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  • हवाई हमले करके लौट जाते हो, सीरियस हो तो सेना भेजो’, ईरान ने अमेरिका को दी जमीनी लड़ाई की चुनौती

    हवाई हमले करके लौट जाते हो, सीरियस हो तो सेना भेजो’, ईरान ने अमेरिका को दी जमीनी लड़ाई की चुनौती


    तेहरान।
    ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य तनाव के बीच ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रेजाई ने अमेरिका को जमीनी लड़ाई में उतरने की चुनौती दी है। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका अपने सैन्य अभियान को लेकर गंभीर है तो उसे अपने सैनिक ईरान भेजने चाहिए। रेजाई ने सवाल उठाया कि अमेरिकी सेना जमीनी कार्रवाई से क्यों बच रही है और केवल हवाई हमले करके वापस लौट रही है।

    रेजाई ने कहा कि युद्ध में अंततः जमीनी सेना निर्णायक भूमिका निभाती है। उनके इस बयान को अमेरिका की मौजूदा दूर से हमला करने वाली सैन्य रणनीति पर ईरान की प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा रहा है।

    अमेरिकी हमले की स्थिति में जवाब की चेतावनी

    रेजाई ने दावा किया कि ईरान ने अमेरिका के खिलाफ अपनी सैन्य रणनीति में बदलाव किया है और वह संभावित अमेरिकी हवाई हमले का जवाब देने के लिए पहले की तुलना में अधिक तैयार है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका ने दोबारा हमला किया तो ईरान क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अन्य अमेरिकी हितों के खिलाफ हमले तेज कर सकता है।

    रेजाई के इन सैन्य दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। हालांकि, हालिया बयानों में उन्होंने कहा है कि ईरान भविष्य में किसी अमेरिकी हमले की स्थिति को गंभीरता से ले रहा है और उसके जवाब की तैयारी कर रहा है।

    ईरान में जमीनी अभियान आसान नहीं

    ईरान में बड़े पैमाने पर जमीनी सैन्य अभियान किसी भी बाहरी शक्ति के लिए जटिल चुनौती हो सकता है। देश का बड़ा भूभाग पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों वाला है तथा उसकी आबादी भी काफी बड़ी है। ऐसे में व्यापक जमीनी अभियान के लिए बड़ी संख्या में सैनिकों, लंबी आपूर्ति व्यवस्था और लगातार सैन्य मौजूदगी की आवश्यकता होगी।

    अमेरिका ने अब तक ईरान के खिलाफ मुख्य रूप से हवाई हमलों और दूर से हमला करने वाली सैन्य क्षमताओं का इस्तेमाल किया है। दूसरी ओर, ईरान ने क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अमेरिकी हितों को निशाना बनाने की रणनीति अपनाने की चेतावनी दी है।

    सैन्य बयानबाजी के बीच बातचीत का रास्ता खुला

    दिलचस्प बात यह है कि सैन्य बयानबाजी के बावजूद ईरान ने बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है। रेजाई ने हालिया साक्षात्कार में बताया कि कतर के माध्यम से अमेरिका तक युद्ध समाप्त करने की ईरान की शर्तें पहुंचाई गई हैं और तेहरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जवाब का इंतजार कर रहा है।

    रेजाई के मुताबिक ईरान ने युद्ध खत्म करने के लिए तीन प्रमुख शर्तें बताई हैं—सभी मोर्चों पर युद्ध समाप्त करना, ईरान की जब्त की गई या फ्रीज की गई धनराशि जारी करना और अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त करना। उन्होंने यह भी कहा कि यदि इन शर्तों पर प्रगति नहीं होती तो ईरान किसी निर्णायक युद्ध के लिए तैयार है।

    कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता

    ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत दोबारा शुरू कराने के प्रयासों में कतर और पाकिस्तान की भूमिका बनी हुई है। दोनों देशों ने पिछले समझौते के समाप्त होने के बाद बातचीत का रास्ता फिर खोलने के लिए मध्यस्थता की कोशिशें जारी रखी हैं। रेजाई के अनुसार कतर ने ईरान की शर्तें अमेरिका तक पहुंचाई हैं और अब तेहरान वाशिंगटन के जवाब की प्रतीक्षा कर रहा है।

    इस तरह ईरान की मौजूदा रणनीति में एक ओर संभावित अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का जवाब देने की तैयारी और कड़े बयान शामिल हैं, वहीं दूसरी ओर मध्यस्थों के जरिए बातचीत का चैनल भी खुला हुआ है। स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष सैन्य टकराव के बीच कूटनीतिक संपर्क को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।

  • ईरान युद्ध पर अमेरिका का खर्च 45 अरब डॉलर के पार, हर महीने 2-3 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ

    ईरान युद्ध पर अमेरिका का खर्च 45 अरब डॉलर के पार, हर महीने 2-3 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ

    वॉशिंगटन। ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष अमेरिका के लिए लगातार महंगा साबित हो रहा है। अमेरिकी सैन्य आकलन के मुताबिक, फरवरी में शुरू हुए युद्ध पर अब तक करीब 45.1 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं। यह राशि नेपाल की सालाना अर्थव्यवस्था के आकार के आसपास बैठती है। वहीं, अमेरिकी कांग्रेस के गैर-पक्षपाती बजट कार्यालय (CBO) ने 1 अगस्त तक युद्ध की प्रत्यक्ष लागत करीब 38 अरब डॉलर आंकी थी।

    ताजा 45.1 अरब डॉलर का आंकड़ा अमेरिकी रक्षा विभाग की ओर से कांग्रेस के समक्ष साझा किए गए आकलन से जुड़ा है। इसमें युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए हथियारों और सैन्य उपकरणों की भरपाई समेत अन्य परिचालन खर्च शामिल हैं। हालांकि, मध्य पूर्व में क्षतिग्रस्त अमेरिकी सैन्य ठिकानों की पूरी मरम्मत का खर्च इसमें शामिल नहीं है।

    पुराने अनुमान से बढ़ी युद्ध की लागत

    CBO ने सितंबर में बताया था कि 28 फरवरी से 1 अगस्त 2026 तक ईरान युद्ध पर अमेरिका के रक्षा विभाग की लागत करीब 38 अरब डॉलर रही। एजेंसी के मुताबिक, संघर्ष जारी रहने पर इसकी लागत हर महीने लगभग 2 से 3 अरब डॉलर और बढ़ सकती है।

    वहीं, अमेरिकी सेंट्रल कमांड से जुड़े हालिया आकलन में युद्ध की लागत सितंबर की शुरुआत तक करीब 43.6 अरब डॉलर बताई गई थी। इसमें करीब 28 अरब डॉलर इस्तेमाल किए गए हथियारों और गोला-बारूद की भरपाई तथा 4.3 अरब डॉलर से अधिक उपकरणों के नुकसान से संबंधित खर्च शामिल था। अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हुए नुकसान की भविष्य की मरम्मत लागत इसमें शामिल नहीं थी।

    हर महीने बढ़ सकता है 2 से 3 अरब डॉलर का बोझ

    CBO का अनुमान है कि युद्ध की तीव्रता के आधार पर अमेरिका को हर महीने करीब 2 से 3 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च करने पड़ सकते हैं। इसका मतलब है कि संघर्ष लंबा खिंचने पर अमेरिकी रक्षा बजट पर दबाव और बढ़ सकता है। युद्ध के कारण अमेरिकी हथियार भंडार पर भी दबाव पड़ा है और इस्तेमाल किए गए कुछ हथियारों की भरपाई में कई वर्ष लगने का अनुमान सामने आया है।

    इसके अलावा, मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हुए नुकसान की मरम्मत और उपकरणों के पुनर्निर्माण का खर्च अलग से जुड़ सकता है। इसलिए युद्ध की अंतिम लागत मौजूदा अनुमानों से अधिक होने की संभावना बनी हुई है।

    होर्मुज को लेकर ईरान का रुख सख्त

    इस बीच ईरान ने रणनीतिक होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने को लेकर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने कहा है कि जब तक ईरान की शर्तें पूरी नहीं होतीं और अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं को लागू नहीं करता, तब तक होर्मुज को फिर से खोलने की स्थिति नहीं बनेगी।

    गालिबाफ ने कहा कि ईरान को एक साथ सैन्य और कूटनीतिक दोनों रास्तों पर आगे बढ़ना होगा। उनके मुताबिक, ईरान सैन्य क्षमता के जरिए अपने विरोधियों का मुकाबला करेगा और उचित समय पर कूटनीति के जरिए युद्धक्षेत्र में हासिल बढ़त को मजबूत करेगा।

    कतर के जरिए अमेरिका तक पहुंचाई गईं शर्तें

    ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत दोबारा शुरू करने के लिए सात शर्तें कतर के माध्यम से भेजे जाने की बात कही है। ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रेजाई के मुताबिक, तेहरान अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जवाब का इंतजार कर रहा है। इन शर्तों में युद्ध समाप्त करना, नौसैनिक नाकाबंदी हटाना और ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों से जुड़े मुद्दे शामिल बताए गए हैं। ईरान ने हालांकि सभी सात शर्तों की आधिकारिक पूरी सूची सार्वजनिक नहीं की है।

    गालिबाफ के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि तेहरान बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं कर रहा, लेकिन वह इसे अपनी घोषित शर्तों से जोड़ रहा है।

    वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर

    ईरान-अमेरिका संघर्ष और होर्मुज में जारी बाधाओं का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहा है। होर्मुज दुनिया के प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में से एक है। यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है।

    CBO ने भी चेतावनी दी है कि ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर अमेरिकी महंगाई पर पड़ सकता है। उसके अनुमान के अनुसार, 2027 की पहली तिमाही में व्यक्तिगत उपभोग व्यय (PCE) महंगाई दर पहले के अनुमान की तुलना में करीब 0.5 प्रतिशत अंक अधिक हो सकती है।

    इस तरह ईरान युद्ध का असर केवल अमेरिकी सैन्य खर्च तक सीमित नहीं है, बल्कि हथियार भंडार, रक्षा बजट, ऊर्जा कीमतों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भी पड़ रहा है। संघर्ष जितना लंबा चलेगा, अमेरिका और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसकी वित्तीय लागत उतनी ही बढ़ सकती है।

  • कनाडा का यूरोप की ओर बढ़ा कदम, मैक्रों ने ईयू का सहयोगी सदस्य बनाने के प्रस्ताव का किया समर्थन; कार्नी से रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा

    कनाडा का यूरोप की ओर बढ़ा कदम, मैक्रों ने ईयू का सहयोगी सदस्य बनाने के प्रस्ताव का किया समर्थन; कार्नी से रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा

    नई दिल्ली । फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कनाडा के यूरोपीय संघ का पहला एसोसिएट सदस्य बनने के प्रस्ताव का समर्थन किया। साथ ही, उन्होंने और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अंतरिक्ष, रक्षा, ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्रों में रणनीतिक संबंध और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाए।

    दोनों नेताओं की मुलाकात रविवार को सेंट-पियरे-ए-मिकेलॉन में हुई। यह न्यूफाउंडलैंड के तट के पास स्थित फ्रांस का एक इलाका है, जहां फ्रांस और कनाडा के बीच की दूरी बस कुछ ही किलोमीटर है। अमेरिका के साथ बिगड़ते रिश्तों के बीच कनाडा का यूरोप की ओर तेजी से झुकाव हो रहा है। इसके साथ ही यह जगह इस बदलाव के लिए एक दिलचस्प पृष्ठभूमि है।

    कार्नी के साथ खड़े होकर मैक्रों ने फ्रेंच भाषा में कहा कि वे यूरोपीय संघ के साथ करीबी रिश्ते बनाने के एजेंडे के बहुत ज्यादा पक्ष में हैं। उन्होंने कहा कि यह रिश्ता संघ के सहयोगी सदस्य के तौर पर हो या फिर यूरोपीय समुदाय के पूर्ण सदस्य के तौर पर। वहीं, कार्नी ने फ्रेंच भाषा में कहा कि कनाडा और फ्रांस के बीच सबसे नजदीकी बिंदु पर सिर्फ कुछ किलोमीटर की दूरी है और दोनों देशों के मूल्य और भी ज्यादा करीब हैं।

    किन क्षेत्रों में सहयोग देने की हुई बात?

    कार्नी ने कहा कि दोनों देश अपनी स्पेस एजेंसियों और रक्षा मंत्रालयों को लॉन्च सिस्टम और जमीन पर आधारित रिसेप्शन सुविधाओं जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने और साझा करने का काम सौंपेंगे। वे ऊर्जा, टेलीकम्युनिकेशन, जलवायु के प्रति लचीलेपन और आर्थिक विकास के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमत हुए।

    मैक्रों का यह समर्थन यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन की ओर से कनाडा को ईयू का पहला एसोसिएट सदस्य बनाने का प्रस्ताव रखने के कुछ दिनों बाद आया है।

    कनाडा यूरोप के साथ संबंध मजबूत क्यों कर रहा?

    कार्नी ने इस संभावना का स्वागत किया और तर्क दिया कि यूरोप के साथ गहरे संबंध कनाडा को और अधिक विकल्प देंगे। इससे उसे किसी एक देश की ओर से आने वाले आर्थिक दबाव के प्रति कम संवेदनशील बनाया जा सकेगा। ट्रंप के टैरिफ, आर्थिक रियायतों की मांग और कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बार-बार की बातों ने यूरोप की ओर इस झुकाव को तेज कर दिया है।

    ट्रंप ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक नक्शा भी पोस्ट किया था, जिसमें कनाडा और सेंट-पियरे-एट-मिकेलॉन सहित पूरे उत्तरी अमेरिका पर अमेरिकी झंडा दिखाया गया था।

    मैक्रों ने रविवार को सेंट-पियरे-एट-मिकेलॉन हवाई अड्डे पर कार्नी का स्वागत किया। यह न्यूफाउंडलैंड के तट के पास स्थित लगभग 5,800 लोगों की आबादी वाला फ्रांसीसी क्षेत्र है। मैक्रों ने कहा कि कनाडा महत्वपूर्ण खनिजों और रेयर अर्थ के महत्वपूर्ण संसाधनों वाला देश है। यह तेल और प्राकृतिक गैस का भी एक प्रमुख उत्पादक है।

    मैक्रों ने कहा कि दोनों देश अधिक लिक्विफाइड नेचुरल गैस सुरक्षित करने के लिए समझौते करना चाहते हैं, जिसे यूरोप के अटलांटिक तट पर भेजा जा सके।

    कार्नी के कार्यालय ने एक बयान में कहा कि नेताओं ने एयरोस्पेस, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और क्वांटम कंप्यूटिंग, उपग्रहों और सुपरकंप्यूटिंग जैसी उन्नत तकनीकों पर भी चर्चा की।

  • चीन को साधने का प्रयास… US ने दिया AI से जुड़ी घटनाओं के लिए नई सूचना व्यवस्था का प्रस्ताव

    चीन को साधने का प्रयास… US ने दिया AI से जुड़ी घटनाओं के लिए नई सूचना व्यवस्था का प्रस्ताव


    न्यूयॉर्क।
    अमेरिका (America) ने चीन (China) के साथ बातचीत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) (Artificial Intelligence – AI) से जुड़ी घटनाओं के लिए नई सूचना व्यवस्था का प्रस्ताव रखा है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट (American Treasury Secretary Scott Bessent) ने रविवार को कहा कि इस व्यवस्था के तहत एआई से जुड़ी ऐसी घटनाओं की जानकारी साझा की जा सकेगी, जिनसे राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

    यह प्रस्ताव इस सप्ताह व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) के बीच होने वाली बातचीत से पहले हुई चर्चा का हिस्सा है। न्यूयॉर्क में चीन के उपप्रधानमंत्री हे लिफेंग के साथ बातचीत के बाद बेसेंट ने कहा कि अमेरिका साझा लक्ष्यों और साझा खतरों को लेकर एक समान दृष्टिकोण चाहता है।


    एआई शक्तियों के बीच हो पारदर्शिता : स्कॉट बेसेंट

    स्कॉट बेसेंट ने कहा कि दुनिया की नंबर एक और नंबर दो एआई शक्तियों के बीच पारदर्शिता बढ़ाना जरूरी है। बेसेंट ने कहा, “हमारा मानना है कि किसी भी सीमा पार गतिविधि की तरह, दुनिया की नंबर एक और नंबर दो एआई शक्तियों के बीच अपारदर्शिता से अधिक पारदर्शिता की ओर बढ़ना बहुत महत्वपूर्ण है।” ट्रंप एआई विकास धीमा करने के सुझावों का विरोध कर चुके हैं। उनका कहना है कि ऐसा करने से चीन को अमेरिकी कंपनियों की बराबरी करने का मौका मिल सकता है।


    अमेरिका-चीन में व्यापार वार्ता को लेकर बनी सहमति

    रविवार देर रात जेपी मॉर्गन चेज के मुख्यालय की लॉबी में बेसेंट और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर ने कहा कि इस सप्ताह ट्रंप और शी के बीच होने वाली बातचीत के लिए आधार तैयार हो चुका है। दोनों नेताओं की बैठक आगामी गुरुवार को होने वाली है।

    बेसेंट और ग्रीर ने बताया कि दोनों देश एक नई ‘व्यापार परिषद’ को अमल में लाने पर सहमत हुए हैं। इस व्यवस्था पर ट्रंप और शी ने मई में बीजिंग में मुलाकात के दौरान चर्चा की थी। ग्रीर ने कहा, “आज वे विचार वास्तविकता बन गए हैं।”

    कम संवेदनशील वस्तुओं पर कम शुल्क की चर्चा
    ग्रीर ने कहा कि दोनों देश अभी भी इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि किन ‘गैर-संवेदनशील’ वस्तुओं को कम शुल्क की श्रेणी में रखा जा सकता है। संभावित सूची में उपभोक्ता वस्तुएं, कृषि उत्पाद, ऊर्जा उत्पाद और चिकित्सा उपकरण शामिल हो सकते हैं। दोनों देशों के बीच हुई ताजा चर्चा ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और चीन एआई, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अपने संबंधों को लेकर बातचीत कर रहे हैं।

  • सऊदी अरब में हूती के हमलों के बाद US में बड़ा अलर्ट… यात्रा के लिए अनुमति लेना अनिवार्य

    सऊदी अरब में हूती के हमलों के बाद US में बड़ा अलर्ट… यात्रा के लिए अनुमति लेना अनिवार्य


    वाशिंगटन।
    यमन (Yemen) के हूती समूह (Houthi Group) के मिसाइल और ड्रोन हमलों (Missile- Drone Attacks) के बाद सऊदी अरब (Saudi Arabia) में सुरक्षा को लेकर अमेरिका ने बड़ा अलर्ट जारी किया है। अमेरिकी मिशन ने सऊदी अरब में काम कर रहे अपने सरकारी कर्मचारियों को ताइफ और यनबू शहरों की यात्रा के लिए विशेष अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया है। यह नियम सरकारी काम के साथ-साथ निजी यात्रा पर भी लागू होगा। अमेरिकी मिशन ने कहा कि यह फैसला मौजूदा सुरक्षा स्थिति को देखते हुए लिया गया है। साथ ही सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी नागरिकों से सतर्क रहने और सुरक्षा निर्देशों का पालन करने को कहा गया है।


    हूतियों ने सऊदी अरब को कैसे निशाना बनाया?

    यह अमेरिकी अलर्ट ऐसे समय आया है जब हूती समूह ने सऊदी अरब की ओर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। इनमें राजधानी रियाद की ओर दागी गई एक बैलिस्टिक मिसाइल भी शामिल है। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने कहा कि मिसाइल को रास्ते में ही रोक दिया गया। गठबंधन ने बिश, ताइफ, फरासन और यनबू में नागरिक आबादी और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की कोशिशों की भी जानकारी दी है। रियाद में एयरपोर्ट के पास विस्फोट और धुएं का बड़ा गुबार दिखाई देने की खबर भी सामने आई, हालांकि सऊदी अधिकारियों के मुताबिक इस घटना में किसी के हताहत होने या नुकसान की सूचना नहीं है।


    अमेरिका ने सऊदी अरब में रहने वाले नागरिकों को क्या कहा?

    अमेरिकी मिशन ने अपने नागरिकों से सतर्क रहने, स्थानीय मीडिया और सरकारी घोषणाओं पर नजर रखने तथा फोन चार्ज रखने को कहा है। हवाई हमले की स्थिति में लोगों को खिड़कियों और कांच के दरवाजों से दूर रहने की सलाह दी गई है। अमेरिका ने लोगों से प्रदर्शन और बड़ी भीड़ से बचने तथा ऐसे स्थानों पर अतिरिक्त सावधानी बरतने को भी कहा है, जिन्हें सार्वजनिक रूप से अमेरिका से जुड़ा माना जाता है। अमेरिकी विदेश विभाग सऊदी अरब के लिए फिलहाल लेवल-3 ‘यात्रा पर पुनर्विचार करें’ की सलाह दे रहा है। इसमें ड्रोन और मिसाइल हमलों, सशस्त्र संघर्ष और आतंकवाद का खतरा बताया गया है।


    ईरान ने अमेरिका और उसके सहयोगियों को क्या चेतावनी दी?

    सऊदी अरब पर हमलों के बीच ईरान ने भी अमेरिका और उसके सहयोगियों को कड़ी चेतावनी दी है। ईरानी सैन्य केंद्रीय कमान ने रविवार को सरकारी मीडिया पर कहा कि अगर अमेरिका और उसके सहयोगी कोई नया बड़ा हमला करते हैं तो ईरान अमेरिका के खिलाफ लगातार जवाबी कार्रवाई करेगा। ईरान ने यह भी कहा कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिका के सहयोगियों को संघर्ष का पक्ष माना जाएगा। हालांकि, ईरान ने उस कथित हमले की कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी, जिसकी तैयारी होने की बात उसने कही है।


    कतर ने हूती हमलों पर क्या कहा?

    कतर ने रियाद को निशाना बनाकर किए गए बैलिस्टिक मिसाइल हमले और बिश, ताइफ, फरासन तथा यनबू में नागरिक आबादी और बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की कोशिशों की कड़ी निंदा की है। कतर के विदेश मंत्रालय ने इन हमलों को सऊदी अरब की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया और सऊदी अरब के साथ एकजुटता जताई है। इस बीच अमेरिका ने पश्चिम एशिया की यात्रा करने या वहां से गुजरने वाले अपने नागरिकों को भी सतर्क रहने को कहा है। अमेरिकी चेतावनी में उड़ानें रद्द होने और हवाई क्षेत्र बंद होने जैसी संभावित परेशानियों का भी जिक्र किया गया है।

  • Russia: पुतिन की पार्टी फिर बहुमत की ओर…! ससदीय चुनाव में मिले 57.54% से अधिक वोट

    Russia: पुतिन की पार्टी फिर बहुमत की ओर…! ससदीय चुनाव में मिले 57.54% से अधिक वोट


    मास्को।
    रूस (Russia) में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (President Vladimir Putin) की पार्टी को एक बार फिर से स्पष्ट बहुमत मिलने के आसार हैं। पुतिन लंबे समय से रूस की सत्ता पर काबिज हैं। इस वर्ष कराए गए चुनाव में भी पार्टी के समर्थकों ने बंपर वोटिंग (Massive Voter turnout) की है। केंद्रीय चुनाव आयोग (Central Election Commission) की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक पुतिन की पार्टी- यूनाइटेड रूस (Putin’s Party – United Russia) को 57 प्रतिशत से अधिक वोट मिले हैं। अंतिम आंकड़े आने पर वोट प्रतिशत में बदलाव संभव है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नीतियों का विरोध लगभग नदारद रहा। क्रेमलिन का वर्चस्व मजबूत होने की उम्मीद है। मतदान में धांधली और इलेक्ट्रॉनिक मतदान में समस्याओं की रिपोर्ट्स भी सामने आईं।


    चुनाव नतीजों में क्या खास, किस दल का कैसा प्रदर्शन?

    रूस के केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने रविवार देर रात (रूसी समय) जारी एक बयान में कहा, चुनाव के शुरुआती परिणाम आ गए हैं। सत्तारूढ़ दल- यूनाइटेड रूस को 57.54% से अधिक वोट मिले हैं। इन प्रारंभिक नतीजों के आधार पर माना जा रहा है कि पुतिन की सत्ता पर पकड़ और मजबूत होगी। खास बात ये भी है कि यूक्रेन के साथ वर्ष 2022 में शुरू हुए सैन्य टकराव के बाद पहली बार आम चुनाव कराए गए हैं।

    रूस के केंद्रीय चुनाव आयोग ने बताया कि मतदान शुक्रवार को 11 करोड़ 10 लाख पात्र मतदाताओं के लिए शुरू हुआ था। इसमें यूक्रेन के उन चार क्षेत्रों के निवासी भी शामिल थे, जिन्हें मॉस्को ने युद्ध के बाद अवैध रूप से अपने साथ मिलाया था, पर अभी भी उन पर पूर्ण नियंत्रण नहीं है। क्रीमिया के निवासी भी मतदान में शामिल थे, जिसे रूस ने 2014 में अवैध रूप से अपने साथ मिलाया था। कीव और यूरोपीय संघ ने रूसी-नियंत्रित क्षेत्रों में हुए मतदान को अवैध बताया। उन्होंने विदेशी सरकारों से परिणामों को मान्यता न देने का आग्रह किया। रूस और यूक्रेन के रूसी-नियंत्रित क्षेत्रों में मतदान समाप्त होने के बाद भी, पश्चिमी समय क्षेत्रों में दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों में मतदान जारी रहा। क्रेमलिन इस संसदीय चुनाव को युद्ध के लिए जन समर्थन दिखाने और अपनी कार्रवाई को वैध बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।


    क्रेमलिन की मुख्य पार्टी को भारी बहुमत

    प्रारंभिक परिणामों से पता चला है कि चार अन्य पार्टियां जो लगभग हमेशा क्रेमलिन के पक्ष में मतदान करती हैं, संसद के निचले सदन- स्टेट ड्यूमा में उनकी वापसी तय है। केंद्रीय चुनाव आयोग के अनुसार लगभग 58% मतदान केंद्रों की गिनती हो चुकी है। पार्टी सूचियों के आधार पर आवंटित 225 सांसदों में से यूनाइटेड रूस को लगभग 58% वोट मिले हैं।

    225 अन्य सांसदों का चुनाव एकल-सीट चुनावों में होगा, यूनाइटेड रूस उनमें भी अधिकांश सीटें जीतने की स्थिति में है। इस चुनाव में अधिकांश विपक्षी दलों को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया, और यह चुनाव सोवियत काल के बाद से रूस में सबसे कठोर राजनीतिक दमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघन के माहौल में हुआ।

    क्रेमलिन ने असंतोष को दबाकर राजनीतिक जोखिमों से बचने की कोशिश की है। एक बड़े राज्य मीडिया अभियान और वास्तविक विपक्ष की अनुपस्थिति में चुनाव पर कड़ा नियंत्रण क्रेमलिन को रूसी राजनीति पर अपनी पकड़ बनाए रखने में मदद करेगा। यह बढ़ती आर्थिक लागतों और यूक्रेनी ड्रोन हमलों के बीच हो रहा है। मतदाताओं ने दो अलग-अलग मतपत्र डाले, जिससे डूमा की आधी सीटें भरी गईं। बाकी सीटों पर एकल-सीट निर्वाचन क्षेत्रों में व्यक्तिगत उम्मीदवारों को चुना गया। मुख्य क्रेमलिन पार्टी, यूनाइटेड रूस, से निचले सदन, स्टेट डूमा पर अपना भारी नियंत्रण बनाए रखने की उम्मीद है। ‘सिस्टेमिक विपक्ष’ की छोटी पार्टियां भी अपनी उपस्थिति बनाए रखेंगी।


    क्या क्रेमलिन का नियंत्रण मजबूत होगा?

    क्रेमलिन इस संसदीय चुनाव को युद्ध के लिए जन समर्थन दिखाने का माध्यम मानता है, जो 2022 में यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के बाद पहला चुनाव है। यह अपनी कार्रवाई को वैध बनाने का भी प्रयास कर रहा है। उसने किसी भी असंतोष को दबाकर राजनीतिक जोखिमों से बचने की कोशिश की है। एक बड़े राज्य मीडिया अभियान और वास्तविक विपक्ष की अनुपस्थिति में चुनाव पर कड़ा नियंत्रण है। यह क्रेमलिन को रूसी राजनीति पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने में मदद करेगा। यह बढ़ती आर्थिक लागतों और यूक्रेनी ड्रोन हमलों के बीच हो रहा है। मतदाता डूमा की 450 सीटों के लिए दो अलग-अलग मतपत्र डालते हैं; आधे सीटों के लिए राजनीतिक दल चुने जाते हैं, जबकि बाकी के लिए व्यक्तिगत उम्मीदवार। मुख्य क्रेमलिन पार्टी, यूनाइटेड रूस, से निचले सदन, स्टेट डूमा पर अपना भारी नियंत्रण बनाए रखने की उम्मीद है। ‘सिस्टेमिक विपक्ष’ की छोटी पार्टियां भी अपनी उपस्थिति बनाए रखेंगी।


    मॉस्को में इलेक्ट्रॉनिक मतदान में क्या समस्याएं आईं?

    रूस के केंद्रीय चुनाव आयोग की प्रमुख एला पामफिलोवा ने रविवार को बताया कि मॉस्को में इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली को साइबर हमलों का निशाना बनाया गया। उन्होंने इसके लिए ‘सिस्टेमिक पार्टियों’ में से एक को दोषी ठहराया, पर किसी का नाम नहीं लिया। एक स्वतंत्र रूसी समाचार आउटलेट- सोता विजन, ने रविवार को मॉस्को के मतदान केंद्रों पर इलेक्ट्रॉनिक पंजीकरण प्रणाली में तकनीकी खराबी की सूचना दी। आउटलेट ने टेलीग्राम पर बताया कि लोगों को कागजी मतपत्र नहीं दिए गए, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक टर्मिनल से मतदान करने को कहा गया। दिवंगत रूसी विपक्षी नेता एलेक्सी नवालनी के करीबी सहयोगी लियोनिद वोल्कोव ने सुझाव दिया कि कागजी मतपत्र प्रणाली का खराब होना जानबूझकर किया गया हो सकता है। इसका उद्देश्य मतदाताओं को इलेक्ट्रॉनिक मतदान की ओर धकेलना था। उन्होंने रविवार को एक्स पर ‘कागजी मतपत्र की मांग करें!’ लिखा। कई मतदाताओं ने इलेक्ट्रॉनिक मतदान से इनकार कर दिया, जिससे मतदान केंद्रों के बाहर कतारें लग गईं। यबलोको पार्टी के नेता निकोलाई राइबाकोव ने सेंट पीटर्सबर्ग में एक मतपत्र डाला, जिस पर ‘स्वतंत्रता के लिए,’ ‘शांति के लिए,’ और ‘यबलोको’ लिखा देखा गया।


    विदेशों में रूसी विपक्ष ने कैसे विरोध किया?

    एलेक्सी नवालनी की विधवा यूलिया नवालनाया सहित रूस के निर्वासित विपक्ष ने युद्ध-विरोधी रूसियों से रविवार दोपहर मतदान करने का आह्वान किया। आर्मेनिया में रहने वाले हजारों रूसियों ने मतदान में भाग लिया। वे राजधानी येरेवन में रूसी दूतावास के बाहर कतार में खड़े थे। उनमें से कुछ ‘शांतिपूर्ण रूस के लिए दोपहर’ नामक युद्ध-विरोधी प्रदर्शन में शामिल हुए। उन्होंने युद्ध-विरोधी और पुतिन-विरोधी पोस्टर पकड़े हुए थे। पत्रकार मार्क पोडबेरेज़िन ने कहा कि येरेवन में चुनाव आयोग के सदस्यों ने ऐसी टिप्पणियां कीं जो ‘खुले तौर पर डराने-धमकाने’ वाली थीं। उन्होंने सुना था कि ‘आपको देर-सबेर रूस लौटना होगा, इसे ध्यान में रखें।’ लिडिया क्लिमेंको ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि उनके वोट का कोई वास्तविक प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सबसे उपयोगी काम ‘अन्य लोगों को देखना था जो युद्ध के खिलाफ हैं, एक साझा उद्देश्य में एक साथ होना।’ जर्मनी में, मतदाताओं ने बर्लिन में रूसी दूतावास में अपने मतपत्र डाले। असंतुष्ट और ओपन रूस समूह के पूर्व प्रमुख आंद्रेई पिवोवारोव ने इमारत के बाहर एकत्रित विरोध प्रदर्शन को संबोधित किया।

  • इटली के स्कूलों में बुर्का और नकाब पहनने पर लगेगा प्रतिबंध… PM मेलोनी ने किया ऐलान

    इटली के स्कूलों में बुर्का और नकाब पहनने पर लगेगा प्रतिबंध… PM मेलोनी ने किया ऐलान


    रोम।
    इतालवी प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी (Italian Prime Minister Giorgia Meloni) ने एक बड़ा नीतिगत बदलाव प्रस्तावित किया है। उन्होंने घोषणा की कि उनकी सरकार जल्द ही एक उपाय पेश करेगी। इस उपाय के तहत इतालवी स्कूलों (Italian schools) में बुर्का और नकाब (Burqa and Niqab) पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। साथ ही, कक्षाओं में विदेशी छात्रों (Foreign Students) की संख्या भी सीमित की जाएगी। यह घोषणा प्रवासन और सांस्कृतिक एकीकरण को लेकर उनकी सरकार के सख्त रुख को दर्शाती है।

    इटली आने वाले लोगों को हमारी भाषा सीखनी चाहिए
    मेलोनी ने अपनी राष्ट्रवादी रूढ़िवादी पार्टी ब्रदर्स ऑफ इटली के युवा विंग को संबोधित किया। उन्होंने बताया कि प्रस्तावित उपाय में एक और महत्वपूर्ण प्रावधान होगा। इसके तहत उन विदेशी छात्रों के माता-पिता के लिए इतालवी भाषा के पाठ अनिवार्य किए जाएंगे। ये वे माता-पिता होंगे जिन्हें ‘स्कूल प्रणाली में एकीकृत होने में गंभीर कठिनाइयां’ आ रही हैं। मेलोनी ने रोम में जियोवेंटु नाज़ियोनेल राष्ट्रीय उत्सव में एक जोरदार तालियों के बीच कहा। उन्होंने स्पष्ट किया, ‘हमारे लिए, जो कोई भी इटली आता है और यहां अपना भविष्य बनाना चाहता है, उसे हमारी भाषा सीखनी चाहिए।’ उन्होंने आगे कहा, ‘उन्हें हमारी संस्कृति को समझना चाहिए और हमारे नियमों का सम्मान करना चाहिए।’ मेलोनी ने इस बात पर जोर दिया कि ‘यह उनका स्वागत करने का एकमात्र गंभीर तरीका है।’


    क्या है बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध का प्रस्ताव?

    मेलोनी ने विशेष रूप से बुर्का पर प्रतिबंध का उल्लेख किया है। बुर्का एक ऐसा पहनावा है जो कुछ मुस्लिम महिलाएं पहनती हैं और पूरे शरीर को ढकता है। उन्होंने नकाब पर भी प्रतिबंध की बात की। नकाब सबसे रूढ़िवादी मुस्लिम महिलाएं पहनती हैं, जिसमें केवल आंखें ही दिखती हैं। हालांकि, मेलोनी ने रविवार को (20 सितंबर) अपने संबोधन में हिजाब का कोई जिक्र नहीं किया। हिजाब एक सिर पर पहना जाने वाला स्कार्फ है जो कुछ मुस्लिम महिलाएं पहनती हैं। सरकार द्वारा इस उपाय को मंजूरी मिलने के बाद, इसे कानून बनने के लिए संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता होगी। यह अनुमोदन 60 दिनों के भीतर प्राप्त करना अनिवार्य होगा।

    प्रवासन पर मेलोनी का क्या रुख है?
    मेलोनी की राजनीतिक जड़ें धुर-दक्षिणपंथी विचारधारा में गहराई से जमी हुई हैं। वह प्रवासन के मुद्दे पर लगातार सख्त और आक्रामक रुख अपनाती रही हैं। प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने अपनी राजनीतिक स्थिति में बदलाव देखा है। वह एक राष्ट्रवादी बाहरी व्यक्ति से यूरोपीय संघ के राजनेताओं के बीच एक स्थापित और प्रभावशाली व्यक्ति बन गई हैं। उनकी नीतियां अक्सर इटली की राष्ट्रीय पहचान और सुरक्षा को प्राथमिकता देती हैं। यह उनके राजनीतिक एजेंडे का एक केंद्रीय बिंदु रहा है।


    क्यों उठाए जा रहे हैं ये नए नीतिगत कदम?

    मेलोनी अगले साल होने वाले आम चुनाव से पहले अपनी लोकप्रियता को और बढ़ाना चाहती हैं। इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वह कई नई नीतियां पेश कर रही हैं। इन नीतियों में छोटे और मध्यम आकार की कारों और स्कूटरों पर लगने वाले संपत्ति कर से छूट देना भी शामिल है। यह एक ऐसा कर है जिससे लोग काफी नाखुश थे। इस महीने की शुरुआत में, मेलोनी का रूढ़िवादी प्रशासन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इटली का सबसे लंबे समय तक निर्बाध रूप से सेवा करने वाला सरकार बन गया। यह उपलब्धि उनकी राजनीतिक स्थिरता और देश में उनके बढ़ते प्रभाव को दर्शाती है। ये कदम मतदाताओं को आकर्षित करने और उनकी सरकार की छवि को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाए जा रहे हैं।

  • ट्रंप से न्यूयॉर्क में मिलेंगे जेलेंस्की, फोन पर बातचीत के बाद बोले- यह मुलाकात बहुत कुछ बदल सकती है

    ट्रंप से न्यूयॉर्क में मिलेंगे जेलेंस्की, फोन पर बातचीत के बाद बोले- यह मुलाकात बहुत कुछ बदल सकती है


    नई दिल्ली। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत की है। बातचीत के बाद जेलेंस्की ने इसे अहम बताते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच शांति की दिशा में कई जरूरी कदमों पर काम चल रहा है। उन्होंने बताया कि वह जल्द ही ट्रंप से न्यूयॉर्क में मुलाकात करेंगे। जेलेंस्की के मुताबिक, यह बैठक मौजूदा हालात में काफी कुछ बदल सकती है और इस समय मजबूत कूटनीतिक गतिविधियां चल रही हैं।

    ट्रंप से बातचीत को बताया अहम

    जेलेंस्की ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर ट्रंप के साथ हुई बातचीत की जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। उन्होंने यह भी बताया कि बातचीत के दौरान न्यूयॉर्क में आमने-सामने मुलाकात करने पर सहमति बनी है।

    जेलेंस्की ने कहा कि मौजूदा समय में कूटनीतिक स्तर पर गतिविधियां तेज हैं और दोनों पक्ष शांति से जुड़े मुद्दों पर आगे बढ़ने के रास्ते तलाश रहे हैं।

    अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के कीव दौरे का किया जिक्र

    यूक्रेनी राष्ट्रपति ने हाल ही में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के कीव दौरे का भी उल्लेख किया। उन्होंने ट्रंप को इसके लिए धन्यवाद देते हुए कहा कि स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर की कीव यात्रा से अमेरिकी पक्ष को यूक्रेन के जमीनी हालात को करीब से देखने और समझने का अवसर मिला।

    जेलेंस्की के अनुसार, इस दौरान सुरक्षा और शांति से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। उनका कहना है कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए यूक्रेनी और अमेरिकी टीमें मिलकर काम कर रही हैं।

    शांति का रास्ता तलाशना यूक्रेन की पहली प्राथमिकता

    जेलेंस्की ने कहा कि यूक्रेन के लिए शांति का रास्ता तलाशना सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि तनाव कम करने और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए कई प्रस्तावों पर काम किया जा रहा है।

    इनमें ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और लोगों की जान की सुरक्षा को प्रमुख मुद्दों में शामिल किया गया है। जेलेंस्की ने कहा कि यूक्रेन की टीम अमेरिकी टीम के साथ मिलकर काम कर रही है और देश इस दिशा में कड़े कदम उठाने के लिए तैयार है।

    लिंडसे ग्राहम विधेयक को कानून बनाने पर ट्रंप को धन्यवाद

    बातचीत के दौरान जेलेंस्की ने लिंडसे ग्राहम विधेयक को कानून का रूप देने के लिए भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आभार जताया। उन्होंने कहा कि सभी पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि शांति स्थापित की जानी चाहिए।

    यूक्रेनी राष्ट्रपति ने रूस-यूक्रेन संकट के दौरान यूक्रेन का समर्थन करने वाले वैश्विक सहयोगियों और मदद के लिए आगे आने वाले लोगों को भी धन्यवाद दिया।

    अब इस बातचीत के बाद दोनों नेताओं की न्यूयॉर्क में होने वाली मुलाकात पर नजर है। जेलेंस्की ने जिस तरह इस बैठक को ‘बहुत कुछ बदलने’ वाली मुलाकात बताया है, उससे शांति प्रयासों को लेकर इस बैठक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, बैठक के बाद क्या ठोस कदम सामने आते हैं, यह आगे की बातचीत पर निर्भर करेगा।

  • रूस पर यूक्रेन का बड़ा ड्रोन हमला, मॉस्को समेत कई इलाकों में नुकसान; चुनाव के आखिरी दिन बढ़ा तनाव

    रूस पर यूक्रेन का बड़ा ड्रोन हमला, मॉस्को समेत कई इलाकों में नुकसान; चुनाव के आखिरी दिन बढ़ा तनाव

    नई दिल्ली । रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के दौरान रविवार को रूस पर बड़े पैमाने पर ड्रोन हमले की खबर सामने आई। रूसी अधिकारियों के अनुसार, रातभर में यूक्रेन की ओर से एक हजार से अधिक ड्रोन भेजे गए। इनमें बड़ी संख्या में ड्रोन मॉस्को और उसके आसपास के इलाकों की ओर बढ़े। मॉस्को के मेयर सर्गेई सोब्यानिन ने इसे राजधानी पर अब तक का सबसे बड़ा ड्रोन हमला बताया।

    रूसी अधिकारियों के अनुसार, देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में ड्रोन को हवा में ही नष्ट किया गया। रक्षा मंत्रालय ने 1,100 से अधिक यूक्रेनी ड्रोन को रोकने की जानकारी दी, जबकि मॉस्को के मेयर के अनुसार राजधानी की ओर बढ़ रहे करीब 450 ड्रोन को नष्ट किया गया। बाद में सामने आई जानकारी में रूस के अलग-अलग मोर्चों पर 1,600 से अधिक ड्रोन गिराए जाने का दावा भी किया गया।

    हमले के दौरान मॉस्को की एक तेल रिफाइनरी और एक रिहायशी इमारत को नुकसान पहुंचा। रिहायशी इमारत से बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। मॉस्को क्षेत्र के अधिकारियों के मुताबिक, एक 21 मंजिला इमारत से करीब 400 लोगों को निकाला गया, जिनमें बच्चे भी शामिल थे।

    मॉस्को क्षेत्र के गवर्नर आंद्रे वोरोब्योव के अनुसार, हमले में दो लोगों की मौत हुई। मृतकों में 44 वर्षीय महिला और एक बुजुर्ग व्यक्ति शामिल बताए गए हैं। क्षेत्र में 20 लोगों के घायल होने की जानकारी भी सामने आई है। घायलों को इलाज के लिए अस्पतालों में पहुंचाया गया।

    हमले का असर ऐसे समय में सामने आया जब रूस में तीन दिन से चल रहा संसदीय चुनाव अपने अंतिम दिन में था। मतदान 18 सितंबर से शुरू हुआ था और 20 सितंबर को अंतिम चरण में पहुंचा। मॉस्को के मेयर ने आरोप लगाया कि ड्रोन हमले का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया में बाधा डालना था। हालांकि, मतदान जारी रहा और अधिकारियों ने कहा कि हमला चुनाव को रोकने में सफल नहीं हुआ।

    रूस ने यूक्रेन के कब्जे वाले कुछ इलाकों और क्रीमिया में भी संसदीय चुनाव के लिए मतदान कराया है। यूक्रेन ने इन क्षेत्रों में रूस की ओर से कराए जा रहे मतदान को अवैध बताया है। ऐसे में चुनाव के अंतिम दिन हुआ यह बड़ा ड्रोन हमला पहले से तनावपूर्ण राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों के बीच हुआ।

    यूक्रेन की ओर से इस हमले को लेकर तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। दोनों देशों के बीच युद्ध के दौरान ड्रोन हमलों का इस्तेमाल लगातार बढ़ा है और ऊर्जा ढांचे तथा अन्य महत्वपूर्ण ठिकाने हमलों का लक्ष्य बनते रहे हैं।

    मॉस्को की तेल रिफाइनरी को नुकसान पहुंचना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि रूस के ऊर्जा ढांचे पर हमले युद्ध के दौरान बार-बार सामने आए हैं। अधिकारियों ने रिफाइनरी परिसर में ड्रोन पहुंचने और नुकसान की पुष्टि की है। आपातकालीन दलों को प्रभावित स्थानों पर भेजकर स्थिति संभालने का काम किया गया।

    रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष में यह हमला ऐसे समय हुआ है जब दोनों पक्षों के बीच सैन्य तनाव बना हुआ है। मॉस्को और आसपास के क्षेत्र में हुए नुकसान तथा जानमाल की हानि ने युद्ध के दौरान ड्रोन हमलों के बढ़ते प्रभाव को एक बार फिर सामने ला दिया है।

  • ईरान-अमेरिका तनाव और कच्चे तेल की कीमतों के बीच घरेलू आंकड़े तय करेंगे अगले हफ्ते बाजार की दिशा

    ईरान-अमेरिका तनाव और कच्चे तेल की कीमतों के बीच घरेलू आंकड़े तय करेंगे अगले हफ्ते बाजार की दिशा

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार के लिए 22 सितंबर से शुरू होने वाला अगला कारोबारी सप्ताह कई वैश्विक और घरेलू घटनाक्रमों के लिहाज से महत्वपूर्ण रहने वाला है। निवेशकों की नजर मध्यपूर्व में ईरान-अमेरिका तनाव, कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी टैरिफ से जुड़े फैसलों, बॉन्ड यील्ड, रुपये की चाल और घरेलू आर्थिक आंकड़ों पर रहेगी। इन संकेतकों में होने वाले बदलाव का असर बाजार के उतार-चढ़ाव पर दिखाई दे सकता है।

    मध्यपूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बाजार के लिए प्रमुख वैश्विक जोखिमों में बना हुआ है। इस क्षेत्र से जुड़ी किसी भी नई खबर का असर निवेशकों की धारणा पर पड़ सकता है। खासकर कच्चे तेल की कीमतों में तेज बदलाव का असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

    अमेरिकी टैरिफ से जुड़े घटनाक्रम भी भारतीय बाजार के लिए अहम रहेंगे। अमेरिका में रूस पर प्रतिबंध लगाने से संबंधित एक विधेयक को प्रतिनिधि सभा से मंजूरी मिलने के बाद इस पर नजर बनी हुई है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है।

    इस तरह के किसी कदम का प्रभाव भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातकों पर पड़ सकता है। इससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े समीकरण प्रभावित होने की आशंका भी बनी रहेगी। इसलिए निवेशक अमेरिकी व्यापार नीति और उससे जुड़े अगले कदमों को करीब से देखेंगे।

    कच्चे तेल की कीमतें भारतीय शेयर बाजार के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण संकेतक रहेंगी। तेल की लागत में बढ़ोतरी से महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है और इससे आर्थिक विकास को लेकर चिंताएं भी पैदा हो सकती हैं। बीते सप्ताह बाजार की धारणा पर ऊर्जा लागत को लेकर ऐसी ही चिंताओं का असर दिखाई दिया।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। 18 सितंबर को विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय नकद बाजार में शुद्ध खरीदार रहे और उन्होंने 599.54 करोड़ रुपये की खरीदारी की। इसी दिन घरेलू संस्थागत निवेशकों ने भी 1,019.69 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की।

    रुपये और अमेरिकी डॉलर की चाल पर भी निवेशकों की नजर रहेगी। मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव का असर कंपनियों की लागत, आयात और विदेशी निवेश के प्रवाह पर पड़ सकता है। इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बदलाव भी वैश्विक निवेश प्रवाह को प्रभावित करने वाला प्रमुख संकेतक बना रहेगा।

    घरेलू मोर्चे पर पीएमआई और बुनियादी ढांचे से जुड़े आंकड़े अगले सप्ताह जारी होने हैं। इन आंकड़ों से देश की आर्थिक गतिविधियों की स्थिति का संकेत मिलेगा। निवेशक इन आंकड़ों को आर्थिक वृद्धि की गति और कारोबारी माहौल के आकलन के लिए देख सकते हैं।

    भारतीय शेयर बाजार ने पिछला सप्ताह कमजोर स्तर पर समाप्त किया। सेंसेक्स 0.65 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,294.46 अंक पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 0.22 प्रतिशत फिसलकर 23,346.40 अंक पर रहा। ऐसे में अगले सप्ताह वैश्विक तनाव, तेल की कीमत, टैरिफ और घरेलू आंकड़ों के बीच बाजार की गतिविधियों पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी।