Category: International

  • इमरान खान की रिहाई की मांग…. 27 सितंबर को PTI का बड़ा आंदोलन… 20 हजार कंटेनरों से इस्लामाबाद सील

    इमरान खान की रिहाई की मांग…. 27 सितंबर को PTI का बड़ा आंदोलन… 20 हजार कंटेनरों से इस्लामाबाद सील


    इस्लामाबाद।
    पड़ोसी देश पाकिस्तान (Pakistan) की राजधानी इस्लामाबाद (Islamabad) में एक अजीब सा खौफ साया है। आलम ये है कि राजधानी को कम से कम 20,000 शिपिंग कंटेनरों (Shipping Containers) से घेर दिया गया है। इतना ही नहीं, इन कंटेनरों को वेल्डिंग करके आपस में जोड़ा गया है और उन पर बाहर की तरफ नुकीले धातु (Sharp metal) के कांटे लगाए गए हैं। पाक मीडिया की खबरों के मुताबिक, शहबाज शरीफ सरकार (Shehbaz Sharif Government) और उनका प्रशासन घबराया हुआ है। अस्पतालों में जगह बनाई जा रही है और अतिरिक्त ब्लड बैग तैयार रखे जा रहे हैं।

    दरअसल, जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान (Imran Khan) की रिहाई की मांग को लेकर उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ (PTI) के कार्यकर्ता और समर्थक 27 सितंबर को राजधानी में विरोध-प्रदर्शन और मार्च करने वाले हैं। इस मार्च को जमात-ए-इस्लामी और किसान संगठनों का भी समर्थन मिल रहा है। लिहाजा, प्रशासन ने PTI के इस प्रस्तावित मार्च और विरोध प्रदर्शन से पहले राजधानी इस्लामाबाद में प्रवेश करने वाली प्रमुख सड़कों को बंद करना शुरू कर दिया है।


    अस्पतालों को क्या-क्या निर्देश?

    पाक मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद के अस्पतालों को संभावित मानवीय संकट और बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने की घटना से निपटने के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया गया है। अस्पतालों में गैर-जरूरी सर्जरी टाली जा रही हैं और स्थिर हालत वाले मरीजों को छुट्टी दी जा रही है ताकि घायलों के आने पर जगह मिल सके। पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ के अनुसार, इस्लामाबाद के अस्पतालों से कहा गया है कि वे कम से कम 100 बैग ब्लड रिजर्व रखें और सभी एम्बुलेंस और उनके ड्राइवरों को चालू हालत में और आपात स्थिति के लिए तैयार रखें।


    दो प्रांतों से बुलाए गए 20,000 पुलिसकर्मी

    राजधानी में सुरक्षा घेरा मजबूत करने के लिए 27 सितंबर के मार्च से पहले पंजाब और सिंध प्रांत से 20,000 से ज़्यादा पुलिसकर्मियों को इस्लामाबाद बुलाया जा रहा है। बीबीसी उर्दू की बुधवार की रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब सरकार ने रावलपिंडी, अटक, झेलम और मियांवाली में संघीय अर्धसैनिक बल ‘पाकिस्तान रेंजर्स’ को बुलाया है। यह लामबंदी ऐसे समय में हो रही है जब जमात-ए-इस्लामी ने ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किया है और PTI के मार्च का समर्थन किया है। किसानों ने भी इमरान खान के समर्थकों के साथ मिलकर राजधानी की ओर मार्च करने की योजना की घोषणा की है। कम से कम दो ऐसे संगठन – ‘किसान इत्तेहाद पाकिस्तान’ और PTI का किसान विंग – विरोध प्रदर्शन की योजना बना रहे हैं।


    ऐसा लग रहा कि किसी हमले की तैयारी हो रही है

    अल जज़ीरा के पाकिस्तान संवाददाता कमाल हैदर के अनुसार, कई पाकिस्तानियों का मानना ​​है कि शहबाज शरीफ सरकार इससे घबरा गई है क्योंकि उसे पक्का नहीं पता कि इस्लामाबाद में इकट्ठा होने वाले विरोध प्रदर्शन कितने बड़े हो सकते हैं। पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ ने 22 सितंबर के एक संपादकीय में कहा, “जिस रफ़्तार से कंटेनर लगाए जा रहे हैं, खाइयां खोदी जा रही हैं और अतिरिक्त सुरक्षा बल बुलाए जा रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि सरकार किसी राजनीतिक कार्यक्रम की नहीं, बल्कि किसी हमले की तैयारी कर रही है।”


    PTI का मार्च

    बता दें कि PTI का 27 सितंबर का मार्च इमरान खान की जेल से रिहाई की मांग के लिए बुलाया गया है। खान अगस्त 2023 से जेल में हैं और अभी अल-कादिर ट्रस्ट जमीन भ्रष्टाचार मामले में 14 साल की सजा काट रहे हैं। यह उन 100 से ज्यादा मामलों में से एक है जो 2022 में सत्ता से हटाए जाने के बाद उन पर दर्ज किए गए थे। खान की रिहाई के अलावा, PTI ने पाकिस्तान में संवैधानिक अधिकारों और कानून के शासन को लेकर चिंता जताई है। वहां आसिम मुनीर ने बेमिसाल ताकतें हासिल कर ली हैं, जिसमें तीनों सशस्त्र बलों की कमान और जीवन भर के लिए कानूनी छूट शामिल है, जिससे वे असल में पाकिस्तान के शासक बन गए हैं।

    इस बीच, इस्लामाबाद पुलिस ने बुधवार को बताया कि इस्लामाबाद-पेशावर मोटरवे, इस्लामाबाद-डेरा इस्माइल खान मोटरवे और ग्रैंड ट्रंक रोड को बुधवार शाम से कई स्थानों पर बंद किया जाएगा। पुलिस ने लोगों से यात्रा की योजना उसी के अनुरूप बनाने का आग्रह किया है। पाकिस्तान के स्थानीय मीडिया के अनुसार, सड़क बंदी अनिश्चितकालीन है और इसका उद्देश्य खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के समर्थकों को 27 सितंबर को राजधानी में मार्च करने से रोकना है। खान की सेहत, विशेषकर उनकी दायीं आंख की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। उनकी आंख के उपचार के लिए कई महीनों से विशेषज्ञ चिकित्सा की आवश्यकता बताई गई है। पीटीआई ने उनकी रिहाई के लिए अभियान तेज किया है।


    दूर-दूर से आएंगे खान के समर्थक

    प्रस्तावित मार्च में लोगों के पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची से करीब 1,150 किलोमीटर और लाहौर से करीब 270 किलोमीटर की दूरी तय कर इस्लामाबाद पहुंचने की योजना है। स्थानीय मीडिया के मुताबिक, अधिकारियों ने राजधानी और उत्तर-पश्चिमी प्रांत खैबर पख्तूनख्वा से आने वाले प्रमुख मार्ग अटक पुल पर करीब 2,000 मालवाहक कंटेनर तैनात किए हैं। खैबर पख्तूनख्वा और पंजाब के बीच एक अन्य महत्वपूर्ण मार्ग हारून पुल पर भी कंटेनर और रेत की बोरियां रखी गई हैं। अटक जिले में करीब 30,000 सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है।

  • ट्रंप के वैश्विक युद्धों को रुकवाने के दावों की उनके ही मंत्री ने निकाली हवा…. भारत-पाक का भी किया जिक्र

    ट्रंप के वैश्विक युद्धों को रुकवाने के दावों की उनके ही मंत्री ने निकाली हवा…. भारत-पाक का भी किया जिक्र


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) द्वारा रोज वैश्विक युद्धों को रुकवाने के दावों की हवा उनके मंत्री ने ही निकाल दी है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (American External Affairs Minister Marco Rubio) ने हाल ही में एक ऐसा बयान दिया है जिसकी खूब चर्चा हो रही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के उच्च स्तरीय सत्र के दौरान रुबियो ने उसी वैश्विक व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, जिसे अमेरिका ने बनाया है और वर्षों से भारत जैसे देश बदलाव की मांग करते आए हैं। रुबियो ने मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए इसे पूरी तरह निष्प्रभावी तक बता दिया। इस दौरान उन्होंने भारत और पाकिस्तान का जिक्र भी किया।

    रुबियो ने अपने संबोधन में कहा कि संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाएं अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी हैं और भारत-पाकिस्तान जैसे तनावों को सुलझाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही हैं। रुबियो ने कहा कि वैश्विक निकाय उन मामलों में उलझ गए हैं जो उनके अधिकार क्षेत्र में आते ही नहीं हैं। उन्होंने कहा, “अंतरराष्ट्रीय प्रणाली इसलिए नाकाम हो रही है क्योंकि यह अपने इरादे से आगे बढ़ चुकी है। यह दुनिया के किसी भी बड़े संघर्ष को सुलझाने में असमर्थ है।” उन्होंने दावा किया कि संयुक्त राष्ट्र में एकत्र हुए कई वैश्विक नेताओं के बीच भी इस बात पर सहमति है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय प्रणाली प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रही है।


    भारत-पाकिस्तान का जिक्र

    रुबियो ने आगे कहा कि अगर सही मायने में काम करने वाली एक वैश्विक व्यवस्था मौजूद होती, तो वह अलग अलग देशों के बीच बढ़ते तनाव को समय रहते टाला जा सकता था। उन्होंने कहा, “बहुत अच्छा होता अगर हमारे पास एक बेहतर करने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रणाली होती जो थाईलैंड और कंबोडिया के बीच हुए युद्ध या भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष से निपट सकती… लेकिन अभी हमारे पास ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जो इसका समाधान कर सके।”

    हालांकि रुबियो ने अपनी बातों पर तुरंत सफाई भी दी। उन्होंने कहा कि वे अंतरराष्ट्रीय प्रणाली पर हमला नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन बातों के जरिए वे इसे अपने शुरुआती लक्ष्यों और सही भूमिका में वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं।


    ट्रंप के दावों की सच्चाई

    अब रुबियो के इस बयान के बाद ट्रंप के दावों की सच्चाई एक बार फिर सामने आई है। बता दें कि बीते साल मई में भारत और पाकिस्तान के बीच बनी जंग जैसी स्थिति के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर करवाने का दावा किया था। उन्होंने कई बार अपने दावे को दोहराया। हालांकि भारत ने बार बार स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान के गिड़गिड़ाने के बाद दोनों देशों के बीच DGMO स्तर पर हुई वार्ता के बाद ही सीजफायर पर सहमति बनी थी।

  • व्हाइट हाउस मीडिया बैन पर कोर्ट में सुनवाई, जज बोले- संस्थानों को पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं मिला

    व्हाइट हाउस मीडिया बैन पर कोर्ट में सुनवाई, जज बोले- संस्थानों को पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं मिला


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से CNN, MS NOW और Politico को व्हाइट हाउस से बैन किए जाने का मामला अब अदालत पहुंच गया है। सुनवाई के दौरान अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट जज टिमोथी केली ने प्रशासन के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहली नजर में ऐसा लगता है कि मीडिया संस्थानों को बैन से पहले अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।

    जज केली ने फिलहाल इस मामले में कोई तत्काल आदेश जारी नहीं किया है। उन्होंने कहा कि वह जल्द फैसला सुनाएंगे। तीनों मीडिया संस्थानों ने अदालत से मांग की है कि उनकी व्हाइट हाउस प्रेस एक्सेस अंतिम कानूनी निर्णय आने तक तुरंत बहाल की जाए।

    जज ने पुराने अदालती फैसलों का किया उल्लेख

    सुनवाई के दौरान जज टिमोथी केली ने अमेरिकी कोर्ट ऑफ अपील्स के दो पुराने फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इन फैसलों के मुताबिक व्हाइट हाउस की प्रेस एक्सेस वापस लेने से पहले पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को उचित प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।

    केली ने यह भी कहा कि भले ही सरकार इन पुराने अदालती फैसलों को गलत मानती हो, लेकिन डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज के तौर पर उन्हें फिलहाल इन्हीं कानूनी मिसालों का पालन करना होगा।

    उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि यदि मीडिया बैन पहले ही लागू कर दिया गया था, तो उसके बाद भेजे गए पत्र किस तरह संबंधित संस्थानों को पहले से नोटिस देने और अपना जवाब रखने का अवसर प्रदान कर सकते हैं।

    ट्रंप प्रशासन ने सुरक्षा को बनाया आधार

    ट्रंप प्रशासन की ओर से अदालत में दलील दी गई कि व्हाइट हाउस में मीडिया की पहुंच कोई कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि एक सुविधा है। सरकार का कहना है कि राष्ट्रपति को सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों से मीडिया संस्थानों की पहुंच सीमित करने का अधिकार है।

    सरकारी वकील ने यह भी दावा किया कि तीनों मीडिया संस्थानों की कुछ रिपोर्टों से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े हुए थे। प्रशासन ने अपनी दलील के समर्थन में मिसाइल भंडार, व्हाइट हाउस में बन रहे बॉलरूम और रिपब्लिकन पार्टी के मिडटर्म कन्वेंशन से जुड़ी रिपोर्टों का हवाला दिया।

    मीडिया संस्थानों ने फर्स्ट अमेंडमेंट का दिया हवाला

    CNN, MS NOW और Politico ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर किया है। तीनों संस्थानों का कहना है कि व्हाइट हाउस का बैन अमेरिकी संविधान के फर्स्ट अमेंडमेंट में दिए गए प्रेस और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के साथ-साथ उचित कानूनी प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन करता है।

    मीडिया संस्थानों ने आरोप लगाया है कि ट्रंप प्रशासन ने उन रिपोर्टों के चलते कार्रवाई की, जो राष्ट्रपति को पसंद नहीं थीं।

    यह विवाद ट्रंप और अमेरिकी मीडिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे टकराव के बीच सामने आया है। बैन के बाद कई बड़े अमेरिकी टीवी नेटवर्क ने इसके विरोध में व्हाइट हाउस की साझा वीडियो कवरेज रोकने का कदम भी उठाया था।

    2018 के जिम एकोस्टा मामले की भी चर्चा

    मौजूदा विवाद की तुलना 2018 में CNN के पत्रकार जिम एकोस्टा से जुड़े मामले से भी की जा रही है। उस समय भी जज टिमोथी केली ने व्हाइट हाउस को एकोस्टा का प्रेस पास बहाल करने का आदेश दिया था। अदालत ने उस मामले में माना था कि प्रेस पास वापस लेने से पहले उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।

    अब एक बार फिर व्हाइट हाउस और मीडिया से जुड़े मामले की सुनवाई जज केली के सामने है। फिलहाल अदालत ने CNN, MS NOW और Politico पर लगाया गया बैन हटाने का आदेश नहीं दिया है। मामले में जज केली के अगले फैसले का इंतजार है।

  • डीजल निर्यात पर रोक के पक्ष में ट्रंप, अमेरिका में रिकॉर्ड कीमतों के बीच फैसला; वैश्विक बाजार पर भी असर की आशंका

    डीजल निर्यात पर रोक के पक्ष में ट्रंप, अमेरिका में रिकॉर्ड कीमतों के बीच फैसला; वैश्विक बाजार पर भी असर की आशंका


    वाशिंगटन।
    अमेरिका में डीजल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी डीजल के निर्यात पर रोक लगाने के विचार का समर्थन किया है। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका बड़ी मात्रा में डीजल का उत्पादन करता है और यदि इसका अधिक हिस्सा घरेलू बाजार में उपलब्ध कराया जाए तो ईंधन की बढ़ती कीमतों से अमेरिकी उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है। ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने भी कहा है कि प्रशासन पूर्ण या आंशिक निर्यात प्रतिबंध की व्यवहार्यता का आकलन कर रहा है। हालांकि अभी इस संबंध में कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

    अमेरिका में 6.52 डॉलर प्रति गैलन पहुंचा डीजल

    अमेरिकन ऑटोमोबाइल एसोसिएशन (AAA) के अनुसार 22 सितंबर को अमेरिका में डीजल की राष्ट्रीय औसत खुदरा कीमत 6.5276 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गई। यह अब तक का रिकॉर्ड स्तर है। एक साल पहले यही कीमत 3.6880 डॉलर प्रति गैलन थी। यानी एक साल में डीजल की कीमत में करीब 77 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

    डीजल की कीमत बढ़ने का असर केवल निजी वाहनों तक सीमित नहीं है। अमेरिका में ट्रक, कृषि मशीनरी, निर्माण उपकरण और माल ढुलाई में डीजल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। इसलिए ईंधन महंगा होने पर परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ सकती है, जिसका असर अन्य वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

    ट्रंप ने क्या कहा?

    संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान ट्रंप ने कहा कि उन्होंने पहले भी अमेरिकी डीजल को विदेश भेजने के बजाय घरेलू बाजार में रखने की बात कही है। उनके मुताबिक इससे अमेरिकी बाजार में आपूर्ति बढ़ाई जा सकती है और डीजल के साथ पेट्रोल की कीमतों पर भी कुछ असर पड़ सकता है। बेसेंट ने कहा कि प्रशासन यह देख रहा है कि पूर्ण या आंशिक निर्यात रोक व्यावहारिक होगी या नहीं और इससे अमेरिकी रिफाइनरियों के संचालन पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

    यह मुद्दा नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले भी महत्वपूर्ण हो गया है। कई रिपब्लिकन सांसद और चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए निर्यात प्रतिबंध की मांग कर रहे हैं।

    रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व संकट का असर

    वैश्विक डीजल बाजार पहले से ही आपूर्ति दबाव का सामना कर रहा है। रूस की रिफाइनरियों पर यूक्रेनी ड्रोन हमलों, मध्य-पूर्व में संघर्ष और ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की उपलब्धता प्रभावित हुई है। रॉयटर्स के अनुसार रूस, मध्य-पूर्व और प्रमुख एशियाई आपूर्तिकर्ताओं से डीजल निर्यात जुलाई में पिछले साल की तुलना में करीब 13 लाख बैरल प्रतिदिन कम रहा।

    ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ बैठक से पहले रूसी रिफाइनरियों पर यूक्रेनी हमलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन हमलों से रूस को नुकसान हुआ है, लेकिन इसका असर डीजल की कीमतों पर भी पड़ रहा है।

    अमेरिका निर्यात रोकता है तो वैश्विक बाजार पर क्या असर?

    अमेरिका दुनिया के प्रमुख रिफाइंड ईंधन आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। अमेरिकी डीजल का एक बड़ा हिस्सा विदेशों में जाता है। ऐसे में यदि अमेरिका निर्यात पर पूर्ण या बड़ी आंशिक रोक लगाता है तो घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ सकती है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी ईंधन की कमी पैदा हो सकती है।

    इसका असर खास तौर पर यूरोप पर पड़ सकता है, जहां रूस से ऊर्जा आयात पर प्रतिबंधों के बाद अमेरिकी ईंधन की भूमिका बढ़ी है। वैश्विक बाजार पहले से ही तंग है, इसलिए अमेरिकी निर्यात घटने पर अन्य क्षेत्रों में डीजल की कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बन सकता है।

    हालांकि निर्यात रोकने से अमेरिकी घरेलू कीमतों में कितनी कमी आएगी, यह भी निश्चित नहीं है। रिफाइनरियां घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के बीच कीमतों के अंतर के आधार पर उत्पादन और बिक्री के फैसले लेती हैं। लंबे समय में निर्यात पर रोक का असर उत्पादन, रिफाइनिंग मार्जिन और आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।

    पेट्रोल की कीमतों पर असर कितना?

    ट्रंप ने संकेत दिया है कि डीजल को घरेलू बाजार में रखने से पेट्रोल की कीमतों पर भी कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि डीजल और पेट्रोल के बाजार अलग-अलग हैं और दोनों की कीमतों पर कच्चे तेल की कीमत, रिफाइनिंग क्षमता, क्षेत्रीय मांग तथा वैश्विक आपूर्ति जैसे कई कारकों का असर पड़ता है। इसलिए केवल डीजल निर्यात रोकने से पेट्रोल की कीमत कितनी घटेगी, इसका अभी कोई निश्चित अनुमान नहीं है।

    भारत पर भी पड़ सकता है अप्रत्यक्ष असर

    अमेरिकी डीजल निर्यात पर रोक का भारत पर सीधा असर इस बात पर निर्भर करेगा कि इससे वैश्विक ईंधन बाजार में आपूर्ति कितनी प्रभावित होती है। यदि अमेरिकी निर्यात में बड़ी कमी आती है और अन्य उत्पादक इसकी भरपाई नहीं कर पाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय डीजल और कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से आयात बिल और परिवहन लागत पर असर पड़ सकता है। हालांकि भारत पर वास्तविक प्रभाव कच्चे तेल की कीमत, रुपये की विनिमय दर, घरेलू ईंधन मूल्य नीति और दुनिया भर में उपलब्ध वैकल्पिक आपूर्ति पर निर्भर करेगा।

    फिलहाल अंतिम फैसला नहीं

    ट्रंप के समर्थन के बावजूद अमेरिकी प्रशासन ने डीजल निर्यात पर रोक लगाने का अंतिम फैसला नहीं किया है। सरकार पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध के संभावित लाभ और अमेरिकी रिफाइनिंग उद्योग तथा वैश्विक ईंधन बाजार पर उसके प्रभाव का आकलन कर रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में प्रशासन का फैसला अमेरिका के साथ-साथ वैश्विक डीजल बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण रहेगा।

  • एक्सप्लेनर: शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के बीच AI की जंग, मॉडल में अंतर सिर्फ 2.7%, चिप्स में कौन आगे?

    एक्सप्लेनर: शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के बीच AI की जंग, मॉडल में अंतर सिर्फ 2.7%, चिप्स में कौन आगे?

    नई दिल्ली। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 23 से 25 सितंबर तक अमेरिका की राजकीय यात्रा पर हैं। यह एक दशक से ज्यादा समय बाद उनकी वॉशिंगटन यात्रा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी के बीच होने वाली बातचीत में व्यापार, दुर्लभ खनिज, ताइवान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे मुद्दे अहम रहने वाले हैं। दोनों देशों के बीच AI को लेकर प्रतिस्पर्धा अब केवल सॉफ्टवेयर या चैटबॉट तक सीमित नहीं है। इसमें अत्याधुनिक चिप्स, डेटा सेंटर, बिजली, मॉडल और पूरे तकनीकी इकोसिस्टम की भूमिका है।

    ऐसे में सवाल है कि AI की दौड़ में अमेरिका और चीन में फिलहाल किसकी स्थिति कैसी है? इसका जवाब एक ही आंकड़े से नहीं दिया जा सकता। कुछ क्षेत्रों में अमेरिका आगे है, जबकि चीन ने मॉडल, रिसर्च, पेटेंट और औद्योगिक इस्तेमाल में बड़ी बढ़त बनाई है।

    AI मॉडल में अंतर कितना रह गया?

    स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की 2026 AI Index Report के मुताबिक अमेरिका और चीन के शीर्ष AI मॉडलों के बीच प्रदर्शन का अंतर काफी कम हो चुका है। मार्च 2026 तक शीर्ष अमेरिकी मॉडल चीनी मॉडल से केवल 2.7 प्रतिशत आगे था। रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2025 की शुरुआत से दोनों देशों के मॉडल कई बार प्रदर्शन रैंकिंग में एक-दूसरे से आगे-पीछे होते रहे हैं।

    हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि दोनों देशों की AI क्षमता हर क्षेत्र में बराबर हो गई है। अमेरिका अभी भी शीर्ष स्तर के अधिक AI मॉडल विकसित कर रहा है। 2025 में अमेरिका ने 59 उल्लेखनीय AI मॉडल विकसित किए, जबकि चीन की संख्या 35 रही। दूसरी ओर, चीन AI शोध प्रकाशनों, उद्धरणों और पेटेंट की संख्या में आगे है।

    अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत क्या है?

    अमेरिका की ताकत केवल AI मॉडल में नहीं है। उसके पास अत्याधुनिक AI चिप्स, विशाल कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा सेंटर और सेमीकंडक्टर तकनीक की मजबूत श्रृंखला है।

    स्टैनफोर्ड AI Index के अनुसार अमेरिका में 5,427 डेटा सेंटर हैं, जो किसी भी दूसरे देश की तुलना में 10 गुना से ज्यादा हैं। दुनिया के सबसे उन्नत AI चिप्स के निर्माण में ताइवान की TSMC की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। यानी अमेरिका की AI बढ़त के पीछे मॉडल के साथ-साथ कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और हार्डवेयर का पूरा नेटवर्क मौजूद है।

    AI में निजी निवेश के मामले में भी अमेरिका की बढ़त बड़ी है। स्टैनफोर्ड के अनुसार 2025 में अमेरिका का निजी AI निवेश चीन से करीब 23 गुना ज्यादा रहा। हालांकि चीन में सरकारी फंड और रणनीतिक निवेश का बड़ा हिस्सा निजी निवेश के आंकड़ों में पूरी तरह दिखाई नहीं देता।

    चीन की रणनीति क्या है?

    चीन की रणनीति AI के पूरे इकोसिस्टम को घरेलू स्तर पर विकसित करने की है। इसका मतलब केवल बड़े AI मॉडल बनाना नहीं, बल्कि उन मॉडलों को चलाने के लिए चिप्स, सर्वर, डेटा सेंटर और सॉफ्टवेयर का विकल्प तैयार करना भी है।

    अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद चीन की कंपनियां घरेलू AI चिप्स पर ज्यादा जोर दे रही हैं। Huawei अपनी Ascend श्रृंखला को आगे बढ़ा रही है, जबकि Alibaba ने Zhenwu M890 जैसे AI चिप विकसित किए हैं। मई 2026 में Alibaba ने M890 पेश करते हुए इसे Nvidia के विकल्प के तौर पर विकसित किए जा रहे घरेलू AI हार्डवेयर का हिस्सा बताया था।

    सितंबर 2026 में Alibaba ने इससे भी आगे बढ़ते हुए Zhenwu V900 चिप पेश की, जिसके बारे में कंपनी ने कहा है कि यह उसके पिछले चिप की तुलना में तीन गुना प्रदर्शन देती है। कंपनी ने 5 से 10 ट्रिलियन पैरामीटर वाला नया AI मॉडल विकसित करने की योजना भी बताई है।

    असली मुकाबला चिप्स का है

    AI मॉडल कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे प्रशिक्षित करने और चलाने के लिए भारी कंप्यूटिंग क्षमता चाहिए। यही वजह है कि AI की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में Nvidia जैसे चिप निर्माताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।

    चीन की बड़ी समस्या यह है कि उसे सबसे उन्नत AI चिप्स और उन्हें बनाने वाली अत्याधुनिक तकनीक तक अमेरिकी निर्यात नियंत्रणों के कारण सीमित पहुंच है। Huawei घरेलू विकल्प विकसित कर रही है, लेकिन उसकी चिप तकनीक अभी Nvidia के सबसे उन्नत उत्पादों से पीछे मानी जाती है। Huawei ने 2027 में नए Ascend 960DT और 960PR चिप लॉन्च करने की योजना भी घोषित की है।

    फिर चीन पीछे है या तेजी से बराबरी कर रहा है?

    दोनों बातें अलग-अलग क्षेत्रों में सही हो सकती हैं। फ्रंटियर मॉडल और अत्याधुनिक AI कंप्यूटिंग में अमेरिका की बढ़त अभी मौजूद है, लेकिन चीन ने AI मॉडल की गुणवत्ता और घरेलू तकनीकी इकोसिस्टम में अंतर तेजी से कम किया है।

    स्टैनफोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि चीन शोध प्रकाशनों, उद्धरणों और पेटेंट की संख्या में आगे है, जबकि अमेरिका ज्यादा उल्लेखनीय मॉडल और ज्यादा प्रभावशाली पेटेंट तैयार कर रहा है। चीन औद्योगिक रोबोटों की तैनाती में भी काफी आगे है। 2024 में दुनिया भर में लगाए गए औद्योगिक रोबोटों में चीन की हिस्सेदारी 54 प्रतिशत थी।

    एडवांस्ड चिप में चीन कितनी दूरी तय कर सकता है?

    Goldman Sachs के एक अनुमान के मुताबिक 7 नैनोमीटर और उससे छोटे प्रोसेस पर बनने वाले चीन के एडवांस्ड चिप्स की घरेलू सप्लाई 2025 से 2035 के बीच सालाना औसतन 46 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। इससे घरेलू आपूर्ति और मांग के बीच का अंतर 2025 के 92 प्रतिशत से घटकर 2035 तक 34 प्रतिशत रह सकता है।

    लेकिन यह एक अनुमान है, उपलब्धि नहीं। इस अनुमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती लिथोग्राफी तकनीक है। Goldman के मॉडल में चीन की घरेलू चिप उत्पादन क्षमता और उत्पादन दक्षता में बहुत तेज सुधार की जरूरत मानी गई है। इसलिए 2035 का अनुमान यह साबित नहीं करता कि चीन तब तक पूरी तरह से सेमीकंडक्टर आत्मनिर्भर हो जाएगा।

    AI की दौड़ में बिजली भी बड़ा हथियार

    AI की प्रतिस्पर्धा में चिप और मॉडल के साथ बिजली भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। बड़े AI मॉडल के प्रशिक्षण और संचालन के लिए विशाल डेटा सेंटर चाहिए, जिन्हें लगातार भारी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है।

    स्टैनफोर्ड AI Index के अनुसार AI डेटा सेंटर की बिजली क्षमता तेजी से बढ़ रही है और AI कंप्यूटिंग का ऊर्जा इस्तेमाल अब एक महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दा बन चुका है। अमेरिका के पास बड़े डेटा सेंटर नेटवर्क की बढ़त है, जबकि चीन के पास विशाल औद्योगिक आधार और बड़ी स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता है।

    तो फिलहाल कौन कितना आगे?

    मॉडल: अंतर बेहद कम हो चुका है। मार्च 2026 में शीर्ष अमेरिकी मॉडल की बढ़त 2.7 प्रतिशत थी।

    फ्रंटियर AI: अमेरिका अभी ज्यादा शीर्ष-स्तरीय मॉडल विकसित कर रहा है।

    AI रिसर्च और पेटेंट: चीन प्रकाशनों, उद्धरणों और पेटेंट संख्या में मजबूत है, जबकि अमेरिका उच्च-प्रभाव वाले पेटेंट में आगे है।

    AI चिप्स: सबसे उन्नत चिप और कंप्यूटिंग इकोसिस्टम में अमेरिका की बढ़त बनी हुई है; चीन घरेलू विकल्प तेजी से विकसित कर रहा है।

    डेटा सेंटर: अमेरिका के पास सबसे बड़ा डेटा सेंटर आधार है।

    औद्योगिक इस्तेमाल: चीन औद्योगिक रोबोटों की तैनाती में स्पष्ट रूप से आगे है।

    यानी AI की यह रेस केवल यह तय करने की नहीं है कि सबसे अच्छा चैटबॉट किस देश के पास है। असली मुकाबला मॉडल + चिप + डेटा सेंटर + बिजली + रिसर्च + मैन्युफैक्चरिंग के पूरे इकोसिस्टम का है। इसी वजह से शी जिनपिंग और ट्रंप की मौजूदा मुलाकात में AI केवल तकनीकी मुद्दा नहीं, बल्कि दोनों देशों के आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

  • ट्रंप नाकाबंदी हटाएंगे तो 7 दिन में खुल सकता है होर्मुज स्ट्रेट… ईरान ने दिए संकेत

    ट्रंप नाकाबंदी हटाएंगे तो 7 दिन में खुल सकता है होर्मुज स्ट्रेट… ईरान ने दिए संकेत


    न्यूयॉर्क।
    संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly) के दौरान ईरान और अमेरिका (Iran and America) के बीच बातचीत की कोशिशों के बीच होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) को लेकर बड़ा बयान सामने आया है. एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा है कि अगर अमेरिका सैन्य दबाव कम करता है और ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी हटाता है तो ईरान 7 दिनों के भीतर होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोल सकता है. ईरान ने यह प्रस्ताव अमेरिका तक मध्यस्थों के जरिए पहले ही पहुंचाया है।

    ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ के साथ बातचीत में होर्मुज को लेकर तेहरान की शर्तें रखीं. ईरानी पक्ष के मुताबिक, इनमें अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाना, ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियां जारी करना और सभी मोर्चों पर जंग खत्म करना शामिल है. ईरानी प्रतिनिधिमंडल को न्यूयॉर्क में बातचीत आगे बढ़ाने का अधिकार भी दिया गया है।


    गल्फ देशों ने भी बढ़ाई बातचीत की कोशिश

    होर्मुज को लेकर कूटनीतिक कोशिशें सिर्फ ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं हैं. कतर ने कहा है कि वह पाकिस्तान के साथ मिलकर तेहरान और वॉशिंगटन के बीच बातचीत का रास्ता खोलने की कोशिश कर रहा है. सऊदी अरब, मिस्र, पाकिस्तान और तुर्की ने भी बातचीत और कूटनीति का समर्थन किया है।

    अराघची ने न्यूयॉर्क में कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी से मुलाकात की. वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गल्फ देशों के नेताओं के साथ बैठक की. ट्रंप ने कहा कि अमेरिका सभी पक्षों की बात सुन रहा है और ईरान के साथ समझौते की दिशा में बातचीत आगे बढ़ सकती है।


    बातचीत के बीच जारी है सैन्य दबाव

    हालांकि बातचीत की कोशिशों के साथ दोनों तरफ से सख्त बयान भी जारी हैं. ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन के दौरान ईरान को लेकर दबाव बढ़ाने की अपील की और बाद में तेहरान से जल्द फैसला लेने को कहा।

    ईरान की तरफ से भी होर्मुज को लेकर साफ संकेत दिए गए हैं कि यह उसके लिए बातचीत में एक अहम मुद्दा है. ईरानी संसद के डिप्टी स्पीकर अली निकजाद ने कहा कि बातचीत अब होर्मुज से जुड़ गई है और ईरान स्ट्रेट को लेकर पीछे नहीं हटेगा।

    यानी न्यूयॉर्क में चल रही कूटनीतिक हलचल के बीच होर्मुज स्ट्रेट अब ईरान-अमेरिका बातचीत का सबसे अहम मुद्दा बनता दिख रहा है. ईरान ने इसे खोलने के लिए 7 दिन का संकेत दिया है, लेकिन इसके लिए अमेरिका को पहले सैन्य दबाव कम करने और ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी हटाने जैसी शर्तें माननी होंगी।

  • रूस ने यूक्रेन पर फिर किया बड़ा हमला… एक साथ दागे कई ड्रोन और मिलाइलें

    रूस ने यूक्रेन पर फिर किया बड़ा हमला… एक साथ दागे कई ड्रोन और मिलाइलें


    नई दिल्ली।
    रूस (Russia) ने यूक्रेन (Ukraine) के कई शहरों पर एक साथ कई तरह की मिसाइलों और ड्रोनों से हमला (Missiles and Drones Attack) किया. इस हमले में ओनिक्स-एम, जिरकॉन और इस्कंदर-एम जैसी मिसाइलों का इस्तेमाल बताया गया है. साथ ही सैकड़ों ड्रोन भी दागे गए. हमला 10 क्षेत्रों में हुआ जिसमें कीव, द्निप्रो और क्रिवी रीह शामिल हैं।

    यूक्रेनी बलों ने ज्यादातर खतरों को रोक लिया लेकिन कुछ हमले लक्ष्य तक पहुंच गए. इससे आग लगी, कारखाने क्षतिग्रस्त हुए और चेर्निहिव में 1 लाख लोगों को बिजली कटौती का सामना करना पड़ा. द्निप्रो में तीन या चार लोगों की मौत हुई और कई घायल हुए।

    रूस ने इस हमले को मास्को के पास यूक्रेनी हमलों का जवाब बताया. दोनों पक्ष ऊर्जा और औद्योगिक ठिकानों पर हमले बढ़ा रहे हैं. यह घटना लंबे संघर्ष के बीच तनाव को और बढ़ाने वाली साबित हुई है. हमले में विभिन्न प्रकार की मिसाइलों का मिश्रण इस्तेमाल हुआ. ओनिक्स-एम सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल है लेकिन जमीन के ठिकानों पर भी लगाई जा सकती है.

    जिरकॉन हाइपरसोनिक मिसाइल है जो तेज गति से लक्ष्य पर हमला करती है. इस्कंदर-एम बैलिस्टिक मिसाइल है जो सटीक निशाना लगाने में सक्षम है. इनके अलावा कुछ क्रूज मिसाइलें भी दागी गईं. ड्रोन की संख्या सैकड़ों में बताई गई है जो विभिन्न दिशाओं से आए।

    यूक्रेनी वायु रक्षा ने इनमें से अधिकांश को मार गिराया. कुल 186 खतरों को रोकने का दावा किया गया. बावजूद इसके कुछ मिसाइल और ड्रोन लक्ष्य तक पहुंच गए. कीव और अन्य शहरों में विस्फोट की आवाजें सुनाई दीं. औद्योगिक क्षेत्रों और ऊर्जा सुविधाओं को निशाना बनाया गया जिससे बिजली व्यवस्था प्रभावित हुई।


    नुकसान और नागरिक प्रभाव

    द्निप्रो में सबसे ज्यादा नुकसान की खबरें आईं. वहां मौतें हुईं और कई लोग घायल हुए. चेर्निहिव में बिजली कटौती से एक लाख लोग प्रभावित हुए. आग बुझाने और मलबा हटाने का काम जारी रहा. कारखानों को नुकसान पहुंचने से स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है. नागरिक इलाकों में भी हमले की खबरों ने लोगों में भय पैदा किया।

    यूक्रेनी अधिकारियों ने नागरिक ठिकानों पर हमले की निंदा की. रूस ने सैन्य और ऊर्जा लक्ष्यों को निशाना बनाने का दावा किया. दोनों पक्षों के बयान अलग-अलग हैं लेकिन जमीनी हकीकत में नुकसान साफ दिख रहा है. यह हमला यूक्रेन द्वारा मास्को के आसपास किए गए हमलों के जवाब में बताया जा रहा है।

    दोनों देश एक-दूसरे के ऊर्जा और औद्योगिक ढांचे को निशाना बना रहे हैं. ड्रोन और मिसाइल हमलों की संख्या बढ़ने से वायु रक्षा प्रणाली पर दबाव बढ़ गया है. सर्दियों के करीब आने के साथ ऊर्जा सुविधाओं पर हमले नागरिकों के लिए और मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस हमले की निंदा हुई है. संघर्ष के लंबे होते जाने से दोनों पक्ष नई रणनीति अपना रहे हैं. हाइपरसोनिक और सुपरसोनिक मिसाइलों का इस्तेमाल युद्ध की प्रकृति को बदल रहा है. बचाव और पुनर्निर्माण का काम चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

    यूक्रेन अपनी वायु रक्षा को मजबूत करने की कोशिश में लगा है. रूस लगातार हमलों से दबाव बनाए रखना चाहता है. आम नागरिकों की सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की बहाली सबसे बड़ी जरूरत है. यह हमला दिखाता है कि संघर्ष अभी भी तीव्र चरण में है और शांति की संभावनाएं फिलहाल कमजोर दिख रही हैं. दोनों पक्षों को संयम बरतने और राजनयिक समाधान तलाशने की सलाह दी जा रही है लेकिन मैदान में तनाव जारी है।

  • भारत-पाक तनाव पर UN में फिर बोले ट्रंप शहबाज शरीफ ने मुझे बताया 3 करोड़ लोगों का जीवन बचाया

    भारत-पाक तनाव पर UN में फिर बोले ट्रंप शहबाज शरीफ ने मुझे बताया 3 करोड़ लोगों का जीवन बचाया


    नई दिल्ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में हुए सैन्य तनाव को लेकर एक बार फिर बड़ा दावा किया है। 22 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने संबोधन के दौरान ट्रंप ने कहा कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष को बढ़ने से रोकने में भूमिका निभाई थी। उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में आठ संघर्षों को खत्म कराने में मदद करने का दावा भी किया। ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उन्हें पत्र लिखकर आभार जताया था और कहा था कि उनके हस्तक्षेप से करीब 3 करोड़ लोगों की जान बची।

    ट्रंप के मुताबिक भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव जिस स्तर तक पहुंच गया था उससे हालात और गंभीर हो सकते थे। उन्होंने अपने संबोधन में इस पूरे घटनाक्रम को अपने उन प्रयासों से जोड़कर पेश किया जिनके जरिए वह विभिन्न देशों के बीच संघर्ष को रोकने का दावा करते रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने उन्हें युद्ध रोकने और बड़ी संख्या में लोगों की जान बचाने के लिए धन्यवाद दिया था। हालांकि 3 करोड़ लोगों की जान बचाने का आंकड़ा ट्रंप द्वारा किया गया दावा है और इसे स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में नहीं बताया गया है।

    भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में तनाव उस समय बढ़ा था जब पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की थी। इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव की स्थिति बनी और कई दिनों तक तनाव जारी रहा। बाद में दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम हुआ। ट्रंप लंबे समय से इस घटनाक्रम को अपनी कूटनीतिक भूमिका से जोड़ते रहे हैं और अब संयुक्त राष्ट्र के मंच से उन्होंने एक बार फिर इसी दावे को दोहराया है।

    हालांकि इस घटनाक्रम को लेकर भारत का पक्ष ट्रंप के दावे से अलग रहा है। भारत ने लगातार कहा है कि सैन्य कार्रवाई रोकने का फैसला दोनों देशों के बीच सीधे संपर्क और आपसी समझ के तहत हुआ था। भारत तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के दावे को स्वीकार नहीं करता। भारत की विदेश नीति में भारत पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय तरीके से मुद्दों को सुलझाने की बात लंबे समय से कही जाती रही है। इसलिए ट्रंप के दावे और भारत के आधिकारिक रुख के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।

    पाकिस्तान की ओर से हालांकि ट्रंप की भूमिका को लेकर सकारात्मक बयान सामने आते रहे हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने पहले भी भारत के साथ हुए संघर्ष विराम में ट्रंप के हस्तक्षेप की सराहना की थी। पाकिस्तान की तरफ से ट्रंप को शांति स्थापित करने की कोशिशों के लिए धन्यवाद दिए जाने की बात ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र में भी दोहराई।

    संयुक्त राष्ट्र महासभा का 81वां सत्र 22 सितंबर से शुरू हुआ है और इसमें दुनिया के विभिन्न देशों के नेता अंतरराष्ट्रीय शांति सुरक्षा और वैश्विक चुनौतियों पर अपने विचार रख रहे हैं। ऐसे में ट्रंप का भारत पाकिस्तान संघर्ष को लेकर यह बयान एक बार फिर चर्चा में आ गया है। खास बात यह है कि ट्रंप ने इस दावे को अपने व्यापक शांति प्रयासों के हिस्से के तौर पर पेश किया जबकि भारत की ओर से संघर्ष विराम में किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की भूमिका को स्वीकार नहीं किया गया है।

  • अमेरिका-ईरान की हाई लेवल मीटिंग, न्यूयॉर्क में अराघची से मिले विटकॉफ, कुशनर भी रहे शामिल

    अमेरिका-ईरान की हाई लेवल मीटिंग, न्यूयॉर्क में अराघची से मिले विटकॉफ, कुशनर भी रहे शामिल


    नई दिल्ली। ईरान को समझौता नहीं होने पर ‘तबाह’ करने की चेतावनी देने के कुछ ही घंटे बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका और ईरान के बीच हुई अहम बातचीत की जानकारी दी। संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयॉर्क में अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर की टीम ने मध्यस्थों के जरिए ईरानी प्रतिनिधियों से बातचीत की। ईरान की ओर से विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी इस प्रक्रिया में शामिल रहे। ट्रंप ने करीब तीन घंटे चली बैठक को ‘बहुत अच्छी’ और ‘बहुत उत्पादक’ बताया।

    ट्रंप ने कहा कि विटकॉफ और कुशनर ने ईरान के साथ समझौते को लेकर मध्यस्थों से मुलाकात की। उन्होंने बातचीत को लेकर कहा कि कई चीजें अच्छी तरह आगे बढ़ रही हैं। ट्रंप के मुताबिक बैठक करीब तीन घंटे चली और इसके खत्म होने के लगभग एक घंटे बाद उन्होंने इसकी जानकारी दी। उन्होंने यह भी कहा कि जल्द ही बातचीत का अगला दौर हो सकता है।

    विटकॉफ की पहल पर हुई अराघची से मुलाकात

    ईरान की सरकारी मीडिया के मुताबिक, अमेरिकी पक्ष की पहल पर अराघची और विटकॉफ के बीच संपर्क हुआ। बातचीत में ईरान की ओर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने की शर्तें रखी गईं। रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान ने अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाने, विदेशों में फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों को जारी करने और सभी मोर्चों पर युद्ध समाप्त करने की मांग रखी है।

    अमेरिकी विशेष दूत विटकॉफ ने भी कहा कि अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधिमंडलों के बीच बातचीत मध्यस्थों के जरिए हुई। मध्यस्थ दिनभर दोनों पक्षों के बीच आते-जाते रहे। विटकॉफ ने इस दौर की बातचीत को आगे के लिए रचनात्मक और उम्मीद जगाने वाला बताया।

    होर्मुज बना बातचीत का अहम मुद्दा

    बातचीत में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज प्रमुख मुद्दों में रहा है। ईरान की ओर से कहा गया है कि अमेरिकी सैन्य दबाव और नाकाबंदी में राहत मिलने पर होर्मुज को फिर से खोलने पर चर्चा आगे बढ़ सकती है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए इसके जरिए होने वाला समुद्री आवागमन अमेरिका-ईरान तनाव का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

    UNGA में ट्रंप की ईरान को कड़ी चेतावनी

    इस बातचीत से पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में ट्रंप ने ईरान को कड़ा संदेश दिया था। उन्होंने कहा कि उनके सामने दो रास्ते हैं—ईरान के साथ ऐसा समझौता हो जिससे वह आगे बढ़ सके या फिर अमेरिका उसके खिलाफ और कठोर सैन्य कार्रवाई करे। ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

    ट्रंप ने यह आरोप भी लगाया कि ईरान अमेरिकी मध्यावधि चुनाव तक किसी समझौते को टालने की कोशिश कर रहा है। उनके भाषण के दौरान ईरानी प्रतिनिधिमंडल के कई सदस्य विरोध में हॉल से बाहर चले गए। इसके बावजूद उसी दिन न्यूयॉर्क में दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थों के जरिए बातचीत हुई, जिससे कूटनीतिक संपर्क का एक नया दौर सामने आया है।

    हालांकि, बातचीत को लेकर अभी किसी अंतिम समझौते की घोषणा नहीं हुई है। अमेरिकी और ईरानी पक्ष के बीच सैन्य दबाव, होर्मुज, प्रतिबंधों और फ्रीज संपत्तियों समेत कई मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं।

  • ट्रंप की ईरान को ‘नेस्तनाबूद’ करने की धमकी पर तेहरान का जवाब, कहा- हमला हुआ तो देंगे और भी कड़ा जवाब

    ट्रंप की ईरान को ‘नेस्तनाबूद’ करने की धमकी पर तेहरान का जवाब, कहा- हमला हुआ तो देंगे और भी कड़ा जवाब


    नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को दी गई कड़ी चेतावनी के बाद दोनों देशों के बीच तनाव फिर बढ़ गया है। ट्रंप ने कहा कि अगर ईरान के साथ समझौता नहीं होता है तो अमेरिका उसके खिलाफ और कड़ी सैन्य कार्रवाई कर सकता है। इसके जवाब में ईरान के सशस्त्र बलों के जनरल स्टाफ और खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर ने संयुक्त बयान जारी कर किसी भी हमले की स्थिति में बेहद कड़ी प्रतिक्रिया की चेतावनी दी है।

    ईरानी सैन्य कमांड ने ट्रंप के UNGA भाषण को ‘प्रोपेगेंडा’ बताया और कहा कि अमेरिकी धमकियों से ईरान की सैन्य तैयारी या उसके आकलन में कोई बदलाव नहीं आएगा। बयान के मुताबिक, किसी नए हमले की स्थिति में ईरान हमलावरों के खिलाफ पहले से अधिक गंभीर, विनाशकारी और अप्रत्याशित जवाब देने के लिए तैयार है।

    ट्रंप ने UNGA में क्या कहा?

    ट्रंप ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि ईरान को लेकर उनके सामने एक बड़ा फैसला है। उन्होंने एक समझौते की संभावना का जिक्र करते हुए कहा कि अगर डील होती है तो ईरान के पुनर्निर्माण का रास्ता खुल सकता है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने इस्लामिक रिपब्लिक को ‘नेस्तनाबूद’ करने की धमकी दी।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान पर परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश का आरोप भी लगाया। ईरान इन आरोपों को खारिज करता रहा है। ट्रंप ने अपने भाषण में ईरान पर दबाव बनाए रखने और बातचीत के जरिए समझौते की संभावना दोनों का संकेत दिया।

    धमकी के बीच बातचीत का रास्ता भी खुला

    एक ओर अमेरिका और ईरान के बीच बयानबाजी तेज हुई है, तो दूसरी ओर कूटनीतिक संपर्क भी जारी है। अमेरिकी राष्ट्रपति के दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर ने मंगलवार को ईरानी प्रतिनिधियों के साथ करीब तीन घंटे बातचीत की। यह वार्ता संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान मध्यस्थों के जरिए हुई। विटकॉफ ने कहा कि मध्यस्थ पूरे दिन दोनों पक्षों के बीच संपर्क कराते रहे और बातचीत को रचनात्मक एवं उम्मीद जगाने वाला बताया।

    ट्रंप ने भी इस बैठक को ‘बहुत अच्छी’ बताया, हालांकि उन्होंने कहा कि इसमें ईरान की ओर से उच्चतम स्तर के अधिकारी शामिल नहीं थे। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी कहा था कि ट्रंप ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से मुलाकात के लिए तैयार हैं, बशर्ते बातचीत से सकारात्मक नतीजे की संभावना हो।

    ईरानी राष्ट्रपति के UNGA संबोधन पर नजर

    ईरानी सैन्य बयान में अमेरिकी प्रतिबंधों और दबाव का भी जिक्र किया गया। तेहरान ने इन कदमों को आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिश बताया और कहा कि ऐसी धमकियों से उसका रुख नहीं बदलेगा।

    इस बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान UNGA में हिस्सा लेने न्यूयॉर्क पहुंच चुके हैं। ऐसे में उनके संबोधन पर भी नजर है। अमेरिका की ओर से सैन्य कार्रवाई की चेतावनी और दूसरी तरफ मध्यस्थों के जरिए चल रही बातचीत ने ईरान-अमेरिका टकराव के बीच कूटनीतिक प्रयासों को भी अहम बना दिया है।