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  • US: महंगाई को काबू में करने के लिए फेडरल रिजर्व का बड़ा फैसला…. ब्याज दरों में किया इजाफा

    US: महंगाई को काबू में करने के लिए फेडरल रिजर्व का बड़ा फैसला…. ब्याज दरों में किया इजाफा


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में जिद्दी बनी महंगाई (Inflation) पर लगाम कसने के लिए केंद्रीय बैंक ‘फेडरल रिजर्व’ (Central Bank ‘Federal Reserve’) ने एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। व्हाइट हाउस (White House) के लगातार दबाव को दरकिनार करते हुए फेडरल रिजर्व ने बुधवार को बेंचमार्क ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर दी है। वर्ष 2023 के बाद से यह पहला मौका है जब अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में इजाफा किया है। इस फैसले से न केवल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) की कम ब्याज दरों की मांग को झटका लगा है, बल्कि इसका असर वैश्विक बाजारों पर भी देखने को मिल सकता है।


    महंगाई पर लगाम लगाने के लिए उठाया सख्त कदम

    फेडरल रिजर्व ने मुख्य ब्याज दर (बेंचमार्क रेट) में 25 बेसिस प्वाइंट (0.25 फीसदी) की बढ़ोतरी की है। इस फैसले के बाद अमरीका में मुख्य ब्याज दर बढ़कर लगभग 3.9 फीसदी हो गई है। बैंक के इस कदम का सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा, जिससे समय के साथ होम लोन, ऑटो लोन और क्रेडिट कार्ड पर ब्याज दरें महंगी हो जाएंगी। त्रैमासिक अनुमानों को जारी करते हुए फेड की दर-निर्धारण समिति (एफओएमसी) ने संकेत दिया है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए इस साल के अंत तक ब्याज दरों को एक बार फिर बढ़ाकर 4.1 फीसदी तक किया जा सकता है।

    केंद्रीय बैंक ने अपने आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया, ‘आज की नीतिगत कार्रवाई मुद्रास्फीति (महंगाई) को केंद्रीय बैंक के दो प्रतिशत के लक्ष्य पर समयबद्ध तरीके से वापस लाने में मदद करेगी।’


    चुनाव से ठीक पहले आम जनता पर दोहरा बोझ?

    फेड का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी जनता पहले से ही खाद्य पदार्थों, पेट्रोल-डीजल और आवास की बढ़ती कीमतों से जूझ रही है। अमेरिका में महज सात हफ्ते बाद मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं, और ऐसे में बढ़ती महंगाई चुनावी अभियानों का सबसे मुख्य मुद्दा बन चुका है। ब्याज दरों के बढ़ने से आम उपभोक्ताओं के लिए कर्ज लेना और महंगा हो जाएगा।


    चेयरपर्सन केविन वॉश का क्या रुख?

    यह फैसला फेडरल रिजर्व के नए चेयरपर्सन केविन वॉश के रुख में आए एक बड़े मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से नियुक्त किए गए केविन वॉश ने इसी साल मई में फेड अध्यक्ष का पद संभाला था। पिछले साल जब ट्रंप इस पद के लिए उनके नाम पर विचार कर रहे थे, तब वॉश ने कई बार संकेत दिए थे कि फेड ब्याज दरों में कटौती कर सकता है। उन्होंने कम ब्याज दरों की राष्ट्रपति ट्रंप की मांग का समर्थन भी किया था। हालांकि, पद संभालने और लगातार ऊंची बनी महंगाई के आंकड़ों के बीच वॉश ने राजनीतिक दबाव के बजाय केंद्रीय बैंक की नीतिगत स्वायत्तता और महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता दी है।

    अमेरिकी सेंट्रल बैंक ने जनवरी 2026 से यूएस फेड रेट्स को स्थिर रखा है। बैंक ने एनर्जी की कीमतों में अचानक आए उछाल के असर को समझने और कीमतों पर टैरिफ के असर को पूरी इकॉनमी में फैलने देने के लिए इंतजार करने का फैसला किया था। हालांकि, पिछली यूएस फेड मीटिंग में वोटिंग करने वाले सदस्यों में से एक-चौथाई ने तुरंत यूएस फेड रेट बढ़ाने की मांग की, जो बाकी नौ वोटिंग सदस्यों की राय से अलग थी।

    अमरीका के केंद्रीय बैंक ‘फेडरल रिजर्व’ ने लगातार बनी हुई महंगाई पर रोक लगाने के उद्देश्य से 2023 के बाद पहली बार अपनी बेंचमार्क ब्याज दर में 0.25% की बढ़ोतरी की है। इससे ब्याज दरें बढ़कर 3.9% हो गई हैं, जिससे होम लोन, कार लोन और क्रेडिट कार्ड महंगे होंगे। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दरें घटाने के दबाव को दरकिनार करते हुए फेड ने इस साल के अंत तक दरों को 4.1% तक ले जाने का संकेत दिया है।

  • ईरान-हूती तनाव के बीच ट्रंप की अरब नेताओं से होगी बैठक, युद्ध की आगे की रणनीति पर होगी चर्चा

    ईरान-हूती तनाव के बीच ट्रंप की अरब नेताओं से होगी बैठक, युद्ध की आगे की रणनीति पर होगी चर्चा


    नई दिल्ली। सऊदी अरब पर हूती हमलों और ईरान के साथ जारी युद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले सप्ताह खाड़ी देशों के नेताओं से मुलाकात कर सकते हैं। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान मंगलवार को प्रस्तावित इस बैठक में खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सदस्य देशों के नेता या विदेश मंत्री शामिल हो सकते हैं। बातचीत के केंद्र में ईरान के साथ युद्ध की आगे की रणनीति के साथ खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा और युद्ध के बाद की अमेरिकी योजना रह सकती है।

    Axios ने तीन सूत्रों के हवाले से बैठक की जानकारी दी है। संभावित बैठक में सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान के नेता या विदेश मंत्री शामिल हो सकते हैं। हालांकि, बैठक का अंतिम एजेंडा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।

    ईरानी हमलों से खाड़ी देश भी प्रभावित

    ट्रंप की प्रस्तावित बैठक ऐसे समय हो रही है जब ईरान के साथ युद्ध के दौरान खाड़ी के उन देशों को भी ईरानी हमलों का सामना करना पड़ा है, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। इसके अलावा तेल और प्राकृतिक गैस के निर्यात में आई रुकावटों का असर इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ा है।

    ऐसे में अरब नेताओं के साथ बातचीत में क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े मुद्दे भी उठ सकते हैं।

    मक्का के एयरस्पेस तक पहुंचा ड्रोन, सऊदी ने बताया ‘रेड लाइन’

    सऊदी अरब और हूतियों के बीच भी तनाव लगातार बना हुआ है। हाल में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने दावा किया था कि हूतियों की ओर से लॉन्च किए गए ड्रोन को मक्का के प्रतिबंधित एयरस्पेस में पहुंचने से पहले ही रोक दिया गया।

    सऊदी गठबंधन ने कहा था कि दो पवित्र मस्जिदों की सुरक्षा उसके लिए “रेड लाइन” है। हालांकि, हूतियों ने मक्का को निशाना बनाने के दावे को खारिज करते हुए इसे झूठ बताया था।

    इस घटनाक्रम के बाद ट्रंप और अरब नेताओं की संभावित बैठक में ईरान युद्ध के साथ हूती गतिविधियों और खाड़ी देशों की सुरक्षा पर चर्चा की संभावना भी जताई जा रही है।

    युद्ध खत्म होने के बाद की योजना पर भी नजर

    Axios के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन ईरान के साथ युद्ध के बाद की रणनीति पर भी काम कर रहा है। ट्रंप और उनकी वरिष्ठ टीम इस योजना को तैयार कर रही है और इसे अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है।

    ट्रंप ने बुधवार को कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि युद्ध अब खत्म होने के करीब है। उन्होंने यह भी दावा किया था कि ईरान समझौता करना चाहता है और अमेरिका को ईरानी पक्ष की ओर से सीधे इस संबंध में संदेश मिला है।

    हालांकि, इन बयानों के बीच युद्ध को लेकर अमेरिकी प्रशासन की अंतिम रणनीति अभी स्पष्ट नहीं है।

    विदेश विभाग ने भेजे शुरुआती निमंत्रण

    अमेरिकी विदेश विभाग ने बुधवार को संभावित बैठक के लिए शुरुआती निमंत्रण भेजे हैं। व्हाइट हाउस ने इस रिपोर्ट पर टिप्पणी करने से इनकार किया है। एक सूत्र के मुताबिक, बैठक में अन्य अरब और मुस्लिम देशों के नेताओं को भी शामिल किया जा सकता है।

    इससे बैठक का दायरा केवल GCC देशों तक सीमित रहने के बजाय व्यापक क्षेत्रीय बातचीत का रूप ले सकता है। हालांकि, अंतिम भागीदारी और एजेंडा की आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।

    नेतन्याहू भी ट्रंप से मिलने की कोशिश में

    इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयॉर्क में ट्रंप से मुलाकात करना चाहते हैं। हालांकि, एक इजरायली सूत्र के अनुसार दोनों नेताओं की बैठक अभी तय नहीं हुई है।

    पिछले साल संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान ट्रंप ने आठ अरब और मुस्लिम देशों के नेताओं से मुलाकात की थी। उस दौरान उन्होंने गाजा में शांति को लेकर अपनी योजना का ड्राफ्ट उनके सामने रखा था। करीब एक सप्ताह बाद योजना सार्वजनिक की गई थी और उसके कुछ समय बाद युद्ध खत्म करने को लेकर एक समझौता हुआ था।

    अब सबकी नजर न्यूयॉर्क बैठक पर

    इस बार फिर संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान ट्रंप और खाड़ी देशों के नेताओं की प्रस्तावित बैठक ऐसे वक्त हो रही है, जब ईरान युद्ध और हूती हमलों ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है।

    बैठक का अंतिम एजेंडा सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि अमेरिका ईरान के साथ जारी संघर्ष, हूती खतरे और खाड़ी देशों की सुरक्षा को लेकर कौन से मुद्दे प्राथमिकता से उठाता है। फिलहाल बातचीत में युद्ध के अगले कदम के साथ संघर्ष खत्म होने की स्थिति में अमेरिकी रणनीति पर भी चर्चा होने की संभावना है।

  • अरब सागर में भारतीय युद्धपोत से पाकिस्तानी नौसैनिक जहाज की टक्कर, भारत ने राजनयिक स्तर पर दर्ज कराया कड़ा विरोध

    अरब सागर में भारतीय युद्धपोत से पाकिस्तानी नौसैनिक जहाज की टक्कर, भारत ने राजनयिक स्तर पर दर्ज कराया कड़ा विरोध

    नई दिल्ली ।उत्तरी अरब सागर में मंगलवार शाम भारतीय नौसेना के एक युद्धपोत और पाकिस्तानी नौसेना के जहाज PNS Hunain के बीच टक्कर हो गई। यह घटना अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में हुई। टक्कर के बाद भारत ने बुधवार को पाकिस्तान के चार्ज डी’अफेयर्स को तलब कर राजनयिक स्तर पर विरोध दर्ज कराया। भारतीय पक्ष ने पाकिस्तानी नौसैनिक इकाई के व्यवहार को अस्वीकार्य और गैर-पेशेवर बताया है। घटना में किसी के घायल होने की जानकारी नहीं है और भारतीय युद्धपोत को भी कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ।

    घटना के समय भारतीय नौसेना का युद्धपोत उत्तरी अरब सागर में नियमित निगरानी मिशन पर था। इसी दौरान पाकिस्तान नौसेना का ऑफशोर पेट्रोल जहाज PNS Hunain भारतीय युद्धपोत के करीब पहुंचा। भारतीय पक्ष के अनुसार, पाकिस्तानी जहाज तेज गति से आगे बढ़ रहा था और उसके संचालन का तरीका सुरक्षित नहीं था। इसी दौरान दोनों जहाजों के बीच टक्कर हो गई।

    बताया गया है कि भारतीय युद्धपोत की ओर से समुद्री रेडियो के चैनल 16 पर कई बार चेतावनी दी गई थी। इसके बावजूद पाकिस्तानी जहाज ने अपनी गति बढ़ाई और भारतीय युद्धपोत के आगे से निकलने का प्रयास किया। इसी दौरान दोनों नौसैनिक जहाज आपस में टकरा गए। भारतीय पक्ष के मुताबिक, टक्कर के बाद भी युद्धपोत का नियमित मिशन जारी रहा।

    भारत के विदेश मंत्रालय ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए पाकिस्तान के चार्ज डी’अफेयर्स को तलब किया। उन्हें संबंधित पाकिस्तानी अधिकारियों तक भारत की आपत्ति पहुंचाने और समुद्र में सभी सैन्य इकाइयों को आवश्यक सावधानी बरतने के लिए कहने को कहा गया। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच लागू संबंधित समझौतों के प्रावधानों का पालन किया जाना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों।

    इस मामले में भारत ने अप्रैल 1991 में हुए भारत-पाकिस्तान समझौते के अनुच्छेद 10 का भी हवाला दिया है। इस प्रावधान के तहत अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में दोनों देशों की नौसैनिक गतिविधियों के दौरान निर्धारित नियमों और सावधानियों का पालन करने की व्यवस्था है। भारत का कहना है कि समुद्र में सैन्य इकाइयों के संचालन के दौरान दोनों पक्षों को ऐसी परिस्थितियों से बचना चाहिए, जिनसे टक्कर या अन्य दुर्घटना की स्थिति पैदा हो।

    भारत ने इस्लामाबाद में अपने चार्ज डी’अफेयर्स को भी पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के सामने इस घटना पर विरोध दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। इस तरह मामले को दोनों देशों के राजनयिक चैनलों के माध्यम से उठाया गया है। भारतीय पक्ष ने समुद्री क्षेत्र में सैन्य इकाइयों के बीच सुरक्षित दूरी और सावधानी बरतने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

    भारत और पाकिस्तान की नौसेनाओं के बीच इस तरह की घटना पहले भी सामने आ चुकी है। वर्ष 2011 में अदन की खाड़ी में भारतीय नौसेना के INS Godavari और पाकिस्तानी नौसेना के PNS Babur के बीच टक्कर हुई थी। उस समय भी दोनों देशों ने घटना को लेकर एक-दूसरे के रुख पर सवाल उठाए थे। भारत ने उस मामले में भी 1991 के समझौते के अनुच्छेद 10 का हवाला दिया था।

    मौजूदा घटना में भारतीय युद्धपोत को किसी बड़े नुकसान या संरचनात्मक क्षति की जानकारी नहीं है और किसी व्यक्ति के घायल होने की भी खबर नहीं है। टक्कर के बाद भारत ने औपचारिक विरोध दर्ज कराते हुए समुद्र में सैन्य इकाइयों से तय सुरक्षा नियमों और दोनों देशों के बीच हुए समझौतों का पालन करने की आवश्यकता दोहराई है।

  • अमेरिका में विदेशी छात्रों के OPT पर 1 लाख डॉलर फीस का प्रस्ताव, भारतीय छात्रों के लिए बढ़ सकती है नौकरी की लागत

    अमेरिका में विदेशी छात्रों के OPT पर 1 लाख डॉलर फीस का प्रस्ताव, भारतीय छात्रों के लिए बढ़ सकती है नौकरी की लागत

    नई दिल्ली ।अमेरिका में पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्रों के लिए पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी का रास्ता महंगा होने की संभावना है। ट्रंप प्रशासन ने Optional Practical Training यानी OPT से संबंधित करीब 1 लाख डॉलर की फीस लगाने का प्रस्ताव रखा है। भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग 96 लाख रुपये बताई गई है। प्रस्ताव को व्हाइट हाउस की मंजूरी मिल चुकी है और अब इसे आगे नियम के रूप में लाया जा सकता है।

    OPT अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों को अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सीमित अवधि तक काम करने की अनुमति देता है। इसका उद्देश्य छात्रों को उनके अध्ययन से जुड़े क्षेत्र में व्यावहारिक अनुभव हासिल करने का अवसर देना है। आम तौर पर OPT के तहत छात्र 12 महीने तक काम कर सकते हैं। STEM यानी साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स से जुड़े पाठ्यक्रमों के छात्रों को इसके अलावा 24 महीने का अतिरिक्त समय मिल सकता है। इस तरह पात्र छात्रों को पढ़ाई के बाद कुल तीन साल तक काम करने का अवसर मिल सकता है।

    प्रस्तावित बदलाव के तहत OPT से जुड़ी फीस 1 लाख डॉलर निर्धारित करने की बात सामने आई है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इतनी बड़ी रकम का भुगतान कौन करेगा। डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी के प्रस्ताव में इस जिम्मेदारी को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं होने की बात कही गई है।

    फीस का भुगतान छात्र को करना होगा या उसे नौकरी देने वाली कंपनी को, यह फिलहाल तय नहीं है। कुछ कानूनी जानकारों के मुताबिक, OPT वाले विदेशी छात्र को नौकरी देने वाली कंपनी पर यह खर्च डाला जा सकता है। वहीं, इस बात को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं कि यदि भुगतान की जिम्मेदारी विश्वविद्यालयों पर आती है तो किसी दूसरी कंपनी में काम करने वाले छात्र के लिए कॉलेज इतनी बड़ी राशि क्यों वहन करेगा।

    प्रस्तावित फीस भारतीय छात्रों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद OPT के जरिए नौकरी करना वहां काम का अनुभव हासिल करने का एक प्रमुख रास्ता है। इसी अवधि में कुछ छात्रों को आगे चलकर नियोक्ता की मदद से H-1B वीजा के लिए अवसर मिल सकता है।

    यदि प्रस्तावित 1 लाख डॉलर की राशि छात्रों को स्वयं देनी पड़ती है, तो पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में नौकरी शुरू करना उनके लिए काफी महंगा हो सकता है। यदि इसका भुगतान कंपनियों या विश्वविद्यालयों को करना पड़ता है, तो इसका असर विदेशी छात्रों की भर्ती और रोजगार के अवसरों पर भी पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

    प्रस्ताव का असर केवल छात्रों तक सीमित रहने की बात भी सामने आई है। यदि विश्वविद्यालयों पर बड़ी वित्तीय जिम्मेदारी आती है, तो कुछ संस्थान विदेशी छात्रों की संख्या कम करने पर विचार कर सकते हैं। इससे अमेरिका में विदेशी छात्रों के लिए उपलब्ध अध्ययन विकल्पों पर असर पड़ सकता है। इसी तरह कंपनियों को भी विदेशी छात्रों से मिलने वाले प्रशिक्षित प्रतिभाशाली कर्मचारियों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पिछले साल करीब 3 लाख विदेशी छात्रों के पास OPT के जरिए अमेरिका में नौकरी करने की अनुमति थी। ऐसे में प्रस्तावित फीस का दायरा बड़ी संख्या में छात्रों तक पहुंच सकता है। फिलहाल प्रस्ताव से जुड़े प्रमुख सवालों में यह शामिल है कि 1 लाख डॉलर की फीस का भुगतान कौन करेगा और अंतिम नियम लागू होने पर उसकी वास्तविक शर्तें क्या होंगी।

  • लंदन में थलपति विजय की एक झलक पाने पहुंचे थे फैंस सुरक्षा कारणों से कार्यक्रम हुआ रद्द

    लंदन में थलपति विजय की एक झलक पाने पहुंचे थे फैंस सुरक्षा कारणों से कार्यक्रम हुआ रद्द


    नई दिल्ली। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और अभिनेता थलपति विजय इन दिनों लंदन दौरे पर हैं। उनके इस दौरे के दौरान मंगलवार को उस समय फैंस को निराशा हुई जब लंदन में प्रस्तावित उनका एक कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। विजय की एक झलक पाने के लिए बड़ी संख्या में प्रशंसक लंदन की मशहूर इमारत द शार्ड के बाहर पहुंच गए थे। कई लोग घंटों तक उनका इंतजार करते रहे लेकिन आखिरकार उन्हें बिना विजय को देखे ही वापस लौटना पड़ा।

    रिपोर्ट के मुताबिक विजय के कार्यक्रम को लंदन की मेट्रोपॉलिटन पुलिस से अनुमति नहीं मिली थी। पुलिस की ओर से सुरक्षा संबंधी कारणों का हवाला दिया गया। इसके बाद विजय की टीम की ओर से आयोजन स्थल के बाहर लाउडस्पीकर के जरिए कार्यक्रम रद्द किए जाने की जानकारी दी गई। फैंस को बताया गया कि लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं मिली है।

    विजय के इंतजार में कुछ प्रशंसक करीब चार घंटे तक द शार्ड के बाहर मौजूद रहे। कार्यक्रम रद्द होने की जानकारी मिलने के बाद उन्हें निराश होकर वापस लौटना पड़ा। वहां मौजूद एक प्रशंसक ने कहा कि सुरक्षा कारणों से कार्यक्रम रद्द करना ठीक है लेकिन वह और दूसरे लोग काफी समय से इंतजार कर रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि लंदन में मौजूद भीड़ तमिलनाडु में विजय के कार्यक्रमों के दौरान जुटने वाली भीड़ की तुलना में काफी कम थी।

    विजय का यह लंदन दौरा केवल प्रशंसकों से मुलाकात तक सीमित नहीं है। वह तमिलनाडु में निवेश आकर्षित करने के उद्देश्य से ब्रिटेन गए प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार लंदन दौरे के दौरान तमिलनाडु से जुड़े कई निवेश समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इन समझौतों का कुल निवेश लगभग 12300 करोड़ रुपये बताया गया है।

    इन प्रस्तावित निवेशों में वाहन कलपुर्जा निर्माण अनुसंधान और विकास नवीकरणीय ऊर्जा पावर ग्रिड उपकरण और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर जैसे क्षेत्र शामिल हैं। तमिलनाडु सरकार के अनुसार इन निवेशों से राज्य में रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।

    इनमें प्रमुख समझौता मदरसन इंटरनेशनल लिमिटेड से जुड़ा बताया गया है। कंपनी तमिलनाडु में अपने डिजाइन इंजीनियरिंग निर्माण एकीकरण और लॉजिस्टिक केंद्रों के विस्तार के लिए करीब 11000 करोड़ रुपये निवेश करने की योजना बना रही है। इससे लगभग 7000 नौकरियां पैदा होने की उम्मीद जताई गई है।

    इसके अलावा ब्रिटेन की विल्सन पावर सॉल्यूशंस तिरुवल्लूर जिले में ट्रांसफॉर्मर निर्माण से जुड़े अपने संचालन के अगले चरण के लिए करीब 300 करोड़ रुपये निवेश करेगी। इस परियोजना से लगभग 400 नए रोजगार मिलने की उम्मीद है।

    विजय के बुधवार को ब्रिटेन से भारत लौटने का कार्यक्रम बताया गया है। लंदन में उनका कार्यक्रम सुरक्षा कारणों से रद्द होने के बावजूद उनका दौरा तमिलनाडु में निवेश से जुड़े समझौतों के कारण चर्चा में बना हुआ है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक तरफ विजय के प्रशंसकों को निराश किया है तो दूसरी तरफ उनके राजनीतिक और प्रशासनिक दौरे से जुड़े निवेश प्रयासों को भी सुर्खियों में ला दिया है।

  • अमेरिका में ग्रीन कार्ड नियम पर कानूनी जंग, 22 राज्यों ने ट्रंप प्रशासन को कोर्ट में घेरा

    अमेरिका में ग्रीन कार्ड नियम पर कानूनी जंग, 22 राज्यों ने ट्रंप प्रशासन को कोर्ट में घेरा

    नई दिल्ली। अमेरिका में ग्रीन कार्ड से जुड़े नए ‘पब्लिक चार्ज’ नियम को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के इस नियम को चुनौती देते हुए 14 सितंबर को दो अलग-अलग मुकदमे दायर किए गए। एक याचिका 22 अमेरिकी राज्यों और कोलंबिया जिले ने दाखिल की है, जबकि दूसरी न्यूयॉर्क शहर के नेतृत्व में शिकागो, सैन फ्रांसिस्को, सिएटल समेत स्थानीय सरकारों ने दायर की है। नया नियम 18 सितंबर 2026 से लागू होना है।

    ग्रीन कार्ड क्यों अहम है?

    अमेरिका में स्थायी रूप से रहने और काम करने की अनुमति देने वाला ग्रीन कार्ड लाखों प्रवासियों के लिए महत्वपूर्ण है। रोजगार आधारित आव्रजन के जरिए स्थायी निवास का इंतजार कर रहे भारतीय पेशेवरों के लिए भी इसका खास महत्व है। ग्रीन कार्ड स्थायी निवास का दर्जा देता है और आगे चलकर अमेरिकी नागरिकता के लिए आवेदन करने का रास्ता भी खोल सकता है।

    क्या है नया ‘पब्लिक चार्ज’ नियम?

    नए नियम के तहत अमेरिकी आव्रजन अधिकारी ग्रीन कार्ड, कुछ वीजा या अमेरिका में प्रवेश से जुड़े आवेदनों पर फैसला लेते समय आवेदक के सार्वजनिक सहायता कार्यक्रमों के इस्तेमाल को भी ध्यान में रख सकेंगे। इनमें मेडिकेड, खाद्य सहायता, आवास सहायता और बच्चों से जुड़ी कुछ स्वास्थ्य योजनाएं शामिल हैं। सरकार का तर्क है कि स्थायी निवास हासिल करने वालों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहिए और नीति का उद्देश्य सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा करना है।

    22 राज्यों ने क्यों दी चुनौती?

    22 राज्यों और कोलंबिया जिले का कहना है कि नियम से उन परिवारों पर असर पड़ सकता है जो कानूनी रूप से सरकारी सहायता के पात्र हैं। मुकदमे में तर्क दिया गया है कि नियम की अस्पष्टता के कारण प्रवासी परिवार सहायता लेने से बच सकते हैं, भले ही वे उसके लिए पात्र हों। राज्यों ने यह भी कहा है कि इससे स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण कार्यक्रमों और राज्य के वित्त पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

    DHS के अनुमान के मुताबिक करीब 9.5 लाख लोग सार्वजनिक सहायता योजनाओं से नाम वापस ले सकते हैं या उनमें नया नामांकन नहीं करा सकते हैं। राज्यों का कहना है कि इसका असर उन अमेरिकी नागरिक बच्चों पर भी पड़ सकता है जिनके माता-पिता अप्रवासी हैं और जो स्वयं इन योजनाओं के पात्र हो सकते हैं।

    ममदानी के नेतृत्व में दूसरा मुकदमा

    न्यूयॉर्क शहर के मेयर जोहरान ममदानी के नेतृत्व में दायर दूसरे मुकदमे में शिकागो, सैन फ्रांसिस्को, सिएटल और कुछ काउंटी सरकारें भी शामिल हैं। इन स्थानीय सरकारों का कहना है कि नियम से परिवार जरूरी स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं का इस्तेमाल करने से डर सकते हैं। इस मुकदमे में नियम की वैधानिकता और उसके व्यापक प्रभाव को चुनौती दी गई है।

    ट्रंप प्रशासन का क्या कहना है?

    ट्रंप प्रशासन नए नियम को आत्मनिर्भरता और सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा से जोड़ रहा है। प्रशासन का कहना है कि स्थायी निवास के लिए आवेदन करने वालों की आर्थिक स्थिति और संभावित सरकारी निर्भरता पर विचार करना आव्रजन कानून के तहत सरकार के अधिकारों के दायरे में आता है। दूसरी ओर, मुकदमा दायर करने वाले राज्यों और स्थानीय सरकारों का तर्क है कि नए नियम से आव्रजन अधिकारियों को बहुत व्यापक विवेकाधिकार मिल जाएगा।

    भारतीयों के लिए क्या बदलेगा?

    नियम का मतलब यह नहीं है कि ग्रीन कार्ड के हर आवेदक को सरकारी सहायता लेने पर स्वतः आवेदन खारिज कर दिया जाएगा। प्रभाव आवेदक की व्यक्तिगत परिस्थितियों, संबंधित लाभ और आव्रजन अधिकारी के आकलन पर निर्भर करेगा। हालांकि, भारतीय पेशेवरों और अन्य प्रवासियों के लिए यह अमेरिकी स्थायी निवास प्रक्रिया में एक नया कारक जोड़ता है।

    फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि 18 सितंबर से नियम लागू होने से पहले अदालतें इसकी समीक्षा के दौरान क्या आदेश देती हैं। दोनों मुकदमों में नए नियम को रोकने और उसे गैरकानूनी घोषित करने की मांग की गई है।

  • मध्य अमेरिका में भयावह सूखा संकट, तीन देशों में इमरजेंसी; फसलें बर्बाद, करोड़ों लोगों पर असर

    मध्य अमेरिका में भयावह सूखा संकट, तीन देशों में इमरजेंसी; फसलें बर्बाद, करोड़ों लोगों पर असर

    नई दिल्‍ली।  मध्य अमेरिका में अल नीनो के प्रभाव के चलते सूखे का संकट लगातार गहराता जा रहा है। ग्वाटेमाला में सूखे से 32 लाख से अधिक लोगों के सामने तत्काल मानवीय सहायता की जरूरत पैदा हो गई है। यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र की रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र में मक्का और बीन्स की फसलें बड़े पैमाने पर प्रभावित हुई हैं। पैदावार में गिरावट और जल संकट बढ़ने से खाद्य सुरक्षा पर भी गंभीर खतरा पैदा हो गया है। हालात को देखते हुए होंडुरास, अल साल्वाडोर और पनामा में आपातकाल या रेड अलर्ट घोषित किया गया है।

    होंडुरास से पनामा तक आपात स्थिति

    होंडुरास ने 19 अगस्त को सूखे को लेकर आपातकाल घोषित किया था। इसके बाद 26 अगस्त को रेड अलर्ट का दायरा बढ़ाकर 103 नगरपालिकाओं तक कर दिया गया। अल साल्वाडोर के पर्यावरण मंत्रालय ने 25 अगस्त को पूरे देश में रेड अलर्ट जारी किया। यहां एक तरफ अनियमित बारिश और दूसरी ओर रिकॉर्ड गर्मी ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

    पनामा में भी सरकार ने 25 अगस्त को राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया। देश की 11 प्रमुख जलधाराओं में जलस्तर कम होने से पनबिजली उत्पादन के साथ-साथ लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने पर भी संकट गहराया है।

    रिकॉर्ड गर्मी और कम बारिश ने बढ़ाई परेशानी

    मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, मध्य अमेरिका में मौजूदा हालात सामान्य मौसमी सूखे से कहीं अधिक गंभीर हैं। अल साल्वाडोर में मई के दौरान सामान्य से 41 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई, जबकि अगस्त में लगातार 19 दिन तक सूखे की स्थिति बनी रही। इस दौरान सांता रोसा डी लीमा में तापमान 43.9 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया।

    अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) ने भी इस वर्ष बेहद तीव्र अल नीनो की 90 प्रतिशत से अधिक संभावना जताई है। इसके चलते 1950 के बाद के कई पुराने मौसम रिकॉर्ड टूटने की आशंका व्यक्त की गई है।

    पूर्वी अफ्रीका में भी फसलों पर असर

    यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र की वैश्विक समीक्षा के अनुसार, अल नीनो का प्रभाव केवल मध्य अमेरिका तक सीमित नहीं है। पूर्वी अफ्रीका में भी भीषण गर्मी और सूखे के कारण फसलों को भारी नुकसान हुआ है। वहां 14 क्षेत्र अकाल के कगार पर पहुंच गए हैं। सूडान और दक्षिण सूडान में पहले से जारी गृहयुद्ध ने खाद्य संकट को और गंभीर बना दिया है।

    वहीं मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, मध्य एवं दक्षिण एशिया तथा दक्षिणी दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में फिलहाल फसलों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है। इससे पता चलता है कि अल नीनो दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश और तापमान के पैटर्न को एक समान तरीके से प्रभावित नहीं करता।

  • पश्चिम एशिया में चल रही जंग से पाकिस्तान की हालत हुई खराब… बनी लॉकडाउन वाली स्थिति

    पश्चिम एशिया में चल रही जंग से पाकिस्तान की हालत हुई खराब… बनी लॉकडाउन वाली स्थिति


    इस्लामाबाद।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में चल रही जंग से पाकिस्तान (Pakistan) बेदम हो चुका है। महीनों से जंग में चौधरी बनने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान (Pakistan) के हाथ कुछ नहीं लग पाया और अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध (America and Iran War) अब भी जारी है। बीते सप्ताह क्षेत्र में तनाव तब बढ़ गया जब सऊदी अरब (Saudi Arabia) और हूती विद्रोहियों के बीच भी जंग शुरू हो गई है। ऐसे में तेल संकट बढ़ गया है। पाकिस्तान में तो अब हालात ऐसे हैं कि लॉकडाउन वाली स्थिति बन गई है।

    बता दें कि पाकिस्तान का फॉरेन रिजर्व पहले ही खाली पड़ा है और उसने हाल ही में माना था कि वह जल्द ही अमेरिका के पास गिड़गिड़ाने जाएगा। इस बीच पाकिस्तान की मुसीबत तब बढ़ गई जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम आसमान छू रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक अब पाकिस्तान की सरकार ‘पेट्रोलियम स्मार्ट लॉकडाउन’ लगाने की योजना बना रही है।


    हफ्ते में 4 दिन ही होगा कामकाज

    रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान की हालत इतनी बुरी है कि कामकाज भी ठप हो सकता है। पेट्रोल लॉकडाउन के तहत सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के लिए हफ्ते में केवल 4 दिन काम करने का नियम लागू हो सकता है। वहीं छुट्टियों को शुक्रवार से रविवार तक बढ़ाकर सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही को कम करने का प्लान है।

    इसके अलावा सरकारी दफ्तरों में कर्मचारियों को रोटेशन बेसिस पर बुलाया जाएगा और अधिकतर लोगों को घर से काम करने का निर्देश दिया जाएगा। वहीं पेट्रोल-डीजल और बिजली बचाने के लिए शॉपिंग मॉल्स, व्यावसायिक बाजारों और मैरिज हॉल को शाम को जल्दी बंद करने का फैसला लिया जा सकता है।


    भत्ता भी कटेगा

    शहबाज शरीफ की सरकार मजबूरी में अपने कर्मचारियों का वेतन तक काटेगी। सरकारी तंत्र में ईंधन बचाने के लिए लगभग 50 फीसदी सरकारी गाड़ियों के इस्तेमाल पर रोक लगाने का प्रस्ताव है। वहीं अधिकारियों के गैर-जरूरी दौरों और सरकारी पेट्रोल भत्तों में भी भारी कटौती की जाएगी। गौरतलब है कि पाकिस्तान ने इससे पहले भी इस तरह के उपाय लागू किए थे। अधिकारियों के वेतन तक काटने के आदेश दे दिए गए थे। हालांकि फायदा कुछ नहीं मिला।

  • भारतीय छात्रों के लिए न्यूजीलैंड ने खोले दरवाजे…. पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा नियमों में किया बदलाव

    भारतीय छात्रों के लिए न्यूजीलैंड ने खोले दरवाजे…. पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा नियमों में किया बदलाव


    वेलिंगटन।
    न्यूजीलैंड (New Zealand) ने भारतीय छात्रों (Indian Students) के लिए पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा नियमों (Post-Study Work Visa Rules) में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। न्यूजीलैंड के आव्रजन मंत्रालय ने 15 सितंबर 2026 को नए अल्पकालिक स्नातक कार्य वीजा की घोषणा की है। यह वीजा 16 नवंबर 2026 से लागू होगा। इसके तहत पात्र अंतरराष्ट्रीय स्नातकों को छह महीने तक खुले तौर पर काम करने का अधिकार मिलेगा।

    यह नया वीजा उन छात्रों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद होगा जो पढ़ाई पूरी करने के बाद तत्काल लंबे समय के पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा के पात्र नहीं होते। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे छात्रों को नौकरी तलाशने और रोजगार हासिल करने के लिए छह महीने का समय देना है।

    इस अवधि में वे मान्यता प्राप्त नियोक्ता कार्य वीजा जैसे दीर्घकालिक विकल्पों की ओर बढ़ सकेंगे। 16 नवंबर से एक और महत्वपूर्ण बदलाव भी लागू होगा। इसके तहत न्यूजीलैंड में योग्यता और प्रमाणन ढांचे के सातवें स्तर का पात्र स्नातक डिप्लोमा पूरा करने वाले छात्र पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा के पात्र हो सकेंगे। इन छात्रों के पास पहले से स्नातक डिग्री होनी चाहिए।


    पात्र योग्यता पूरी करनी होगी

    छह महीने के खुले कार्य वीजा के लिए छात्र को न्यूजीलैंड योग्यता और प्रमाणन ढांचे के पांचवें, छठे या सातवें स्तर की पात्र योग्यता पूरी करनी होगी। पढ़ाई पूर्णकालिक होनी चाहिए और न्यूजीलैंड में कम से कम 24 सप्ताह की होनी जरूरी है। अंग्रेजी भाषा, आधारभूत और सहभागी योग्यताएं इसके दायरे में नहीं होंगी। आवेदक के पास न्यूजीलैंड में रहने के दौरान अपने खर्च के लिए कम से कम 5,000 न्यूजीलैंड डॉलर होने चाहिए।

  • Report : अमेरिका ने ईरान जंग में अब तक 38 अरब डॉलर फूंके….., महंगाई पर पड़ेगा युद्ध का असर

    Report : अमेरिका ने ईरान जंग में अब तक 38 अरब डॉलर फूंके….., महंगाई पर पड़ेगा युद्ध का असर


    वाशिंगटन।
    ईरान के खिलाफ युद्ध (Iran War) पर 1 अगस्त तक अमेरिका (America) के रक्षा विभाग के 38 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। यह खर्च आगे भी जारी रहेगा। युद्ध की स्थिति और उसकी तीव्रता के आधार पर हर महीने तीन अरब डॉलर या उससे ज्यादा खर्च हो सकते हैं। यह आकलन मंगलवार को गैर-दलीय संस्था कांग्रेसनल बजट कार्यालय (सीबीओ) (Congressional Budget Office – CBO) ने जारी किया।

    सीबीओ ने कहा कि इस युद्ध का असर महंगाई पर 2027 की पहली तिमाही तक रह सकता है। इसके कारण महंगाई पहले के अनुमान से करीब 0.5 प्रतिशत अंक ज्यादा रह सकती है। इसकी बड़ी वजह तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति में कमी है। ईरान युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से इनकी आवाजाही प्रभावित हुई है। लाल सागर से होने वाली जहाजों की आवाजाही में भी बाधा आई है।

    यह अनुमान प्रतिनिधि ब्रेंडन बॉयल के जानकारी मांगने के बाद तैयार किया गया। बॉयल प्रतिनिधि सभा की बजट समिति में सबसे वरिष्ठ डेमोक्रेट सदस्य हैं। सीबीओ का यह अनुमान पहले दिए गए रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के अनुमान से काफी मिलता है। हेगसेथ ने सीनेट में गवाही के दौरान युद्ध की लागत 37.5 अरब डॉलर बताई थी।

    सीबीओ के मुताबिक, इस खर्च का बड़ा हिस्सा युद्ध में इस्तेमाल हुई या नष्ट हुई मिसाइलों, हथियारों और सैन्य उपकरणों को फिर से खरीदने पर हो रहा है। इसमें युद्ध में मारे गए या घायल हुए अमेरिकी सैनिकों का खर्च शामिल नहीं है। इसमें भविष्य में सैनिकों की स्वास्थ्य देखभाल और विकलांगता मुआवजे का खर्च भी शामिल नहीं किया गया है।

    ब्रेंडन बॉयल ने कहा कि युद्ध की मानवीय कीमत के अलावा अमेरिकी लोगों को इसकी आर्थिक कीमत भी चुकानी पड़ रही है। उन्होंने कहा कि सीबीओ की गैर-दलीय रिपोर्ट से साफ है कि युद्ध पर अमेरिकी करदाताओं के अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं। खर्च अभी भी बढ़ रहा है। इसके साथ ही आम लोगों के लिए चीजों की कीमतें भी बढ़ रही हैं।

    बॉयल ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन कई वर्षों से अमेरिकी लोगों से कहते रहे हैं कि देश में परिवारों की मदद करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। लेकिन उनके मुताबिक, सरकार एक ऐसे युद्ध पर अरबों डॉलर खर्च कर सकती है, जिसे उन्होंने गैर-जिम्मेदाराना बताया। उन्होंने कहा कि इस युद्ध की कीमत आखिरकार अमेरिकी लोगों को चुकानी पड़ रही है।


    50 से ज्यादा विमान-हेलिकॉप्टर और ड्रोन गंवाए

    ईरान के खिलाफ 28 फरवरी से 30 जून तक चले ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में अमेरिका को भारी सैन्य और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। पेंटागन के महानिरीक्षक की सोमवार को जारी रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी हमलों और युद्ध से जुड़े हादसों में अमेरिका के 50 से ज्यादा विमान, हेलिकॉप्टर और ड्रोन नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए। इनमें 30 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन शामिल हैं।

    रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी मिसाइल व ड्रोन हमलों से कुवैत, बहरीन, कतर, यूएई, सऊदी अरब, इराक, ओमान व जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सैकड़ों इमारतों को नुकसान पहुंचा।

    अमेरिका ने ये विमान खोए : अमेरिका के चार एफ-15ई लड़ाकू विमान नष्ट हुए। इसके अलावा ए-10 थंडरबोल्ट- एक, ई-3 सेंट्री- एक व एक एएच-64 अपाचे भी गंवाया। एक एफ-35ए और 7 केसी-135 विमान भी क्षतिग्रस्त हुए। इनमें से एक 12 मार्च को इराक में ईंधन भरने के मिशन में दुर्घटनाग्रस्त हुआ, जिसमें सभी छह सदस्यों की मौत हो गई थी।


    गोला-बारूद के भंडार पर बढ़ा दबाव :

    रिपोर्ट ने अमेरिकी हथियारों और गोला-बारूद के भंडार पर बढ़ते दबाव तथा आपूर्ति शृंखला में बाधाओं की ओर भी इशारा किया है। ट्रंप ने हथियारों की कमी के दावे को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका इतिहास में सबसे अधिक आधुनिक हथियार बना रहा है।