Category: International

  • ईरान के विदेश मंत्री अराघची का अमेरिका और इजरायल पर तीखा आरोप, बोले- आलोचकों की आवाज दबाने में हो रहा टैक्सदाताओं के धन का इस्तेमाल

    ईरान के विदेश मंत्री अराघची का अमेरिका और इजरायल पर तीखा आरोप, बोले- आलोचकों की आवाज दबाने में हो रहा टैक्सदाताओं के धन का इस्तेमाल

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने अमेरिका और इजरायल को लेकर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी करदाताओं के धन का उपयोग इजरायल की आलोचना करने वाली आवाजों को दबाने के लिए किया जा रहा है। अराघची का यह बयान ऐसे समय आया है, जब क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज हैं और अमेरिका तथा ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है।

    विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया पर एक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका की रिपोर्ट साझा करते हुए कहा कि अमेरिका में विदेशी प्रभाव को लेकर लगातार चर्चा होती है, लेकिन इजरायल से जुड़े कथित प्रभाव अभियानों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। उनके अनुसार यह गंभीर विषय है और इससे अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा सार्वजनिक विमर्श पर असर पड़ सकता है। उन्होंने दावा किया कि इस पूरे मामले से जुड़े तथ्यों को समय के साथ सार्वजनिक किया जाएगा।

    अराघची ने अपने बयान में यह भी कहा कि अमेरिका को ऐसे संघर्षों में शामिल करने की कोशिश की जा रही है, जो उसकी प्राथमिकताओं का हिस्सा नहीं रहे हैं। उनका कहना था कि पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों में सभी पक्षों को संयम और कूटनीतिक समाधान की दिशा में प्रयास करना चाहिए। हालांकि उनके आरोपों पर अमेरिका या इजरायल की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।

    इस बीच क्षेत्रीय तनाव को लेकर ईरान के शीर्ष सैन्य नेतृत्व की ओर से भी कड़े बयान सामने आए हैं। ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व से जुड़े एक वरिष्ठ सैन्य सलाहकार ने चेतावनी दी कि यदि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई जारी रहती है तो संघर्ष का दायरा और व्यापक हो सकता है। उन्होंने कहा कि अब तक ईरान ने स्थिति को बड़े क्षेत्रीय संकट में बदलने से रोकने के लिए संयम बरता है, लेकिन लगातार हमलों की स्थिति में उसकी प्रतिक्रिया अधिक व्यापक हो सकती है।

    सैन्य सलाहकार ने यह भी संकेत दिया कि यदि हालात नहीं बदले तो ईरान अपनी अतिरिक्त सैन्य क्षमताओं को सक्रिय कर सकता है। उनके अनुसार भविष्य की रणनीति परिस्थितियों के अनुसार तय की जाएगी। इन बयानों ने पहले से ही संवेदनशील पश्चिम एशियाई स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

    विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा समय में पश्चिम एशिया की स्थिति अत्यंत संवेदनशील बनी हुई है। एक ओर राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज हो रही है, वहीं दूसरी ओर सैन्य गतिविधियों और कूटनीतिक प्रयासों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ती जा रही है। ऐसे हालात में किसी भी पक्ष की ओर से उठाया गया बड़ा कदम क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।

    अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच आगे होने वाले घटनाक्रम पर टिकी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि तनाव कम करने के लिए संवाद और कूटनीतिक पहल सबसे प्रभावी विकल्प हो सकते हैं। फिलहाल सभी पक्षों के बयानों और संभावित कदमों पर वैश्विक स्तर पर करीबी नजर रखी जा रही है, क्योंकि इनका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया ही नहीं बल्कि वैश्विक सुरक्षा और आर्थिक परिस्थितियों पर भी पड़ सकता है।

  • अमेरिका ने ईरान के चाबहार में तबाह किया सर्विलांस टावर, भारत से है कनेक्शन, जाने कैसे ?

    अमेरिका ने ईरान के चाबहार में तबाह किया सर्विलांस टावर, भारत से है कनेक्शन, जाने कैसे ?


    वॉशिंगटन। अमेरिका ने दावा किया है कि उसकी सेना ने ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के एक महत्वपूर्ण सर्विलांस टावर को नष्ट कर दिया है। अमेरिकी सेना ने इस कार्रवाई का वीडियो फुटेज भी जारी किया है।

    अमेरिका के अनुसार, यह हमला होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की निगरानी और सैन्य क्षमता को कमजोर करने के अभियान का हिस्सा था। अमेरिकी सेंट्रल कमान (CENTCOM) ने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि अमेरिकी सेना ने चाबहार बंदरगाह शहर में स्थित ‘चाबहार शहीद कलंतरी पोर्ट’ सर्विलांस टावर को निशाना बनाया।

    खास बात यह है कि चाबहार बंदरगाह परियोजना में भारत भी कभी ईरान का सहयोगी रह चुका है। भारत ने इस रणनीतिक बंदरगाह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

    16 जुलाई को किया गया हमला
    CENTCOM के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने 16 जुलाई को इस ऑपरेशन को अंजाम दिया और चाबहार शहीद कलंतरी पोर्ट के सर्विलांस टावर को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया। अमेरिकी सेना का कहना है कि यह टावर ईरान के ओमान की खाड़ी तट पर मौजूद समुद्री निगरानी नेटवर्क का हिस्सा था। इसका इस्तेमाल कथित तौर पर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों की निगरानी और कार्रवाई के लिए किया जाता था।

    अमेरिका के अनुसार, टावर के नष्ट होने से IRGC की उस क्षमता को नुकसान पहुंचा है, जिसके जरिए वह रणनीतिक जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर नजर रखने और हमलों के समन्वय का काम करता था।

    अमेरिका ने बताई कार्रवाई की वजह
    CENTCOM ने कहा कि इस हमले से नागरिक जहाजों के क्रू सदस्यों को निशाना बनाने की IRGC की क्षमता कम होगी। अमेरिकी कमान ने यह भी दावा किया कि इस कार्रवाई से क्षेत्रीय जल क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। हालांकि, अमेरिका ने यह भी कहा कि यह सुविधा उन जहाजों के लिए लागू नहीं होगी, जो ईरान के खिलाफ चल रही अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का उल्लंघन करने की कोशिश कर रहे हैं।

    होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ता तनाव
    अमेरिकी कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस व्यापार इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। अमेरिका रणनीतिक रूप से इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और प्रभाव मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान लंबे समय से इस इलाके में अपनी सैन्य और निगरानी क्षमता बनाए हुए है।

    चाबहार और भारत का संबंध
    चाबहार बंदरगाह भारत के लिए भी रणनीतिक महत्व रखता है। भारत ने ईरान के साथ मिलकर इस बंदरगाह के विकास में सहयोग किया था। इसका उद्देश्य भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक वैकल्पिक व्यापार मार्ग उपलब्ध कराना था। यही वजह है कि चाबहार का नाम किसी भी सैन्य कार्रवाई के संदर्भ में आने पर भारत के लिए भी यह घटनाक्रम खास महत्व रखता है।

  • चीन में मकॉक बंदरों की कीमतों में उछाल, एक बंदर के लिए देने पड़ रहे ₹25 लाख से ज्यादा, जाने वजह

    चीन में मकॉक बंदरों की कीमतों में उछाल, एक बंदर के लिए देने पड़ रहे ₹25 लाख से ज्यादा, जाने वजह


    नई दिल्ली। चीन में इन दिनों बंदरों की कीमतों में ऐसी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है कि वे सोने से भी ज्यादा महंगे साबित हो रहे हैं। खासतौर पर मकॉक बंदरों की मांग इतनी बढ़ गई है कि एक-एक बंदर की कीमत करीब 24 से 25 लाख रुपये तक पहुंच गई है। भारी कीमत चुकाने के बाद भी कई वैज्ञानिकों को ये बंदर आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।

    इन बंदरों का इस्तेमाल नई दवाओं की खोज और मेडिकल रिसर्च में किया जाता है। हालांकि, कीमतों में अचानक आए इस उछाल के कारण कुछ शोधकर्ताओं को अपनी स्टडी तक रोकनी पड़ रही है।

    क्यों बढ़ी मकॉक बंदरों की कीमत?
    रिपोर्ट के अनुसार, गुआंगझोउ की जिनान यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक गुओ शियांगयू दिमाग से जुड़ी गंभीर बीमारियों के लिए नॉन-ह्यूमन प्राइमेट मॉडल विकसित करने पर शोध कर रहे हैं। इसके लिए उनकी लैब में मकॉक बंदरों की जरूरत होती है, लेकिन अब इनकी बढ़ती कीमत और कमी के कारण शोध कार्य प्रभावित हो रहा है।

    चीनी नव वर्ष के बाद से लैब में इस्तेमाल होने वाले मकॉक बंदरों की कीमत लगातार बढ़ी है। वर्तमान में सप्लायर एक मकॉक बंदर के लिए करीब 1 लाख 80 हजार युआन, यानी लगभग 25 लाख 58 हजार 772 रुपये तक मांग रहे हैं।

    गुओ शियांगयू के मुताबिक, समस्या सिर्फ कीमत की नहीं है। कई बार इतनी अधिक रकम देने के बावजूद भी बंदर उपलब्ध नहीं हो पाते, क्योंकि मांग बहुत ज्यादा है और सप्लाई सीमित है। गुओ ग्वांगडोंग प्रोविंशियल की-लैबोरेटरी ऑफ नॉन-ह्यूमन प्राइमेट रिसर्च से जुड़े हैं।

    रिसर्च के लिए मकॉक बंदर ही क्यों जरूरी?
    वैज्ञानिकों के अनुसार, मकॉक बंदर इंसानों के सबसे करीब माने जाने वाले जीवों में शामिल हैं। इनके डीएनए और शरीर की जैविक प्रतिक्रिया इंसानों से काफी मिलती-जुलती है। इसी वजह से नई दवाओं और उपचारों की जांच के लिए इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है।

    गुओ ने बताया कि उनकी लैब को हर साल वैज्ञानिक अध्ययन के लिए करीब 30 से 50 बंदरों की जरूरत होती है। इनमें पैथोलॉजिकल और मॉलिक्यूलर बायोलॉजिकल एनालिसिस जैसे शोध शामिल हैं।

    चीन में दवा और बायोटेक उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है। चीनी सरकार नई दवाओं और बायोलॉजिकल मेडिसिन के विकास को बढ़ावा दे रही है। इसका उद्देश्य पश्चिमी देशों की दवा क्षेत्र में पकड़ को चुनौती देकर चीन को दुनिया का प्रमुख मेडिसिन हब बनाना है।

    दवा बनाने की प्रक्रिया में बंदरों की भूमिका
    किसी भी नई दवा को सीधे बाजार में लॉन्च नहीं किया जाता। पहले उसे प्रयोगशालाओं में जांचा जाता है और इसके बाद जानवरों पर परीक्षण किए जाते हैं, ताकि दवा के प्रभाव और सुरक्षा का आकलन किया जा सके। इन चरणों में सफल होने के बाद ही संबंधित अधिकारियों की अनुमति और सर्टिफिकेशन के बाद दवा बाजार में लाई जाती है।

    घटती संख्या बनी वैज्ञानिकों के लिए चुनौती
    चीन ने पिछले कुछ वर्षों में बायोटेक सेक्टर में भारी निवेश किया है। देश में कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, हार्ट अटैक और ऑटोइम्यून जैसी बीमारियों के इलाज के लिए नई दवाओं पर तेजी से काम हो रहा है।

    लेकिन मकॉक बंदरों की कमी अब वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। बढ़ती मांग के कारण जंगलों में इनकी संख्या पर भी असर पड़ रहा है। अनुमान है कि चीन में वर्ष 2025 से 2027 के बीच हर साल लैब रिसर्च के लिए करीब 49 हजार से 52 हजार बंदर ही उपलब्ध हो पाएंगे।

  • ट्रंप के नए प्रस्ताव से अमेरिका में डेढ़ लाख भारतीय ट्रक ड्राइवरों की नौकरी खतरे में

    ट्रंप के नए प्रस्ताव से अमेरिका में डेढ़ लाख भारतीय ट्रक ड्राइवरों की नौकरी खतरे में


    नई दिल्ली।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने प्रवासियों (Migrants) को लेकर एक नया और बेहद विवादित प्रस्ताव पेश किया है, जिसका सीधा और बड़ा असर अमेरिका में रह रहे लाखों भारतीय प्रवासियों (Indian Migrants) पर पड़ सकता है. ट्रंप ने घोषणा की है कि उनकी सरकार देश की सड़कों पर दौड़ रहे बड़ी संख्या में अप्रवासी ट्रक ड्राइवरों को हटाकर उनकी जगह अमेरिकी सेना के सेवानिवृत्त सैनिकों को तैनात करेगी।

    ट्रंप ने आरोप लगाया कि प्रवासियों में से अधिकांश ड्राइवर नशे की लत में डूबे हैं और सड़कों पर कई लोगों की जान ले रहे हैं. पेंसिल्वेनिया में आयोजित मिलिट्री इन्वेस्टमेंट समिट में बोलते हुए ट्रंप ने कहा कि उनका प्रशासन गैर-कानूनी और बिना उचित दस्तावेजों के बड़े ट्रक चलाने वाले ड्राइवरों के खिलाफ देशव्यापी कार्रवाई कर रहा है।

    ट्रंप ने कहा, “मेरा प्रशासन जल्द ही अवैध विदेशी ट्रक ड्राइवरों के खिलाफ ऐतिहासिक कार्रवाई करेगा, जो सड़कों पर कई लोगों की जान ले रहे हैं. वे सड़कों पर लगे साइन बोर्ड तक नहीं पढ़ सकते. उनमें से कई ड्रग्स या शराब के नशे में होते हैं. वे पूरी तरह से अवैध रूप से देश में आए हैं, और हम उन्हें अमेरिकी सड़कों पर गाड़ियां चलाते हुए नहीं देखना चाहते।

    ट्रंप ने आगे कहा कि इन ड्राइवरों की जगह गर्वित अमेरिकी दिग्गजों को दी जाएगी. प्रस्ताव के तहत, सेना में भारी ट्रक चलाने का अनुभव रखने वाले किसी भी अमेरिकी नागरिक को बिना किसी परेशानी के सीधे कमर्शियल ड्राइविंग लाइसेंस (CDL) जारी कर दिया जाएगा।


    2 लाख प्रवासियों के लाइसेंस पहले ही हो चुके हैं रद्द

    यह कोई हवाई घोषणा नहीं है, बल्कि ट्रंप प्रशासन इस पर पहले से ही एक बड़ा क्रैकडाउनकर रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी साल मार्च में नए नियमों के तहत लगभग 2,00,000 अप्रवासी ड्राइवरों के कमर्शियल लाइसेंस रद्द कर दिए गए हैं, जिनके पास पहले अमेरिका में रहने और काम करने का कानूनी अधिकार था।

    दरअसल, अमेरिकी नागरिकों द्वारा ट्रक ड्राइविंग से दूरी बनाने के कारण हाल के वर्षों में वैध और अवैध दोनों तरह के प्रवासियों के लिए यह सेक्टर मोटी कमाई का जरिया बन गया था।

    भारतीय समुदाय, खासकर सिख और पंजाबी ड्राइवरों को लगेगा तगड़ा झटकानॉर्थ अमेरिकन पंजाबी ट्रकर्स एसोसिएशन (NAPTA) के आंकड़ों के मुताबिक, इस समय अमेरिका में करीब 1.3- 1.5 लाख ट्रक ड्राइवर पंजाब और हरियाणा के रहने वाले हैं।

    यदि ट्रंप का यह नया प्रस्ताव पूरी तरह लागू होता है, तो इन परिवारों की रोजी-रोटी पर सीधा संकट आ जाएगा. भारतीय मूल के ट्रक चालक पहले से ही सरकार के कड़े फैसलों, जैसे- अनिवार्य अंग्रेजी दक्षता परीक्षा और नए दलीला कानून की मार झेल रहे हैं।

  • मेक्सिको में आया 7.4 की तीव्रता का भूकंप, आसपास के कई देशों में महसूस हुए झटके

    मेक्सिको में आया 7.4 की तीव्रता का भूकंप, आसपास के कई देशों में महसूस हुए झटके


    मेक्सिको सिटी।
    मेक्सिको (Mexico) में 7.4 की तीव्रता के साथ भयंकर भूकंप (Earthquake) आया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक देश के दक्षिणी राज्य चियापास (Southern state Chiapas) के पास इसका केंद्र था। इस शक्तिशाली भूकंप (Powerful Earthquake) की वजह से मेक्सिको समेत आस पास के कई देशों जैसे कि अल सल्वाडोर और ग्वाटेमाला में झटके महसूस किए गए हैं। हालांकि अभी तक मानवीय नुकसान के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।

    शुक्रवार को आए इस भूकंप के बारे में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) विभाग ने स्पष्ट रूप से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भूकंप का केंद्र मेक्सिकों के प्यूर्टो मादेरो शहर से करीब 10 किलोमीटर की गहराई में था। अब ऑफ्टर शॉक की वजह से और भी झटके आने की आशंका है। रिपोर्ट्स के मुताबिक 7.4 तीव्रता के झटके बाद कई झटके और लगे। इसमें सबसे तेज झटका 6.1 की तीव्रता का था।

    मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शिनबाम ने कहा कि भूकंप के बाद चियापास और टबास्को राज्यों में नुकसान की कोई तत्काल खबर नहीं मिली है। प्रभावित इलाकों में नुकसान का आकलन जारी है और अधिकारी स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। वहीं, ग्वाटेमाला के राष्ट्रपति बर्नार्डो अरेवालो ने भी पुष्टि की, “अब तक किसी की मौत की खबर नहीं है। एजेंसियां पल-पल की स्थिति पर नजर रख रही हैं।” उन्होंने आगे कहा, “मैं लोगों से शांत रहने और ऐसे मामलों में दी गई सलाह का पालन करने की अपील करता हूं।”


    सुनामी की चेतावनी जारी

    इस शक्तिशाली भूकंप के बाद अमेरिकी अमेरिकी सुनामी चेतावनी प्रणाली (US Tsunami Warning System) ने इस क्षेत्र के लिए सुनामी खतरे की चेतावनी जारी की है। इसके साथ ही उन्होंने प्रभावित तटीय इलाकों में समुद्र के जल-स्तर में खतरनाक बदलाव की संभावना के प्रति आगाह किया।

    सोशल मीडिया पर भूकंप के बाद के कई वीडियो वायरल हो रहे हैं। इसमें इमारतें तेजी के साथ हिलती हुई नजर आ रही हैं।

    मेक्सिको में आए इस भूकंप का असर पड़ोसी देशों में भी देखा गया। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ग्वाटेमाला सिटी में इमारतें बुरी तरह से हिल गई हैं। दूसरी तरफ अल सल्वाडोर में भी निवासियों ने तेज भूकंप के झटके महसूस किए हैं। फिलहाल किसी भी देश में कितना नुकसान हुआ है, इसके बारे में स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। हालांकि, इतने शक्तिशाली भूकंप के बाद नुकसान की आशंका बढ़ गई है।

    यह भूकंप ऐसे समय में सामने आया है। जब कुछ समय पहले ही मेक्सिको के पड़ोसी देश वेनेजुएला में भूकंप ने तबाही मचाई थी। इसमें कई दर्जन लोग मारे गए थे। भारत समेत कई देशों ने मदद भेजी थी। इसके अलावा अभी हाल ही में न्यूजीलैंड और इंडोनेशिया के पास भूकंप आया था। इसके बाद भी सुनामी की चेतावनी जारी की गई थी।

  • ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बनेंगे एंडी बर्नहैम…. किंग ऑफ नॉर्थ के नाम से हैं मशहूर

    ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बनेंगे एंडी बर्नहैम…. किंग ऑफ नॉर्थ के नाम से हैं मशहूर


    लंदन।
    ब्रिटेन (Britain) को नया प्रधानमंत्री (New Prime Minister) मिल गया है। लेबर पार्टी ने एंडी बर्नहैम (Andy Burnham) के नाम का ऐलान कर दिया है। एंडी ग्रेटर मैनचेस्टर के पूर्व मेयर (Former Mayor Greater Manchester) और मेकरफील्ड से सांसद एंडी हैं। उन्हें मध्य लंदन में आयोजित विशेष सम्मेलन में निर्विरोध रूप से लेबर पार्टी का नया नेता चुन लिया गया है। बर्नहैम सोमवार को ब्रिटेन के नये प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालेंगे।

    पार्टी नेता घोषित होने के बाद अपने पहले ऐतिहासिक भाषण में बर्नहैम ने ‘मैं तैयार हूं’ का नारा दिया। साथ ही देश में नई राजनीति की शुरुआत करने, कामकाजी वर्ग को उनका पुराना गौरव और उम्मीद वापस लौटाने आर्र कीर स्टारमर की बनाई मजबूत नींव पर आगे बढ़ने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के हर हिस्से- चाहे वह उत्तर हो, दक्षिण, स्कॉटलैंड हो या वेल्स, सभी को समान और मजबूत आवाज दी जाएगी।


    पहले भी पार्टी नेतृत्व के लिए लड़ा चुनाव

    ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बनने जा रहे एंडी बर्नहैम का जन्म 7 जनवरी 1970 को हुआ। फिलहाल एंडी, ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर हैं और हाल ही में मेकरफील्ड से सांसद चुने गए हैं। लेबर पार्टी में उन्हें पारंपरिक वामपंथी और उत्तरी इंग्लैंड का सबसे मजबूत चेहरा माना जाता है। बर्नहैम ने 1990 के दशक में राजनीति में कदम रखा। गॉर्डन ब्राउन सरकार में स्वास्थ्य और संस्कृति मंत्री रहे। बर्नहैम इससे पहले पार्टी नेतृत्व के लिए दो बार चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन दोनों बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। 2010 और 2015 में पार्टी नेतृत्व की दौड़ में शामिल हुए, लेकिन एड मिलिबैंड और जेरेमी कॉर्बिन से हार गए।

    बनाई है अपनी अलग पहचान
    एंडी बर्नहैम को ‘किंग ऑफ नॉर्थ’ कहा जाता है। इसके पीछे एंडी का तौर-तरीका है। असल में उन्होंने एक अंदाज के राजनेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई। एंडी ने कीमती सूट और परंपरागत टाई को छोड़कर टी-शर्ट और बॉम्बर जैकेट पहनना शुरू कर दिया। साल 2001 में वह पहली बार संसद पहुंचे। तब उन्होंने टोनी ब्लेयर और गॉर्डन ब्राउन की सरकारों में संस्कृति और स्वास्थ्य मंत्रालय जैसे बड़े पद संभाले। लेकिन 2010 और 2015 में लेबर पार्टी के नेतृत्व की रेस में पिछड़ने के बाद उन्होंने सभी को चौंकाते हुए लंदन का एलीट कूटनीतिक गलियारा छोड़ दिया। यहीं से उनकी पहनावे में बदलाव आया।


    ऐसी रही है लव लाइफ

    एंडी बर्नहैम की पत्नी का नाम है फ्रैंकी। हालांकि उनका पूरा नाम, मैरी-फ्रांस वैन हील है। इन दोनों की पहली मुलाकात साल 1989 में हुई थी। उस वक्त दोनों, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के फिट्जविलियम कॉलेज में पढ़ते थे। फ्रैंकी, नीदरलैंड्स से यहां पढ़ने आई थीं। दोनों के बीच पहले दोस्ती हुई फिर प्यार हो गया, आखिर साल 2000 में दोनों ने शादी कर ली। दोनों अपने बच्चों को बहुत ही सादगी से पालते हैं। उनके बच्चों के नाम जिमी, रोजी और एनी है।

    नेता चुने जाने के बाद क्या बोले
    लेबर पार्टी का चुने जाने के बाद बर्नहैम ने कहा कि ब्रिटिश जनता मौजूदा राजनीति से तंग आ चुकी है। उन्होंने 1980 के दशक की नीतियों की आलोचना करते हुए कहाकि तब राजनीतिक शक्ति का केंद्रीकरण और आर्थिक शक्ति का निजीकरण कर दिया गया था, जिससे जनता आवास, पानी, ऊर्जा और परिवहन जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए ऊंचे दामों के जाल में फंस गई। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे केवल नंबर हासिल करने की राजनीति के बजाय सोशल केयर जैसे बड़े और उपेक्षित मुद्दों को हल करेंगे। इसके साथ ही पूरी पार्टी में एकजुटता का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि वे एक लेबर टीम की संस्कृति का निर्माण करेंगे और उनकी कैबिनेट में पार्टी के हर धड़े और विचारों के नेताओं को जगह दी जाएगी।


    सियासी यात्रा का जिक्र

    अपनी राजनीतिक यात्रा का जिक्र करते हुए बर्नहैम ने कहाकि 2009 में एनफील्ड (लिवरपूल) से उन्होंने महसूस किया था कि यह देश कामकाजी वर्ग के लिए ठीक से काम नहीं कर रहा है। उन्होंने शेफील्ड, स्कैंथॉर्प, साउथ वेल्स और क्लाइड जैसे औद्योगिक व खनन क्षेत्रों का नाम लेते हुए कहा कि इन जगहों के लोगों ने लेबर पार्टी को बनाया, लेकिन राजनीति ने उनकी उपेक्षा की। अब लेबर पार्टी उनके भरोसे को वापस जीतेगी। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती नेता कीर स्टारमर को देश और पार्टी की शानदार सेवा के लिए धन्यवाद दिया, जिनके नेतृत्व में पार्टी अपनी सबसे बड़ी हार से उबरकर सबसे बड़ी जीत तक पहुंची और वैश्विक मंच पर ब्रिटेन की साख मजबूत हुई।


    कैसे बना रास्ता

    बता दें कि लेबर पार्टी को मई में हुए स्थानीय चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री सर कीर स्टार्मर पर पद छोड़ने का भारी दबाव बन गया था। इसी बीच बर्नहैम ने जून में मेकरफील्ड उपचुनाव में शानदार जीत दर्ज कर संसद में वापसी की। उनके सांसद बनते ही राजनीतिक समीकरण बदल गए और स्टार्मर ने अपने पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी। सोमवार को प्रधानमंत्री ऑफिस ‘10 डाउनिंग स्ट्रीट’ में स्टॉर्मर के भावुक संबोधन के तुरंत बाद बर्नहैम ने ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में सांसद के रूप में औपचारिक रूप से शपथ ली।

  • Pak: आतंकी संगठनों में अब महिलाओं की हो रही भर्ती… हनी ट्रैप की भी दी जा रही ट्रेनिंग

    Pak: आतंकी संगठनों में अब महिलाओं की हो रही भर्ती… हनी ट्रैप की भी दी जा रही ट्रेनिंग


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की केंद्रीय खुफिया एजेंसियों (Intelligence agencies) के ताजा आकलन में पाकिस्तान (Pakistan) स्थित आतंकी संगठनों (Terrorist organizations) की रणनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। खुफिया इनपुट के अनुसार, आतंकी संगठन अब महिलाओं की सुनियोजित तरीके से भर्ती के लिए गुप्त प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे हैं। इन प्रशिक्षण मॉड्यूल का उद्देश्य महिलाओं को आतंकवादी नेटवर्क में अलग-अलग भूमिकाओं के लिए तैयार करना है।

    ये प्रशिक्षण कार्यक्रम 2 से 4 सप्ताह तक चलते हैं और इन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा जीवन कौशल सिखाने के नाम पर आयोजित किया जाता है। हालांकि, वास्तविक मकसद महिलाओं को आतंकी संगठनों के लिए तैयार करना है। एजेंसियों के अनुसार, इन कार्यक्रमों के लिए बैच बनाए जाते हैं। कुछ चुनिंदा मदरसों को भी इस अभियान का हिस्सा बनाया जाता है।

    इन स्थानों पर आने वाली महिला परिजनों के जरिए भर्ती और प्रशिक्षण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रचार ऐसे किया जाता है कि यह मजबूत आस्था और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की इच्छा रखने वाली महिलाओं के लिए है। इसके जरिए धार्मिक प्रतिबद्धता व व्यक्तिगत विकास को प्रमुख उद्देश्य बताकर महिलाओं को आकर्षित किया जाता है।


    ड्रोन संचालन की ट्रेनिंग

    प्रशिक्षण में महिलाओं को विभिन्न भूमिकाओं के लिए तैयार किया जा रहा है। इनमें शामिल हैं बैक-एंड लॉजिस्टिक और ऑपरेशनल सपोर्ट, तकनीकी सहायता, ड्रोन संचालन, खुफिया जानकारी जुटाना, हनी-ट्रैप के जरिए लक्ष्यों को फंसाना और समझौता कराने जैसी गतिविधियां। यह व्यवस्था आतंकियों को जमीनी स्तर पर मजबूत बैक-एंड सपोर्ट उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार की जा रही है।


    कई ठिकाने चिन्हित

    खुफिया एजेंसियों ने बहावलपुर, फैसलाबाद सहित आधा दर्जन से अधिक ऐसे स्थानों की पहचान की है, जहां महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ये इलाके पिछले दो दशकों से विभिन्न आतंकी संगठनों के प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक केंद्र माने जाते रहे हैं।


    ऑपरेशन सिंदूर के बाद रणनीति में बदलाव

    खुफिया अधिकारियों का कहना है ऑपरेशन सिंदूर के बाद आतंकियों की भर्ती रणनीति में यह बड़ा बदलाव देखा गया है। महिलाओं की पहचान उनकी क्षमता और भूमिका के आधार पर की जा रही है और उन्हें विशेष कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।

  • कुवैत का बड़ा दावा, ईरान ने डिसैलिनेशन प्लांट पर किया हमला, बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर मंडराया संकट

    कुवैत का बड़ा दावा, ईरान ने डिसैलिनेशन प्लांट पर किया हमला, बिजली उत्पादन और पेयजल आपूर्ति पर मंडराया संकट

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच कुवैत ने ईरान पर अपने महत्वपूर्ण डिसैलिनेशन और बिजली संयंत्र पर हमला करने का आरोप लगाया है। कुवैती प्रशासन का कहना है कि इस हमले से संयंत्र को भारी नुकसान पहुंचा है और कुछ हिस्सों में आग भी लग गई थी। घटना के बाद राहत और मरम्मत कार्य तत्काल शुरू कर दिया गया है, जबकि सुरक्षा एजेंसियां पूरे मामले की निगरानी कर रही हैं।

    कुवैत के बिजली, पानी और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार हमले के कारण बिजली उत्पादन से जुड़ी कई इकाइयों को क्षति पहुंची है। अधिकारियों ने बताया कि आग पर समय रहते काबू पा लिया गया, जिससे बड़े स्तर पर नुकसान को रोका जा सका। फिलहाल तकनीकी विशेषज्ञ प्रभावित इकाइयों का निरीक्षण कर रहे हैं और संयंत्र को दोबारा पूरी क्षमता से संचालित करने की दिशा में कार्य जारी है।

    कुवैत के लिए डिसैलिनेशन संयंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यह देश प्राकृतिक मीठे जल स्रोतों की कमी के कारण अपनी अधिकांश पेयजल जरूरतों के लिए समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने की प्रक्रिया पर निर्भर है। ऐसे में यदि इस तरह के संयंत्र लंबे समय तक प्रभावित रहते हैं तो जल आपूर्ति के साथ-साथ बिजली व्यवस्था पर भी व्यापक असर पड़ सकता है। सरकार ने कहा है कि आवश्यक सेवाओं को बनाए रखने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर भी काम किया जा रहा है।

    कुवैती प्रशासन ने कहा कि इस प्रकार के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमला केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे आम नागरिकों के दैनिक जीवन और आवश्यक सेवाओं पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण संबंधित एजेंसियों को नुकसान का त्वरित आकलन करने और संयंत्र को जल्द से जल्द सामान्य संचालन में लाने के निर्देश दिए गए हैं।

    इस घटना के बीच पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियां भी तेज बनी हुई हैं। क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण कई रणनीतिक ठिकानों और बुनियादी ढांचों को लेकर सुरक्षा चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। हाल के दिनों में दोनों पक्षों के बीच बढ़ी सैन्य कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता का माहौल पैदा कर दिया है, जिसका असर पड़ोसी देशों पर भी दिखाई देने लगा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा और जल आपूर्ति से जुड़े प्रतिष्ठानों पर किसी भी प्रकार का हमला केवल संबंधित देश ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में कुवैत द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक गतिविधियों पर भी नजरें टिकी हुई हैं। फिलहाल इस घटना के संबंध में आधिकारिक स्तर पर आगे की जांच और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है, जबकि कुवैत सरकार ने आवश्यक सेवाओं को निर्बाध बनाए रखने के लिए सभी संबंधित विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं।

  • अमेरिकी चुनाव में दखल के ट्रंप के आरोपों पर चीन का पलटवार, बोला- बेबुनियाद दावे बंद करें, बेहतर संबंधों के लिए माहौल बनाएं

    अमेरिकी चुनाव में दखल के ट्रंप के आरोपों पर चीन का पलटवार, बोला- बेबुनियाद दावे बंद करें, बेहतर संबंधों के लिए माहौल बनाएं

    नई दिल्ली । अमेरिका और चीन के बीच एक बार फिर चुनावी हस्तक्षेप के आरोपों को लेकर जुबानी टकराव तेज हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीन पर अमेरिकी चुनावों में दखल देने और करोड़ों मतदाताओं का डेटा हासिल करने के आरोप लगाए जाने के बाद बीजिंग ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। चीन ने कहा है कि उसने कभी अमेरिकी चुनावों में हस्तक्षेप नहीं किया और न ही उसकी ऐसी कोई मंशा है।

    चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि अमेरिका की ओर से लगाए गए आरोप तथ्यहीन और मनगढ़ंत हैं। उन्होंने कहा कि चीन को बदनाम करने के उद्देश्य से इस प्रकार के बयान दिए जा रहे हैं। उनके अनुसार चीन हमेशा दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति का पालन करता है और अमेरिकी चुनाव उसके लिए किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने का विषय नहीं हैं।

    चीन ने अमेरिका से अपील की कि वह चुनावी राजनीति में चीन का नाम घसीटना बंद करे और दोनों देशों के संबंधों को बेहतर बनाने के लिए सकारात्मक माहौल तैयार करे। प्रवक्ता ने संकेत दिया कि यदि दोनों देश स्थिर और रचनात्मक संबंध चाहते हैं तो आरोप-प्रत्यारोप की बजाय संवाद और सहयोग पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

    यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क बनाए रखने की कोशिशें भी जारी हैं। इसी वर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन का दौरा कर राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए नए संवाद तंत्र पर सहमति जताई थी। इसके बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे की भी तैयारी चल रही है, जिसे दोनों देशों के संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इस बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने आरोप लगाया कि चीन ने अमेरिकी चुनावी प्रणाली को प्रभावित करने के उद्देश्य से करोड़ों मतदाताओं का डेटा अवैध रूप से हासिल किया। उनके अनुसार इस कथित डेटा में मतदाताओं के नाम, पते, फोन नंबर, राजनीतिक संबद्धता और अन्य व्यक्तिगत जानकारियां शामिल थीं। ट्रंप ने दावा किया कि इन सूचनाओं का उपयोग चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने और अन्य गतिविधियों के लिए किया जा सकता था।

    ट्रंप ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास चीन की कथित गतिविधियों से संबंधित जानकारी थी, लेकिन वह पूरी तरह सार्वजनिक नहीं की गई। उन्होंने दावा किया कि कुछ रिपोर्टों में चीन द्वारा अमेरिकी कारोबारी नेताओं और मीडिया से जुड़े लोगों को प्रभावित करने के प्रयासों का भी उल्लेख किया गया था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण सूचनाएं शीर्ष स्तर तक समय पर नहीं पहुंचाई गईं।

    हालांकि चीन ने इन सभी आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहा कि ऐसे दावों का कोई आधार नहीं है। बीजिंग का कहना है कि दोनों देशों के बीच मतभेदों का समाधान संवाद और आपसी सम्मान के माध्यम से होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और भू-राजनीतिक मुद्दों पर पहले से ही तनाव बना हुआ है। ऐसे में चुनावी हस्तक्षेप जैसे आरोप दोनों देशों के संबंधों में नई चुनौती पैदा कर सकते हैं।

    फिलहाल दोनों देशों की ओर से अपने-अपने दावों पर कायम रहने के कारण यह विवाद कूटनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले समय में उच्चस्तरीय बैठकों और आधिकारिक संवाद के दौरान इस मुद्दे पर दोनों पक्षों का रुख अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण माना जाएगा।

  • तीस्ता परियोजना पर बांग्लादेश ने चीन के साथ बढ़ाई साझेदारी, भारत के पुराने प्रस्ताव के बीच नए समझौते से क्षेत्रीय रणनीति पर चर्चा तेज

    तीस्ता परियोजना पर बांग्लादेश ने चीन के साथ बढ़ाई साझेदारी, भारत के पुराने प्रस्ताव के बीच नए समझौते से क्षेत्रीय रणनीति पर चर्चा तेज

    नई दिल्ली । बांग्लादेश द्वारा तीस्ता नदी परियोजना के लिए चीन की सरकारी कंपनी के साथ समझौता किए जाने की खबरों ने दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा पर नई चर्चा शुरू कर दी है। यह परियोजना लंबे समय से बांग्लादेश की प्राथमिक जल संसाधन योजनाओं में शामिल रही है और भारत भी पूर्व में इसमें सहयोग की इच्छा जता चुका था। अब चीन के साथ आगे बढ़ती इस साझेदारी को दोनों देशों के बदलते रणनीतिक समीकरणों के रूप में देखा जा रहा है।

    रिपोर्टों के अनुसार बांग्लादेश ने तीस्ता परियोजना के लिए चीन की सरकारी कंपनी पावर चाइना के साथ सरकार-से-सरकार समझौता किया है। इसके तहत परियोजना के लिए दीर्घकालिक रियायती ऋण व्यवस्था की गई है, जिसकी पुनर्भुगतान अवधि लगभग 50 वर्ष बताई जा रही है। समझौते के बाद चीन के इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों का एक दल परियोजना क्षेत्र में प्रारंभिक सर्वेक्षण के लिए पहुंचा है।

    बताया जा रहा है कि मानसून के दौरान तीस्ता नदी के प्रवाह, तलछट और कैचमेंट क्षेत्र का अध्ययन किया जाएगा ताकि बांध, तट संरक्षण, जल प्रबंधन और अन्य बुनियादी ढांचे की विस्तृत योजना तैयार की जा सके। बांग्लादेश की प्राथमिकता नदी के अतिरिक्त बहाव के बेहतर उपयोग और कृषि के लिए जल उपलब्धता बढ़ाने पर केंद्रित बताई जा रही है।

    तीस्ता नदी भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए महत्वपूर्ण जल संसाधन है। नदी का उद्गम भारत के सिक्किम में है और यह पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। इसी कारण इससे जुड़ी किसी भी बड़ी परियोजना का प्रभाव केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे द्विपक्षीय जल सहयोग और क्षेत्रीय रणनीति के व्यापक संदर्भ में भी देखा जाता है।

    सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता मुख्य रूप से परियोजना क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को लेकर है। यह इलाका भारतीय सीमा और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के अपेक्षाकृत निकट माना जाता है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की मुख्य भूमि को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण भू-भाग है, इसलिए वहां किसी बाहरी देश की दीर्घकालिक तकनीकी और अवसंरचनात्मक मौजूदगी पर स्वाभाविक रूप से रणनीतिक चर्चा होती है।

    पावर चाइना चीन की प्रमुख सरकारी अवसंरचना कंपनियों में से एक है और एशिया तथा अफ्रीका में कई बड़े ऊर्जा और जल प्रबंधन परियोजनाओं में सक्रिय रही है। हालांकि कंपनी को लेकर लगाए जा रहे सैन्य संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। फिर भी भारत में कुछ रणनीतिक विश्लेषक चीन की बढ़ती आर्थिक और तकनीकी मौजूदगी को व्यापक भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से देख रहे हैं।

    इसी बीच बांग्लादेश और चीन के बीच रक्षा सहयोग बढ़ने की अटकलों ने भी चर्चा को और तेज कर दिया है। हालांकि संभावित लड़ाकू विमानों की आपूर्ति या अन्य सैन्य समझौतों को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले दोनों देशों के आधिकारिक बयानों और औपचारिक समझौतों का इंतजार करना जरूरी होगा।

    कुल मिलाकर तीस्ता परियोजना केवल एक जल संसाधन योजना नहीं रह गई है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में बदलते आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक समीकरणों का संकेतक बनती दिखाई दे रही है। आने वाले महीनों में परियोजना के सर्वेक्षण, वित्तीय शर्तों और निर्माण प्रक्रिया से जुड़े आधिकारिक विवरण सामने आने के बाद इसके वास्तविक प्रभाव का अधिक स्पष्ट आकलन संभव हो सकेगा।