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  • अफ्रीकी देश कांगो में इबोला का कहर…. अब तक 1,031 लोगों की हो चुकी है मौत

    अफ्रीकी देश कांगो में इबोला का कहर…. अब तक 1,031 लोगों की हो चुकी है मौत


    घाना।
    अफ्रीकी देश कांगो (Congo) में इबोला (Ebola) के प्रकोप से 1,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. यह इतिहास का सबसे तेजी से फैलने वाला इबोला प्रकोप माना जा रहा है।

    बुधवार को घाना में एक स्वास्थ्य सम्मेलन में बोलते हुए, ‘अफ्रीका सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन’ के महानिदेशक डॉ. जीन कासेया (Dr. Jean Casey) ने बताया कि अब तक 1,031 मौतों की पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा, ‘ये लोग मर रहे हैं. वे इसलिए मर रहे हैं क्योंकि हमारे पास वैक्सीन नहीं हैं, दवाएं नहीं हैं और फंड नहीं है।

    कांगो के स्वास्थ्य मंत्रालय की ताजा जानकारी के अनुसार, सोमवार तक इस प्रकोप में 2,473 मामले दर्ज किए गए थे. मंत्रालय ने बताया कि कम से कम 737 मरीज आइसोलेशन में थे या अस्पताल में भर्ती थे।

    इस बीच, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कहा है कि इबोला प्रकोप का वास्तविक दायरा आधिकारिक आंकड़ों की तुलना में दो से चार गुना बड़ा हो सकता है. WHO के मुताबिक, 15 मई से शुरू हुआ यह प्रकोप इतनी तेजी से फैल रहा है कि स्वास्थ्य अधिकारी इसकी रफ्तार को पकड़ने में सफल नहीं हो पा रहे हैं.

    अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि 80% नए मामले संक्रमण की ज्ञात चेन के बाहर सामने आए हैं. यह इस बात का संकेत है कि प्रकोप स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा ट्रैक किए जा सकने की गति से भी तेजी से फैल रहा है.

    बता दें, इबोला एक बहुत खतरनाक वायरस से होने वाली बीमारी है. यह संक्रमण दुर्लभ जरूर है, लेकिन काफी गंभीर और कई मामलों में जानलेवा साबित हो सकता है.

    यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों जैसे खून, उल्टी, पसीना या वीर्य के संपर्क में आने से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है. इसका कोई पक्का इलाज अभी तक नहीं है।

  • ट्रंप की चेतावनी पर ईरान का पलटवार, बोला- हमारा तेल रुका तो दुनिया की सप्लाई भी ठप होगी

    ट्रंप की चेतावनी पर ईरान का पलटवार, बोला- हमारा तेल रुका तो दुनिया की सप्लाई भी ठप होगी


    नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी चेतावनी के बाद ईरान ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरान के प्रमुख वार्ताकार और संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने कहा कि यदि ईरान को अपना तेल निर्यात करने से रोका गया, तो क्षेत्र में कोई भी देश आसानी से तेल नहीं बेच पाएगा। साथ ही उन्होंने दोहराया कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) में हालात अब युद्ध से पहले जैसे नहीं होंगे।

    ‘या सब बेचेंगे, या कोई नहीं’
    मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि मौजूदा हालात का संदेश बिल्कुल साफ है—”या तो सभी तेल बेचेंगे या फिर कोई नहीं।” उन्होंने कहा कि यदि ईरान की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है, तो क्षेत्र के अन्य देशों की तेल आपूर्ति भी सुरक्षित नहीं रह पाएगी।

    उन्होंने यह भी कहा कि अगर ईरान की सुरक्षा खतरे में होगी तो किसी अन्य देश का महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा भी सुरक्षित नहीं रहेगा। गालिबाफ ने यह भी दोहराया कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा अमेरिकी सैन्य मौजूदगी के बिना ही संभव है और यह समुद्री मार्ग अब पहले जैसी स्थिति में नहीं लौटेगा।

    ट्रंप ने दी थी सख्त चेतावनी
    इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर ईरान को सीधी चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य में किसी जहाज पर मिसाइल, ड्रोन, रॉकेट या अन्य हथियार से हमला किया गया, तो अमेरिका ईरान के अहम बुनियादी ढांचे को निशाना बनाएगा।

    ट्रंप ने लिखा कि यदि ईरान समुद्री मार्ग में जहाजों पर हमला करता है, तो अमेरिका जवाबी कार्रवाई में पुलों, बिजली संयंत्रों और अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को निशाना बनाएगा। उन्होंने संकेत दिया कि ऐसे हमलों के दायरे में तेहरान के आसपास स्थित महत्वपूर्ण ठिकाने भी आ सकते हैं।

    तनाव का सबसे बड़ा केंद्र बना हॉर्मुज स्ट्रेट
    अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच हॉर्मुज जलडमरूमध्य सबसे संवेदनशील मुद्दा बन गया है। शुरुआती युद्धविराम समझौता टूटने के बाद दोनों देशों के बीच लगातार सैन्य कार्रवाई और जवाबी हमलों का दौर जारी है। अमेरिका कई बार ईरानी ठिकानों पर कार्रवाई कर चुका है, जबकि ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर जवाब दिया है।

    दुनिया की तेल सप्लाई पर पड़ सकता है असर
    हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम समुद्री मार्ग माना जाता है। दुनिया के कुल तेल निर्यात का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ईरान इस क्षेत्र को अपनी रणनीतिक सुरक्षा का हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग बताते हुए निर्बाध आवाजाही बनाए रखने की वकालत करता है। ऐसे में दोनों देशों के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक तेल बाजार और ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर डाल सकता है।

  • नेतन्याहू की गिरफ्तारी पर ममदानी का यू-टर्न, कानूनी अधिकार न होने की बात स्वीकार, फिर भी ICC वारंट लागू करने की उठाई मांग

    नेतन्याहू की गिरफ्तारी पर ममदानी का यू-टर्न, कानूनी अधिकार न होने की बात स्वीकार, फिर भी ICC वारंट लागू करने की उठाई मांग

    नई दिल्ली । न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को लेकर अपने पहले के चुनावी रुख में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए कहा है कि उनके प्रशासन के पास नेतन्याहू को गिरफ्तार करने का स्वतंत्र कानूनी अधिकार नहीं है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कई बार दावा किया था कि यदि नेतन्याहू न्यूयॉर्क आए तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, लेकिन अब कानूनी समीक्षा के बाद उन्होंने स्पष्ट किया है कि स्थानीय प्रशासन के अधिकार सीमित हैं और इस प्रकार की कार्रवाई उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती।

    ममदानी ने एक वीडियो संदेश जारी कर बताया कि उनके प्रशासन ने लागू कानूनों का विस्तृत अध्ययन किया और यह जांचने का प्रयास किया कि क्या न्यूयॉर्क शहर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) द्वारा जारी किसी गिरफ्तारी वारंट को स्वयं लागू कर सकता है। समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकला कि नगर प्रशासन के पास ऐसा करने का स्वतंत्र कानूनी अधिकार उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि इस विषय में अंतिम अधिकार संघीय सरकार के पास है।

    हालांकि कानूनी सीमाओं को स्वीकार करने के बावजूद ममदानी ने अपने राजनीतिक रुख में कोई नरमी नहीं दिखाई। उन्होंने दोहराया कि उनकी राय में बेंजामिन नेतन्याहू पर लगे आरोप गंभीर हैं और यदि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया है तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने अमेरिका की संघीय सरकार से अपील की कि वह अंतरराष्ट्रीय न्यायिक प्रक्रियाओं के प्रति सहयोगात्मक रवैया अपनाए और संबंधित वारंट के अनुरूप आवश्यक कदम उठाए।

    ममदानी ने यह भी कहा कि जब सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए नेतन्याहू के न्यूयॉर्क आने की संभावना हो, तब संघीय प्रशासन को आवश्यक कानूनी विकल्पों पर विचार करना चाहिए। उन्होंने अमेरिका से अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के साथ सहयोग बढ़ाने की भी वकालत की। हालांकि अमेरिका वर्तमान में आईसीसी का सदस्य नहीं है, इसलिए इस मुद्दे पर कानूनी और कूटनीतिक जटिलताएं बनी हुई हैं।

    इस घटनाक्रम के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि नेतन्याहू की अमेरिका यात्रा के दौरान किसी प्रकार की गिरफ्तारी नहीं होगी। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अमेरिकी भूमि पर रहते हुए इजरायली प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसी कार्रवाई नहीं की जाएगी। उनके इस बयान के बाद ममदानी की नई टिप्पणी को राजनीतिक और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ममदानी ने यह भी दोहराया कि वह नेतन्याहू की नीतियों के आलोचक बने हुए हैं और उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष सुनवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आईसीसी ने आरोप तय किए हैं तो न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि न्यूयॉर्क ऐसे किसी व्यक्ति का स्वागत नहीं करता जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ रहा हो।

    दूसरी ओर, नेतन्याहू के कार्यालय ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की वैधता पर सवाल उठाए हैं। इजरायल की ओर से कहा गया कि आईसीसी का इजरायली नागरिकों या अमेरिकी नागरिकों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है और उसके निर्णयों को स्वीकार नहीं किया जाता। इस पूरे विवाद ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय न्याय, राष्ट्रीय संप्रभुता और स्थानीय प्रशासन के अधिकारों को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है।

  • CJP प्रदर्शन पर पाकिस्तान में छिड़ी बहस, भारत की कवरेज और PoK पर चुप्पी को लेकर पाकिस्तानी मीडिया पर सवाल

    CJP प्रदर्शन पर पाकिस्तान में छिड़ी बहस, भारत की कवरेज और PoK पर चुप्पी को लेकर पाकिस्तानी मीडिया पर सवाल

    नई दिल्ली । भारत में छात्रों के विरोध प्रदर्शनों को लेकर पाकिस्तान के मीडिया में लगातार कवरेज देखने को मिल रही है। इस बीच पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार कुर्रत-उल-ऐन शिराज़ी ने अपने देश के मीडिया की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत की घटनाओं को प्रमुखता से दिखाया जा रहा है, जबकि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चल रही गतिविधियों और वहां के हालात को पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा है। उनके इस बयान के बाद पाकिस्तान के मीडिया कवरेज को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

    कुर्रत-उल-ऐन शिराज़ी ने कहा कि समाचार माध्यमों का दायित्व केवल पड़ोसी देशों की घटनाओं को दिखाना नहीं, बल्कि अपने देश और उससे जुड़े क्षेत्रों की महत्वपूर्ण घटनाओं को भी समान प्राथमिकता देना है। उन्होंने सवाल उठाया कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कई महीनों से सामने आ रहे घटनाक्रमों और स्थानीय लोगों से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय मीडिया में अपेक्षित स्थान क्यों नहीं मिल रहा है। उनके अनुसार संतुलित पत्रकारिता के लिए सभी महत्वपूर्ण विषयों पर समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।

    दूसरी ओर, पाकिस्तान के कई प्रमुख समाचार माध्यमों ने भारत में छात्रों के विरोध प्रदर्शनों और उससे जुड़े राजनीतिक घटनाक्रमों को विस्तार से प्रकाशित और प्रसारित किया है। विभिन्न रिपोर्टों में प्रदर्शन, विपक्ष की प्रतिक्रिया और राजनीतिक माहौल का उल्लेख किया गया है। कई विश्लेषणों में यह भी कहा गया कि छात्र आंदोलन ने देश की राजनीतिक चर्चा को नई दिशा दी है और विभिन्न दलों की सक्रियता बढ़ी है।

    कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने भी भारत में जारी विरोध प्रदर्शनों को प्रमुखता से प्रकाशित किया है। इन रिपोर्टों में प्रदर्शन, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और प्रशासनिक कदमों का उल्लेख किया गया है। साथ ही यह भी बताया गया कि शिक्षा व्यवस्था और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर देशभर में बहस तेज हुई है। हालांकि अलग-अलग मीडिया संस्थानों ने घटनाक्रम को अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है।

    इधर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को लेकर भी समय-समय पर विभिन्न दावे और रिपोर्ट सामने आती रही हैं। स्थानीय परिस्थितियों, प्रशासनिक व्यवस्थाओं और जनभावनाओं को लेकर अलग-अलग पक्ष अपनी राय रखते रहे हैं। इसी संदर्भ में कुर्रत-उल-ऐन शिराज़ी ने कहा कि यदि मीडिया अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को विस्तार से दिखा सकता है तो उसे अपने क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को भी समान गंभीरता के साथ सामने लाना चाहिए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की भूमिका निष्पक्ष और संतुलित सूचना उपलब्ध कराने की होती है। जब किसी एक विषय को अत्यधिक महत्व दिया जाता है और दूसरे महत्वपूर्ण विषय अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं, तो मीडिया की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक माना जाता है। यही कारण है कि पाकिस्तान में भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज होती दिखाई दे रही है।

    भारत में जारी छात्र प्रदर्शनों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी निगरानी की जा रही है और विभिन्न विदेशी मीडिया संस्थान अपने-अपने दृष्टिकोण से घटनाक्रम का विश्लेषण कर रहे हैं। वहीं पाकिस्तान के भीतर मीडिया कवरेज को लेकर उठे सवाल यह संकेत देते हैं कि समाचार प्रस्तुति और संपादकीय प्राथमिकताओं पर बहस केवल एक देश तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया इन विषयों को किस प्रकार प्रस्तुत करते हैं तथा दोनों देशों से जुड़े घटनाक्रमों को किस संतुलन के साथ स्थान दिया जाता है।

  • जहां जन्मा था एडोल्फ हिटलर, उसी ऐतिहासिक इमारत में खुला पुलिस स्टेशन, चरमपंथी गतिविधियों पर लगेगी रोक

    जहां जन्मा था एडोल्फ हिटलर, उसी ऐतिहासिक इमारत में खुला पुलिस स्टेशन, चरमपंथी गतिविधियों पर लगेगी रोक

    नई दिल्ली । ऑस्ट्रिया ने इतिहास के सबसे विवादित और कुख्यात तानाशाह एडोल्फ हिटलर के जन्मस्थान को नई पहचान देते हुए वहां आधिकारिक तौर पर पुलिस स्टेशन शुरू कर दिया है। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य उस इमारत को नव-नाजी समर्थकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनने से रोकना और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत करना है। वर्षों तक विवादों में रही इस इमारत का व्यापक पुनर्निर्माण करने के बाद इसे पुलिस प्रशासन के उपयोग के लिए तैयार किया गया है।

    यह ऐतिहासिक भवन ऑस्ट्रिया के ब्राउनाउ-एम-इन शहर में स्थित है, जहां 20 अप्रैल 1889 को एडोल्फ हिटलर का जन्म हुआ था। 17वीं सदी में बने इस भवन को लंबे समय तक लेकर यह बहस चलती रही कि इसका भविष्य क्या होना चाहिए। कई विशेषज्ञों का मानना था कि यदि इसे ऐतिहासिक स्मारक का रूप दिया जाता है तो यह चरमपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों के लिए प्रतीकात्मक स्थल बन सकता है। इसी आशंका को देखते हुए सरकार ने इसे सार्वजनिक प्रशासन के उपयोग में लाने का निर्णय लिया।

    इमारत के पुनर्निर्माण पर लगभग 20 मिलियन यूरो, यानी भारतीय मुद्रा में करीब 220 करोड़ रुपये खर्च किए गए। यह परियोजना तय समय से लगभग तीन वर्ष की देरी से पूरी हुई। बाहरी स्वरूप में भी बदलाव किए गए हैं ताकि भवन की पुरानी पहचान कम दिखाई दे और उसे सामान्य सरकारी भवन जैसा रूप दिया जा सके। अब मुख्य प्रवेश द्वार पर पुलिस स्टेशन का आधिकारिक चिन्ह लगाया गया है।

    हालांकि भवन के बाहर स्थित स्मारक पत्थर को यथावत रखा गया है। इस स्मारक पर शांति, स्वतंत्रता और लोकतंत्र का संदेश अंकित है तथा फासीवाद की पुनरावृत्ति न होने की चेतावनी दी गई है। सरकार का मानना है कि यह स्मारक इतिहास की त्रासदी को याद रखने और भविष्य के लिए सीख लेने का महत्वपूर्ण माध्यम बना रहेगा।

    इतिहास के अनुसार, हिटलर के शासनकाल में लाखों लोगों ने उत्पीड़न और नरसंहार का सामना किया। ऑस्ट्रिया भी उस दौर की घटनाओं को लेकर लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाओं का सामना करता रहा है। इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि आधुनिक ऑस्ट्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था, कानून के शासन और मानवाधिकारों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

    इस भवन का स्वामित्व कई दशकों तक एक निजी परिवार के पास रहा। बाद में सरकार इसे लीज पर लेकर सामाजिक कार्यों के लिए इस्तेमाल करती रही, लेकिन भविष्य को लेकर विवाद लगातार बना रहा। निजी मालिक और सरकार के बीच कानूनी प्रक्रिया भी चली, जिसके बाद सरकार ने कानून के तहत भवन का अधिग्रहण किया और मुआवजा देकर इसे अपने नियंत्रण में लिया।

    भवन के उपयोग को लेकर कई विकल्पों पर विचार किया गया था। कुछ लोगों ने इसे संग्रहालय बनाने का सुझाव दिया, जबकि कुछ ने भवन को पूरी तरह ध्वस्त करने की वकालत की। हालांकि इतिहासकारों और विशेषज्ञों की राय थी कि भवन को मिटाने के बजाय उसका ऐसा उपयोग किया जाए जिससे चरमपंथी विचारधारा को किसी प्रकार का प्रतीकात्मक लाभ न मिले। विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर अंततः इसे पुलिस स्टेशन में बदलने का निर्णय लिया गया।

    सरकार का मानना है कि भवन में स्थायी पुलिस उपस्थिति यह स्पष्ट संदेश देगी कि नाजी विचारधारा या उसके किसी भी प्रकार के महिमामंडन के लिए समाज में कोई स्थान नहीं है। साथ ही यह कदम इतिहास की संवेदनशील विरासत को सुरक्षित रखते हुए उसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास भी माना जा रहा है।

  • चुनावी वादे से पीछे हटे न्यूयॉर्क मेयर जोहरान ममदानी, बोले- नेतन्याहू को गिरफ्तार करने का कानूनी अधिकार नहीं, फिर भी ट्रंप प्रशासन से की कार्रवाई की मांग

    चुनावी वादे से पीछे हटे न्यूयॉर्क मेयर जोहरान ममदानी, बोले- नेतन्याहू को गिरफ्तार करने का कानूनी अधिकार नहीं, फिर भी ट्रंप प्रशासन से की कार्रवाई की मांग

    नई दिल्ली । न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को लेकर अपने पहले के चुनावी रुख में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए कहा है कि उनके प्रशासन के पास नेतन्याहू को गिरफ्तार करने का स्वतंत्र कानूनी अधिकार नहीं है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कई बार दावा किया था कि यदि नेतन्याहू न्यूयॉर्क आए तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, लेकिन अब कानूनी समीक्षा के बाद उन्होंने स्पष्ट किया है कि स्थानीय प्रशासन के अधिकार सीमित हैं और इस प्रकार की कार्रवाई उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती।

    ममदानी ने एक वीडियो संदेश जारी कर बताया कि उनके प्रशासन ने लागू कानूनों का विस्तृत अध्ययन किया और यह जांचने का प्रयास किया कि क्या न्यूयॉर्क शहर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) द्वारा जारी किसी गिरफ्तारी वारंट को स्वयं लागू कर सकता है। समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकला कि नगर प्रशासन के पास ऐसा करने का स्वतंत्र कानूनी अधिकार उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि इस विषय में अंतिम अधिकार संघीय सरकार के पास है।

    हालांकि कानूनी सीमाओं को स्वीकार करने के बावजूद ममदानी ने अपने राजनीतिक रुख में कोई नरमी नहीं दिखाई। उन्होंने दोहराया कि उनकी राय में बेंजामिन नेतन्याहू पर लगे आरोप गंभीर हैं और यदि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया है तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने अमेरिका की संघीय सरकार से अपील की कि वह अंतरराष्ट्रीय न्यायिक प्रक्रियाओं के प्रति सहयोगात्मक रवैया अपनाए और संबंधित वारंट के अनुरूप आवश्यक कदम उठाए।

    ममदानी ने यह भी कहा कि जब सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए नेतन्याहू के न्यूयॉर्क आने की संभावना हो, तब संघीय प्रशासन को आवश्यक कानूनी विकल्पों पर विचार करना चाहिए। उन्होंने अमेरिका से अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय के साथ सहयोग बढ़ाने की भी वकालत की। हालांकि अमेरिका वर्तमान में आईसीसी का सदस्य नहीं है, इसलिए इस मुद्दे पर कानूनी और कूटनीतिक जटिलताएं बनी हुई हैं।

    इस घटनाक्रम के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि नेतन्याहू की अमेरिका यात्रा के दौरान किसी प्रकार की गिरफ्तारी नहीं होगी। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अमेरिकी भूमि पर रहते हुए इजरायली प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसी कार्रवाई नहीं की जाएगी। उनके इस बयान के बाद ममदानी की नई टिप्पणी को राजनीतिक और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ममदानी ने यह भी दोहराया कि वह नेतन्याहू की नीतियों के आलोचक बने हुए हैं और उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष सुनवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आईसीसी ने आरोप तय किए हैं तो न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि न्यूयॉर्क ऐसे किसी व्यक्ति का स्वागत नहीं करता जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ रहा हो।

    दूसरी ओर, नेतन्याहू के कार्यालय ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की वैधता पर सवाल उठाए हैं। इजरायल की ओर से कहा गया कि आईसीसी का इजरायली नागरिकों या अमेरिकी नागरिकों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है और उसके निर्णयों को स्वीकार नहीं किया जाता। इस पूरे विवाद ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय न्याय, राष्ट्रीय संप्रभुता और स्थानीय प्रशासन के अधिकारों को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है।

  • ट्रंप का बड़ा फैसला…. जेनेरिक दवाओं पर 200% तक टैरिफ लगाएगा अमेरिका

    ट्रंप का बड़ा फैसला…. जेनेरिक दवाओं पर 200% तक टैरिफ लगाएगा अमेरिका


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने बुधवार को घोषणा की कि अमेरिका (America) अगस्त 2028 से विदेश से आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं (Generic medicines) पर भारी आयात शुल्क (टैरिफ) (Hefty Import Duties- Tariffs) लगाएगा। उन्होंने कहा कि इस कदम का मकसद जेनेरिक दवाओं का उत्पादन अमेरिका के भीतर कराना है। इस फैसले का असर भारत पर पड़ सकता है, क्योंकि भारत अमेरिका को जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक है।

    ट्रंप ने ट्रथु सोशल प्लेटफॉर्म पर कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में आने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर अगले दो साल तक टैरिफ शून्य फीसदी रहेगा। इसके बाद एक साल के लिए इसे 100 फीसदी कर दिया जाएगा। उसके बाद यह बढ़ाकर 200 फीसदी कर दिया जाएगा।


    ट्रंप ने क्या कहा?

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा कि 1 अगस्त 2026 से अमेरिका में लाई जाने वाली सभी जेनेरिक दवाओं पर अगले दो साल तक शून्य फीसदी आयात शुल्क रहेगा। इसके बाद एक साल के लिए यह 100 फीसदी होगा और उसके बाद 200 फीसदी कर दिया जाएगा।

    उन्होंने कहा कि यह फैसला इसलिए लिया गया है, ताकि जेनेरिक दवाओं का उत्पादन फिर से अमेरिका में शुरू हो। उन्होंने कहा कि जो कंपनियां तय समय के भीतर अमेरिका में कारखाने और जरूरी उपकरण नहीं लगाएंगे, उन्हें इस नीति के तहत दंड का सामना करना पड़ेगा।


    नई नीति में क्या बदलेगा?

    राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि इस नीति का मकसद अमेरिका के लोगों के हितों की रक्षा करना है। उन्होंने यह भी कहा कि पेटेंट वाली, ब्रांडेड और नई दवाओं से जुड़ी मौजूदा नीति में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा और वह पहले की तरह जारी रहेगी।

    भारत का अमेरिका को दवाओं का कितना निर्यात है?
    ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत ने अमेरिका को 9.7 अरब अमेरिकी डॉलर की दवाओं का निर्यात किया। यह भारत के कुल वैश्विक दवा निर्यात 25.8 अरब अमेरिकी डॉलर का 36 प्रतिशत था।


    जेनेरिक दवाओं का इस्तेमाल कहां होता है?

    भारत में बनी जेनेरिक दवाएं उच्च रक्तचाप, मधुमेह, कैंसर, संक्रामक रोगों और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों के इलाज में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जाती हैं।

  • ट्रंप के नए वीजा नियम ने बढ़ाई चिंता… भारतीय छात्रों को 54 दिन के भीतर लौटना होगा अमेरिका

    ट्रंप के नए वीजा नियम ने बढ़ाई चिंता… भारतीय छात्रों को 54 दिन के भीतर लौटना होगा अमेरिका


    वॉशिंगटन।
    अमेरिका (America) में आव्रजन नियमों (Immigration rules) में एक बड़े बदलाव के चलते भारतीय छात्रों (Indian students) समेत अंतरराष्ट्रीय छात्रों को लौटने की सलाह दी गई है। विश्वविद्यालयों ने सलाह दी है कि अगर वे मौजूदा आव्रजन व्यवस्था का लाभ बनाए रखना चाहते हैं तो 15 सितंबर से पहले अमेरिका लौट आएं। यह सलाह उन छात्रों के लिए है जो शैक्षणिक अवकाश के दौरान अपने देश आए हुए हैं और एफ-1 या जे-1 वीजा पर पढ़ाई कर रहे हैं।

    यह सलाह अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (डीएचएस) के नए “अंतिम नियम” के लागू होने से पहले दी गई है। यह नियम लंबे समय से लागू “ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस यानी डी/एस व्यवस्था” की जगह लेगा।


    15 सितंबर से लागू होगा नया नियम

    नए नियम के तहत अंतरराष्ट्रीय छात्रों को अमेरिका में अधिकतम चार वर्ष की निश्चित अवधि के लिए ही प्रवेश मिलेगा। मौजूदा व्यवस्था में एफ-1 वीजा धारक छात्र तब तक अमेरिका में रह सकते हैं, जब तक वे अपने शैक्षणिक कार्यक्रम की शर्तों का पालन करते रहते हैं। कोलंबिया विश्वविद्यालय ने अपने नोटिस में कहा, “इस अंतिम नियम को लागू करने के लिए 60 दिन का समय दिया गया है। हम सभी छात्रों को सलाह देते हैं कि वे 8 सितंबर, 2026 से शुरू होने वाली कक्षाओं से पहले न्यूयॉर्क लौट आएं।”


    क्या-क्या बदलेगा?

    – डीएचएस ने एफ-1 छात्र वीजा, जे-1 एक्सचेंज विजिटर वीजा और विदेशी पत्रकारों के लिए आई वीजा पर अधिकतम चार वर्ष की अवधि तय कर दी है।
    – नए नियम के तहत पढ़ाई पूरी होने के बाद अमेरिका में रहने की छूट 60 दिन से घटाकर 30 दिन कर दी जाएगी।
    – अगर किसी छात्र को अपनी अवधि बढ़ानी होगी तो उसे अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (यूएससीआईएस) से फॉर्म आई-539 के माध्यम से मंजूरी लेनी होगी।


    किन छात्रों पर लागू नहीं होगा नया नियम?

    डीएचएस के अनुसार, जो छात्र 15 सितंबर को पहले से अमेरिका में “ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस” के तहत मौजूद होंगे, वे अपने फॉर्म आई-20 में दर्ज कार्यक्रम पूरा होने तक या स्वीकृत ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (ओपीटी/एसटीईएम ओपीटी) की अवधि तक अमेरिका में रह सकेंगे। हालांकि, यह छूट भी नए नियम के लागू होने की तारीख से अधिकतम चार वर्ष तक ही मान्य होगी और किसी भी स्थिति में 14 नवंबर, 2030 के बाद लागू नहीं रहेगी। इसमें देश छोड़ने के लिए मिलने वाली अवधि भी शामिल होगी।


    भारतीय छात्रों में बढ़ी चिंता

    नए नियम के बाद भारतीय छात्रों और पेशेवरों के बीच चिंता बढ़ गई है। उन्हें आशंका है कि इसका असर उनकी पढ़ाई और करियर की योजनाओं पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है, “चार वर्ष की सीमा आधुनिक डिग्री पाठ्यक्रमों के अनुरूप नहीं है। स्नातक की डिग्री पूरी करने में औसतन 52 महीने और पीएचडी पूरी करने में लगभग 5.7 वर्ष लगते हैं। यूएससीआईएस के पास पहले से ही 1.1 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं और उनके निपटारे में करीब एक वर्ष लग रहा है।”

    विशेषज्ञों का कहना है, “छात्रों को पढ़ाई या शोध के बीच में ही अमेरिका छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इससे प्रयोगशालाओं को प्रतिभाशाली शोधकर्ताओं का नुकसान होगा और अमेरिका अपनी नवाचार क्षमता अपने प्रतिस्पर्धी देशों के हाथों सौंप देगा।” एफआईआईडीएस के अनुसार, शोध आधारित कई पाठ्यक्रम, विशेषकर पीएचडी और चिकित्सा शिक्षा, सामान्य तौर पर चार वर्ष से अधिक समय लेते हैं। वहीं, जे-1 श्रेणी के शोधकर्ता और चिकित्सकों को अपना कार्यक्रम पूरा करने में अक्सर पांच से सात वर्ष तक लग जाते हैं।

  • नई रिपोर्ट का दावा: चेतावनियों के बावजूद जेफ्री एपस्टीन से 30 से अधिक बार मिले थे बिल गेट्स

    नई रिपोर्ट का दावा: चेतावनियों के बावजूद जेफ्री एपस्टीन से 30 से अधिक बार मिले थे बिल गेट्स


    नई दिल्ली। माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स और दिवंगत फाइनेंसर जेफ्री एपस्टीन के संबंधों को लेकर एक नई समीक्षा रिपोर्ट में कई अहम दावे किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, गेट्स और उनकी परोपकारी संस्था गेट्स फाउंडेशन के अधिकारियों ने वर्ष 2011 से 2014 के बीच एपस्टीन से 30 से अधिक मुलाकातें की थीं। यह भी कहा गया है कि संस्था के कुछ कर्मचारियों ने इन बैठकों से प्रतिष्ठा को होने वाले संभावित नुकसान को लेकर चिंता जताई थी, लेकिन इसके बावजूद संपर्क बना रहा।

    30 से ज्यादा बैठकों का उल्लेख
    लॉ फर्म विल्मरहेल (WilmerHale) द्वारा तैयार समीक्षा रिपोर्ट के तीन पन्नों का सारांश मंगलवार को जारी किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 से 2014 के बीच हुई करीब 30 बैठकों में से कई एपस्टीन के मैनहट्टन स्थित टाउनहाउस में आयोजित हुईं, जबकि एक बैठक गेट्स फाउंडेशन के कैंपस में भी हुई थी।

    अवैध गतिविधि का कोई प्रमाण नहीं मिला
    रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जांच के दौरान ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि गेट्स फाउंडेशन ने एपस्टीन को कोई भुगतान किया था या किसी अवैध गतिविधि में शामिल था। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच मुख्य रूप से एक संभावित ग्लोबल हेल्थ फंड बनाने पर चर्चा हुई थी, जो बाद में कभी अस्तित्व में नहीं आ सका। इसके अलावा, एपस्टीन के एक सहयोगी द्वारा संचालित इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट को दिए गए वित्तीय सहयोग पर भी बातचीत होने का उल्लेख किया गया है।

    बिल गेट्स ने माना था फैसला गलत था
    रिपोर्ट में बिल गेट्स पर एपस्टीन के यौन अपराधों में किसी तरह की संलिप्तता का आरोप नहीं लगाया गया है। गेट्स पहले भी कई बार यह कह चुके हैं कि उन्हें नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण की जानकारी नहीं थी। हाल ही में एक संसदीय समिति के समक्ष गेट्स ने स्वीकार किया था कि एपस्टीन से मुलाकात करना उनके जीवन के फैसलों में “एक बड़ी गलती” थी।

    स्टाफ की आपत्तियों के बावजूद जारी रहा संपर्क
    रिपोर्ट में दावा किया गया है कि फाउंडेशन के कुछ कर्मचारियों ने कानूनी जोखिम और संस्था की साख पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता जताई थी। इसके बावजूद 2012 में एपस्टीन ने बिल गेट्स की मुलाकात इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट के प्रमुख तेर्जे रोड-लार्सन से कराई। इसके बाद फाउंडेशन ने पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम के लिए इस संस्था को वित्तीय सहायता दी। बाद में विवाद बढ़ने पर 2020 में तेर्जे रोड-लार्सन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

    फाउंडेशन ने मजबूत किए निगरानी तंत्र
    यह खुलासा ऐसे समय में सामने आया है जब हाल ही में वॉरेन बफेट ने अपने वार्षिक दान में गेट्स फाउंडेशन को शामिल नहीं किया। इस बीच फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क सुजमैन ने कहा कि बोर्ड ने जोखिम प्रबंधन और जांच प्रक्रियाओं को और मजबूत करने के लिए नए कदमों को मंजूरी दी है। उनके अनुसार संस्था का कार्य सहयोगियों के भरोसे और पारदर्शिता पर आधारित है।

    एपस्टीन फाइल्स में भी आया था नाम
    अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा सार्वजनिक किए गए एपस्टीन फाइल्स में टेक्नोलॉजी, वित्त और राजनीति जगत की कई चर्चित हस्तियों के साथ बिल गेट्स का नाम भी दर्ज है। गौरतलब है कि जेफ्री एपस्टीन को जुलाई 2019 में नाबालिगों की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। मुकदमे की सुनवाई शुरू होने से पहले ही जेल में उसकी मौत हो गई थी, जिसे अधिकारियों ने आत्महत्या बताया था।

  • ट्रंप प्रशासन का बड़ा अभियान, कथित इमिग्रेशन धोखाधड़ी पर पाकिस्तानी मूल के व्यक्ति समेत 10 लोगों की अमेरिकी नागरिकता रद्द करने की पहल

    ट्रंप प्रशासन का बड़ा अभियान, कथित इमिग्रेशन धोखाधड़ी पर पाकिस्तानी मूल के व्यक्ति समेत 10 लोगों की अमेरिकी नागरिकता रद्द करने की पहल

    नई दिल्ली । अमेरिका में ट्रंप प्रशासन ने नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया में कथित धोखाधड़ी और गंभीर आपराधिक मामलों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई शुरू करते हुए 10 मामलों में अमेरिकी नागरिकता रद्द करने की पहल की है। इन मामलों में पाकिस्तान में जन्मा एक व्यक्ति भी शामिल है, जिस पर अलग-अलग पहचान का उपयोग कर अमेरिकी आव्रजन प्रणाली का लाभ उठाने और बाद में नागरिकता हासिल करने का आरोप है। प्रशासन का कहना है कि यह अभियान अमेरिकी नागरिकता प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने और कथित धोखाधड़ी के मामलों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

    अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग और न्याय विभाग के अनुसार पिछले एक महीने के दौरान ऐसे कई मामलों में न्यायिक कार्रवाई शुरू की गई है, जिनमें नागरिकता प्राप्त करने के दौरान गलत जानकारी देने, महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने या फर्जी दस्तावेजों के इस्तेमाल के आरोप लगाए गए हैं। इन मामलों में केवल आव्रजन धोखाधड़ी ही नहीं, बल्कि बच्चों के यौन शोषण, स्वास्थ्य बीमा धोखाधड़ी, मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े आरोप भी शामिल हैं। हालांकि प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि सभी मामलों में अंतिम निर्णय अदालतों द्वारा ही किया जाएगा।

    कार्रवाई के केंद्र में 65 वर्षीय पाकिस्तानी मूल के मुर्तजा अली का मामला है। अधिकारियों का आरोप है कि उन्होंने अमेरिका में स्थायी निवास और बाद में नागरिकता प्राप्त करने के लिए अलग-अलग नामों से कई आव्रजन आवेदन दाखिल किए। आरोपों के अनुसार उन्होंने अमेरिकी नागरिकता “मोहम्मद इकबाल” नाम से हासिल की थी। बाद में फिंगरप्रिंट मिलान और जांच के दौरान विभिन्न आवेदनों को एक ही व्यक्ति से जुड़ा पाया गया।

    संघीय अधिकारियों के अनुसार वर्ष 2014 में मुर्तजा अली ने अमेरिकी सरकारी एजेंसी को झूठी और भ्रामक जानकारी देने के मामले में दोष स्वीकार किया था। जांच एजेंसियों का कहना है कि उन्होंने तीन अलग-अलग पहचान का उपयोग करते हुए अलग-अलग आव्रजन लाभ प्राप्त करने का प्रयास किया। इसी आधार पर अब उनके खिलाफ नागरिकता रद्द करने की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है।

    सरकार ने टेक्सास की संघीय अदालत में दायर शिकायत में आरोप लगाया है कि संबंधित व्यक्ति ने इमिग्रेशन धोखाधड़ी, नागरिकता प्रक्रिया के दौरान झूठी गवाही देने और आवश्यक तथ्यों को छिपाने जैसे कृत्यों के माध्यम से अमेरिकी नागरिकता प्राप्त की। प्रशासन का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत जानकारी देकर नागरिकता हासिल करता है तो वह उस नागरिकता पर अपना वैधानिक अधिकार खो देता है।

    ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा है कि अमेरिकी नागरिकता एक विशेष कानूनी अधिकार है और इसे प्राप्त करने की प्रक्रिया में ईमानदारी सर्वोपरि है। प्रशासन का दावा है कि जिन मामलों में कार्रवाई की गई है, उनमें गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे लोग शामिल हैं और कानून के अनुसार ऐसे मामलों में नागरिकता रद्द करने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि आने वाले समय में भी इसी प्रकार के अन्य मामलों की समीक्षा जारी रहेगी।

    इन मामलों में पाकिस्तान के अलावा क्यूबा, मेक्सिको, पेरू और पोलैंड में जन्मे कुछ अन्य नागरिक भी शामिल हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि सभी शिकायतें संघीय अदालतों में दायर की गई हैं और फिलहाल ये आरोप न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं। अंतिम निर्णय अदालतों के आदेश के बाद ही प्रभावी होगा। प्रशासन का कहना है कि उसका उद्देश्य आव्रजन व्यवस्था की पारदर्शिता बनाए रखना और नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की कथित धोखाधड़ी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।