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  • न्यूयॉर्क में नेतन्याहू की गिरफ्तारी की बात पर बढ़ा विवाद, इजरायल और अमेरिकी नेताओं ने ममदानी के बयान पर जताई कड़ी आपत्ति

    न्यूयॉर्क में नेतन्याहू की गिरफ्तारी की बात पर बढ़ा विवाद, इजरायल और अमेरिकी नेताओं ने ममदानी के बयान पर जताई कड़ी आपत्ति


    नई दिल्ली ।
    न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी के एक हालिया बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि यदि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने के लिए सितंबर में न्यूयॉर्क आते हैं, तो उनके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय द्वारा जारी आरोपों के संदर्भ में गिरफ्तारी होनी चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी नए कानून के जरिए ऐसा करने का प्रयास नहीं करेंगे और शहर के मौजूदा कानूनी ढांचे के भीतर ही कार्य करेंगे।

    ममदानी ने कहा कि उनके अनुसार नेतन्याहू पर लगे आरोप गंभीर हैं और इस कारण उन्हें न्यायिक प्रक्रिया का सामना करना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी दोहराया कि न्यूयॉर्क शहर का प्रशासन कानून के दायरे में रहकर ही किसी भी निर्णय पर अमल करेगा। उन्होंने संकेत दिया कि इस विषय पर शहर के कानूनी विभाग के साथ चर्चा हुई है, लेकिन किसी प्रकार के विशेष कानूनी बदलाव की योजना नहीं है।

    ममदानी के इस बयान के बाद इजरायल और अमेरिका के कई नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। अमेरिका में इजरायल के राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने कहा कि ऐसी किसी भी कार्रवाई की संभावना व्यावहारिक रूप से नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि अमेरिका रोम संविधि का सदस्य नहीं है, जिसके आधार पर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय काम करता है। उन्होंने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय समझौते के तहत किसी राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख को राजनयिक सुरक्षा प्राप्त होती है और संघीय अधिकार स्थानीय प्रशासन से ऊपर होते हैं।

    संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के राजदूत डेनी डेनन ने भी ममदानी के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि न्यूयॉर्क के मेयर को अंतरराष्ट्रीय विवादों की बजाय शहर के प्रशासनिक और स्थानीय मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रकार के बयान केवल राजनीतिक सुर्खियां बटोरने का प्रयास हैं और इससे किसी कानूनी स्थिति में बदलाव नहीं आएगा। उन्होंने विश्वास जताया कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेंगे और इजरायल का पक्ष अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने रखेंगे।

    न्यूयॉर्क स्थित इजरायल के महावाणिज्य दूतावास की ओर से भी कहा गया कि किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की गिरफ्तारी का आदेश देने का अधिकार शहर के मेयर के पास नहीं होता। उनके अनुसार यह विषय संघीय सरकार, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और कानूनी प्रावधानों से जुड़ा है, इसलिए स्थानीय प्रशासन की भूमिका सीमित है।

    अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं ने भी ममदानी की टिप्पणी का विरोध किया। उनका कहना है कि स्थानीय प्रशासन को विदेश नीति से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप करने के बजाय शहर की कानून-व्यवस्था, महंगाई, आवास संकट और सामाजिक चुनौतियों जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के बयान स्थानीय प्रशासन के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।

    इजरायल में अमेरिका के पूर्व राजदूत डैनियल बी. शापिरो ने भी इस पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसी किसी कार्रवाई का वास्तविक प्रभाव सीमित होगा और इससे इजरायल की आंतरिक राजनीति पर अलग तरह का असर पड़ सकता है। उनके अनुसार इस प्रकार की बयानबाजी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक बहस को और तीखा बना सकती है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर कानूनी और राजनयिक प्रक्रियाएं कहीं अधिक जटिल हैं। इस घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय कानून, राजनयिक प्रतिरक्षा और स्थानीय प्रशासन की शक्तियों को लेकर एक बार फिर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

  • जयशंकर और जांजीबार के राष्ट्रपति म्विनी की अहम मुलाकात, शिक्षा, एआई और डिजिटल सहयोग को नई गति देने पर बनी सहमति

    जयशंकर और जांजीबार के राष्ट्रपति म्विनी की अहम मुलाकात, शिक्षा, एआई और डिजिटल सहयोग को नई गति देने पर बनी सहमति

    नई दिल्ली । भारत और तंजानिया के बीच रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने की दिशा में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने रविवार को जांजीबार, यूनाइटेड रिपब्लिक ऑफ तंजानिया के राष्ट्रपति और रिवोल्यूशनरी काउंसिल के चेयरमैन डॉ. हुसैन अली म्विनी से नई दिल्ली में मुलाकात की। इस बैठक में दोनों नेताओं ने शिक्षा, क्षमता निर्माण, स्वास्थ्य सेवाओं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल तकनीक, जल आपूर्ति और अन्य विकासोन्मुख क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत बनाने के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब भारत और तंजानिया अपने दीर्घकालिक संबंधों को नई तकनीकी और शैक्षणिक साझेदारियों के माध्यम से आगे बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।

    बैठक के बाद विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर ने बातचीत को सकारात्मक और उपयोगी बताते हुए कहा कि भारत जांजीबार और तंजानिया के साथ अपनी विकास साझेदारी को लगातार मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने उच्च शिक्षा, क्षमता निर्माण, स्वास्थ्य, जल आपूर्ति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं पर गंभीर चर्चा की है। उनका कहना था कि ये ऐसे क्षेत्र हैं जो भविष्य की विकास आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

    विदेश मंत्री ने विशेष रूप से शिक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के बढ़ते सहयोग को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आईआईटी जांजीबार भारत और तंजानिया के बीच मजबूत होते शैक्षणिक संबंधों का महत्वपूर्ण प्रतीक है। उनके अनुसार यह परियोजना न केवल दोनों देशों की साझेदारी को नई ऊंचाई देती है, बल्कि अफ्रीका में शिक्षा और कौशल विकास को बढ़ावा देने के लिए भारत की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है। उन्होंने इसे ज्ञान आधारित सहयोग का प्रभावी उदाहरण बताया।

    राष्ट्रपति डॉ. हुसैन अली म्विनी भारत के आधिकारिक दौरे पर हैं और इससे पहले उन्होंने चेन्नई में आयोजित आईआईटी मद्रास के 63वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया था। अपने चेन्नई प्रवास के दौरान उन्होंने भारत और जांजीबार के बीच शैक्षणिक सहयोग की सराहना करते हुए आईआईटी मद्रास के जांजीबार परिसर को दोनों देशों के संबंधों की ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। यह भारत का पहला विदेशी आईआईटी परिसर है, जिसे दोनों देशों के बीच ज्ञान और नवाचार आधारित सहयोग का मजबूत आधार माना जा रहा है।

    नई दिल्ली पहुंचने पर राष्ट्रपति म्विनी का औपचारिक स्वागत किया गया। इस अवसर पर भारत और तंजानिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोगों के बीच संपर्क और साझा विकास प्राथमिकताओं को भी रेखांकित किया गया। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि शिक्षा, डिजिटल नवाचार, स्वास्थ्य सेवाओं और संस्थागत क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने से दोनों देशों के विकास संबंधों को और मजबूती मिलेगी।

    भारत पिछले कुछ वर्षों से अफ्रीकी देशों के साथ विकास साझेदारी को व्यापक रूप देने पर लगातार कार्य कर रहा है। इसी नीति के तहत शिक्षा, प्रौद्योगिकी, डिजिटल परिवर्तन और कौशल विकास को सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। जांजीबार के राष्ट्रपति की यह यात्रा भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। माना जा रहा है कि इस दौरे से भारत और तंजानिया के बीच रणनीतिक, शैक्षणिक और तकनीकी सहयोग को नई गति मिलेगी तथा दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक विकास साझेदारी और अधिक सुदृढ़ होगी।

  • 20 वर्षों बाद व्हाइट हाउस पहुंचे लेबनान के राष्ट्रपति, ट्रंप के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य तनाव पर होगी निर्णायक चर्चा

    20 वर्षों बाद व्हाइट हाउस पहुंचे लेबनान के राष्ट्रपति, ट्रंप के साथ क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य तनाव पर होगी निर्णायक चर्चा


    नई दिल्ली ।
    लेबनान के राष्ट्रपति जोसेफ आउन आधिकारिक दौरे पर अमेरिका पहुंच गए हैं, जहां वह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति, इजरायल-लेबनान सीमा पर तनाव और हिज्बुल्लाह की भूमिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख चर्चा का विषय बनी हुई है। दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की मुलाकात में क्षेत्रीय स्थिरता, सुरक्षा सहयोग और राजनीतिक समाधान की दिशा में आगे की रणनीति पर विचार-विमर्श होने की उम्मीद है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति के निमंत्रण पर वॉशिंगटन पहुंचे राष्ट्रपति आउन और उनकी पत्नी नायमा आउन का एंड्रयूज एयर फोर्स बेस पर औपचारिक स्वागत किया गया। स्वागत समारोह में अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी, अमेरिका में लेबनान की राजदूत, संयुक्त राष्ट्र में लेबनान के प्रतिनिधि तथा लेबनानी दूतावास के राजनयिक और सैन्य अधिकारी मौजूद रहे। इसके बाद राष्ट्रपति आउन अपने आधिकारिक आवास पहुंचे, जहां उन्होंने अमेरिका स्थित लेबनानी दूतावास के अधिकारियों से मुलाकात कर वहां के कामकाज और प्रवासी लेबनानी समुदाय से जुड़े मुद्दों की जानकारी प्राप्त की।

    राष्ट्रपति आउन अपने दौरे की शुरुआत अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ बैठक से करेंगे। इस बैठक में दोनों देशों के बीच रणनीतिक सहयोग, क्षेत्रीय हालात और सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर विस्तृत चर्चा होगी। इसके बाद व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उनका औपचारिक स्वागत करेंगे। दोनों नेताओं के बीच होने वाली द्विपक्षीय वार्ता में हिज्बुल्लाह के हथियारों से जुड़े मुद्दे, लेबनान के दक्षिणी क्षेत्र से इजरायली सेना की वापसी तथा संघर्ष विराम व्यवस्था को प्रभावी बनाने जैसे विषय प्रमुख रहेंगे।

    इस यात्रा के दौरान राष्ट्रपति आउन अमेरिकी सीनेट के कई सदस्यों और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से भी अलग-अलग बैठक करेंगे। इन बैठकों में लेबनान की आर्थिक स्थिति, सुरक्षा सहयोग, मानवीय सहायता, निवेश और दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करने के उपायों पर भी विचार होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दौरा दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों को नई दिशा देने के साथ-साथ क्षेत्रीय कूटनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    जोसेफ आउन पिछले वर्ष लेबनान के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे। इससे पहले वह लंबे समय तक लेबनानी सेना के कमांडर रहे और उन्हें अमेरिका समर्थित सैन्य नेतृत्व के रूप में भी देखा जाता रहा है। राष्ट्रपति बनने के बाद यह उनका पहला व्हाइट हाउस दौरा है और पहली बार उनकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से आमने-सामने मुलाकात होगी। लगभग दो दशक बाद किसी लेबनानी राष्ट्रपति का व्हाइट हाउस पहुंचना इस यात्रा को विशेष महत्व प्रदान करता है।

    मध्य पूर्व में लगातार बदलते सुरक्षा परिदृश्य और सीमा पर बनी संवेदनशील स्थिति के बीच इस मुलाकात पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजरें टिकी हुई हैं। यदि दोनों पक्ष सुरक्षा और राजनीतिक मुद्दों पर किसी साझा समझ तक पहुंचते हैं तो इससे लेबनान, इजरायल और व्यापक पश्चिम एशियाई क्षेत्र में तनाव कम करने की दिशा में सकारात्मक संकेत मिल सकते हैं। साथ ही यह दौरा अमेरिका और लेबनान के बीच भविष्य के सहयोग को नई मजबूती देने का अवसर भी माना जा रहा है।

  • मोजतबा खामेनेई के ठिकाने पर फिर उठे सवाल, इजरायली सुरक्षा अधिकारी के दावे से ईरान की राजनीतिक और सुरक्षा स्थिति पर बढ़ी चर्चा

    मोजतबा खामेनेई के ठिकाने पर फिर उठे सवाल, इजरायली सुरक्षा अधिकारी के दावे से ईरान की राजनीतिक और सुरक्षा स्थिति पर बढ़ी चर्चा

    नई दिल्ली । ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई को लेकर एक नया दावा सामने आने के बाद पश्चिम एशिया की राजनीतिक और सुरक्षा गतिविधियों पर फिर से चर्चा तेज हो गई है। एक इजरायली सुरक्षा अधिकारी के हवाले से यह दावा किया गया है कि मोजतबा खामेनेई फिलहाल ईरान में मौजूद नहीं हैं। हालांकि, इस दावे की किसी स्वतंत्र स्रोत से पुष्टि नहीं हुई है और न ही ईरान की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी किया गया है। ऐसे में इस दावे को सत्यापित तथ्य के बजाय एक पक्ष के दावे के रूप में ही देखा जा रहा है।

    रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली अधिकारी ने कहा कि मोजतबा खामेनेई का लंबे समय से सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं देना कई सवाल खड़े करता है। दावा किया गया कि हाल के दिनों में उनके नाम से जारी किए गए संदेश और सार्वजनिक बयान वास्तव में ईरान के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा तैयार और जारी किए जा रहे हैं। अधिकारी ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के वरिष्ठ पदाधिकारियों की भूमिका हो सकती है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि के लिए कोई आधिकारिक या स्वतंत्र प्रमाण सामने नहीं आया है।

    दावे में यह भी कहा गया कि ईरानी नेतृत्व के भीतर मतभेद गहराते जा रहे हैं और इसका असर देश की सुरक्षा व्यवस्था तथा शीर्ष संस्थानों पर भी पड़ सकता है। इजरायली अधिकारी ने यह भी आरोप लगाया कि ईरान ने इजरायल के खिलाफ एक गुप्त अभियान की योजना तैयार की थी, जिसका उद्देश्य वरिष्ठ इजरायली अधिकारियों को निशाना बनाना था। इस दावे को लेकर भी अभी तक किसी स्वतंत्र एजेंसी या आधिकारिक संस्था ने पुष्टि नहीं की है।

    मोजतबा खामेनेई को लेकर पहले भी कई तरह की अटकलें सामने आती रही हैं। उनकी सार्वजनिक अनुपस्थिति के कारण समय-समय पर उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर विभिन्न दावे किए गए। कुछ रिपोर्टों में उन्हें गंभीर रूप से घायल होने की बात कही गई, जबकि अन्य रिपोर्टों में उनके सुरक्षित होने का दावा किया गया। हालांकि, इन दावों पर भी कोई स्पष्ट और आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

    विश्लेषकों का मानना है कि ईरान और इजरायल के बीच लंबे समय से जारी तनावपूर्ण संबंधों के बीच इस तरह के दावे और प्रतिदावे सामने आते रहते हैं। ऐसे मामलों में दोनों पक्षों की ओर से सूचना युद्ध भी देखने को मिलता है, इसलिए किसी भी दावे को अंतिम निष्कर्ष मानने से पहले आधिकारिक पुष्टि और स्वतंत्र सत्यापन का इंतजार करना आवश्यक होता है।

    फिलहाल मोजतबा खामेनेई के वर्तमान ठिकाने, स्वास्थ्य या सार्वजनिक गतिविधियों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। ईरानी सरकार की ओर से भी इस दावे पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में आने वाले दिनों में यदि किसी पक्ष की ओर से आधिकारिक बयान जारी होता है तो उससे इस पूरे मामले की वास्तविक स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी। अभी तक उपलब्ध जानकारी के आधार पर इतना ही कहा जा सकता है कि यह मामला दावों और अटकलों के बीच बना हुआ है तथा इसकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।

  • ईरान-इराक संबंधों पर व्यक्तिगत बयानों का असर नहीं पड़ना चाहिए, विदेश मंत्रियों की बातचीत में क्षेत्रीय सुरक्षा और बढ़ते तनाव पर गंभीर चर्चा

    ईरान-इराक संबंधों पर व्यक्तिगत बयानों का असर नहीं पड़ना चाहिए, विदेश मंत्रियों की बातचीत में क्षेत्रीय सुरक्षा और बढ़ते तनाव पर गंभीर चर्चा

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में लगातार बदलते सुरक्षा परिदृश्य के बीच ईरान और इराक ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाए रखने की प्रतिबद्धता दोहराई है। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई टेलीफोन वार्ता में क्षेत्रीय तनाव, सुरक्षा चुनौतियों और आपसी सहयोग को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। इस दौरान ईरान ने स्पष्ट किया कि कुछ व्यक्तिगत या गैर-आधिकारिक टिप्पणियों के कारण दोनों देशों के ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध प्रभावित नहीं होने चाहिए।

    ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने अपने इराकी समकक्ष फुआद हुसैन से बातचीत में कहा कि तेहरान और बगदाद के संबंध केवल वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर आधारित नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और साझा रणनीतिक हितों की मजबूत नींव पर खड़े हैं। उन्होंने कहा कि आपसी सम्मान, अच्छे पड़ोसी के सिद्धांत और निरंतर सहयोग के आधार पर दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाना दोनों पक्षों के हित में है।

    वार्ता के दौरान दोनों नेताओं ने हाल के क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर भी विचार-विमर्श किया। दोनों पक्षों ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, सुरक्षा चुनौतियों और उनके संभावित प्रभावों का आकलन किया। चर्चा में इस बात पर भी सहमति जताई गई कि मौजूदा परिस्थितियों में दोनों देशों के बीच नियमित संवाद, समन्वय और कूटनीतिक संपर्क बनाए रखना आवश्यक है ताकि किसी भी प्रकार के तनाव को और बढ़ने से रोका जा सके तथा क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बनाए रखने में सहयोग मिल सके।

    इस बीच क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां भी तेज होती दिखाई दे रही हैं। अमेरिकी सेना ने घोषणा की है कि उसने ईरान के खिलाफ नए हवाई अभियान शुरू किए हैं। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि यह कार्रवाई हाल में हुए उन हमलों के जवाब में की गई है, जिनमें अमेरिकी सैनिक हताहत हुए। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार, इन अभियानों का उद्देश्य ईरान की उन सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है, जिन्हें क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और अमेरिकी बलों के लिए खतरा माना जा रहा है।

    अमेरिकी सेना के अनुसार हालिया हमलों में दो अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई है, जबकि एक अन्य सैनिक के लापता होने की जानकारी दी गई है। इसके बाद सैन्य कार्रवाई को और तेज करते हुए नए हवाई हमलों की शुरुआत की गई। दूसरी ओर, ईरान का कहना है कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के कारण नागरिकों को भी नुकसान पहुंचा है। ईरानी अधिकारियों के अनुसार हाल के हमलों में कई लोगों की मौत हुई है और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए हैं। मृतकों में महिलाओं और बच्चों के शामिल होने का भी दावा किया गया है।

    विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात में एक ओर जहां सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय देशों के बीच कूटनीतिक संपर्क बनाए रखने के प्रयास भी जारी हैं। ईरान और इराक के विदेश मंत्रियों के बीच हुई बातचीत को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। दोनों देशों ने इस बात पर बल दिया कि संवाद और समन्वय ही क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का सबसे प्रभावी माध्यम है। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण बनी हुई है, कूटनीतिक प्रयासों की निरंतरता आने वाले दिनों में क्षेत्र की राजनीतिक और सामरिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • भारत-पाक तनाव के बीच पाकिस्तान का नया NOTAM जारी, भारतीय विमान और सैन्य उड़ानों पर 23 अगस्त तक एयरस्पेस बंद

    भारत-पाक तनाव के बीच पाकिस्तान का नया NOTAM जारी, भारतीय विमान और सैन्य उड़ानों पर 23 अगस्त तक एयरस्पेस बंद

    नई दिल्ली । भारत और पाकिस्तान के बीच जारी कूटनीतिक और सुरक्षा तनाव के बीच पाकिस्तान ने भारतीय विमानों के लिए अपने हवाई क्षेत्र पर लागू प्रतिबंध की अवधि एक बार फिर बढ़ा दी है। नए आदेश के अनुसार भारतीय पंजीकरण वाले सभी विमान, भारतीय एयरलाइंस द्वारा संचालित या लीज पर लिए गए विमान तथा सैन्य उड़ानें अब 23 अगस्त 2026 की रात 11:59 बजे तक पाकिस्तान के एयरस्पेस का उपयोग नहीं कर सकेंगी। पहले यह प्रतिबंध 24 जुलाई को समाप्त होने वाला था, लेकिन अवधि खत्म होने से पहले ही इसे आगे बढ़ाने का फैसला लिया गया है।

    यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है जब दोनों देशों के बीच विमानन संबंध सामान्य नहीं हो सके हैं। सुरक्षा कारणों से लागू यह प्रतिबंध लगातार बढ़ाया जा रहा है और पिछले कई महीनों से इसकी अवधि समय-समय पर आगे बढ़ाई जाती रही है। नए नोटिस के जारी होने के बाद भारतीय विमानन कंपनियों को अपनी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के संचालन में पहले की तरह वैकल्पिक मार्गों का इस्तेमाल करना होगा।

    भारत और पाकिस्तान के बीच विमानन प्रतिबंधों की शुरुआत अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद हुई थी। उस हमले में 26 लोगों की जान चली गई थी, जिसके बाद दोनों देशों के संबंधों में तीखा तनाव देखने को मिला। इसके बाद सुरक्षा और कूटनीतिक कदमों के तहत दोनों देशों ने एक-दूसरे की एयरलाइंस और सैन्य विमानों के लिए अपने-अपने हवाई क्षेत्र पर प्रतिबंध लगा दिया था। तब से यह व्यवस्था लगातार प्रभावी बनी हुई है।

    पाकिस्तान की ओर से जारी नवीनतम NOTAM में स्पष्ट किया गया है कि भारत में पंजीकृत किसी भी विमान को उसके हवाई क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। इसमें वे विमान भी शामिल हैं जो भारतीय एयरलाइंस द्वारा संचालित या लीज पर लिए गए हैं। साथ ही सैन्य उड़ानों पर भी यह प्रतिबंध पहले की तरह लागू रहेगा। इससे दोनों देशों के बीच सीधी हवाई आवाजाही पूरी तरह प्रभावित बनी हुई है।

    इस प्रतिबंध का सबसे अधिक असर उन अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर पड़ता है जिन्हें पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र से होकर गुजरना पड़ता था। अब इन उड़ानों को लंबा वैकल्पिक मार्ग अपनाना पड़ता है, जिससे उड़ान अवधि बढ़ने के साथ ईंधन की खपत और परिचालन लागत भी बढ़ जाती है। कई मामलों में यात्रियों को अधिक यात्रा समय और उड़ानों के संचालन में अतिरिक्त बदलाव का सामना करना पड़ता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक दोनों देशों के बीच सुरक्षा और कूटनीतिक परिस्थितियों में सकारात्मक बदलाव नहीं आता, तब तक इस प्रकार के प्रतिबंध जारी रह सकते हैं। विमानन क्षेत्र में सामान्य स्थिति बहाल होने के लिए दोनों देशों के बीच विश्वास और संवाद की प्रक्रिया का आगे बढ़ना आवश्यक माना जा रहा है। फिलहाल 23 अगस्त तक भारतीय विमानों के लिए पाकिस्तान का हवाई क्षेत्र बंद रहेगा और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का संचालन मौजूदा वैकल्पिक मार्गों के अनुसार ही जारी रहने की संभावना है।

  • मियामी में एंड्रयू और ट्रिस्टन टेट गिरफ्तार, ब्रिटेन ने दुष्कर्म, मानव तस्करी और यौन अपराधों के नए आरोपों के साथ तेज की प्रत्यर्पण प्रक्रिया

    मियामी में एंड्रयू और ट्रिस्टन टेट गिरफ्तार, ब्रिटेन ने दुष्कर्म, मानव तस्करी और यौन अपराधों के नए आरोपों के साथ तेज की प्रत्यर्पण प्रक्रिया


    नई दिल्ली ।
    सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर एंड्रयू टेट और उनके भाई ट्रिस्टन टेट एक बार फिर गंभीर कानूनी विवादों के केंद्र में आ गए हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने दोनों भाइयों को मियामी से हिरासत में लिया है। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब ब्रिटेन में उनके खिलाफ दुष्कर्म, मानव तस्करी, यौन शोषण, गंभीर मारपीट और बाल अश्लील सामग्री से जुड़े कई नए आपराधिक आरोप दर्ज किए गए हैं। गिरफ्तारी के बाद दोनों भाइयों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही कानूनी प्रक्रिया ने नया मोड़ ले लिया है और अब उनके प्रत्यर्पण को लेकर भी गतिविधियां तेज हो गई हैं।

    बताया जा रहा है कि ब्रिटेन में अभियोजन पक्ष ने एंड्रयू टेट और ट्रिस्टन टेट के खिलाफ कुल 38 नए आरोप तय किए हैं। इनमें यौन शोषण के उद्देश्य से मानव तस्करी, दुष्कर्म, गंभीर हिंसा और अश्लील सामग्री से जुड़े मामलों को शामिल किया गया है। एंड्रयू टेट पहले से भी कई आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं, जबकि ट्रिस्टन टेट पर भी दुष्कर्म, मानव तस्करी और हिंसा से संबंधित कई मामले पहले से लंबित हैं। नए आरोप जुड़ने के बाद दोनों भाइयों के खिलाफ कानूनी चुनौती और अधिक गंभीर हो गई है।

    अमेरिकी अधिकारियों ने दोनों को एक न्यायिक वारंट के आधार पर हिरासत में लिया। गिरफ्तारी के बाद आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। माना जा रहा है कि आगे की सुनवाई के दौरान यह तय किया जाएगा कि दोनों भाइयों को ब्रिटेन भेजने की प्रक्रिया किस प्रकार आगे बढ़ेगी। ब्रिटेन पहले ही उनके प्रत्यर्पण की मांग कर चुका है ताकि वहां दर्ज मामलों में न्यायिक कार्रवाई पूरी की जा सके।

    एंड्रयू और ट्रिस्टन टेट लंबे समय से सोशल मीडिया पर अपने विवादित बयानों और जीवनशैली को लेकर चर्चा में रहे हैं। विशेष रूप से महिलाओं को लेकर दिए गए उनके कई बयान लगातार विवादों का कारण बने। इसके बावजूद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके बड़ी संख्या में समर्थक और अनुयायी मौजूद हैं। उनकी लोकप्रियता और विवाद एक साथ बढ़ते रहे हैं, जिसके कारण वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार सुर्खियों में बने रहे।

    दोनों भाइयों के खिलाफ केवल ब्रिटेन ही नहीं बल्कि रोमानिया में भी अलग-अलग आपराधिक मामले चल रहे हैं। वर्ष 2022 में वहां उनकी गिरफ्तारी के बाद उन पर दुष्कर्म, मानव तस्करी और संगठित आपराधिक गतिविधियों से जुड़े आरोप लगाए गए थे। इन मामलों की न्यायिक प्रक्रिया अभी भी जारी है। ऐसे में विभिन्न देशों में चल रही कानूनी कार्रवाइयों ने उनके भविष्य को लेकर अनिश्चितता और बढ़ा दी है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रत्यर्पण प्रक्रिया पूरी होती है तो दोनों भाइयों को ब्रिटेन में दर्ज मामलों का सामना करना पड़ेगा। वहीं अन्य देशों में लंबित मामलों की सुनवाई भी अपने-अपने कानूनी ढांचे के अनुसार जारी रहेगी। इस पूरे घटनाक्रम ने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की जवाबदेही, अंतरराष्ट्रीय न्यायिक सहयोग और गंभीर आपराधिक मामलों में सीमा-पार कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। आने वाले दिनों में अदालतों की कार्यवाही और विभिन्न देशों की कानूनी एजेंसियों के फैसले इस बहुचर्चित मामले की दिशा तय करेंगे।

  • UNGA दौरे से पहले इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर न्यूयॉर्क में गिरफ्तारी की चर्चा तेज, मेयर ममदानी के बयान से बढ़ा अंतरराष्ट्रीय विवाद

    UNGA दौरे से पहले इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर न्यूयॉर्क में गिरफ्तारी की चर्चा तेज, मेयर ममदानी के बयान से बढ़ा अंतरराष्ट्रीय विवाद

    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्तावित सत्र से पहले इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को लेकर न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी का बयान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस का विषय बन गया है। ममदानी ने कहा है कि यदि नेतन्याहू संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने के लिए न्यूयॉर्क आते हैं, तो उनकी गिरफ्तारी की संभावना से जुड़े कानूनी पहलुओं की समीक्षा की जा रही है। इस बयान के सामने आने के बाद कूटनीतिक और कानूनी स्तर पर कई तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं।

    मेयर ममदानी ने स्पष्ट किया कि उनका प्रशासन इस बात का परीक्षण कर रहा है कि क्या न्यूयॉर्क शहर के पास किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई वैधानिक अधिकार मौजूद है। उन्होंने स्वीकार किया कि इस विषय पर अंतिम कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं है, लेकिन संबंधित विभागों के साथ विस्तृत परामर्श जारी है। उनका कहना है कि किसी भी संभावित कदम से पहले सभी संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों का अध्ययन किया जाएगा।

    ममदानी ने यह भी याद दिलाया कि मेयर पद के चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने नेतन्याहू के खिलाफ सख्त रुख अपनाने का वादा किया था। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय द्वारा जारी वारंट और युद्ध अपराधों से जुड़े आरोपों को देखते हुए इस मामले को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके अनुसार ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय कानून और न्यायिक प्रक्रियाओं का सम्मान किया जाना आवश्यक है।

    इस बयान के बाद इजरायल की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। इजरायली पक्ष ने मेयर के बयान पर आपत्ति जताते हुए इसे अनुचित और विवाद को बढ़ाने वाला बताया है। वहीं, इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि किसी विदेशी नेता के खिलाफ स्थानीय प्रशासन की शक्तियां कितनी व्यापक हो सकती हैं और अंतरराष्ट्रीय कानून तथा राजनयिक संरक्षण के बीच संतुलन किस प्रकार बनाया जाता है।

    कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई का विषय केवल स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसमें राष्ट्रीय कानून, अंतरराष्ट्रीय दायित्व और राजनयिक प्रोटोकॉल जैसी कई जटिल प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। इसी कारण इस प्रकार के मामलों में किसी भी निर्णय से पहले विस्तृत कानूनी परीक्षण और विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय आवश्यक माना जाता है।

    सितंबर में प्रस्तावित संयुक्त राष्ट्र महासभा का सत्र हर वर्ष दुनिया के अनेक देशों के शीर्ष नेताओं को एक मंच पर लाता है। ऐसे में यदि नेतन्याहू इस बैठक में भाग लेने के लिए न्यूयॉर्क पहुंचते हैं, तो ममदानी के बयान के कारण पहले से ही राजनीतिक और कानूनी चर्चाएं तेज रहने की संभावना जताई जा रही है। यह भी माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाएं और अधिक स्पष्ट हो सकती हैं।

    पूरा घटनाक्रम केवल एक राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था, राजनयिक अधिकारों और स्थानीय प्रशासन की सीमाओं को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि कानूनी समीक्षा का निष्कर्ष क्या निकलता है और संयुक्त राष्ट्र महासभा से पहले इस विषय पर आगे कौन से घटनाक्रम सामने आते हैं।

  • ईरान-US संघर्ष खतरनाक मोड़ पर….. इस बार हॉर्मुज में तेल नहीं, पानी के लिए छिड़ी भीषण जंग

    ईरान-US संघर्ष खतरनाक मोड़ पर….. इस बार हॉर्मुज में तेल नहीं, पानी के लिए छिड़ी भीषण जंग


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच चल रहा सैन्य टकराव (Military confrontation) अब तेल के कुओं और सैन्य ठिकानों से आगे बढ़कर एक बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। दोनों देशों के बीच जून में हुआ इस्लामाबाद समझौता (Islamabad Agreement) पूरी तरह से टूट चुका है और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) में फिर से भीषण जंग छिड़ गई है।

    इस बार दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को घुटनों पर लाने के लिए पानी से जुड़े बुनियादी ढांचे यानी पानी के सप्लाई सिस्टम को अपना मुख्य निशाना बनाया है। पारंपरिक हवाई हमलों के साथ-साथ अब पानी साफ करने वाले प्लांटों को नष्ट करने की होड़ मची है, जिसने सीधे तौर पर आम नागरिकों की जिंदगी को दांव पर लगा दिया है।


    पानी को क्यों बनाया जा रहा है युद्ध का नया मैदान?

    फारस की खाड़ी दुनिया के उन चुनिंदा हिस्सों में से है, जहां प्राकृतिक रूप से पीने का पानी न के बराबर है। ऐसे में पानी का उत्पादन और उसका वितरण सिस्टम किसी भी देश के वजूद के लिए सबसे संवेदनशील नस है।

    तेल रिफाइनरी या कच्चे तेल के जहाजों पर हमला करने से वैश्विक बाजार और अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। लेकिन जब समंदर के खारे पानी को पीने लायक बनाने वाले डिसेलिनेशन प्लांट को तबाह किया जाता है, तो सीधे तौर पर आम जनता के सामने पीने के पानी का संकट खड़ा हो जाता है।

    ईरान ने फारस की खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों और उसके सहयोगी देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। इनमें से एक बड़ा हमला कुवैत के मुख्य बिजली उत्पादन और डिसेलिनेशन प्लांट पर हुआ। इस हमले से बिजली की कई इकाइयां ठप हो गईं और भयंकर आग लग गई। कुवैत सरकार को आपातकालीन योजनाएं लागू करनी पड़ीं और नागरिकों से पानी व बिजली का इस्तेमाल कम करने की अपील करनी पड़ी है।

    कुवैत अपनी जरूरत का 90 फीसदी पीने का पानी समंदर के पानी को साफ करके हासिल करता है। ऐसे में इन प्लांट्स पर होने वाले हमले देश की पूरी घरेलू जल आपूर्ति को पंगु बना सकते हैं। यह हमला दिखाता है कि खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देश कितने संवेदनशील हैं, क्योंकि उनके ज्यादातर बड़े वॉटर प्लांट समुद्र तटों पर हैं, जो ईरानी मिसाइलों की सीधी जद में आते हैं।


    अमेरिका का पलटवार: ईरान के बुंजी गांव में प्लांट तबाह

    कुवैत पर हमले के लगभग साथ ही, अमेरिकी सेना ने भी अपनी रणनीति बदलते हुए सैन्य ठिकानों के अलावा नागरिक और लॉजिस्टिक्स सुविधाओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। अमेरिका ने ईरान के दक्षिण-पूर्वी होर्मोजगान प्रांत के बुंजी गांव में स्थित एक प्रमुख डिसेलिनेशन प्लांट पर हवाई हमला किया।

    होर्मोजगान वॉटर एंड वेस्टवॉटर कंपनी के मुताबिक, अमेरिकी हमले में प्लांट का पूरा फिल्ट्रेशन इक्विपमेंट (पानी छानने वाले उपकरण) और पंपिंग सिस्टम पूरी तरह तबाह हो गया है। इसके कारण भीषण गर्मी के इस मौसम में 20 से ज्यादा गांवों के लगभग 10,000 लोग बिना पीने के पानी के रहने को मजबूर हो गए हैं, जिससे इलाके में बड़ा मानवीय संकट खड़ा हो गया है।

    इससे पहले भी युद्ध के दौरान कुवैत के ‘दोहा वेस्ट’ डिसेलिनेशन प्लांट को नुकसान पहुंचा था। वहीं ईरान ने अमेरिका पर 8 मार्च को ‘केशम द्वीप’ के वॉटर प्लांट पर भी हमला करने का आरोप लगाया था, जिससे 30 गांवों की पानी सप्लाई रुकी थी। हालांकि, वाशिंगटन ने इसकी पुष्टि नहीं की थी।

    खाड़ी देश पानी के लिए डिसेलिनेशन पर इतने निर्भर क्यों हैं?
    संयुक्त राष्ट्र (UN) के मानकों के अनुसार, अगर किसी देश में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 500 क्यूबिक मीटर से कम रिन्यूएबल ताजा पानी उपलब्ध है, तो उसे ‘पूर्ण जल कमी’ की श्रेणी में रखा जाता है। खाड़ी (GCC) देशों में यह आंकड़ा 100 क्यूबिक मीटर से भी कम है।

    प्राकृतिक संसाधनों की इस कमी के बावजूद, इस क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों में तेजी से शहरीकरण, औद्योगिक विकास और आबादी बढ़ी है। इस चकाचौंध को जिंदा रखने के लिए प्राकृतिक स्रोतों के बजाय पूरी तरह आर्टिफिशयल वाटर सप्लाई का जाल बिछाया गया।

    अगर ये प्लांट काम करना बंद कर दें, तो क्या होगा?
    किसी तेल रिफाइनरी के बंद होने से केवल व्यावसायिक गतिविधियां रुकती हैं, लेकिन वॉटर प्लांट बंद होने का असर अस्पतालों, आपातकालीन सेवाओं और घरों पर हर सेकंड पड़ता है। अगर युद्ध के कारण ये प्लांट लंबे समय के लिए बंद हो जाएं, तो संकट का टाइमलाइन कुछ इस तरह बदल सकता है:

    बहरीन और कतर जैसे बहुत ज्यादा निर्भर देशों को तुरंत पानी की सख्त लिमिट लागू करनी होगी। उद्योगों और कमर्शियल इलाकों का पानी रोककर केवल घरेलू उपयोग को प्राथमिकता दी जाएगी।

    अगर हफ्ते भर में मरम्मत न हुई, तो आबादी का एक बड़ा हिस्सा बूंद-बूंद पानी को तरस जाएगा। खाड़ी की 45°C से ज्यादा की झुलसाने वाली गर्मी में पानी न मिलना बड़े पैमाने पर डिहाइड्रेशन (शरीर में पानी की कमी) और पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी को जन्म दे देगा।


    पानी की सुरक्षा और ऊर्जा का आपस में क्या कनेक्शन है?

    खाड़ी देशों में बिजली और पानी के प्लांट अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए ‘कोग्नरेशन सिस्टम’ के तहत काम करते हैं। थर्मल डिसेलिनेशन प्लांट पानी साफ करने के लिए पास के तेल या गैस से चलने वाले बिजलीघरों से निकलने वाली गर्म भाप का इस्तेमाल करते हैं। वहीं, वे बिजलीघर अपने बॉयलरों को ठंडा रखने और सुरक्षित संचालन के लिए इसी साफ किए गए पानी पर निर्भर होते हैं।

    अगर किसी वॉटर प्लांट के इनटेक पंप या फिल्टर को निशाना बनाया जाता है, तो थर्मल डैमेज से बचने के लिए बिजलीघर को भी अपनी क्षमता कम करनी पड़ती है या उसे बंद करना पड़ता है। यानी पानी पर हमला सीधे तौर पर बिजली ग्रिड को ठप कर देता है।

    आधुनिक वॉटर प्लांट ‘रिवर्स ऑस्मोसिस’ (RO) तकनीक पर चलते हैं, जिसमें बेहद बारीक पॉलीमर मेम्ब्रेन के जरिए नमक को अलग किया जाता है। ये मेम्ब्रेन बेहद नाजुक और महंगी होती हैं। अगर युद्ध के कारण समुद्र में कच्चे तेल का रिसाव होता है और वह दूषित पानी इनटेक पॉइंट तक पहुंच जाता है, तो ये मेम्ब्रेन हमेशा के लिए खराब हो जाती हैं। इन्हें बदलने में महीनों का समय लग सकता है।


    साइबर वॉरफेयर का नया खतरा

    फिजिकल मिसाइल हमलों के अलावा अमेरिका ने चेतावनी दी है कि ईरानी साइबर हैकर्स अमेरिकी पानी और वेस्टवॉटर सिस्टम को निशाना बना रहे हैं। इसके लिए FBI, NSA और CISA ने अलर्ट जारी किया है।

    हैकर्स किसी वायरस या मालवेयर का इस्तेमाल करने के बजाय सिस्टम के प्रोग्रामेबल लॉजिक कंट्रोलर्स में सेंध लगाते हैं, जो पंपों और फिल्टरेशन को ऑटोमैटिक कंट्रोल करते हैं। हैकर्स प्रोग्रामिंग टूल्स का इस्तेमाल करके सामान्य मेंटेनेंस स्टाफ की तरह नेटवर्क में छिप जाते हैं।

    वे उन फाइलों को डिलीट कर देते हैं जो तय करती हैं कि पंप कब चालू या बंद होना है। साथ ही, वे ह्यूमन-मशीन इंटरफेस यानी ऑपरेटर की डिजिटल स्क्रीन पर झूठा डेटा दिखा देते हैं, जिससे अधिकारियों को लगता है कि सब ठीक चल रहा है, जबकि अंदर ही अंदर सिस्टम फेल हो चुका होता है। इससे पहले इजरायल के वॉटर सिस्टम पर भी ऐसा ही हमला हुआ था, जहां पानी में क्लोरीन की मात्रा को चुपके से बढ़ाने की कोशिश की गई थी।


    इंटरनेशनल कानून और CIA की पुरानी चेतावनी

    पेंटागन और अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों को सालों से इस कमजोरी का अंदाजा था। साल 2010 में CIA की एक गोपनीय रिपोर्ट में आगाह किया गया था कि खाड़ी के 90% से ज्यादा पानी का उत्पादन केवल 56 संवेदनशील प्लांट्स में केंद्रित है। इन पर किया गया कोई भी बड़ा हमला पूरे क्षेत्र में राष्ट्रीय आपातकाल ला सकता है।

    जिनेवा कन्वेंशन का उल्लंघन, अनुच्छेद 54 (पैराग्राफ 2) के तहत इंटरनेशनल मानवीय कानून साफ तौर पर कहता है कि- नागरिक आबादी के जिंदा रहने के लिए अपरिहार्य वस्तुओं, जैसे कि भोजन, कृषि क्षेत्र… और पीने के पानी के प्रतिष्ठानों और सप्लाई को नष्ट करना, हटाना या बेकार करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।”

  • तेहरान में ट्रंप परिवार को लेकर विवादित होर्डिंग, ताबूतों में दिखाया, लिखा- 'खून का बदला खून'

    तेहरान में ट्रंप परिवार को लेकर विवादित होर्डिंग, ताबूतों में दिखाया, लिखा- 'खून का बदला खून'


    नई दिल्‍ली । अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच तेहरान में एक ऐसा सरकारी समर्थित होर्डिंग लगाया गया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छेड़ दी है. राजधानी तेहरान के फिलिस्तीन स्क्वायर में लगाए गए इस विशाल होर्डिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उनकी पत्नी मेलानिया ट्रंप और उनके बच्चों को अमेरिकी झंडे से ढके ताबूतों के ऊपर दिखाया गया है. इसके साथ बड़े अक्षरों में लिखा है- ‘खून का बदला खून’

    रिपोर्ट के मुताबिक यह होर्डिंग अमेरिका और इजरायल के उन हमलों के जवाब के रूप में देखा जा रहा है, जिनमें ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई और उनके परिवार के कई सदस्य मारे गए थे. होर्डिंग में व्हाइट हाउस की पृष्ठभूमि का इस्तेमाल करते हुए ट्रंप परिवार को सीधे निशाने पर दिखाया गया है.

    अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति और उनके पूरे परिवार को सीधे जान से मारने और बदला लेने की यह ईरान की ओर से अब तक की सबसे सीधी और आक्रामक चेतावनी है.

    तेहरान में बढ़ रहे आक्रामक संदेश

    यह अकेला पोस्टर नहीं है. हाल के दिनों में तेहरान के अलग-अलग हिस्सों में कई ऐसे पोस्टर और भित्तिचित्र बनाए गए हैं, जिनमें अमेरिका के खिलाफ तीखे संदेश दिए गए हैं. एक अन्य पोस्टर में ट्रंप को खुले काले ताबूत में लेटा हुआ दिखाया गया है, जिसके ऊपर अंग्रेजी और फारसी भाषा में “हम ट्रंप को मार डालेंगे” लिखा गया है.

    ताबूत पर नीचे सफेद रंग से लिखा है ‘मिनाब के बच्चों की याद में’, जो उस ईरानी शहर का संदर्भ है जहां अमेरिकी हमले में एक प्राइमरी स्कूल की चपेट में आने से कई बच्चों की मौत हो गई थी.

    वहीं, कुछ अन्य पोस्टरों में ट्रंप के चेहरे को बंदूक की क्रॉसहेयर (निशाने) में दिखाया गया है. इसके साथ ही, हाल ही में 71 वर्ष की आयु में दम तोड़ने वाले वरिष्ठ अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम के नीचे लिखा गया है- “अगला कौन?”

    फिलिस्तीन स्क्वायर स्थित जिस इमारत पर यह पोस्टर लगाया गया है, उसका इस्तेमाल लंबे समय से अमेरिका और इजरायल के खिलाफ सरकारी संदेशों के प्रदर्शन के लिए किया जाता रहा है. यहां अक्सर ईरान समर्थक समूह फिलिस्तीनी और हिज़्बुल्लाह के झंडों के साथ प्रदर्शन भी करते हैं.

    पहले भी मिल चुकी हैं धमकियां
    डोनाल्ड ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि यदि ईरान उनकी हत्या की किसी भी कोशिश में शामिल पाया गया, तो अमेरिका की प्रतिक्रिया “बेहद विनाशकारी” होगी. दूसरी ओर, खामेनेई की मौत के बाद ईरानी नेताओं और सरकारी समर्थक मीडिया की ओर से लगातार “बदले” की बात कही जा रही है. उनके उत्तराधिकारी आयतुल्ला मोजतबा खामेनेई ने भी कहा है कि जिम्मेदार लोग “अपने बिस्तर पर भी शांतिपूर्वक नहीं मरेंगे.”

    हालांकि, इस पोस्टर को लेकर ईरानी सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है. वहीं, अमेरिका की तरफ से भी इस पर तत्काल प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.