Category: International

  • ईरान की सात शर्तों और युद्ध की चेतावनी के बीच ट्रंप ने कैंप डेविड का दौरा छोड़ा, अमेरिका ने सुरक्षा अलर्ट जारी किया

    ईरान की सात शर्तों और युद्ध की चेतावनी के बीच ट्रंप ने कैंप डेविड का दौरा छोड़ा, अमेरिका ने सुरक्षा अलर्ट जारी किया

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शनिवार को अपना वीकेंड प्रवास बीच में छोड़कर व्हाइट हाउस लौट आए। वह मैरीलैंड स्थित कैंप डेविड से रविवार को वापस आने वाले थे, लेकिन निर्धारित कार्यक्रम से एक दिन पहले ही वॉशिंगटन पहुंच गए। ट्रंप की अचानक वापसी के पीछे प्रशासन की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया गया।

    ट्रंप की वापसी ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ा हुआ है। ईरान ने युद्ध समाप्त करने और बातचीत की दिशा में आगे बढ़ने के लिए अमेरिका के सामने सात शर्तें रखी हैं। ईरान की ओर से कहा गया है कि इन शर्तों को मध्यस्थ कतर के जरिए अमेरिकी पक्ष तक पहुंचाया जा चुका है।

    ईरान के सुरक्षा प्रमुख मोहसिन रेजाई ने बताया कि तेहरान अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जवाब का इंतजार कर रहा है। ईरान की ओर से यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि उसकी मांगों को स्वीकार नहीं किया गया तो वह निर्णायक युद्ध के लिए तैयार है।

    ईरान की ओर से रखी गई शर्तों और चेतावनी के बीच पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति को लेकर अमेरिका ने भी सतर्कता बढ़ाई है। अमेरिकी राजनयिक मिशनों के लिए हाई सिक्योरिटी अलर्ट जारी किया गया है। क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी नागरिकों को बदलती परिस्थितियों पर नजर रखने की सलाह दी गई है।

    सऊदी अरब और हूती समूह के बीच जारी सैन्य गतिविधियों ने भी क्षेत्रीय तनाव बढ़ाया है। हूती समूह ईरान समर्थित है और सऊदी अरब के खिलाफ पहले भी सैन्य कार्रवाई कर चुका है। इनमें नागरिक हवाई अड्डों को निशाना बनाने वाली घटनाएं भी शामिल रही हैं।

    अमेरिकी सुरक्षा चेतावनी में कहा गया है कि ईरान और उसके समर्थक समूह मध्य पूर्व के बाहर भी अमेरिकी हितों या अमेरिका और उसके नागरिकों से जुड़े स्थानों को निशाना बना सकते हैं। इस वजह से अलग-अलग देशों में मौजूद अमेरिकी राजनयिक प्रतिष्ठानों और नागरिकों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

    अमेरिकी चेतावनी में यात्रा को लेकर भी सावधानी बरतने को कहा गया है। क्षेत्र से आने-जाने वाले अमेरिकी नागरिकों को हवाई अड्डों और एयरलाइंस के संचालन से संबंधित जानकारी पर लगातार नजर रखने की सलाह दी गई है। सुरक्षा स्थिति में बदलाव होने पर उड़ानों और यात्रा कार्यक्रमों में भी असर पड़ सकता है।

    पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच ट्रंप का कैंप डेविड से निर्धारित समय से एक दिन पहले व्हाइट हाउस लौटना महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि उनकी वापसी का आधिकारिक कारण स्पष्ट नहीं किया गया है।

    ईरान की ओर से एक तरफ बातचीत के लिए शर्तें सामने रखी गई हैं, जबकि दूसरी तरफ मांगें पूरी नहीं होने पर निर्णायक युद्ध की चेतावनी दी गई है। ऐसे में अमेरिका की अगली प्रतिक्रिया और ईरान के रुख पर क्षेत्रीय हालात की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।

    फिलहाल पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियां, अमेरिकी सुरक्षा अलर्ट और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ता तनाव चिंता का प्रमुख विषय बना हुआ है। क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी नागरिकों के लिए सुरक्षा और यात्रा संबंधी सावधानियां बढ़ा दी गई हैं।

  • ट्रंप ने रूस-ईरान प्रतिबंध कानून पर किए हस्ताक्षर, भारत और चीन जैसे ऊर्जा खरीदार देशों पर बढ़ा अमेरिकी दबाव

    ट्रंप ने रूस-ईरान प्रतिबंध कानून पर किए हस्ताक्षर, भारत और चीन जैसे ऊर्जा खरीदार देशों पर बढ़ा अमेरिकी दबाव

    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान से जुड़े एचआर 5334 विधेयक पर 18 सितंबर 2026 को हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया। इस कानून में रूस पर प्रतिबंधों, टैरिफ और अन्य पाबंदियों को लागू करने तथा उनका दायरा बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। साथ ही ईरान पर पहले से लागू प्रतिबंधों को आगे जारी रखने की व्यवस्था भी की गई है।

    ट्रंप के इस फैसले पर भारत में कांग्रेस की ओर से प्रतिक्रिया सामने आई है। कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने कहा कि किसी धौंस जमाने वाले का मुकाबला करने का एक ही तरीका है और वह है मजबूती से उसका प्रतिरोध करना।

    नए कानून में रूस के ऊर्जा क्षेत्र को लेकर भी कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। इसमें रूस के ऊर्जा कारोबार और उससे जुड़े प्रमुख खरीदार देशों पर दबाव बढ़ाने की व्यवस्था है। रूस के साथ बड़े स्तर पर ऊर्जा व्यापार करने वाले देशों में भारत और चीन भी शामिल हैं।

    कानून के तहत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। इससे रूस के साथ ऊर्जा कारोबार करने वाले देशों के लिए अमेरिकी प्रतिबंध नीति का प्रभाव बढ़ सकता है। हालांकि कानून पर हस्ताक्षर होने के साथ भारत पर तत्काल कोई नया टैरिफ लागू किए जाने की घोषणा नहीं हुई है।

    विधेयक में रूस के नेतृत्व, ऊर्जा क्षेत्र और रक्षा कारोबार से जुड़े नेटवर्क पर कार्रवाई के प्रावधान भी शामिल हैं। रूस के साथ रक्षा क्षेत्र में सहयोग करने वाले देशों और संस्थाओं पर दबाव बढ़ाने की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य रूस के आर्थिक और रणनीतिक नेटवर्क पर प्रतिबंधों का प्रभाव मजबूत करना है।

    कानून में रूस के ऊर्जा निर्यात से जुड़े नेटवर्क पर भी ध्यान दिया गया है। इसके जरिए प्रतिबंधों को दरकिनार करने वाली गतिविधियों पर कार्रवाई का रास्ता तैयार किया गया है। रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए टैरिफ और अन्य प्रतिबंधों का इस्तेमाल किए जाने की व्यवस्था की गई है।

    ईरान को लेकर भी कानून में महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। इसमें ईरान पर पहले से लागू प्रतिबंधों को आगे बढ़ाने की व्यवस्था की गई है। इस तरह रूस के साथ ईरान को लेकर भी अमेरिकी प्रतिबंध व्यवस्था को कानूनी आधार मिला है।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने इस विधेयक को 16 सितंबर 2026 को मंजूरी दी थी। इसके बाद विधेयक को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा गया। 18 सितंबर को ट्रंप ने इस पर हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया।

    भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस के साथ उसका ऊर्जा कारोबार लंबे समय से जारी है। रूस भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। ऐसे में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर संभावित अमेरिकी टैरिफ का मुद्दा भारत के आर्थिक और ऊर्जा हितों से जुड़ता है।

    जयराम रमेश की प्रतिक्रिया के बाद यह मुद्दा भारत की राजनीतिक बहस में भी सामने आया है। नए कानून के तहत भारत पर तत्काल कोई नया शुल्क लागू किए जाने की घोषणा नहीं हुई है। हालांकि आगे अमेरिकी प्रशासन इस कानून के प्रावधानों का किस तरह इस्तेमाल करता है, इससे भारत समेत रूस के साथ ऊर्जा कारोबार करने वाले देशों पर संभावित प्रभाव स्पष्ट होगा।

  • ईरान में महिलाओं का साहसिक कदम…. बिना हिजाब पहने 10 किमी दौड़ में लिया हिस्सा

    ईरान में महिलाओं का साहसिक कदम…. बिना हिजाब पहने 10 किमी दौड़ में लिया हिस्सा


    तेहरान।
    ईरान (Iran) की राजधानी तेहरान में महिलाओं के एक समूह ने देश के अनिवार्य हिजाब कानून का खुलेआम उल्लंघन करते हुए बिना हिजाब (Without Hijab) पहने 10 किलोमीटर की दौड़ (10 Kilometer Race) प्रतियोगिता में भाग लिया। यह साहसिक कदम ऐसे समय उठाया गया है जब ईरानी अधिकारी पहले भी इसी तरह बिना हिजाब के दौड़ के आयोजन पर सख्त कार्रवाई कर चुके थे। यह प्रतियोगिता वेलायात पार्क में आयोजित की गई थी, जिसमें पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग दौड़ की व्यवस्था थी।


    10 किमी की दौड़ प्रतियोगिता में भाग लिया

    सोशल मीडिया पर बिना हिजाब के दौड़ती महिलाओं के वीडियो वायरल हो रहे हैं। इस घटना ने ईरान के सख्त हिजाब कानून की ओर दुनिया का ध्यान खींचा है।


    युद्ध के बीच ईरान का शक्ति प्रदर्शन 3,13,000 लोगों ने दिखाई ताकत

    तेहरान। ईरान में शुक्रवार को सरकार के आह्वान पर बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। सरकारी मीडिया के अनुसार, तेहरान में 3.13 लाख लोगों ने मार्च में हिस्सा लिया, जबकि रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कमांडर जनरल हसन हसांजादेह ने दावा किया कि छह लाख से अधिक लोग सीमित सैन्य प्रशिक्षण के लिए पंजीकरण करा चुके हैं और प्रशिक्षण में 10 लाख से अधिक लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। तेहरान में प्रदर्शनकारियों ने ईरानी झंडे लेकर मार्च किया और देश की रक्षा के लिए हथियार उठाने की तैयारी जताई। सरकार ने इस अभियान को ‘जांफदाये ईरान’ यानी ‘ईरान के लिए जान कुर्बान करने वाले’ नाम दिया है। राज्य मीडिया कई दिनों से लोगों से इसमें शामिल होने की अपील कर रहा था।

  • हूती विद्रोहियों ने सऊदी पर किया बैलिस्टिक मिसाइल से हमला, राजधानी रियाद को बनाया निशाना

    हूती विद्रोहियों ने सऊदी पर किया बैलिस्टिक मिसाइल से हमला, राजधानी रियाद को बनाया निशाना


    रियाद।
    सऊदी अरब (Saudi Arabia) ने पुष्टि की है कि यमन के हूती विद्रोहियों (Yemen’s Houthi rebels) ने उसकी राजधानी रियाद (Riyadh) को बैलिस्टिक मिसाइल (Ballistic Missile attack) से निशाना बनाने की कोशिश की। शनिवार देर रात सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यह जानकारी दी। गठबंधन यमन में हूतियों के खिलाफ लड़ रहे सऊदी समर्थित बलों का नेतृत्व करता है। उसके मुताबिक, मिसाइल को हमले के प्रयास के दौरान ही रोक लिया गया था। यह रियाद को निशाना बनाकर किया गया पहला हमला था, जब से ईरान समर्थित हूतियों और सऊदी समर्थन वाले यमनी सरकारी बलों के बीच लड़ाई तेज हुई है।


    हूतियों ने सऊदी अरब में और किन जगहों को निशाना बनाने की कोशिश की?

    सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने कहा कि हूतियों ने लाल सागर के बंदरगाह शहर यानबू के अलावा ताइफ, बायश और फरासन में नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने की भी कोशिश की। गठबंधन के मुताबिक इन प्रयासों को भी नाकाम कर दिया गया। हालांकि, बयान में इन हमलों के बारे में इससे ज्यादा जानकारी नहीं दी गई।


    हूतियों ने हमले को लेकर क्या दावा किया?

    हूतियों ने इससे पहले दावा किया था कि उन्होंने रियाद में कुछ ‘संवेदनशील ठिकानों’ और यानबू में सऊदी तेल कंपनी अरामको को निशाना बनाया। हूतियों ने दावा किया कि इन हमलों के कारण ‘भारी आग’ लगी। हालांकि, उन्होंने अपने दावे के समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं किया। दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको ने टिप्पणी के लिए भेजे गए अनुरोध का जवाब नहीं दिया।


    तुर्की ने सऊदी अरब को सैन्य मदद देने का संकेत दिया

    इस बीच तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने संकेत दिया है कि हाल ही में हुए रक्षा समझौते के तहत तुर्की सऊदी अरब को सैन्य मदद दे सकता है। एक टीवी इंटरव्यू में जब उनसे तीन देशों के उस गठबंधन (जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है) के यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने की संभावना के बारे में पूछा गया, तो फिदान ने कहा कि तुर्की को किसी भी सैन्य ज़रूरत को पूरा करने में कोई दिक्कत नहीं होगी। उन्होंने कहा, ‘हम सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता पर बहुत गंभीर हमले देख रहे हैं। हमारे बीच गठबंधन का समझौता है और हम अपनी बात पर कायम हैं।

    इससे पहले भी सऊदी के तेल ढांचे पर हुआ था हमला
    रियाद पर ताजा मिसाइल हमले की कोशिश से पहले सऊदी अरब के अहम ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन पर ड्रोन हमला हुआ था। 11 सितंबर को हुए इस हमले के बाद पाइपलाइन का संचालन रोकना पड़ा, जिससे सऊदी के लाल सागर स्थित यानबू बंदरगाह से तेल निर्यात प्रभावित हुआ। इसी के चलते सऊदी अरामको ने यूरोप के कम से कम दो रिफाइनिंग ग्राहकों को अक्तूबर में दी जाने वाली कच्चे तेल की आपूर्ति नहीं करने की जानकारी दी है। सऊदी और इराकी अधिकारियों ने कहा है कि ड्रोन इराक से आए थे, लेकिन हमले के पीछे वास्तव में कौन था, इसकी स्पष्ट जिम्मेदारी अभी सामने नहीं आई है।

  • महाराष्ट्र के BJP मंत्री की भतीजी नीला विखे पाटिल बनीं स्वीडन की सांसद, स्टॉकहोम सिटी से जीता चुनाव

    महाराष्ट्र के BJP मंत्री की भतीजी नीला विखे पाटिल बनीं स्वीडन की सांसद, स्टॉकहोम सिटी से जीता चुनाव


    स्टॉकहोम सिटी। महाराष्ट्र के BJP मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल की भतीजी नीला विखे पाटिल ने स्वीडन की राजनीति में अहम मुकाम हासिल किया है। ग्रीन पार्टी की नेता नीला ने स्टॉकहोम सिटी से चुनाव जीतकर 349 सदस्यीय स्वीडिश संसद में जगह बनाई है। चुनाव परिणाम के बाद उन्होंने अपने परिवार, खासकर अपने दादा और पूर्व केंद्रीय मंत्री बालासाहेब विखे पाटिल से जुड़ी यादें साझा कीं।

    अहमदनगर में बीता बचपन, महाराष्ट्र से आज भी गहरा जुड़ाव

    नीला का जन्म स्वीडन में हुआ, लेकिन उनके बचपन के शुरुआती साल महाराष्ट्र के अहमदनगर में बीते। बाद में वह स्वीडन लौट गईं और वहीं से उन्होंने राजनीति में अपना सफर आगे बढ़ाया। महाराष्ट्र से उनका पारिवारिक रिश्ता कई पीढ़ियों पुराना है। उनके दादा बालासाहेब विखे पाटिल पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे हैं, जबकि पिता अशोक विखे पाटिल शिक्षाविद हैं। उनके चाचा राधाकृष्ण विखे पाटिल महाराष्ट्र सरकार में मंत्री हैं।

    चुनाव जीतने के बाद नीला ने अपने दादा को याद करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि बालासाहेब विखे पाटिल को उन पर गर्व होता। उन्होंने बताया कि जब वह 15 साल की थीं, तब उनके दादा उन्हें महाराष्ट्र का बजट पढ़ने के लिए दिया करते थे। नीला ने अपने दादा के साथ बिताए आखिरी वर्षों की याद भी साझा की। उन्होंने बताया कि उस दौरान उनके दादा लगभग हर सप्ताह उन्हें फोन करते थे और अब उन्हें उनकी बहुत याद आती है।

    प्रधानमंत्री कार्यालय में भी कर चुकी हैं काम

    नीला विखे पाटिल कई वर्षों से स्वीडन की राजनीति में सक्रिय रही हैं। पूर्व प्रधानमंत्री स्टीफन लोफवेन के कार्यकाल में उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में सलाहकार के तौर पर काम किया। इस दौरान वित्त, टैक्स और आवास से जुड़े विषयों पर उनकी जिम्मेदारी रही।

    इसके बाद वह स्टॉकहोम सिटी काउंसिल के लिए चुनी गईं। उन्होंने ग्रीन पार्टी की चुनाव समिति में भी काम किया। इसके अलावा वह स्वीडिश यंग ग्रीन्स और ग्रीन पार्टी की अन्य इकाइयों से जुड़ी रहीं।

    शिक्षा के क्षेत्र में भी नीला की पृष्ठभूमि विविध रही है। उन्होंने गोथेनबर्ग स्कूल ऑफ बिजनेस से अर्थशास्त्र और कानून की पढ़ाई की है। इसके साथ ही उन्होंने MBA की डिग्री हासिल की और मैड्रिड की कॉम्प्लूटेंस यूनिवर्सिटी में भी अध्ययन किया है।

    बच्चों के कल्याण और पर्यावरण पर रहेगा फोकस

    सांसद बनने के बाद नीला ने बच्चों के कल्याण और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करने की बात कही है। उनका कहना है कि वह उन लोगों की आवाज बनना चाहती हैं, जो खुद वोट नहीं दे सकते। साथ ही वह स्टॉकहोम और पूरे स्वीडन के लिए योगदान देना चाहती हैं।

    भारत के साथ अपने रिश्ते पर भी नीला ने बात की। उन्होंने कहा कि वह भारत से बहुत प्यार करती हैं और देश से उनका गहरा जुड़ाव है। उनके कई करीबी दोस्त भी भारतीय हैं।

    सहकारिता आंदोलन से भी जुड़ा है विखे पाटिल परिवार

    नीला के परिवार का महाराष्ट्र की राजनीति और शिक्षा के साथ-साथ सहकारिता आंदोलन से भी पुराना संबंध रहा है। उनके परदादा विठ्ठलराव विखे पाटिल ने एशिया की पहली सहकारी चीनी मिल की स्थापना की थी। इसी वजह से परिवार की सामाजिक और सहकारी क्षेत्र में भी अलग पहचान रही है।

    स्वीडन में विपक्ष को तीन सीटों का बहुमत

    स्वीडन के चुनाव में वामपंथी विचारों वाली चार विपक्षी पार्टियों ने कुल 176 सीटें हासिल की हैं, जबकि मौजूदा रूढ़िवादी सरकार का समर्थन करने वाली पार्टियों को 173 सीटें मिली हैं। इस तरह विपक्षी दलों को तीन सीटों का अंतर मिला है।

    नतीजे सामने आने के बाद प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन ने अपने इस्तीफे का ऐलान कर दिया। पूर्व प्रधानमंत्री मैग्डालेना एंडरसन की सोशल डेमोक्रेट्स पार्टी 99 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी है। हालांकि, विपक्षी दलों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं। ऐसे में नई सरकार बनाने के लिए एंडरसन को अलग-अलग दलों के साथ बातचीत करनी होगी।

  • हूती हमलों के बीच सऊदी के साथ तुर्की, बोला- जरूरत पड़ी तो सैन्य और तकनीकी मदद देंगे

    हूती हमलों के बीच सऊदी के साथ तुर्की, बोला- जरूरत पड़ी तो सैन्य और तकनीकी मदद देंगे


    नई दिल्ली। यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब पर लगातार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच तुर्की ने रियाद के समर्थन में बड़ा बयान दिया है। तुर्की के विदेश मंत्री हकन फिदान ने कहा कि सऊदी अरब को अगर सैन्य मदद की जरूरत पड़ती है तो अंकारा सहायता देने के लिए तैयार है। उन्होंने खास तौर पर तकनीकी सैन्य जरूरतों को पूरा करने की बात कही। यह बयान तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के बीच आया है।

    फिदान ने कहा कि सऊदी अरब की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर गंभीर हमले हो रहे हैं और इस मुद्दे पर तुर्की पूरी मजबूती के साथ रियाद के साथ खड़ा है। उन्होंने कहा कि तीनों देशों के बीच हुए रक्षा समझौते में गठबंधन का प्रावधान है। ऐसे में सऊदी अरब को किसी भी तरह की सैन्य जरूरत, विशेष रूप से तकनीकी सहायता की आवश्यकता होती है तो तुर्की उसे पूरा करने में पीछे नहीं हटेगा।

    क्या है मक्का संयुक्त रक्षा समझौता?

    तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच अगस्त में हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा। इसी समझौते को मौजूदा हूती हमलों के बीच पहली बड़ी परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है।

    हालांकि, समझौते के बावजूद अभी तक तुर्की या पाकिस्तान ने हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य अभियान शुरू करने की घोषणा नहीं की है। पाकिस्तान ने कहा है कि मक्का समझौते के तहत हूती हमलों के जवाब में तत्काल सैन्य कार्रवाई को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है, लेकिन जरूरत के मुताबिक वह आगे कदम उठाएगा।

    ईरान-अमेरिका संघर्ष में सऊदी को घसीटना स्वीकार्य नहीं: फिदान

    तुर्की के विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि सऊदी अरब को अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे व्यापक संघर्ष का हिस्सा बनाया जाना स्वीकार्य नहीं है। उनके मुताबिक रियाद की इस युद्ध में शामिल होने की कोई इच्छा नहीं है।

    फिदान ने कहा कि तुर्की ने संघर्ष खत्म करने के उद्देश्य से सभी संबंधित पक्षों के सामने कई प्रस्ताव रखे हैं। उन्होंने कहा कि कई पहल की गई हैं, लेकिन अब संबंधित पक्षों को उन्हें स्वीकार करना होगा। उन्होंने नए प्रस्तावों की भी जानकारी देते हुए उम्मीद जताई कि सभी पक्ष उन्हें मानेंगे।

    हूतियों का रियाद पर मिसाइल-ड्रोन हमले का दावा

    इस बीच शनिवार को हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद में संवेदनशील ठिकानों को मिसाइल और ड्रोन से निशाना बनाने का दावा किया। यह दावा रियाद के मुख्य एयरपोर्ट के पास आग और धुएं का गुबार दिखाई देने के कुछ घंटे बाद किया गया।

    सऊदी अरब के अधिकारियों के मुताबिक, उसकी एयर डिफेंस प्रणाली ने रियाद की ओर आ रही एक मिसाइल को हवा में ही रोककर नष्ट कर दिया। अधिकारियों ने रातभर संभावित हवाई हमले को लेकर लोगों को अलर्ट पर रखा। शनिवार सुबह स्थिति सामान्य होने की जानकारी दी गई।

    पाकिस्तान ने भी सऊदी की सुरक्षा को लेकर जताई प्रतिबद्धता

    हूती हमलों के बीच पाकिस्तान की भूमिका पर भी नजर बनी हुई है। इस्लामाबाद ने सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है, लेकिन अभी तक मक्का समझौते के तहत किसी संयुक्त सैन्य कार्रवाई की घोषणा नहीं की गई है। पाकिस्तान का कहना है कि उचित समय आने पर वह समझौते के तहत अपनी भूमिका निभाएगा।

    हूती हमलों के बढ़ने के साथ मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की व्यावहारिक भूमिका भी चर्चा में आ गई है। फिलहाल तुर्की ने सऊदी की सैन्य जरूरतों को पूरा करने की तैयारी जताई है, जबकि सीधे युद्ध में उतरने की घोषणा नहीं की है।

  • भारत चीन पर ट्रंप का बड़ा दांव रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ की तलवार

    भारत चीन पर ट्रंप का बड़ा दांव रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ की तलवार


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से जुड़े Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 पर हस्ताक्षर कर इसे कानून बना दिया है। इस कानून के बाद अमेरिका के पास रूस से तेल और गैस खरीदने वाले कुछ देशों के सामान पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार होगा। भारत और चीन उन प्रमुख देशों में शामिल हैं जिन पर इस प्रावधान का असर पड़ सकता है। हालांकि अभी यह समझना जरूरी है कि कानून लागू होने के साथ ही भारत पर 100 फीसदी टैरिफ नहीं लगा है। कानून राष्ट्रपति को ऐसा शुल्क लगाने का अधिकार देता है और वास्तविक दर तथा किन देशों या उत्पादों को इसके दायरे में रखा जाएगा इसका फैसला आगे किया जा सकता है।

    इस कानून का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा और अन्य आर्थिक गतिविधियों से होने वाली आय पर दबाव बढ़ाना है। रूस यूक्रेन युद्ध के कारण लंबे समय से अमेरिकी और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। नए कानून में रूस के अधिकारियों और वित्तीय संस्थानों के अलावा ऊर्जा क्षेत्र तथा प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल होने वाले तेल टैंकरों के खिलाफ भी कार्रवाई का प्रावधान है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक इसका मकसद रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है ताकि उसकी युद्ध संबंधी वित्तीय क्षमता को सीमित किया जा सके।

    भारत के लिए इस कानून का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि रूस लंबे समय से भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदा है। इसी वजह से भारत उन देशों की सूची में आता है जिन पर नए अमेरिकी टैरिफ अधिकार का इस्तेमाल किया जा सकता है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की ओर से जारी जानकारी में भारत और चीन समेत कई देशों को संभावित 100 फीसदी शुल्क वाले प्रावधान के तहत शामिल किया गया था।

    अगर अमेरिका भारत के खिलाफ अतिरिक्त टैरिफ लागू करता है तो इसका सीधा असर अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान की कीमत पर पड़ सकता है। भारत से अमेरिका को निर्यात होने वाले कपड़ा उत्पाद जेम्स एंड ज्वेलरी इंजीनियरिंग सामान लेदर समुद्री उत्पाद और कुछ औद्योगिक वस्तुओं पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका कितना शुल्क लगाता है और किन उत्पादों को इसके दायरे में शामिल करता है। भारतीय निर्यातकों के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चिंता इसी अनिश्चितता को लेकर है।

    भारत के सामने दूसरा विकल्प रूस से कच्चे तेल की खरीद घटाकर दूसरे देशों से आयात बढ़ाने का हो सकता है। भारत पहले से मध्य पूर्व अमेरिका और अन्य तेल उत्पादक देशों से कच्चा तेल खरीदता है। लेकिन सप्लायर बदलने की स्थिति में कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति और परिवहन लागत जैसे कई कारक भारत के आयात बिल को प्रभावित कर सकते हैं। इसका असर ऊर्जा लागत पर भी पड़ सकता है हालांकि घरेलू ईंधन कीमतों पर इसका प्रभाव सीधे तौर पर तय नहीं माना जा सकता।

    इस कानून का असर केवल भारत और अमेरिका के व्यापार तक सीमित नहीं रह सकता। चीन भी रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदता है और इसलिए वह भी अमेरिकी टैरिफ अधिकार के संभावित दायरे में है। इससे रूस की ऊर्जा बिक्री अमेरिका की व्यापार नीति और एशियाई देशों की ऊर्जा जरूरतों के बीच नया दबाव बन सकता है।

    सबसे अहम बात यह है कि फिलहाल 100 फीसदी टैरिफ की बात को संभावित अधिकार के तौर पर देखना चाहिए न कि भारत पर लागू हो चुके शुल्क के रूप में। ट्रंप प्रशासन के पास कानून के तहत टैरिफ की दर और उसके इस्तेमाल को लेकर व्यापक अधिकार हैं। इसलिए आने वाले समय में अमेरिकी सरकार की ओर से जारी होने वाले फैसले यह तय करेंगे कि भारत के निर्यात और दोनों देशों के व्यापार पर इसका वास्तविक असर कितना पड़ता है।

  • सिलहट-लंदन फ्लाइट में यात्रियों के बीच मारपीट, हवा में चले मुक्के; वीडियो वायरल

    सिलहट-लंदन फ्लाइट में यात्रियों के बीच मारपीट, हवा में चले मुक्के; वीडियो वायरल


    ढाका।
    बांग्लादेश की बिमान बांग्लादेश एयरलाइंस की सिलहट से लंदन जा रही उड़ान में दो यात्रियों के बीच हुई कहासुनी देखते ही देखते मारपीट में बदल गई। दोनों यात्रियों ने एक-दूसरे पर मुक्के बरसाए। इस दौरान एक यात्री की टी-शर्ट तक फट गई। केबिन क्रू और आसपास मौजूद यात्रियों ने हस्तक्षेप कर दोनों को अलग किया। घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

    घटना 16 सितंबर की बताई जा रही है। बिमान बांग्लादेश एयरलाइंस के जनरल मैनेजर फॉर पब्लिक रिलेशंस मोहिउद्दीन अहमद ने बताया कि उड़ान के दौरान दो यात्री आपस में भिड़ गए थे। स्थिति बिगड़ने पर क्रू ने हस्तक्षेप किया और दोनों को अलग कर मामला शांत कराया।

    पहले हुई कहासुनी, फिर शुरू हुई हाथापाई

    घटना के वीडियो में दोनों यात्रियों को पहले बहस करते और उसके बाद एक-दूसरे पर हाथ उठाते देखा जा सकता है। कुछ ही देर में विवाद मारपीट में बदल गया। आसपास बैठे यात्रियों में हलचल मच गई और कुछ लोग दोनों को अलग करने के लिए आगे आए।

    मारपीट के दौरान एक यात्री की टी-शर्ट फट गई। हालांकि, दोनों के बीच विवाद की शुरुआत किस बात को लेकर हुई, इसकी आधिकारिक वजह सामने नहीं आई है। कुछ स्थानीय रिपोर्टों में सीट को लेकर विवाद का उल्लेख किया गया है, लेकिन एयरलाइन ने इसकी पुष्टि नहीं की है।

    विमान में उपद्रव पर हो सकती है कानूनी कार्रवाई

    उड़ान के दौरान यात्रियों का हिंसक व्यवहार केवल आपसी विवाद तक सीमित नहीं माना जाता। विमान में किसी यात्री का आक्रामक आचरण दूसरे यात्रियों और चालक दल की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। ऐसे मामलों में संबंधित देश के कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

    ब्रिटेन की सिविल एविएशन अथॉरिटी के अनुसार, गंभीर रूप से बाधा डालने वाले यात्रियों को गिरफ्तार किया जा सकता है। परिस्थितियों के आधार पर उन पर आपराधिक कार्रवाई, जुर्माना या जेल की सजा हो सकती है। एयरलाइन भविष्य की उड़ानों के लिए ऐसे यात्री पर प्रतिबंध भी लगा सकती है। कुछ मामलों में यात्री के उपद्रव के कारण विमान का मार्ग बदलने पर होने वाला खर्च भी उससे वसूला जा सकता है।

    भारत में भी हैं उपद्रवी यात्रियों के खिलाफ नियम

    भारत में भी अनियंत्रित या उपद्रवी यात्रियों से निपटने के लिए नागरिक उड्डयन नियमों के तहत नो-फ्लाई प्रतिबंध का प्रावधान है। वर्ष 2023 में सरकार ने बताया था कि 2020 से उस समय तक 149 यात्रियों को अलग-अलग अवधि के लिए नो-फ्लाई सूची में रखा गया था।

    नियमों के तहत एयरलाइन की आंतरिक समिति घटना की जांच कर प्रतिबंध की अवधि तय कर सकती है। गंभीर मामलों में मामला कानून प्रवर्तन एजेंसियों को भी सौंपा जा सकता है।

    फिलहाल सिलहट-लंदन उड़ान में हुई इस घटना में संबंधित यात्रियों के खिलाफ आगे क्या कार्रवाई की गई, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है।

  • अमेरिका-सऊदी अरब के बीच सबसे बड़ा रक्षा सौदा… दो लाख करोड़ की विदेशी सैन्य बिक्री को मंजूरी

    अमेरिका-सऊदी अरब के बीच सबसे बड़ा रक्षा सौदा… दो लाख करोड़ की विदेशी सैन्य बिक्री को मंजूरी


    वॉशिंगटन।
    हूतियों के बढ़ते हमलों (Escalating Houthi attacks) के बीच अमेरिका (America) ने सऊदी अरब (Saudi Arabia) को 48 एफ-35 लड़ाकू विमान बेचने का रास्ता साफ कर दिया है। अमेरिकी विदेश विभाग ने 24.3 अरब डॉलर (लगभग 2 लाख करोड़ रुपये) की संभावित विदेशी सैन्य बिक्री (Foreign Military Sales) को मंजूरी दी है। यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब रियाद हूतियों के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए वॉशिंगटन से सैन्य मदद मांग रहा था।

    अमेरिका ने हालांकि, सऊदी अरब के आग्रह के बावजूद हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य कार्रवाई से इन्कार किया। इसके बजाय वॉशिंगटन ने रियाद को खुफिया जानकारी और टारगेटिंग सहायता देने की बात कही। इसी बीच हूतियों ने सऊदी शहरों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाकर दबाव बढ़ाया। ऐसे माहौल में सऊदी अरब की अपनी हवाई रक्षा क्षमता मजबूत करने की जरूरत और बढ़ी। इसी क्रम में एफ-35 सौदा सामने आया है।


    अमेरिका से क्या-क्या खरीदेगा सऊदी अरब

    अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक प्रस्तावित पैकेज में 48 एफ-35 विमान, 49 प्रैट एंड व्हिटनी एफ135 इंजन, सुरक्षित संचार और नेविगेशन उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध सहायता, स्पेयर पार्ट्स, प्रशिक्षण, सिम्युलेटर, सॉफ्टवेयर और लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल हैं।


    संकट सऊदी का, फायदा अमेरिकी रक्षा उद्योग का?

    घटनाक्रम को एक साथ देखें तो हूतियों के खिलाफ प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से पीछे हटने के बाद अमेरिका ने सऊदी को अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने के लिए अत्याधुनिक अमेरिकी हथियारों का विकल्प दिया है। 24.3 अरब डॉलर का सौदा वॉशिंगटन की रणनीति से मेल खाता है। 


    होर्मुज में तेल टैंकर पर ईरान का हमला

    ईरान ने दावा किया है कि उसने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की कोशिश कर रहे टोगो के झंडे वाले एक तेल टैंकर को निशाना बनाया है। ईरानी सरकारी प्रसारक ने रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के हवाले से बताया कि ‘ट्रेंड’ नाम के टैंकर ने जलडमरूमध्य से गुजरने का अवैध प्रयास किया था। रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की नौसेना ने चेतावनी दी है कि होर्मुज से बिना अनुमति गुजरने वाले जहाजों को नष्ट किया जा सकता है। इस बीच, ब्रिटेन के यूनाइटेड किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस (यूकेएमटीओ) ने ओमान के खासाब से करीब 16 नॉटिकल मील उत्तर-पूर्व में एक जहाज से जुड़े सुरक्षा घटनाक्रम की जानकारी दी।


    लाल सागर में तनाव और सऊदी पर हमले पूरी तरह अस्वीकार्य : भारत

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने लाल सागर क्षेत्र और सऊदी अरब में आर्थिक और नागरिक संपत्तियों पर हूती विद्रोहियों की ओर से किए जा रहे हमले क्षेत्रीय शांति को कमजोर कर रहे हैं। ये हमले बाब अल-मंदब जैसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापारिक मार्गों पर नौवहन की स्वतंत्रता को बाधित करते हैं। उन्होंने क्षेत्र में जल्द शांति और स्थिरता बहाल होने की उम्मीद जताई।भारत ने लाल सागर क्षेत्र में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति पर चिंता व्यक्त की है।

  • उत्तर कोरिया में 2000 साल से शांत पड़ा सीस्मिक जोन…. परमाणु परीक्षणों की वजह से अब लगातार आ रहे भूकंप

    उत्तर कोरिया में 2000 साल से शांत पड़ा सीस्मिक जोन…. परमाणु परीक्षणों की वजह से अब लगातार आ रहे भूकंप


    प्योंगयांग।
    उत्तर कोरिया (North Korea) ने साल पिछले कुछ सालों में कई बार परमाणु परीक्षण (Nuclear test) किया है। इसकी ही वजह से ऐसे इलाके में भी भूकंप (Earthquake) के झटके आ रहे हैं जहां पिछले 2000 सालों से एकदम शांति थी। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर कोरिया ने आखिरी बार 2017 में परमाणु परीक्षण किया था। एक स्टडी में पता चला है कि मंताप की पहाड़ियों के आसपास 2008 से 2025 के बीच 1399 भूकंप के झटके आ चुके हैं। जबकि 2013 से पहले यहां कभी भूकंप नहीं आया। 2006 से 2017 तक उत्तर कोरिया ने यहां कम से कम 6 बार परमाणु परीक्षण किया है।


    2013 में पहली बार आया बड़ा भूकंप

    रिपोर्ट के मुताबिक इस इलाके में पहली बार 2013 में बड़ा भूकंप आया। उस समय यहां तीसरा परमाणु परीक्षण किया गया था। 2017 में आखिरी परमाणु परीक्षण के बाद भूकंप की तीव्रता और फ्रेक्वेंसी दोनों बढ़ गईं। 2017 में इस इलाके में 6.3 तीव्रता का भूकंप आया। एक जानकार ने बातया कि उत्तर कोरिया की मंताप पहाड़ियों में आए भूकंप ज्यादा ताकतवर नहीं थे। इनकी तीव्रता 2 से 3 के बीच ही रही। वहीं इनका केंद्र भी धरती के ज्यादा नीचे नहीं होता था।


    ऐक्टिव हो गया पुराना सीस्मिक जोन

    यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने बताया, हमारे पास 2000 सालों का रिकॉर्ड है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि यहां कभी भूकंप नहीं आया लेकन इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि सीस्मिक गतिविधियां इस इलाके में बहुत कम थीं जो कि अचानक तेजी से बढ़ी हैं। कई जानकारों का कहना है कि 2017 के बाद मंताप की पहाड़ियां अपने पुराने रूप में वापस आ गई हैं। जानकारों का कहना है कि स्टडी से पता चला है 2000 साल से पहले इस इलाके में अकसर भूकंप आते थे। हो सकता है कि बार-बार होने वाले परमाणु परीक्षण की वजह से फाल्ट फिर से ऐक्टिव हो गए हों।

    उत्तर कोरिया ने सोमवार को कहा कि उसने मिसाइलों, तोप और ड्रोन का संयुक्त युद्धाभ्यास किया जिसमें ”गोलाबारी की भीषण विनाशकारी क्षमता” का प्रदर्शन किया गया। सरकारी समाचार एजेंसी ‘कोरियन सेंट्रल न्यूज एजेंसी’ (केसीएनए) ने बताया कि शनिवार को किए गए इस युद्धाभ्यास का उद्देश्य एकीकृत मारक क्षमता नियंत्रण प्रणाली के संचालन की प्रक्रिया का अभ्यास करना था। इससे पहले दक्षिण कोरिया की सेना ने कहा था कि उसे शनिवार सुबह उत्तर कोरिया के पूर्वी तटीय वोनसान क्षेत्र से कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें दागे जाने का पता चला।