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  • समुद्र और आसमान दोनों मोर्चों पर सक्रिय हुआ चीन, दक्षिण चीन सागर में बढ़ी रणनीतिक हलचल..

    समुद्र और आसमान दोनों मोर्चों पर सक्रिय हुआ चीन, दक्षिण चीन सागर में बढ़ी रणनीतिक हलचल..

    नई दिल्ली । दक्षिण चीन सागर में एक बार फिर सैन्य गतिविधियां तेज होने से क्षेत्रीय तनाव बढ़ गया है। चीन ने विवादित समुद्री क्षेत्र में अपनी नौसेना और वायुसेना की नियमित गश्त बढ़ाने की घोषणा की है। इस कदम को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब दुनिया के कई हिस्सों में समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले से ही चर्चा का विषय बनी हुई है। चीन की इस कार्रवाई के बाद फिलीपींस सहित क्षेत्र के अन्य देशों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।

    चीनी सेना के दक्षिणी थिएटर कमांड ने बताया कि नौसेना और वायुसेना ने दक्षिण चीन सागर के विभिन्न हिस्सों में नियमित संयुक्त गश्त की है। सैन्य अधिकारियों का कहना है कि इन अभियानों का उद्देश्य समुद्री सीमाओं, क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। चीन ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी सैन्य गतिविधियां नियमित सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं और वह अपने दावों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाता रहेगा।

    चीन ने इस दौरान फिलीपींस पर भी आरोप लगाए हैं। उसका कहना है कि फिलीपींस बाहरी देशों के साथ मिलकर संयुक्त सैन्य गश्त और सहयोग बढ़ा रहा है, जिससे क्षेत्र में तनाव और अस्थिरता पैदा हो रही है। चीनी अधिकारियों के अनुसार, ऐसे कदम दक्षिण चीन सागर में शांति बनाए रखने के प्रयासों के विपरीत हैं और इससे क्षेत्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

    दूसरी ओर, दक्षिण चीन सागर लंबे समय से कई देशों के बीच विवाद का केंद्र बना हुआ है। चीन लगभग पूरे समुद्री क्षेत्र पर अपना दावा करता है, जबकि फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान भी इसके विभिन्न हिस्सों पर अपने अधिकार का दावा करते हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र में समय-समय पर सैन्य गतिविधियां, गश्त और कूटनीतिक बयानबाजी तेज होती रहती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर भी इस इलाके पर बनी रहती है।

    इस विवाद की कानूनी पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। वर्ष 2016 में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने दक्षिण चीन सागर पर चीन के व्यापक दावों को कानूनी आधारहीन माना था। हालांकि चीन ने उस फैसले को स्वीकार नहीं किया और लगातार अपने दावे पर कायम रहा। इसके बाद से इस समुद्री क्षेत्र में कई बार दोनों पक्षों के जहाजों और विमानों के आमने-सामने आने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण चीन सागर वैश्विक व्यापार और समुद्री परिवहन के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। दुनिया के बड़े हिस्से का समुद्री व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में यहां बढ़ने वाला कोई भी तनाव केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन पर भी पड़ सकता है।

    चीन की ताजा सैन्य गश्त ने यह संकेत दिया है कि वह विवादित समुद्री क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखने की रणनीति पर कायम है। वहीं, क्षेत्रीय देशों की गतिविधियों और बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच दक्षिण चीन सागर एक बार फिर वैश्विक कूटनीति और सामरिक चर्चाओं का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में संबंधित देशों के बीच संवाद, सैन्य गतिविधियों और कूटनीतिक प्रयासों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी रहेगी।

  • सैन्य कार्रवाई के वीडियो में गाने के उपयोग से नाराज हुईं कैटी पेरी, कहा- मेरी मंजूरी के बिना नहीं होना चाहिए था इस्तेमाल

    सैन्य कार्रवाई के वीडियो में गाने के उपयोग से नाराज हुईं कैटी पेरी, कहा- मेरी मंजूरी के बिना नहीं होना चाहिए था इस्तेमाल


    नई दिल्ली । अमेरिकी पॉप सिंगर और गीतकार कैटी पेरी ने ईरान पर अमेरिकी सैन्य हमलों से जुड़े एक वीडियो में उनके लोकप्रिय गीत ‘Firework’ के इस्तेमाल पर कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस गाने को उपयोग करने से पहले उनसे किसी प्रकार की अनुमति नहीं ली गई थी और वह इस तरह के किसी भी उपयोग का समर्थन नहीं करती हैं। इस मामले ने एक बार फिर राजनीतिक और सैन्य संदेशों में लोकप्रिय संगीत के इस्तेमाल को लेकर बहस तेज कर दी है।

    विवाद तब सामने आया जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से प्रसारित होने लगा, जिसमें ईरान पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से जुड़े दृश्य दिखाए गए थे। वीडियो की पृष्ठभूमि में कैटी पेरी का वर्ष 2010 में रिलीज हुआ चर्चित गीत ‘Firework’ सुनाई दे रहा था। वीडियो के व्यापक रूप से साझा होने के बाद सिंगर ने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी व्यक्त की और कहा कि इस उपयोग के लिए उनकी सहमति नहीं ली गई थी।

    कैटी पेरी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सैन्य हमलों के दृश्यों के साथ उनके गीत का इस्तेमाल देखकर उन्हें गहरा आश्चर्य और दुख हुआ। उन्होंने कहा कि उनसे न तो इस संबंध में कोई अनुमति मांगी गई और न ही उन्हें इसकी जानकारी दी गई। उनके अनुसार, वह किसी भी प्रकार की हिंसा या सैन्य कार्रवाई को बढ़ावा देने वाले संदेश से अपने संगीत को जोड़कर नहीं देखना चाहतीं।

    सिंगर ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि ‘Firework’ गीत का मूल उद्देश्य लोगों को कठिन परिस्थितियों में आशा, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा देना था। उन्होंने कहा कि यह गीत आत्मबल और प्रेरणा का प्रतीक है, इसलिए इसे युद्ध या सैन्य कार्रवाई से जुड़े दृश्यों के साथ प्रस्तुत करना उसके मूल संदेश के विपरीत है। उनका मानना है कि संगीत लोगों को जोड़ने और उनका मनोबल बढ़ाने का माध्यम होना चाहिए, न कि संघर्ष या हिंसा का प्रतीक।

    कैटी पेरी लंबे समय से सामाजिक और मानवीय मूल्यों के समर्थन में अपनी राय खुलकर रखती रही हैं। वर्ष 2021 में अमेरिका के राष्ट्रपति पद के शपथ ग्रहण समारोह के अवसर पर उन्होंने इसी गीत ‘Firework’ की प्रस्तुति दी थी। उस समय भी उन्होंने इसे एकता, उम्मीद और सकारात्मक बदलाव के संदेश से जोड़ा था। यही वजह है कि मौजूदा विवाद में उन्होंने विशेष रूप से इस गीत के उद्देश्य और उसके भावनात्मक महत्व का उल्लेख किया।

    यह पहली बार नहीं है जब किसी लोकप्रिय कलाकार ने राजनीतिक या सरकारी प्रचार से जुड़े वीडियो में अपने गीत के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई हो। इससे पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय कलाकार अपने संगीत के अनधिकृत उपयोग को लेकर सार्वजनिक रूप से विरोध दर्ज करा चुके हैं। हाल के महीनों में गायिका अरियाना ग्रांडे ने भी एक वीडियो में अपने गीत के उपयोग को लेकर नाराजगी व्यक्त की थी और स्पष्ट किया था कि उनके संगीत का इस्तेमाल उनकी सहमति के बिना नहीं किया जाना चाहिए।

    इस तरह के मामलों ने बौद्धिक संपदा अधिकारों, कलाकारों की सहमति और सार्वजनिक मंचों पर रचनात्मक सामग्री के उपयोग से जुड़े कानूनी और नैतिक पहलुओं को फिर चर्चा में ला दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी रचनात्मक कृति का उपयोग उसके निर्माता की अनुमति और लागू नियमों के अनुरूप होना चाहिए, विशेषकर तब जब उसका संबंध राजनीतिक, सरकारी या सैन्य संदेशों से जुड़ा हो। कैटी पेरी की आपत्ति ने इसी संवेदनशील मुद्दे को एक बार फिर वैश्विक स्तर पर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

  • ब्राजील ने अमेरिकी अधिकारियों के वीजा आवेदन ठुकराए, चुनावी प्रक्रिया में संभावित दखल पर बढ़ी सख्ती

    ब्राजील ने अमेरिकी अधिकारियों के वीजा आवेदन ठुकराए, चुनावी प्रक्रिया में संभावित दखल पर बढ़ी सख्ती

    नई दिल्ली:  ब्राजील ने आगामी राष्ट्रपति चुनाव से पहले एक अहम कूटनीतिक निर्णय लेते हुए अमेरिकी विदेश विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारियों के वीजा आवेदन अस्वीकार कर दिए हैं। सरकार को आशंका थी कि प्रस्तावित यात्रा से ऐसे समूहों को अप्रत्यक्ष समर्थन मिल सकता है जो देश की चुनावी व्यवस्था पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। इस फैसले ने चुनावी माहौल के बीच ब्राजील और अमेरिका के संबंधों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है।

    वीजा आवेदन जिन अधिकारियों के अस्वीकार किए गए हैं, उनमें अमेरिकी विदेश विभाग के ब्यूरो ऑफ डेमोक्रेसी, ह्यूमन राइट्स एंड लेबर के सहायक सचिव रिले एम. बार्न्स और उपसहायक सचिव सैमुअल सैमसन शामिल हैं। दोनों अधिकारियों ने 20 जुलाई को ब्राजील यात्रा के लिए आवेदन किया था। प्रस्तावित कार्यक्रम के तहत वे कई प्रमुख राजनीतिक हस्तियों, चुनावी अधिकारियों और दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़े प्रतिनिधियों से मुलाकात करने वाले थे।

    जानकारी के अनुसार, दोनों अधिकारियों की यात्रा में पूर्व राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो के बेटे और राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार फ्लावियो बोल्सोनारो से मुलाकात भी शामिल थी। इसके अलावा उनकी ब्राजील के सुपीरियर इलेक्टोरल कोर्ट के अधिकारियों तथा कुछ अन्य राजनीतिक समूहों से भी चर्चा की योजना थी। ब्राजील सरकार को आशंका थी कि इस तरह की मुलाकातों का असर चुनावी माहौल पर पड़ सकता है, इसलिए वीजा आवेदन स्वीकार नहीं किए गए।

    ब्राजील के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की कि दोनों अधिकारियों के आवेदन निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्राप्त हुए थे और समीक्षा के बाद उन्हें अस्वीकार करने का निर्णय लिया गया। वहीं, इस पूरे घटनाक्रम पर अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर आगे क्या रुख अपनाया जाएगा, इस पर भी नजर बनी हुई है।

    ब्राजील में राष्ट्रपति चुनाव का पहला चरण 4 अक्टूबर को निर्धारित है। यदि किसी उम्मीदवार को आवश्यक बहुमत नहीं मिलता है तो दूसरे चरण का मतदान 25 अक्टूबर को कराया जाएगा। इस चुनाव में मौजूदा राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा और फ्लावियो बोल्सोनारो के बीच मुकाबले को देश की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चुनाव की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार विदेशी गतिविधियों और राजनीतिक संपर्कों पर विशेष सतर्कता बरत रही है।

    हाल के महीनों में ब्राजील और अमेरिका के संबंधों में कई मुद्दों को लेकर तनाव भी देखने को मिला है। पूर्व राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो और उनके बेटे एडुआर्डो बोल्सोनारो ने मई के अंत में वॉशिंगटन का दौरा किया था, जहां उन्होंने अमेरिकी अधिकारियों और तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की थी। इसके कुछ समय बाद अमेरिका ने ब्राजील के दो बड़े मादक पदार्थ तस्करी संगठनों को आतंकवादी संगठन घोषित किया और ब्राजील से आयात होने वाले हजारों उत्पादों पर 37.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का फैसला किया।

    अमेरिका ने इन कदमों को व्यापारिक अनियमितताओं और जबरन श्रम से जुड़े आरोपों के संदर्भ में उचित बताया था। हालांकि ब्राजील सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ऐसे फैसलों का उद्देश्य देश के राजनीतिक माहौल को प्रभावित करना हो सकता है। सरकार का मानना है कि चुनाव के समय किसी भी प्रकार के बाहरी प्रभाव से लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।

    ब्राजील में इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली भी लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रही है। पूर्व राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो कई अवसरों पर इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठा चुके हैं, हालांकि उन्होंने अपने दावों के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया। दूसरी ओर चुनावी अधिकारियों ने लगातार स्पष्ट किया है कि देश की इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली सुरक्षित, पारदर्शी और विश्वसनीय है। ऐसे माहौल में अमेरिकी अधिकारियों के वीजा आवेदन अस्वीकार करने का फैसला चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम माना जा रहा है।

  • ईरान पर अमेरिका ने रोके रात के हवाई हमले, उपराष्ट्रपति वेंस और जनरल कैन ने युद्ध के विस्तार पर जताई गंभीर चिंता

    ईरान पर अमेरिका ने रोके रात के हवाई हमले, उपराष्ट्रपति वेंस और जनरल कैन ने युद्ध के विस्तार पर जताई गंभीर चिंता

    नई दिल्ली । अमेरिका ने ईरान के खिलाफ पिछले कई दिनों से जारी रात के हवाई हमलों को फिलहाल रोक दिया है। इस फैसले के साथ ही वाशिंगटन में युद्ध के संभावित विस्तार, सैन्य संसाधनों की उपलब्धता और कूटनीतिक विकल्पों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। अमेरिकी प्रशासन के भीतर हुई उच्चस्तरीय बैठकों में सुरक्षा, रणनीति और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया, जिसके बाद अभियान को अस्थायी रूप से रोकने का निर्णय सामने आया।

    जानकारी के अनुसार, व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अध्यक्षता में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। बैठक के दौरान ईरान के खिलाफ जारी सैन्य कार्रवाई के प्रभाव, संभावित जोखिम और आगे की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई। इसी क्रम में अभियान को कुछ समय के लिए रोकने का फैसला किया गया।

    बताया गया कि अमेरिकी सेना ने लगभग दो सप्ताह तक लगातार रात के समय सैन्य अभियान चलाया था। इसके बाद रक्षा प्रतिष्ठान की ओर से संकेत मिला कि फिलहाल सभी अभियान ‘होल्ड’ पर रखे गए हैं। हालांकि प्रशासन की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह निर्णय स्थायी है या परिस्थितियों के अनुसार भविष्य में इसमें बदलाव किया जा सकता है।

    बैठक के दौरान जनरल डैन केन ने विशेष रूप से सैन्य हथियारों के भंडार और लंबे समय तक अभियान जारी रहने के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने उपलब्ध सैन्य विकल्पों की प्रभावशीलता पर विश्वास जताते हुए यह भी कहा कि किसी भी आगे की कार्रवाई से पहले उसके व्यापक परिणामों का गंभीरता से आकलन किया जाना आवश्यक है। माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा के बाद ही सैन्य अभियान को अस्थायी रूप से रोकने का निर्णय लिया गया।

    सूत्रों के अनुसार, हथियारों के भंडार की स्थिति बैठक में उठाए गए कई महत्वपूर्ण विषयों में से एक थी। हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यही कारण अंतिम निर्णय का आधार बना या फिर क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका और अन्य रणनीतिक कारकों ने भी इसमें भूमिका निभाई। अमेरिकी प्रशासन ने इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।

    व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया कि अमेरिका अब भी कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देता है। प्रशासन का कहना है कि यदि ईरान क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियां जारी रखता है या अपने सहयोगियों के माध्यम से सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न करता है, तो अमेरिका के पास सभी विकल्प उपलब्ध रहेंगे। साथ ही यह भी संकेत दिया गया कि प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के बाद ईरान के लिए बातचीत का रास्ता अपनाना अधिक व्यावहारिक होगा।

    बैठक के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अमेरिकी अधिकारी ईरान के साथ संपर्क बनाए हुए हैं और विभिन्न स्तरों पर संवाद जारी है। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य की रणनीति परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। यदि आवश्यक हुआ तो सैन्य अभियान दोबारा शुरू किया जा सकता है या उसकी तीव्रता भी बढ़ाई जा सकती है। उनके अनुसार, मौजूदा बातचीत में ईरान पहले की तुलना में अधिक गंभीर रुख अपनाता दिखाई दे रहा है।

    अमेरिका के इस कदम को पश्चिम एशिया की बदलती सुरक्षा स्थिति के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि कूटनीतिक प्रयास कितने सफल होते हैं और आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच तनाव कम होता है या सैन्य गतिविधियां फिर से तेज होती हैं। ऐसे में क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा पर इस घटनाक्रम का प्रभाव लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।

  • नेतन्याहू की गिरफ्तारी पर कानूनी अधिकार न होने की बात मानने के बाद भी घिरे ममदानी, यहूदी समुदाय की चिंताएं बरकरार

    नेतन्याहू की गिरफ्तारी पर कानूनी अधिकार न होने की बात मानने के बाद भी घिरे ममदानी, यहूदी समुदाय की चिंताएं बरकरार

    नई दिल्ली ।न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी के हालिया बयान ने एक बार फिर इजरायल और यहूदी समुदाय से जुड़े राजनीतिक विवाद को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ममदानी ने स्पष्ट किया है कि उनके पास इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को गिरफ्तार करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। हालांकि, इस स्वीकारोक्ति के बावजूद उनके पूर्व बयानों और इजरायल को लेकर उनके रुख पर उठ रहे सवाल अभी भी शांत नहीं हुए हैं।

    ममदानी ने हाल ही में जारी एक वीडियो संदेश में कहा कि न्यूयॉर्क सिटी प्रशासन के पास किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री की गिरफ्तारी का अधिकार नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी दोहराया कि उनके अनुसार नेतन्याहू को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) के वारंट के तहत जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर नई बहस शुरू हो गई।

    यह मुद्दा इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि मेयर चुनाव अभियान के दौरान ममदानी ने नेतन्याहू की संभावित गिरफ्तारी का उल्लेख किया था। उस समय कई कानूनी विशेषज्ञों ने कहा था कि न्यूयॉर्क के मेयर के पास ऐसा कोई संवैधानिक या कानूनी अधिकार नहीं है। अब स्वयं ममदानी ने भी इस सीमा को स्वीकार किया है, लेकिन उनके पहले दिए गए बयानों को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुआ है।

    न्यूयॉर्क के यहूदी समुदाय के कई प्रतिनिधियों ने कहा है कि मौजूदा स्पष्टीकरण उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं है। उनका मानना है कि ऐसे बयान ऐसे समय में सामने आए हैं, जब यहूदी विरोधी घटनाओं और सामाजिक तनाव को लेकर पहले से ही संवेदनशील माहौल बना हुआ है। समुदाय के कुछ नेताओं ने आशंका जताई कि सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों के बयान समाज में मतभेद और अविश्वास को बढ़ा सकते हैं।

    कई यहूदी संगठनों के प्रतिनिधियों ने हाल के वर्षों में इजरायल-हमास संघर्ष के दौरान हुए प्रदर्शनों का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक विमर्श में जिम्मेदारी और संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। उनका कहना है कि राजनीतिक नेताओं के शब्दों का व्यापक प्रभाव पड़ता है और किसी भी बयान को ऐसे संदर्भ में देखा जाता है, जहां सामाजिक सौहार्द और सामुदायिक विश्वास प्रभावित हो सकता है।

    दूसरी ओर, इजरायली नेताओं की ओर से भी ममदानी के रुख पर प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने न्यूयॉर्क में रहने वाले यहूदी समुदाय की सुरक्षा और उनके प्रति बढ़ती चिंताओं का उल्लेख करते हुए ऐसे बयानों पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि सार्वजनिक जीवन में संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर टिप्पणी करते समय सभी पक्षों के हितों और सामाजिक प्रभावों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक कानूनी प्रश्न तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति, स्थानीय नेतृत्व और सामुदायिक संबंधों से भी जुड़ गया है। ऐसे मामलों में विभिन्न पक्षों के अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते हैं, जिससे सार्वजनिक बहस और तेज हो जाती है। फिलहाल ममदानी के स्पष्टीकरण के बावजूद यह मुद्दा न्यूयॉर्क की राजनीति और यहूदी समुदाय के साथ उनके संबंधों को लेकर चर्चा का विषय बना हुआ है।

  • US ने 13 दिन बाद रोके हमले…, जहाज पर अटैक को लेकर अब यूक्रेन-ईरान के बीच ठनी

    US ने 13 दिन बाद रोके हमले…, जहाज पर अटैक को लेकर अब यूक्रेन-ईरान के बीच ठनी


    तेहरान।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में पिछले दो हफ्तों से लगातार बढ़ रहे तनाव के बीच अचानक बड़ा मोड़ आया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने शुक्रवार को अमेरिकी सेना को ईरान पर नए हवाई हमले नहीं करने का निर्देश दिया. इससे पहले ट्रंप लगातार 13 दिनों तक हर दिन सैन्य हमलों की मंजूरी दे रहे थे. वहीं दूसरी तरफ अब ईरान और यूक्रेन में एक जहाज पर हमले को लेकर ठनी हुई है. लेकिन पहले ईरान और अमेरिका की खबर समझ लेते हैं।

    भारतीय समय के मुताबक हर सुबह 5 बजे से पहले अमेरिकी सेंट्रल कमांड एक्स पर पोस्ट करके बताता था कि वह हमले कर रहा है. लेकिन 25 जुलाई को ऐसा कोई भी पोस्ट नहीं आया. हालांकि ट्रंप ने साफ किया कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका दोबारा हमले शुरू कर सकता है, लेकिन फिलहाल उनकी प्राथमिकता बातचीत के जरिए समाधान निकालना है।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका चाहे तो हमले जारी रख सकता है या उन्हें और तेज कर सकता है. लेकिन उन्होंने इसे ‘समझौते का सही समय’ बताते हुए कहा कि ईरान के साथ बातचीत चल रही है और उन्हें लगता है कि तेहरान अब पहले से ज्यादा गंभीर नजर आ रहा है. एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी दौरान ओमान का एक प्रतिनिधिमंडल ईरान पहुंचा, जहां होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने से जुड़े संभावित समझौते पर बातचीत हुई. रिपोर्ट का दावा है कि इस बातचीत में कुछ प्रगति हुई है।


    इजरायल भी था बड़े हमले की तैयारी में

    रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल के सुरक्षा तंत्र को उम्मीद थी कि शुक्रवार को अमेरिका ईरान पर एक और बड़ा हमला करेगा. इसी आशंका के चलते इजरायली सेना और सुरक्षा कैबिनेट हाई अलर्ट पर थे. बाद में उन्हें जानकारी दी गई कि ट्रंप ने नए हमलों की मंजूरी नहीं दी।


    यूक्रेन पर भड़का ईरान

    इसी बीच ईरान ने एक अलग मोर्चे पर यूक्रेन के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया है. ईरान के विदेश मंत्रालय ने आरोप लगाया कि कैस्पियन सागर जो रूस और ईरान को जोड़ता है वहां एक वाणिज्यिक जहाज पर यूक्रेन ने हमला किया. इस हमले में एक नाविक की मौत हो गई और दूसरा घायल हो गया. ईरान ने इस घटना को संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन बताते हुए तेहरान में यूक्रेन के प्रभारी राजनयिक को तलब किया. विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख से बातचीत में भी इस घटना की निंदा करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से कार्रवाई की मांग की. वहीं ईरान से जुड़े कई टेलीग्राम चैनलों ने ईरानी मिसाइलों की रेंज दिखाते हुए धमकी दे रहे हैं कि कि वह यूक्रेन तक हमला कर सकते हैं।


    यूक्रेन का क्या कहना है?

    यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की ने इससे पहले कहा था कि उनकी सेना ने कैस्पियन सागर में एक रूसी युद्धपोत और ईरान से जुड़े सैन्य सामान ले जा रहे जहाजों को निशाना बनाया है. जेलेंस्की ने यह आरोप भी लगाया कि रूस खाड़ी देशों और क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सैटेलाइट तस्वीरें ईरान को उपलब्ध करा रहा है, ताकि ईरान हमलों की योजना बना सके. इन आरोपों पर रूस की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

  • कभी एशिया का सबसे आधुनिक इलाका था उत्तर कोरिया, आज क्यों कहलाता है दुनिया का सबसे रहस्यमयी देश?

    कभी एशिया का सबसे आधुनिक इलाका था उत्तर कोरिया, आज क्यों कहलाता है दुनिया का सबसे रहस्यमयी देश?


    नई दिल्ली। आज उत्तर कोरिया का नाम आते ही दुनिया से कटे हुए एक ऐसे देश की तस्वीर सामने आती है, जहां कड़े सरकारी नियंत्रण, परमाणु हथियार, सीमित स्वतंत्रता और बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह अलग-थलग व्यवस्था है। लेकिन करीब आठ-नौ दशक पहले तस्वीर बिल्कुल अलग थी। आज का उत्तर कोरिया कभी पूरे कोरियाई प्रायद्वीप का सबसे विकसित, औद्योगिक और आधुनिक क्षेत्र माना जाता था।

    इतिहास से जुड़े दस्तावेज बताते हैं कि 1948 में उत्तर कोरिया के गठन और किम इल सुंग के सत्ता में आने से पहले यह क्षेत्र एकीकृत कोरिया का हिस्सा था। उस समय राजधानी प्योंगयांग शिक्षा, संस्कृति और ईसाई धर्म का प्रमुख केंद्र थी। बड़ी संख्या में चर्च, मिशनरी स्कूल और आधुनिक शिक्षण संस्थान मौजूद थे। इसी वजह से प्योंगयांग को कभी “पूर्व का यरुशलम” भी कहा जाता था। यहां लोगों को धार्मिक आस्था और सामाजिक जीवन में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी।

    औद्योगिक विकास में था सबसे आगे
    1910 से 1945 के बीच जापान के औपनिवेशिक शासन के दौरान कोरियाई प्रायद्वीप के उत्तरी हिस्से को औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया। यहां खनिज संपदा, कोयला और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के कारण बड़े स्टील प्लांट, जलविद्युत परियोजनाएं, रासायनिक कारखाने और रेलवे नेटवर्क विकसित किए गए। उस समय दक्षिणी क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था, जबकि उत्तर तकनीकी और औद्योगिक रूप से अधिक मजबूत माना जाता था।

    विभाजन के बाद बदल गई तस्वीर
    द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद 1945 में कोरिया को 38वीं समानांतर रेखा के आधार पर दो हिस्सों में बांट दिया गया। उत्तरी भाग सोवियत संघ के प्रभाव में आया और 1948 में किम इल सुंग के नेतृत्व में उत्तर कोरिया की स्थापना हुई। इसके बाद 1950 से 1953 तक चले कोरियाई युद्ध ने देश के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया। भारी बमबारी में शहर, उद्योग और बुनियादी ढांचा नष्ट हो गया।

    युद्ध के बाद सोवियत संघ और चीन की आर्थिक सहायता से उत्तर कोरिया ने तेज़ी से पुनर्निर्माण किया और 1970 के दशक तक उसकी अर्थव्यवस्था कई मामलों में दक्षिण कोरिया के बराबर या उससे बेहतर मानी जाती थी।

    ‘जुचे’ नीति और अलगाव की शुरुआत
    बाद के वर्षों में किम इल सुंग ने ‘जुचे’ (आत्मनिर्भरता) की नीति अपनाई, जिसके तहत देश ने बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह दूरी बना ली। 1990 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद आर्थिक सहायता और सस्ते तेल की आपूर्ति बंद हो गई, जिससे उत्तर कोरिया गंभीर आर्थिक संकट और अकाल की चपेट में आ गया। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, उस दौर में भुखमरी और कुपोषण से बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई।

    दक्षिण और उत्तर कोरिया की अलग राह
    जहां दक्षिण कोरिया ने लोकतांत्रिक व्यवस्था और खुली अर्थव्यवस्था को अपनाते हुए तकनीक और उद्योग के क्षेत्र में वैश्विक पहचान बनाई, वहीं उत्तर कोरिया ने सीमित संसाधनों का बड़ा हिस्सा रक्षा और परमाणु कार्यक्रमों पर केंद्रित किया। समय के साथ दोनों देशों के आर्थिक और सामाजिक विकास में बड़ा अंतर पैदा हो गया।

    सख्त नियंत्रण वाली व्यवस्था
    उत्तर कोरिया में नागरिकों के जीवन पर सरकारी नियंत्रण बेहद कड़ा माना जाता है। वहां सामाजिक स्थिति का निर्धारण कथित ‘सोंगबुन’ व्यवस्था के आधार पर किया जाता है, जिसमें परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि और शासन के प्रति निष्ठा को महत्व दिया जाता है। शिक्षा व्यवस्था में भी शासन और नेतृत्व से जुड़े विषयों पर विशेष जोर दिया जाता है।

    देश के भीतर आवागमन, सूचना तक पहुंच और इंटरनेट जैसी सुविधाओं पर भी व्यापक नियंत्रण है। बाहरी दुनिया से सीमित संपर्क और बंद व्यवस्था के कारण उत्तर कोरिया आज भी दुनिया के सबसे रहस्यमयी देशों में गिना जाता है।

    कभी औद्योगिक प्रगति, आधुनिक शिक्षा और आर्थिक विकास का केंद्र रहा यह क्षेत्र आज अपनी राजनीतिक व्यवस्था, सीमित खुलापन और वैश्विक अलगाव के कारण पूरी दुनिया में अलग पहचान रखता है।

  • होर्मुज और लाल सागर के बाद ब्लैक सी पर बढ़ी चिंता, भारत ने समुद्री कर्मचारियों के लिए जारी किए सुरक्षा निर्देश

    होर्मुज और लाल सागर के बाद ब्लैक सी पर बढ़ी चिंता, भारत ने समुद्री कर्मचारियों के लिए जारी किए सुरक्षा निर्देश


    नई दिल्ली ।
    रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध का असर अब समुद्री मार्गों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। ब्लैक सी क्षेत्र में बढ़ते सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए भारत सरकार ने जहाजों पर कार्यरत भारतीय नाविकों और समुद्री कर्मचारियों के लिए विस्तृत एडवाइजरी जारी की है। सरकार ने सलाह दी है कि किसी भी समुद्री यात्रा या नई नियुक्ति से पहले संबंधित क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति, रोजगार की शर्तों और आपातकालीन व्यवस्थाओं की पूरी जानकारी अवश्य प्राप्त कर लें। इस कदम का उद्देश्य भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और संभावित जोखिमों को कम करना है।

    विदेश मंत्रालय की ओर से जारी परामर्श में कहा गया है कि ब्लैक सी और उससे जुड़े समुद्री क्षेत्रों में मौजूदा समय में हालात संवेदनशील बने हुए हैं। युद्ध के कारण व्यावसायिक जहाजों पर हमलों का खतरा बना हुआ है और समुद्री गतिविधियां लगातार प्रभावित हो रही हैं। ऐसे माहौल में जहाजों पर कार्यरत कर्मचारियों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। सरकार ने विशेष रूप से उन भारतीय नाविकों को सावधानी बरतने की सलाह दी है, जो इस क्षेत्र से होकर गुजरने वाले जहाजों पर कार्यरत हैं या नई नियुक्ति के लिए जाने वाले हैं।

    हाल के दिनों में यूक्रेन के ओडेसा बंदरगाह के पास एक व्यावसायिक जहाज पर हुए हमले ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया है। उस जहाज पर भारतीय नागरिक भी सवार थे। घटना के बाद कुछ भारतीय सुरक्षित पाए गए, जबकि अन्य की तलाश और स्थिति को लेकर प्रयास जारी रहे। इस घटनाक्रम ने ब्लैक सी क्षेत्र में कार्यरत समुद्री कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने समय रहते एहतियाती सलाह जारी की है।

    एडवाइजरी में नाविकों से कहा गया है कि किसी भी जहाज पर कार्यभार संभालने से पहले यह सुनिश्चित करें कि उन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधा, बीमा सुरक्षा और आपातकालीन निकासी जैसी व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। इसके साथ ही रोजगार अनुबंध की शर्तों की भी सावधानीपूर्वक जांच करने की सलाह दी गई है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों और सुरक्षा मानकों के अनुरूप हैं। सरकार का मानना है कि पूर्व तैयारी और सही जानकारी संभावित संकट की स्थिति में जोखिम को काफी हद तक कम कर सकती है।

    विदेश मंत्रालय ने यह भी उल्लेख किया है कि अप्रैल 2026 से अब तक रूस-यूक्रेन संघर्ष से जुड़े घटनाक्रमों में कई भारतीय नागरिकों की जान जा चुकी है। ऐसे मामलों को देखते हुए सरकार लगातार भारतीय नाविकों और समुद्री क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों को सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश जारी कर रही है। अधिकारियों ने सभी संबंधित एजेंसियों और शिपिंग कंपनियों से भी सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा है।

    इस बीच वैश्विक समुद्री व्यापार पहले से ही कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रहा है। अमेरिका-ईरान तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता बनी हुई है, जबकि लाल सागर में भी सुरक्षा संबंधी घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों को प्रभावित किया है। अब ब्लैक सी में बढ़ते जोखिम ने वैश्विक शिपिंग उद्योग की चिंताओं को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन समुद्री क्षेत्रों में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा परिवहन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है। ऐसे में भारत सरकार की यह एडवाइजरी भारतीय नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण एहतियाती कदम मानी जा रही है।

  • राष्ट्रीय सुरक्षा पर अमेरिका सख्त विदेशी हस्तक्षेप और सीमापार दमन रोकने के लिए नया कानून लाने की पहल

    राष्ट्रीय सुरक्षा पर अमेरिका सख्त विदेशी हस्तक्षेप और सीमापार दमन रोकने के लिए नया कानून लाने की पहल


    अमेरिका  अमेरिका में राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। अमेरिकी सीनेट में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों दलों के सांसदों ने मिलकर एक नया विधेयक पेश किया है जिसका उद्देश्य विदेशी सरकारों या उनके एजेंटों द्वारा अमेरिकी धरती पर कथित सीमापार दमन की घटनाओं पर सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना है। स्टॉप ट्रांसनेशनल रिप्रेशन एक्ट नामक यह प्रस्ताव पहली बार ऐसे मामलों की स्पष्ट संघीय कानूनी परिभाषा तय करने और दोषियों के खिलाफ कठोर दंड का प्रावधान करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

    यह विधेयक कैलिफोर्निया के डेमोक्रेट सीनेटर एडम शिफ और यूटा के रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कर्टिस ने संयुक्त रूप से पेश किया है। दोनों सांसदों का कहना है कि हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें विदेशी सरकारों पर अमेरिका में रह रहे असंतुष्टों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पत्रकारों और अन्य लोगों को डराने धमकाने उनकी निगरानी करने या उन पर हमले की साजिश रचने के आरोप लगे हैं। उनका मानना है कि मौजूदा कानूनी ढांचे को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है ताकि ऐसी गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।

    प्रस्तावित कानून के तहत यदि किसी व्यक्ति को सीमापार दमन से जुड़े संघीय अपराध में दोषी पाया जाता है तो उसे अधिकतम 10 वर्ष की अतिरिक्त कैद और 100000 अमेरिकी डॉलर तक के अतिरिक्त जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। इसके साथ ही पहली बार ट्रांसनेशनल रिप्रेशन को संघीय आपराधिक कानून में स्पष्ट रूप से परिभाषित करने का प्रस्ताव रखा गया है ताकि जांच और अभियोजन की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और एकरूप हो सके।

    विधेयक के अनुसार ऐसे मामलों में अभियोजन की निगरानी अमेरिकी न्याय विभाग के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभाग के अधीन होगी जबकि आपराधिक जांच की जिम्मेदारी एफबीआई को सौंपी जाएगी। इसके अलावा कांग्रेस को हर वर्ष सीमापार दमन से जुड़े मामलों पर विस्तृत रिपोर्ट और ब्रीफिंग देना अनिवार्य होगा। संघीय एजेंसियों को यह भी निर्देश दिया जाएगा कि वे मौजूदा कानूनी अधिकारों की समीक्षा करें और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से होने वाले संभावित सीमापार दमन से निपटने के लिए व्यापक रणनीति तैयार करें।

    सीनेटर एडम शिफ ने कहा कि अमेरिका की धरती पर किसी भी विदेशी सरकार द्वारा असंतुष्टों या आलोचकों को डराने धमकाने या चुप कराने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती। उनके अनुसार यह केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का मामला नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का भी प्रश्न है। वहीं सीनेटर जॉन कर्टिस ने कहा कि चाहे कोई भी विदेशी सरकार हो उसे अमेरिका की संप्रभुता और नागरिकों की स्वतंत्रता को चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने इस विधेयक को राष्ट्रीय हित और कानून के शासन को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया।

    प्रस्तावित कानून में सीमापार दमन की परिभाषा के अंतर्गत किसी विदेशी सरकार उसके एजेंट या उसके सहयोगियों द्वारा अमेरिका या अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ की जाने वाली धमकी उत्पीड़न प्रतिशोध शारीरिक नुकसान अपहरण या हत्या जैसी गतिविधियों को शामिल किया गया है। साथ ही ऐसे प्रयास भी इस दायरे में आएंगे जिनका उद्देश्य किसी व्यक्ति को अमेरिकी संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का उपयोग करने से रोकना हो।

    हाल के वर्षों में इस तरह के मामलों को लेकर अमेरिका में चिंता बढ़ी है और कानून प्रवर्तन एजेंसियां कई कथित मामलों की जांच कर चुकी हैं। इसी पृष्ठभूमि में लाया गया यह विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और अमेरिका में रहने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

  • भारत रोमानिया संबंधों को नई मजबूती राष्ट्रपति मुर्मु ने बुखारेस्ट में भारतीय समुदाय की सराहना की विकसित भारत 2047 में योगदान का किया आह्वान

    भारत रोमानिया संबंधों को नई मजबूती राष्ट्रपति मुर्मु ने बुखारेस्ट में भारतीय समुदाय की सराहना की विकसित भारत 2047 में योगदान का किया आह्वान


    नई दिल्ली। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु अपने तीन देशों के विदेश दौरे के अंतिम चरण में रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट पहुंचीं जहां उन्होंने भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए भारत और रोमानिया के संबंधों को नई ऊर्जा देने वाला संदेश दिया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्तों की सबसे मजबूत नींव सरकारों के बीच सहयोग से अधिक लोगों के बीच आत्मीय संबंध हैं। राष्ट्रपति ने प्रवासी भारतीयों की सराहना करते हुए कहा कि वे अपनी मेहनत प्रतिभा और समर्पण से न केवल रोमानिया के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं बल्कि भारत की संस्कृति और मूल्यों को भी पूरे सम्मान के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।

    राष्ट्रपति मुर्मु ने अपने संबोधन में कहा कि बुखारेस्ट पहुंचने पर जिस तरह भारतीय संस्कृति की झलक देखने को मिली उससे ऐसा महसूस हुआ मानो वह किसी विदेशी देश में नहीं बल्कि भारत के ही किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम में मौजूद हों। उन्होंने विशेष रूप से उन बच्चों और युवाओं की प्रशंसा की जिन्होंने भारतीय पारंपरिक परिधान और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यह भारतीय समुदाय की एकजुटता और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत उदाहरण है।

    उन्होंने कहा कि आज भारतीय आईटी इंजीनियर वैज्ञानिक शोधकर्ता स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े विशेषज्ञ और विद्यार्थी बड़ी संख्या में रोमानिया में अपनी पहचान बना रहे हैं। उनका ज्ञान अनुभव और पेशेवर योगदान रोमानिया की अर्थव्यवस्था और समाज को नई दिशा देने में मदद कर रहा है। साथ ही उनकी उपलब्धियां भारत की सकारात्मक छवि को भी वैश्विक स्तर पर मजबूत कर रही हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि विदेशों में रहने वाले भारतीय वास्तव में भारत के सांस्कृतिक और सामाजिक राजदूत हैं जो दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग को और मजबूत बनाते हैं।

    राष्ट्रपति मुर्मु ने विकसित भारत 2047 के राष्ट्रीय संकल्प का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत एक समृद्ध आधुनिक आत्मनिर्भर और समावेशी राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने प्रवासी भारतीयों से इस अभियान में सक्रिय भागीदारी बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि चाहे भारतीय दुनिया के किसी भी हिस्से में रहते हों उनका अनुभव नवाचार और उपलब्धियां भारत की प्रगति को नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि भारतीय समुदाय भविष्य में भी भारत और रोमानिया के संबंधों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में अहम योगदान देगा।

    इस अवसर पर राष्ट्रपति ने रोमानिया की सरकार और वहां की जनता का भी आभार व्यक्त किया जिन्होंने भारतीय समुदाय का खुले दिल से स्वागत किया और उन्हें सुरक्षित तथा सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच बढ़ता सहयोग आने वाले वर्षों में व्यापार शिक्षा विज्ञान प्रौद्योगिकी स्वास्थ्य और सांस्कृतिक आदान प्रदान जैसे अनेक क्षेत्रों में नए अवसर पैदा करेगा।

    इससे पहले बुखारेस्ट यूनिवर्सिटी ऑफ इकोनॉमिक स्टडीज ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। इस अवसर पर उन्होंने भारत और रोमानिया के शैक्षणिक संस्थानों के बीच संयुक्त शोध छात्र और शिक्षक आदान प्रदान तथा नवाचार के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता डिजिटल तकनीक और विज्ञान के नए युग में प्रवेश कर रही है तब शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारी केवल ज्ञान देना नहीं बल्कि नैतिकता संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों को भी आगे बढ़ाना है। उनके अनुसार शिक्षा ही एक न्यायपूर्ण समावेशी और प्रगतिशील समाज की सबसे मजबूत आधारशिला है।