Category: International

  • यूएन में नेतन्याहू ने ममदानी पर साधा निशाना, कहा- न्यूयॉर्क में यहूदी खुद को सुरक्षित नहीं मानते

    यूएन में नेतन्याहू ने ममदानी पर साधा निशाना, कहा- न्यूयॉर्क में यहूदी खुद को सुरक्षित नहीं मानते

    नई दिल्ली । इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने ममदानी की गाजा और इस्राइल से जुड़ी टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया कि उनकी बयानबाजी से न्यूयॉर्क में रहने वाले यहूदी समुदाय के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ी है। नेतन्याहू ने ममदानी को यहूदी-विरोधी मेयर भी बताया।

    अपने भाषण में नेतन्याहू ने कहा कि ममदानी के मेयर चुने जाने के बाद कई यहूदी न्यूयॉर्क में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करते। उन्होंने दावा किया कि कुछ लोग उनसे बातचीत के दौरान कहते हैं कि शहर तेजी से बदल गया है और अब वह पहले जैसा नहीं रहा। यह टिप्पणी दोनों नेताओं के बीच लंबे समय से चल रहे सार्वजनिक विवाद के बीच आई है।

    ममदानी गाजा में इस्राइल की सैन्य कार्रवाई के मुखर आलोचक रहे हैं। उन्होंने नेतन्याहू के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं और फिलिस्तीनी अधिकारों की वकालत की है। ममदानी का रुख रहा है कि इस्राइल की नीतियों की आलोचना करना अपने आप में यहूदी-विरोधी नहीं माना जाना चाहिए। दूसरी ओर, नेतन्याहू उनकी टिप्पणियों को इस्राइल और यहूदी समुदाय की सुरक्षा से जोड़ते रहे हैं।

    नेतन्याहू और ममदानी के बीच विवाद का एक प्रमुख मुद्दा अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय यानी आईसीसी का गिरफ्तारी वारंट भी रहा है। ममदानी ने अपने चुनाव अभियान के दौरान कहा था कि यदि नेतन्याहू न्यूयॉर्क आए तो वह उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट लागू कराने की कोशिश करेंगे। बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि न्यूयॉर्क शहर के पास किसी विदेशी नेता को गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं है। हाल के दिनों में उन्होंने अमेरिकी संघीय सरकार से आईसीसी के वारंट का सम्मान करने की अपील भी की है।

    नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन के दौरान इस मुद्दे का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ममदानी ने उन्हें न्यूयॉर्क आने से रोकने और चुप कराने की कोशिश की, लेकिन वह अपनी बात रखने से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने कहा कि न तो उन्हें और न ही सच्चाई को चुप कराया जा सकता है।

    इसी सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ममदानी के बीच न्यूयॉर्क में मुलाकात भी हुई थी। दोनों नेताओं के बीच कई राजनीतिक और नीतिगत मतभेद हैं, लेकिन बैठक में शहर से जुड़े मुद्दों पर बातचीत हुई। नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र में ट्रंप के इस्राइल के प्रति समर्थन की प्रशंसा की और उन्हें अपना महत्वपूर्ण साझेदार बताया।

    इस पूरे विवाद में एक तरफ ममदानी इस्राइल की गाजा नीति और फिलिस्तीनी अधिकारों को लेकर अपनी आलोचना पर कायम हैं, वहीं नेतन्याहू उनकी टिप्पणियों को यहूदी समुदाय की सुरक्षा और यहूदी-विरोधी भावना के संदर्भ में पेश कर रहे हैं। दोनों नेताओं के बीच सार्वजनिक टकराव अब गाजा युद्ध के साथ-साथ न्यूयॉर्क में यहूदी सुरक्षा, आईसीसी के गिरफ्तारी वारंट और अमेरिकी सरकार की भूमिका जैसे मुद्दों से भी जुड़ गया है।

    नेतन्याहू के संयुक्त राष्ट्र संबोधन के दौरान कई प्रतिनिधि सभागार से बाहर भी चले गए और न्यूयॉर्क में उनके दौरे के खिलाफ प्रदर्शन हुए। इस घटनाक्रम ने उनके भाषण को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी राजनीतिक मतभेदों को भी सामने ला दिया।

  • शी जिनपिंग ने पांच साल में एक लाख अमेरिकी युवाओं को चीन बुलाने का किया बड़ा एलान

    शी जिनपिंग ने पांच साल में एक लाख अमेरिकी युवाओं को चीन बुलाने का किया बड़ा एलान


    नई दिल्ली ।
    चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अगले पांच वर्षों में एक लाख युवा अमेरिकियों को चीन आने का निमंत्रण दिया है। इन युवाओं के लिए पढ़ाई और विभिन्न आदान-प्रदान कार्यक्रमों के अवसर उपलब्ध कराने की बात कही गई है। यह घोषणा ऐसे समय हुई है जब चीन और अमेरिका के बीच संबंधों में व्यापार, तकनीक और अन्य रणनीतिक मुद्दों को लेकर लगातार चर्चा बनी हुई है। शी जिनपिंग ने युवाओं को दोनों देशों के भविष्य के संबंधों से जोड़ते हुए लोगों के बीच संपर्क और आपसी समझ बढ़ाने पर जोर दिया।

    शी जिनपिंग ने कहा कि चीन और अमेरिका के रिश्तों की उम्मीद दोनों देशों के लोगों से जुड़ी है और इन संबंधों का भविष्य युवाओं के हाथ में है। इसी सोच के तहत उन्होंने अगले पांच वर्षों में एक लाख युवा अमेरिकियों को चीन आने का न्योता देने की घोषणा की। इन यात्राओं में शिक्षा के साथ सांस्कृतिक और अन्य आदान-प्रदान कार्यक्रमों को भी शामिल किया जाएगा।

    यह पहली बार नहीं है जब चीन की ओर से अमेरिकी युवाओं को इस तरह आमंत्रित किया गया है। नवंबर 2023 में भी पांच वर्षों के भीतर 50 हजार युवा अमेरिकियों को चीन बुलाने की पहल की गई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह लक्ष्य तय समय से करीब ढाई साल पहले ही पूरा हो गया। इसके बाद अब प्रस्तावित संख्या को बढ़ाकर एक लाख कर दिया गया है।

    इस पहल के तहत अमेरिकी युवाओं ने चीन के अलग-अलग हिस्सों का दौरा किया है। कई युवाओं ने वहां शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया, स्थानीय लोगों से मुलाकात की और चीन के इतिहास तथा आधुनिक विकास को करीब से समझने का अवसर पाया। चीन में आयोजित कार्यक्रमों में विश्वविद्यालयों के छात्रों के बीच संवाद और विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियां भी शामिल रही हैं।

    अपने संबोधन में शी जिनपिंग ने चीन और अमेरिका के पुराने संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दोनों देशों के सहयोग को याद किया और कहा कि उस समय दोनों पक्षों ने फासीवादी ताकतों के खिलाफ मिलकर लड़ाई लड़ी थी। उनका कहना था कि इस साझा इतिहास को दोनों देशों के लोगों ने याद रखा है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चीन और अमेरिका के सहयोग का उल्लेख किया। उन्होंने चीन की मदद करने वाले अमेरिकी पायलटों के समूह ‘फ्लाइंग टाइगर्स’ की भूमिका को याद किया। इसके साथ ही उन्होंने दोनों देशों के बीच पुराने संपर्कों से जुड़े ‘गंग हो’ शब्द का भी जिक्र किया और इसे मिलकर काम करने के अर्थ से जोड़ा।

    शी जिनपिंग ने यह भी कहा कि चीन के राष्ट्रीय पुनरुत्थान का लक्ष्य और अमेरिका को फिर से महान बनाने की कोशिश एक-दूसरे के साथ आगे बढ़ सकती हैं। उन्होंने दोनों देशों के लोगों के बीच दोस्ती और संपर्क बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया।

    एक लाख अमेरिकी युवाओं को चीन बुलाने की नई पहल को शिक्षा, सांस्कृतिक संपर्क और लोगों के बीच संवाद बढ़ाने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। पिछले कार्यक्रम में 50 हजार युवाओं का लक्ष्य समय से पहले पूरा होने के बाद अब इसकी संख्या दोगुनी की गई है। आने वाले पांच वर्षों में इस पहल के तहत कितने युवा चीन पहुंचते हैं और इससे दोनों देशों के बीच शैक्षणिक एवं सामाजिक संपर्क किस स्तर तक बढ़ता है, यह आगे स्पष्ट होगा।

  • मुस्लिमों के पवित्र शहर मक्का पर मिसाइल अटैक का खतरा…. हूती विद्रोही कर सकते हैं हमला

    मुस्लिमों के पवित्र शहर मक्का पर मिसाइल अटैक का खतरा…. हूती विद्रोही कर सकते हैं हमला


    मक्का।
    मुस्लिमों (Muslims) के सबसे पवित्र शहर मक्का (Holiest city, Mecca) पर हमले का साया मंडरा रहा है। ये बात खुद सऊदी अरब (Saudi Arabia) की सुरक्षा एजेंसियां कह रही हैं। उन्हें डर है कि ईरान समर्थित हूती विद्रोही (Houthi rebels) इस पवित्र शहर को अपना निशाना बना सकते हैं। सऊदी सिविल डिफेंस ने गुरुवार को पवित्र शहर मक्का और अन्य इलाकों के लिए अलर्ट जारी किया है। अमूमन ऐसी चेतावनियां मिसाइल हमले के संभावित खतरे का संकेत देती हैं। एजेंसी ने अपने आधिकारिक X हैंडल पर एक पोस्ट में कहा, “मक्का शहर में संभावित खतरे के बारे में आगाह करने के लिए ‘नेशनल अर्ली वार्निंग प्लेटफॉर्म’ की ओर से चेतावनी जारी की गई है।”

    10 दिनों से भी कम समय में यह दूसरी बार है, जब अधिकारियों ने मक्का के लिए ऐसी चेतावनी जारी की है। सऊदी अरब के पश्चिमी तट के अन्य इलाकों के लिए भी अलग-अलग चेतावनियां जारी की गईं, जिनमें लाल सागर के किनारे बसा यानबू (Yanbu) शहर और ताइफ, जेद्दा और तबुक इलाके शामिल हैं। समाचार एजेंसी AFP के अनुसार, कुछ मिनटों बाद ये अलर्ट हटा लिए गए। हाल के हफ्तों में, ऐसे अलर्ट के बाद यमन के हूती विद्रोहियों (ईरान समर्थित एक सशस्त्र समूह) ने हमले किए हैं।

    पिछले हफ्ते, सऊदी अरब ने हूतियों पर मक्का को ड्रोन से निशाना बनाने की कोशिश का आरोप लगाया था, जिसे मार गिराया गया। सऊदी अरब ने कहा कि 2017 के बाद से ऐसी कोशिश पहली बार हुई थी। दूसरी तरफ, हूती समूह ने इन आरोपों से इनकार किया है। पिछला अलर्ट 15 सितंबर को जारी किया गया था, जब सऊदी अरब की एयर डिफेंस सिस्टम ने मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को रोककर नष्ट कर दिया था। वह ड्रोन प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में दाखिल नहीं हो पाया था। कुछ दिनों बाद, हूतियों ने कई सालों में पहली बार सऊदी राजधानी रियाद को निशाना बनाया, जिससे इस संघर्ष में तनाव और बढ़ गया।

    बता दें कि ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों और सऊदी समर्थित यमनी सरकार के बीच नई लड़ाई चल रही है, जो तेहरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव के बीच हो रही है। यह संघर्ष तब शुरू हुआ, जब इस सशस्त्र समूह ने सऊदी अरब की समुद्री नाकेबंदी की घोषणा की और लाल सागर में उसके जहाजों को निशाना बनाया। इस महीने की शुरुआत में, हूतियों ने सऊदी समर्थित सरकारी बलों से इलाके छीनने के बाद बाब अल-मंडेब स्ट्रेट के पास रणनीतिक तटीय इलाकों पर कब्जा कर लिया। यह इलाका सऊदी अरब के तेल निर्यात के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

  • इटली: मेलोनी सरकार ने स्कूलों के लिए बदले नियम… भाषा की सीमा तय, नकाब पर भी रोक

    इटली: मेलोनी सरकार ने स्कूलों के लिए बदले नियम… भाषा की सीमा तय, नकाब पर भी रोक


    रोम।
    इटली (Italy) में स्कूलों (Schools) को लेकर प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी (Prime Minister Giorgia Meloni) की सरकार ने बड़ा फैसला लिया है. सरकार ने स्कूलों (Schools) में इटैलियन भाषा (Italian language) की कम जानकारी रखने वाले बच्चों की संख्या पर एक सीमा तय कर दी है. इसके साथ ही स्कूलों में नकाब पर भी रोक लगाने का फैसला लिया गया है।

    फैसले के पक्ष में मेलोनी प्रशासन का कहना है कि इन नियमों से छात्रों में इटैलियन भाषा को सीखने और स्कूलों में एकीकरण को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी. लेकिन विपक्ष के साथ ही कुछ शिक्षक संगठनों और यूनियनों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि इस फैसले से छात्रों और उनके परिवारों पर असर पड़ सकता है।

    सरकार के नए प्लान के मुताबिक किसी भी क्लास में इटैलियन भाषा पर कम पकड़ वाले बच्चों की संख्या 30 फीसदी होगी. इस फैसले में खास बात यह है कि बच्चों की सीमा नागरिकता के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी भाषा की क्षमता के आधार पर तय की जाएगी। यानी अगर किसी दूसरे यूरोपीय संघ के देश का छात्र भी इटैलियन भाषा अच्छी तरह नहीं बोलता, तो वह भी इस नियम के दायरे में आएगा. सरकार का तर्क है कि इससे स्कूलों में ऐसी क्लासेज कम होंगी, जहां ज्यादातर बच्चों को भाषा समझने में दिक्कत हो।


    स्कूलों में चेहरा ढकने पर भी रोक

    इन्हीं नियमों में स्कूलों में ऐसे इस्लामिक पहनावे पर भी रोक लगाने का फैसला किया गया है, जिससे चेहरा पूरी तरह ढक जाता हो. नियम का हवाला देते हुए सरकार का कहना है कि इससे स्कूलों में कम्यूनिकेशन और एकीकरण को बढ़ावा मिलेगा. मेलोनी ने इन फैसलों को सोशल मीडिया पर “कॉमन सेंस” वाले उपाय बताए. उनके मुताबिक इनका मकसद छात्रों को अलग-अलग समूहों में बांटना नहीं, बल्कि सभी को समान अवसर देना है।


    विपक्ष ने नियमों पर उठाए सवाल

    सरकार के फैसले का विरोध भी शुरू हो गया है. आलोचकों का कहना है कि 30 फीसदी की सीमा के चलते कुछ छात्रों को अपने घर के आसपास के स्कूल के बजाय दूसरे इलाके के स्कूल में जाना पड़ सकता है. विपक्षी दलों और कुछ शिक्षकों ने यह भी आरोप लगाया है कि सरकार इमिग्रेशन के मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला रही है।

    सरकार का डिक्री तुरंत लागू हो गया है, लेकिन इसे 60 दिनों के भीतर संसद की मंजूरी लेनी होगी. संसद में मेलोनी के गठबंधन के पास बहुमत है. ऐसे में आने वाले दिनों में इटली की इमिग्रेशन और पहचान पर भी इस फैसले का असर दिख सकता है।

  • ट्रंप-जिनपिंग की मुलाकात में दिखी गर्मजोशी, लेकिन बड़े मुद्दे अभी बाकी, बैठक से निकले 5 अहम संकेत

    ट्रंप-जिनपिंग की मुलाकात में दिखी गर्मजोशी, लेकिन बड़े मुद्दे अभी बाकी, बैठक से निकले 5 अहम संकेत


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की व्हाइट हाउस में हुई मुलाकात में दोनों देशों के बीच रिश्तों में नरमी के संकेत जरूर दिखे, लेकिन कई बड़े और संवेदनशील मुद्दों पर अभी अंतिम समाधान सामने नहीं आया है। व्यापार समझौते की अवधि बढ़ाने से लेकर ताइवान, अमेरिका-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक, बैठक में ऐसे पांच मुद्दे सामने आए जो आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्तों की दिशा तय कर सकते हैं।

    1. ट्रेड डील सिर्फ दो महीने के लिए आगे बढ़ी

    बैठक से सबसे बड़ा व्यावहारिक नतीजा व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के रूप में सामने आया। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, अमेरिका और चीन उस ट्रेड डील को दो महीने के लिए बढ़ाने पर सहमत हुए हैं, जिसने पिछले साल दोनों देशों के बीच चल रहे ट्रेड वॉर को खत्म करने में भूमिका निभाई थी। यह समझौता नवंबर में खत्म होने वाला था।

    हालांकि, यह विस्तार लंबी अवधि का समाधान नहीं है। टैरिफ, चीन की खरीद, रेयर-अर्थ सप्लाई और तकनीकी प्रतिबंध जैसे जटिल मुद्दों पर दोनों देशों के बीच बातचीत आगे भी जारी रहेगी। यानी फिलहाल इन मुद्दों पर अंतिम सहमति के बजाय बातचीत के लिए समय बढ़ाया गया है।

    2. व्हाइट हाउस में अमेरिकी अंदाज में हुआ भव्य स्वागत

    जिनपिंग के दौरे के दौरान व्हाइट हाउस में भव्य समारोहों का आयोजन किया गया। ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति के स्वागत के लिए अमेरिकी सैन्य परंपरा और शान-शौकत को खास तौर पर प्रदर्शित किया।

    बुधवार और गुरुवार को आयोजित कार्यक्रमों में त्रिकोणीय टोपियां और विशेष वेशभूषा पहने सैनिकों ने मार्च किया। संगीत के साथ आसमान में फाइटर जेट्स और बमवर्षक विमानों ने भी उड़ान भरी। एक मौके पर जेट की तेज आवाज से राष्ट्रपति ट्रंप भी चौंक गए।

    ट्रंप ने जिनपिंग को व्हाइट हाउस के नए हेलीपैड और ‘मरीन वन’ हेलीकॉप्टर की जानकारी भी दी। इस तरह बैठक के राजनीतिक एजेंडे के साथ दोनों नेताओं की मुलाकात में प्रतीकात्मक और औपचारिक पहलू भी नजर आया।

    3. ताइवान पर चीन ने अमेरिका से सावधानी बरतने को कहा

    बैठक में ताइवान का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। चीन की सरकारी समाचार एजेंसी के मुताबिक, शी जिनपिंग ने ट्रंप से ताइवान के सवाल पर चर्चा की और उम्मीद जताई कि अमेरिका इस मुद्दे को बेहद सावधानी से संभालेगा।

    चीनी पक्ष ने यह भी कहा कि बीजिंग चाहता है कि अमेरिका ताइवान की स्वतंत्रता का स्पष्ट रूप से विरोध करे।

    हालांकि, अमेरिका ने ताइवान को लेकर अपने पुराने रुख में कोई बदलाव नहीं किया है। इस मुद्दे पर किसी बड़े बदलाव का असर ताइवान की सुरक्षा और अमेरिकी कांग्रेस में राजनीतिक प्रतिक्रिया पर भी पड़ सकता है।

    4. ‘थ्यूसीडाइड्स ट्रैप’ का जिक्र, टकराव के जोखिम पर संकेत

    शी जिनपिंग ने मुलाकात के दौरान एक बार फिर ‘थ्यूसीडाइड्स ट्रैप’ का जिक्र किया। यह एक अकादमिक अवधारणा है, जिसके मुताबिक किसी उभरती हुई महाशक्ति और मौजूदा प्रमुख महाशक्ति के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा से टकराव का खतरा पैदा हो सकता है।

    जिनपिंग ने हालांकि यह भी कहा कि इस जोखिम से बचा जा सकता है। उनके इस संदर्भ को अमेरिका और चीन के बीच जारी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा गया। दोनों देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के साथ सैन्य टकराव की आशंका भी लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय रही है।

    5. AI को लेकर दोनों नेताओं की सोच अलग

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के भविष्य और उसके नियमन को लेकर ट्रंप और जिनपिंग के विचारों में अंतर दिखाई दिया।

    राष्ट्रपति ट्रंप AI को ‘सुपर इंटेलिजेंस’ यानी ‘SI’ कहने पर जोर देते हैं और उनका रुख नई तरह के नियंत्रण लागू करने के प्रति सतर्कता का रहा है। दूसरी ओर, जिनपिंग ने कहा कि दुनिया की प्रमुख शक्तियों के रूप में अमेरिका और चीन की जिम्मेदारी है कि AI के विकास को नियंत्रित किया जाए।

    जिनपिंग ने जोर दिया कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि AI इंसानों के नियंत्रण में रहे और मानवता के हित में काम करे। इससे संकेत मिलता है कि तकनीक के भविष्य को लेकर दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाओं के साथ नीति और नियमन को लेकर मतभेद भी बने हुए हैं।

    स्टेट डिनर में टेक जगत के दिग्गज भी पहुंचे

    ट्रंप ने जिनपिंग के साथ बैठक के बाद व्हाइट हाउस में चीनी राष्ट्रपति के सम्मान में शानदार स्टेट डिनर का आयोजन किया। इसमें टेक्नोलॉजी जगत की कई प्रमुख हस्तियां भी शामिल हुईं।

    डिनर में गूगल के सुंदर पिचई, OpenAI के सैम ऑल्टमैन और Nvidia के जेनसेन ह्वांग जैसे टेक जगत के दिग्गज मौजूद रहे। ऐसे में बैठक के राजनीतिक और व्यापारिक एजेंडे के साथ AI और तकनीकी क्षेत्र की भूमिका भी खास तौर पर चर्चा में रही।

    कुल मिलाकर, ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात में व्यापार के मोर्चे पर सीमित अवधि का समझौता जरूर हुआ, लेकिन ताइवान, तकनीकी प्रतिबंध, रेयर-अर्थ सप्लाई और AI जैसे कई अहम मुद्दे अभी भी बातचीत के दायरे में हैं। दोनों देशों के रिश्तों में आगे की दिशा इन मुद्दों पर होने वाली अगली बातचीत से तय होगी।

  • G4 देशों ने UNSC की 80 साल पुरानी संरचना में सुधार को जरूरी बताया, दिल्ली में होगी अगली समीक्षा बैठक

    G4 देशों ने UNSC की 80 साल पुरानी संरचना में सुधार को जरूरी बताया, दिल्ली में होगी अगली समीक्षा बैठक

    नई दिल्ली ।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में सुधार को लेकर भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान ने एक बार फिर अपनी साझा मांग दोहराई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र से इतर 22 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में हुई G4 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना में जल्द सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

    बैठक में चारों देशों ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सुरक्षा परिषद में सुधार पहले की तुलना में अधिक जरूरी हो गया है। G4 का मानना है कि परिषद की मौजूदा संरचना करीब 80 साल पुरानी है और आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करती। इसी वजह से परिषद की प्रतिनिधित्व क्षमता, वैधता, विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    बैठक में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के साथ ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा, जर्मनी के विदेश मंत्री डॉ. योहान डेविड वाडेफुल और जापान के विदेश मंत्री मोतेगी तोशिमित्सु शामिल हुए। मंत्रियों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार से जुड़ी अंतर-सरकारी वार्ताओं में हुई प्रगति और चर्चाओं की समीक्षा की।

    G4 देशों ने सुरक्षा परिषद की सदस्यता में स्थायी और गैर-स्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार को सुधार प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। चारों देशों ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के बीच दोनों श्रेणियों में सदस्यता बढ़ाने के समर्थन की व्यापक मौजूदगी है।

    अफ्रीका के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की जरूरत पर भी बैठक में जोर दिया गया। G4 देशों ने सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वकारी और प्रभावी बनाने के लिए ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता बताई, जो वर्तमान वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों को बेहतर तरीके से दर्शा सके।

    G4 की ओर से सुधार प्रक्रिया को जल्द आगे बढ़ाने और ठोस परिणाम हासिल करने की मांग की गई। देशों ने सुरक्षा परिषद की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में व्यापक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए अंतर-सरकारी वार्ता प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है और G4 इस प्रक्रिया में लगातार सक्रिय भूमिका निभाता रहा है।

    न्यूयॉर्क में हुई चर्चा के बाद अब G4 देशों की अगली समीक्षा बैठक दिल्ली में प्रस्तावित है। इसमें सुधार प्रक्रिया में हुई प्रगति और आगे की दिशा पर चर्चा की जाएगी। इस बैठक के जरिए चारों देश सुरक्षा परिषद में प्रतिनिधित्व बढ़ाने, स्थायी और गैर-स्थायी सदस्यता के विस्तार तथा सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से जुड़े मुद्दों पर अपने समन्वय की समीक्षा करेंगे।

    G4 देशों की बैठक ऐसे समय हुई है जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना को वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बनाने की मांग लगातार उठ रही है। सुधार समर्थक देशों का जोर परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वकारी, विश्वसनीय और प्रभावी बनाने पर है। G4 ने भी इसी दिशा में प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और लंबे समय से लंबित सुधार को ठोस रूप देने की आवश्यकता पर अपना रुख दोहराया है।

  • व्हाइट हाउस मीडिया बैन पर ट्रंप प्रशासन को कोर्ट से झटका, तीन संस्थानों की प्रेस एक्सेस बहाल करने का आदेश

    व्हाइट हाउस मीडिया बैन पर ट्रंप प्रशासन को कोर्ट से झटका, तीन संस्थानों की प्रेस एक्सेस बहाल करने का आदेश


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को व्हाइट हाउस से तीन मीडिया संस्थानों को प्रतिबंधित करने के मामले में अदालत से बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी फेडरल जज टिमोथी केली ने तीनों मीडिया संस्थानों के पत्रकारों की व्हाइट हाउस में प्रवेश संबंधी प्रेस एक्सेस तुरंत बहाल करने का आदेश दिया है। यह मामला प्रेस की स्वतंत्रता और संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़े विवाद के बीच अदालत पहुंचा था।

    राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 18 सितंबर को तीन प्रमुख अमेरिकी मीडिया संस्थानों को व्हाइट हाउस परिसर से प्रतिबंधित करने का फैसला किया था। इसके बाद संबंधित संस्थानों ने अदालत का रुख किया और अपने पत्रकारों की पहुंच बहाल करने की मांग की। उनका कहना था कि प्रतिबंध अमेरिकी संविधान के फर्स्ट अमेंडमेंट में दी गई प्रेस स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन करता है।

    मामले की सुनवाई के दौरान जज टिमोथी केली ने इस बात पर ध्यान दिया कि प्रतिबंध लागू करने से पहले संबंधित पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि किसी व्यक्ति से संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकार वापस लेने से पहले उसे नोटिस और अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।

    जज केली ने ट्रंप प्रशासन को तीनों मीडिया संस्थानों के पत्रकारों की व्हाइट हाउस पहुंच बहाल करने का निर्देश दिया। अदालत का आदेश ऐसे समय आया है जब प्रतिबंध के खिलाफ दायर मुकदमे में मीडिया संस्थानों ने तत्काल राहत की मांग की थी।

    ट्रंप प्रशासन की ओर से अदालत में इस फैसले का बचाव करते हुए कहा गया कि व्हाइट हाउस में पत्रकारों की पहुंच कोई पूर्ण संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि प्रशासन की ओर से दी जाने वाली सुविधा है। सरकार ने सुरक्षा से जुड़े कारणों का भी हवाला दिया और तर्क दिया कि राष्ट्रपति के पास संवेदनशील सरकारी परिसर में प्रवेश को नियंत्रित करने का अधिकार है।

    न्याय विभाग ने यह भी दलील दी कि संविधान का फर्स्ट अमेंडमेंट प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करता है, लेकिन इससे पत्रकारों को बिना अनुमति व्हाइट हाउस या अन्य संवेदनशील सरकारी परिसरों में असीमित प्रवेश का अधिकार नहीं मिल जाता।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने पुराने अपीलीय फैसलों का भी संदर्भ लिया। इन फैसलों के आधार पर कहा गया कि व्हाइट हाउस की प्रेस एक्सेस वापस लेने से पहले संबंधित पत्रकारों या मीडिया संस्थानों को उचित प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाना चाहिए।

    इस विवाद के बीच अमेरिका के कई बड़े टीवी नेटवर्क ने भी व्हाइट हाउस की साझा लाइव वीडियो कवरेज रोक दी थी। यह कदम तीन मीडिया संस्थानों पर लगाए गए प्रतिबंध के विरोध में उठाया गया था। इससे राष्ट्रपति के कार्यक्रमों की साझा मीडिया कवरेज प्रभावित हुई।

    अदालत के आदेश के बाद अब तीनों प्रतिबंधित मीडिया संस्थानों के पत्रकारों की व्हाइट हाउस पहुंच बहाल करने का रास्ता साफ हुआ है। हालांकि, मामला अभी कानूनी प्रक्रिया में है और प्रतिबंध को लेकर प्रशासन तथा मीडिया संस्थानों के बीच विवाद अदालत में आगे भी जारी रहेगा।

  • ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात के बीच अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर पर राहत, व्यापारिक युद्धविराम जनवरी 2027 तक बढ़ाया गया

    ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात के बीच अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर पर राहत, व्यापारिक युद्धविराम जनवरी 2027 तक बढ़ाया गया


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से जारी व्यापारिक तनाव के बीच दोनों देशों ने फिलहाल राहत की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। दोनों देशों ने मौजूदा व्यापारिक युद्धविराम की अवधि को करीब दो महीने आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है। पहले यह समझौता 10 नवंबर 2026 को समाप्त होना था, लेकिन अब इसकी अवधि बढ़ाकर 10 जनवरी 2027 कर दी गई है।

    इस फैसले से अमेरिका और चीन को टैरिफ सहित कई व्यापारिक मुद्दों पर बातचीत जारी रखने के लिए अतिरिक्त समय मिल गया है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चल रहे व्यापारिक विवाद में टैरिफ, आयात-निर्यात और अन्य आर्थिक विषयों को लेकर मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में युद्धविराम की अवधि बढ़ने से बातचीत के जरिए समाधान तलाशने का अवसर मिलेगा।

    यह फैसला चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के दौरान सामने आया है। शी जिनपिंग अपनी पत्नी पेंग लियुआन के साथ अमेरिका पहुंचे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी पत्नी मेलानिया ने उनका स्वागत किया। इसके बाद ट्रंप और जिनपिंग के बीच मुलाकात भी हुई।

    दोनों नेताओं की बैठक को अमेरिका-चीन व्यापार संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बातचीत के दौरान टैरिफ समेत कई आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव कम करने और आगे की बातचीत का रास्ता बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है।

    मौजूदा व्यापारिक युद्धविराम की अवधि बढ़ाए जाने का सीधा मतलब यह है कि दोनों देशों के पास अब अपने विवादित मुद्दों पर चर्चा के लिए पहले की तुलना में अधिक समय रहेगा। इससे तत्काल व्यापारिक टकराव बढ़ने की स्थिति को टालने में मदद मिल सकती है।

    अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रखने की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच संवाद जरूरी है।

    अमेरिका और चीन दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसी वजह से दोनों देशों के बीच टैरिफ और व्यापार नीति से जुड़े फैसलों पर दुनियाभर की नजर रहती है।

    युद्धविराम की अवधि बढ़ने के बावजूद दोनों देशों के बीच सभी व्यापारिक मतभेद समाप्त नहीं हुए हैं। टैरिफ और अन्य आर्थिक मुद्दों पर आगे भी बातचीत जारी रहने की संभावना है। दोनों पक्षों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अस्थायी राहत को आगे किसी व्यापक व्यापारिक समझौते की दिशा में ले जा सकें।

    अब 10 जनवरी 2027 तक अमेरिका और चीन के पास व्यापारिक विवादों पर बातचीत आगे बढ़ाने का अतिरिक्त समय है। ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात के बीच हुआ यह फैसला दोनों देशों के बीच जारी व्यापारिक संवाद को बनाए रखने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

  • चीन का एआई मिशन तेज, रोबोटिक्स और सरकारी निवेश के सहारे तकनीकी ताकत बढ़ाने की तैयारी

    चीन का एआई मिशन तेज, रोबोटिक्स और सरकारी निवेश के सहारे तकनीकी ताकत बढ़ाने की तैयारी

    नई दिल्ली । चीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और उन्नत विनिर्माण के क्षेत्र में अपनी क्षमता तेजी से बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। सरकार भारी निवेश, तकनीकी अनुसंधान और औद्योगिक विकास के जरिए एआई को अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की योजना पर आगे बढ़ रही है। इस रणनीति का उद्देश्य आने वाले वर्षों में चीन को वैश्विक तकनीकी क्षेत्र में मजबूत स्थिति दिलाना है।

    चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हाल ही में एक प्रौद्योगिकी पार्क का दौरा किया, जहां रोबोटिक्स और एआई से जुड़ी कई परियोजनाओं को प्रदर्शित किया गया। इस दौरान उन्होंने रोबोटिक तकनीक के इस्तेमाल को देखा और कहा कि उन्नत रोबोटिक्स तथा उच्चस्तरीय विनिर्माण चीन की अगली आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। चीन की सरकार एआई को केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित रखने के बजाय विभिन्न औद्योगिक और सामाजिक क्षेत्रों में इस्तेमाल करने की दिशा में काम कर रही है।

    जिस प्रौद्योगिकी पार्क का दौरा किया गया, वहां सैकड़ों कंपनियां अत्याधुनिक चिप्स और एआई मॉडल विकसित करने में लगी हैं। स्थानीय प्रशासन इन कंपनियों को बड़े स्तर पर कंप्यूटिंग संसाधन उपलब्ध करा रहा है। इसका उद्देश्य एआई अनुसंधान और नई तकनीकों के विकास की गति को बढ़ाना है।

    चीन में एआई से जुड़े अनुसंधान का दायरा भी लगातार विस्तृत किया जा रहा है। तकनीकी प्रदर्शनों में ऐसे चिप्स और उपकरण शामिल हैं जिनका इस्तेमाल अत्याधुनिक प्रणालियों में किया जा सकता है। इसके अलावा लकवाग्रस्त मरीजों को संवाद करने में मदद करने वाली ब्रेन-इम्प्लांट तकनीक जैसे प्रयोग भी सामने आए हैं। इससे संकेत मिलता है कि चीन एआई और रोबोटिक्स को औद्योगिक उपयोग के साथ-साथ स्वास्थ्य क्षेत्र में भी आगे बढ़ाना चाहता है।

    इस अभियान में सरकारी पूंजी की भूमिका काफी बड़ी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2000 से 2023 के बीच सरकार के नेतृत्व वाले फंडों ने एआई कंपनियों में 184 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया। इसके अलावा पिछले साल सरकार और सरकारी बैंकों की ओर से एआई क्षेत्र में सैकड़ों अरब डॉलर के अतिरिक्त निवेश की प्रतिबद्धता जताई गई थी। हालांकि निजी क्षेत्र से चीन में होने वाला एआई निवेश अभी अमेरिका की तुलना में कम बताया गया है।

    चीन की बढ़ती बुजुर्ग आबादी भी रोबोटिक्स के विकास की एक बड़ी वजह है। देश में ऐसे बुद्धिमान रोबोट तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है जो भविष्य में कामगारों की कमी को पूरा करने में मदद कर सकें। स्वास्थ्य क्षेत्र में भी एआई आधारित डिजिटल तकनीक के जरिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाओं को अधिक लोगों तक पहुंचाने की संभावनाओं पर काम हो रहा है।

    सरकार का लक्ष्य 2030 तक एआई टूल्स और एआई एजेंट्स की पहुंच चीनी समाज के 90 प्रतिशत हिस्से तक बढ़ाने का है। हालांकि इस लक्ष्य को किस तरह मापा जाएगा, इसकी स्पष्ट रूपरेखा सामने नहीं आई है।

    एआई के विस्तार के साथ चीन के सामने कुछ जोखिम भी हैं। उन्नत चैटबॉट और सूचना आधारित तकनीक सरकारी सूचना नियंत्रण की व्यवस्था के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। वहीं अत्याधुनिक विदेशी एआई मॉडल साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में भी जोखिम बढ़ा सकते हैं। इसके बावजूद चीन सरकार एआई, रोबोटिक्स और उन्नत तकनीक में निवेश तथा अनुसंधान को आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है।

  • USS अब्राहम लिंकन पर 8 नौसैनिकों ने की आत्महत्या की कोशिश, 286 दिन समुद्र में रही तैनाती

    USS अब्राहम लिंकन पर 8 नौसैनिकों ने की आत्महत्या की कोशिश, 286 दिन समुद्र में रही तैनाती


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी नौसेना के विमानवाहक पोत USS अब्राहम लिंकन पर लंबे समय तक समुद्र में तैनाती के दौरान आठ नौसैनिकों द्वारा आत्महत्या की कोशिश किए जाने की जानकारी सामने आई है। अमेरिकी कार्यवाहक नेवी सेक्रेटरी हंग काओ ने सीएनएन को दिए एक पत्र में यह जानकारी दी है। यह पत्र उन्होंने सीनेटर किर्स्टन गिलीब्रांड के सवालों के जवाब में रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की ओर से लिखा था।

    हंग काओ के मुताबिक, लिंकन की तैनाती शुरू होने के बाद से पूरे स्ट्राइक ग्रुप में आत्महत्या के कुल आठ प्रयास दर्ज किए गए। इनमें USS अब्राहम लिंकन के क्रू के साथ एयरविंग, डिस्ट्रॉयर स्क्वाड्रन और स्ट्राइक ग्रुप के साथ तैनात अन्य जहाजों के सैन्यकर्मी भी शामिल हैं। यह पोत ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान के तहत लंबे समय तक समुद्र में तैनात रहा था।

    USS अब्राहम लिंकन करीब 286 दिन समुद्र में रहने के बाद एक सितंबर को थाईलैंड के एक पर्यटन शहर पहुंचा। उसकी तैनाती पहले मई में समाप्त होनी थी, लेकिन ईरान के साथ तनाव जारी रहने के कारण इसे आगे बढ़ा दिया गया था।

    समुद्र में कूदने की कोशिश की घटनाएं भी सामने आईं

    अगस्त में दो सैन्य समाचार पत्रों ने नौसैनिकों की मानसिक स्थिति और पोत पर काम करने की परिस्थितियों को लेकर रिपोर्ट प्रकाशित की थीं। इनमें कुछ सैन्यकर्मियों द्वारा समुद्र में कूदने की कोशिश किए जाने की जानकारी भी सामने आई थी। इसके बाद डेमोक्रेटिक सांसदों ने मामले की जांच की मांग की थी।

    काओ के अनुसार, मार्च में एक नौसैनिक को उसके साथियों ने समुद्र में कूदने से रोक लिया था। वहीं, अगस्त में एक सैन्यकर्मी वास्तव में समुद्र में कूद गया था। उसे बचा लिया गया और इलाज के लिए जहाज से बाहर भेजा गया।

    खाने और जरूरी सामान की कमी की शिकायतें

    पोत पर तैनात सैन्यकर्मियों की परिस्थितियों को लेकर अन्य शिकायतें भी सामने आई थीं। इनमें फफूंद की समस्या के अलावा भोजन और साबुन जैसी जरूरी वस्तुओं की कमी की खबरें शामिल थीं।

    काओ ने स्वीकार किया कि जहाज पर खाने के विकल्पों में अस्थायी रूप से कटौती की गई थी। हालांकि, उनके मुताबिक नौसैनिकों को रोजाना चार बार संतुलित भोजन उपलब्ध कराया जाता रहा। इससे पहले रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने पोत पर खराब परिस्थितियों से जुड़ी खबरों को गलत बताया था।

    ताजा जानकारी सामने आने के बाद सीनेटर किर्स्टन गिलीब्रांड ने सरकार पर सैन्यकर्मियों की परिस्थितियों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। लंबे समय तक समुद्र में तैनाती, मानसिक स्वास्थ्य और जहाज पर उपलब्ध सुविधाओं को लेकर सामने आई जानकारी ने अमेरिकी नौसेना में सैनिकों की स्थिति पर बहस को फिर तेज कर दिया है।