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  • तीस्ता परियोजना पर बांग्लादेश ने चीन के साथ बढ़ाई साझेदारी, भारत के पुराने प्रस्ताव के बीच नए समझौते से क्षेत्रीय रणनीति पर चर्चा तेज

    तीस्ता परियोजना पर बांग्लादेश ने चीन के साथ बढ़ाई साझेदारी, भारत के पुराने प्रस्ताव के बीच नए समझौते से क्षेत्रीय रणनीति पर चर्चा तेज

    नई दिल्ली । बांग्लादेश द्वारा तीस्ता नदी परियोजना के लिए चीन की सरकारी कंपनी के साथ समझौता किए जाने की खबरों ने दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा पर नई चर्चा शुरू कर दी है। यह परियोजना लंबे समय से बांग्लादेश की प्राथमिक जल संसाधन योजनाओं में शामिल रही है और भारत भी पूर्व में इसमें सहयोग की इच्छा जता चुका था। अब चीन के साथ आगे बढ़ती इस साझेदारी को दोनों देशों के बदलते रणनीतिक समीकरणों के रूप में देखा जा रहा है।

    रिपोर्टों के अनुसार बांग्लादेश ने तीस्ता परियोजना के लिए चीन की सरकारी कंपनी पावर चाइना के साथ सरकार-से-सरकार समझौता किया है। इसके तहत परियोजना के लिए दीर्घकालिक रियायती ऋण व्यवस्था की गई है, जिसकी पुनर्भुगतान अवधि लगभग 50 वर्ष बताई जा रही है। समझौते के बाद चीन के इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों का एक दल परियोजना क्षेत्र में प्रारंभिक सर्वेक्षण के लिए पहुंचा है।

    बताया जा रहा है कि मानसून के दौरान तीस्ता नदी के प्रवाह, तलछट और कैचमेंट क्षेत्र का अध्ययन किया जाएगा ताकि बांध, तट संरक्षण, जल प्रबंधन और अन्य बुनियादी ढांचे की विस्तृत योजना तैयार की जा सके। बांग्लादेश की प्राथमिकता नदी के अतिरिक्त बहाव के बेहतर उपयोग और कृषि के लिए जल उपलब्धता बढ़ाने पर केंद्रित बताई जा रही है।

    तीस्ता नदी भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए महत्वपूर्ण जल संसाधन है। नदी का उद्गम भारत के सिक्किम में है और यह पश्चिम बंगाल से होकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। इसी कारण इससे जुड़ी किसी भी बड़ी परियोजना का प्रभाव केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे द्विपक्षीय जल सहयोग और क्षेत्रीय रणनीति के व्यापक संदर्भ में भी देखा जाता है।

    सुरक्षा विशेषज्ञों की चिंता मुख्य रूप से परियोजना क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को लेकर है। यह इलाका भारतीय सीमा और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के अपेक्षाकृत निकट माना जाता है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत की मुख्य भूमि को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण भू-भाग है, इसलिए वहां किसी बाहरी देश की दीर्घकालिक तकनीकी और अवसंरचनात्मक मौजूदगी पर स्वाभाविक रूप से रणनीतिक चर्चा होती है।

    पावर चाइना चीन की प्रमुख सरकारी अवसंरचना कंपनियों में से एक है और एशिया तथा अफ्रीका में कई बड़े ऊर्जा और जल प्रबंधन परियोजनाओं में सक्रिय रही है। हालांकि कंपनी को लेकर लगाए जा रहे सैन्य संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। फिर भी भारत में कुछ रणनीतिक विश्लेषक चीन की बढ़ती आर्थिक और तकनीकी मौजूदगी को व्यापक भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से देख रहे हैं।

    इसी बीच बांग्लादेश और चीन के बीच रक्षा सहयोग बढ़ने की अटकलों ने भी चर्चा को और तेज कर दिया है। हालांकि संभावित लड़ाकू विमानों की आपूर्ति या अन्य सैन्य समझौतों को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष निकालने से पहले दोनों देशों के आधिकारिक बयानों और औपचारिक समझौतों का इंतजार करना जरूरी होगा।

    कुल मिलाकर तीस्ता परियोजना केवल एक जल संसाधन योजना नहीं रह गई है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में बदलते आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक समीकरणों का संकेतक बनती दिखाई दे रही है। आने वाले महीनों में परियोजना के सर्वेक्षण, वित्तीय शर्तों और निर्माण प्रक्रिया से जुड़े आधिकारिक विवरण सामने आने के बाद इसके वास्तविक प्रभाव का अधिक स्पष्ट आकलन संभव हो सकेगा।

  • भारतीय नौसेना को मिली नई सामरिक ताकत, एक और MH-60R सीहॉक हेलीकॉप्टर हुआ शामिल; भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग पहुंचा नए स्तर पर

    भारतीय नौसेना को मिली नई सामरिक ताकत, एक और MH-60R सीहॉक हेलीकॉप्टर हुआ शामिल; भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग पहुंचा नए स्तर पर

    नई दिल्ली । भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता को और सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए उसके बेड़े में एक और अत्याधुनिक MH-60R सीहॉक नौसैनिक हेलीकॉप्टर शामिल किया गया है। इस नई डिलीवरी के साथ भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को नई गति मिली है। आधुनिक तकनीक से लैस यह हेलीकॉप्टर समुद्री सुरक्षा, पनडुब्बी रोधी अभियानों और निगरानी क्षमताओं को पहले से अधिक प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।

    भारत अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक उपस्थिति को लगातार मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। इसी उद्देश्य से अमेरिका से 24 MH-60R सीहॉक हेलीकॉप्टरों की खरीद का समझौता किया गया था। इन हेलीकॉप्टरों की चरणबद्ध तरीके से आपूर्ति की जा रही है और नई खेप के शामिल होने से भारतीय नौसेना की युद्धक तैयारियों को अतिरिक्त मजबूती मिलेगी।

    यह हेलीकॉप्टर अत्याधुनिक मल्टी-रोल नौसैनिक प्लेटफॉर्म के रूप में जाना जाता है। इसे विशेष रूप से पनडुब्बियों का पता लगाने, समुद्री निगरानी, खोज एवं बचाव अभियान, विशेष नौसैनिक ऑपरेशन और युद्धकालीन मिशनों के लिए विकसित किया गया है। आधुनिक रडार, सोनार, इलेक्ट्रॉनिक सेंसर और उन्नत हथियार प्रणालियों से लैस होने के कारण यह समुद्र में लंबी दूरी तक प्रभावी निगरानी और त्वरित कार्रवाई करने में सक्षम है।

    भारतीय नौसेना इन हेलीकॉप्टरों को अपने युद्धपोतों पर तैनात करेगी, जिससे समुद्र में निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था पहले की तुलना में अधिक मजबूत होगी। विशेष रूप से हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती सामरिक चुनौतियों और समुद्री गतिविधियों के बीच यह क्षमता भारत के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आधुनिक तकनीक से लैस यह प्लेटफॉर्म समुद्री सीमाओं की निगरानी के साथ-साथ संभावित खतरों की समय रहते पहचान करने में भी सहायक होगा।

    भारत और अमेरिका के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुआ है। दोनों देश रक्षा तकनीक, संयुक्त अभ्यास, सैन्य उपकरणों की आपूर्ति और रणनीतिक साझेदारी के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं। नवीनतम हेलीकॉप्टर की डिलीवरी को इसी व्यापक रक्षा सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। यह साझेदारी केवल सैन्य क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा देने के साझा उद्देश्य को भी दर्शाती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य में भारतीय नौसेना के लिए आधुनिक नौसैनिक हेलीकॉप्टरों की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा, पनडुब्बियों की निगरानी और बहुआयामी नौसैनिक अभियानों के दौरान ऐसे प्लेटफॉर्म निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इससे भारतीय नौसेना की त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता और दूरदराज समुद्री क्षेत्रों में संचालन की दक्षता भी बढ़ेगी।

    आने वाले समय में शेष हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति पूरी होने के बाद भारतीय नौसेना की समुद्री युद्ध क्षमता में और व्यापक विस्तार होने की उम्मीद है। अत्याधुनिक तकनीक से लैस इन प्लेटफॉर्मों के शामिल होने से भारत की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था और अधिक मजबूत होगी तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी रणनीतिक उपस्थिति को भी नई मजबूती मिलेगी। रक्षा विशेषज्ञ इसे भारत की दीर्घकालिक समुद्री सुरक्षा रणनीति और आधुनिक सैन्य आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देख रहे हैं।

  • सुंदरबन के दलदली इलाकों में पहली बार फेंसिंग की तैयारी, घुसपैठ और तस्करी रोकने के लिए बीएसएफ ने बनाया 90 किलोमीटर का मास्टर प्लान

    सुंदरबन के दलदली इलाकों में पहली बार फेंसिंग की तैयारी, घुसपैठ और तस्करी रोकने के लिए बीएसएफ ने बनाया 90 किलोमीटर का मास्टर प्लान

    नई दिल्ली । भारत-बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ, अवैध घुसपैठ और सीमा पार तस्करी की गतिविधियों पर पूरी तरह से लगाम लगाने के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कदम उठाया है। राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में पहली बार लगभग 90 किलोमीटर लंबी फेंसिंग (बाड़बंदी) करने की विस्तृत रूपरेखा तैयार कर ली गई है। घने जंगलों, ज्वारीय दलदलों, मिट्टी के तटबंधों और दर्जनों नदी-नालों के नेटवर्क से घिरा यह इलाका भौगोलिक दृष्टि से देश के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण सीमावर्ती क्षेत्रों में से एक माना जाता है, जहां अब तक कोई स्थायी बाड़ नहीं थी।

    केंद्रीय गृह मंत्रालय के सीधे निर्देशों और प्राथमिकताओं के बाद बीएसएफ ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए प्रारंभिक व्यवहार्यता (फीजिबिलिटी) रिपोर्ट तैयार करने और तकनीकी व्यवहार्यता का गहराई से अध्ययन करने का काम युद्ध स्तर पर शुरू कर दिया है। वर्तमान परिस्थितियों में सुंदरबन के इस विस्तृत और दुर्गम नदी क्षेत्र में फेंसिंग न होने के कारण सुरक्षा बल मुख्य रूप से फ्लोटिंग बॉर्डर आउटपोस्ट (एफबीओपी) यानी तैरती हुई सीमा चौकियों और विशेष नौकाओं के माध्यम से गश्त करते हैं। नए मास्टर प्लान के तहत अब समुद्री गश्त को और अधिक आक्रामक बनाने के साथ-साथ पूरे इलाके को आधुनिक तकनीकी निगरानी व्यवस्था से लैस किया जाएगा।

    इस वृहद सुरक्षा योजना को गति देने के उद्देश्य से बीएसएफ के महानिदेशक प्रवीण कुमार ने स्वयं सुंदरबन के संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों का चार दिवसीय दौरा कर सुरक्षा तैयारियों की जमीनी समीक्षा की है। इस उच्च स्तरीय दौरे में सीमा सुरक्षा व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के साथ-साथ प्रस्तावित फेंसिंग कार्य को एक निश्चित समय सीमा के भीतर पूरा करने पर रणनीतिक चर्चा की गई। बैठक में नदी क्षेत्रों में रात्रि गश्त बढ़ाने, अतिरिक्त सर्चलाइटें लगाने और अत्याधुनिक नाइट-विज़न सीसीटीवी कैमरे स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। इस सीमा रेखा का लगभग 71 किलोमीटर लंबा हिस्सा सुंदरबन वन्यजीव अभयारण्य के संरक्षित क्षेत्र से होकर गुजरता है, जिसके कारण निर्माण कार्य के दौरान पर्यावरणीय नियमों का पूरी तरह पालन किया जाएगा।

    सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, हाल के दिनों में प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर आए बदलावों के बाद इस लंबित परियोजना की गति में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली है। पहले संयुक्त भूमि सर्वेक्षण के लिए आवश्यक अनुमतियां न मिलने के कारण यह परियोजना काफी समय तक अधर में लटकी हुई थी। हालांकि सुंदरबन को घुसपैठ का पारंपरिक या मुख्य मार्ग नहीं माना जाता है, लेकिन इसकी भौगोलिक बनावट का फायदा उठाकर तस्कर और अंतरराष्ट्रीय अपराधी अक्सर इसका उपयोग प्रतिबंधित सामानों की तस्करी और अन्य आपराधिक गतिविधियों के लिए करते रहे हैं, जिसे रोकना बेहद अनिवार्य हो गया था।

    इस बीच, फेंसिंग योजना को लेकर स्थानीय आबादी और व्यापारिक संगठनों के बीच भूमि अधिग्रहण को लेकर कुछ चिंताएं और आशंकाएं भी उभर कर सामने आई हैं। सीमा से सटे क्षेत्रों में रह रहे कई स्थानीय परिवारों और वहां पर्यटन व्यवसाय से जुड़े मध्यम आकार के होटल एवं लॉज संचालकों ने संभावित विस्थापन को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों ने जनसंवाद के माध्यम से उन्हें आश्वस्त किया है कि सभी प्रभावित लोगों को नियमों के अनुसार उचित मुआवजा और बेहतर पुनर्वास की व्यवस्था प्रदान की जाएगी। सीमा सुरक्षा बल और राज्य के सिंचाई विभाग की एक संयुक्त टीम जल्द ही इस पूरी भूमि का विस्तृत सर्वेक्षण कार्य शुरू करने जा रही है।

  • UN में भारत की मेंबरशिप की बात पर क्या बोला चीन, 4 ताकतवर देश पहले से ही साथ

    UN में भारत की मेंबरशिप की बात पर क्या बोला चीन, 4 ताकतवर देश पहले से ही साथ

    नई दिल्‍ली। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की अस्थायी सदस्यता के लिए प्रचार अभियान की शुरुआत कर चुके हैं। अब भारत की इस दावेदारी पर चीन ने भी प्रतिक्रिया दे दी है। खास बात है कि चीन वीटो अधिकार प्राप्त सदस्य है।

    UNSC यानी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की अस्थायी सदस्यता के दावे पर अब चीन ने भी प्रतिक्रिया दे दी है। पड़ोसी मुल्क ने कहा है कि वह इस तरह की खबरों पर गौर कर रहा है। खास बात है कि पहले ही कई बड़े देश भारत का साथ दे रहे हैं।

    चीन की तरफ से यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर प्रचार अभियान की शुरुआत कर चुके हैं।
    क्या बोला चीन

    चीन ने गुरुवार को कहा कि उसने 2028-29 की अवधि के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थायी सदस्यता हासिल करने की भारत की दावेदारी से जुड़ी खबरों पर गौर किया है। सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए चुनाव लड़ने की भारत की घोषणा पर चीन के रुख के बारे में पूछे जाने पर चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘चीन ने इससे जुड़ी खबरों पर गौर किया है।’
    क्या बोले जयशंकर

    विदेश मंत्री जयशंकर ने सोमवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए भारत के आधिकारिक प्रचार अभियान की शुरुआत की। इस कार्यक्रम में विभिन्न देशों के राजदूत, राजनयिक और अधिकारी शामिल हुए थे।

    जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा था कि संयुक्त राष्ट्र के प्रति भारत का दृष्टिकोण ‘शांति अर्थात मानदंडों, विश्वास और सत्यनिष्ठा के जरिये समग्र प्रगति सुनिश्चित करने’ पर आधारित है।

    उन्होंने सुरक्षा परिषद में भारत के संभावित कार्यकाल की प्राथमिकताओं का भी विस्तार से उल्लेख किया था।
    चीन नहीं करता भारत का समर्थन

    चीन सुरक्षा परिषद के वीटो अधिकार प्राप्त पांच स्थायी सदस्यों में शामिल है लेकिन उसने अभी तक भारत की दावेदारी का समर्थन नहीं किया है। इसके विपरीत, पांच स्थायी सदस्यों में शामिल अन्य चार देश-अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और फ्रांस-सुधार के बाद गठित होने वाली संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का स्पष्ट रूप से समर्थन कर चुके हैं।
    किस देश से है मुकाबला

    सुरक्षा परिषद में 2028-29 के कार्यकाल के लिए चुनाव अगले साल जून में होंगे। इसमें एशिया-प्रशांत समूह की एकमात्र सीट के लिए भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला होगा।

    भारत पिछली बार 2021-22 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बना था।

    यह संयुक्त राष्ट्र के 15 सदस्यीय इस शक्तिशाली निकाय में भारत का आठवां कार्यकाल था। इससे पहले भारत 1950-1951, 1967-1968, 1972-1973, 1977-1978, 1984-1985, 1991-1992 और 2011-2012 में सुरक्षा परिषद का सदस्य रह चुका है।
    सुरक्षा परिषद में नहीं हुआ खास सुधार

    भारत का कहना है कि UNSC का 80 साल पुराना ढांचा मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिहाज से उपयुक्त नहीं है। और इसी वजह से यह वैश्विक संस्था दुनिया भर में जारी संघर्षों से हो रही मानवीय पीड़ा को खत्म करने में प्रभावी साबित नहीं हुई।

    भारत ने यह भी कहा कि विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को बेहतर ढंग से पूरा करने के लिए वैश्विक वित्तीय ढांचे में भी बदलाव होना चाहिए।

    स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने मंगलवार को कहा, ‘हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र को लेकर लोगों की धारणा नकारात्मक हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों में सुरक्षा परिषद प्रभावी ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर पाई है।’

  • SpaceX: लॉन्चिंग से 1 सेकंड पहले थमा मस्क की कंपनी का मिशन… पैड पर रुकी स्टारशिप की उड़ान

    SpaceX: लॉन्चिंग से 1 सेकंड पहले थमा मस्क की कंपनी का मिशन… पैड पर रुकी स्टारशिप की उड़ान


    वाशिंगटन।
    एलन मस्क (Elon Musk) की कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) की मेगा रॉकेट स्टारशिप (Mega Rocket Starship) गुरुवार को अपने 13वें परीक्षण मिशन के लिए उड़ान भरने से महज एक सेकंड पहले ही रुक गई। लॉन्च से ठीक पहले कुछ इंजनों के सही तरीके से चालू न होने के कारण सिस्टम ने स्वतः लॉन्च को निरस्त कर दिया। इसके बाद रॉकेट को लॉन्च पैड पर ही सुरक्षित रखा गया और ईंधन निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।


    आखिर लॉन्च से ठीक पहले क्या गड़बड़ी हुई?

    स्पेसएक्स ने बताया कि अब यह पता लगाया जाएगा कि आखिर तकनीकी खराबी कहां हुई, उसके बाद ही अगली लॉन्च की तारीख तय की जाएगी। 407 फीट (124 मीटर) ऊंची स्टारशिप 33 मुख्य इंजनों से लैस दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे शक्तिशाली रॉकेट है। यह इसका 13वां परीक्षण मिशन था।


    इंजन स्टार्ट होने के बाद अचानक क्यों रुक गया मिशन?

    स्पेसएक्स के लाइव वेबकास्ट में देखा गया कि निर्धारित उड़ान से तीन सेकंड पहले इंजनों के प्रज्वलन (इग्निशन) की प्रक्रिया शुरू हुई। लॉन्च पैड के ऊपर उड़ रहे ड्रोन कैमरे में यह दृश्य साफ दिखाई दिया। हालांकि, जिन इंजनों ने काम करना शुरू किया था, वे अचानक बंद हो गए और रॉकेट लॉन्च पैड से बंधा ही रह गया। इसके तुरंत बाद लॉन्च टीम ने रॉकेट से ईंधन निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी।


    एलन मस्क ने अगली लॉन्च कोशिश को लेकर क्या कहा?

    एलन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि उम्मीद है कि अगली लॉन्च कोशिश कुछ ही दिनों में की जाएगी।


    मिशन में क्या-क्या भेजा जाना था?

    लॉन्च से पहले तक सब कुछ स्पेसएक्स के पक्ष में दिखाई दे रहा था। मौसम भी पूरी तरह अनुकूल था, लेकिन आंशिक इंजन इग्निशन के बाद मिशन रोकना पड़ा। इस उड़ान के दौरान स्पेसएक्स के 20 नए और सबसे उन्नत स्टारलिंक उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़े जाने थे। लगभग एक घंटे की इस उड़ान में इन उपग्रहों को पहले से कक्षा में मौजूद स्टारलिंक उपग्रहों से संपर्क स्थापित करने के साथ-साथ स्टारशिप की हीट शील्ड की तस्वीरें भी लेनी थीं। इस मिशन में न तो पहले चरण के बूस्टर और न ही अंतरिक्ष यान को वापस लाने की योजना थी। दोनों को अंततः समुद्र में गिरना था।


    नासा के लिए स्टारशिप क्यों है बेहद अहम?

    नासा आने वाले वर्षों में अपने अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर उतारने के लिए स्टारशिप पर भरोसा कर रहा है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने स्पेसएक्स और जेफ बेजोस की कंपनी ब्लू ओरिजिन को ऐसे लूनर लैंडर विकसित करने और उड़ाने का जिम्मा दिया है, जिनकी मदद से आधी सदी से अधिक समय बाद इंसानों की चंद्रमा पर वापसी कराई जाएगी।


    आर्टेमिस मिशन की तैयारी पर क्या पड़ेगा असर?

    दोनों कंपनियों को अगले वर्ष तक अपने-अपने लूनर लैंडर, स्टारशिप और ब्लू मून उड़ान के लिए तैयार रखने होंगे, ताकि हाल ही में घोषित आर्टेमिस-III मिशन के अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी की कक्षा में अपने कैप्सूल की इन लैंडरों के साथ डॉकिंग का अभ्यास कर सकें। इसके बाद आर्टेमिस-IV मिशन, जिसकी योजना 2028 से पहले नहीं है, में इन्हीं लैंडरों में से किसी एक की मदद से दो अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में उतारा जाएगा।

  • भूकंप के तेज झटकों से हिली न्यूजीलैंड की धरती, 5.9 रही तीव्रता….. सुनामी का अलर्ट

    भूकंप के तेज झटकों से हिली न्यूजीलैंड की धरती, 5.9 रही तीव्रता….. सुनामी का अलर्ट


    आकलैंड।
    दक्षिणी-पश्चिमी प्रशांत महासागर (Southwestern Pacific Ocean) में स्थित न्यूजीलैंड (New Zealand) में गुरुवार, 16 जुलाई को) भूकंप (Earthquake) के तेज झटके महसूस किए गए हैं। अधिकारियों ने बताया है कि रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 5.9 (Earthquake magnitude 5.9) थी। अधिकारियों के मुताबिक, गुरुवार को साउथ आइलैंड के पश्चिमी तट पर 5.9 तीव्रता के भूकंप के बाद सुनामी की चेतावनी जारी की गई है और लोगों से तुरंत ऊंचे इलाकों में जाने को कहा गया है। जानकारी के मुताबिक भूकंप का केंद्र ते अनाउ शहर से करीब 40 किलोमीटर उत्तर में था। यह इलाका फियोर्डलैंड जैसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थल का प्रवेश द्वार माना जाता है।

    न्यूजीलैंड के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसी (NEMA) ने लोगों से समुद्री तट और तटीय इलाकों से दूर जाने की सलाह दी है और कहै है कि जितना जल्दी संभव हो सके सबसे नजदीकी ऊंचे स्थान पर जाकर शरण ले लें। फिलहाल, इस भूकंप से किसी तरह का जनहानि की खबर नहीं है। इस बीच, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) और जर्मनी के जियोसाइंस रिसर्च सेंटर (GFZ) ने इस भूकंप की तीव्रता 5.9 दर्ज की है। दोनों एजेंसियों के अनुसार भूकंप का केंद्र 50 किलोमीटर से अधिक गहराई में था। सुनामी के इस अलर्ट का भारत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है क्योंकि वह भारतीय तट से करीब 12000 किलोमीटर की दूरी है।


    अब सुनामी अलर्ट भी कैंसिल

    रॉयटर्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि एजेंसी ने शुरू में भूकंप की तीव्रता 6.3 आंकी थी, जो लोकल टाइम के हिसाब से रात 9.14 बजे (0914 GMT) आया था, फिर इसे घटाकर 5.9 कर दिया गया। अब एजेंसी ने सुनामी अलर्ट भी कैंसिल कर दिया है, NEMA ने कहा कि उसे उम्मीद है कि तटीय इलाकों में “तेज़ और अजीब लहरें और किनारे पर अचानक लहरें” आएंगी। उसने कहा कि लोगों को पानी से, बीच से दूर चले जाना चाहिए, और बंदरगाहों, मरीना और नदियों से दूर रहना चाहिए।


    झटका लंबा और तेज था

    लोकल रहने वाली मेलिन पुयात, जो ते आनु के फियोर्डलैंड होटल की ड्यूटी मैनेजर हैं ने बताया कि भूकंप “थोड़ा तेज़” था और उन्हें एक मिनट तक कंपन महसूस हुआ। उन्होंने कहा, “होटल में कंपन हो रहा है, लेकिन होटल में कुछ भी हिला नहीं।” एक और स्थानीय निवासी ने लोकल आउटलेट ओटागो डेली टाइम्स को बताया कि भूकंप का झटका लंबा और तेज़ था और ट्रेन जैसा लग रहा था। उन्होंने कहा, “दीवारें ज़रूर हिल रही थीं।”

  • यूक्रेन में जेलेंस्की सरकार में बड़ा फेरबदल…. सेरगी कोरेट्स्की बने नए प्रधानमंत्री

    यूक्रेन में जेलेंस्की सरकार में बड़ा फेरबदल…. सेरगी कोरेट्स्की बने नए प्रधानमंत्री


    कीव।
    रूस (Russia) संग जारी युद्ध (War) के बीच यूक्रेन (Ukraine) में एक बार फिर बड़ा सियासी बदलाव हुआ है। राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की (President Volodymyr Zelenskyy) के भरोसेमंद और ऊर्जा क्षेत्र के दिग्गज सेरगी कोरेत्स्की (48) (Sergi Koretsky) को देश का नया प्रधानमंत्री (Prime Minister) बना दिया गया है। यूक्रेन की संसद ने गुरुवार को व्यापक मतदान के बाद कोरेत्स्की को 289 वोटों से मंजूरी दे दी। यह नियुक्ति जेलेंस्की सरकार के उस बड़े फेरबदल का हिस्सा है, जिसका मकसद युद्ध के बीच ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और यूरोपीय संघ की राह को मजबूत करना है।

    बता दें कि राष्ट्रपति जेलेंस्की ने पिछले कुछ महीनों से सरकार में बड़े स्तर पर फेरबदल शुरू किया है। कोरेत्स्की को नामित करते हुए जेलेंस्की ने कहा था कि ऊर्जा क्षेत्र में उनके प्रदर्शन को देखते हुए वे आगामी सर्दियों में युद्ध प्रभावित देश की मदद के लिए सबसे सही विकल्प हैं। संसद में मतदान से पहले कोरेत्स्की ने सांसदों को संबोधित करते हुए अपनी प्राथमिकताओं का खुलासा किया।


    कोरेत्स्की की तीन बड़ी प्राथमिकताएं

    – यूक्रेन की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना
    – आर्थिक स्थिरता को पक्का करना
    – यूरोपीय संघ में शामिल होने की प्रक्रिया को तेज करना


    कौन हैं कोरेत्स्की?

    ट्रेनिंग से इंजीनियर और अर्थशास्त्री सेरगी कोरेत्स्की राजनीतिक दलों से पूरी तरह दूर रहे हैं और उनके पास कोई पूर्व सरकारी अनुभव नहीं है। लेकिन ऊर्जा क्षेत्र में दो दशक से ज्यादा का उनका अनुभव उन्हें इस पद के लिए खास बनाता है।


    करियर

    मई 2025 से नैफ्तोगाज कंपनी के सीईओ के रूप में कार्यरत, जहां वे देश के गैस उत्पादन, आयात और वितरण की पूरी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इससे पहले यूक्रेन की सबसे बड़ी तेल उत्पादक कंपनी उक्रनाफ्टा के प्रमुख रहे। शुरुआती दौर में वेस्टर्न ऑयल ग्रुप का नेतृत्व, कॉन्टिनम ग्रुप के सीईओ और देश की प्रमुख ईंधन स्टेशन चेन WOG का प्रबंधन किया। पश्चिमी शहर लुत्स्क में जन्मे कोरेत्स्की ने निजी क्षेत्र में एक सफल कॉफी चेन व्यवसाय भी शुरू किया था।


    सबसे बड़ी चुनौती

    नए प्रधानमंत्री के सामने सबसे कठिन चुनौती देश के ऊर्जा ढांचे को आगामी सर्दियों के लिए तैयार करना है। पिछले कई महीनों से रूसी मिसाइल और ड्रोन हमलों ने यूक्रेन के बिजली उत्पादन केंद्रों, सबस्टेशनों और गैस पाइपलाइनों को भारी नुकसान पहुंचाया है। राष्ट्रपति जेलेंस्की ने सर्दियों की तैयारी को सरकार की सबसे ऊंची प्राथमिकता बताया है। कोरेत्स्की को उम्मीद है कि उनके ऊर्जा क्षेत्र के गहरे अनुभव से बिजली और गैस आपूर्ति को स्थिर रखा जा सकेगा, ताकि आम लोगों को सर्दी के मौसम में और कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।

  • अमेरिका में भारतीय छात्रों को बड़ा झटका, F-1 वीजा पर रहने की अवधि 4 साल तक सीमित करने की तैयारी

    अमेरिका में भारतीय छात्रों को बड़ा झटका, F-1 वीजा पर रहने की अवधि 4 साल तक सीमित करने की तैयारी


    नई दिल्ली। अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने का सपना देख रहे लाखों विदेशी छात्रों, खासकर भारतीय विद्यार्थियों के लिए नई चुनौती सामने आ सकती है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने F-1 छात्र वीजा नियमों में बदलाव का प्रस्ताव तैयार किया है। इसके तहत अमेरिका में विदेशी छात्रों के रहने की अवधि अधिकतम चार साल तक सीमित की जा सकती है।

    यदि यह नियम लागू होता है, तो दशकों से चली आ रही ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ (Duration of Status) व्यवस्था समाप्त हो जाएगी। वर्तमान व्यवस्था के तहत F-1 वीजा वाले छात्र तब तक अमेरिका में रह सकते हैं, जब तक वे अपने शैक्षणिक कार्यक्रम में सक्रिय हैं और वीजा की सभी शर्तों का पालन कर रहे हैं।

    चार साल से ज्यादा पढ़ाई के लिए लेनी होगी मंजूरी
    रिपोर्ट्स के अनुसार, नए नियम के तहत F-1 वीजा पर अमेरिका जाने वाले छात्रों को सामान्य तौर पर अधिकतम चार साल तक रहने की अनुमति मिलेगी। अगर किसी छात्र का कोर्स, रिसर्च या प्रशिक्षण चार साल से अधिक समय तक चलता है, तो उसे अपनी वैध अवधि समाप्त होने से पहले DHS से एक्सटेंशन की मंजूरी लेनी होगी। समय पर अनुमति नहीं मिलने की स्थिति में छात्र की कानूनी स्थिति प्रभावित हो सकती है।

    यह बदलाव सिर्फ F-1 वीजा तक सीमित नहीं रहेगा। प्रस्तावित नियम J-1 एक्सचेंज विजिटर वीजा और विदेशी मीडिया प्रतिनिधियों को दिए जाने वाले I वीजा पर भी निश्चित अवधि लागू कर सकता है। हालांकि, लागू होने से पहले इस नियम को अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा प्रक्रिया से गुजरना होगा।

    सरकार ने बताई राष्ट्रीय सुरक्षा वजह
    ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इस बदलाव का उद्देश्य छात्र वीजा प्रणाली की निगरानी को मजबूत करना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को प्रभावी बनाना है। वहीं, अमेरिकी विश्वविद्यालयों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठनों ने चिंता जताई है कि नए नियमों से चार साल से अधिक अवधि वाले शैक्षणिक कार्यक्रमों में पढ़ने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

    भारतीय छात्रों पर सबसे ज्यादा असर की आशंका
    इस बदलाव का प्रभाव भारतीय छात्रों पर खास तौर पर पड़ सकता है। ‘ओपन डोर्स 2024’ रिपोर्ट के अनुसार, शैक्षणिक वर्ष 2023-24 में अमेरिका के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में 3.31 लाख से अधिक भारतीय छात्र अध्ययन कर रहे थे। यह संख्या अमेरिका में पढ़ने वाले कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों का करीब 30 प्रतिशत है।

    भारतीय छात्रों का एक बड़ा हिस्सा पीएचडी, रिसर्च आधारित मास्टर्स, मेडिकल ट्रेनिंग, इंजीनियरिंग रिसर्च और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों में दाखिला लेता है, जिनकी अवधि कई बार चार साल से ज्यादा हो जाती है। ऐसे छात्रों को अब पढ़ाई जारी रखने के लिए समय रहते DHS से अतिरिक्त समय की अनुमति लेनी पड़ सकती है।

    एक्सटेंशन में देरी से बढ़ सकती हैं कानूनी मुश्किलें
    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी छात्र का एक्सटेंशन आवेदन समय पर मंजूर नहीं होता या दस्तावेजों की कमी, प्रशासनिक देरी अथवा अन्य कारणों से उसकी वैध अवधि खत्म हो जाती है, तो वह अमेरिका में ‘अनलॉफुल प्रेजेंस’ (अवैध रूप से रहने) की स्थिति में आ सकता है।

    इसका असर भविष्य में वीजा आवेदन, रोजगार के अवसर और अमेरिका में दोबारा प्रवेश पर पड़ सकता है। हालांकि, फिलहाल यह नियम तत्काल प्रभाव से लागू नहीं होगा। अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा पूरी होने और अंतिम प्रभावी तारीख घोषित होने तक F-1 छात्रों के लिए मौजूदा ‘ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस’ व्यवस्था ही जारी रहेगी।

  • रूस से तेल खरीदने पर 100% अमेरिकी टैरिफ का प्रस्ताव, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या पड़ेगा असर?

    रूस से तेल खरीदने पर 100% अमेरिकी टैरिफ का प्रस्ताव, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या पड़ेगा असर?

    नई दिल्ली। रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के अमेरिकी प्रस्ताव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी सीनेटरों के एक समूह ने संशोधित विधेयक पेश किया है, जिसमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों पर रूसी तेल का आयात जारी रखने की स्थिति में भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रस्ताव के कानून बनने की संभावना फिलहाल सीमित है।

    संशोधित विधेयक में क्या है?

    प्रस्तावित बिल में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रीय हित के आधार पर प्रतिबंधों में छूट देने का अधिकार भी दिया गया है। वहीं, 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित कार्रवाई से बाहर रखा गया है, क्योंकि वे सीमित मात्रा में रूसी गैस आयात करते हैं और रूस पर अपनी निर्भरता लगातार कम कर रहे हैं।

    डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह केवल टैरिफ लगाने का प्रस्ताव नहीं, बल्कि रूस की ऊर्जा, वित्तीय और रक्षा अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। यदि यह कानून बनता है तो पहली बार अमेरिकी कांग्रेस किसी तीसरे देश के साथ व्यापार करने वाले देशों पर टैरिफ को दंडात्मक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति देगी।

    वैश्विक तेल बाजार पर पड़ सकता है असर

    ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रूसी तेल की खरीद पर इस प्रकार के सेकेंडरी टैरिफ लागू होते हैं तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    केप्लर के मॉडलिंग एवं रिफाइनिंग विशेषज्ञ सुमित रिटोलिया के अनुसार, वैश्विक बाजार में रूसी कच्चे तेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यदि इसकी आपूर्ति में बड़ी कमी आती है तो उसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा। सीमित अतिरिक्त उत्पादन क्षमता, होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिम और वैकल्पिक आपूर्ति की कमी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।

    भारत के लिए क्यों अहम है रूसी तेल?

    पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत के सबसे बड़े कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया है। रियायती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल ने भारतीय रिफाइनरियों को लागत कम रखने, ईंधन आपूर्ति बनाए रखने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में मदद की है।

    उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, जून में भारत ने प्रतिदिन लगभग 26 लाख बैरल (2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन) रूसी कच्चे तेल का आयात किया, जो देश के कुल क्रूड आयात का 50 प्रतिशत से अधिक था। जुलाई में भी आयात का स्तर मजबूत बना हुआ है।

    क्या भारत को चिंतित होना चाहिए?

    ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का मानना है कि भारत को फिलहाल इस प्रस्ताव को लेकर अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उनके अनुसार, ऐसा ही एक विधेयक लंबे समय से अमेरिकी सीनेट में लंबित है, जिससे स्पष्ट होता है कि ऐसे कठोर प्रावधानों को पर्याप्त राजनीतिक समर्थन नहीं मिल पाया है।

    उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी न्यायिक फैसलों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े कानूनी पहलुओं को देखते हुए इस प्रस्ताव के लागू होने की राह आसान नहीं है। साथ ही यूरोपीय देशों को दी गई छूट यह भी दर्शाती है कि प्रस्ताव सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा रहा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तय करनी चाहिए। यदि भविष्य में इस प्रस्ताव पर आगे बढ़त होती है, तब भी भारत के सामने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और आयात रणनीति का संतुलित मूल्यांकन करना महत्वपूर्ण होगा।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव के बीच सरकार का बड़ा कदम, भारतीय नाविकों की तैनाती पर जारी हुई नई एडवाइजरी

    होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ते तनाव के बीच सरकार का बड़ा कदम, भारतीय नाविकों की तैनाती पर जारी हुई नई एडवाइजरी

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में लगातार बिगड़ते सुरक्षा हालात के बीच भारत सरकार ने भारतीय नाविकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए महत्वपूर्ण कदम उठाया है। समुद्री प्रशासन महानिदेशालय (DGMA) ने शिपिंग कंपनियों और जहाज प्रबंधन से जुड़ी संस्थाओं के लिए नई एडवाइजरी जारी करते हुए निर्देश दिया है कि अगले आदेश तक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों पर भारतीय नाविकों की तैनाती से बचा जाए।

    सरकार का यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है, जब पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों और सुरक्षा संबंधी जोखिमों को देखते हुए समुद्री मार्गों पर अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल है, जहां से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का परिवहन होता है।

    जारी एडवाइजरी में शिप ओनर और शिप मैनेजमेंट कंपनियों से कहा गया है कि भारतीय नाविकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। जब तक सुरक्षा स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक होर्मुज क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों पर भारतीय नागरिकों की तैनाती नहीं की जाए। साथ ही कंपनियों को क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों पर लगातार नजर रखने और सभी सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

    समुद्री प्रशासन का कहना है कि यह फैसला पूरी तरह एहतियाती उपाय के रूप में लिया गया है। खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा हालात लगातार चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं और किसी भी अप्रत्याशित घटना से भारतीय नाविकों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। ऐसे में पहले से सावधानी बरतना आवश्यक माना गया है।

    हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ी सैन्य गतिविधियों और क्षेत्रीय तनाव ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर भी असर डाला है। कई देशों ने अपने नागरिकों और व्यापारिक जहाजों के लिए अलग-अलग स्तर पर सुरक्षा सलाह जारी की है। भारत ने भी इसी क्रम में अपने समुद्री कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण केंद्र है। इस मार्ग पर किसी भी प्रकार का सुरक्षा संकट अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल आपूर्ति और समुद्री परिवहन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए समुद्री कंपनियां भी लगातार सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासन के निर्देशों के अनुरूप अपनी परिचालन रणनीति में बदलाव कर रही हैं।

    सरकार ने शिपिंग कंपनियों से यह भी अपेक्षा की है कि वे अपने जहाजों की आवाजाही और चालक दल की तैनाती से जुड़े सभी निर्णय मौजूदा सुरक्षा आकलन के आधार पर लें। यदि क्षेत्र की परिस्थितियों में कोई नया बदलाव होता है तो उसके अनुसार आगे के निर्देश भी जारी किए जाएंगे।

    भारतीय नाविक दुनिया के विभिन्न देशों के व्यापारिक जहाजों पर बड़ी संख्या में कार्यरत हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। वर्तमान एडवाइजरी को भी इसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण एहतियाती कदम माना जा रहा है, ताकि किसी भी संभावित खतरे की स्थिति में भारतीय समुद्री कर्मियों की सुरक्षा से कोई समझौता न हो।