक सैन्य और पुलिस कर्मी संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न मिशनों में तैनात हैं, जिनमें 155 महिला कर्मी शामिल हैं।

    भारतीय सैनिक इस समय दक्षिण सूडान के अलावा एबेई, मध्य अफ़्रीकी गणराज्य, साइप्रस, कांगो, लेबनान, मध्य पूर्व, सोमालिया और पश्चिमी सहारा के मिशनों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। वैश्विक शांति की वेदी पर भारत ने सबसे बड़ा बलिदान भी दिया है। कर्तव्य की वेदी पर देश के लगभग 180 भारतीय शांति सैनिकों ने अपनी जान गंवाई है, जो किसी भी सैनिक योगदान देने वाले देश की तुलना में सबसे अधिक संख्या है।